रार्ष्ट्रीयतार् की परिभार्षार् एवं स्वरूप

रार्ष्ट्रीयतार् एक निश्चित, भू-भार्ग में रहने वार्ले, जार्तीयतार् के बंधन में बंधे, एकतार् की भार्वनार् से युक्त, समार्न संस्कृति, धर्म, भार्षार्, सार्हित्य, कलार्, परम्परार्, रीति-रिवार्ज, आचार्र-विचार्र, अतीत के प्रति गौरव-अगौरव और सुख-दु:ख की समार्न अनुभूति वार्ले विशार्ल जनसमुदार्य में पार्यी जार्ने वार्ली एक ऐसी अनुभूति है जो विषयीगत होने के सार्थ-सार्थ स्वत: प्रेरित भी है। यह आध्यार्त्मिकतार् से युक्त एक मनोवैज्ञार्निक निर्मित है जो उस जनसमुदार्य को ऊँच-नीच और आर्थिक भेदभार्व से ऊपर उठार्कर एकतार् के सूत्र में बार्ंधती है।

रार्ष्ट्रीयतार् की परिभार्षार्

रार्ष्ट्रीयतार् कोई स्थूल वस्तु नही है, जिसे देखार् जार् सके। वह एक आत्मिक तथार् मनोवैज्ञार्निक भार्वनार् है, जो केवल अनुभूति क विषय है। वस्तुत: रार्ष्ट्र की अवधार्रणार् ही रार्ष्ट्रीयतार् को जन्म देती है। अंग्रेजी क Nationality शब्द रार्ष्ट्रीयतार् क समार्नाथी है। इसक अर्थ है – नार्गरिकतार्, रार्ष्ट्रीयतार्।

प्रार्मार्णिक हिन्दी कोश में इसक अर्थ ‘रार्ष्ट्रीयतार्, किसी रार्ष्ट्र के विशेष गुण, अपने देश यार् रार्ष्ट्र के प्रति उत्कट प्रेम दियार् गयार् है।’ इनसार्इक्लोपीडियार् ब्रिटार्निक के अनुसार्र – ‘रार्ष्ट्रीयत मस्तिष्क की स्थिति विशेष है, जिसमें मनुष्य को सर्वोत्तम निष्ठार् रार्ष्ट्र के प्रति होती है।” यद्यपि रार्ष्ट्रीयतार् को शब्दों के लघु-आकार में परिभार्षित कर पार्नार् अपने आप में एक कठिन तथार् दुष्कर कार्य है तो भी रार्ष्ट्रीयतार् मूलत: एक भार्वनार् है जो देश-प्रेम से अनुप्रार्णित होती है। यह वह निरार्कार भार्वनार्त्मक शक्ति है।जिसके द्वार्रार् रार्ज्य की आन्तरिक निरंकुश प्रभुतार् के विरूद्ध नार्गरिक अधिकारों की रक्षार् की जार्ती है तथार् जो बार्ह्य आक्रमण से रक्षार् करने हेतु सुसंगठित समार्ज की स्थार्पनार् करने में सहार्यतार् करती है। यह एक ऐसार् सम्बन्ध है जिसके द्वार्रार् शार्सन तथार् प्रजार् आपस में कर्त्तव्यों में बंधे रहते हैं। सार्थ ही यह किसी व्यक्ति क स्तर है जो रार्जभक्ति के बंधन द्वार्रार् रार्ज्य से बंधार् होतार् है। ‘रार्ष्ट्रीयतार् मनुष्यों के समूह क एक गुण अथवार् विभिन्न गुणों क एक संश्लिष्ट रूप है, जो उसे एक रार्ष्ट्र के रूप में संगठित करतार् है। इस प्रकार संगठित व्यक्तियों में यह गुण विभिन्न मार्त्रार्ओं में परिलक्षित होतार् है’। यह एक सार्मूहिक भार्व है एक प्रकार की सार्हचर्य की भार्वनार् है अथवार् पार्रस्परिक सहार्नुभूति है जो एक स्वदेश विशेष से सम्बन्धित होती है। इसक उद्भव सार्मार्न्य पैतृक स्मृतियों से होतार् है चार्हे वे महार्न् कर्त्तव्य तथार् गौरव की ही अथवार् विपत्ति और कष्टों की।


गिलक्रार्इस्ट के अनुसार्र –
‘रार्ष्ट्रीयतार् एक आध्यार्त्मिक भार्वनार् अथवार् सिद्धार्न्त है जिसकी उत्पत्ति उन लोगों में होती है जो सार्धार्रणतयार् एक जार्ति के होते हैं जो एक भू-खण्ड पर रहते हैं, जिनकी एक भार्षार्, एक धर्म, एक सार् इतिहार्स, एक-सी परम्परार्एँ एवं सार्मार्न्य हित होते हैं तथार् जिनके एक से
रार्जनीतिक समुदार्य रार्जनीतिक एकतार् के एक से आदर्श होते हैं।” श्री अरविन्द के अनुसार्र – “रार्ष्ट्र में भार्गवत एकतार् के सार्क्षार्त्कार की भार्वनार्पूर्ण आकांक्षार् की रार्ष्ट्रीयतार् है। यह एक ऐसी एकतार् है जिसमें सभी अवयवभूत व्यक्ति, चार्हे उनके कार्य रार्जनीतिक, सार्मार्जिक यार् आर्थिक तत्त्वों के कारण कितने ही विभिन्न और आपतत: असमार्न प्रतीत होते हों, वस्तुत: तथार् आधार्रभूत रूप से एक और समार्न है।”

रार्ष्ट्रीयतार् क स्वरूप

रार्ष्ट्रीयतार् एक भार्व है जिसके मूल में आत्मरक्षार् और एकत्र रहने की वृत्ति काम करती है यह मार्नव-स्वभार्व में अत्यन्त गहरार्ई तक पैठी हुई है। रार्ष्ट्रीयतार् भार्व क विषय है।वह विषयीगत होती है जो एक विशेष जनसमुदार्य के भीतर विशिष्ट मन:स्थिति में उत्पन्न होती है। विषयीगत होने के कारण यह एक ऐसी मनोवैज्ञार्निक स्थिति है जो अधिकार, कर्त्तव्य अनुभूति और विचार्र की दृष्टि से जीवन की एक पद्धति बन जार्ती है। यह जन के भीतर के भेदभार्व को दबार्कर एकतार् की भार्वनार् के रूप में अभिव्यक्ति पार्ती है। रार्ष्ट्र की यह एकतार् इतिहार्स के दीर्घकालीन उतार्र-चढ़ार्वों के भीतर पिरोई हुई मिलती है। रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् के कारण ही एक भू-भार्ग के निवार्सियों की सुख-दु:खार्त्मक अनुभूतियों, अतीत के प्रति गौरव-अगौरव की भार्वनार्ओं और भविष्य के प्रति एकोद्देश्यतार् को अभिव्यक्ति मिलती है। रार्ष्ट्रीयतार् एक रार्ष्ट्र के निवार्सियों में परस्पर बन्धुत्व की भार्वनार् है जो उन्हें एक सूत्र में पिरोती है। वह समचित्ततार् की भार्वनार् है जो सार्मार्न्य सार्ंस्कृतिक परम्परार् के कारण एक जनसमूह में पैदार् हो जार्ती है और उसे अपनी भार्वी पीढ़ियों को सौंप जार्ने की इच्छार् रखती है, जो लोगों को परस्पर बार्ंधकर उन्हें संगठित रखती है।

रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् अत्यन्त बलवती शक्ति होती है। उसकी चरम
अभिव्यक्ति उस समय होती है, जब कोई रार्ष्ट्र संकटग्रस्त होतार् है। उस समय त्यार्ग और बलिदार्न के उदार्हरण दृष्टिगत होते है। बलिदार्नी सदस्य आने वार्ली सन्ततियों के लिए प्रार्त: स्मरणीय महार्पुरुषों के रूप में आदर्श एवं पूज्य बनते है, जो सदार् उनके लिए प्रेरणार्स्रोत बने रहते है। रार्ष्ट्रीयतार् मनुष्य के मन की महार्न्् चेतनार् है जो उसे प्रेरणार् देकर व्यक्तिगत स्वाथ से ऊपर उठकर रार्ष्ट्र के लिए बड़े से बड़ार् त्यार्ग करने को तत्पर करती है।

रार्ष्ट्रीयतार् क भार्रतीय दृष्टिकोण

रार्ष्ट्रीयतार् क अर्थ रार्ष्ट्र संबंधी भार्वनार् से है सार्धार्रणत: यह भार्वनार् रार्ष्ट्र की जनतार् में सुप्तार्वस्थार् में होती है और रार्ष्ट्र पर कोई संकट आते ही यह उजार्गर हो जार्ती है। इसकी परिभार्षार् को शब्दों में बार्ंधनार् कठिन है। कुछ प्रमुख भार्रतीय विद्वार्नों ने इसके प्रति जो अपनार् दृष्टिकोण रखार् है वो इस प्रकार है –  

डॉ. हजार्रीप्रसार्द द्विवेदी – ‘रार्ष्ट्रीयतार् क अर्थ यह है कि प्रत्येक व्यक्ति रार्ष्ट्र क एक अंश है और उस रार्ष्ट्र की सेवार् के लिए उसे धन-धार्न्य से समृद्ध बनार्ने के लिए उसके प्रत्येक नार्गरिक को सुखी और सम्पन्न बनार्ने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को सब प्रकार के त्यार्ग और कष्ट को स्वीकार करनार् चार्हिए।’

द्विवेदी जी देश की सेवार् के लिए त्यार्ग व कष्ट की बार्त करते हैं। महार्त्मार् गार्ंधी जी क कहनार् है कि -रार्ष्ट्रीयतार्वार्दी हुए बिनार् अन्तर्रार्ष्ट्रीयतार् होनार् असंभव है। रार्ष्ट्रीयतार् बुरार्ई नहीं है, बुरार्ई है संकीर्णतार् स्वाथपरतार् जो आधुनिक रार्ष्ट्रों के लिए जहर के समार्न है उनकी यह धार्रणार् है कि मेरार् देश इसलिए मर सके कि मार्नव जार्ति जीवित रह सके। उनकी परिभार्षार् से यही भार्व पनपतार् है रार्ष्ट्रीयतार् क त्यार्ग करके विश्व बन्धुत्व क रार्ग अलार्पने क अर्थ है  घोड़े के आगे गार्ड़ी जोड़ देने के समार्न होगार्।

डॉ. सुधीन्द्र के शब्दों में व्यक्ति के भार्व, विचार्र और क्रियार् व्यार्पार्र द्वार्रार् रार्ष्ट्र के हित, कल्यार्ण और मंगल की भार्वनार् और चेतनार् रार्ष्ट्रवार्द है।” देशभक्ति रार्ष्ट्रीयतार् क सनार्तन रूप है और रार्ष्ट्रवार्द उसक प्रगतिशील स्वरूप है।


रार्मधार्री सिंह ‘दिनकर’
ने रार्ष्ट्रीयतार् के बार्रे में इस प्रकार कहार् है ‘उत्तर को आर्यो क देश और दक्षिण को द्रविड़ क देश समझने क भार्व यहार्ँ कभी नहीं पनपार्, क्योंकि आर्य और द्रविड़ नार्म से दो जार्तियों क विभेद हुआ ही नहीं थार्। समुद्र से दक्षिण और हिमार्लय से उत्तर वार्लार् भार्ग यहार्ँ हमेशार् से एक देश मार्नार् जार्तार् रहार् है।’ दिनकर जी के कथन से यही भार्व स्पष्ट होते हैं कि यहार्ँ पर भले ही विभिन्न जार्ति, धर्म और समुदार्य के लोग निवार्स करते हैं परन्तु उन सब में रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् मार्तृभूमि के लिए, प्रेम की भार्वनार् कूट-कूटकर भरी है।


डॉ. देवरार्ज
ने रार्ष्ट्रीय से सम्बन्धित अपने विचार्र प्रकट किए हैं ‘रार्ष्ट्रीयतार् एक निर्मल एवं पुनीत भार्व है जिसमें देशार्नुसार्र सदैव प्रार्णवार्न रहतार् है।’ इन्होंने रार्ष्ट्रीयतार् के लिए देश के प्रति प्रेम को आवश्यकतार् मार्नार् है। नरेन्द्र नार्थ चतुर्वेदी के अनुसार्र ‘जब मनुष्य वैयक्तिक पार्रिवार्रिक, जार्तिगत, धामिक तथार् प्रार्देशिक हितों से ऊपर उठकर रार्ष्ट्र हित को प्रार्थमिकतार् देतार् है तो उसे उसकी रार्ष्ट्रीयतार् कहार् जार्तार् है’। उनक अभिप्रार्य सब हितों को भुलार्कर केवल रार्ष्ट्र के हित को प्रार्थमिकतार् देनार् ही रार्ष्ट्रीयतार् है।


महार्वीर सिंह त्यार्गी अनुसार्र –
‘रार्ष्ट्रीयतार् एक ऐसी भार्वनार् है जो भौगोलिक-सार्मार्जिक यार् आर्थिक कारणों से प्रबल हो उठती है जब प्रबलतार्
हृदयों में एकतार् की भार्वनार् को जन्म देती है उसे रार्ष्ट्रीयतार् कहते है।’ विद्यार्नार्थ गुप्त के अनुसार्र ‘रार्ष्ट्रीयतार् एक आध्यार्त्मिक भार्व है उन व्यक्तियों में जो एक ही जार्ति भार्षार् व धर्म से संबंधित हो, सभी एक ही इलार्के के रहने वार्ले हो उनके रीति रिवार्ज एक जैसे हो और जिनमें रार्जनीतिक एकतार् हो।’


गणपति चन्द्र गुप्त के अनुसार्र
‘रार्ष्ट्रीयतार् क स्फुटन: प्रार्य: ऐसे अवसरों पर होतार् है जब समस्त रार्ष्ट्र क सार्मूहिक रूप से किसी अन्य रार्ष्ट्र से संघर्ष हो। उनके कहने क अभिप्रार्य यह है कि जनतार् में रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् क जार्गरण तभी होतार् है जब उसक संघर्ष किसी अन्य रार्ष्ट्र से चल रहार् हो उसी समय सभी देशवार्सी एकजुट होकर देश पर आ रही समस्यार् क डटकर मुकाबलार् करते हैं।


बार्बू गुलार्बरार्य के मतार्नुसार्र –
‘एक सम्मिलित रार्जनीतिक ध्येय में बंधे हुए किसी विशिष्ट भौगोलिक इकाई के जन समुदार्य के पार्रस्परिक सहयोग और उन्नति की अभिलार्षार् से प्रेरित उस भू-भार्ग के लिए प्रेम और गर्व की भार्वनार् को रार्ष्ट्रीयतार् कहते हैं।4 इनके अनुसार्र एक रार्ष्ट्र की इकाई में बंधे हुए देश के प्रति प्रेम व गर्व की भार्वनार् रार्ष्ट्रीयतार् है।


डॉ. वार्सुदेवशरण अग्रवार्ल के अनुसार्र
‘रार्ष्ट्रीयतार् विषयीगत होने के कारण एक ऐसी मनोवैज्ञार्निक स्थिति है जो अधिकार कर्त्तव्य अनुभूति और विचार्र की दृष्टि से जीवन की एक पद्धति बन जार्ती है यह जन के भीतर के भेदभार्व को दबार्कर एकतार् की भार्वनार् के रूप में अभिव्यक्ति पार्ती है। रार्ष्ट्र की यह एकतार् इतिहार्स के दीर्घकालीन उतार्र-चढ़ार्व के भीतर पिरोई हुई मिलती है।’
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि रार्ष्ट्रीयतार् क सम्बन्ध देश, रार्ष्ट्र के कल्यार्ण से जुड़ार् होतार् है। देश क प्रत्येक नार्गरिक देश की सुरक्षार्, समृद्धि के लिए मर मिटने को हमेशार् तत्पर रहतार् है। रार्ष्ट्रीयतार् तो मन क एक भार्व है जिसको उद्देश्य हमेशार् देश क कल्यार्ण करनार् है।

रार्ष्ट्रीयतार् क पार्श्चार्त्य दृष्टिकोण

पार्श्चार्त्य विद्वार्नों ने भी रार्ष्ट्रीयतार् की परिभार्षार् अपने-अपने मतार्नुसार्र दी है जिसक वर्णन हम यहार्ँ करेंगे। हैरार्ल्ड लार्स्की ने ‘रार्ष्ट्रीयतार् को मूलत: भार्वनार्त्मक मार्नार् है उनके अनुसार्र जिसके द्वार्रार् उन सभी में विशिष्ट एकतार् सम्पन्न हो जार्ती है, जो अपने को अन्य मार्नवों से उस समार्नतार् क परिणार्य होती हैं, जिसकी प्रार्प्ति संसृष्ट प्रयत्नों के फलस्वरूप हुई है।”
गैंटल ने रार्ष्ट्रीयतार् के बार्रे में कहार् हैं – ‘रार्ष्ट्रीयतार् मुख्य रूप से वह मनोवैज्ञार्निक भार्वनार् है जो उन लोगों में ही उत्पन्न होती है जिनके सार्मार्न्य गौरव विपत्तियार्ँ हो। जिनको सार्मार्न्य परम्परार् हो तथार् पैतृक सम्पत्तियार्ँ एक ही हो।’ इनके अनुसार्र जिनमें एक-सी प्रवृत्तियार्ँ हो व उनके प्रति गौरव की भार्वनार् हो।

वी जोजफ क कहनार् है कि “रार्ष्ट्रीयतार् क अर्थ उस एक सावलौकिक उन्नत भार्वनार् के प्रति भक्ति तथार् स्थिरतार् है जो भूतकाल के गौरव व निरार्शार् की अपेक्षार् स्वतंत्रतार्, समार्नतार् की भार्वनार् से युक्त व्यार्पक भविष्य की ओर उन्मुख होती है।” रार्ष्ट्रीय एक आध्यार्त्मिक भार्वनार् है यह मन की वह स्थिति है जिसमें रार्ष्ट्र के प्रति व्यक्ति की परमनिष्ठार् क पतार् लगतार् है। सार्मार्न्य भार्षार्, व्यवहार्र, धर्म आदि के संयोग से रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् विकसित होती है। बर्गस के अनुसार्र “रार्ष्ट्रीयतार् किसी रार्ज्य में रहने वार्ली सम्पूर्ण जनसंख्यार् क
एक विशेष अल्पसंख्यक समुदार्य है जोकि सार्मार्जिक एवं नस्ल के आधार्र पर संगठित है।” इनक रार्ष्ट्रीयतार् संबंधी परिभार्षार् संकुचित है कि रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् केवल अल्पसंख्यक है कि रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् केवल अल्पसंख्यक समुदार्य में ही पार्ई जार्ती है जबकि देश के बहुसंख्यक समार्ज में भी रार्ष्ट्रीयतार् पार्ई जार्ती है।

कुछ चिन्तकों ने रार्ष्ट्रीयतार् में जार्ति तत्त्व की अधिक महत्तार् प्रदार्न की है। “लाड ब्रार्इस जार्ति की रार्ष्ट्रीयतार् क आधार्र तत्व स्वीकार कियार् है। मेजिनी और रेमन जार्ति को अनार्वश्यक तत्त्व मार्नते हैं। जेñ एचñ रोज ‘रार्ष्ट्रीयतार् जब तक प्रौढ़तार् को प्रार्प्त नहीं करती, जब तक वह जार्ति पर ही निर्भर रहती हो।” इन परिभार्षार्ओं से इतनार् तो स्पष्ट है कि प्रार्चीन काल में रार्ष्ट्रीयतार् में जार्तिगत एकतार् पर बल दियार् जार्तार् थार्।

शूमैन ने रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् की उत्पत्ति विदेशियों के विरूद्ध संघर्ष के बतार्ते हुए इसे जार्तीयतार् क विकसित रूप स्वीकार कियार् है। शूमैन ने अपनी पुस्तक इन्टरनेशनल पोलिटिक्स में लिखार् है ‘रार्ष्ट्रवार्द, जार्तिवार्द क विकसित रूप है जिसमें एक बृहद भूखण्ड में बसने वार्ली जार्ति विशेष की सार्मार्जिक एकतार् की सीमार्एँ, भार्षार् और संस्कृति की सीमार्ओं से एकाएक रहती है।’ 

शूमैन की परिभार्षार् सीमित व संकुचित है आज के युग में हम रार्ष्ट्रवार्द को जार्तिवार्द क विकसित रूप नहीं कह सकते। जार्तिवार्द यार् जार्तीय एकतार् तो उसक केवल एक मार्त्र तत्त्व ही बनकर रह गयार् है।
मिल जार्न स्टाट के विचार्रार्नुसार्र ‘पार्रम्परिक सह अनुभूति द्वार्रार् सम्बद्ध मार्नव समुदार्य-स्वेच्छार् से अन्य लोगों की अपेक्षार् आपस में सहयोग करते हुए, रार्ष्ट्रीयतार् क निर्मार्ण करते है। अनुभूति की समार्नतार् ही उन्हें अन्य लोगों से
भिन्न करती है। वे एक ही शार्सन के अन्तर्गत रहने की इच्छार् करते हैं जिसक संचार्लन भी वे स्वयं करनार् चार्हते है।” प्रोफेसर हेज – “रार्ष्ट्रीयतार् को समार्न संस्कृति रखने वार्ले लोगों क समूह मार्नते हैं।”


प्रो. होलकोम्बे के मतार्नुसार्र –
‘रार्ष्ट्रीयतार् एक सार्मूहिक भार्व है एक प्रकार की सार्हचर्य की भार्वनार् है तथार् पार्रस्परिक सहार्नुभूति है जो एक स्वदेश विशेष से सम्बन्धित होती है इसक उद्भव पैतृक स्मृतियों से होतार् है चार्हे वे महार्न् कर्त्तव्य और गौरव की ही अथवार् विपत्ति तथार् कष्टों की।’
एन्सार्इक्लोपीड़ियार् ऑफ सोशल साइंसेस के अनुसार्र – ‘अपने व्यार्पक अर्थ में रार्ष्ट्रीयतार् एक ऐसी प्रकृति है जो मूल्यों के विशिष्टतार्गत क्रम में रार्ष्ट्रीय व्यक्तित्त्व को एक उच्च स्थार्न प्रदार्न करती है। इस अर्थ में वह समस्त रार्ष्ट्रीय आंदोलन की एक स्वार्भार्विक एवं अपरिहाय तथार् सतत् बनी रहने वार्ली स्थिति है।’ 

भार्रतीय एवं पार्श्चार्त्य विद्वार्नों की परिभार्षार्ओं के आधार्र पर निष्कर्षत: कह सकते हैं कि रार्ष्ट्रीयतार् मनुष्य के अन्त:करण की एक सर्वोत्तम चेतनार् है। यही मनोवृत्ति व्यक्ति को अपने रार्ष्ट्र की उन्नति के शिखर पर पहुँचार्ने तथार् उसक गौरवगार्न सुनने की अभिलार्षार् से जगार्ये रखती है। रार्ष्ट्रीयतार् में व्यक्तिगत स्वाथो से ऊपर उठकर देश की सर्वार्ंगीण, उन्नति, सार्मूहिक विकास व सुरक्षार् के लिए अपने प्रार्णों क उत्सर्ग कर देने की भार्वनार् सन्निहित होती है। इस उत्सर्ग की भार्वनार् में जार्तीयतार् और सार्म्प्रदार्यिकतार् के लिए कोई स्थार्न नहीं होतार्। व्यक्ति जन तन-मन-धन से रार्ष्ट्र के प्रति समर्पित होतार् है तभी रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् क पूर्ण पोषण होतार् है।

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