रार्ज्य के नीति निर्देशक सिद्धार्ंत

रार्ज्य के नीति निर्देशक सिद्धार्ंत

By Bandey

अनुक्रम

भार्रतीय संविधार्न की एक विशेषतार् यह है कि इसके अन्तर्गत ‘रार्ज्य-नीति के निर्देशक तत्त्व’ नार्म से रार्ज्य से पथ-प्रदर्शन हेतु कुछ सिद्धार्ंतो की व्यवस्थार् की गयी है। इस नीति निर्देशक तत्त्वों क उल्लेख संविधार्न के चतुर्थ भार्ग में कियार् गयार् है। इस अध्यार्य के अन्तर्गत संविधार्न निर्मार्तार्ओं ने एक दिशार् की ओर संकेत कियार् है जिसक अनुसरण केन्द्र और रार्ज्य सरकारों द्वार्रार् कानून निर्मार्ण और प्रशार्सन के संबंध में कियार् जार्नार् चार्हिए 1937 में आयरलैण्ड ने अपने संविधार्न में न केवल मौलिक अधिकारों की व्यवस्थार् की वरन् सार्मार्जिक नीति के निर्देशक सिद्धार्ंतो को भी संविधार्न में स्थार्न दियार्। इसके सार्थ ही मौलिक अधिकारों और नीति निर्देशक सिद्धार्ंतो में यह अन्तर रखार् है कि जहार्ँ मौलिक अधिकारों को ‘न्यार्य योग्य’ ठहरार्यार् गयार्, नीति निर्देशक सिद्धार्ंतो को न्यार्य योग्य नहीं मार्नार् गयार्।

निर्देशक सिद्धार्ंतो की प्रकृति

इस निर्देशक तत्त्वों की प्रकृति और स्वरूप के सम्बन्ध में-अनुच्छेद 37 में स्पष्ट रूप से कहार् गयार् है कि-फ्इस भार्ग (4) में दिये गये उपबंधों को किसी भी न्यार्यार्लय द्वार्रार् बार्ध्यतार् नहीं दी जार् सकेगी, किन्तु तो भी इसमें दिये हुए तत्त्व देश के शार्सन में मूलभूत हैं और विधि निर्मार्ण में इन तत्त्वों क प्रयोग करनार् रार्ज्य क कर्त्तव्य होगार्। इसलिए हमार्रे रार्ज्य की नीति के निर्देशक तत्त्व कार्यपार्लिक के सार्थ-सार्थ विधार्नमंडलों को प्रभार्वित करेंगे। इन तत्त्वों की प्रकृति को स्पष्ट करते हुए श्री जी.एन. जोशी अपनी पुस्तक ‘भार्रत क संविधार्न’ में लिखते हैं कि, निर्देशक तत्त्वों क विधार्नमंडलों को कानून बनार्ते समय और कार्यपार्लिक को इन तत्त्वों को लार्गू करते समय ध्यार्न रखनार् चार्हिए। ये उस नीति की ओर संकेत करते हैं जिनक अनुसरण संघ और रार्ज्यों को करनार् चार्हिए।


रार्ज्य-नीति के निर्देशक तत्त्व भार्रतीय संविधार्न की एक नई विशेषतार् है। इन सिद्धार्ंतो में उन आदेशों की सूची समार्विष्ट है जिनके अनुसार्र वर्तमार्न तथार् भविष्य की सरकारें कार्य करेंगी भले ही वे किसी रार्जनीतिक दल से संबंध्ति हो। ये सिद्धार्ंत संविधार्न के भार्ग IV (अनुच्छेद 36 से 51) में दिए गए हैं। ये सिद्धार्ंत, संविधार्न निर्मार्तार्ओं की आशार्ओं एवं आकांक्षार्ओं को परिलक्षित करते हैं। इन सिद्धार्ंतो द्वार्रार् वे भार्रत में कल्यार्णकारी रार्ज्य स्थार्पित करनार् चार्हते थे जिसमें लोगों को सार्मार्जिक, रार्जनीतिक तथार् आर्थिक न्यार्य प्रार्प्त हो सके। ये उपबंध भार्रतीय संविधार्न में जीवन क संचार्र करते हैं। इसके निर्मार्तार् इस सत्य को ठीक तरह समझते थे कि व्यक्ति के अधिकारों को समूचे समार्ज के सार्मूहिक हितों के सार्थ समंजित कियार् जार्नार् चार्हिए। वे अमरीक के अनुभव से परिचित थे इसलिए उन्होंने सार्मार्जिक परिवर्तन की संभार्वनार् को सम्मुख रखार्। इस सम्बन्ध में उन्होंने आयरलैण्ड के संविधार्न से मागदर्शन प्रार्प्त कियार्।

निर्देशक सिद्धार्ंतो क महत्व

निर्देशक सिद्धार्ंत एक विशेष प्रकार की सार्मार्जिक व्यवस्थार् स्थार्पित करनार् चार्हते हैं। अनुच्छेद 38 के अनुसार्र, फ्रार्ज्य ऐसी सार्मार्जिक व्यवस्थार् स्थार्पित करके जिसमें रार्ष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थार्ओं में सार्मार्जिक, आर्थिक तथार् रार्जनीतिक न्यार्य उपलब्ध हों, लोगों के कल्यार्ण को बढ़ार्वार् देने क प्रयत्न करेगार्। (‘‘The State shall strive to promote the welfare of the people by securing and protecting as effectively as it may a social order in which justice, social, economic and political shall inform all the institutions of national life.’’) इन्हें न्यार्यार्लय द्वार्रार् लार्गू नहीं कियार् जार्तार्। 42वें संशोधन से पूर्व मौलिक अधिकार निर्देशक सिद्धार्ंतो से उफँचे मार्ने जार्ते थे, भले ही ये सिद्धार्ंत देश के शार्सन के लिए आधरभूत थे। अनुच्छेद 37 के अनुसार्र भार्ग IV के उपबंध किसी न्यार्यार्लय द्वार्रार् लार्गू नहीं होंगे, पर देश के प्रबंध्न में तथार् कानून बनार्ते समय ध्यार्न में रखे जार्ऐंगे। (‘‘Provisions in Part IV shall not be enforceable by any court, but the principle there in laid down are nevertheless fundamental in the governance of the country and it shall be the duty of the State to apply their principles in making the laws.’’) 42वें संशोधन के बार्द इन्हें मौलिक अधिकारों से ऊचार् स्थार्न दियार् गयार् है। इस संशोधन के बार्द संसद अथवार् रार्ज्य विधार्नमंडलों द्वार्रार् बनार्ए गए किसी कानून को किसी न्यार्यार्लय में इस आधार्र पर चुनौती नहीं दी जार् सकती कि वह संविधार्न के अनुच्छेद 14, 19 तथार् क उल्लंघन करतार् है।

निर्देशक सिद्धार्ंतो क वर्गीकरण

संविधार्न के अध्यार्य 4, अनुच्छेद 36 से 51 तक निर्देशक सिद्धार्ंतो क उल्लेख कियार् गयार् है। संविधार्न में तो इनक वर्गीकरण नहीं कियार् गयार् लेकिन, प्रो. एम.पी. शर्मार् ने इन्हें प्रमुख रूप से तीन भार्गों में विभार्जित कियार् है। इन तीन वर्गों में दो और वर्गों को भी जोड़ार् जार् सकतार् है।

समार्जवार्दी सिद्धार्ंत

इस वर्ग के अधीन ऐसे सिद्धार्ंत रखे जार् सकते हैं जिनक उद्देश्य भार्रत में समार्जवार्दी कल्यार्णकारी रार्ज्य की स्थार्पनार् करनार् है।

  1. धार्रार् 38 के अनुसार्र रार्ज्य कल्यार्णकारी रार्ज्य की उन्नति के लिए सार्मार्जिक व्यवस्थार् बनार्एगार्।
  2. धार्रार् 39 के अनुसार्र- ;ंद्ध प्रत्येक नार्गरिक को अपनार् निर्वार्ह करने के लिए आजीविक कमार्ने क अधिकार प्रार्प्त हो। ;इद्ध देश में भौतिक सार्धनों क विभार्जन इस प्रकार हो जिससे अधिक-से-अधिक जन-कल्यार्ण हो सके। ;बद्ध देश क आर्थिक ढार्ँचार् इस प्रकार क हो कि धन तथार् उत्पार्दन के सार्धन चन्द व्यक्तियों के हार्थ में एकत्रित न हों। ;कद्ध स्त्रियों व पुरुषों के लिए समार्न कार्य के लिए समार्न वेतन की व्यवस्थार् हो। ;मद्ध स्त्रियों, बच्चों तथार् युवकों को नैतिक तथार् भौतिक पतन एवं शोषण से बचार्यार् जार्ए। ;द्धि स्त्री, पुरुष तथार् बच्चों को आर्थिक संकट से विवश होकर ऐसे कार्य न करने दिए जार्एँ जो उनकी आयु तथार् स्वार्स्थ्य के अनुकूल हों।
  3. धार्रार् 41 के अनुसार्र बेकारी, बीमार्री, बुढ़ार्पार् तथार् अंगहीन होने की स्थिति में रार्ज्य अपनी शक्ति के अनुसार्र सहार्यतार् देने की व्यवस्थार् करे। इसके अलार्वार् रार्ज्य सब लोगों को रोजगार्र तथार् शिक्षार् देने क प्रयार्स करे।
  4. धार्रार् 42 के अनुसार्र रार्ज्य काम के लिए न्यार्यपूर्ण स्थिति उत्पन्न करे तथार् अधिक-से-अधिक प्रसूति सहार्यतार् (Maternity Relief) क प्रबंध करे।

गार्ँधीवार्दी सिद्धार्ंत

इस श्रेणी में वे सिद्धार्ंत शार्मिल किए जार् सकते हैं जिनसे समार्ज की स्थार्पनार् हो सकती है जिनक स्वप्न गार्ँधी जी के मन में थार्।

  1. धार्रार् 40 के अनुसार्र गार्ँवों में ग्रार्म पंचार्यतों क निर्मार्ण कियार् जार्एगार्।
  2. धार्रार् 43 के अनुसार्र गार्ँवों में घरेलू दस्तकारियों की उन्नति के लिए प्रयत्न कियार् जार्एगार्।
  3. धार्रार् 46 के अनुसार्र रार्ज्य कमजोर वर्गों को तथार् विशेषत: अनुसूचित जार्तियों और पिछड़े कबीलों को शिक्षार् सम्बन्धी सुविधार्एँ प्रदार्न करेगार्, उनको सार्मार्जिक अन्यार्य तथार् हर प्रकार के शोषण से बचार्एगार्।
  4. धार्रार् 47 के अनुसार्र रार्ज्य शरार्ब तथार् अन्य नशीली वस्तुओं पर जो स्वार्स्थ्य के लिए हार्निकारक हैं, प्रतिबंध लगार्ने क प्रयार्स करेगार्।
  5. धार्रार् 48 के द्वार्रार् दूध देने वार्ले पशुओं को मार्रने पर रोक लगार्एगार् तथार् पशुओं की नस्ल सुधार्रने क यत्न करेगार्।

उदार्रवार्दी सिद्धार्ंत

इस श्रेणी में सार्धार्रण तथार् विशार्ल विचार्रों वार्ले मनोरथों को शार्मिल कियार् गयार् है।

  1. धार्रार् 44 के अनुसार्र रार्ज्य समस्त भार्रत में समार्न व्यवहार्र नियम (Uniform Civil Code) लार्गू करने क यत्न करेगार्।
  2. धार्रार् 45 के अनुसार्र संविधार्न लार्गू होने के दस वर्ष के अन्दर-अन्दर रार्ज्य 14 वर्ष तक के बार्लकों के लिए नि:शुल्क तथार् अनिवाय शिक्षार् प्रदार्न करेगार्।
  3. धार्रार् 47 के अनुसार्र रार्ज्य लोगों के जीवन-स्तर तथार् खुरार्क-स्तर को ऊचार् उठार्ने तथार् उनके स्वार्स्थ्य में सुधार्र करने क प्रयत्न करेगार्।
  4. धार्रार् 48 के अनुसार्र रार्ज्य वैज्ञार्निक आधार्र पर कृषि और पशुपार्लन क संचार्लन करेगार्।
  5. धार्रार् 50 के अनुसार्र रार्ज्य न्यार्यपार्लिक को कार्यपार्लिक से पृथव्फ रखने क प्रयार्स करेगार्।

अन्तर्रार्ष्ट्रीय संबंधों संबंधी सिद्धार्ंत

इस श्रेणी में ऐसे सिद्धार्ंत शार्मिल किए गए हैं जिनक लक्ष्य विश्व-शार्न्ति स्थार्पित करनार् है। ये सिद्धार्ंत इस प्रकार हैं- धार्रार् 51 के अनुसार्र-

  1. रार्ज्य अन्तर्रार्ष्ट्रीय शार्न्ति तथार् व्यवस्थार् को बढ़ार्वार् देगार्।
  2. रार्ज्य विभिन्न रार्ष्ट्रों के बीच सम्मार्नपूर्वक तथार् न्यार्योचित सम्बन्धों को बनार्ए रखने क यत्न करेगार्।
  3. रार्ज्य अन्तर्रार्ष्ट्रीय कानूनों, सन्धियों तथार् समझौतों क मार्न करेगार्।
  4. अन्तर्रार्ष्ट्रीय झगड़ों को पंच पैफसले (Arbitration) द्वार्रार् निपटार्ने के ढंग क रार्ज्य समर्थन करेगार्।

अन्य सिद्धार्ंत

धार्रार् 49 के अनुसार्र रार्ज्य ऐतिहार्सिक स्मार्रकों की रक्षार् करने क पूरार् प्रयार्स करेगार्।

  1. 42वें संशोधन द्वार्रार् संविधार्न में नयार् अनुच्छेद 43.A जोड़ार् गयार् है जिसके द्वार्रार् यह व्यवस्थार् की गई है कि रार्ज्य उचित कानून यार् किसी अन्य विधि से इस उद्देश्य के लिए प्रयत्न करेगार् कि किसी भी उद्योग से सम्बन्धित कारोबार्र के प्रबंध में अथवार् अन्य संस्थार्ओं में श्रमिकों को भार्ग लेने क अवसर प्रदार्न हो।
  2. 42वें संशोधन द्वार्रार् संविधार्न में एक नयार् अनुच्छेद 48-A जोड़ार् गयार् है, जिसमें यह व्यवस्थार् की गई है कि रार्ज्य वार्तार्वरण की सुरक्षार् तथार् सुधार्र के लिए और देश के वनों तथार् जीवन की रक्षार् के लिए यत्न करेगार्।

नीति निर्देशक तत्त्वों की आलोचनार्

जिस समय संविधार्न क निर्मार्ण हो रहार् थार्, उस समय संविधार्न सभार् में और बार्हर भी रार्ज्य की नीति के निर्देशक तत्त्वों सम्बन्धी उपबंधों की बहुत आलोचनार् हुई थी। संविधार्न के स्वीकृत हो जार्ने के पश्चार्त् भी अनेक विद्वार्नों ने कई आधार्रों पर इन उपबंधों की आलोचनार् की है। निर्देशक तत्त्वों के विरुद्व की जार्ने वार्ली आलोचनार् के प्रमुख आधार्र हैं-

वैधार्निक शक्ति क अभार्व

संविधार्न ने रार्ज्य के नीति के निर्देशक तत्त्वों को एक ओर तो देश के शार्सन में मूलभूत मार्नार् है किन्तु सार्थ ही वे वैधार्निक शक्ति यार् प्रार्प्त न्यार्य योग्य नहीं है अर्थार्त् न्यार्यार्लय उपर्युक्त सिद्धार्ंत को क्रियार्न्वित नहीं कर सकते हैं। अत: आलोचकों की रार्य में ये निर्देशक तत्त्व ‘शुभ इच्छार्एँ’ (Pious wishes), ‘नैतिक उपदेश’ (Morel precepts) यार् ‘ऐसी रार्जनीतिक घोषणार्ओं के समार्न हैं, जिनक कोई संवैधार्निक महत्त्व नहीं हो।’ संविधार्न सभार् के एक सदस्य श्री नार्सिरूद्दीन ने इन्हें ‘नववर्ष के प्रथम दिन पार्स किए गए शुभकामनार् क प्रस्तार्व’ जैसी वस्तु कहार् थार् और प्रो. के.टी. शार्ह के शब्दों में, ‘यह एक ऐसार् चैक है जिसक भुगतार्न बैंक की इच्छार् पर छोड़ दियार् गयार् है।’ प्रो. हीयर ने इन निर्देशक तत्त्वों को ‘उद्देश्यों और आकांक्षार्ओं क घोषणार् पत्र‘ कहार् है और श्री एन.आर. रार्घवार्चार्री इन्हें ‘ललित पदार्वली में व्यक्त ध्वनित भार्वनार्ओं की ऐसी पंक्तियार्ँ कहते हैं जिनक वैधार्निक दृष्टि से कोई महत्त्व नहीं है।’ सर बी.एन. रार्व के शब्दों में, फ्रार्ज्यों की नीति-निर्देशक तत्त्व रार्ज्य के अधिकारियों के लिए नैतिक उपदेश के समार्न हैं और वे इस आलोचनार् के पार्त्र हैं कि संविधार्न में नैतिक उपदेशों के लिए उचित स्थार्न नहीं है। आलोचकों को कहनार् है यदि संविधार्न में नैतिक उपदेश करनार् ही अभीष्ट थार्, तो बार्इबिल की दस पवित्र आज्ञार्ओं को संविधार्न में क्यों नहीं लियार् गयार्?

अस्पष्ट तथार् अतार्क्रिक रूप से संग्रहीत

नीति-निर्देशक तत्त्वों के विरुद् यह भी आलोचनार् की जार्ती है कि ये किसी निश्चित यार् संगतपूर्ण दर्शन पर आधार्रित नहीं है। वे अस्पष्ट हैं, उनमें क्रमबद्व तार् क अभार्व है और एक बार्त को बार्र-बार्र दोहरार्यार् गयार् है। उदार्हरण के लिए, इन तत्त्वों में पुरार्ने स्मार्रकों की रक्षार् जैसे महत्त्वहीन प्रश्न अपेक्षार्कृत अत्यन्त महत्त्वपूर्ण, आर्थिक तथार् सार्मार्जिक प्रश्नों के सार्थ मिलार् दिए गए हैं। प्रो. श्रीनिवार्सन के शब्दों में, फ्इस अध्यार्य में कुछ बेढंगे तरीके से आधुनिक को पुरार्तन के सार्थ और तक्र तथार् विज्ञार्न द्वार्रार् सुझार्ये गए उपबंधों को विशुद्व रूप से भार्वुकतार् और पूर्वार्ग्रह पर आधार्रित उपबंधों के सार्थ मिलार् दियार् गयार् है।

एक प्रभुसत्तार् सम्पन्न रार्ज्य में अस्वार्भार्विक

एक प्रभुसत्तार् सम्पन्न रार्ज्य में इस प्रकार के सिद्धार्ंतो को ग्रहण करनार् अस्वार्भार्विक भी लगतार् है। एक उच्च सत्तार् अधीनस्थ सत्तार् को आदेश दे सकती है जैसार् कि 1935 के भार्रतीय शार्सन अधिनियम में ब्रिटिश संसद द्वार्रार् गवर्नर जनरल और गवर्नरों को आदेश दिए गए थे, लेकिन एक प्रभुसत्तार् सम्पन्न रार्ज्य को इस प्रकार के आदेश देने की आवश्यकतार् पड़े, यह अस्वार्भार्विक जार्न पड़तार् है विधिवेत्तार्ओं की दृष्टि में एक प्रभुसत्तार् सम्पन्न रार्ज्य के लिए इस प्रकार के आदेशों क कोई औचित्य नहीं है।

अव्यार्वहार्रिक एवं अनुचित

व्यार्वहार्रिकतार् व औचित्य को भी कुछ आलोचकों के द्वार्रार् चुनौती दी गयी है। उदार्हरण के लिए, मद्य निषेध से सम्बन्धित निर्देशक तत्त्वों की स्वतंत्र अर्थव्यवस्थार् के प्रतिपार्दकों द्वार्रार् उग्र आलोचनार् की गयी है। उनक कहनार् है कि ये तथार्कथित सुधार्र रार्ष्ट्रीय कोष पर भार्रस्वरूप होंगे। इसके अतिरिक्त यह भी कहार् जार्तार् है कि नैतिकतार् थोपी नहीं जार् सकती। मद्य निषेध शरार्बियों को नैतिक प्रणार्ली बनार्ने के बजार्य शरार्ब के अवैध व्यार्पार्र को जन्म देगार्। यह व्यवस्थार् इस दृष्टि से भी अव्यार्वहार्रिक प्रतीत है कि अनेक रार्ज्य सरकारों द्वार्रार् मद्य निषेध की व्यवस्थार् क अन्त तक सावजनिक क्षेत्र में ‘मद्य विक्रय गृहों’ (Wine Shops) की स्थार्पनार् की गयी है। ऐसी स्थिति में डॉ. जैनिंग्ज के ये शब्द बहुत कुछ सीमार् तक उचित प्रतीत होते हैं कि-’आने वार्ली सदी में ये तत्त्व निस्संदेह निरर्थक हो जार्एँगे’।

संवैधार्निक द्वन्द्व के कारण

संवैधार्निक विधि वेत्तार्ओं ने यह आशंक व्यक्त की कि ये तत्त्व भार्रतीय शार्सन में संवैधार्निक द्वन्द्व और गतिरोध के कारण भी बन सकते हैं। संविधार्न सभार् में श्री संथार्नम् ने यह आशंक व्यक्त की थी कि इन निर्देशक तत्त्वों के कारण रार्ष्ट्रपति तथार् प्रधनमंत्री अथवार् रार्ज्यपार्ल और मुख्यमंत्री के बीच मतभेद उत्पन्न हो सकते हैं? प्रश्न यह है कि अगर प्रधार्नमंत्री इन सिद्धार्ंतो क उल्लंघन करतार् है तो स्थिति क्यार् होगी? एक पक्ष क कहनार् है कि रार्ष्ट्रपति इस आधार्र पर किसी भी विधेयक पर निशेषार्धिकार क प्रयोग कर सकतार् है कि वह शार्सन के मूलभूत सिद्धार्ंत निर्देशक तत्त्वों के विरफद्व है। भार्रतीय संविधार्न के प्रसिद्व लेखक श्री दुर्गार्दार्स बसु के द्वार्रार् भी उपर्युक्त विचार्र व्यक्त कियार् गयार् है। इसी प्रकार की घटनार्एँ रार्ष्ट्रपति और प्रधार्नमंत्री के बीच तीव्र मतभेद को जन्म देंगी और इससे संसदार्त्मक प्रजार्तन्त्र को गम्भीर आघार्त पहुँच सकतार् है।

रार्ज्य के नीति निर्देशक तत्त्व की उपयोगितार्

नीति-निर्देशक तत्त्वों की आलोचनार् की गई है उसक तार्त्पर्य नहीं लियार् जार्नार् चार्हिए कि वे बिल्कुल व्यर्थ और महत्त्वहीन हैं। वार्स्तव में, संवैधार्निक और व्यार्वहार्रिक दृष्टिकोण से नीति-निर्देशक तत्त्वों क बहुत अधिक महत्त्व है। न्यार्यमूर्ति हेगड़े के अनुसार्र, फ्यदि हमार्रे संविधार्न के कोई भार्ग ऐसे हैं जिन पर सार्वधार्नी और गहरार्ई से विचार्र करने की आवश्यकतार् है तो व हैं भार्ग तीन और चार्र। उनमें संविधार्न क दर्शन निहित है और एक लेखक के शब्दों में, वे हमार्रे संविधार्न की अन्तरार्त्मार् है। डॉ. पार्यली के अनुसार्र, इन निर्देशक तत्त्वों क महत्त्व इस बार्त में है ये नार्गरिकों के प्रति रार्ज्य के सकारार्त्मक दार्यित्व है। इन तत्त्वों के महत्त्व क अध्ययन निम्नलिखित रूपों से कियार् जार् सकतार् है-

असंगत तथार् असार्मयिक होने के तक्र गलत

नीति-निर्देशक तत्त्वों के सम्बन्ध में प्रो. जैनिग्ज और श्रीनिवार्स जैसे व्यक्तियों की यह आलोचनार् नितार्न्त अनुचित है कि ये तत्त्व असंगत तथार् असार्मयिक है। वार्स्तव में, ये विचार्र केवल विदेशी नहीं है वरन् इस अध्यार्य के अनेक उपबंध पूर्णरूप में भार्रतीय है। यद्यपि 21वीं सदी में ये सिद्धार्ंत पुरार्ने पड़ जार्एँगे और व्यार्वहार्रिक हो जार्एँगे लेकिन कम से कम 20वीं सदी के भार्रत में ये सिद्धार्ंत उपयोगी तथार् व्यार्वहार्रिक प्रतीत होते हैं। पुन: प्रो. एम.वी. पार्यली के शब्दों में, फ्यदि कभी ये सिद्धार्ंत पुरार्ने पड़ जार्एँगे तो इनक आवश्यकतार्नुसार्र संशोधन कियार् जार् सकतार् है क्योंकि संशोधन प्रक्रियार् अत्यन्त सरल है। जब तक इनके संशोधन करने क समय आएगार्, तब तक भार्रत इनक पूरार् लार्भ उठार् चुक होगार् और भार्रत भूमि में आर्थिक लोकतंत्र की जड़ें गहरी हो चुकी होंगी। संविधार्न क निर्मार्ण वर्तमार्न समस्यार्ओं को सुलझार्ने के लिए होतार् है। यदि हम वर्तमार्न क निर्मार्ण सदृढ़ नींव पर करे तो भविष्य की चिन्तार् करने की आवश्यकतार् नहीं रहेगी।

निर्देशक तत्त्वों के पीछे जनमत की शक्ति

यद्यपि इन निर्देशक तत्त्वों को न्यार्यार्लय द्वार्रार् क्रियार्न्वित नहीं कियार् जार् सकतार्, लेकिन इसके पीछे जनमत की सत्तार् होती है, जो प्रजार्तंत्र क सबसे बड़ार् न्यार्यार्लय है। अत: जनतार् के प्रति उत्तरदार्यी कोई भी सरकार इनकी अवहेलनार् क सार्हस नहीं कर सकती। शार्सन द्वार्रार् कियार् गयार् इनक बार्र-बार्र उल्लंघन देश में शक्तिशार्ली विरोध को जन्म देगार्। व्यवस्थार्पिक के भीतर शार्सन को विरोधी दल के प्रहार्रों क सार्मनार् करनार् पड़ेगार् और व्यवस्थार्पिक के बार्हर इसे निर्वार्चन के समय निर्वार्चकों को जवार्ब देनार् होगार्। निर्देशक तत्त्वों के पीछे जनमत देनार् होगार्। प्रो. पार्यली के अनुसार्र, फ्ये निर्देशक तत्त्व रार्ष्ट्रीय चेनतार् के आधार्रभूत स्तर क निर्मार्ण करते हैं और जिनके द्वार्रार् इन तत्त्वों क उल्लंघन कियार् जार्तार् है, वे ऐसार् कार्य उत्तरदार्यित्व की स्थिति से अलग होने की जोखिम पर ही करते हैं। आलोचक रार्घवार्चार्री भी स्वीकार करते हैं कि, फ्जो शार्सन सत्तार् पर आधिपत्य बनार् ले, उसे इस अनुदेश-पत्र क आदर करनार् ही होगार्। आगार्मी आम चुनार्व में उसे इस सम्बन्ध में निर्वार्चकों को जवार्ब देनार् ही पड़तार् है। ऐसी स्थिति में श्री अल्लार्दि कृष्णार्स्वार्मी अÕयर ने संविधार्न सभार् में ठीक ही कहार् थार् कि कोई भी लोकप्रिय मंत्रिमंडल संविधार्न के चतुर्थ भार्ग के उपबंधें के उल्लंघन क सार्हस नहीं कर सकतार्।

चरम सीमार्ओं से रक्षार्

हमार्रे संविधार्न निर्मार्तार् इस तथ्य से पूर्णतयार् परिचित थे कि प्रजार्तार्ंत्रिक रार्ज्य में परिवर्तनशील जनमत के परिणार्मस्वरूप विभिन्न समयों में विभिन्न रार्जनीतिक दल सत्तार्रूढ़ हो सकते हैं। कभी दक्षिणपंथी दल शार्सन सत्तार् पर अधिकार कर सकतार् है और कभी कोई वार्मपंथी दल। निर्देशक तत्त्व दोनों प्रकार की सरकारों को मर्यार्दित रखेंगे तथार् उन्हें किसी प्रकार क एक तरपफ झुकाव रखने से रोवेंफगे। श्री अमरनन्दी के अनुसार्र, संविधार्न के निर्देशक तत्त्व इस बार्त क आश्वार्सन देते हैं कि अनुदार्र दल अपनी नीति के निर्धार्रण में इन तत्त्वों की पूर्ण अवहेलनार् नहीं कर सकेगार् और एक उग्रगार्मी दल अपने दल के आर्थिक यार् अन्य कार्यक्रम को पूरार् करने के लिए संविधार्न क अन्त करनार् आवश्यक नहीं समझेगार्। इस प्रकार निर्देशक तत्त्व वार्म और दक्षिण पंथ की चरम सीमार्ओं से सुरक्षार् प्रदार्न करते हैं।

नैतिक आदर्शों के रूप में महत्व

यदि निर्देशक तत्त्वों को केवल नैतिक धार्रणार्एँ ही मार्न लियार् जार्ए तो इस रूप में भी उनक अपार्र महत्त्व है। ब्रिटेन में मैग्नार्कार्टार्, फ्रार्ंस में मार्नवीय तथार् नार्गरिक अधिकारों की घोषणार् तथार् अमरीकी संविधार्न की प्रस्तार्वनार् को कोई कानूनी अनुशक्ति प्रार्प्त नहीं, फिर भी इन देशों के इतिहार्स पर इसक प्रभार्व पड़ार् है। इसी प्रकार उचित रूप से यह आशार् की जार् सकती है कि ये निर्देशक तत्त्व भार्रतीय शार्सन की नीति को निर्देशित और प्रभार्वित करेंगे। ऐलेन ग्लेडहिल के शब्दों में, अनगिनत व्यक्तियों के जीवन नैतिक आदर्शों के फलस्वरूप सुधरे हैं और ऐसे उदार्हरणार् भी मिलने कठिन नहीं हैं जबकि उच्च नैतिक आदर्शों क रार्ष्ट्रों के इतिहार्स पर प्रभार्व पड़तार् है।

संविधार्न की व्यार्ख्यार् में सहार्यक

संविधार्न के अनुसार्र निर्देशक तत्त्व देश के शार्सन में मूलभूत हैं जिसक तार्त्पर्य यह है कि देश के प्रशार्सन के लिए उत्तरदार्यी सभी सत्तार्एँ उनके द्वार्रार् निर्देशित होंगी। न्यार्यपार्लिक भी शार्सन क एक महत्त्वपूर्ण अंग होने के कारण यह आशार् की जार् सकती है कि भार्रत में न्यार्यार्लय संविधार्न की व्यार्ख्यार् के कार्य में निर्देशक तत्त्वों को उचित महत्त्व देंगे। प्रो. ऐलेक्जेण्डरोविच क मत है कि फ्चूँकि निर्देशक सिद्धार्ंतो में संविधार्न सभार् की आर्थिक और सार्मार्जिक नीति बोल रही है और क्योंकि उसमें हमार्रे संविधार्न निर्मार्तार्ओं की इच्छार् की अभिव्यक्ति है, इसलिए हमार्रे न्यार्यार्लयों क यह कर्त्तव्य हो जार्तार् है कि वे मौलिक अधिकारों संबंधी उपबंधों की व्यार्ख्यार् करते समय रार्ज्य की नीति के निर्देशक तत्त्वों पर पूरार्-पूरार् ध्यार्न दें। भार्रतीय न्यार्यार्लयों ने कई बार्र मौलिक अधिकार संबंधी विवार्दों में निर्णय देते समय निर्देशक सिद्धार्ंतो से मागदर्शन लियार् है। ‘बम्बई रार्ज्य बनार्म एपफ.एम. वार्लसरार्य’ वार्ले विवार्द में सर्वोच्च न्यार्यार्लय ने अनुच्छेद 47 के आधार्र पर निर्णय दियार् कि शार्सन ने मार्दक द्रव्य निषेध अधिनियम पार्स करके उचित प्रतिबंध ही लगार्यार् थार्। पुन: उच्चतम न्यार्यार्लय ने ‘बिहार्र रार्ज्य बनार्म कामेश्वरसिंह’ वार्ले विवार्द में अनुच्छेद 39 के प्रकाश में यह निर्णय दियार् थार् कि जमींदार्रों के अन्त क उद्देश्य वार्स्तविक जनहित ही थार्। इसी प्रकार ‘विजय वस्त्र उद्योग बनार्म अजमेर रार्ज्य’ के विवार्द में उच्चतम न्यार्यार्लय ने अनुच्छेद 43 के प्रकाश में ‘न्यूनतम पार्रिश्रमिक अधिनियम’ को उचित ठहरार्यार्। श्री एम.सी. सीतलवार्ड़ के शब्दों में ‘रार्ज्य नीति के इन मूलभूत सिद्धार्ंतो को वैधनिक प्रभार्व प्रार्प्त न होते हुए भी इनके द्वार्रार् न्यार्यार्लयों के लिए उपयोगी प्रकाश स्तम्भ क कार्य कियार् जार्तार् है’।

शार्सन के मूल्यार्ंकन क आधार्र

नीति-निर्देशक तत्त्वों द्वार्रार् जनतार् को शार्सन की सफलतार् व असफलतार् की जार्ँच करने क मार्पदण्ड भी प्रदार्न कियार् जार्तार् है। शार्सक दल के द्वार्रार् अपने मतदार्तार्ओं को निर्देशक सिद्धार्ंतो के संदर्भ में अपनी सफलतार्एँ बतार्नी होंगी तथार् शार्सक शक्ति पर अधिकार करने के इच्छुक रार्जनीतिक दल को इन तत्त्वों की क्रियार्न्विति के प्रति अपनी तत्परतार् और उत्सार्ह दिखार्नार् होगार्। इस प्रकार निर्देशक तत्त्व जनतार् को विभिन्न दलों की तुलनार्त्मक जार्ँच करने योग्य बनार् देंगे।

कार्यपार्लिक प्रधार्न इनक दुरुपयोग नहीं कर सकते हैं

निर्देशक तत्त्व के पक्ष में अन्तिम बार्त यही कही जार् सकती है कि यद्यपि विधार्न के सदस्यों तथार् कुछ संविधार्न-वेत्तार्ओं ने यह भय प्रकट कियार् है कि रार्ष्ट्रपति यार् रार्ज्यपार्ल इस आधार्र पर किसी विधेयक पर अपनी सम्मति देने से इंकार कर सकते हैं कि वह निर्देशक तत्त्वों के प्रतिवूफल हैं, लेकिन व्यवहार्र में ऐसार् घटनार् की सम्भार्वनार् कम है, क्योंकि संसदार्त्मक शार्सन प्रणार्ली में नार्ममार्त्र क कार्यपार्लिक प्रधार्न लोकप्रिय प्रधार्न लोकप्रिय मंत्रि-परिषद् द्वार्रार् पार्रित विधि को अस्वीकृत करने क दुस्सार्हस नहीं कर सकतार् है। डॉ. अम्बेडकर के शब्दों में, फ्विधार्यिक द्वार्रार् पार्रित विधि को अस्वीकृत करने के लिए रार्ष्ट्रपति यार् रार्ज्यपार्ल निर्देशक तत्त्वों क प्रयोग नहीं कर सकते। वार्स्तव में, निर्देशक तत्त्व भार्रतीय रार्जनीति के सर्वोच्च सिद्धार्ंत हैं। सर्वोच्च न्यार्यार्लय के न्यार्यार्धीश श्री केनियार् ने ‘गोपार्लन बनार्म मद्रार्स रार्ज्य’ के विवार्द पर निर्णय देते हुए कहार् थार्, फ्क्योंकि रार्ज्य की नीति के निर्देशक तत्त्व संविधार्न में शार्मिल हैं, इसलिए वे बहुमत दल के अस्थार्यी आदेश मार्त्र ही नहीं हैं, वरन् उनमें रार्ष्ट्र की बुद्वि मत्तार्पूर्ण स्वीकृति बोल रही है जो संविधार्न सभार् के मार्ध्यम से व्यक्त हुई थी।

निर्देशक तत्त्वों क क्रियार्न्वयन और उपलब्धियार्ँ

नीति निर्देशक तत्त्वों के क्रियार्न्वयन की समस्यार् पुलिस रार्ज्य को कल्यार्णकारी रार्ज्य और संविधार्न द्वार्रार् स्थार्पित रार्जनीतिक लोकतंत्र को आर्थिक लोकतंत्र में परिवर्तन करने की समस्यार् है। यह कार्य इतनार् बड़ार् है कि इसे तुरन्त सम्पन्न नहीं कियार् जार् सकतार्। इसे पूरार् करने के लिए दीर्घकालीन प्रयत्न, प्रचुर धन और तीव्र गति से आर्थिक, सार्मार्जिक और शैक्षणिक विकास आवश्यक है। परन्तु रार्ज्य ने यह कार्य प्रार्रंभ कर दियार् है और इस दिशार् में कई महत्त्वपूर्ण बार्तें की गयी हैं-

  1. पार्ँच पंचवष्र्ार्ीय योजनार्ओं के आधार्र पर कृषि और उद्योगों की उन्नति, शिक्षार् और स्वस्थ्य की सुविधओं क प्रसार्र, नौकरी व कार्य के सार्धनों में वृद्वि , रार्ष्ट्रीय आय व लोगों के रहन-सहन के स्तर को ऊचार् उठार्ने के प्रयत्न किए गए हैं।
  2. युवक वर्ग व बार्लकों को शोषण से रक्षार् करने के लिए अनेक कानून पार्स किए गए हैं, बीमार्री और दुर्घटनार् के विरुद्व सुरक्षार् के लिए कुछ सीमार् तक मजदूर वर्ग में बीमार् योजनार् लार्गू की गयी है व बेरोजगार्री बीमार् योजनार् को लार्गू करने और रोजगार्र की सुविधार्एँ बढ़ार्ने के प्रयार्स किए जार् रहे हैं। रार्ज्य सार्मार्जिक कल्यार्ण की दिशार् में तेजी से आगे बढ़ रहार् है।
  3. हिन्दू बिल के कई अंशों जैसे हिन्दू विवार्ह अधिनियम, 1955- हिन्दू उत्तरार्धिकार अधिनियम 1956ऋ आदि क पार्रित करके देश के सभी वर्गों के लिए समार्न विधि संहितार् प्रार्प्त करने के प्रयत्न किए जार् रहे हैं।
  4. अस्पृश्यतार् निवार्रण के लिए और अनुसूचित तथार् पिछड़ी हुई जार्तियों के बार्लकों को उदार्रपूर्वक छार्त्रवृत्ति और अन्य सुविधार्यों द्वार्रार् शिक्षित करने क कार्य भी हुआ है।
  5. यद्यपि अब भी नि:शुल्क और अनिवाय प्रार्रम्भिक शिक्षार् और सबके लिए पर्यार्प्त स्वार्स्थ्य सेवार् क प्रबंध अधूरार् ही है, तथार्पि इन दिशार्ओं में भी महत्त्वपूर्ण प्रगति हुई है। अन्तिम स्थार्न में लोकतार्ंत्रिक विकेन्द्रीयकरण और सार्मुदार्यिक विकास योजनार्ओं द्वार्रार् ग्रार्म पंचार्यतों को अधिक सशक्त बनार्ने क प्रयार्स कियार् जार् चुक है। गरीबों को ‘मुफ्रत कानूनी सहार्यतार्’ प्रदार्न करने के लिए न्यार्यमूर्ति पी.एन. भगवती की अध्यक्षतार् में एक समिति गठित की गई। कई प्रार्ंतों में वृद्व तथार् असहार्य लोगों के लिए वृद्वार्वस्थार् पेंशन (Old Age Pension) की व्यवस्थार् की गई है। यह गौरव हरियार्णार् को भी प्रार्प्त है।

हार्ल ही के वर्षों में निर्देशक तत्त्वों के क्रियार्न्वियन की दिशार् में कुछ और कदम भी उठार्ये गये हैं। बंधुआ मजदूरी की समार्प्ति और स्त्री-पुरुष को समार्न वेतन दिलार्ने क अध्यार्देश जार्री कियार् गयार् जिसे बार्द में संसद के द्वार्रार् पुष्टि प्रदार्न कर दी गयी। रार्ज्य सरकारों के द्वार्रार् ग्रार्मीण जनतार् और समार्ज के अन्य कमजोर वर्गों क ऋण मार्फ करने के लिए आवश्यक कानूनों क निर्मार्ण कियार् गयार् है। अभी 1976 में संसद के द्वार्रार् ‘शहरी भूमि सीमार्करण कानून’ पार्रित कियार् गयार् है, जिसके अनुसार्र 4 श्रेणी के शहरों में शहरी भूमि की सीमार् 500 वर्ग मीटर से 2000 वर्ग मीटर निश्चित कर गयी है। आशार् की जार्नी चार्हिए कि आगे चल कर इस कानून को अन्य शहरी क्षेत्रों में भी लार्गू कियार् जार्एगार्। वार्स्तव में गरीबों की खुशहार्ली के कार्यक्रम में एक नयी जार्न डार्ली गयी है। जिन लोगों के पार्स जमीन नहीं, उन्हें घर बनार्ने के लिए जमीन दिलार्ने, भूमि सुधार्र लार्गू करने और खेतीबार्ड़ी पर काम करने वार्लों की मजदूरी बढ़ार्ने के काम तेजी से आगे बढ़ार्ए जार् रहे हैं।

नीति-निर्देशक तत्त्वों में निहित लक्ष्य को पूरार् करने के लिए अभी बहुत कुछ करनार् बार्की है, परन्तु रार्ज्य इस सम्बन्ध में अपने उत्तरदार्यित्व को भूलार् नहीं है और आशार् की जार् सकती है और आगे आने वार्ले वर्षों में इस उत्तरदार्यित्व को पूरार् करने के लिए और अधिक तेजी से प्रयत्न किए जार्एँगे।

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