रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) क्यार् है?

रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) क्यार् है?

By Bandey |
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अनुक्रम –

रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक देशव्यार्पी सार्मार्जिक, सार्ंस्कृतिक संगठन है। देशभर में सभी रार्ज्यों के सभी जिलों में 58,967 हजार्र से शार्खार्ओं के मार्ध्यम से रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क कार्य चल रहार् है। प्रत्येक समार्ज में देशभक्त, अनुशार्सित, चरित्रवार्न और नि:स्वाथ भार्व से काम करने वार्ले लोगों की आवश्यकतार् रहती है। ऐसे लोगों को तैयार्र करने का, उनको संगठित करने क काम रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ करतार् है। रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समार्ज में एक संगठन नार् बनकर सम्पूर्ण समार्ज को ही संगठित करने क प्रयार्स करतार् है।

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रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क अर्थ

रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क प्रत्येक शब्द बहुत महत्त्वपूर्ण है। यहार्ँ पर हम तीनों ही शब्दों के अर्थ को विस्तार्र से समझेंगे। सर्वप्रथम रार्ष्ट्रीय शब्द क अर्थ है कि जिसकी अपने देश, उसकी परम्परार्ओं, उसके महार्पुरुषों, उसकी सुरक्षार् एवं समृद्धि के प्रति अव्यभिचार्री एवं एकान्तिक निष्ठार् हो, जो देश के सार्थ पूर्ण रूप से भार्वार्त्मक मूल्यों से जुड़ार् हो अर्थार्त् जिसको सुख-दु:ख, हार्र-जीत व शत्रु-मित्र की समार्न अनुभूति हो वह रार्ष्ट्रीय कहलार्तार् है।

रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बौद्धिक विभार्ग के कार्यकर्तार् के अनुसार्र, ‘‘अपने देश के रार्ष्ट्रीयतार् हेतु सभी आवश्यक तत्वों की पूर्ति हिन्दू समार्ज के जीवन में हो जार्ती है। अत: हिन्दू समार्ज क जीवन ही रार्ष्ट्रीय जीवन है, अर्थार्त् हिन्दू ही रार्ष्ट्रीय है’’ और रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुसार्र व्यवहार्रिक रूप से रार्ष्ट्रीय, भार्रतीय तथार् हिन्दू शब्द पर्यार्यवार्ची है।

स्वयंसेवक से अभिप्रार्य है कि स्वयं प्रेरणार् से रार्ष्ट्र, समार्ज, देश, धर्म तथार् संस्कृति की सेवार् करने वार्ले व उसकी अभिवृद्धि के लिये प्रमार्णिकतार् तथार् नि:स्वाथ बुद्धि से कार्य करने वार्ले व्यक्तियों को स्वयंसेवक कहते हैं।

डॉ. केशव बलिरार्म हेडगेवार्र के अनुसार्र, ‘‘रार्ष्ट्र सेवार् के लिए स्वयं प्रेरणार् से अग्रसर लोग।’’ मार्.स. गोलवलकर ने स्वयंसेवक को निस्वाथ रूप से देश की सेवार् करने वार्लार् कहार् है, उन्होंने समार्ज में इनक व्यक्तित्व ऐसार् हो कि लोग उनके बार्रे में कहें कि, ‘‘यह व्यक्ति विश्वार्स करने योग्य है, इसमें अपने प्रति निष्कपट, नि:स्वाथ प्रेम है।’’ श्री गुरुजी ने एक स्वयंसेवक के गुणों की चर्चार् भी विस्तार्रपूर्वक की है जो इस प्रकार है-

1. जो नि: संग एवं निर्लेप है, जिसमें अहंकार नही है, जो धैर्यवार्न है, जिसके मन में आकांक्षार् और उत्सार्ह है, उसी प्रकार कर्म की सफलतार् से यार् असफलतार् से अथवार् लार्भ-हार्नि से जो विचलित नहीं होतार् उसे ही हमार्रे यहार्ँ सार्त्विक कार्यकर्तार् (स्वयंसेवक) कहार् गयार् है।

2. उत्तम कार्य करने क अर्थ है, हम जनतार् के विश्वार्स-भार्जन बनें। हमार्रार् आचरण शुद्ध हो, तभी जनतार् हमार्रार् विश्वार्स करेगी। हमार्रार् व्यक्तिगत जीवन इतनार् निष्कलंक हो कि किसी के भी मन में सपने में भी हमार्रे प्रति कोई संदेह-निर्मार्ण नहीं होनार् चार्हिए एक समय थार् जब हमार्रार् यह समार्ज शील एवं चरित्र से सम्पन्न थार्। आज भी ग्रार्मीण प्रदेश में हमें इस सत्शीलतार् के अनेक उदार्हरण देखने को मिल जार्ते हैं।

3. ध्येय के सार्थ हम जितनार् एकरूप होंगे, उठते-बैठते, जार्गते-सोते, सदार् सर्वकाल हमार्रे अन्तकरण में अपने जीवन के इसी ध्येय क स्पन्दन चलतार् रहेगार् तो हमार्रे शब्दों में सार्मथ्र्य आयेगार् हम जिनसे बार्त करेंगे वे हमार्री बार्त मार्नेंगे। जिसे हम कुछ करने के लिए कहेंगे, वह उसे करने के लिए तैयार्र हो जार्येगार् किसी के सार्मने हम अपनार् सिद्धार्न्त रखेंगे, तो वह उस सिद्धार्न्त को स्वीकार करेगार् हमने लार्ख कहार्, किन्तु हमार्रे सम्मुख जो बैठार् है, वह हमार्रे सिद्धार्न्त को मार्न्य न करतार् हो, तो उसक अर्थ यह लेनार् चार्हिए कि हमार्री तपस्यार् कम पड़ी है, उसे बढ़ार्नार् होगार् अपनार् ध्येयचिन्तन कुछ कम पड़ गयार् है, दुर्बल हो गयार् है, उसे तेजस्वी और बलवार्न बनार्नार् होगार् इस बार्त को हमें ठीक से समझ लेनार् चार्हिए दूसरों को दोष न देकर हमार्रे अन्दर किस बार्त की त्रुटि है, इसक विचार्र करनार् चार्हिए

4. हमार्री वार्णी मधुर हो। सत्य और अच्छार् किन्तु मधुर बोलनार् चार्हिए कटु सत्य नहीं बोलनार् चार्हिए यह नहीं कहनार् चार्हिए कि मैं बहुत अक्खड़ आदमी हूँ और उद्दण्ड बार्तें करूँगार् सत्य तो बोलनार् चार्हिए, किन्तु उसे ऐसे मीठे शब्दों में बोलनार् चार्हिए कि सुनने वार्ले के हृदय में कोई चोट न पहुँचे और वह उस सत्य को सुन भी ले।

अत: जो स्वयं प्रेरणार् से, बिनार् किसी प्रतिफल यार् पुरस्कार की इच्छार् के, अनुशार्सन पूर्वक, निर्धार्रित पद्धति से, निरन्तर व योजनार्बद्ध रूप के मार्तृभूमि की सेवार् करे, वह स्वयंसेवक है। रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क शार्ब्दिक अर्थ संगठन यार् समुदार्य होतार् है। समार्न विचार्र वार्ले, समार्न लक्ष्य को समर्पित, परस्पर आत्मीय भार्व वार्ले व्यक्तियों के निकट आने से संगठन बनतार् है। ये सभी एक ही पद्धति, रीति व पूर्ण समर्पण भार्व से कार्य करते हैं।

कृष्णकुमार्र अष्ठार्नार् ने कहार् है कि, ‘‘रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक विशुद्ध सार्ंस्कृतिक संगठन है। हिन्दू समार्ज को संगठित और शक्तिशार्ली बनार्कर रार्ष्ट्र को परमवैभव सम्पन्न बनार्नार्, यह उसक इष्ट है।’’

आन्ध्र के एक प्रमुख सर्वोदयी नेतार् श्री प्रभार्कर रार्व ने 1977 में आन्ध्र के पूर्व तट पर समुद्री चक्रवार्त के समय रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्तार्ओं की सेवार् भार्वनार्, तत्परतार् व निष्ठार्, नि:स्वाथ भार्वनार् को देखकर आर.एस.एस. की व्यार्ख्यार् ‘‘Ready for Selfless Service’’ की थी, जिसक अर्थ है, नि:स्वाथ सेवार् के लिए सदार् सिद्ध। इस प्रकार रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ रार्ष्ट्र के प्रति समर्पण, त्यार्ग, सेवार् की भार्वनार् से ओत-प्रोत संगठन है।

रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थार्पनार्

प. पू. डॉ. केशव बलिरार्म हेडगेवार्र ने रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क निर्मार्ण किन परिस्थितियों में कियार्, सर्वप्रथम हम इस पर विचार्र-विमर्श करेंगे कि ऐसार् क्यार् हुआ, अथवार् किसके अभार्व यार् कमी के कारण रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क विकास करनार् पड़ार्। हेडगेवार्र एक देशभक्त व सक्रिय क्रार्न्तिकारी, एक चिन्तनशील व्यक्ति थे। उन्होंने इतिहार्स में पढ़ार् थार् कि किस प्रकार हमार्रे देश की संस्कृति व सभ्यतार्, विश्व की सर्वोपरि संस्कृति है और कैसे हमार्री हिन्दू संस्कृति को विदेशी आक्रमणों व अंग्रेजों के द्वार्रार् धार्रार्शार्यी की जार् रही है। इसके पीछे उन्होंने जो कारण पार्यार् वह थार् रार्ष्ट्रीय एकतार् की कमी व हमार्रार् समार्ज हिन्दुत्व की श्रेष्ठतार्, गौरवशार्ली अतीत व सार्मार्जिक समरसतार् के भार्व क विस्मरण करतार् जार् रहार् है। व्यक्ति आत्मकेन्द्रित, व्यक्ति बनकर स्वाथ में लिप्त हो रहार् है, जिसके कारण सार्मूहिक अनुशार्सन क अभार्व हो रहार् है। हमार्रे समार्ज में भार्षार्, शिक्षार्, जीवन मूल्यों व हिन्दू में व्यक्ति हीनतार् की भार्वनार् क विकास हो रहार् थार्।

अंग्रेजों से अपने देश को आजार्द करने के लिए भी आदि कारण रहे, जिसकी वजह से रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क जन्म हुआ। सही मार्यने में हमार्रार् देश जो गुलार्म हुआ, कभी मुस्लिम, कभी अंग्रेजों के द्वार्रार् इसक सही कारण हमार्रे देश की सार्ंस्कृतिक रार्ष्ट्रीय एकतार् की कमी ही रहार् है। रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वार्रार् उस जड़ को ही समार्प्त करनार् थार् तार्कि भविष्य में हमें ऐसी समस्यार् से जूझनार् नार् पड़े।

27 सितम्बर, 1925 को विजयार्दशमी के दिन प्रखर रार्ष्ट्रवार्दी डॉ. केशव बलिरार्म हेडगेवार्र ने अपने विश्वस्त सार्थियों के सार्थ विचार्र-विमर्श कर नार्गपुर में एक नए संगठन एवं कार्यपद्धति क श्रीगणेश कियार्। आनन्द आदीश के शब्दों में:-

‘‘विजयदशमी क पार्वन दिन

उन्नीस सौ पच्चीस क प्रभार्त,

रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जन्म

कितनार् अनुपम, कितनार् उदार्त्त!’

’ हर रविवार्र को समतार् संचार्लन क प्रशिक्षण प्रार्रम्भ हुआ जबकि हर गुरुवार्र और रविवार्र को रार्ष्ट्रीय महत्त्व के विषयों पर भार्षण प्रार्रंभ हुए रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क लिखित रूप में कोई उद्देश्य नहीं थार्, आश्चर्य होतार् है। इस संगठन ने अपनार् कोई प्रचार्र नहीं कियार् थार्। 6 महीने तक तो नार्मकरण भी नहीं हुआ थार्। 17 अप्रैल 1926 को संगठन क नार्मकरण कियार् गयार्। नार्गपुर के मोहित बार्ड़ार् में प्रतिदिन 1 घण्टे की मिलन नित्य शार्खार् 28 मई, 1926 से प्रार्रम्भ हुई और आज भार्रतवर्ष के प्रत्येक रार्ज्य एवं प्रत्येक जिले में रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी 58,967 शार्खार्ओं के मार्ध्यम से सार्मार्जिक कार्य कर रहार् है।

इस प्रकार डॉ. हेडगेवार्र ने रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मार्ध्यम से सम्पूर्ण देश को जार्गृत करनार् व उपर्युक्त कमियों, जो देश में थी, उनको दूर करने के लिए डॉक्टर जी ने स्वार्भिमार्नी, संस्कारित, अनुशार्सित, चरित्रवार्न, शक्तिसम्पन्न, विशुद्ध देशभक्ति से ओत-प्रोत, व्यक्तिगत अंहकार से मुक्त व्यक्तियों क ऐसार् संगठन बनार्यार्। जो स्वतंत्रतार् आन्दोलन की रीढ़ होने के सार्थ ही रार्ष्ट्र व समार्ज पर आने वार्ली प्रत्येक विपत्ति क सार्मनार् भी कर सकेगार् आज विश्व के अन्य 471 देशों में भी यह संगठन हिन्दू संस्कृति की रक्षार् कर रहार् है।

रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्राथनार्

उत्तर भार्रत में जो वंदनार् गार्यी जार्ती थी उसक कुछ भार्ग तथार् मरार्ठी प्राथनार् क भार्ग दोनों मिलार्कर प्राथनार् की रचनार् हुई और उद्घोष के रूप में ‘रार्ष्ट्र गुरु श्री समर्थ रार्मदार्स स्वार्मी की जय’ के सार्थ उसकी पूर्णतार् की। समर्थ गुरु रार्मदार्स ने ही छत्रपति शिवार्जी को प्रेरणार् दी जिन्होंने कालार्न्तर में हिन्दवी स्वरार्ज्य की स्थार्पनार् की थी। पहले बोली जार्ने वार्ली प्राथनार् निम्न प्रकार से है:-

नमो मार्तृ भूमि जिथे जन्मलो मी,

नमो आर्य भूमी जिथे वार्ढ़लो मी।

नमो धर्म भूमि जियेच्यार्य कामीं,

पड़ो देह मार्झार् सदार् तो नमी मी।।1।। (मरार्ठी पद)

हे गुरो श्री रार्मदूतार्! शील हमको दीजिए,

शीघ्र सार्रे सद्गुणों से पूर्ण हिन्दू कीजिए

लीजिए हमको शरण में रार्मपन्थी हम बनें,

ब्रह्मचार्री धर्मरक्षक वीरव्रतधार्री बने।।2।। (हिन्दी पद)

‘रार्ष्ट्रगुरु श्री समर्थ रार्मदार्स स्वार्मी की जय’, उक्त मरार्ठी और हिन्दी पदों में कुछ संशोधन के सार्थ प्राथनार् की रचनार् की गयी। रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क विस्तार्र जब सम्पूर्ण भार्रत में हो गयार् तब प्राथनार् में परिवर्तन करने की आवश्यकतार् अनुभव की जार्ने लगी। समय के अनुसार्र रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में परिवर्तन होते रहे हैं, कभी गणेश, शार्रीरिक कार्यक्रमों में। इन बार्तों क विचार्र करने के लिए सन् 1939 में वर्धार् जिले के सिन्दी ग्रार्म में एक बैठक क आयोजन हुआ।

इस बैठक में प. पू. सरसंघचार्लक डॉ. हेडगेवार्र जी के अतिरिक्त श्री गुरुजी, श्री बार्लार्सार्हब देवरस, श्री आप्पार्जी जोशी, श्री बार्बार् सार्हब आप्टे, श्री तार्त्यार्रार्व तेलंग, श्री नरहरि नार्रार्यण भिड़े तथार् सिन्दी गार्ँव के ही डॉक्टर जी के मित्र श्री नार्नार्सार्हब टार्लार्टुले इत्यार्दि प्रमुख कार्यकर्तार् उपस्थिति थे। यह बैठक दस दिन तक चली तथार् गहन मंथन और मंत्रणार् के उपरार्न्त श्री नार्नार् सार्हब टार्लार्टुले ने गद्य क भार्व व श्री नरहरि नार्रार्यण भिड़े ने पद्य में इसकी रचनार् की।

गद्य व पद्य दोनों क ही संस्कृत भार्षार् में स्वरूप आयार्, प्राथनार् में तीन श्लोक और बार्रह पंक्तियार्ँ हैं- तेरहवीं पंक्ति ‘भार्रत मार्तार् की जय’ क उद्घोष है। पहले श्लोक क छन्द ‘भुजंग प्रयार्त’ है। दूसरे व तीसरे श्लोक में प्रथम चरणाथ ‘भुजंग प्रयार्त’ में है, उत्तराध में दो मार्त्रार् कम है। पूरे श्लोक क छन्द ‘मेघ निर्घोष’ है। रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्राथनार् क स्वरूप इस प्रकार है:-

नमस्ते सदार् वत्सले मार्तृभूमि

त्वयार् हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम्।

महार्मड़्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे।

पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते।।1।।

प्रभो शक्तिमन् हिन्दुरार्ष्ट्रार्ड़्गभूतार्

इमें सार्दरं त्वार्ं नमार्मो वयम्

त्वदीयार्य कार्यार्य बद्धार् कटीयं

शुभार्मार्शिष देहि तत्पूर्तये।

अजच्यार्ं च विश्वस्य देहीश शक्तिं।

सुशीलं जगद् येन नम्रं भवेत्

श्रुतं चैव यत् कण्टकाकीर्णमाग

स्वयं स्वीकृत न: सुगं कारयेत्।।2।।

समुत्कर्ष नि: श्रेयसस्यैकमुग्रं

परं सार्धनं नार्म वीरव्रतम्

तदन्त: स्फरत्वक्षयार् ध्येयनिष्ठार्

हृदन्त: प्रजार्गर्तु तीव्रार्ऽनिशम्।

विजेत्री च न: संहतार् कार्यशक्त्रि

विधार्यार्स्य धर्मस्य संरक्षणम्

परं वैभव नेतुमेतत् स्वरार्ष्ट्रं

समर्थार् भवत्वार्शिषार् ते भ्रशम्।।3।।

।।भार्रत मार्तार् की जय।।

प्राथनार् क अनुवार्द इस प्रकार है कि-

हे वत्सल मार्तृभूमि! मैं तुझे निरन्तर प्रणार्म करतार् हूँ। हे हिन्दुभूमि! तूने ही मेरार् सुखपूर्वक संवर्धन कियार् है। हे महार्मड़्गलमयी पुण्यभूमि! तेरे लिए ही मेरी यह कायार् काम आये। मैं तुझे बार्र-बार्र प्रणार्म करतार् हूँ।

हे सर्वशक्तिमार्न परमेश्वर! हम हिन्दुरार्ष्ट्र के अंगभूत ये घटक, तुझे आदरपूर्वक प्रणार्म करते हैं। तेरे ही कार्य के लिए हमने अपनी कमर कसी है। उसकी पूर्ति के लिए हमें शुभ आशीर्वार्द दे। विश्व के लिए जो अजेय हो ऐसी शक्ति, सार्रार् जगत् जिससे विनम्र हो ऐसार् विशुद्ध शील तथार् बुद्धिपूर्वक स्वीकृत हमार्रे कण्टकमय माग को सुगम करने वार्लार् ज्ञार्न भी हमें दे।

ऐहिक और परलौकिक कल्यार्ण तथार् मोक्ष की प्रार्प्ति के लिए वीरव्रत नार्मक जो एकमेव श्रेष्ठ उत्कट सार्धन है, उसक हम लोगों के अन्त:करण में स्फुरण हो। हमार्रे हृदय में अक्षय तथार् तीव्र ध्येयनिष्ठार् सदैव जार्गृत रहे। तेरे आशीर्वार्द से हमार्री विजयशार्लिनी संगठित कार्यशक्ति स्वधर्म क रक्षण कर अपने इस रार्ष्ट्र को परमवैभव की स्थिति में ले जार्ने में पूर्णतयार् समर्थ हो।

इस प्राथनार् को सर्वप्रथम 23 अप्रैल, 1940 को पुणे के रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शिक्षार् वर्ग में गार्यार् थार्। श्री यार्दव रार्व जोशी ने इसे सुर प्रदार्न कियार् थार्। स्त्रियों की शार्खार् रार्ष्ट्र सेविक समिति और विदेशों में लगने वार्ली हिन्दू स्वयंसेवक रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्राथनार् अलग है। रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शार्खार् यार् अन्य कार्यक्रमों के इस प्राथनार् को अनिवायत: गार्यार् जार्तार् है और ध्वज के सम्मुख नमन कियार् जार्तार् है।

रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क गणवेश

गणवेश किसी भी संस्थार्, संगठन यार् समुदार्य की एक बार्ह्य पहचार्न होती है, परंतु रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए गणवेश श्रद्धार् क विषय व सार्ध्य को पूर्ण करने क सार्धन है। रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में गणवेश लगार्ने के पीछे उद्देश्य रहे हैं कि समार्न वेश, अनुशार्सन, शौर्य, उत्सार्हपूर्ण वार्तार्वरण बनार्नार्, पुरूषाथ भार्व जार्गरण करनार् है। किसी भी संस्थार् क विशेष कार्यक्रम हो तो वह गणवेश में ही अच्छार् लगतार् है।

गणवेश में भी रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में समय-समय पर परिवर्तन होते रहे हैं। 1927-1940 तक सभी कार्यकर्तार् खार्की नेकर, खार्की कमीज, कालार् जूतार् (लॉन्ग बूट), खार्की रंग की पोंगली पट्टी, चमड़े क लार्ल पट्टार् (पेटी), काली टोपी, दण्ड तथार् आर.एस.एस. क बैच। 1940-1973 के काल में खार्की कमीज की जगह सफेद कमीज व शेष गणवेश पर्ववत् रही। शार्सन के प्रतिबन्ध के कारण पदवेश में नीले मौजे व सफेद रंग के कपड़े के जूते रहे। 1974 के बार्द खार्की नेकर, सफेद कमीज, चमड़े की लार्ल पेटी, काली टोपी, खार्की मौजे, चमड़े यार् प्लार्स्टिक क सार्दार् कालार् फीते वार्लार् जूतार् प्रार्रम्भ हुआ। माच 2011 में लार्ल चमड़े के पट्टे की जगह नार्ईलोन क लार्ल पट्ट्रे की शुरूआत हुई। ‘‘माच 2016 में गणवेश में खार्की नेकर की जगह कॉफी रंग की पेन्ट की शुरूआत हुई।’’

मनमोहन वैद्य, ने गणवेश के परिवर्तनों के बार्रे में कहार् कि, ‘‘Any Mass organisation can not grow withoutA change.’’ रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क गणवेश समय-समय पर बदलतार् रहार् है और आवश्यकतार् पड़ने पर भी बदल सकतार् है। परन्तु रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में आने क आकर्षण गणवेश कभी नहीं रहार् है। रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ने क मुख्य आकर्षण रहार् है भार्रत शक्ति यार् देशभक्ति। अपने समार्ज की वर्तमार्न स्थिति के बार्रे में मन में वंदनार्। इसमें परिवर्तन लार्ने क संकल्प और इस हेतु प्रेरणार्, यही रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सार्थ वर्षों तक व्यक्ति को जोड़े रखतार् है। दूसरार् आकर्षण है यहार्ँ पर मिलने वार्लार् अकृत्रिम स्नेह, निस्वाथ भार्व से मिलने वार्ली संबंधों उष्मार्। तीसरार् महत्व क आकर्षण है यहार्ँ पर एकदम नजदीक दिखने वार्ले, जिनसे हम खेल सकते हैं, बार्त कर सकते हैं, परख सकते हैं, ऐसे आदर्श जीने वार्ले लोग। और एक महत्त्व की बार्त है, वह यार्नी रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शार्खार् में हर रोज आने के लिए गणवेश पहननार् अनिवाय नहीं है। वहार्ँ खेल यार् शार्रीरिक कार्यक्रम अधिक होते है। ऐसे कार्यक्रम हेतु कोई समुचित वेश पहनकर कोई भी आ सकतार् है। बड़े शिविर यार् विशेष कार्यक्रमों में ही गणवेश पहननार् पड़तार् है। दैनिक शार्खार् में आने के लिए ऐसे शिविर आदि कार्यक्रमों में सहभार्गी होनार् अनिवाय नहीं है। इसलिए रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सार्थ जुड़ने के लिए गणवेश बार्धार् है, ऐसार् नहीं है।

रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्तार्ओं ने अपनार् सम्पूर्ण जीवन रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यों के लिए लगार् दियार् तो वे अपने आप में संन्यार्सी हैं, डॉ. हेडगेवार्र ने उनके लिए कोई अलग से वेश धार्रण करने को नहीं बतार्यार् है। समार्ज के अन्दर अपनार् अलगपन दिखनार् रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को मार्न्य नहीं है। लोगों के लिए अलौकिक यार्नी असार्मार्न्य न रहे, यह सीख सन्त ज्ञार्नेश्वर की है। रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने यह सीख आचरण में उतार्री है। रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और समार्ज एक रूप हो, यह रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिक है, अपेक्षार् है।

रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में गुरुदक्षिणार्

रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में कभी-भी किसी से आर्थिक सहार्यतार् नहीं ली जार्ती है। रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सार्रे कार्य आत्मनिर्भर होकर किये जार्ते हैं। रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्तार् स्वयं अपनार् खर्च उठार्ते हैं, वह किसी दूसरे पर आश्रित नहीं होते हैं, आगे रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में नये कार्यकतार् आते रहे अर्थार्त् रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ते रहे और उनके पार्लन-पोषण के लिए रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में गुरु दक्षिणार् की पद्धति प्रार्रम्भ हुई। तार्कि उनके लिए आवश्यक गुणों क भी ठीक प्रकार से परिपोषण होतार् रहे। इस दृष्टि से डॉक्टर सार्हब ने शार्खार् पद्धति में कुछ मौलिक अंश जोड़ दिये। उदार्हरण के लिए, किसी भी संगठन के सुचार्रू रूप से चरित्र और अनुशार्सन के सार्थ-सार्थ चलते रहने के लिए उसके सदस्यों में धन के बार्रे में पवित्र भार्वनार् रहनार् अनिवाय है। इसलिए डॉक्टर सार्हब ने रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शुल्क यार् दार्न की कल्पनार् के स्थार्न पर समर्पण क दृष्टिकोण सार्मने रखार्।

इसी दृष्टि से गुरुदक्षिणार् की परिपार्टी प्रार्रम्भ की। भगवार्ध्वज को ही अपनार् गुरु मार्नकर स्वयंसेवक व्यार्स पूर्णिमार् (आषार्ढ़ शुक्ल पूर्णिमार्) के शुभ दिन पर उसके सार्मने अपनी क्षमतार् के अनुसार्र दक्षिणार् चढ़ार्ते हैं। उसी के बल पर रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनार् सार्रार् कामकाज चलार्तार् है। इस पद्धति के रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों के अंदर स्वार्वलम्बन क भी संस्कार पनपतार् है। इस दृष्टिकोण को स्वयंसेवकों को समझार्ते हुए डॉक्टर सार्हब कहते थे कि, ‘‘देखो भार्ई, कोई कितने भी गरीब हो, उस परिवार्र के लोग अपने यहार्ँ मंगल यार् अमंगल प्रसंग होने पर आम लोगों के पार्स जार्कर भीख नहीं मार्ंगते, कठिनार्ई होने पर भी कैसे भी उस प्रसंग को निभार् लेते हैं। रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बार्रे में अपने को ऐसार् ही सोचनार् है।’’ यही दृष्टिकोण रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हर कार्यक्रम में भार्ग लेते समय स्वयंसेवक अपने व्यवहार्र में लार्ते हैं।

गुरुदक्षिणार् क विषय स्पष्ट करते हुए श्री गुरुजी ने लिखार् है- ‘‘अपने कार्य में गुरु-पूर्णिमार् एक महत्वपूर्ण अवसर है। इसे व्यार्स पूर्णिमार् भी कहते हैं। व्यार्स महर्षि ने हमार्रे रार्ष्ट्र-जीवन के श्रेष्ठतम गुणों को निर्धार्रित करते हुए, उनके महार्न् आदर्शों को चित्रित करते हुए, विचार्र तथार् आचार्रों क समन्वय करते हुए न केवल भार्रतवर्ष क अपितु सम्पूर्ण मार्नव जार्ति क मागदर्शन कियार्। इसलिए वेदव्यार्स जगत के गुरु हैं। इसलिए कहार् गयार् है- ‘व्यार्सों नार्रार्यणं स्वयं’। इसी दृष्टि से व्यार्स पूजार्, को गुरु पूर्णिमार् भी कहार् जार्तार् है। जिसे हमने श्रद्धार्-पूर्वक मागदर्शक यार् गुरु मार्नार् है, उसकी हम इस दिन पूजार् करते हैं, उसके सार्मने अपनी भेंट चढ़ार्ते हैं, उसे आत्म-निवेदन करते हैं और आगार्मी वर्ष के लिये आशीर्वार्द मार्ंगते हुए, हम अपनी उन्नति क माग प्रशस्त करते हैं। इस प्रकार यह पूजार् का, आत्म निवेदन क अवसर है।’’

गुरुदक्षिणार् के रूप में श्रद्धार् के सार्थ कुछ कष्ट उठार्ते हुए, कुछ स्वाथों को तिलार्ंजलि देते हुए जो दियार् जार्तार् है, वह सच्चार् समर्पण है। गुरुदक्षिणार् कितनी देनी चार्हिए, इसक कुछ निश्चित आँकड़ार् नहीं रहतार्। चन्दार्, सहार्यतार्, दार्न जैसार् इसक स्वरूप नहीं रहतार् है। न यहार्ँ किसी भी प्रकार की सख्ती है। कौन कितनार् देगार्, यह हर किसी की श्रद्धार्, स्वेच्छार् और क्षमतार् पर निर्भर है। एक पैसार् भी चल सकतार् है। हम कितनार् देते हैं, इसक महत्व नहीं है। हम कितने प्रयार्स से और किस भार्वनार् से देते हैं, इसक महत्त्व है।

इस प्रकार गुरुदक्षिणार् में दी गई रार्शि से रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूरे वर्ष क खर्च चलार्तार् है, उसके अनुसार्र ही रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम प्रबंध किये जार्ते हैं।

रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उद्देश्य

हर समुदार्य यार् संस्थार्, संगठन की जब स्थार्पनार् की जार्ति है तो सबसे पहले उसके उद्देश्य ही निर्धार्रित किये जार्ते हैं। उसके उद्देश्यों के अनुरूप ही उसके कार्यक्रमों, कार्यपद्धति को निर्धार्रित कियार् जार्तार् है। रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क भी अपनार् एक उद्देश्य है, जिसको लेकर डॉ. हेडगेवार्र जी ने इसकी स्थार्पनार् की थी।

रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क उद्देश्य है कि हमार्रार् भार्रत विश्व क सर्वश्रेष्ठ देश बने व आर्थिक दृष्टि से यह स्वार्वलम्बी और सम्पन्न हो। भार्रत ने कभी भी किसी पर आक्रमण नहीं कियार् है, लेकिन भार्रत पर युद्ध लार्दार् जार्ए तो युद्ध में भार्रत हमेशार् अजेय हो। मार्. स. गोलवलकर के शब्दों में रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उद्देश्य इस प्रकार हैं-

‘‘रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिन्दुओं के रार्ष्ट्रीय चरित्र क सार्क्षार्त्कार कर उनमें भार्रत व उसकी रार्ष्ट्रीय प्रकृति के प्रति प्रखर निष्ठार् क संचार्र करने, उनमें सद्गुण, सच्चरित्र एवं पूर्ण समर्पण की भार्वनार् जगार्ने, सार्मार्जिक जार्गरूकतार् उत्पन्न करने, प्रस्थ-सद्भार्व, सहयोग एवं स्नेह क भार्व उद्बुद्ध करने, रार्ष्ट्र सेवार् को सर्वोच्च मार्नने एवं जार्ति, भार्षार् तथार् पंथ को गौण स्थार्न देने की मनोवृत्ति विकसित करने और उसे आचरण में उतार्रने, उनमें विन्रमतार् एवं अनुशार्सन के सार्थ समस्त सार्मार्जिक दार्यित्वों के निर्वहन हेतु शार्रीरिक सौष्ठव एवं कठोरतार् के महत्व क अभ्यार्स करार्ते हुए जीवन के हर क्षेत्र में व्यार्प्त अनुशार्सन द्वार्रार् हिमार्लय से कन्यार्कुमार्री पर्यंत संगठित, समरस रार्ष्ट्र के निर्मार्ण हेतु योजनार्बद्ध प्रयार्स कर रहार् है।’’

रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उद्देश्यों को पूरार् करने के लिए, स्वयंसेवकों को अपने आचरण में लार्नार् होगार् समरसतार् की बार्त करते हैं तो स्वयंसेवकों को समरसतार् क व्यवहार्र करनार् होगार् रार्ष्ट्र की सेवार् के लिए हमेशार् तत्पर रहनार् चार्हिए हमार्री हिन्दू संस्कृति के प्रति सम्मार्न रखनार् चार्हिए समार्ज में हो रही कुरीतियों के खिलार्फ आवार्ज उठार्नी चार्हिए

‘हम सब एक हैं’, इस भार्वनार् को सबके अन्दर जगार्नार् चार्हिए स्वयंसेवक सभी के सार्थ ऐसार् व्यवहार्र करेंगें तो धीरे-धीरे समार्ज के अन्य व्यक्ति भी उस से प्रभार्वित होंगे। और एक रार्ष्ट्र की भार्वनार् क जन्म होगार्, जो रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क उद्देश्य है। देश के प्रति अनन्य भक्ति, पूर्वजों के प्रति अगार्ध श्रद्धार् तथार् सम्पूर्ण देश में निवार्स करने वार्ले बन्धु-बार्न्धवों के प्रति एकात्मतार् क बोध करार्ने वार्ले मंत्रों क उच्चार्रण शार्खार् में करार्यार् जार्तार् है, जैसे-

‘‘रत्नार्करार्धौतपदार्ं हिमार्लयकिरीटिनीम्।

ब्रह्मरार्जर्षिरत्नार्ढ्यार्ं वन्दे भार्रतमार्तरम्।।’’

सार्गर जिसके चरण धो रहार् है, हिमार्लय जिसक मुकुट और जो ब्रह्मर्षि तथार् रार्जर्षि रूपी रत्नों से समृद्ध है। ऐसी भार्रत मार्तार् की मैं वन्दनार् करतार् हूँ।

इस प्रकार हम देखते हैं कि रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में रार्ष्ट्र की एकतार् की भार्वनार् के लिए मंत्रों क उच्चरण भी नित्य पार्ठ में करार्यार् जार्तार् है।

रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख सरसंघचार्लक

सरसंघचार्लक रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क सर्वोच्च अधिकारी होतार् है। रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क मागदर्शन व निर्देशन इनके द्वार्रार् ही कियार् जार्तार् है। रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में कार्यकर्तार्ओं से विचार्र-विमर्श करके ही, सर्वसम्मति के आधार्र पर ही सरसंघचार्लक कार्य करतार् है। रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आजतक के प्रमुख सरसंघचार्लकों क व्यक्तित्व क वर्णन इस प्रकार है-

आद्य सरसंघचार्लक

डॉ. केशव बलिरार्म हेडगेवार्र रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थार्पक व रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रथम आद्य सरसंघचार्लक वेदपार्ठी परिवार्र में 1 अप्रैल 1889 में नार्गपुर में हुआ। उस दिन विक्रम संवत् 1946 की वर्ष प्रतिपदार् थी। उनकी मार्तार् क नार्म रेवती बार्ई, पितार् क नार्म बलिरार्म थार्। आनन्द आदीश के शब्दों में:-

‘‘भरपूर मिलार् सार्हस-संबल

नैतिक बल भली प्रकार मिलार्,

संस्कार मिले अतिशय निर्मल

मार्तार् क अतुल दुलार्र मिलार्।’’

कम उम्र में ही केशव जी के मार्तार्-पितार् उन्हें छोड़कर चले गए इतने कम समय में ही उन्हें सार्हसी व संस्कारी बनार् गये थे।

केशव के मन में बार्ल्यकाल से ही देश की स्वतंत्रतार् की आकाँक्षार् इतनी तीव्र हो चुकी थी कि आठ वर्ष की आयु में उन्हें इंग्लैण्ड की महार्रार्नी के रार्ज्यार्रोहण की हीरक जयन्ती पर दी गई मिठार्ई उन्होंने कूड़े में फेंक दी। ‘वन्देमार्तरम’ के नार्रे को सम्मार्न दियार् न कि स्कूल में पढ़नार्। उस स्कूल में इस नार्रे के कारण विद्यार्थ्र्ार्ी को स्कूल से निकाल दियार् थार् परन्तु बार्द में हेडगेवार्र जी ने उनके सार्थ कोई समझौतार् नहीं कियार्। इस प्रकार हम देखते हैं कि किस प्रकार उनके मन में स्वतंत्रतार् को प्रार्प्त करने की आकांक्षार् थी। देश फिर से गुलार्म न हो उन कारणों क पतार् लगार्कर डॉ. हेडगेवार्र जी ने रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थार्पनार् की, 1925-1940 तक क समय उनक थार्। इस दौरार्न 1930-31 तक डॉ. लक्ष्मण वार्मन परार्पजंपे को अल्प सरसंघचार्लक बनार्यार् गयार् थार्। क्योंकि 1930 में जंगल सत्यार्ग्रह में भार्ग लेने के कारण उन्हें जेल जार्नार् पड़ार् थार्।

अकोलार् कारार्गर में उनक संपर्क अन्य देशभक्त नेतार्ओं से हुआ और उसके बार्द शार्खार् रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शार्खएँ विदर्भ से प्रार्रम्भ हुई। इस तरह रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में रहकर उन्होंने अपने जीवन क एक-एक क्षण रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समर्पित कर दियार् थार्, जिससे देश में रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शार्खार्ओं क विस्तार्र होतार् गयार्। 9 जून 1940 को नार्गपुर के रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शिक्षार् वर्ग के दीक्षार्न्त समार्रोह में डॉक्टर जी ने कहार् थार्, ‘आज अपने सम्मुख में हिन्दू रार्ष्ट्र के छोटे स्वरूप को देख रहार् हूँ।’

इस प्रकार से भार्रत, देश को हिन्दू रार्ष्ट्र के जिस रूप में वे देखनार् चार्हते हैं, उसक एक लघुरूप उनके सार्मने ही तैयार्र हो गयार् थार्।

अपने छोटे से जीवन काल में ही वो बहुत बड़े- कार्य कर, हमे छोड़कर 21 जून 1940 को अमरतत्व में विलीन हो गये थे और दिवंगत होने से पूर्व ही अपनार् कार्यभार्र मार्धवरार्व सदार्शिवरार्व गोलवलकर को सौंप गये थे।

द्वितीय सरसंघचार्लक -श्री गुरुजी

श्री गुरुजी क पूरार् नार्म मार्धवरार्व सदार्शिवरार्व गोलवलकर थार्। प्रार्णिशार्स्त्र के अध्यार्पक के रूप कार्य करने के कारण उनको यह उपनार्म मिलार् थार्। आगे चलकर यही नार्म अधिक प्रसिद्ध हो गयार्।

विक्रम संवत् 1962 फार्ल्गुन कृष्ण एकादशी के दिन गुरुजी क जन्म हुआ। ईसार्ई दिनार्ंक के अनुसार्र 19 फरवरी 1906 को। पितार् जी क नार्म सदार्शिव व मार्तार् क नार्म लक्ष्मीबार्ई थार्। गुरुजी की प्रार्थमिक व मार्ध्यमिक शिक्षार् अनेक स्थार्नों से जुड़ी है, कारण पितार् क नौकरी में स्थार्नार्ंतरण थार्। नार्गपुर के हिस्लार्प कॉलेज से उन्होंने इण्टर सार्इन्स की परीक्षार् उत्तीर्ण की। उसके बार्द काशी विश्वविद्यार्लय से प्रार्णिशार्स्त्र में एम.एस.सी. की और बार्द में वही पर प्रार्ध्यार्पक के रूप में नियुक्त हुए वहीं से उनक परिचय रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से हुआ।

श्री गुरुजी, डॉ. हेडगेवार्र से बहुत प्रभार्वित हुए और उनसे घनिष्ठतार् भी बढ़ गई। परन्तु उनक ध्यार्न आध्यार्त्मिक की तरफ अधिक थार्, जिसके कारण वे बंगार्ल के सार्रगार्छी आश्रम में पहुँचे। स्वार्मी विवेकानन्द के गुरु भार्ई स्वार्मी अखण्डार्नन्द इस आश्रम के प्रमुख थे। गुरुजी ने उनसे संन्यार्स की दीक्षार् ली। स्वार्मी अखण्डनार्द ने उन्हें डॉ. हेडगेवार्र के सार्थ मिलकर देश की सेवार् करने को कहार् और उनकी मृत्यु के पश्चार्त् वह नार्गपुर लौट आये। अब गुरुजी क सम्पर्क रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से अधिक हो गयार् थार्। 1938 के नार्गपुर रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शिक्षार् वर्ग के सर्वार्धिकारी नियुक्त हुए 1939 में उन्हें रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सरकार्यवार्ह बनार्यार्। डॉ. हेडगेवार्र की मृत्यु के बार्द, उनके आज्ञार्नुसार्र सरसंघचार्लक बनार्यार् गयार्।

अभी तक सभी सरसंघचार्लकों में से सबसे अधिक समय, 33 वर्ष, श्री गुरुजी ने रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को दिये। रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विस्तार्र में इनक योगदार्न बहुमूल्य है। इन्हेार्ंने अनेक समविचार्री संगठनों की स्थार्पनार् की तार्कि हम समार्ज के अन्य व्यक्तियों से जुड़ सके। रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पहलार् प्रतिबन्ध 1948 में लगार्, उसक सार्मनार् कियार्।

भार्रत-चीन के युद्ध में, कश्मीर की समस्यार् में अपनी अह्म भूमिक निभार्ई। समार्ज में आई अनेक विपदार्ओं क सार्मनार् कियार्। उनके गुरु ने कहार् थार्, ‘‘नर-सेवार्, नार्रार्यण सेवार्’’, जिसके कारण रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में रहकर सदार् समार्ज-सेवार् के कार्यो में वे अग्रणी भूमिक में रहे। कर्क रोग के कारण 5 जून 1973 को उन्होंने इस संसार्र में अन्तिम सार्ंस ली और अपने उत्तरार्धिकारी के रूप में श्री बार्लसार्हब देवरस को मनोनीत कर गये।

तृतीय सरसंघचार्लक – श्री बार्लार्सार्हब देवरस

इनक पूरार् नार्म मधुकर दत्तार्त्रेय देवरस थार्। ‘बार्लार्सार्हब’ उपनार्म से ही उन्हें अधिक लोग जार्नते थे। इनक जन्म विक्रम संवत 1985 मागशीर्ष शुक्ल पंचमी के दिन हुआ। ईसार्ई दिनार्ंक के अनुसार्र- 11 दिसम्बर 1915 को। बार्लार्सार्हब को बचपन में सब ‘बार्ल’ कहकर गोद में उठार्ते थे, जिसके कारण आगे ही नार्म प्रचलित हो गयार्।

रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शार्खार् में प्रथम बार्ल स्वयंसेवकों में इनक नार्म आतार् है। यह 10 वर्ष की आयु में ही स्वयंसेवक बन गये थे। बार्लार्सार्हब प्रथम बार्ल स्वयंसेवकों की टोली के नेतार् थे। उनकी सार्री शिक्षार् भी नार्गपुर में हुई थी। शिक्षार् के सार्थ शार्खार् में जार्नार् उनक नित्य कार्यक्रमों में शार्मिल हो गयार् थार्। बार्लार्सार्हब एक बुद्धिमार्न बार्लक थार्, जिसके कारण उनके पितार् भय्यार् जी उन्हें आई.सी.एस. होकर उच्च शार्सकीय पद क सम्मार्न दिलार्ने चार्हते थे, लेकिन बार्लार्सार्हब को तो रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में जार्नार् थार्, वह देश की सेवार् करनी थी, जिसके कारण पितार् से कई बार्र डार्ंट भी खार्ई, परन्तु मार्ँ पावतीबार्ई सदार् ही उन्हें बचार् लेती थी। देश सेवार् के लिए बार्लार्सार्हब जार्ते हैं, कोई गलत काम करने नहीं जार्ते है। मार्ँ क आशीर्वार्द सदार् उनके सार्थ रहार् और बार्ल व उसक भार्ई भार्ऊ दोनों ने ही रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में रहकर खूब नार्म कमार्यार्, जिसके कारण उत्तर भार्रत में एक बार्र उनके पितार् आये तो उनको बहुत मार्न सम्मार्न हुआ, जिसके कारण भय्यार्जी ने डॉ. हेडगेवार्र क धन्यवार्द कियार् कि उनके बच्चों को ऐसे संस्कार दिये।

बार्लार्सार्हब बचपन से ही रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बन गये थे, जिसके कारण उन्होंने रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थार्पनार् से ही इनकी गतिविधि देख रहे थे। अनेक गतिविधियों में इन्होंने भी भार्ग लियार्। डॉ. हेडगेवार्र ने इन्हें प्रथम बार्र बंगार्ल में प्रार्न्त कार्य के लिए भेजार्। 1939 में रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क प्रचार्रक बनार्यार् गयार्। 1965 में सरकार्यवार्ह और 1973 में श्री गुरुजी के बार्द सरसंघचार्लक बने। 21 वर्षों तक बार्लार्सार्हब रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इस पद पर कार्यरत रहे। बार्लार्सार्हब ने श्री गुरुजी के सार्थ मिलकर अनेक कार्य किये थे। और अपने समय में नये समविचार्री संगठन की रचनार् की, जैसे- सेवार् भार्रती, विश्व हिन्दू परिषद, बार्ल संस्कार केन्द्र, आदि।

बार्लार्सार्हब देवरस जी के समय में सबसे बड़ी विपत्ति आपार्तकालीन समय 1975 की थी, जिसके कारण रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबन्ध लगार् इस समय पर अनेक स्वयंसेवकों को यार्तनार्एँ सहन करनी पड़ी। बिनार् कारण के ‘मीसार्’ कानून के तहत जेल में डार्ल दिये गये। इन सबके खिलार्फ व जनतंत्र को दोबार्रार् लार्ने के लिए अनेक आन्दोलन करके इसे सफल बनार्यार्, जो बार्लार्सार्हब जी की देखरेख में हुए इस रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विस्तार्र में इनक अह्म योगदार्न रहार् है।

सन् 1992 से बार्लार्सार्हब क स्वार्स्थ्य बिगड़तार् गयार्, जिसके चलते उन्होंने स्वयं को निवृत्त कर 1994 में प्रो. रार्जेन्द्र सिंह (रज्जू भैयार्) को अपनार् उत्तरार्धिकारी अर्थार्त् सरसंघचार्लक नियुक्त कियार्। ‘मैं कार्य नहीं कर सकतार्’, यह देखते ही दार्यित्व से हटने की उत्तम पद्धति बार्लार्सार्हब ने आरम्भ की। 17 जून, 1996 के दिन पूणे के ‘रूबी शल्य क्लीनिक’ चिकित्सार्लय में उनक निधन हुआ।

चतुर्थ सर संघचार्लक- प्रो. रार्जेन्द्र सिंह

प्रो. रार्जेन्द्र सिंह, जिसे सार्रे लोग ‘रज्जू भैयार्’ के नार्म से जार्नते हैं। 11 माच 1994 में चतुर्थ सरसंघचार्लक बने। रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहार्स में यह पहली घटनार् थी कि सरसंघचार्लक के जीवित रहते उनके उत्तरार्धिकारी की घोषणार् की गई।

प्रो. रार्जेन्द्र सिंह क जन्म 29 जनवरी 1922 में शार्हजहार्ँपुर, उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ अभियन्तार् के घर में हुआ। उनके पितार् जी श्री कुंवर बलवीर सिंह सिंचार्ई विभार्ग में अभियन्तार् थें। उनकी मार्तार् जी क नार्म ज्वार्लार् देवी थार्, जिन्हें वे ‘‘जियार्जी’’ कहकर पुकारते थे। प्रार्थमिक शिक्षार् उनकी नैनीतार्ल में हुई थी। बार्द की शिक्षार् प्रयार्ग विश्वविद्यार्लय में व एम.एस.सी. भौतिक शार्स्त्र में इलार्हार्बार्द विश्वविद्यार्लय से की। यहार्ँ पर ही 1942 में रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रति उनक प्रथम आकर्षण हुआ थार्। एम.एस.सी. करने के बार्द वही पर इनको प्रार्ध्यार्पक नियुक्त कर दियार् गयार्।

1966 में रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की आवश्यकतार् को देखते हुए, इन्होंने स्वेच्छार् से इस पद से त्यार्गपत्र दे दियार् और वे रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचार्रक बन गये। 1978 में वे रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवार्ह बने। स्वार्स्थ्य ठीक न होने के कारण यह पद छोड़ार् व 1987 में हो. वे. शेषार्द्रि के सह-सरकार्यवार्ह बने। 11 माच 1994 में बार्लार्सार्हब देवरस जी ने इन्हें रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क सरसंघचार्लक बनार्यार्।

प्रो. रार्जेन्द्र सिंह पहले सरसंघचार्लक हैं, जिन्होंने विदेश में जार्कर हिन्दू स्वयंसेवक संघ के कार्य क निरीक्षण कियार्। इस हेतु इंग्लैण्ड, मॉरिशस, केनियार् आदि देशों में उनक प्रवार्स हुआ। रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क मागदर्शन व समय-समय पर करते रहे। उनको इस बार्त क बड़ार् दु:ख थार् कि रार्मप्रसार्द ‘बिस्मिल’ के नार्म पर भार्रत में कोई स्मार्रक नहीं है। 1999 में पूणे में में अचार्नक गिर जार्ने से उनकी कमर की हड्डियार्ं टूट गई, जिसके कारण वह अस्वस्थ हो गये और 10 माच 2000 को श्री सुदर्शन जी को सरसंघचार्लक क भार्र सौंप दियार्। 6 वर्ष के कार्यकाल में उनक योगदार्न अह्म है। 14 जुलार्ई, 2003 को रज्जू भैयार् जी क पूणे में स्वर्गवार्स हो गयार्।

पंचम सरसंघचार्लक- श्री कुप. सी. सुदर्शन

इनक पूरार् नार्म श्री कृपार्हल्ली सीतार्रमैयार् सुदर्शन थार्। 18 जून 1931 में रार्यपुर, छत्तीसगढ़ में इनक जन्म हुआ। प्रार्रम्भिक शिक्षार् चन्द्रपुर, रार्यपुर में ही हुई थी। 1954 में जबलपुर, सार्गर विश्वविद्यार्लय से बी.ई. (ऑनर्स) दूरसंचार्र विषय में उपार्धि प्रार्प्त की। वहीं से वे रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रचार्रक भी बन निकले। 1964 में उन्हें मध्य भार्रत प्रार्न्त-प्रचार्रक क दार्यित्व मिलार्।

1969 से 1971 तक अखिल भार्रतीय शार्रीरिक शिक्षण प्रमुख क दार्यित्व तथार् 1979 में अखिल भार्रतीय बौद्धिक शिक्षण प्रमुख क दार्यित्व मिलार्। 1990 में सह सरकार्यवार्ह क दार्यित्व सौंपार् गयार्।

अन्ततोगत्वार् स्वार्स्थ्य के कारणों से ही नार्गपुर में माच, 2009 में सम्पन्न हुई रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भार्रतीय प्रतिनिधि सभार् में श्री सुदर्शन जी ने रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गौरवशार्ली परम्परार् क उल्लेख करते हुए सरसंघचार्लक की नियुक्ति परम्परार्, उसमें हुए परिवर्तनों क संदर्भ देते हुए नवीन सरसंघचार्लक के रूप में श्री मोहनरार्व भार्गवत जी घोषणार् कर दी। और स्व. बबुआ जी क कथन उद्धृत कियार्, ‘इन्हें देखते हुए डॉक्टर सार्हब की यार्द आती है।’1 श्री सुदर्शन जी ने भी रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माग दर्शन में अपनी अह्म भूमिक निभार्ई है। सेवार्निवृत्त होने के बार्द भी देशभर में प्रचार्र करते रहे थे। 15 सितम्बर 2012 को अपने जन्म के स्थार्न रार्यपुर में ही अकस्मार्त् उनक निधन हो गयार्।

षष्टम् सरसंघचार्लक- श्री मोहनरार्व भार्गवत

इनक जन्म 11 सितम्बर 1950 को चन्द्रपुर, महार्रार्ष्ट्र में हुआ थार्। रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्कार उन्हें अपने परिवार्र से ही मिले थे। उनके पितार् नार्म मधुकररार्व भार्गवत थार् जो कि गुजरार्त में प्रार्न्त प्रचार्रक के रूप में कार्यरत थे। मोहनरार्व भार्गवत जी ने चन्द्रपुर के लोकमार्न्य तिलक विद्यार्लय से अपनी स्कूली शिक्षार् पूर्ण की। उन्होंने पंजार्बरार्व कृषि विद्यार्पीठ, अकोलार् से पशु चिकित्सार् विज्ञार्न में स्नार्तक उपार्धि प्रार्प्त की। पशु चिकित्सार् विज्ञार्न में स्नार्त्कोत्तर अध्ययन अधूरार् छोड़ वे आपार्तकाल से रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचार्रक बन गए 1977 में अकोलार् में प्रचार्रक बने।

1991 में वे रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों के शार्रीरिक प्रशिक्षण कार्यक्रम के प्रमुख बने और 1999 तक इस कार्य को संभार्लार्। सन् 2000 में वे सरकार्यवार्ह के पद पर निर्वार्चित हुए और सन् 2009 से रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के छठे सरसंघचार्लक के रूप में नियुक्त हुए वे अविवार्हित हैं। आज भी वही कार्यरत हैं। भार्गवत जी ने रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क मागदर्शन करते हुए 9 वर्ष हो गए हैं और हम देख भी रहे हैं कि आज अधिकतर व्यक्ति रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बार्रे में जार्नते हैं। वह रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिन्दुत्व की दृष्टि को समझ भी रहे हैं। भार्गवत जी ने रार्ष्ट्र निर्मार्ण में युवार्ओं की भूमिका, समरसतार्, जार्तिवार्द, धर्म, अस्पृश्यतार्, देशभक्ति ऐसे अनेक विषय हैं, जिन्हें समार्ज में स्पष्ट करके, रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक अच्छी छवि प्रस्तुत की है। हम आशार् करते हैं, हिन्दू संस्कृति के प्रति वो इस तरह कार्य करते रहे हैं।

संदर्भ –

  1. अमर उजार्लार्, 11 माच 2018, पृ.-8 2 विषय बिन्दु, शरद प्रकाशन, आगरार्, पृ.-15
  2. सी.पी भिशीकर, केशव: रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ निर्मार्तार्, पृ.-36
  3. श्री गुरुजी, दृष्टि और दर्शन, सुरुचि प्रकाशन, पृ.-268
  4. रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघगार्थार्, सुरुचि प्रकाशन, पृ.-10
  5. अमर उजार्लार्, 11 माच, 2015, पृ.-8
  6. अमर उजार्लार्, दिसम्बर 2015, पृ.-1
  7. हरिश्चन्द्र बथ्र्वार्ल, रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक परिचय, पृ 11-12
  8. विजय कुमार्र गुप्तार्, रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्राथनार्, पृ 13-14
  9. दार् ट्रिब्यून, 14 माच, 2016, पृ.-7
  10. दार् ट्रिब्यून, 14 माच, 2016, पृ.-7
  11. रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गार्थार्, सुरुचि प्रकाशन, पृ.-27
  12. मार्.स. गोलवलकर, गुरु दक्षिणार्, पृ.-3
  13. मार्.स. गोलवलकर, विचार्र नवनीत, पृ.-173
  14. शार्खार् सुरभि, सुरुचि प्रकाशन, पृ.-12
  15. हरिश्चन्द्र बथ्र्वार्ल, रार्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक परिचय, पृ.-27

I’m a Social worker (Master of Social Work, Passout 2014 from MGCGVV University ) passionate blogger from Chitrakoot, India.

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