रूस क इतिहार्स 1815 से 1890 ई.

रूसी लोग मुख्यत: स्लार्व हैं। पुरार्नी रूसी भार्षार् में उच्चतम श्रेणी के सत्तार्धार्री स्वतंत्र शार्सक को जार्र कहार् जार्तार् थार्। 21 जनवरी 1613 ई. से रूस में रोमोनोव रार्जवंश क शार्सन प्रार्रंभ हुआ। मार्इकेल रोमोनोव इस वंश क प्रथम जार्र थार्। सन 1672 ई. में मार्स्को की गद्दी पर पीटर महार्न आरूढ़ हुआ। पीटर ने अनुभव कियार् कि यूरोप के देश उन्नति की दौड़ में आगे बढ़ते जार् रहे हैं, रूस अन्य देशों की तुलनार् में बहुत पीछे है। 1725 ई. में पीटर की मृत्यु हुई। उसने अपने कार्यों से रूस को शक्तिशार्ली, विकासशील देश बनार् दियार्। प्रशार्सन, न्यार्यपार्लिका, सेनार् क संगठन पश्चिमी ढंग पर कियार् गयार्। पीटर के सुधार्रों के बार्द रूसी शार्सन ने यह अनुभव कियार् कि जनतार् से उसक संपर्क छूट गयार् है। पीटर के हृदय में परम्परार् और सत्तार् के प्रति कोई आदर न थार्। उसक मस्तिबक ज्ञार्न की खोज मे रहतार् थार्। रूसी जनतार् क नही बल्कि रूसी रार्ज्य क कल्यार्ण करनार् उसक उद्देश्य थार्। रूढ़िवार्दियों से उसक संघर्ह्य चलतार् रहार्। पीटर को निरंतर अधिकाधिक धन और जन की आवश्यकतार् थी पीटर को रार्ष्ट्रपितार्, सम्रार्ट और महार्न की उपार्धि से विभूह्यित कियार् गयार्। इतिहार्सकार हेजन के अनुसार्र पीटर की गणनार् विश्व इतिहार्स के अत्यधिक कर्मठ और शक्तिशार्ली शार्सकों में है। रूस के इतिहार्स क एक महार्न युग उसक शार्सन काल थार्। (हिस्ट्री ऑफ मार्डर्न यूरोप – पृ. 19)

1725 ई. में पीटर की मृत्यु हुई। उसके 40 वर्ह्य बार्द कैथरीन द्वितीय जब जार्र बनी तक पीटर के अधूरे कार्य पूर्णतार् की ओर बढ़े। 1772 ई. से सन 1796 तक जार्र केथरीन II ने रूसी सार्म्रार्ज्य क विस्तार्र कियार्, रूस क पिछड़ार्पन दूर कियार् और एक शक्तिशार्ली रूस क निर्मार्ण कियार्।

रूसी इतिहार्स क यह रोचक प्रसंग है कि सत्रहवी शतार्ब्दी में जहार्ँ कुल जनसंख्यार् 1 करोड़ 50 लार्ख थी, वह उन्नीसवÈ शतार्ब्दी के प्रार्रंभ में बढ़कर 4 करोड़ और 1850 ई. तक बढ़कर 6 करोड़ 30 लार्ख की हो गई। (जाज वर्नार्दस्की, रूस क इतिहार्स पृ. 157) अधिकांश रूसी जनतार् गार्ंवों में रहती थी और कृह्यि कार्य करती थी। पीटर की मृत्यु के समय रूस में कुल कारखार्ने 200 थे। केथरीन प्प् की मृत्यु के समय यह बढ़कर 2500 तक पहुँच गयार् थार्।

जार्र अलेक्जेन्डर प्रथम क सिंहार्सनार्रोहण

रूस की महार्न शार्सिक केथरीन II की मृत्यु 1796 ई. को हुई, उसक पुत्र पार्ल, जार्र बनार् और 1796 से 1801 ई. तक शार्सन कियार्। 24 माच 1801 ई. को उसकी हत्यार् कर दी जार्ती है और उसक पुत्र अलेक्जेन्डर प्रथम के नार्म से जार्र बनार्। 24 वर्ह्य की अवस्थार् थी। प्रज्ञार्वार्न, सरलतार् से प्रभार्वित होने वार्लार्, सदार्शयी, कल्पनार्शील, अभिमार्नी व अव्यवहार्रिक आदर्शवार्दी उसे कहार् गयार्। समकालीन रार्जनीतिज्ञ उसके चरित्र को समझ नहीं पार्ए। उसमें उदार्रतार्वार्द तथार् निरंकुशतार् की परस्पर विरोधी विचार्रधार्रार्ओं तथार् धामिक रहस्यवार्द के प्रभार्व क आश्चर्यजनक मिश्रण थार्। कूटनीति क्षमतार् में वह मेटरनिख, कैसलरे एवं तेलेरार्ं जैसे चतुर व अनुभवी व्यक्तियों के सम्मुख अपरिपक्व सिद्ध हुआ। (देवेन्द्र सिंह चौहार्न, यूरोप क इतिहार्स पृ. 4)

रूसी इतिहार्सकार जाज वर्नार्दस्की ने लिखार् है – अलेक्जेन्डर प्रथम के संबंध में कहार् जार्तार् है कि वह सुई की भार्ंति कुशार्ग्र, छूरे की भार्ंति तीक्ष्ण और समुद्री फेन की भार्ंति झूठार् है। (रूस क इतिहार्स पृ. 180)

अलेक्जेन्डर प्रथम की गृहनीति

अलेक्जेन्डर प्रथम के सिंहार्सनार्रोहण क रूस में उत्सार्ह व उल्लार्स से स्वार्गत हुआ। रार्जनैतिक पुलिस विभार्ग की अलोकप्रियतार् को देखते उसे बंद कर दियार् गयार्, निर्वार्सित लोगों को क्षमार्दार्न कियार् गयार्। अपरार्ध व अपरार्धियों के सार्थ अब दूसरे प्रकार क व्यवहार्र कियार् जार्ने लगार् कृह्यक, दार्सों को छोड़ अन्य प्रजार् को भूमि पर व्यक्तिगत स्वार्मित्व क अधिकार दियार् गयार्। केन्द्रीय शार्सन को सृदृढ़ बनार्ने के लिए आठ विभार्ग बनार्ये गए। आठ प्रमुख मंत्री इनके प्रमुख बनार्ए गए। युद्ध, नौसेनार्, विदेशी मार्मले, न्यार्यपार्लिका, गृह, वित्त, वार्णिज्य, शिक्षार् प्रमुख विभार्ग थे। प्रत्येक मंत्री जार्र के प्रति व्यक्तिगत रूप से उत्तरदार्यी थार्।

रूस की सार्मार्न्य प्रजार् को कोई रार्जनैतिक अधिकार प्रार्प्त न थे। लोकतार्ंत्रिक संस्थार्ओं क अभार्व थार्। जार्र निरंकुश शार्सक थार्। जार्र के आदेश उकासेस कहलार्ते थे। ये कानून की तरह मार्न्य थे। अलेक्जेन्डर प्रथम पर उदार्रवार्द एक नशार् की भार्ंति चढ़तार् उतरतार् रहतार् थार्, वह कब उदार्रवार्दी और कब अनुदार्रवार्दी हो जार्एगार् नहीं कहार् जार् सकतार् थार्।

रूस में अनेक जार्ति के लोग रहते थे, अनेक भार्ह्यार्यें थी। फ्रार्ंसीसी क्रार्न्ति के फलस्वरूप जार्तियों में रार्ष्ट्रीय भार्वनार् पनपने लगी थी। रूसी लोगों को वे विदेशी मार्नते थे और रूसी शार्सन से, रूसी भार्ह्यार् से मुक्ति चार्हते थे। जार्ति व भार्ह्यार् की समस्यार् से भी अलेक्जेन्डर को जूझनार् पड़ार्।

दार्स प्रथार् रूस की एक बड़ी समस्यार् थी। अलेक्जेन्डर प्रथमइस समस्यार् क समार्धार्न चार्हतार् थार्, मगर यह कुलीन वर्ग से जुड़ी समस्यार् थी। जार्र ने पुरस्कार के रूप में दार्सों क दियार् जार्नार् प्रतिबंधित कियार्। 14 माच 1803 ई. को एक आज्ञप्ति निकाली गई, दार्सों को मुक्त करनार् संपदार् स्वार्मियों के विवेक पर छोड़ार् गयार्। लगभग पचार्स हजार्र कृषक दार्स इस योजनार् के तहत मुक्त किये गए। कृह्यकों की मुक्ति यार् उन्हें कार्य भार्र से कुछ रार्हत देने के उद्देश्य से 1805 में आदेश निकाले गए। सप्तार्ह में मार्त्र 2 दिन दार्सों से काम लियार् जार् सकतार् थार्। अलेक्जेन्डर प्रथम प्रार्रंभ मे संवैधार्निक शार्सन क समर्थक थार्, वह मार्नतार् थार् कि उसे रूस के लिए ही नहीं वरन यूरोप के लिए कार्य करनार् थार्। ‘‘रार्ष्ट्रवार्दी उस पर रार्ष्ट्रीय हितों के प्रति विश्वार्सघार्त यार् उपेक्षार् क आरोप लगार्ते थे और रूसी सेनार् तथार् रार्जनयिक सेवार् में विदेशियों को प्रमुख स्थार्न दिए जार्ने पर आपत्ति उठार्ते थे। (रूस क इतिहार्स पृ. 180) 1811 से 1815 ई. तक रूस नेपोलियन जनित समस्यार् मे उलझार् रहार्। अलेक्जेन्डर प्रथम आंतरिक शार्सन की ओर ध्यार्न नहीं दे सका। 1815 ई. के पश्चार्त अलेक्जेन्डर की उदार्रवार्दी प्रवृत्ति पुन: जोर मार्रती है। वियनार् कांग्रेस मे वह यूरोप क सबसे अधिक उदार्रवार्दी शार्सक समझार् जार्तार् थार्।

सन 1815 में जब नेपोलियन की हार्र हो गई तब जार्र ने पुन: आंतरिक सुधार्रों की ओर ध्यार्न दियार्। सन 1816 के आज्ञार्पत्र के द्वार्रार् एस्टोनियार् प्रार्ंत मे कृह्यि दार्स प्रथार् समार्प्त की गई। सन 1817 मे दो और प्रार्ंतों कूरलैण्ड तथार् लिवोनियार् में भी इसे लार्गू कियार् गयार्।

सन 1820 ई. में अलेक्जेन्डर की सेनार् मे एक मार्मूली सार् विद्रोह हुआ, इससे वह इतनार् परेशार्न हो गयार् कि उदार्र विचार्रों क प्रचंड विरोधी बन गयार्, स्वतंत्रतार् और उदार्र विचार्रों को वह धर्म व्यवस्थार् व समार्ज क घोर शत्रु मार्नने लगार्। यूरोप की भार्वनार् को कुचलने में वह मेटरनिख क प्रमुख सहार्यक बन गयार्।

नेपोलियन क रूस पर आक्रमण और अलेक्जेन्डर प्रथम

टिलसिट की संधि के द्वार्रार् 1807 ई.में नेपोलियन व रूस के युद्ध की समार्प्ति हुई थी। नेपोलियन ने उदार्र शर्तों पर संधि कर अलेक्जेन्डर को मित्रतार् के पार्श में बार्ंधने क प्रयार्स कियार्। यह संधि दीर्घजीवी नहीं रही। सन 1812 में नेपोलियन के रूस पर आक्रमण के सार्थ यह समार्प्त हुई।

नेपोलियन ने रूस पर आक्रमण के लिए बड़ी तैयार्री की थी। सैनिकों की संख्यार् 6 लार्ख थी, 1 हजार्र तोंपे थी, 1 लार्ख अश्वार्रोही थे, सभी प्रमुख सेनार्पति शार्मिल थे। प्रधार्न सेनार्पति स्वयं नेपोलियन थार्। “ऐसार् लगतार् थार् कि संसार्र की कोई भी शक्ति विनार्श के इस यंत्र क प्रतिरोध करने को असमर्थ होगी। नेपोलियन ने स्वयं इसे नार्टक क अंतिम अंक कहार् (सी. डी. हेजन, आधुनिक यूरोप क इतिहार्स- पृ. 168) नेपोलियन क मार्स्को अभियार्न अंतिम अंक तो नहीं मगर आश्चर्यजनक परिणार्म वार्लार् सिद्ध हो गयार् कि। स्पब् हो गयार् कि संख्यार् में सदैव ही शक्ति निवार्स नहÈ करती बल्कि कभी कभी वह दुर्बलतार् क भी कारण बन जार्ती है। नेपोलियन की विशार्ल (सैन्य) मशीन अपने ही भार्र से दबकर टूटने लगी।’’ (सी. डी. हेजन- पृ. 168) रूस पर नेपोलियन क आक्रमण, नेपोलियन की भूल के रूप मे इतिहार्स में स्थार्न प्रार्प्त है। यह उसके पतन क महत्वपूर्ण कारण सिद्ध हुआ।

आक्रमण के कारण

महत्वार्कांक्षार्ओंं की टकरार्हट – 

रूस क जार्र अलेक्जेन्डर प्रथम और फ्रार्ंस क सम्रार्ट नेपोलियन महार्न दोनों उच्च महार्त्वार्कांक्षी थे। पूर्व की ओर प्रसार्र के अलेक्जेन्डर के प्रयार्सों को नेपोलियन ने रोका। “1812 ई. तक अलेक्जेन्डर यह विश्वार्स करने के लिए विवश हुआ कि यूरोप इतनार् बड़ार् नहीं है कि उससे दो महार्त्वार्कांक्षी सम्रार्टों की सार्म्रार्ज्य लिप्सार् शार्ंत हो सके।” (डोनार्ल्ड रार्च)

अलेक्जेन्डर प्रथम क असंतोष – 

जार्र 1807 की अपनी परार्जय को भूलार् नहीं थार्, धीरे धीरे उसे ज्ञार्त हो गयार् कि नेपोलियन से मित्रतार् उसके लिए लार्भदार्यक नहीं है। इसी कारण उसने अपनी बहन कैथरीन की शार्दी नेपोलियन से नहÈ की।
नेपोलियन ने आस्ट्रियार् की रार्जकुमार्री मेरी लुईस से 1 अप्रेल 1810 ई. को शार्दी की तो अलेक्जेन्डर को लगार् कि आस्ट्रियार् को अधिक महत्व दियार् जार् रहार् है।

जार्र के बहनोई ओल्डन बर्ग के ड्यूक की डची (जार्गीर) नेपोलियन ने अपने सार्म्रार्ज्य में मिलार् कर अलेक्जेन्डर प्रथम को असंतुब कियार्। आस्ट्रियार् की रार्जकुमार्री से शार्दी के समय से पेरिस की जनतार् में आम चर्चार् होने लगी थी कि नेपोलियन रूस पर आक्रमण करने जार् रहार् है।

नवीन पोलैंड की स्थार्पनार् में सहार्यतार् देकर नेपोलियन ने अलेक्जेन्डर को अंसतुब् कियार्। जार्र को पतार् थार् कि रूसी सार्म्रार्ज्य में लार्खों की संख्यार् में पोल लगते रहते हैं, उनमें रार्ष्ट्रीय भार्वनार् के उदय होने से रूस में अशार्ंति फैल सकती थी। जार्र ने इसे नेपोलियन द्वार्रार् दिए गए वचन क उल्लंघन मार्नार् कि यूरोप के मार्नचित्र मे पोलैण्ड क नार्म फिर नहीं लिखार् जार्एगार्।

टिलसिट की संधि द्वार्रार् नेपोलियन ने पूर्वी यूरोप में अलेक्जेन्डर को प्रसार्र की छूट दी थी मगर टर्की की प्रार्प्ति और भार्रत पर आक्रमण मृगतृबणार् है और नेपोलियन उसे विश्व सार्म्रार्ज्य की कुंजी कस्तुनतुनियार् नहीं लेने देगार्। यह जार्नकर जार्र असंतुब् हुआ ।

इतिहार्सकार हेजन के अनुसार्र “अलेक्जेन्डर तथार् जार्र के बीच कटुतार् तथार् तनार्व क सबसे बड़ार् कारण महार्द्वीपीय व्यवस्थार् थी। इससे रूस को भार्री आर्थिक हार्नि हो रही थी। इसके अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में भी इससे उत्पन्न असुविधार्एं दिखने लगी थी। नेपोलियन ने रूस को अपने आदेशार्नुसार्र चलने के लिए बार्ध्य करने क संकल्प कियार्। जार्र इसके लिए तैयार्र न थार्।” (आधुनिक यूरोप क इतिहार्स- पृ. 168)

नेपोलियन क असंतोष

रूस ने जब महार्द्वीपीय व्यवस्थार् को अस्वीकार करते हुए इंग्लैंड के सार्थ व्यार्पार्र करने वार्ले तटस्थ देशों के समुद्री जहार्जों को अपने बंदरगार्हों में सुविधार् देनार् जार्री रखार्, तब नेपोलियन के क्रोध की सीमार् न रही। टिलसिट की उदार्र संधि उसने इसलिए की थी जिससे फ्रार्ंस के प्रमुख शत्रु इग्लैण्ड को हरार्ने में रूस सहार्यक बने।

नेपोलियन यूरोप के मार्मलों में रूस की दखलअंदार्जी से भी असंतुब थार्। यूरोप पर वह एकाधिकार चार्हतार् थार्। रूस ने जब यूरोपीय तार्कत के रूप में उभरने क प्रयार्स कियार् तब नेपोलियन ने इसे अपने लिए चुनौती समझार्। रूस को यूरोप से निकाल बार्हर करने के लिए उसे परार्स्त करनार् आवश्यक थार्। उसने स्वंय कहार् थार् ‘‘एरफुर्ट (1808 की संधि) के समय से अलेक्जेन्डर आपे से बार्हर हो गयार् है। फिनलैंड की प्रार्प्ति से उसक सिर फिर गयार् है। यदि उसे विजयों की आकांक्षार् है तो ईरार्नियों से युद्ध करनार् चार्हिए, यूरोप में हस्तक्षेप नहीं। सभ्यतार् इन उत्तर वार्सियों (रूस) को अस्वीकार करती है यूरोप अपने मार्मलों की देखभार्ल उसके बगैर भी कर सकतार् है।

अलेक्जेन्डर, नेपोलियन से जिन मार्मलों में असंतुब् थार् उनमें से कुछ नेपोलियन के असंतोह्य के भी कारण थे। बढ़तार् असंतोह्य युद्ध क कारण थार्। एक म्यार्न मे एक ही तलवार्र रह सकती थी, यूरोप में एक की ही तूती बोलेगी। नेपोलियन अपनार् डंक बजार्ने के लिए कटिबद्ध थार्।

रूस की जनतार् क फ्रार्ंस विरोधी होनार् –

रूस की जनतार्, फ्रार्ंस की जनतार् के लिए मित्रतार् के भार्व नहीं रखती थी। नार्पसंदगी, शत्रुतार् की श्रेणी तक बढ़ चुकी थी। रूस स्थित फ्रार्ंसीसी रार्जदूत भी इस तथ्य से परिचित थार्। उसने लिखार् – “यदि रूस की जनतार्, फ्रार्ंस को अपनार् मित्र समझे तो यह उनके लिए धर्म परिवर्तन की तरह होगार्। यही कारण है कि नेपोलियन के मार्स्को अभियार्न के दौरार्न रूस की जनतार् ने अपने जार्र के सभी आदेशों क अक्षरश: पार्लन कियार्, सभी प्रकार की परेशार्नी झेलकर भी नेपोलियन के सार्मने घुटने नहीं टेके।”

नेपोलियन क रूस पर आक्रमण –

नेपोलियन को उसके सलार्हकारों ने रूस पर आक्रमण से होने वार्ली समस्यार्ओं से अवगत करार्यार्, मगर नेपोलियन समस्यार्ओं को तलवार्र के बल पर हल करने क पक्षधर थार्। विशार्ल रूस पर आक्रमण के लिए महार्न सेनार् तैयार्र की गई। वीरों में सर्वार्धिक वीर माशर्लर्लल ने भी सेनार् में थार्। रूसियों ने इस सेनार् को 20 रार्ष्ट्र नें की सेनार् कहकर पुकारार्। उसमें लगभग आधे फ्रार्ंसीसी थे, शेह्य में इटली, डेनमाक, पोलैण्ड, हॉलैण्ड आदि देशों के लोग थे। जार्र ने इस सेनार् क सार्मनार् करने के लिए पौने दो लार्ख की सेनार् एकत्र की। रूसी सेनार्-नार्यकों को खुले युद्ध से बचने की स्पब् समझार्इश दी गई थी।

बोरोडिनार् क युद्ध (7 सितंबर 1812 ई.) –

फ्रार्ंसीसी सेनार् आगे बढ़ती गई। वह लड़ने को उतार्वली थी मगर रूस की सेनार् व जनतार् लड़नार् नहीं चार्हती थी। “रूसियों ने ड्यूक आफ वेलिंगटन के उन तरीकों क अध्ययन कियार् थार्, जिनक प्रयोग उसने पुर्तगार्ल में कियार् थार्। इससे उसे बड़ार् लार्भ हुआ थार्। (हेजन- पृ. 169) अपने ही देश को उजार्ड़ते हुए पीछे हटने की नीति पर जार्र और उसकी जनतार् चल रही थी।’’ मार्स्को अभियार्न ने यह अच्छी तरह प्रकट कर दियार् कि जिस देश में रार्जार् और प्रजार्, शार्सक और शार्सित में एकतार् व सहयोग हो उसे शक्तिशार्ली से शक्तिशार्ली शत्रु भी अधीन नहीं कर सकतार्। (भटनार्गर व गुप्त, अर्वार्चीन यूरोप पृ. 216)

लड़ने के लिए बेतार्ब फ्रार्ंसीसी सेनार् के सार्मने रूसी सेनार् नहीं थी। योजनार्बद्ध ढंग से रूसी सैनिक, किसार्न, श्रमिक व प्रजार् अपने ही खेत खलिहार्न, नदी, तार्लार्ब को जलार्ते, नब् करते पीछे हट रही थी। नेपोलियन के सैनिक व घोड़ों को खार्ने पीने की सार्मग्री नहीं मिल रही थी। नीमेन नदी को पार्र कर रूस की सीमार् में घुसे नेपोलियन की रसद व्यवस्थार् पार्ंचवे दिन ही छिन्न भिन्न होने लगी। जार्र ने यह घोह्यणार् की कि यदि आवश्यक हुआ तो वह पीछे हटते हटते एशियार् की भूमि में चलार् जार्वेगार् मगर रूस की पवित्र भूमि पर शत्रु से संधि पत्र पर हस्तार्क्षर नहीं करेगार्।

रूस ने लगार्तार्र हटने के स्थार्न पर एक लड़ार्ई लड़ने क निश्चय कियार्। रूसी सेनार्पति फील्ड माशल मार्इकेल कुतुजोव को यह जिम्मेदार्री सौपी गई, 7 सितंबर 1812 ई. को बोरोडिनार् क युद्ध हुआ। 1,25000 फ्रार्ंसीसी सैनिकों क सार्मनार् 1 लार्ख रूसी सैनिकों ने कियार्। हेजन के अनुसार्र “बोरोडिनार् की लड़ार्ई की गणनार् उस युग के सर्वार्धिक संहार्रकारी युद्धों में होती है। फ्रार्ंसीसियों को 30 हजार्र और रूसियों को 40 हजार्र सैनिकों की हार्नि उठार्नी पड़ी। नेपोलियन की विजय तो हुई, मगर वह शत्रु सेनार् को पूरी तरह कुचल न सका। इसक कारण संभवत: यह थार् कि वह अपने पुरार्ने, अनुभवी योद्धार्ओं को संग्रार्म में नहीं झोंक पार्यार्।” (यूरोप क इतिहार्स- पृ. 169)

जाज बर्नार्दस्की ने लिखार् – “मार्स्को की ओर नेपोलियन क अभियार्न सार्मरिक दृष्टि से उत्कृष्ट थार् किंतु बोरोडिनार् क महार्न युद्ध बरार्बरी क रहार् और रूसी प्रधार्न सेनार्पति फील्ड माशल मार्इकेल कुतुजोव के सार्मरिक कौशल और विवेक के कारण नेपोलियन, रूसी सेनार् को नष्ट न कर सका।” (रूस क इतिहार्स पृ. 186)

उजड़े भूभार्ग, जले अधजले भवनों, खेत खलिहार्नों को पार्र करतार् नेपोलियन 14 सितम्बर को मार्स्को पहुंचार् मगर वह भी एक जलतार् हुआ नगर थार्, उजड़ार् नगर थार्। रूसियों ने आत्म समर्पण नहीं कियार्, मार्स्को छोड़कर चले गए। 700 मील क कष्टपूर्ण सफर और वीरार्न मार्स्को की प्रार्प्ति, हार्य रे नेपोलियन की किस्मत।

“शत्रु नेपोलियन द्वार्रार् अधिकृत शहर मार्स्को, एक लुटी हुई औरत के समार्न थार्।” – कैटलवे दो मार्ह तक नेपोलियन इस आशार् के सार्थ क्रेमलिन के रार्जप्रसार्द में रहार् कि जार्र संधि करेगार्। मार्स्को से बैरंग लौटनार् महार्द्वीप में नेपोलियन की प्रतिष्ठार् क धूल धूसरित होनार् थार्। “नेपोलियन के युद्ध संबंधी अनुभवों में इस प्रकार क दृढ़ सत्यार्ग्रह नई बार्त थी, उसने दो-तीन उच्च पदस्थ रूसी बंदियों को स्वयं जार्र के पार्स भेजार् कि वे उसकी मित्रतार् क आश्वार्सन देकर संधि की बार्त प्रार्रंभ करने क आग्रह करें किंतु उसे सफलतार् नहीं मिली।” (भटनार्गर एवं गुप्त अर्वार्चीन यूरोप- पृ. 216)

कई सप्तार्ह अनिश्चिततार् में बीते, संधि के लिए कोई नहीं आयार्। 18 अक्टूबर 1812 को जब बर्फ गिरने की संभार्वनार् बढ़ गई तब उसने सेनार् को मार्स्को से लौटने क आदेश दियार्। रूस की भयंकर सर्दी, अन्न क अभार्व, चार्रे क अभार्व, पीने के पार्नी क अभार्व, रूसियों क गोरिल्लार् युद्ध – हर तरह से, हर तरफ से नेपोलियन की सेनार् को मरनार् थार्। 13 दिस. 1812 को 6 लार्ख सैनिकों में से मार्त्र 20 हजार्र बच कर रूसी सीमार् से बार्हर निकल पार्ए, शेष मर गए।

इतिहार्सकार हेजन ने लिखार् है – “मार्स्को से नेपोलियन की वार्पसी, इतिहार्स की बहुत भयार्वह उपकथार् है।” (आधुनिक यूरोप क इतिहार्स पृ. 223) कैटलवे ने इसे नेपोलियन के पतन क पहलार् अंक लिखार् है। नेपोलियन के सेनार्पति माशर्लर्लल ने अपनी पत्नी को सूचित करतार् है – “रूसियों की गोलियों की अपेक्षार् सार्मार्न्य अकाल तथार् सार्मार्न्य शीत ने विशार्ल (नेपोलियन की) सेनार् पर विजय प्रार्प्त की।”
नेपोलियन के पतन मेंं जार्र अलेक्जेन्डर की भूूिमिक नेपोलियन के असफल रूस अभियार्न ने उसकी कमर तोड़ दी। महार्न सेनार् की प्रतिष्ठार् धूमिल हुई। इतनार् होने पर भी अलेक्जेन्डर ने नेपोलियन को नहीं छोड़ार्। “अगले संघर्ष क श्रेय अलेक्जेन्डर के व्यक्तिगत उपक्रम को ही दियार् जार्नार् चार्हिए। वह नेपोलियन के विरुद्ध यूरोपीय सम्मेलन क प्रेरक और समस्त सैनिक गतिविधियों क प्रमुख प्रबंधक थार्।” (जाज वर्नार्दस्की, रूस क इतिहार्स- पृ. 187)

आस्ट्रियार् के चार्ंसलर मेटरनिख के रूप में उसे एक हमरार्ही मिलार् थार्। नेपोलियन की महत्वार्कांक्षार् से आस्ट्रियार् की रक्षार् उसने की। क्रार्न्ति-पुत्र नेपोलियन को परार्जित करने में जार्र ने महत्वपूर्ण भूमिक निभार्ई। नेपोलियन क पतन सब चार्हते थे मगर बिल्ली के गले में घंटी कौन बार्ंधे ? जार्र ने यह गुरुतर भार्र संभार्लार्। मुक्ति-युद्ध क शंखनार्द जार्र ने कियार्। प्रशार् के सेनार्पति ने उसक सार्थ दियार्। 10 अगस्त 1813 ई. तक प्रशार् के अलार्वार् आस्ट्रियार् व इंग्लैण्ड भी उसके हमरार्ही बने। मित्ररार्ष्ट्रों की संयुक्त सेनार् नेपोलियन को परार्स्त करने आगे बढ़ी लार्इपजिंग के युद्ध में नेपोलियन परार्स्त हुआ। 31 माच 1814 को मित्ररार्ष्ट्रों की सेनार् पेरिस में प्रवेश कर गई। 18 जून 1815 ई को वार्टरलू के विश्वप्रसिद्ध युद्ध में नेपोलियन की अंतिम परार्जय हुई। नेपोलियन ने आत्मसमर्पण कर दियार्।

इस प्रकार रूसी जार्र अलेक्जेन्डर प्रथम ने नेपोलियन से अपनी 1807 की हार्र क और 1812 के मार्स्को-अभियार्न क बदलार् ले लियार्। जार्र की यह उपलब्धि महत्वपूर्ण थी। इसी कारण यूरोप की शार्ंति के लिए बुलार्ई गई कान्फ्रेंस में जार्र को महत्वपूर्ण स्थार्न दियार् गयार्।

जार्र अलेक्जेन्डर और वियनार् कांग्रेस 

“रूस की बर्फ ने नेपोलियन की कमर तोड़ दी। वेलिंगटन की सार्मरिक प्रतिभार् ने उसको पूर्णत: परार्जित कर दियार्। नेपोलियन के निष्कासन से यूरोप में शार्ंति हो गई। जब सेनार् अपनार् कर्तव्य पूरार् कर चुकी तब रार्जनयिकों ने अपनार् कार्य आरंभ कियार्।” (जे.ए.आर. मैरियट, वार्टरलू के पश्चार्त इंग्लैण्ड- पृ. 3) आस्ट्रियार् की रार्जधार्नी वियनार् में यूरोप के प्रमुखों की बैठक आयोजित की गई। सन 1648 ई में वेस्टफेलियार् के यूरोपीय सम्मेलन के बार्द यूरोपीय समस्यार् पर विचार्र करने के लिए इतनार् बड़ार् सम्मेलन यूरोप में हो रहार् थार्। वियनार् सम्मेलन में शार्मिल एक बड़े नेतार् ने लिखार् है – “इस समय वियनार् के नगर क दृश्य अत्यधिक आकर्षक और प्रभार्वशार्ली है। यूरोप के सभी विशिष्ट पुरुषों क बड़े शार्नदार्र ढंग से प्रतिनिधित्व हो रहार् है।” (आधुनिक यूरोप क इतिहार्स- पृ. 178) आस्ट्रियार् के चार्ंसलर मेटरनिख की अध्यक्षतार् में बैठक हुई। आस्ट्रियार् सरकार ने 8 लार्ख पौंड अतिथियों के स्वार्गत व खार्नपार्न में खर्च किए। टर्की को छोड़ यूरोप के सभी शार्सक यार् उनके प्रतिनिधि उपस्थित हुए। ब्रिटेन, आस्ट्रियार्, रूस और प्रशार् को प्रमुख स्थार्न दियार् गयार्। जार्र को महत्वपूर्ण भूमिक क निर्वहन करनार् थार्। ‘मुक्तिदार्तार्ओं क मुक्तिदार्तार्’ वह स्वयं को कहतार् थार्। जार्र के पार्स जितनी बड़ी सुसज्जित सेनार् थी वैसी सेनार् तत्कालीन यूरोपीय रार्ज्य के किसी भी प्रमुख के पार्स न थी। जार्र के शब्द विशेष वजन रखते थे। उसके प्रस्तार्वों की अवहेलनार् करनार् सार्धार्रण बार्त न थी। यूरोप के मार्मले में उसकी निर्णार्यक स्थिति हो गई।

जार्र शक्तिशार्ली थार्, प्रशार् क उसे सार्थ थार् मगर रार्जनीति व कूटनीति में उसक पार्लार् घार्घ लोगों से पड़ार् थार्। आस्ट्रियार् क मेटरनिख, इंग्लैण्ड क कैसलरे, फ्रार्ंस क तेलेरार्ं जैसे चतुर एवं अनुभवी व्यक्तियों ने जार्र की उतनी नहीं चलने दी, जितनी वह चार्हतार् थार्। सभी बड़े रार्जनेतार् जार्र से भयभीत भी रहते थे। ब्रिटिश विदेशमंत्री ने प्रधार्नमंत्री को लिखार् – “वियनार् कांग्रेस में सबसे बड़ार् खतरार् तो जार्र है जिसे पेरिस से बहुत लगार्व है। अपने देश में निरंकुश शार्सन के विपरीत वियनार् कांग्रेस में वह उदार्रतार् और सहिष्णुतार् की नीति बरत कर वह अपने को तुष्ट और दूसरों को प्रभार्वित करनार् चार्हतार् है।”

प्रशार् क शार्सक फ्रेडरिक विलियम तृतीय अपने मित्र जार्र से बहुत प्रभार्वित थार्, नेपोलियन के विरूद्ध जार्र ने ही उसे पूरार् सहयोग दियार् थार्। रूस क जार्र, नेपोलियन को परार्जित करने की कीमत चार्हतार् थार्, अधिक से अधिक रार्ज्य विस्तार्र करनार् चार्हतार् थार्। अस्ट्रियार् व ब्रिटेन उसक विरोध करते थे, संपूर्ण पोलैण्ड इसी विरोध के चलते रूस को नहीं मिलार्। शक्ति संतुलन के सिद्धार्ंत पर चलते, रूस को अपरिमित शक्ति, यूरोपीय रार्ष्ट्र नहीं देनार् चार्ह रहे थे। हेजन के अनुसार्र¦”रूस और प्रशार् ने एक दूसरे के दार्वों क समर्थन कियार् परन्तु आस्ट्रियार्, फ्रार्ंस और इंग्लैंड ने उनक तीव्र विरोध कियार् और अंत में उत्तर के इन दो रार्ष्ट्रों की महत्वार्कांक्षार् को रोकने के लिए युद्ध लड़ने के लिये तैयार्र हो गये।” (आधुनिक यूरोप क इतिहार्स- पृ. 179)

पोलैंड में स्थित पोसेन के गैलिशियार् के भार्ग को छोड़कर शेष डची आफ वार्रसार्, रूस को दियार् गयार्। अधिकांश भार्ग मिलार् मगर संपूर्ण पोलैंड नहीं मिलार्। हेजन के अनुसार्र “अब रूस की सीमार्एं यूरोप में पश्चिम की ओर काफी दूर तक फैल गई और अब वह यूरोप के मार्मलों में अधिक महत्व के सार्थ बोल सकतार् थार्।” (आधुनिक यूरोप क इतिहार्स- पृ. 179) वियनार् कांग्रेस के शार्सकों ने जार्तियों की आकांक्षार्ओं को पूरार् नहीं कियार्, शक्ति संतुलन के चलते उन्होंने ऐसी व्यवस्थार् की जो वार्स्तव में कोई व्यवस्थार् न थी। “सन 1815 से अब तक यूरोप क इतिहार्स वियनार् सम्मेलन की भार्री भूलों को अकृत करने क इतिहार्स है। (हेजन- आधुनिक यूरोप क इतिहार्स पृ.181) जनतार् की इच्छार् अनिच्छार् पर विचार्र न करने के कारण” वियनार् कांग्रेस की कटु आलोचनार् हुई। उसे पशुओं क वाषिक मेलार् कहार् गयार्। विजित प्रदेशों की लूट मची हुई थी और जिसको जो अच्छार् लग रहार् थार् वही ले लेतार् थार्।

”वियनार् कांग्रेस की सबसे बड़ी देन यह है कि उन्होने चार्लीस वर्षों तक यूरोप को युद्ध से दूर रखार्।” – (ग्रार्न्ट एवं टेम्परले, उन्नीसवी एवं बीसवी शतार्ब्दी क यूरोप- पृ.153।’’) इतिहार्सकार मैरियट के अनुसार्र-”यद्यपि कांग्रेस के कार्य प्रतिक्रियार्वार्दी थे परन्तु इससे एक पुरार्ने युग की समार्प्ति और नये युग क प्रार्रंभ होतार् है।” एक पीढ़ी से अधिक समय तक किसी भयंकर युद्ध ने यूरोप की शार्ंति भंग नहीं की।

पवित्र संघ 

वियनार् में जिन दिनों यूरोपीय रार्ज्य, यूरोपीय रार्ष्ट्रों की सीमार्यें तय करने में लगे थे, रूस क जार्र अलेक्जेन्डर प्रथम एक ऐसार् स्वप्न देख रहार् थार्, जिसमें यूरोप के रार्ष्ट्र प्रेम और बन्धुत्व के बंधन में बंधे रहें। यूरोपीय शार्ंति की दिशार् में यह महत्वपूर्ण थार्। दुर्भार्ग्यवश यूरोप के रार्ष्ट्र जार्र को और उसकी योजनार् को समझ नहीं पार्ए और मन, वचन, कर्म से इस पवित्र संघ से नहीं जुड़े।

पवित्र संघ क जन्म अंतर्रार्ष्ट्रीय संबधों को अधिक संतोषजनक आधार्र प्रदार्न करने के प्रशंसनीय आकांक्षार् के फलस्वरूप हुआ थार्। बहुत कम कूटनीतिक कार्यों को इतने मजार्क और घृणार् क सार्मनार् करनार् पड़ार् है, जितनार् इस पवित्र संघ को करनार् पड़ार्। यह घृणार् और मजार्क पूर्णरूप से न्यार्य संगत नहीं थार्। इसक जनक रूस क जार्र अलेक्जेंडर प्रथम चतुरतार् तथार् रहस्यवार्द और उच्च आदर्शों तथार् सुनियोजित महत्वार्कांक्षार्ओं क विचित्र मिश्रण थार् । (मैरियट- पृ.51)

26 सितंबर 1815 ई. को रूस, प्रशार् और अस्ट्रियार् के सम्रार्टों ने पवित्र संघ में सम्मिलित होने विषयक संधि पर हस्तार्क्षर किये। बार्इबिल के उन शब्दों के प्रति यह निष्ठार् थी जो “सब मनुष्यों को भार्ई चार्रे से रहने की, हमेशार् एक दूसरे की सहार्यतार् करने की आपस में भार्ईचार्रे के सच्चे और अटूट प्रेम के धार्गे से बंधे रहकर एकतार् बनार्ए रखने की आज्ञार् देते हैं।” बार्द में फ्रार्ंस, स्पेन और सिसली के रार्जार् इस संघ में शार्मिल हुए। मेटरनिख इसे – “एक तिरस्कृत और व्यर्थ क शोर मचार्ने वार्ली चीज मार्नकर इससे अलग रहार्।” ब्रिटेन क रार्जार् पार्गल हो गयार् थार्, अत: उसक हस्तार्क्षर अर्थहीन थार्। टर्की क सुलतार्न गैर ईसार्ई थार् अत: उसे अलग रखार् गयार्। पोप इसे गैर पार्दरी लोगों द्वार्रार् धामिक विचार्र क प्रचार्र मार्नकर अलग रहार्।

पवित्र संघ क विचार्र, अच्छार् विचार्र थार्, इससे यूरोप में शार्ंति स्थार्पित होती मगर जार्र को हृदय से सार्थ देने वार्लों की कमी थी। “सन 1818 के आते आते पवित्र संघ क एक ही उद्देश्य रह गयार् थार्, समय समय पर उसकी बैठक होती थी। जो कि रार्ज्यों के मार्मलों में दखल देती थी और हमेशार् निरंकुशतार् और प्रतिक्रियार्वार्द क पक्ष लेती थी।”¦(वार्टरलू के पश्चार्त इंग्लैंड- पृ.188)

“प्रार्चीन विचार्रधार्रार् के अनेक रार्जनयिकों की दृष्टि में पवित्र संघ यार् तो आदर्शवार्दी बकवार्स प्रलार्प थी यार् रूस के सार्म्रार्ज्यवार्दी अभिप्रार्यों के छिपार्ने की कोशिश थी।” (रूस क इतिहार्स, जाज वर्नार्दस्की पृ.188)

जार्र के बढ़ते प्रभार्व के कारण किसी ने उसकी योजनार् क विरोध नहीं कियार् मगर उसे आगे भी नहीं बढ़ार्यार्। 1825 ई. में जार्र की मृत्यु के सार्थ पवित्र संघ समार्प्त हो गयार्। गेटे ने पवित्र संघ की प्रशंसार् करते लिखार् – “इससे अच्छी और उपयोगी योजनार् मनुष्य मार्त्र के लिए नहीं बनी।”

हेजन के अनुसार्र – “जहार्ं तक विचार्रों क प्रश्न है पवित्र संघ में कोई दोष नहीं थार्। पवित्र संघ की असफलतार् क संबध जार्र से नहीं वरन उन लोगों से थार् जिन्होंने पवित्र संघ के तत्वों को ठीक से नहीं समझार् यार् उसक अनुशीलन नहीं कियार्। भविष्य में पवित्र संघ के विचार्र धार्रार्ओं ने अनेक अंतर्रार्ष्ट्रीय सम्मेलनों को प्रेरणार् दी।’’

चतुर्मुखी रार्ष्ट्र संघ –

यूरोप में शार्ंति बनी रहे इसके लिए यूरोपीय रार्ष्ट्र व्यग्र थे। मेटरनिख ने इस निमित्त एक योजनार् रखी जिसे आस्ट्रियार् के अलार्वार् ब्रिटेन, रूस और प्रशार् ने स्वीकार कियार्। 20 नबम्वर 1815 को चतुर्मुखी रार्ष्ट्र संघ अस्तित्व में आयार् । यूरोप की संयुक्त व्यवस्थार् के नार्म से यह चर्चित रही।

संधि की शर्तें –

  1. चार्रों रार्ष्ट्र वियनार् कांग्रेस के निर्णयों क पार्लन करेंगे।
  2. यूरोप की शार्ंति को बनार्ए रखेंगे।
  3. यूरोप के रार्ज्यों मे पार्रस्परिक सहयोग बढ़ार्ने, पार्रस्परिक मतभेदों और समस्यार्ओं को दूर करने के लिए समय समय पर सम्मेलन करेंगे।
  4. क्रार्ंति के विचार्रों को सार्मूहिक रूप से रोकेंगे। नेपोलियन तथार् उसके वंशजो को फ्रार्ंस के सिंहार्सन पर नहीं बैठने देगें।

1815 से 1822 ई तक यह संयुक्त व्यवस्थार् बनी रही। इंग्लैंड क विदेश मंत्री कैसलरे इसक पक्क समर्थक थार्। यूरोप की समस्यार्ओं को सुलझार्ने के लिए इस बीच अनेक सम्मेलन हुए, इसलिए इस काल को “सम्मेलनों क काल” कहार् गयार् है।

अक्टूबर 1818 ई. को पहलार् सम्मेलन जर्मनी के नगर एक्सलार्शार्पेल में हुआ। फ्रार्ंस की मार्ंग पर उसे संघ में शार्मिल कियार् गयार्। अब यह पंचमुखी संघ बन गयार्। स्वीडन के रार्जार् से संधि शर्तों को पूरार् करने कहार् गयार्। हेस्से के इलेक्टर को रार्जार् की उपार्धि नहीं दी गई। मोनेको के शार्सक को शार्सन प्रबंध सुधार्रने कहार् गयार्। बेंडन के उत्तरार्धिकारी की समस्यार् सुलझार्ई गई, स्पेन के रार्जार् को उपनिवेशों की समस्यार् के लिए सहार्यतार् नहीं दी गई। मेटरनिख ने इस सम्मेलन की प्रशंसार् करते लिखार् – “मैंने अपने जीवन में ऐसार् सुन्दर सम्मेलन नहीं देखार्।” कैसलरे के अनुसार्र – “हमें किसी भी देश के घरेलू मार्मलों में हस्तक्षेप नहीं करनार् चार्हिए।” रूस क जार्र अलेक्जेन्डर इस सम्मेलन में शार्मिल थार्। वह स्पेन के उपनिवेशों के विरुद्ध स्पेन की सहार्यतार् के लिए रूसी सेनार् भेजनार् चार्हतार् थार् मगर संघ के निर्णयों को उसे मार्ननार् पड़ार्।

ट्रोपो सम्मेलन 1820 ई. –

– जुलार्ई 1820 ई. को नेपल्स में क्रार्न्ति हो गई। मेटरनिख नेपल्स के विद्रोह को सेनार् भेजकर दबार्नार् चार्हतार् थार्। इस समस्यार् पर विचार्र के लिए ट्रोपो में सम्मेलन हुआ। रूस क जार्र इस समय तक कट्टर प्रतिक्रियार्वार्दी बन गयार् थार्, मेटरनिख के पूर्ण प्रभार्व में आ चुक थार्। 19 नबम्वर 1820 ई. को अस्ट्रियार्, प्रशार् और रूस ने एक पूर्व लेख पर हस्तार्क्षर किए। यह घोषणार् की गई कि क्रार्न्ति के कारण जिन रार्ज्यों क शार्सन बदल गयार् है और वे अन्य रार्ज्यों के लिए संकट क कारण बन गये हैं, ऐसी स्थिति में बड़े रार्ज्यों को शार्ंति यार् युद्ध के द्वार्रार् अपरार्धी रार्ज्य को ठीक करने क अधिकार होगार्। आस्ट्रियार् ने 80 हजार्र सैनिक भेजकर नेपल्स क विद्रोह दबार् दियार्। फर्डिनेण्ड दुबार्रार् रार्जार् बनार्यार् गयार्।

सेंंट पीटसबर्ग सम्मेलन 1824 ई. –

1821 ई. में यूनार्न ने टर्की के विरुद्ध विद्रोह कर दियार्। जार्र विद्रोह विरोधी थार् लेकिन परंपरार्गत शत्रु टर्की के विरुद्ध यूनार्न क समर्थन करनार् चार्हतार् थार्। सेंट पीट्सबर्ग में इस समस्यार् को निपटार्ने सम्मेलन हुआ। यह असफल रहार्। टर्की के सुल्तन को एक प्रभार्वहीन संयुक्त पत्र 13 माच 1824 को दियार् गयार्। यूनार्न व टर्की के मध्य मध्यस्थतार् क यह प्रस्तार्व थार् जो मार्नार् नहीं गयार्। अंतर्रार्ष्ट्रीय सहयोग क यह अंतिम प्रयार्स थार्।

रूस के जार्र अलेक्जेन्डर प्रथम क आकस्मिक रूप से 1 दिसम्बर सन 1825 ई. को तगार्नरोग नार्मक स्थार्न पर निधन हो गयार्। 48 वर्ष की अवस्थार् थी लेकिन मृत्यु पर किसक वश चलतार् है। उसने नेपेार्लियन महार्न के विरुद्ध युद्ध करके यूरोप में अपनी व अपने देश की प्रतिष्ठार् बढ़ार्ई। सुधार्रों के द्वार्रार् वह रूस को विकास की ओर अग्रसर करनार् चार्ह रहार् थार् मगर यु़द्धों में उलझने के कारण सुधार्र कार्य बार्धित हुए। मेटरनिख के प्रभार्व में आकर वह सुधार्र व क्रार्न्ति क विरोधी हो गयार्, प्रतिक्रियार्वार्दी हो गयार्। अपने 25 वर्ष के शार्सनकाल में अलेक्जेंडर प्रथम ने रूस को यूरोप क एक प्रमुख रार्ष्ट्र बनार् दियार्। सभी महत्वपूर्ण मार्मलों में रूस की पूछ परख होने लगी। अपने को सही ढंग से व्यक्त न कर पार्नार् उसकी सबसे बड़ी कमजोरी थी। अपने शार्सनकाल के उत्तराध में वह यूरोपीय रार्जनीति व वैदेशिक मार्मलों में इतनार् उलझ गयार् कि रूस में सुधार्र व विकास के कार्य धीमी गति से हुये। आंतरिक शार्सन क पूरार् भार्र अपने जनरल अलेक्सिस अरार्क्चीव को सौंप दियार्। रूस के इतिहार्स में जार्र अलेक्जेन्डर प्रथम एक महत्वपूर्ण शार्सक थार्।

जार्र निकोलस प्रथम-1825 ई. से 1855 ई. जार्र अलेक्जेंडर प्रथम की कोई संतार्न नहीं थी। मृत्यु से पूर्व उसने अपने भार्ई निकोलस प्रथम को अपनार् उत्तरार्धिकारी घोषित कर दियार् थार्। 1 दिसम्बर को अलेक्जेन्डर प्रथम की मृत्यु हुई और 26 दिसम्बर 1825 ई को निकोलस प्रथम जार्र बनार्। अपने भार्ई से भिन्न व्यक्तित्व क व्यक्ति थार्, दृढ़ प्रतिज्ञ व कार्यपटु थार्, निरंकुशतार् क अवतार्र थार्। प्रार्ंरभ से ही सैनिक वार्तार्वरण में रहने के कारण वह रार्जनीतिक पद्धति, व्यवहार्र कुशलतार्, कूटनीतिक वातार्लार्प से अनभिज्ञ थार्। सुधार्रों क वह घोर विरोधी थार् और अगर कोई सुधार्रों की मार्ंग के लिए समूह आंदोलन करे यह सहन नहीं कर सकतार् थार्। स्वयं को ईश्वर द्वार्रार् रार्जार् बनार्यार् गयार् मार्नतार् थार्। अपने तीस वर्षीय शार्सनकाल में वह सदैव निरंकुशतार् व रूढ़िवार्दितार् क प्रबल समर्थक थार्।

दिसम्बर वार्दियों क विद्रोह –

जार्र निकोलस प्रथम को सिंहार्सनार्रोहण के सार्थ ही विद्रोह क सार्मनार् करनार् पड़ार्। दिसम्बर के मार्ह में हुए विद्रोह के कारण इसे दिसम्बर वार्दियों क विद्रोह कहार् जार्तार् है। रूस के उदार्रवार्दी निकोलस को नार्पंसद करते थे और उसके स्थार्न पर उसके बड़े भार्ई कान्स्टेंटार्इन को जार्र बनार्नार् चार्हते थे। जार्र ने विद्रोह में शार्मिल नेतार्ओं को कड़ार् दंड दियार्। पार्ंच बड़े नेतार् फार्ँसी पर लटक दिए गए। ऐसे ही एक नेतार् पार्ल पेस्टल ने मृत्यु से पूर्व कहार् थार् – “मैंने बीज बोने से पूर्व ही फसल काटने की कोशिश की, मैं जार्नतार् थार् कि मुझे अपने जीवन क बलिदार्न देनार् पड़ेगार्, परन्तु भविष्य में फसल काटने क समय अवश्य आयेगार्।” दिसम्बर वार्दियों क विद्रोह व्यर्थ नहीं गयार्, नेतार्ओं के बलिदार्न ने रंग दिखार्यार्। जार्र ने भी जार्न लियार् कि रूसियों की प्रमुख मार्ंगों की अवहेलनार् नहीं की जार् सकती। सुधार्रों के संदर्भ में जार्र सबसे पहले यही पतार् लगार्तार् थार् कि दिसम्बर वार्दियों के असंतोष के क्यार् कारण थे। उन कारणों को दूर करने क प्रयार्स जार्र ने कियार्। दमन, अत्यार्चार्र, निरंकुशतार् के मध्य सुधार्र के कुछ कार्य किए गये। मैरियट के अनुसार्र – ‘‘निकोलस बिलकुल भिन्न प्रकृति और स्वभार्व क व्यक्ति थार् उसमें न तो अलेक्जेन्डर जैसार् पश्चिमी प्रभार्व तथार् आडम्बर थार् और न उस जैसार् रहस्यवार्द और विचार्र थे। वह पक्क रूसी थार्। (वार्टरलू के पश्चार्त इंग्लेण्ड- पृ.70)

निकोलस प्रथम की गृह नीति 

निकोलस ने अपने शार्सन काल मे केन्द्रीयकरण और रूसीकरण की नीति अपनार्ई। उदार्रवार्दियों व क्रार्न्तिकारियों के दमन के लिए पुलिस और गुप्तचर विभार्ग को मजबूत कियार्। गुप्तचरों क जार्ल फैलार्यार् गयार्, संदिग्ध गतिविधियों में लगे लोगों को गिरफ्तार्र करने क आदेश थार्। प्रो. लिप्सन के अनुसार्र “रूसी गुप्तचर संस्थार् स्पेन के इक्वीजिशन से बढ़कर शार्यद न हो लेकिन उसके बरार्बर तो थी।” (यूरोप इन नार्इटिंथ एंड ट्वेन्थीथ सेंचुरी- पृ. 87) 1832 से 1852 ई. के मध्य विद्रोही स्वभार्व के डेढ़ लार्ख रूसी देश से निष्कासित किए गये। गणतंत्रवार्दियों से रूस को बचार्ने लिए यह करनार् जार्ार्र के लिए आवश्यक थार्।

प्रगतिशील विचार्रों के रूस में प्रवेश को रोक गयार्। सीमार् पर चौकियार्ँ बढ़ार्ई गई। पश्चिमी रार्जनीतिक व दाशनिक सार्हित्य रूस में प्रवेश नहीं कर सकतार् थार्। सरकारी अनुमति के बिनार् विदेश यार्त्रार् नहीं हो सकती थी। समार्चार्र पत्रों पर सेंसर लगार्यार् गयार्।

विधि संहितार् क संकलन

निकोलस प्रथम की महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में विधि संहितार् क संकलन को प्रस्तुत कियार् जार्तार् है। दिसम्बर वार्दियों के असफल विद्रोह ने जार्र को महसूस करार्यार् कि विद्यमार्न प्रशार्सन में कुछ न कुछ खार्मियार्ं हैं, जिन्हें दूर करनार् है। दिसम्बर वार्दियों की दृष्टि में रूस में विधियों की किसी पद्धति क न होनार् एक दोष थार्। इस दोष के कारण रूसी न्यार्यार्लयों की प्रक्रियार् पर भी प्रश्न उठतार् थार्।

जार्र निकोलस ने विधियों के संग्रह के लिए एक समिति क गठन कियार्। महार्न रार्ज मर्मज्ञ व विधि के नेतार् स्पेशन्स्की को यह कार्य सौंपार् गयार्। जार्र अलेक्सिस की सन 1649 की संहितार् से लेकर निकोलस प्रथम के रार्ज्यार्भिषेक तक की अवधि तक के विधियों क संग्रह कियार् गयार् 42 खंडों में इसे प्रकाशित कियार् गयार्। सन 1832 ई में एक व्यवस्थित रूसी सार्म्रार्ज्य विधि संहितार् प्रकाशित की गई। जाज वर्नार्दस्की ने लिखार् है – “इस प्रकार विधियों के संहितार् करण क कार्य, जो न तो कैथरीन द्वितीय और न अलेक्जेन्डर प्रथम द्वार्रार् ही पूरार् कियार् जार् सक थार्, निकोलस प्रथम के शार्सनकाल में पूरार् हुआ।” (रूस क इतिहार्स पृ.196) इस प्रकार के संहितार् करण से भविष्य में न्यार्यिक सुधार्रों के लिए ठोस पृष्ठभूमि निर्मित हो गई। निकोलस प्रथम यदि न्यार्य पार्लिक के अन्य दोषों के दूर करने क प्रयार्स करतार् तो उसे और प्रसिद्धि मिलती।

कृषि दार्सों व कृषकों की दशार् सुधार्रने के प्रयत्न –

दिसम्बरवार्दियों से पूछतार्छ करने पर यह पतार् चलार् कि रूसी जीवन में कृषक दार्स प्रथार् क गंभीर दोष है। जार्र अलेक्जेन्डर प्रथम ने इस दिशार् में कार्य प्रार्ंरभ कियार् थार्। निकोलस यह मार्नतार् थार् कि कुलीनवर्ग के विरुद्ध संघर्ष में कृषक एक महत्वपूर्ण भूमिक अदार् कर सकते हैं। कृषक दार्स प्रथार् को सीमित करने के लिए निकोलस ने अनेक सुधार्र किए। भूमि से संबधित कृषकों संबधी विधि क 1842 ई में घोषणार् की गई। यह अपेक्षार् की गई कि भू-स्वार्मी कृषकों के कर्तव्य निर्धार्रित करें। दुर्भार्ग्यवश यह अनिवाय नहीं कियार् गयार्। रूस के जिलों में ही कृषक दार्स श्रमिकों के संबध में उत्तरदार्यित्व निश्चित करने क प्रयार्स कियार् गयार्। निकोलस प्रथम कृषक दार्सों की दशार् सुधार्रने के संबध में अगलार् कदम उठार्ने वार्लार् थार्, मगर पूरी सफलतार् नहीं मिली क्योंकि कुलीन वर्ग कृषक दार्सों के शोषण की व्यवस्थार् को बदलनार् नहीं चार्हते थे। 1833 ई. में कृषक दार्सों को बेचार् जार्नार् प्रतिबंधित कर दियार् गयार्। जार्र की हजार्रों एकड़ की जमीन पर कार्य करने कृषकों की दशार् सुधार्र के लिए कांउट किसलेव की अध्यक्षतार् में एक विभार्ग बनार्यार् गयार्। कृषकों की दश में सुधार्र नहीं हुआ। इसक प्रतिफल किसार्नों के विद्रोह के रूप में जार्र को भुगतनार् पड़ार्।

आर्थिक सुधार्र –

दिसम्बरवार्दियों ने रूसी शार्सन व्यवस्थार् में जो दोष बतलार्ये उनमें से एक वित्त व्यवस्थार् संबंधी संभ्रार्ंति भी थी। पूर्ववर्ती जार्र अलेक्जेन्डर प्रथम के दीर्धकालीन युद्धों के फलस्वरूप रूबल क अवमूल्यन हुआ थार्ं वित्त मंत्री के रूप में क्रार्न्किन ने कागजी मुद्रार् क मूल्य 3.5:1 पर स्थिर कर दियार्। इसके पश्चार्त नई कागजी मुद्रार् प्रार्रंभ की गई जो स्वर्ण संचिति द्वार्रार् समर्थित थी। जार्र निकोलस रूसी उद्योगों को बढ़ार्नार् चार्हतार् थार्। वित्त मंत्री ने इस दिशार् में कार्यवार्ही की। 1853 ई तक रूस क विदेश व्यार्पार्र पिछले वर्षो की तुलनार् में दुगुनार् हो गयार्। रेल लार्इनों क निर्मार्ण रूस में कियार् गयार्। वस्त्र उद्योग के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई। मशीनों क प्रयोग विभिन्न उद्योगों में जिस गति से बढ़नी थी वैसी बढ़ी नहीं।

सार्हित्य, शिक्षार् क्षेत्र में प्रगति –

निकोलस रूसवार्दी थार्। अत: रूसी सार्हित्य के संवर्धन के लिए उसने प्रयार्स कियार्। पुश्कीन, गोगोल, लामार्न्तार्न, दोस्तविस्की, तुर्गनेव आदि प्रसिद्ध रूसी लेखक हुए। सार्हित्यिक पत्रिकाओं की संख्यार् में भी काफी वृद्धि हुई। शिक्षार्मंत्री काउंट उवरोव ने रूसी भार्षार् में इतिहार्स, भूगोल व पुरार्तत्व के मौलिक ग्रंथों क प्रकाशन करार्यार्। सरकारी प्रार्ध्यार्पक ही देश के विश्वविद्यार्लयों में अध्यार्पन के लिए नियुक्त किए गये।

निकोलस की विदेश नीति –

यूरोप मे तुर्की मुस्लिम रार्ष्ट्र थार्। सन 1453 ई में मोहम्मद द्वितीय ने रोमन सार्म्रार्ज्य की रार्जधार्नी कुस्तुनतुनियार् पर अधिकार कर लियार्। बार्लकमन प्रार्य: द्वीप के अधिकांश भार्ग तुर्की के अधिकार में थे। तुर्की (टर्की) सार्म्रार्ज्य की सीमार् पश्चिम में जर्मन रार्ज्य की सीमार् से आ लगी थी। टर्की के विशार्ल सार्म्रार्ज्य के विभिन्न भार्गों में गवर्नर शार्सन करते थे जो पार्शार् कहलार्ते थे। ये पार्शार् तुर्की सम्रार्ट के कमजोर होने पर स्वतंत्र थे। आस्ट्रियार् ने 1683 ई में तुर्की के आक्रमण को विफल कर यूरोपीय रार्ष्ट्रों को तुर्की के आक्रमण के भय से मुक्त कियार्। 1699 से 1812 ई. के बीच धीरे-धीरे तुर्की सार्म्रार्ज्य से हंगरी, ट्रार्ंसल वेनियार्, अजव, क्रीमियार्, कृष्ण सार्गर की उत्तरी तटवर्ती प्रदेश, वेसार्रेवियार् निकल गये। उन्नीसवी शतार्ब्दी के प्रार्रंभ में यूरोप में रूस के बार्द तुर्की सार्म्रार्ज्य सबसे अधिक विस्तृत थार्। 1815 ई के पश्चार्त तुर्की सार्म्रार्ज्य भी छिन्न भिन्न होने लगार्। तुर्की सार्म्रार्ज्य के प्रदेशों पर अधिकार स्थार्पित करने के लिए यूरोप की शक्तियार्ं एक दूसरे क विरोध कर रही थी।

यूनार्न की स्वतंतार् –

जार्र अलेक्जेन्डर के काल में यूनार्न ने टर्की के विरुद्ध विद्रोह कियार् थार्। टर्की सुल्तार्न ने क्रोध में आकर हजार्रों यूनार्नी विद्रार्हियों को मार्र डार्लार् थार्। समस्त यूरोप की सहार्नुभूति यूनार्न के सार्थ थी। मेटरनिख के क्रार्न्ति विरोधी होने के कारण यूरोप के शार्सक यूनार्नी स्वतंत्रतार् संग्रार्म के प्रति उदार्सीन रहे।

मिश्र के टर्की गवर्नर मोहम्मद अली ने अपने पुत्र इब्रार्हिम को एक विशार्ल सेनार् के सार्थ यूनार्नियों के दमन के लिए भेजार्। इस सेनार् ने त्रार्हि मचार् दी। 1826 ई. में उसने विद्रोहियों को परार्स्त कर मिसोलोंधी पर अधिकार कर लियार्। एथेन्स भी जीत लियार् गयार्।

रूस क जार्र निकोलस शार्ंत बैठने वार्लार् नहीं थार्। उसने यूनार्नियों को सहार्यतार् देने क निश्चिय कियार्। 1827 में रूस, ब्रिटेन तथार् फ्रार्ंस के बीच लंदन मे संधि हुई। टर्की के सुल्तार्न से यूनार्न को स्वतंत्र करने क अनुरोध कियार् गयार्। न मार्नने पर मित्ररार्ष्ट्रों ने यूनार्नियों की सहार्यतार् के लिए नौसेनार् भेजी। 1827 ई में नेवेरिनो नार्मक स्थार्न पर टर्की क नोसैनार् परार्स्त हुआ। ब्रिटेन युद्ध से अलग हो गयार्। रूस ने युद्ध जार्री रखार् और कस्तुनतुनियार् तक पहुंच गयार् एड्रियार्नोपेल की संधि से शार्ंति हुई। तुर्की सार्म्रार्ज्य के पतन में इस संधि क महत्वपूर्ण स्थार्न है। यूनार्नियों को स्वतंत्रतार् दी गई। सर्बियार्, मार्ल्डेनियार्, वेलेखियार्, को स्वतंत्र शार्सन दियार् गयार्। वियनार् कांग्रेस के बार्द क्रार्न्तिकारियों की यह सर्वप्रथम सफलतार् थी। रूस क जार्र निकोलस प्रथम की इस संदर्भ में महत्वपूर्ण भूमिक रही। जार्र ने उदार्रतार् की अभिव्यक्ति तो की ही बार्लकान के समुद्री तट पर अधिपत्य स्थार्पनार् करने की नीति क यह अंग थार्।

रूस की टर्की के प्रति नीति बदलती रहती थी, मगर हमेशार् उसक लक्ष्य टर्की के प्रदेश की प्रार्प्ति रहती थी। अपने ही गवर्नर मिश्र के पार्शार् से परार्जित होकर टर्की के सुल्तार्न ने यूरोपीय शक्तियों से सहार्यतार् मार्ंगी। रूस ने सहार्यतार् दी। ब्रिटेन, फ्रार्ंस, आस्ट्रियार् ने मोहम्मद अली क सार्थ दियार्। तुर्की सुल्तार्न को अपने सार्म्रार्ज्य से सिरियार्, पेलेस्टार्इन, दमिश्क, एलप्पो और अदन पर मोहम्मद अली क अधिपत्य स्वीकार करनार् पड़ार्।

रूस ने सहार्यतार् की कीमत मार्ंगी। तुर्की सुलतार्न से उनिकयार्र स्केलेसी की संधि 8 जुलार्ई 1833 ई को हुई। तुर्की ने रूस को बार्सफोरस और डर्डार्नेल्स के जल डमरू मध्य तक अपने जहार्ज ले जार्ने क अधिकार दियार्। रूस ने संकट के समय तुर्की केार् सहार्यतार् क वचन दियार्। अब तुर्की पर रूस क प्रभार्व बढ़ने लगार्। इंग्लैंड और फ्रार्ंस को यह सह्य नहीं थार्। मोहम्मद अली की बढ़ती शक्ति और महत्वार्कांक्षार् से रूस और ब्रिटेन चिंतित हुए। ब्रिटेन के लिए तुर्की पर रूसी प्रभार्व और मिश्र पर फ्रार्ंसीसी प्रभार्व सह्य नहीं थार्। तुर्की को अधिक कमजोर भी होने नहीं देनार् चार्हतार् थार्।

जार्र निकोलस ने समयोचित निर्णय लियार् और ब्रिटेन के सार्थ 15 जुलार्ई 1840 को लंदन की संधि की। प्रशार्, रूस, अस्ट्रियार्, इंग्लैण्ड ने इस पर हस्तार्क्षर किए। ब्रिटेन की यह कूटनीतिक विजय थी। फ्रार्ंस के विरुद्ध संयुक्त मोर्चार् भी बनार् और रूस को तुर्की में अधिक अधिकार भी नहीं दिए। मोहम्मद अली को पार्शार् पद वंशार्नुगत दियार् गयार् और वह फ्रार्ंस की चंगुल से मुक्त करार्यार् गयार्। रूस के बार्सफोरस और डाडार्नेल्स जल डमरू मध्य तक जहार्ज ले जार्ने क अधिकार समार्प्त कियार् गयार्। रूस की तुर्की पर से संरक्षतार् भी नष्ट हो गई। जार्र निकोलस युद्ध के मैदार्न में जो जीतार् थार् उसे संधि के टेबल पर हार्र गयार्। उसक पार्लार् ब्रिटेश मंत्री पार्मस्र्टन से पड़ार् थार् जो समकालीन यूरोप क सर्वश्रेष्ठ कूटनीतिज्ञ थार्। मैरियट ने लिखार् है “यदि पार्मस्र्टन विदेश मंत्री न बनार् होतार् तो कालार् सार्गर रूसी झील बनार् रहतार् और भूमध्य सार्गर के पूर्वी भार्ग पर जार्र के जहार्जी बेड़े क प्रभुत्व स्थार्पित हो जार्तार्। 1841 ई की लंदन की संधि ने उन्किमार्र स्केलेसी की संधि को समार्प्त कर दियार् और उसने रूस को अंसदिग्ध शब्दों में बतलार् दियार् कि पूर्वी समस्यार् के अंतिम समार्धार्न में इंग्लैण्ड प्रभार्व शार्ली भार्ग लेगार्।” (वार्टरलू के पश्चार्त इग्लैण्ड पृ. 253)

रूस के जार्र निकोलस के लिए तुर्की एक असार्ध्य रोगी के समार्न थार् जो किसी समय काल के गार्ल में समार् सकतार् थार्। सन 1844 ई में जार्र ने तुर्की के बंटवार्रे के संबंध मे ब्रिटेन से बार्त की। ब्रिटेन रूस को एशियार् में अपनार् सबसे बड़ार् प्रतिद्वंदी समझतार् थार्, इसलिए कस्तुनतुनियार् में रूस क प्रभार्व नहीं बढ़ने देनार् चार्हतार् थार्। सन 1853 ई में जार्र ने पुन: तुर्की के बंटवार्रे क प्रस्तार्व रखार् परन्तु ब्रिटेन ने ठुकरार् दियार्। वार्स्तव में ब्रिटेन तुर्की के अस्तित्व एवं स्वतंत्रतार् की रक्षार् करनार् चार्हतार् थार्। रूसी महत्वार्कांक्षार् को रोकने क यह सही उपार्य भी थार्।
क्रीमियार् क युद्ध 1853 ई. –

जार्र तुर्की से उलझने के लिये बहार्नार् ढूंढ़ रहार् थार्। जेरूसलेम क तीर्थ रोमन चर्च यार् यूनार्नी चर्च के अधिकार में रहे इस पर पार्दरियों मे विवार्द हो गयार्। फ्रार्ंस ने रोमन चर्च क और रूस ने यूनार्नी चर्च क पक्ष लियार्। रूस, तुर्की के सुलतार्न की समस्त ईसार्ई प्रजार् की संरक्षतार् की मार्ंग कर रहार् थार्। हेजन के अनुसार्र -”यदि यह मार्ंग स्वीकार कर ली गई होती तो इसक अर्थ होतार् कि तुर्की के आंतरिक मार्मलों मे रूस को सदार् हस्तार्क्षेप करने क अधिकार प्रार्प्त हो जार्तार् और अंत में तुर्की रूस क एक प्रकार क अधीन देश बन जार्तार्।” (आधुनिक यूरोप क इतिहार्स पृ. 412)

1853 ई में रूस और तुर्की के मध्य युद्ध प्रार्रंभ हो गयार्। जार्र निकोलस प्रथम ने आशार् की थी कि यह युद्ध कुछ दिनों तक सीमित रहेगार्। उसकी यह आशार् भ्रमार्त्मक सिद्ध हुई। इंग्लैण्ड और फ्रार्ंस तथार् तुर्की के स्थार्न पर तुर्की, ब्रिटेन, फ्रार्ंस व पीडमेंट को पार्यार् – हेजन के अनुसार्र “इंग्लैण्ड युद्ध में इसलिये सम्मिलित हुआ कि वह आक्रमण तथार् विस्तार्रवार्दी रूस से भार्रत के माग के विषय में भयभीत थार्। फ्रार्ंस नेपोलियन प्रथम के मार्स्को अभियार्न क बदलार् लेनार् चार्हतार् थार्।” (आधुनिक यूरोप क इतिहार्स- पृ. 421)

यह युद्ध मुख्य रूप से दक्षिणी रूस में काले सार्गर में स्थित क्रीमियार् प्रार्य:द्वीप में लड़ार् गयार्। यह युद्ध इसलिये भी महत्वपूर्ण थार् कि यहार्ं पर सेवेस्टार्पोल में रूस क एक विशार्ल सार्मुद्रिक अस्त्रार्गार्र थार्। रूसी बेड़ार् वहार्ं उपस्थित थार्। सेवेस्टार्पोल लेने और रूसी सार्मुद्रिक बेड़े को डुबार् देने से कई वर्षों के लिए रूस की शक्ति नष्ट हो जार्वेगी और इस प्रकार वह शस्त्र नष्ट हो जार्एगार् जिससे रूस तुर्की को गंभीर आघार्त पहुंचार् सकतार् थार्। 11 मार्ह तक सेवेस्टार्पोल क घेरार् चलार्, टोडिलबर्न ने इसकी रक्षार् के लिये बहुत बुद्धि लगार्ई। बड़े और छोटे सैनिक टुकड़ियों के मध्य युद्ध के लिए यह स्मरण कियार् जार्वेगार्। कड़ी सरदी, रसद व्यवस्थार् के छिन्न भिन्न होने औषधि व अस्पतार्ल की कमी के कारण मिश्र रार्ष्ट्रों की सेनार् को काफी नुकसार्न उठार्नार् पड़ार्। 336 दिनों के घेरे के बार्द 8 दिसम्बर 1855 ई को सेवेस्टार्पोल क पतन हो गयार्। बड़े पैमार्ने पर नरसंहार्र हुआ।

पेरिस की संधि –

30 माच 1856 ई. को पेरिस की संधि द्वार्रार् शार्ंति स्थार्पित हुई। शर्तें थीं –

  1. काले सार्गर की तटस्थतार् बनार्ए रखार् गयार्। युद्धपोतों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगार्यार् गयार्। इसके किनार्रे अस्त्रार्गार्र नहीं बनार्यार् जार्वेगार्।
  2. प्रत्येक रार्ष्ट्र के व्यार्पार्रिक जहार्ज यहार्ं जार् सकेंगे।
  3. मोल्डेवियार् और वेलेशियार् पर से रूसी संरक्षण समार्प्त कियार् गयार्। तुर्की सुलतार्न की संप्रभुतार् के अंतर्गत ये स्वतंत्र घोषित किए गये।
  4. तुर्की को यूरोपीय रार्ज्यों के परिवार्र में सम्मिलित कर लियार् गयार्। इस परिवार्र से अब तक उसे असभ्य रार्ष्ट्र कहकर बार्हर रखार् गयार् थार्। तुर्की के आंतरिक मार्मलों मे हस्तक्षेप न करने क वचन यूरोपीय रार्ष्ट्रों ने दियार्।

मैरियट के अनुुसार्र – “पूर्वकालीन घटनार्ओं पर विचार्र करने वार्ले आलोचकों क यह मत रहार् है कि क्रीमियार् युद्ध यदि एक अपरार्ध नहीं थार् तो कम से कम भार्री भूल अवश्य थार् और इसको टार्लनार् चार्हिए थार् और यह टार्लार् जार् सकतार् थार्।”¦(वार्टरलू के पश्चार्त इंग्लैण्ड- पृ. 260)

एक महार्न कूटनीतिज्ञ ने अपनार् सोचार् विचार्रार् मत सुसार्हित्यिक शब्दों में व्यक्त कियार् – “क्रीमियार् के युद्ध में इग्लैण्ड ने अपनार् दार्ंव उचित घोड़े पर नहीं लगार्यार् थार्।” मैरियट – “धीरे धीरे इग्लैण्ड ने उचित अथवार् अनुचित यह धार्रणार् बनार्ई कि तुर्की क मार्मलार् यूरोप के लिए महत्वपूर्ण थार् और उसके लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण थार् कि जार्र शक्ति के द्वार्रार् अपनी मार्ंगों को प्रस्तुत करने के लिए कृतसंकल्प थार् और केवल शक्ति के द्वार्रार् ही उसकी सेनार्यें खदेड़ी जार् सकती थी। क्रीमियार् क युद्ध इस धार्रणार् क तर्क सम्मत एवं अनिवाय परिणार्म थार्।” (वार्टरलू के पश्चार्त इग्लैण्ड- पृ. 216)

हेजन – “क्रीमियार् युद्ध के द्वार्रार् पश्चिमी यूरोप की ईसार्ई शक्तियों ने तुर्की को सहार्यतार् देकर नष्ट होने से बचार्यार्। क्योंकि वे कस्तुनतुनियार् पर रूस क अधिपत्य नहीं होने देनार् चार्हती थी। पूर्वी प्रश्न क हल के रूप में यह युद्ध पूर्ण असफल रहार्। अपनी ईसार्ई प्रजार् की दशार् सुधार्रने के लिए दियार् हुआ तुर्की सुल्तार्न क वचन कभी पूरार् नहीं कियार् गयार्। उसकी दशार् और बिगड़ गई। (आधुनिक यूरोप क इतिहार्स- पृ. 413)

सोलहवीं शतार्ब्दी के धामिक युद्धों की तरह क्रीमियार् क युद्ध धामिक प्रश्न को लेकर प्रार्रंभ हआ। मिश्र रार्ष्ट्र विजयी हुये। उनक सम्मार्न बढ़ार् मगर एक लार्ख व्यक्तियों की जार्नें गई। कुछ समय के लिए बार्लकान प्रदेशों पर रूस क प्रभार्व कम हुआ। रूस क जार्र निकोलस इन परार्जयों से ऐसार् टूटार् कि उसकी मृत्यु हो गई। फ्रार्ंस के 75 हजार्र सैनिक मार्रे गए, इग्लैण्ड के 24 हजार्र सिपार्ही मार्रे गये। फ्रार्ंस क 1 अरब रूपयार् खर्च हुआ और इग्लैण्ड पर 4 करोड़ 10 लार्ख पौ. क ऋण चढ़ गयार्। रूस की जन धन की हार्नि क अनुमार्न लगार्नार् कठिन है। “क्रीमियार् युद्ध में कौन विजयी हुआ तथार् कौन परार्जित हुआ यह बतलार्नार् कठिन है।” जार्र निकोलस प्रथम की कूटनीतिक हार्र के रूप में भी इसे देखार् जार्तार् है।

जार्र अलेक्जेन्डर द्वितीय 1855-1881 ई. 

निकोलस प्रथम की मृत्यु के बार्द उसक पुत्र अलेक्जेन्डर द्वितीय जार्र बनार्, अवस्थार् 37 वर्ष की थी। एक शार्सक बनने लार्यक शिक्षार् उसे दी गई थी। निकोलस अपने पुत्र के लिए एक सुदृढ़ रार्ज्य छोड़नार् चार्हतार् थार्, मगर क्रीमियार् युद्ध की परार्जय ने रूस की कमर तोड़ दी। अंतिम समय में उसने बड़े दुख के सार्थ अपने पुत्र से कहार् थार् – “अब तो मैं केवल तुम्हार्रे लिए तथार् रूस के लिए ईश्वर से प्राथनार् कर सकतार् हूँ।” अलेक्जेन्डर अपने पितार् की भार्ंति निरंकुश थार् लेकिन कट्टर प्रतिक्रियार्वार्दी नहीं थार्। कभी वह सुधार्रवार्दी बन जार्तार् थार् तो कभी प्रतिक्रियार्वार्दी। रूस के आंतरिक इतिहार्स की यह विशेषतार् रही है कि जब जब विदेशी युद्धों में उसकी परार्जय हुई तब तब उसके आंतरिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण सुधार्र हुए। क्रीमियार् युद्ध के पश्चार्त रूस में महत्वपूर्ण आंतरिक सुधार्र हुए। रूस के बुद्धिजीवी भी सुधार्र की मार्ंग कर रहे थे।

कृषक दार्स प्रथार् की समार्प्ति 1861 ई. –

“कृषक दार्स प्रथार् पूर्ववर्ती शार्सन की आधार्रभूत त्रुटि थी। इसलिए स्वार्भार्विक थार् कि अलेक्जेन्डर द्वितीय के सुधार्र इस त्रुटि के निरार्करण से प्रार्रंभ होते विशेषत: ऐसी स्थिति में जब उनकी आधार्र-भूमि क निर्मार्ण निकोलस के रार्ज्य काल में ही हो चुक थार्।” (जाज वर्नार्दस्की, रूस क इतिहार्स- पृ. 202)

दार्स प्रथार् क तार्त्पर्य उन किसार्नों से थार् जो भूमि जोतते-बोते थे किंतु भूमि पर उनक कोई अधिकार न थार्। वे भूमिस्वार्मियों के नियंत्रण में रहते थे। भूमि जोतने-बोने के बदले उन्हें भूमिपतियों के खेतों में मुफ्त में कार्य करनार् पड़तार् थार्। लगार्न भी देनार् पड़तार् थार्। रार्ज्य को अलग से लगार्न देनार् होतार् थार्। भूस्वार्मी क नियंत्रण उनके जीवन पर भी थार्। बिनार् अनुमति के वे विवार्ह भी नहीं कर सकते थे। ये दार्स भूमि के सार्थ इस ढंग से बंधे होते थे कि भूस्वार्मी द्वार्रार् खेत बेच देने पर दार्स भी स्वार्मी के अधिकार में स्वयमेव चले जार्ते थे।

दार्स प्रथार् रूस की महत्वपूर्ण समस्यार् थी। तथ्य यह है कि रूस की आबार्दी क 90 प्रतिशत कृषक दार्स थे। संख्यार् की दृष्टि से ये पार्ंच करोड़ थे। 2 करोड़ 30 लार्ख कृषक दार्स तो केवल जार्र की निजी जमीन पर थे। शेष कुलीन वर्ग के अधिकार में थे।

समितियों क गठन –

जनवरी सन 1857 में जार्र अलेक्जेन्डर द्वितीय ने एक समिति क गठन कियार्। उच्च पदस्थ अधिकारियों की यह समिति कोई ठोस निर्णय नहीं कर पार्ई। विलनो के गवर्नर जनरल को यह कार्य सौंपार् गयार्। अभिजार्त वर्ग की प्रार्ंतीय समिति क गठन कियार् गयार्। अन्य प्रार्ंतों के अभिजार्त वर्गों की मार्ंग पर वहार्ं भी समितियार्ं गठित की गई। मार्स्को के अभिजार्त वर्गों के सार्मने जार्र ने स्पष्ट कहार् – “इसकी अपेक्षार् हम इस बार्त की प्रतीक्षार् करें कि कृषक दार्स प्रथार् नीचे से समार्प्त हो। यह अच्छार् होगार् कि सुधार्र ऊपरी स्तर से प्रार्रंभ हो।” (रूस क इतिहार्स- पृ. 202)

प्रार्ंतीय समितियों के कार्यों क पुनरीक्षण सेन्ट पीट्सबर्ग के विशेष आयोग द्वार्रार् कियार् गयार्। इस आयोग में शार्सकीय अधिकारियों के अलार्वार् कुलीन वर्ग के भूस्वार्मी भी रखे गए। जेम्स रोस्तो इसक अध्यक्ष थार्। प्रार्ंतीय समितियों की सुझार्वों की अपेक्षार् इस समिति के सुझार्व दूरगार्मी प्रभार्व वार्ले थे।

कृषक दार्स प्रथार् समार्प्त 1861 ई. –

रूस के कृषक दार्सों के लिए 3 माच 1861 ई. की तिथि अत्यंत महत्व की है। सम्रार्ट ने इसी तिथि को कृषक दार्स प्रथार् समार्प्ति विषयक आदेश पर हस्तार्क्षर किए :-

  1. घरेलू दार्सों को 2 वर्ष के भीतर स्वतंत्र कर दियार् जार्वेगार्।
  2. कृषक दार्सों को व्यक्तिगत स्वतंत्रतार् दी गई। भूमि भी उन्हें दियार् जार्वेगार्।
  3. भमि के उपयोग के कारण उन्हें कुछ रार्शि देनी थी यार् भूस्वार्मी के कुछ कार्य करने थे।
  4. कृषक चार्हे तो ऋण लेकर एकमुश्त भूस्वार्मी से भूमि ले सकतार् थार्।
  5. भूस्वार्मी को रार्शि देने के लिए कृषक को 49 वर्ष के लिए शार्सन की ओर से ऋण की व्यवस्थार् की गई।

जार्र अलेक्जेन्डर द्वितीय की इस सुधार्र योजनार् क लार्भ प्रत्यक्षत: कृषक दार्सों को मिलार्। 1861 से 1881 ई. के मध्य कुल भूस्वार्मियों में से 85 प्रतिशत ने कृषकों को अपनी जमीन बेच दी। कम्यून के लोग सार्मूहिक रूप से भूस्वार्मियों को जमीन की कीमत देने के लिए वचनबद्ध थे। सभी किसार्न जब निर्धार्रित रार्शि पटार् देते तब भूस्वमित्व कम्यून को मिलतार्। कम्यून अपने सदस्यों को परिवार्र के आकार के अनुसार्र स्वयं भूमि क बंटवार्रार् कियार् करतार् थार्। कम्यूनों के अधिकार व कर्तव्य निर्धार्रित थे। कम्यून के बार्हर कृषक पूर्ण स्वार्मित्व के आधार्र पर जमीन खरीद सकतार् थार्। सन 1861 ई क सुधार्र अपूर्ण होने के बार्वजूद कृषक दार्सों की दशार् सुधार्रने के क्षेत्र में बड़ार् कदम थार्। कृषक संपूर्ण रार्ज्य की भूमि बंटवार्रे में प्रार्प्त करने क स्वप्न देखने लगे – यह भार्वी क्रार्ंति की पृष्ठभूमि बनी।

जेमेमस्त्वो सुधार्र –

सन 1864 ई. में जार्र ने एक और सुधार्र कियार्। स्थार्नीय स्वशार्सन क प्रार्रंभ हुआ। प्रत्येक गार्ंव के निर्वार्चित प्रतिनिधियों को शार्लार्, अस्पतार्ल, सड़क संबंधी कार्य सौंपे गए। 3 वर्ष के लिए प्रतिनिधियों क चुनार्व होतार् थार्। निर्वार्चक तीन श्रेणी के थे। कुलीन और व्यार्पार्री, कृषक कम्यून, नगर निवार्सी। जेमस्त्वो के द्वार्रार् रूस में स्थार्नीय शार्सन व्यवस्थार् की नींव रखी गई। ये संस्कृति के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य करने वार्ले सिद्ध हुए।

न्यार्यिक सुधार्र –

सन 1864 में न्यार्यिक सुधार्र किए गए। न्यार्यार्लयीन प्रक्रियार् में सुधार्र, जूरी पद्धति क प्रार्रंभ करनार्, शार्ंति न्यार्यार्धिपति के पद की स्थार्पनार् इसमें सम्मिलित थे। रूस न्यार्य के क्षेत्र में अन्य यूरोपीय रार्ज्यों से सक्षम प्रमार्णित हुआ। कृषकों को अपने मार्मले पृथक नगर न्यार्यार्लयों द्वार्रार् निपटार्ने की विशेष व्यवस्थार् की गई थी।

सावजनिक सैनिक सेवार् –

1874 में लार्गू किए गए इस व्यवस्थार् से रंगरूटों को उनके परिवार्र के अनुसार्र विशेषार्धिकार दिए गए। एकमार्त्र पुत्र, पौत्र को पूर्ण विशेषार्धिकार प्रार्प्त होते थे। उसे द्वितीय वर्ग की रक्षित सेनार् में रखार् जार्तार् थार्। व्यवहार्रिक रूप में प्रथम विश्व युद्ध के पूर्व उसे सैनिक सेवार् के लिए नहीं बुलार्यार् गयार्। मार्ध्यमिक शिक्षार् प्रार्प्त व्यक्ति को विशिष्ट विशेषार्धिकार दिए गए थे। सेनार् में वर्गगत भेदभार्व नहीं थार्।

अलेक्जेन्डर द्वितीय के द्वार्रार् जो सुधार्र किए गए वे 1905 ई. तक और कुछ सन 1917 तक बनी रही। इन सुधार्रों से रूसी समार्ज में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। असंतोष की आंधी को रोकने में ये कारगर सिद्ध हुए।

13 माच 1881 को एक बम विस्फोट में जार्र अलेक्जेन्डर द्वितीय मार्रार् गयार्। ‘मुक्तिदार्तार् जार्र’ ने अनेक सुधार्र कर रूस क आधुनिकीकरण कियार्। रूसी सार्म्रार्ज्य क काफी विस्तार्र हुआ। जार्र अलेक्जेन्डर की हत्यार् एक महार्न रार्जनीतिक दुर्घटनार् थी।

जार्र अलेक्जेन्डर तृतीय 1881.1894 ई. – 

अलेक्जेन्डर द्वितीय की हत्यार् के पश्चार्त उसक पुत्र अलेक्जेन्डर तृतीय गद्दी पर बैठार्। निरंकुशतार् व प्रतिक्रियार्वार्द उसे विरार्सत में प्रार्प्त थी। उदार्रवार्द क वह शत्रु थार्। क्रार्ंतिकारियों ने उसके पितार् की हत्यार् की थी यह तथ्य उसे सदैव स्मरण रहतार् थार्। वह रूस की प्रतिष्ठार् को फिर से स्थार्पित करनार् चार्हतार् थार्। पालियार्मेंट उसकी निगार्ह में निरर्थक संस्थार् थी। पुलिस विभार्ग क प्रमुख प्लेबी उसकी निरंकुशतार् को बढ़ार्वार् देतार् थार्। निरंकुशतार्, धामिक कट्टरतार् और रूसीकरण इस त्रिभुज क नार्म अलेक्जेन्डर तृतीय थार्। एक जार्र, एक धर्म औरैरैर एक रूस उसक नार्रार् थार्।

हजार्रों की संख्यार् में आतंकवार्दी पकड़े गए, सूली पर लटकाए गए, जेल भेजे गए, सार्इबेरियार् मरने के लिए निर्वार्सित किए गए। प्रेस पर कठोर नियंत्रण स्थार्पित कियार् गयार्। अल्पसंख्यक जार्तियार्ं यार् तो रूसी भार्षार् व संस्कृति अपनार् लें अन्यथार् दंड के लिए तैयार्र रहें। पोल, यहूदी मुख्य रूप से शिकार बने। कुलीन वर्ग निरंकुश रार्जतंत्र क समर्थक थार्। उनके सार्थ अच्छार् व्यवहार्र कियार् गयार्। एक विशेष बैंक बनार्यार् गयार् जहार्ं से कुलीनों को कम ब्यार्ज में रुपये उधार्र दिए जार्ते थे। उच्च पदों पर उनकी नियुक्तियार्ं की गई। किसार्नों की दशार् सुधार्रने की ओर भी ध्यार्न दियार् गयार्। सिंचार्ई की सुविधार्यें बढ़ार्ई गई। औद्योगिक प्रगति की शुरु हुई। दार्स प्रथार् की समार्प्ति से रूस में मजदूर मिलनार् आसार्न हो गयार् थार्। कोयले व लोहे के बड़े खार्नों क पतार् लगार्यार् गयार्। आयार्त कर बढ़ार् दियार् गयार्। नये शहर रूस में बसने लगे। मध्यमवर्ग क जन्म हुआ। बड़े पैमार्ने पर रेलों की लार्इन बिछार्ई गई। 1891 में ट्रार्ंस सार्इबेरियन लार्इन क निर्मार्ण प्रार्रंभ हुआ। 1902 ई. में यह पूर्ण हुआ। रूस क मजदूर वर्ग समार्जवार्दी सिद्धार्ंतों से प्रभार्वित होने लगार्। 1894 ई. में अलेक्जेन्डर तृतीय की मृत्यु हुई।

“अलेक्जेन्डर तृतीय को कोई विशेष शिक्षार् नहीं मिली थी। किंतु उसमें रार्जमर्मज्ञतार् की सहज प्रवृत्ति और व्यवहार्रकुशलतार् थी। और वह उसके समक्ष प्रस्तुत किए गए प्रश्नों के सार्रभूत मुद्दों को बिनार् किसी कठिनार्ई के समझ जार्तार् थार्। अलेक्जेन्डर तृतीय क स्वभार्व जटिलतार्ओं से रहित थार्, किंतु वह एक जन्मजार्त सम्रार्ट थार्। (जाज वर्नार्दस्की, रूस क इतिहार्स- पृ. 215)

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