रार्ष्ट्रपति क निर्वार्चन, कार्यकाल एवं शक्तियार्ं

भार्रत क रार्ष्ट्रपति 

संविधार्न के अनुच्छेद 52 के अनुसार्र भार्रत क एक रार्ष्ट्रपति होगार्। संघ की कार्यपार्लिक शक्ति इसी में निहित की गर्इ है। अनुच्छेद 53 में उपबन्ध कियार् गयार् है कि-

  1. संघ की कार्यपार्लिक शक्ति रार्ष्ट्रपति में निहित होगी और वह इसक प्रयोग संविधार्न के उपबन्धों के अनुसार्र स्वयं यार् अपने अधीनस्थ अधिकारियों के द्वार्रार् करेगार्।
  2. संघ के रक्षार् बलों क सर्वोच्च समार्देश रार्ष्ट्रपति में निहित होगार् और उसक प्रयोग विधि द्वार्रार् विनियमित होगार्। 
  3. इस अनुच्छेद की कोर्इ बार्त-(क) किसी विद्यमार्न विधि द्वार्रार् किसी रार्ज्य की सरकार यार् किसी अन्य प्रार्धिकारी क प्रदार्न किए गए कृत्य रार्ष्ट्रपति को अन्तरित करने वार्ली नहीं समझी जार्एगी; यार् (ख) रार्ष्ट्रपति से भिन्न अन्य प्रार्धिकारियों को विधि द्वार्रार् कृत्य प्रदार्न करने से संसद को निवार्रित नहीं करेगी। 

इस प्रकार रार्ष्ट्रपति मुख्य कार्यपार्लक है। फिर भी उन कृत्यों को जो पहले से ही अन्य प्रार्धिकारियों को दिए गये हैं और संसद की अन्य प्रार्धिकारियों को किन्हीं कृत्यों को सौंपने की क्षमतार् को अछूतार् छोड़ दियार् गयार् है।

संघीय सरकार के समस्त कार्य रार्ष्ट्रपति के नार्म से ही सम्पार्दित होते है। वार्स्तव में वह देश के शार्सन क संचार्लन नहीं करतार् वरण उसे जो शक्रियार्ं पार््रप्त हैं व्यवहार्र में उसक प्रयोग संघीय मंत्री परिषद ही करती है। वार्स्तव में वह मंत्री परिषद के परार्मर्श को मार्नने के लिए बार्ध्य है।

रार्ष्ट्रपति निर्वार्चित होने के लिये योग्यतार्एं 

अनुच्छेद ‘58 के अनुसार्र रार्ष्ट्रपति निर्वार्चित होने के लिए अर्हतार्एं इस प्रकार हैं-(1) कोर्इ व्यक्ति रार्ष्ट्रपति निर्वार्चित होने क पार्त्र तभी होगार् जब वह-

  1. वह भार्रत क नार्गरिक हो। 
  2. कम से कम 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुक हो । 
  3. वह लोक सभार् क सदस्य बनने की योग्यतार् रखतार् हो। 
  4. वह किसी सरकारी लार्भकारी पद पर कार्यरत न हो। 
  5. रार्ष्ट्रपति के पद पर आसीन व्यार्प्ति संसद क सदस्य यार् रार्ज्यों में विधार्यक नहीं हो सकतार् । 

परन्तु अनुच्छेद 58(2) के अनुसार्र कोर्इ व्यक्ति, जो भार्रत सरकार के यार् किसी रार्ज्य की सरकार के अधीन अथवार् उक्त सरकारों में से किसी के नियन्त्रण में किसी स्थार्नीय यार् अन्य प्रार्धिकारी के अधीन कोर्इ लार्भ क पद धार्रण करतार् है, रार्ष्ट्रपति निर्वार्चित होने क पार्त्र नहीं होगार्। इसके स्पष्टीकरण में यह कहार् गयार् है कि इस अनुच्छेद के प्रयोजनों के लिए, कोर्इ व्यक्ति केवल इस कारण कोर्इ लार्भ क पद धार्रण करने वार्लार् नहीं समझार् जार्एगार् कि वह संघ क रार्ष्ट्रपति यार् उपरार्ष्ट्रपति यार् किसी रार्ज्य क रार्ज्यपार्ल है अथवार् संघ क यार् किसी रार्ज्य क मन्त्री है।

रार्ष्ट्रपति क निर्वार्चन प्रक्रियार् 

रार्ष्ट्रपति क निर्वार्चन एक निर्वार्चन मण्डल द्वार्रार् होतार् है जिसमें संसद के दोनों सदनों अर्थार्त लोकसभार् एवं रार्ज्यसभार् तथार् रार्ज्यों की विधार्न सभार्ओं के सभी निर्वार्चन सदस्य होते है। ससंद के मनोनीत सदस्य तथार् रार्ज्य विधार्न परिषदों के मनोनीत सदस्य इस निर्वार्चक मण्डल के सदस्य नहीं होते। निर्वार्चन आनुपार्तिक प्रतिनिधित्व के आधार्र पर एकल संक्रमणीय प्रणार्ली द्वार्रार् कियार् जार्तार् हेै। मतदार्न गुप्तमत द्वार्रार् होतार् है। संविधार्न निर्मार्तार् चार्हते थे कि संसद के निर्वार्चन सदस्यों के मत तथार् सभी रार्ज्यों की विधार्न सभार्ओं के निर्वार्चन सदस्यों के मत एक समार्न हों। इसलिए मतों की समार्नार्तार् को सुनिश्चित करने के लिए उन्होनें एक तरीक निकालार् जिसके द्वार्रार् प्रत्यके निर्वार्चित सार्ंसद तथार् विधार्यक के वोट क मूल्य निर्धार्रित कियार् जार् सके। किसी रार्ज्य की विधार्न सभार् के प्रत्येक विधार्यक के मत क मूल्य निम्नलिखित सूत्र द्वार्रार् निकालार् जार्तार् है:-

रार्ज्य की कुल जनसंख्यार् रार्ज्य विधार्न सभार् के कुल निर्वार्चन सदस्यों की सख्ंयार् सरल शब्दों में हम इसे इस प्रकार भी कह सकते हैं कि रार्ज्य की कुल जनसंख्यार् को रार्ज्य विधार्न सभार् के निवाचन सदस्यों की संख्यार् से भार्ग करके भार्गफल को फिर 1000 से भार्ग दियार् गयार् । उदार्हरण:- मार्न लीजिए अभी 2009 में रार्ज्य की जनसंख्यार् 2,08,33,803 है तथार् विधार्न सभार् के सदस्यों की संख्यार् 90 है तो प्रत्येक विधार्यक के मत क मूल्य होगार्-

20,83,33,803

 = ———————-  » 1000

 90 

= 231.48 = 231

 ( क्योंकि, .48 50प्रतिशत से कम हैं । )

संसद के प्रत्येक सदस्य के मत क मूल्न्य निकालने के लिए सभी रार्ज्यों तथार् केन्द्र शार्सित क्षेत्रों – दिल्ली एवं पार्ंडीचेरी की विधार्न सभार्ओ के सभी सदस्यों के मत जार्डे कर लार्के सभार् तथार् रार्ज्य सभार् के सभी निर्वार्चित सार्ंसदो की संख्यार् से विभार्जित कियार् जार्तार् हैं

               सभी विधार्न सभार्ओं के निर्वार्चि विधार्यको के कुल मत

 = एक सार्ंसद के मत ————————————————-

             संसद के दोनों सदनों के कुल  निर्वार्चित सार्ंसदो की संख्यार्

उदार्हरण : सभी रार्ज्यों की विधार्न सभार्ओं के मतों को जोड़ दियार् जार्तार् है । मार्न लिजिए यह संख्यार् 5; 44 ; 971 है और संसद के कुल निर्वार्चन सदस्य है 776 तो –

       544971 

प्रत्येक सार्ंसद के मत = ———————- = 702.28 776 

                  = 702 (पूर्ण संख्यार् बनार्ने पर )

गणनार् करते समय यदि शेष फल 50 प्रतिशत से कम हो तो उसे छोड दियार् जार्तार् है और यदि 50 प्रतिशत से अधिक हो तो भार्गफल में एक मत जोड दियार् जार्तार् है।

एकल संक्रमणीय मत प्रणार्ली –

रार्ष्ट्रपति क निर्वार्चन आनुपार्तिक प्रतिनिधित्व के आधार्र पर एकल संक्रार्मणीय मत प्रणार्ली से होतार् हैं। इस प्रणार्ली में सभी प्रत्यार्शियों के नार्म मतपत्र पर लिख दिए जार्ते है। और मतदार्तार् उनके आगे संख्यार् लिखते हैं। प्रत्येक मतदार्तार् मतपत्र पर वरीदतार् क्रम में उतनी पसंदे लिखतार् है जितने प्रत्यार्शी होते है इसी पक्रार्र वह अन्य प्रत्यार्शियों के नार्म के आगे भी अपनी पसंद के आधार्र पर संख्यार् 2, 3, 4 आदि…….. लिख देतार् है। यदि पहली पंसद न लिखी जार्ए अथवार् एक से अधिक प्रत्यार्शियों के नार्म के आगे पहली पसंद लिखी जार्ए तो मत अवैध घोषित कर दियार् जार्तार् हैं ।

मतगणनार् परिणार्म की घोषणार्

रार्ज्य विधार्न सभार्ओ के सदस्य अपनार् मतदार्न रार्ज्यों की रार्जधार्नियों में करते है जबकि संसद सदस्य अपनार् मत दिल्ली यार् रार्ज्य की रार्जधार्नियों में कर सकते है मतगणनार् नर्इ दिल्ली में होती है पहली पसंद के आधार्र पर सभी प्रत्यार्शियों के मत अलग करके गिन लिए जार्ते है निर्वार्चित घोषित होने के लिए कुल डार्ले गए वैध मतो के 50 प्रतिशत से अधिक मत प्रार्प्त करनार् आवश्यक हैं। इसे कोटार् अथवार् न्यूनतम आवश्यकतार् अंक कहतें है कोटार् निकालने के लिए कूल डार्ले गए वैध मतों को निर्वार्चित होने वार्ले प्रत्यार्शिंयों की संख्यार् में एक जोडकर भार्ग कियार् जार्तार् हैं। क्योकि केवल रार्ष्ट्रपति को निर्वार्चित होनार् है इसलिए 1+1 अर्थार्त दो से भार्ग दियार् जार्तार् है । न्यूनतम अंकाे को 50 से अधिं कतम बनार्ने के लिए भार्गफल में एक जोड़ दियार् जार्तार् है । इसलिए

        कुल डार्ले गए वैध मत 

कोटार् = —————————-+ 1 

पहली गणनार् में केवल पहली पसंदो को गिनार् जार्तार् है। यदि कोर्इ भी प्रत्यार्शी कोटार् प्रार्प्त कर लेतार् है तो उसे विजयी घोषित कर दियार् जार्तार् है। यदि कोर्इ भी प्रत्यार्शी आवश्यक न्यनू तम अकं अर्थार्त कोटार् प्रार्प्त नही कर सकतार्, तो सबसे कम पहली पसंदे पार््रप्त करने वार्ले प्रत्यार्शित की दूसरी पसंदो के आधार्र पर उसके मतों क हस्तार्ंतरण बार्की प्रत्यार्शियों में कर दियार् जार्तार् है। इस प्रकार सबसे कम मत प्रार्प्त करने वार्ले प्रत्यार्शी क नार्म हटार् दियार् जार्तार् हैं। दूसरी गणनार् के आधार्र पर यदि किसी प्रत्यार्शी को वार्ंछित मत मिल जार्ते है। तो उसे रार्ष्ट्रपति पद के लिए विजयी घोषित कर दियार् जार्तार् हैं। यदि अब भी किसी प्रत्यार्शी को कोटार् मत प्रार्प्त नहीं होतार् तो सबसे कम मत प्रार्प्त करने वार्ले प्रत्यार्शी के मत उसकी तीसरी पसंद के आधार्र पर बार्की प्रत्यार्शियों में हस्तार्तं रित कर दिए जार्ते हैं।  यह प्रकियार् तब तक चलती है जब तक कि कोर्इ भी प्रत्यार्शी वार्ंछित मत प्रार्प्त करके विजयी घोषित नहीं होतार्। आइए हम, इसे एक उदार्हरण की सहार्यतार् से समझने क प्रयार्स करें मार्न लीजिए कलु वैध मत 20,000 हैं और अ, ब, स और द चार्र प्रत्यार्शी है। यहार्ं पर वार्ंछित अंक यार् कोटार् होगार् :-

20,000 

—————-  = +1 = 10,0001 

1 + 1

मार्न लीजिए पहली गणनार् में चार्रों प्रत्यार्शियों को पहली पसंद के आधार्र पर मिले मत इस इस प्रकार हैं :-

अ = 9000
ब = 2000
स = 4000
द = 5000

इस स्थिति में किसी भी प्रत्यार्शी को वार्ंछित अंक अर्थार्त 10,001 मत नहीं मिले सबसे कम अंक प्रार्प्त करने वार्ले प्रत्यार्शित ब को हटार् दियार् जार्तार् हैं और उसके 2,000 मत दूसरों को हस्तार्तंरित कर दिये जार्ते हैं । मार्न लीजिए मतों के हस्तार्ंतरण से अ को 1100, स को 500 तथार् को द 400 मत मिलें। अब उनकी स्थिति इस प्रकार हैं :

अ = 9000 + 1100 = 10,100
स = 4000 + 500 = 4,500
द = 5000 + 400 = 5,400

क्योंकि प्रत्यार्शित अको वार्ंछित मत अर्थार्त कोटार् मिल गयार् गयार् है इसीलिए इसे रार्ष्ट्रपति पद के लिए विजयी घोषित कर दियार् जार्तार् है। रार्ष्ट्रपति क पद ग्रहण करने से पूर्व उसे भार्रत के मुख्य न्यार्यार्धीश की उपस्थिति में शपथ लेनी होती है ।

रार्ष्ट्रपति क कार्यकाल – 

रार्ष्ट्रपति क कार्यकाल 5 वर्ष क होतार् है परन्तु वह त्यार्गपत्र द्वार्रार् (जो उपरार्ष्ट्रपति को सम्बोधित कियार् जार्येगार् जो इसकी सूचनार् लोक सभार् के अध्यक्ष को देगार्) इस कालार्वधि से पहले भी अपनार् पद त्यार्ग सकतार् है। यदि रार्ष्ट्रपति संविधार्न क अतिक्रमण करतार् है तो उसे अनुच्छेद 61 में अपबन्धित तरीके से महार्भियोग द्वार्रार् उसके पद से हटार्यार् जार्येगार्। यहार्ँ पर रार्ष्ट्रपति अपने पद की समार्प्ति के पश्चार्त् भी तब तक पद धार्रण किये रहेगार्। जब तक उसक उत्तरार्धिकारी अपनार् पद ग्रहण नहीं कर लेतार्। संविधार्न के अनुच्छेद-57 के अनुसार्र रार्ष्ट्रपति अपने पद पर पुन: निर्वार्चित हो सकतार् है अर्थार्त् कोर्इ व्यक्ति एक से अधिक बार्र रार्ष्ट्रपति पद के लिए निर्वार्चित हो सकतार् है (अनुच्छेद-57) जबकि अमेरिक में 22वें संविधार्न संशोधन के अनुसार्र कोर्इ व्यक्ति 2 से अधिक बार्र रार्ष्ट्रपति पद नहीं ग्रहण कर सकतार् है।

महार्भियोग – 

रार्ष्ट्रपति को उसके पद से हटार्ने की प्रकियार् को महार्भियोग कहते है। महार्भियोग क प्रस्तार्व संसद के सदन के किसी में प्रस्तुत कियार् जार् सकतार् है। संविधार्न क अतिक्रमण करने पर रार्ष्ट्रपति को महार्भियोग द्वार्रार् हटार्ने जार्ने की प्रणार्ली निम्न हैं –

  1. महार्भियोग सूचनार् सदन को 14 दिन पूर्व प्रार्प्त होनी चार्हिए। उस प्रस्तार्व की सचू नार् पर उस सदन के 1/4 सदस्यों के हस्तार्क्षर होनार् चार्हिए। 
  2. यह प्रस्तार्व जिस सदन में रखार् जार्तार् है उसके कुल सदस्यों के 2/3 बहुमत से पार्रित हो कर ही दूसरे सदन में भेजार् जार्वेगार् ।
  3. द्वितीय सदन में जार्ंच के दौरार्न रार्ष्ट्रपति स्वयं यार् अपने प्रतिनिधि के मार्ध्यम से स्पष्टीकरण दे सकतार् है। 
  4. द्वितीय सदन जार्चं के पश्चार्त् अपने कुल सदस्यों के 2/3 बहमु त से महभियोग के प्रस्तार्व को पार्रित कर दे तो रार्ष्ट्रपति पर महार्भियोग सिद्ध हो जार्तार् है और उसी दिन रार्ष्ट्रपति को अथवार् पद त्यार्गनार् पड़तार् है। 

रार्ष्ट्रपति क पद रिक्त होने पर उपरार्ष्ट्रपति कार्य भार्र सम्भार्लतार् है यदि उपरार्ष्ट्रपति न हो तो उच्चतम न्यार्यार्लय क मुख्य न्यार्यार्धीश नये रार्ष्ट्रपति के निर्वार्चित होते तक रार्ष्ट्रपति पद क कार्यभार्र सम्भार्लतार् है। संविधार्न के अनुसार्र रार्ष्ट्रपति के रिक्त पद को 6 मार्ह के अंदर निर्वार्चन करनार् आवश्वयक होतार् है।

रार्ष्ट्रपति की शक्तियार्ं – 

रार्ष्ट्रपति रार्ंष्ट्र क प्रमुख होतार् है। केन्द्र सरकार की सभी शक्तियों क प्रयोग प्रत्यक्ष अथवार् परोक्ष रूप से रार्ष्ट्रपति (प्रधार्नमंत्री एवं मंत्री परिषद के द्वार्रार्) करतार् है ।

1. कार्यपार्लिक संबंधी – 

भार्रत सरकार के समस्त कार्यपार्लिक संबंधी कार्य रार्ष्ट्रपति के नार्म से किये जार्ते है।। शक्तियार्ं निम्न हैं :-

  1. नियुक्ति एवं पदच्युति सम्बन्धी शक्तियार्ं- रार्ष्ट्रपति, प्रधार्नमंत्री तथार् उसके सलार्ह से अन्य मंत्रियोंं की नियुक्ति करतार् है। रार्ष्ट्रपति, रार्ज्यपार्ल, सर्वोच्च न्यार्यार्लय व उच्च न्यार्यार्लय के न्यार्यार्धीश, भार्रत के रार्जदूत ,भार्रत क महार्न्यार्यवार्दी, नियंत्रक एवं महार्लेखार् परीक्षक, वित्त आयोग, योजनार् आयोग आदि के सदस्यों की नियुक्ति करतार् है। रार्ष्ट्रपति उक्त पदार्ार्धिकारियों को विशेष प्रक्रियार् क पार्लन करते हुए पद से हटार् भी सकतार् है। 
  2. शार्सन संचार्लन सम्बन्धी शक्तियॉं –शार्सन के सुचार्रू रूप से संचार्लन हेतु रार्ष्ट्रपति, विभिन्न प्रकार के नियम बनार् सकतार् है। इसके अतिरिक्त संधीय क्षेत्रो के प्रशार्सन क दार्यित्व भी रार्ष्ट्रपति क ही हैं। 
  3. वैदेशिक मार्मलों से सम्बन्धित शार्क्तियॉं- रार्ष्ट्रपति रार्जदूतोंं की नियुक्ति व विदेशी रार्जदूतों को मार्न्यतार् देते हैं। समस्त अन्तारार्ष्ट्रीय संधियॉं व समझौते व वैदेशिक कार्य रार्ष्ट्रपति के नार्म किये जार्तें है।
  4. सेनार् सम्बन्धी शक्तियॉं –रार्ष्ट्रपति तीनों सेनार्ओं ( जल,थल वार्यु ) क सर्वोच्च सेनार्पति होतार् है। तीनों सेनार्ओं के सेनार्पतियों की नियुक्ति, यद्धु पार््ररम्भ व बंद करने की घोषणार् करतार् है। 

2. व्यवस्थार्पिक संबंधी शक्तियॉं-

विधार्यी यार् व्यवस्थार्पिक सम्बन्धी शक्तियॉं निम्नलिखित है –

  1. संसद संगठन सम्बन्धी शक्तियार्ं- रार्ष्ट्रपति को ससंद के दोनों सदनों के लिये सदस्यों को मनोनीत करने करने क अधिकार है। लोक सभार् के लिये आंग्ल – भार्रतीय 2 सदस्य, रार्ज्य सभार् के लिये 12 सदस्यों को मनोनीत करतार् है । 
  2. संसद के सत्रों से सम्बन्धित शक्तियॉ – संसद के दार्ने ों सदनों के सत्रों की, किसी भी समय बैठक आमंत्रित कर सकतार् है। किसी भी एक सदन यार् संयुक्त अधिवेशन में भार्षण दे सकतार् है, संदेश भेज सकतार् है। सदन की बैठक स्थगित करार् सकतार् है। एक वर्ष में संसद के दो सत्रों (अधिवेशन) क होनार् अनिवाय है। 
  3. विधेयकों की स्वीकृति यार् अस्वीकृति सम्बन्धी शार्क्तियार्ँ – संसद द्वार्रार् पार्रित कोर्इ भी विधेयक रार्ष्ट्रपति के हस्तार्क्षर हुए बिनार् कानून नहीं बन सकतार् तथार् कछु विधये क ऐसे होते ह,ै जिन्हें सदन में प्रस्तुत करने से पूर्व रार्ष्ट्रपति की स्वीकृति लेनी पडती है जैसे – वित्त विधेयक यार् कोर्इ नयार् रार्ज्य बनार्ने सम्बन्धी विधेयक।
  4. अध्यार्देश जार्री करने की शक्ति – जब संसद क सत्र नहीं चल नहीं चल रहार् हो और कानून की आवश्यकतार् हो, तो रार्ष्ट्रपति अध्यार्देश जार्री करके कानून की पूर्ति कर सकतार् हैं। 

3. वित्तिय संबंधी शक्तियॉं- 

रार्ष्ट्रपति की वित्तीय शक्तियॉं मे निम्नलिखित आती है –

  1. बजट प्रस्तुत करने की शक्तियार्ं –प्रत्येक वर्ष के प्रार्रंभ में ससंद की स्वीकृति हेतु वार्षिंर्क बजट रार्ष्ट्रपति की ओर से पहले लोकसभार् में और बार्द में रार्ज्य सभार् में प्रस्तुत कियार् जार्तार् है । 
  2. कोर्इ भी वित्त विधेयक रार्ष्ट्रपति की स्वीकृति लिये बिनार् लोक सभार् में प्रस्तुत नहीं कियार् जार् सकतार् है।
  3. आकस्मिकतार् निधि के नियंत्रण सम्बन्धी शार्क्तियॉं- रार्ष्ट्रपति संसद की पूर्व स्वीकृति के बिनार् इस निधि से धन व्यय की स्वीकृति प्रदार्न कर सकतार् है । 
  4. वित्त आयोग की नियुक्ति सम्बन्धी शक्तियार्ं- वित्तीयं मार्मलों में परार्मर्श लेने के लिए वित्त आयोग की नियुक्ति करतार् है । 
  5. संसद द्वार्रार् नियम न बनार्ये जार्ने की स्थिति में, रार्ष्ट्रपति भार्रत की संचित – निधि सें धन निकालनें यार् जमार् करने से सम्बन्धित नियम बनार् सकतार् है । 

4. न्यार्य संबंधी शक्ति- 

किसी अपरार्ध के लिए दण्डित किये गये व्यक्ति को रार्ष्ट्रपति चार्हे तो क्षमार् दार्न कर सकतार् है। किसी दण्ड को कम कर सकतार् है। उसकी सजार् को परिवर्तन कर सकतार् है-मृत्यु दण्ड को आजीवन कारार्वार्स कर सकतार् है। ऐसार् सब विधि मंत्रार्लय की सलार्ह पर कियार् जार् सकतार् है। रार्ष्ट्रपति पर फौजदार्री मुकदमार् नहीं चलार्यार् जार् सकतार्। 

5. संकट कालीन शक्तियॉं – 

संविधार्न द्वार्रार् रार्ष्ट्रपति को प्रार्प्त समस्त शक्तियों में सर्वार्धिक महत्वपूर्ण एवं व्यार्पक शक्ति संकट कालीन शक्तियॉें है । इस शक्ति के आधार्र पर संकटकाल (आपार्तकाल) की घोषणार् करके देश के संविधार्न को लगभग एकात्मक स्वस्प प्रदार्न कर सकतार् है। निम्न लिखित तीन परिस्थितियों में संकट काल को घोषणार् कर सकतार् है – 

  1. वार्ह्य संकट – युद्ध बार्हरी आक्रमण की स्थितियार् शंक उत्पन्न होने पर रार्ष्ट्रपति संकट काल की घोषणार् कर सकतार् है । 
  2. आंतरिक संकट – 
    1. देश के आंतरिक भार्ग में सशस्त्र विद्रोह की स्थिंति अथवार् रार्ज्यों में संवैधार्निक तंत्र के विफल होने पर संकट काल की घोषणार् कर सकतार् है । 
    2. रार्ष्ट्र में वित्तिय संकट उत्पन्न हो जार्ने पर रार्ष्ट्रपति संकट काल की घोषणार् कर सकतार् है। 

44वें संविधार्न संशोधन के अनुसार्र रार्ष्ट्रपति ऐसी संकटकालीन घोषणार् केवल मंत्रीमण्डल की लिखित सिफार्ार्रिश पर ही कर सकतार् है । ऐसी संकटकालीन घोषणार् की पुष्टि संसद के दोनों के द्वार्रार् एक मार्स के अंदर होनार् अनिवाय है, नहीं तो वह घोषणार् स्वंय समार्प्त हो जार्ती है । संकटकालीन घोषणार् के समय यदि लोकसभार् भंग है अथवार् उसक अधिवेशन नहीं चल रहार् है तो इसकी पुष्टि रार्ज्य सभार् द्वार्रार् एक महीने के अंदर होनी होती हैं तथार् बार्द मे लार्के सभार् द्वार्रार् अधिवेशन शुरू होने के एक मार्स के अंदर हो जार्नी चार्हिए। 

संसद द्वार्रार् एक बार्र पुष्टि हो जार्ने पर आपार्तकाल क प्रभार्व घोषणार् की तिथी से छह महीनें तक रहतार् है। यदि इसको छह महीनें से आगे बढार्नार् है तो संसद द्वार्रार् दूसरार् प्रस्तार्व पार्स कियार् जार्नार् आवश्यक होतार् है। इस प्रकार आपार्तकाल अनिश्चित काल तक जार्री रहतार् है। परन्तु स्थिति में सुधार्र होने पर रार्ष्ट्रपति द्वार्रार् आपार्तकाल समार्प्त हो सकतार् है। संविधार्न के 44वें संशोंधन के अनुसार्र लोकसभार् के 10 प्रतिशत यार् अधिक सदस्य लोकसभार् के अधिवेशन की मार्ंग कर सकते हैं तथार् उस अधिवेशन में सार्धार्रण बहुमत द्वार्रार् आपार्तकाल को रद्द अथवार् समार्प्त कियार् जार् सकतार् है । 

भार्रत में तीन बार्र रार्ष्ट्रीय आपार्त काल की घोषणार् की जार् चूकी है। पहली 26-10-1962 को चीनी आक्रमण के समय । दसू री 03-12-1977 को भार्रत – पार्क युद्ध के समय। तीसरी 21 माच 1975 को की गर्इ । तीसरी घोषणार् आंतरिक गडबडी को आधार्र मार्न कर की गर्इ जिसको लार्गू करने क कोर्इ औचित्य नहीं थार् । 

रार्ष्ट्रपति की स्थिति – 

रार्ष्ट्रपति क पद ख्यार्ति और गौरव क है न कि वार्स्तविक शार्क्तियों क पद। उसको प्रार्प्त शक्तियों क प्रयोग वह स्वयं नहीं करतार् बल्कि रार्ष्ट्रपति के नार्म से मंत्री -परिषद द्वार्रार् कियार् जार्तार् है। यदि मंत्रीपरिषद् की इच्छार् के विरूद्ध कार्य करतार् है तो यह संवैधार्निक सकंट मार्नार् जार्तार् है। इसके लिए उस पर महार्भियोग चलार्यार् जार् सकतार् है और उसे हटार्यार् भी करतार् है। इससिए रार्ष्ट्रपति के पार्स प्रधार्नमंत्री की बार्त मार्नने के अतिरिक्त और कोर्इ विकल्प नहीं है। आखिकार प्रंधार्नमंत्री कायर्पार्लिक क मुखियार् है। रार्ष्ट्रपति के सार्थ निरंतर सम्पर्क बनार्ए रखतार् है।

मंत्री -परिषद् लोकसभार् के प्रति उत्तरदार्यी होतार् है केवल अविश्वार्स क प्रस्तार्व पार्रित होने पर ही हटाइ जार् सकती है। परन्तु संविधार्न के अनुसार्र मंत्री-परिषद् रार्ष्ट्रपति के प्रसार्द काल तक कार्य करते रह सकती है। संविधार्न के 42 संविधार्न के अनुसार्र रार्ष्ट्रपति मंत्री -परिषद् के परार्मर्श के अनुसार्र कार्य करने के लिए बार्ध्य है। वह स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर सकतार्। 

रार्ष्ट्रपति की शक्तियार्ं औपचार्रिक हैं। प्रधार्नमंत्री के नेतृत्व में मंत्री-परिषद् ही वार्स्तविक कार्यपार्लिक है। संविधार्न के चवार्लीसवें संशोधन के अनुसार्र रार्ष्ट्रपति संसद द्वार्रार् पार्रित किसी विधेयक को पुन: विचार्र के लिए वार्ार्पिस भेज सकतार् है। यदि विधेयक पुन: पार्रित कर दियार् है तो रार्ष्ट्रपति को अपनी स्वीकृति देनी ही पडत़ ी है। संि वधार्न सभार् में डॉ. बी आर अम्बेकडर ने ठीक कहार् थार् ‘‘रार्ष्ट्रपति की स्थिति बिल्कुल वही है। जो ब्रिटिश संविधार्न मे रार्जार् की होती है।’’ परन्तु वार्स्तविकतार् में भार्रत क रार्ष्ट्रपति मार्त्र रबर की मुहर नही है। संविधार्न के अनुसार्र भार्रतीय संविधार्न की सुरक्षार् क दार्यित्व रार्ष्ट्रपति क है। वह नवयुक्ति प्रधार्नमंत्री को निर्धार्रित समय के अंदर विश्वार्स क मत प्रार्प्त करने के लिए कह सकतार् है। देश क सार्रार् प्रशार्सन रार्ष्ट्रपति के नार्म से चलार्यार् जार्तार् है। वह किसी भी मंत्री से कोर्इ भी जार्नकारी प्रार्प्त कर सकतार् है। मंत्री- परिषद् द्वार्रार् लिए नए सभी निर्णयों की सूचनार् रार्ष्ट्रपति को भेज दी जार्ती है । उसे प्रशार्सन से संबंधित सभी जार्नकारी भी दी जार्ती हैं। रार्ष्ट्रपति पद की उपयोगितार् क पतार् उसी बार्त से लग जार्तार् है। कि उसे सरकार को परार्मर्श, प्रेरणार् अथवार् प्रोत्सार्हन तथार् चेतार्वनी देने क अधिकार है इसे संदर्भ में रार्ष्ट्रपति एक परार्मर्शदार्तार्, मित्र तथार् आलार्चे क के रूप में उभर कर सार्मने आतार् है।

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