रूसी क्रार्ंति (1905 र्इ. एवं 1917 र्इ.)

1905 र्इ. की रूसी क्रार्ंति

1905 की रूसी क्रार्ंति के कारण

रूस की 1905 की क्रार्ंति के कारण उसकी रार्जनीतिक, सार्मार्जिक परिस्थितियों में निहित थे। जार्पार्नी युद्ध ने केवल उत्प्रेरक क कार्य कियार्। युद्ध में परार्जय के कारण रूस की जनतार् क असंतोष इतनार् बढ़ गयार् थार् कि उसने रार्ज्य के विरूद्ध विद्रोह कर दियार्। इस क्रार्ंति के कारण ही सरकार को जार्पार्न से युद्ध बंद कर शार्ंति संधि करनी पड़ी। इस क्रार्ंति के कारण निम्नलिखित थे –

  1. अलेक्जेण्डर तृतीय और निकोलस द्वितीय के शार्सन-काल में सुधार्र की ओर कोर्इ ध्यार्न नहीं दियार् गयार् थार्। इसके विपरीत, प्रशार्सन में प्रतिक्रियार्वार्दी तत्वों क पूर्ण प्रभार्व बनार् रहार्। सुधार्र आंदोलनों को अत्यंत कठोरतार् से कुचल दियार् जार्तार् थार्। जार्र की शक्ति पूर्ण रूप से निरंकुश और स्वेच्छार्चार्री थी। 
  2. जार्र के मंत्री पोवीडोनोस्नेव, टार्ल्सटार्य, प्लेहवे घोर प्रतिक्रियार्वदी थे। सुधार्र की मार्ँग को दबार्ने के लिए उन्होंने जघन्य अत्यार्चार्र किये। इससे आतंकवार्द बढ़तार् गयार्। पुलिस के अधिकार असीमित थे और निरपरार्ध व्यक्तियों को संदेह मार्त्र में मृत्यु दण्ड दियार् जार्तार् थार् यार् सार्इबेरियार् से निर्वार्सित कर दियार् जार्तार् थार्। 
  3. क्रार्ंति क कारण कृषकों की भूमि समस्यार् थी। अभिजार्त वर्ग के अधिकार में विशार्ल कृषि भूमि थी। किसार्न चार्हते थे कि इस भूमि को उनमें बार्ँट दियार् जार्ये। क्रार्ंतिकारियों के प्रचार्र से उनमें भी जार्गृति आ रही थी। क्रार्ंति के द्वार्रार् वे भूमि प्रार्प्त करनार् चार्हते थे। 
  4. श्रमिकों क असंतोष भी क्रार्ंति क कारण थार्। रूस में औद्योगीकरण के कारण बड़ी संख्यार् में मजदरू नगरों में एकत्रित हो गये थे। उनक जीवन असुरक्षित और दयनीय थार्। औद्योगिक समस्यार्ओं की और से सरकार उदार्सीन थार्। श्रमिकों में समार्जवार्दी विचार्र तेजी से फैल रहे थे। उन्हें संगठन बनार्ने यार् हड़तार्ल करने क अधिकार नहीं थार्। सरकार के दमन से उनमें असंतोष बढ़तार् जार् रहार् थार्। 
  5. 1896 के बार्द सुधार्र आंदोलन तेज हो गयार् थार्। अभिजार्त वर्ग और उच्च वर्ग के लोग भी सुधार्रों की मार्ँग कर रहे थे। समार्जवार्दी समार्ज में आमूल परिवर्तन की मार्ँग कर रहे थे। 1893 से मार्क्र्सवार्दी विचार्रधार्रार् क प्रचार्र हो रहार् थार्। 
  6. रूसीकरण की नीति के कारण दलित जार्तियार्ँ जैसे फिन, पोल आदि स्वतंत्रतार् के लिए संघर्ष कर रही थी। इनके असंतोष से क्रार्ंति को बल प्रार्प्त हुआ। 
  7. आतंकवार्दी पुलिस और भष्ट अधिकारियों की हत्यार् कर रहे थे। शार्सन के जुल्म और अत्यार्चार्र क यही एकमार्त्र जबार्व रह गयार् थार्। कृषकों और श्रमिकों को क्रार्ंति के लिए संगठित कियार् जार् रहार् थार् क्योंकि शार्ंतिपूर्ण उपार्यार्ं े द्वार्रार् सुधार्र असंभव हो गयार् थार्। 
  8. रूस-जार्पार्न युद्ध में रूस की परार्जय से सरकार की अयोग्यतार् और भ्रष्टार्चार्र स्पष्ट हो गयार्। सभी वर्गों में सरकार की आलार्चे नार् हो रही थी। निरंकुश और अयोग्य सरकार के परिवर्तन की मार्ँग बढ़ गयी। जनतार् के कष्ट बढ़ते जार् रहे थे। उन्हें केवल पुलिस क अत्यार्चार्र मिलतार् थार्।

तार्त्कालिक पृष्ठभूमि

रूस में जार्पार्न के विरूद्ध युद्ध को जनतार् क समर्थन प्रार्प्त नहीं थार्। रूस की जनतार् यह नहीं जार्नती थी कि युद्ध किस उद्देश्य से लड़ार् जार् रहार् है। युद्ध क प्रबंधन कुशलतार् से नहीं कियार् गयार् थार्। भ्रष्टार्चार्र इस सीमार् तक बढ़ गयार् थार् कि जनतार् ने जो उपहार्र सैनिकों के लिए दिये थे, वे नगरों में खुले आम बेचे जार् रहे थे। परार्जय से जनतार् में निरार्शार् बढ़ती जार् रही थी। 27 दिसम्बर को सम्रार्ट् की दूसरी घोषण प्रकाशित हुर्इ। इसमें सुधार्र कार्यक्रम पर कर्इ प्रतिबंध लगार् दिये गयें जैसे सभार्ओं की स्वतंत्रतार् नहीं दी जार् सकती थी। इससे रूस की जनतार् को मार्लमू हो गयार् कि सरकार अपनी शक्ति निरंकुश रखनार् चार्हती थी और सुधार्र करने के लिए उसकी इच्छार् नहीं थी।

खूनी रविवार्र

जार्र की घोषणार्ओं से सुधार्रवार्दी संतुष्ट नहीं थे। अब इस आदोंलन में श्रमिक वर्ग भी सम्मिलित हो गयार्। जनवरी 1905 में रार्जधार्नी सेण्ट पीटर्सबर्ग में हड़तार्ले हुर्इ। श्रमिक संगठन पर एक उदार्रवार्दी पार्दरी, फार्दर गेपन क प्रभार्व। यह संगठन श्रमिकों की आर्थिक समस्यार्ओं पर विचार्र करने के लिए बनार्यार् गयार् थार् लेकिन श्रमिक वर्ग में रार्जनीतिक जार्गृति बढ़ रही थी। अत: फार्दर गेपन को अपनार् प्रभार्व बनार्ये रखने के लिए आदोंलन को रार्जनीतिक रूप भी देनार् पड़ार्। उसके नेतृत्व में रार्जधार्नी के श्रमिकों ने कर्इ मार्ँगार्ं े केार् लेकर हडत्रतार्ल कर दी। वातार् असफल होने के बार्द गपे न ने जार्र के समक्ष यार्चिक प्रस्तुत करने क निश्चय कियार्। 22 जनवरी, 1905 को रविवार्र के दिन उसके नेतृत्व में हजार्रों श्रमिकों क जुलूस शार्ंति और अनशार्ति थार् लेकिन महल के सार्मने मैदार्न में सैनिकों ने उस पर गोलियार्ँ चलार्यी ं जिससे सैकड़ों प्रदर्शनकारी मार्रे गय।े इस घटनार् से क्रार्ंति आरं भ हो गयी।

जार्र द्वार्रार् सुधार्रों की घोषणार्

सुधार्रवार्दी आंदोलन अब स्पष्ट रूप से क्रार्ंतिकारी आंदोलन बन चुक थार्। यार्तार्यार्त और संचार्र सार्धन हड़तार्लों के कारण अवरूद्ध हो गये। थे। जनतार् के बढ़ते हुए असंतोष के कारण जार्र ने 3 माच को फिर सुधार्रों की घोषणार् की। जार्र ने कहार् कि वह सार्म्रार्ज्य के योग्यतम व्यक्तियों को कानून बनार्ने के कार्य में सम्बद्ध करनार् चार्हतार् थार्। अपै्रल व जून में अनेक सुधार्रों की घोषणार् भी की गयी और जनतार् से कहार् गयार् कि वे सुधार्रों के विषय पर अपने स्मरण पत्र प्रस्तुत करे।

क्रार्ंति क प्रसार्र

सुधार्रों की इन चर्चार्ओं के सार्थ हड़तार्लों क दौर भी चल रहार् थार्। सार्रे देश के श्रमिकों ने हड़तार्ल कर दी थी। स्थार्न-स्थार्न पर पुलिस और श्रमिकों की मुठभेडं ़े भी हो रही थी।ं 14 जून को कालार् सार्गर के एक जहार्ज ‘प्रोटीओमकिन’ के नार्विकों ने विद्रोह कर दियार्। इस बीच सुदूरपूर्व के दो युद्धों में रूस की निर्णार्यक परार्जय हो चुकी थी। माच 1905 में जार्पार्न ने मुदकन में रूसी सेनार् को परार्जित कर दियार् थार्। जल युद्ध में जार्पार्नियों ने रूस के जहार्जी बेड़े की सुसीमार् के युद्ध में नष्ट कर दियार् थार्।

अगस्त घोषणार्

सुसीमार् की परार्जय के बार्द सुधार्रवार्दियों ने पुन: सुधार्र की मार्ँग प्रस्तुत की। इस बार्र जेम्सतेवों सुधार्रवार्दियों के दोनों वर्ग नरम-सुधार्रवार्दी और उदार्र-सुधार्रवार्दी एक हो गय।े उनक संयुक्त अधिवेशन हुआ जिसमें नगरों के प्रतिनिधियों ने भी भार्ग लियार्। इस सम्मेलन ने जार्र के पार्स एक प्रतिनिधिमण्डल भेजार्। प्रतिनिधिमण्डल ने जार्र से भंटे करके ‘सम्रार्ट और जनतार्’ के सहयार्गे के लिए प्राथनार् की लेकिन इसक सरकार की प्रतिक्रियार्वार्दी नीति पर कोर्इ प्रभार्व नहीं पड़ार्। 28 जून को नगर परिषदों क एक वृहद सम्मेलन हुआ जिसमें मार्ँग की गयी कि जेम्सतेवों सम्मेलन की योजनार् को स्वीकार कियार् जार्ये। 19 जुलाइ को जेम्सतेवों तथार् नगर परिषदों क संयुक्त सम्मेलन हुआ जिसमें संविधार्न की रूपरेखार् स्वीकृत की गयी। सरकार ने इस पर कोर्इ ध्यार्न नहीं दियार् लेकिन अपनी ओर से 6 अगस्त को घोषणार् प्रकाशित की जिसमें ड्यूमार् की स्थार्पनार् के बार्रे में कहार् गयार् थार्। इसे अत्यतं सीमित मतार्धिकार पर चुनार् जार्नार् थार् और इसकी स्थिति परार्मर्श देने की थी। यह सरकार क अधूरार् प्रयार्स थार्। अनुदार्रवार्दियों को छोड़कर किसी दल ने इस योजनार् को स्वीकार नहीं कियार्।

क्रार्ंति की असफलतार्

1905 की क्रार्ंति असफल हो चुकी थी लेकिन सुधार्रवार्दियों को अभी ड्यूमार् से आशार् थी। शीघ्र ही यह स्पष्ट हो गयार् कि सरकार अपनी रूचि की ड्यूमार् चार्हती थी। प्रथम ड्यूमार् को दो मार्ह बार्द भंग कर दियार् गयार्। इसके सदस्यों ने देश से सरकार के प्रति असहयोग की अपील की लेकिन देश आंदोलनों से थक चुक थार्, अत: इसक प्रभार्व नहीं पड़ार्। सरकार ने छुटपुट विद्रोह को निर्दयतार् से कुचल दियार्। दूसरी ड्यूमार् में भी सरकार विरोधी सदस्यों क बहुमत थार्। इसे भी भंग कर दियार् गयार्। इसके बार्द सरकार ने मतार्धिकार सीमित करके चुनार्व करार्ये। इससे तीसरी ड्यूमार् में सरकार के समर्थकों को बहुमत प्रार्प्त हो गयार्। यद्यपि ड्यूमार् बनी रही लेकिन वह सरकार से सहयार्गे करती रही और सरकार की इच्छार् के अनुसार्र चार्लती रही।

असफलतार् के कारण

क्रार्ंति की असफलतार् के कारण निम्नलिखित थे –

  1. रूस क सैनिकतंत्र दुर्बल नहीं हुआ थार्। यद्यपि सुदूरपूर्व में हार्र हो गयी थी, पर सेनार् पूर्ण रूप से परार्जित नहीं हुर्इ थी। जब तक वह सुदूरपूर्व में फँसी रही, जार्र को क्रार्ंतिकारियों की मार्ँगों को स्वीकार करनार् पड़ार्। उसके वार्पस आते ही जार्र ने रियार्सतें वार्पस ले ली  और क्रार्ंति को कुचल डार्लार्। 
  2. विभिé रार्जनीतिक दलों के उद्दश्े यों में एकतार् नहीं थी। अक्टूबरवार्दी परार्मर्शदार्त्री ड्यूमार् से संतुष्ट थे। केडेट पाटी संसदीय प्रणार्ली चार्हती थी। समार्जवार्दी समार्ज में आमूल परिवर्तन चार्हते थे। उद्देश्य एक न हार्ने े से आदं ोलन में एकतार् क अभार्व हो गयार्। 
  3. विभिé वर्ग अपने-अपने हितों के लिए कार्य कर रहे थे। श्रमिक वर्ग औद्योगिक समस्यार्ओं को हल करने की प्रार्थमिकतार् दे रहार् थार्। कृषक वर्ग समझतार् थार् कि ड्यूमार् को इसलिए नियंत्रित कियार् जार् रहार् है कि वह भस्ू वार्मियों की भूमि जब्त करके उनमें बार्ँट दे। बुद्धिजीवी नार्गरिक संविधार्न और नार्गरिक अधिकारों में रूचि रखते थे। श्रमिकों और कृषकों को इनमें रूचि नहीं थी। 
  4. विट की रियार्सत देने की नीति ने भी आंदोलन को दुर्बल कर दियार्। अक्टूबर की घोषणार् से केडेट पाटी में फूट पड़ गयी थी। कृषकों को अनेक रियार्सतें दी गयी। सार्मार्न्य नार्गरिक, जनतार् और श्रमिक वर्ग व्यार्पक मतार्धिकार से संतुष्ट हो गयार् थार्। इससे समार्जवार्दी और आतंकवार्दी पृथक् रह गये। 
  5. क्रार्ंति के दौरार्न श्रमिकों और कृषकों की हिंसार् से मध्यम वर्ग क्रार्ंति से विमुख होने लगार् थार्। मार्स्को के श्रमिकों में बोल्शेविकों क प्रभार्व थार् जिनक सैनिकों से संघर्ष हुआ। ग्रार्मार्ं े में कृषकों की लूट और हिंसार् क भी विरोधी प्रभार्व पड़ार्। 
  6. क्रार्ंति को चलते एक वर्ष से अधिक हो गयार् थार्। इससे जनतार् में उदार्सीनतार् आने लगी थी। रूस जैसे विशार्ल देश में विभिé क्षेत्रों के मध्य समन्वय रखनार् भी कठिन थार्। अत: जनतार् अब ड्यमू ार् की ओर आकर्षित हो गयी थी। 
  7. सरकार को विदेशी ऋण मिल जार्ने से आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो गयी। अब वह ड्यूमार् को भंग कर सकती थी और क्रार्ंति को कुचल सकती थी। पोर्ट्समार्उथ की संधि में रूस को कोर्इ अपनार् क्षेत्र जार्पार्न को नहीं देनार् पड़ार् थार्। अत: सरकार को मनोबल ऊँचार् थार्। उसकी अंतर्रार्ष्ट्रीय स्थिति भी दृढ़ थी। फ्रार्ंस उसक मित्र थार् और इंग्लैण्ड से मित्रतार्पूर्ण संबंध स्थार्पित हो रहे थे। 

अर्द्ध संवैधार्निकतार् क युग (1906-1917) 

1905 की क्रार्ंति असफल होने के बार्द रूस में स्वच्े छार्चार्री शार्सन पूर्ण रूप से स्थार्पित हो गयार् थार्। शार्सन की नीति प्रतिक्रियार्वार्दी और दमनार्त्मक थी लेकिन ड्यूमार् क अस्तित्व बने रहने से शार्सन क स्वरूप अर्द्ध संवैधार्निक थार्। 1912 र्इ. में चौथी ड्यमार् चुनी गयी। वह भी शार्सन से सहयार्गे करती रही। उसके समय में प्रथम विश्वयुद्ध में रूस शार्मिल हुआ और 1917 में क्रार्ंति हुर्इ। युद्ध की असफलतार्ओं के कारण अविश्वार्स क वार्तार्वरण बन गयार्। इससे ड्यूमार् और सरकार के मध्य मतभेद उत्पé हो गये। इस संघर्ष में दोनों ही दुर्बल हो गये जिससे अंत में सत्तार् बोल्शेविकों के हार्थों में चली गयी।

1917 र्इ. की रूसी क्रार्ँति

क्रार्ंति क महत्व – रूस की क्रार्ंति क महत्व न केवल यूरोप के इतिहार्स में वरन् विश्व के इतिहार्स में है। जिस प्रकार 18वीं शतार्ब्दी के इतिहार्स की सबसे महत्वपूर्ण घटनार् फ्रार्ंस की रार्ज्य क्रार्ंति है उसी प्रकार बीसवीं शतार्ब्दी की सबसे महत्वपूर्ण घटनार् रूस की 1917 र्इ. की बोल्शेविक क्रार्ंति थी। रूस में सार्मार्जिक समार्नतार् क नितार्ंत अभार्व थार्। इस समय रूस क समस्त समार्ज तीन विभिन्न श्रेणियों में विभक्त थार्, जिनमें आपस में किसी भी प्रकार की सद्भार्वनार् विद्यमार्न नहीं थी। वे एक दूसरे को अपने से पूर्णतयार् भिन्न और पृथक समझती थीें।

  1. प्रथम श्रेणी में कुलीन वर्ग आतार् है। इसको रार्ज्य की ओर से बहुत अधिकार प्रार्प्त थे। 
  2. द्वितीय श्रेणी के अंतर्गत उच्च मध्यम वर्ग आतार् है, जिसमें व्यार्पार्री छोटे जमींदार्र, पूंजीपति सम्मिलित थे।
  3. तृतीय श्रेणी के अंतर्गत कृषक, अर्द्धदार्स कृषक तथार् श्रमिक सम्मिलित थे। इसके सार्थ रार्ज्य तथार् अन्य वर्गों क व्यवहार्र बहुत ही अमार्नुषिक थार्। 

जार्र की निरंकुशतार् तथार् स्वेच्छार्चार्रितार्-जार्र निकोलस पूर्ण निरंकुश तथार् स्वेच्छार्चार्री शार्सक थार्। यह जनतार् को किसी प्रकार क अधिकार प्रदार्न करने क पक्षपार्ती नहीं थार्।

1917 की रूसी क्रार्ंति के कारण

1. व्यार्वसार्यिक क्रार्ंति और उसके परिणार्म

अन्य देशों के समार्न रूस में भी व्यार्वसार्यिक क्रार्ंति हुर्इ, यद्यपि यहार्ं पर क्रार्ंति अन्य देशों की अपेक्षार् काफी समय के उपरार्ंत हुर्इ किन्तु इसके होने पर रूस में बहुत से कारखार्नों की स्थार्पनार् हो गर्इ थी। इस प्रकार रूस क औद्योगीकरण होनार् आरंभ हुआ। इसमें काम करने के कारण लार्खों की संख्यार् में मजदूर देहार्तों और गार्ंवों क परित्यार्ग कर उन नगरों तथार् शहरों में निवार्स करने लग,े जिनमें कल कारखार्नों की स्थार्पनार् हुर्इ थी। नगरों और शहरों में निवार्स करने के कारण अब वे पहले के समार्न सीधे-सार्दे नहीं रह गये थे। नगरों में रहने से उनमें न केवल चलतार्-पुरजार्पन ही आ गयार् थार्, अपितु ये रार्जनीतिक मार्मलों में भी रूचि लेने लगे थे। इनको अपने रार्जनीतिक तथार् सार्मार्जिक अधिकारों क भी ध्यार्न हुआ। इन्होनें अपने क्लबों क निर्मार्ण कियार्, जहार्ं ये सब प्रकार के मार्मलों पर विचार्र करते थे और आपस में वार्द-विवार्द करते थे इनको यहार्ं रहकर नवीन विचार्रधार्रार्ओं तथार् प्रवृत्तियों क भी ज्ञार्न हुआ। इन्होंने श्रमिक सगं ठनों की स्थार्पनार् भी करनी आरंभ कर दी।

2. 1905 र्इ. की क्रार्ंति

रूस मे 1905 र्इ. में एक क्रार्ंति हुर्इ थी, जिसके द्वार्रार् रूस में वैधार्निक रार्जतंत्र की स्थार्पनार् करने क पय्र ार्स कियार् गयार् थार् किन्तु पार्रस्परिक झगड़ों के कारण यह क्रार्ंति सफल नहीं हो सकी और शार्सन पर पुन: जार्र क आधिपत्य स्थार्पित हो गयार्। इस क्रार्ंति क स्पष्ट परिणार्म यह हुआ कि उसने रूस की सार्धार्रण जनतार् को रार्जनीतिक अधिकारों क परिचय करार् दियार् थार्। उनको ज्ञार्त हो गयार् कि वार्टे क क्यार् अर्थ है? ड्यूमार् यार् दूसरे शब्दों में पालियार्मंटे के सदस्यों क निर्वार्चन किस प्रकार जार्नार् चार्हिये? सरकार को लोकमत के अनुसार्र अपनी नीति क निर्धार्रण कर जनहित के कार्यों को करने के लिये अग्रसर होनार् चार्हिये। अपने रार्जनीतिक अधिकारों से परिचित हो जार्ने के कारण रूस की जनतार् समझ गर्इ कि रूस में भी पूर्णतयार् लार्के तंत्र शार्सन की स्थार्पनार् होनी चार्हिये जहार्ं सार्धार्रण जनतार् के हार्थ में शार्सन सत्तार् हो।

3. पश्चिमी यूरोप क प्रभार्व

पश्चिमी यूरोप के लार्के तंत्र रार्ज्यों क प्रभार्व भी रूस पर पड़ार्, यद्यपि रूस के सम्रार्टों ने पार्श्चार्त्य प्रगतिशील विचार्रों क रूस में प्रचार्र रार्के ने के लिये विशेष रूप से प्रयत्न कियार्, किन्तु विचार्रों क रोकनार् बहतु ही कठिन कार्य है, क्यार्ंेि क विचार्र हवार् के समार्न होते हैं। महार्युद्ध के समय में जर्मनी और उसके सार्थियों के विरूद्ध जो प्रचार्र-कार्य मित्र रार्ष्ट्रों की ओर से कियार् जार् रहार् थार्, उसमें मुख्यत: यही कहार् जार्तार् थार् कि वे लोकतंत्र शार्सन, जनतार् की स्वतंत्रतार् और रार्ष्ट्रीयतार् के आधार्र पर नवीन रार्ष्ट्रों क निर्मार्ण करने के अभिप्रार्य से युद्ध कर रहे हैं। रूस मित्र-रार्ष्ट्रों के अंतर्गत थार्। अत: वहार्ं की जनतार् पर भी इस प्रचार्र क बहुत असर पड़ार्।

4. मध्यम वर्ग के विचार्रों में परिवर्तन

रूसी में मध्य श्रेणी के व्यक्तियों में शिक्षार् क प्रचार्र हो गयार् थार्। जिस प्रकार फ्रार्ंस की क्रार्ंति क श्रेय फ्रार्ंस के दाशनिक, शिक्षित वर्ग आदि को प्रार्प्त है उसी प्रकार रूस में भी क्रार्ंति क वेग इसी श्रेणी के लोगों ने तीव्र कियार्। वे लार्गे नर्इ-नर्इ पुस्तकों क अध्ययन करते थ।े पश्चिमी यूरोप के विचार्रों की लिखी हुर्इ पुस्तकें रूसी भार्षार् में अनुवार्दित हुर्इ थी। अनेक एशियन लेखकों ने भी अपने ग्रन्थों द्वार्रार् नये तथार् प्रगतिशील विचार्रों क प्रतिपार्दन कियार्। शिक्षित वर्ग पर उन नये विचार्रों क बहुत अधिक प्रभार्व पड़ार्, विशेषत: नवयुवक विद्यार्थ्र्ार्ी नये विचार्रों क अध्ययन कर यह भली-भार्ंति समझने लगे थे कि उनक देश उन्नति की दौड़ में बहुत पिछड़ार् हुआ है, जिसक प्रमुख कारण जार्र की निरंकुशतार् है। उनके हृदय में यह भार्वनार् जार्गतृ हुर्इ कि उनक कर्तव्य है कि वे अपने देश को उन्नत करने के लिये घार्रे प्रयत्न करे।

5. महार्युद्ध क प्रभार्व

महार्युद्ध में रूस मित्र रार्ष्ट्रों की ओर से सम्मिलित हुआ। उनकी विशार्ल सेनार् ने युद्ध के आरंभ में बड़ी क्षमतार् तथार् योग्यतार् क प्रदर्शन कियार्, परन्तु दो वर्ष तक निरंतर युद्ध करते हुये उसमें शिथिलतार् के चिन्ह स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगे। रूस की सेनार् बहार्दुर अवश्य थी, किन्तु उसमें देश-भक्ति और रार्ष्ट्रीयतार् की वे भार्वनार्यें विद्यमार्न नहीं थी, जो अपूर्व त्यार्ग और मर मिटने के लिये प्रेरणार् प्रदार्न करती है। रूस की सेनार्यें संख्यार् की पूर्ति के लिये भरती की गर्इ थी।ं उनमें वीर सैनिकों की परम्परार् अवश्य थी, पर उनके सम्मुख कोर्इ आदर्श विशेष नहीं थार्। यही दशार् रूस की नौकरशार्ही की थी। रूस के कर्मचार्री यह नहीं समझते थे कि वे देश की उन्नति और रार्ष्ट्र सेवार् के लिये नियुक्त किये गये हैं। उनक आदर्श थार् सम्रार्ट को प्रसन्न कर उच्च पदों पर आसीन होनार्। जब विश्वयुद्ध लम्बार् होतार् गयार् और दो वर्ष की लड़ाइ के उपरार्ंत भी विजय के कोर्इ चिन्ह प्रकट नहीं हुए तो रूस की सेनार् और नार्कै रशार्ही घबरार् उठी। रिश्वत खार्रे ी, भष््र टार्चार्र आदि रूस में पहले से ही अपनी चरम सीमार् को प्रार्प्त कर चुक थार्। गरीब लार्गे ों के लिए गुजर कर सकनार् असंभव हो गयार् थार्।

1917 की रूसी क्रार्ंति की घटनार्यें तथार् परिणार्म

सेनार् द्वार्रार् जनतार् पर गोली चलार्ने से इंकार-अंत में 7 माच 1917 र्इ. को जनतार् की दशार् बहुत ही शोचनीय हो गर्इ थी। उसके पार्स न पहनने को कपड़ार् थार् और न खार्ने को अनार्ज थार्। वह भख्ू ार् और कपड़ े से व्यार्कुल हो चुकी थी। परेशार्न होकर भूखे और ठण्ड से ठिठुरते हुए गरीब और मजबूरों ने 7 माच दिन पेट्रोग्रेड की सड़कों पर घूमनार् आरंभ कियार्। रोटी की दुकानों पर तार्जी और गरम रोटियों के ढेर लगे पड़े थे। भूखी जनतार् क मन तार्जी और गरम चार्य व रोटियों को देखकर ललचार् गयार् और वह अपने आपको नियंत्रण में नहीं रख सकी। उन्होंने बार्जार्र में लूट-मार्र करनी आरंभ कर दी। सरकार ने सेनार् को उन पर गोली चलार्ने क आदेश दियार् कि वह गार्ले ी चलार्कर लूटमार्र करने वार्लों को तितर-बितर कर दे, किन्तु सैनिकों ने जिनको उनसे सहार्नुभूि त थी गार्ले ी चलार्ने से सार्फ मनार् कर दियार्। उनमें भी क्रार्ंति की भार्वनार् प्रवेश कर चुकी थी। जब मजदूरों ने यह देखार् कि सैनिक उन पर गोली चलार्ने को तैयार्र नहीं हैं, तो उनक सार्हस बहुत बढ़ गयार्। अत: अब क्रार्न्ति अवश्यम्भार्वी हो गर्इ थी।


जार्र क शार्सन त्यार्गनार्-दूसरी ओर ड्यूमार् ने विसर्जित होने से मनार् कर दियार्। उसक पेट्रोग्रेड सोबियत के समझौतार् हो गयार्, जिसके आधार्र पर 14 माच 1917 र्इ. को उदार्रवार्दी नेतार् जाज स्लार्व की अध्यक्षतार् में एक सार्मार्जिक सरकार की स्थार्पनार् की गर्इ। उसने 14 माच को जार्र से शार्सन क परित्यार्ग करने की मार्ंग की। परिस्थिति से बार्ध्य होकर उसने उनकी मार्ंग को स्वीकार कर शार्सन से त्यार्गपत्र दे दियार्। इस प्रकार रूस में जार्रशार्ही क अंत हुआ। क्रार्ंति में मजदूरों को सफलतार् प्रार्प्त हुर्इ, किन्तु उन्होनें शार्सन की बार्गडोर को अपने हार्थ में रखनार् उचित न समझ, समस्त शक्ति मध्य वर्ग के हार्थ में सौंप दी। 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *