रार्ज्यपार्ल की नियुक्ति, पद के लिए योग्यतार्एँ, कार्य और शक्तियार्ं 

रार्ज्यपार्ल की नियुक्ति, पद के लिए योग्यतार्एँ, कार्य और शक्तियार्ं 

By Bandey

अनुक्रम

रार्ज्यपार्ल की नियुक्ति अनुच्छेद 153 के अधीन भार्रत क संविधार्न यह व्यवस्थार् करतार् है कि, प्रत्येक रार्ज्य क एक रार्ज्यपार्ल होगार्। परन्तु सार्थ ही यह व्यवस्थार् भी की गई है कि एक व्यक्ति दो यार् इससे अधिक रार्ज्यों के रार्ज्यपार्ल के रूप में कार्य कर सकतार् है।

रार्ज्यपार्ल की नियुक्ति

जब संविधार्न निर्मार्ण सभार् में रार्ज्यपार्ल के पद की व्यवस्थार् के बार्रे में विचार्र कियार् जार् रहार् थार् तो रार्ज्यपार्ल की नियुक्ति के लिए कई प्रस्तार्व प्रस्तुत किए गए। परन्तु अन्तत: इस बार्त पर सहमति हो गई कि क्योंकि रार्ज्यपार्ल ने रार्ज्य के संवैधार्निक मुखियार् के रूप में ही कार्य करनार् थार्, इसलिए रार्ज्यपार्ल की रार्ष्ट्रपति के द्वार्रार् नियुक्ति की व्यवस्थार् करनार् सबसे उपयुक्त बार्त होगी। यह भी अनुभव कियार् गयार् कि यदि रार्ज्यपार्ल और मुख्यमन्त्री दोनों निर्वार्चित प्रतिनिधि होंगे तो दोनों के बीच टकरार्वार् की संभार्वनार् बन सकती थी, क्योंकि एक निर्वार्चित रार्ज्यपार्ल नार्ममार्त्र के शार्सक के रूप में कार्य करनार् पसंद नहीं करेगार्। इस बार्त के लिए सहमति हुई कि संसदीय प्रबन्ध में एक निर्वार्चित रार्ज्यपार्ल एक गोल छिद्र में चौरस वस्तु के समार्न होगार्। यह भी प्रस्तार्व कियार् गयार् थार् कि रार्ज्य के विधार्नकार चार्र सदस्यों, जोकि रार्ज्य के निवार्सी हों, के एक पैनल क चयन करें और देश क रार्ष्ट्रपति इन चार्रों में से किसी एक को रार्ज्यपार्ल नियुक्त करे। परन्तु यह अनुभव कियार् गयार् कि रार्ज्य के विधार्यकों के द्वार्रार् चार्र उम्मीदवार्रों क पैनल बनार्ते समय व्यवहार्र में रार्जनीति क खेल खेलार् जार् सकतार् थार्। इससे रार्ज्यपार्ल को संघ और रार्ज्य के बीच एक सम्पक्र सूत्र बनार्ने की आवश्यकतार् परोक्ष हो जार्एगी। इसलिए यह निर्णय कियार् गयार् कि रार्ज्यपार्ल भार्रत के रार्ष्ट्रपति के द्वार्रार् नियुक्त कियार् जार्एगार्। इसके अनुसार्र संविधार्न के अनुच्छेद 155 में लिखार् गयार् कि फ्रार्ज्य के रार्ज्यपार्ल की नियुक्ति रार्ष्ट्रपति के द्वार्रार् अपने हस्तार्क्षरों और मोहर से जार्री आदेश के द्वार्रार् की जार्एगी।


दो महत्त्वपूर्ण परम्परार्एँ जिनके आधार्र पर रार्ज्यपार्ल की नियुक्ति की जार्ती है- पहली परम्परार् यह है कि रार्ज्यपार्ल उस रार्ज्य क निवार्सी नहीं होनार् चार्हिए जिस रार्ज्य में उसकी रार्ज्यपार्ल के रूप में नियुक्ति की जार्ती है। इस परम्परार् क आधार्र यह विचार्र है कि यदि रार्ज्यपार्ल उस रार्ज्य क निवार्सी होगार् तो वह स्वतंत्र और निष्पक्ष ढंग से कार्य नहीं कर सकेगार्। उसकी रार्ज्य में अपनी रार्जनीतिक प्रतिबद्व तार्एँ होंगी और इस बार्त की प्रत्येक संभार्वनार् विद्यमार्न होगी कि वह रार्ज्य के आंतरिक मार्मलों और रार्जनीति में हस्तक्षेप करेगार्। प्रार्य: रार्ष्ट्रपति के द्वार्रार् इस परम्परार् क सम्मार्न कियार् जार्तार् है, परन्तु इस परम्परार् से संबंधित कुछ अपवार्द भी रहे हैं जैसे उदार्हरण के लिए डॉ एच सी मुखर्जी को उनके पैतृक रार्ज्य पश्चिमी बंगार्ल क रार्ज्यपार्ल नियुक्त कियार् गयार् थार्। इसी प्रकार कुछ समय के लिए सरदार्र उज्जल सिह को पंजार्ब क रार्ज्यपार्ल नियुक्त कियार् गयार् थार्। पंजार्ब के भूतपूर्व रार्ज्यपार्ल लैफ्रिटनैंट जनरल (रिटार्यर्ड) बी के एन छिब्बर भी पंजार्बी थे, परन्तु इनको परम्परार् क अपवार्द कह कर उपेक्षित कियार् जार् सकतार् है। रार्ज्यपार्ल नियुक्त किए जार्ने के संबंध में दूसरी परम्परार् यह है कि किसी विशेष रार्ज्य क रार्ज्यपार्ल नियुक्त करने के लिए किसी व्यक्ति के चयन को अंतिम रूप देने से पहले केन्द्र सरकार को उपेक्षित कर दियार् जार्तार् है। उदार्हरण के रूप में 1967 में हरियार्णार् के मुख्यमन्त्री रार्व बीरेन्द्र सिह के रार्ज्यपार्ल की नियुक्ति से संबंधित विचार्रों को केन्द्र सरकार ने स्वीकार नहीं कियार् थार्। बिहार्र के मुख्यमन्त्री महार्मार्यार् प्रसार्द सिन्हार् के श्री एन एन कानगो की बिहार्र के रार्ज्यपार्ल के रूप में नियुक्ति क विरोध कियार् थार्। परन्तु केन्द्र ने मुख्यमन्त्री के परार्मर्श को स्वीकार नहीं कियार् थार्। पश्चिमी बंगार्ल और तमिलनार्डू की सरकारों ने सदैव ही रार्ज्यपार्ल की नियुक्ति से संबंधित अपनी भूमिक (सिफार्रिश करने की) पर बल दियार् है। परन्तु अब यह स्थार्यी रूप में निर्णय कर लियार् गयार् है कि रार्ज्यपार्ल की नियुक्ति करते समय केन्द्र सदैव संबंध्ति रार्ज्य की मन्त्रि-परिषद् क परार्मर्श लेगार् और जहार्ं तक हो सकेगार्, ऐसे परार्मर्श को स्वीकार भी करेगार्। इन दो अच्छी परम्परार्ओं के सार्थ-सार्थ देश में एक बुरी परम्परार् भी विद्यमार्न रही है और वह है कि चुनार्व में परार्जित हुए रार्जनीतिक नेतार्ओं की अलग-अलग रार्ज्यों के रार्ज्यपार्ल के रूप में नियुक्ति करनार्। एक और बुरी परम्परार् यह पड़ रही है कि केन्द्र सरकार बदलने के पश्चार्त् रार्ज्यपार्लों क थोक में हस्तार्ंतरण यार् उनको हटार्यार् जार्नार्। आवश्यकतार् इस बार्त की है इन बार्तों से उपर उठार् जार्ए और योग्यतार् के आधार्र पर ही रार्ज्यपार्ल की नियुक्ति की जार्ए।

रार्ज्यपार्ल के पद के लिए योग्यतार्एँ

संविधार्न क अनुच्छेद 157 यह शर्त रखतार् है कि कोई भी व्यक्ति रार्ज्यपार्ल की नियुक्ति के लिए योग्य नहीं हो सकतार् जोकि भार्रत क नार्गरिक न हो और जिसकी आयु 35 वर्ष से कम हो। अनुच्छेद 158 कुछ अन्य योग्यतार्ओं क वर्णन रखतार् है :

  1. रार्ज्यपार्ल संसद के किसी भी सदन क यार् किसी रार्ज्य की विधार्नसभार् क सदस्य नहीं होनार् चार्हिए और यदि संसद के किसी भी सदन के सदस्य यार् किसी भी रार्ज्य की विधार्नपार्लिक के सदस्य को रार्ज्यपार्ल नियुक्त कियार् जार्तार् है तो उसी दिन से यह समझार् जार्एगार् कि उसकी सदन की सदस्यतार् समार्प्त हो गई है जिस दिन से वह रार्ज्यपार्ल के रूप में पद संभार्ल लेगार्।
  2. रार्ज्यपार्ल कोई लार्भदार्यक पद ग्रहण नहीं कर सकतार्।
  3. वह किसी भी न्यार्यार्लय के द्वार्रार् घोषित दिवार्लियार् नहीं होनार् चार्हिए। अधिकतर सावजनिक जीवन में अच्छे व्यक्तित्व और मार्न-सम्मार्न वार्ले व्यक्ति यार् सक्रिय रार्जनीति छोड़ चुके किसी वरिष्ठ रार्जनीतिक नेतार् यार् सेवार्निवृत्त सिविल यार् सैनिक अफसरों को ही रार्ज्यपार्ल के रूप में नियुक्त कियार् जार्तार् है।

वेतन और भत्ते

इस समय रार्ज्यपार्ल रुपए मार्सिक वेतन के रूप में प्रार्प्त करतार् है, बिनार् किरार्ए क मुफ्रत सरकारी निवार्स और संचार्र तथार् यार्तार्यार्त की सुविध मिलती है, उसके स्तर, कर्त्तव्यों और पद की श्रेष्ठतार् को देखते अलग-अलग प्रकार के कई अन्य भत्ते मिलते हैं। रार्ज्यपार्ल के पद के संबंध में कियार् जार्ने वार्लार् व्यय, संबंधित रार्ज्य के धन में से कियार् जार्तार् है।

जहार्ं कभी एक ही व्यक्ति को दो यार् इससे अधिक रार्ज्यों क रार्ज्यपार्ल बनार्यार् जार्तार् है वहार्ं उसको मिलने वार्ले वेतन और भत्ते रार्ष्ट्रपति के आदेश के अुनसार्र उसी अनुपार्त में संबंधित रार्ज्यों में बार्ँट दिए जार्ते हैं। रार्ज्यपार्ल क वेतन और भत्ते उनके कार्यकाल के दौरार्न कम नहीं किए जार् सकते।

कार्यकाल

रार्ज्यपार्ल की नियुक्ति पार्ंच वर्ष के लिए की जार्ती है परन्तु वह तब तक अपने पद पर रह सकतार् है जब तक कि रार्ष्ट्रपति चार्हे। रार्ष्ट्रपति उसको किसी समय पद से हटार् सकतार् है यार् उसक हस्तार्ंतरण कर सकतार् है। यहार्ं तक कि 5 वर्ष की अवधि पूरी होने के पश्चार्त् भी रार्ज्य क रार्ज्यपार्ल तब तक अपने पद पर बनार् रह सकतार् है जब तक कि उसके स्थार्न पर नयार् नियुक्त हुआ व्यक्ति अपनार् पद नहीं संभार्ल लेतार्। 1999 में पंजार्ब में ऐसार् ही देखने को मिलार्। भूतकाल में हरियार्णार् और पश्चिमी बंगार्ल के रार्ज्यपार्ल क पद अस्थार्यी रूप में रिक्त हो जार्तार् है यार् उसकी मृत्यु के कारण रिक्त हो जार्तार् है तो रार्ज्य के उच्च न्यार्यार्लय क मुख्य न्यार्यार्धीश कार्यवार्हक रार्ज्यपार्ल के रूप में कार्य करतार् है। रार्ज्यपार्ल किसी भी समय अपने पद से त्यार्ग-पत्र दे सकतार् है। जून, 1991 में पंजार्ब के रार्ज्यपार्ल जनरल (सेवार्निवृत्त) ओ पी मल्होत्रार् ने पंजार्ब में चुनार्व स्थगित किए जार्ने के विरोध में अपने पद से त्यार्ग-पत्र दे दियार् थार्। माच, 1995 में तमिलनार्डू विधार्नसभार् ने एक प्रस्तार्व पार्स करके मार्ंग की थी कि रार्ज्यपार्ल श्री चन्नार् रैडी को वार्पस बुलार्यार् जार्ए परन्तु केन्द्र ने रार्ज्य विधार्नसभार् तथार् सरकार की ऐसी मार्ंग प्रस्तुत करने क अधिकार को स्वीकार नहीं कियार् थार्।

रार्ज्यपार्ल के द्वार्रार् शपथ लेनार् यार् प्रतिज्ञार् लेनी

प्रत्येक रार्ज्यपार्ल और रार्ज्यपार्ल के कर्तव्य निभार् रहे प्रत्येक व्यक्ति को अपनार् पद संभार्लने से पहले रार्ज्य के उच्च न्यार्यार्लय के चीपफ जस्टिस की उपस्थिति में अपने पद की शपथ उठार्नी अथवार् प्रतिज्ञार् लेनी पड़ती है।

रार्ज्यपार्ल की कानूनी छूटें

रार्ज्य के रार्ज्यपार्ल को रार्ज्य क मुखियार् होने के नार्ते अपने कार्य निपटार्ने के संबंध में हुए कुछ विशेष कानूनी छूटें प्रार्प्त हैं। संविधार्न के अनुच्छेद 361 के अधीन रार्ष्ट्रपति यार् प्रधार्नमंत्री यार् किसी रार्ज्य क रार्ज्यपार्ल उनके पद के अधिकारों और कर्त्तव्यों क पार्लन करने के प्रति यार् अपने उन अधिकारों और कर्त्तव्यों क पार्लन करते समय किए गए किसी कार्य के प्रति किसी भी न्यार्यार्लय के समक्ष उत्तरदार्यी नहीं होतार्। इसी प्रकार उसके कार्यकाल के दौरार्न रार्ज्यपार्ल के विरुद्व कोई भी पफौजदार्री यार् सिविल कार्यवार्ही नहीं की जार् सकती। रार्ज्यपार्ल के कार्यकाल के दौरार्न उसकी गिरफ्रतार्री यार् केद करने के लिए किसी भी न्यार्यार्लय के द्वार्रार् कोई भी आदेश जार्री नहीं कियार् जार् सकतार्।

रार्ज्यपार्ल के कार्य और शक्तियार्ं

रार्ज्य क मुखियार् होने के नार्ते रार्ज्यपार्ल को बहुत-सी शक्तियार्ं और सम्मार्न मिलतार् है जिसकी तुलनार् भार्रत के रार्ष्ट्रपति को प्रार्प्त शक्तियों और सम्मार्न से की जार् सकती है। जैसार् कि डी डी बसु लिखते हैं, फ्रार्ज्य के रार्ज्यपार्ल की शक्तियार्ं देश के रार्ष्ट्रपति की शक्तियों के समार्न ही हैं। अन्तर केवल यह है कि रार्ज्यपार्ल के पार्स कोई कूटनीतिक (डिप्लोमैटिक) सैनिक यार् संकटकालीन शक्तियार्ं नहीं होती। परन्तु जबकि भार्रत के रार्ष्ट्रपति के पार्स कोई स्वैच्छिक शक्तियार्ं नहीं होतीं, रार्ज्यपार्ल के पार्स कुछ स्वैच्छिक शक्तियार्ं होती हैं, जो रार्ज्य में उसकी स्थिति को सुदृढ़ बनार्ती हैं। रार्ज्यपार्ल की शक्तियों क निम्नलिखित शीर्षकों के अधीन वर्णन कियार् जार् सकतार् है:

कार्यकारी शक्तियार्ँ

रार्ज्यपार्ल रार्ज्य क मुखियार् होतार् है। संविधार्न रार्ज्य की कार्यपार्लिक शक्तियार्ं रार्ज्यपार्ल को सौंपतार् है जिनक प्रयोग उसने प्रत्यक्ष रूप में यार् अपने अधीन कर्मचार्रियों के द्वार्रार् करनार् होतार् है। वह मुख्यमन्त्री की नियुक्ति करतार् है और मुख्यमन्त्री की सिपफार्रिश पर अन्य मन्त्रियों को नियुक्त करतार् है। मन्त्री तब तक पद पर रह सकते हैं जब तक रार्ज्यपार्ल चार्हे। यदि रार्ज्यपार्ल अनुभव करे कि सरकार को बहुमत क विश्वार्स प्रार्प्त नहीं यार् वह उचित ढंग से कार्य नहीं कर रही तो वह रार्ज्य के मुख्यमन्त्री को पद से हटार् सकतार् है जैसार् कि जुलार्ई, 1984 में जम्मू और कश्मीर के रार्ज्यपार्ल श्री जगमोहन ने कियार् थार् जब उन्होंने डॉ फार्रूक अब्दुल्लार् को मुख्यमन्त्री के पद से हटार् दियार् थार्। रार्ज्य में सभी महत्त्वपूर्ण नियुक्तियार्ं (एडवोकेट जनरल, रार्ज्य लोक सेवार् आयोग क चेयरमैन और सदस्य, विश्वविद्यार्लय के उपकुलपति) रार्ज्यपार्ल के द्वार्रार् की जार्ती हैं। परन्तु ऐसार् करते समय, रार्ज्य में रार्ष्ट्रपति रार्ज्य लार्गू होने की स्थिति को छोड़कर, रार्ज्यपार्ल रार्ज्य के मुख्यमन्त्री और मन्त्रि-परिषद् की सिपफार्रिशों पर निर्भर करतार् है। मुख्यमन्त्री को रार्ज्य के प्रशार्सन और मन्त्रि-परिषद् के द्वार्रार् लिए गए निर्णयों से रार्ज्यपार्ल को सूचित करते रहनार् पड़तार् है। रार्ज्यपार्ल रार्ज्य के प्रशार्सन से संबंधित मुख्यमन्त्री से जार्नकारी मार्ंग सकतार् है। वह मुख्यमन्त्री से यह मार्ंग कर सकतार् है कि मन्त्रि-परिषद् में निर्णय लेने से पूर्व किसी मन्त्री ने कोई निर्णय लियार् हो तो उस पर मन्त्रि-परिषद् के द्वार्रार् विचार्र कियार् जार्ए। रार्ष्ट्रपति उच्च न्यार्यार्लय के न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति समय रार्ज्यपार्ल से परार्मर्श भी लेतार् है। रार्ज्यपार्ल रार्ज्य के सभी विश्व-विद्यार्लयों के चार्ंसलर के रूप में कार्य करतार् है।

रार्ज्य क प्रशार्सन रार्ज्यपार्ल के नार्म पर चलार्यार् जार्तार् है। वह उन सभी विषयों जोकि रार्ज्य की विधार्न पार्लिक के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, क प्रशार्सन चलतार् है। वह मन्त्रि-परिषद् के कार्य-व्यवहार्र को उचित ढंग से चलार्ने के लिए नियम बनार्तार् है। वह रार्ज्य सरकार को यह कह सकतार् है कि वह अपने किसी निर्णय पर पुन: विचार्र करें। असम और सिक्किम के रार्ज्यपार्लों को अनुसूचित कबीलों के हितों की रक्षार् करने के लिए विशेष शक्तियार्ं प्रार्प्त हैं।

सार्मार्न्य रूप में रार्ज्यपार्ल अपने सभी कार्यपार्लिक शक्तियों क प्रयोग रार्ज्य मन्त्रि-परिषद् की सिफार्रिश के अनुसार्र करतार् है। रार्ज्यपार्ल के सभी कार्यों के लिए मन्त्री उत्तरदार्यी होते हैं। परन्तु घोषित संकटकाल स्थिति में रार्ज्यपार्ल कार्यकारिणी क वार्स्तविक कार्यपार्लक मुखियार् बन जार्तार् है।

वैधार्निक शक्तियार्ं

रार्ज्यपार्ल रार्ज्य विधार्नपार्लिक क सदस्य नहीं होतार् परन्तु इसके बार्वजूद वह इसक एक अंग मार्नार् जार्तार् है। रार्ज्य विधार्नपार्लिक के द्वार्रार् पार्स किए बिल तब ही कानून बनते हैं जब इन पर रार्ज्यपार्ल हस्तार्क्षर कर देतार् है। वह रार्ज्य विधार्नसभार् के अधिवेशन बुलार् सकतार् है और इनको स्थार्गित कर सकतार् है। वह रार्ज्य विधार्नपार्लिक को भंग कर सकतार् है। सार्मार्न्य रूप में उसके द्वार्रार् इन शक्तियों क प्रयोग रार्ज्य के मुख्यमन्त्री के परार्मर्श के सार्थ कियार् जार्तार् है। रार्ज्य विधार्नसभार् क अधिवेशन रार्ज्यपार्ल के भार्षण से आरंभ होतार् है। वह आम चुनार्वों के पश्चार्त् विधार्नपार्लिक के प्रथम अधिवेशन में भार्षण देतार् है और विधार्नपार्लिक क प्रत्येक वर्ष क प्रथम अधिवेशन रार्ज्यपार्ल के प्रथम अधिवेशन में भार्षण देतार् है और विधनपार्लिक क प्रत्येक वर्ष क प्रथम अधिवेशन रार्ज्यपार्ल के भार्षण से आरंभ होतार् है। यदि वह अनुभव करे कि आंग्ल-भार्रतीय भार्ईचार्रे को रार्ज्य विधार्नसभार् में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलार् तो वह इस भार्ई-चार्रे क सदस्य रार्ज्य विधार्नसभार् में मनोनीत कर सकतार् है। वह किसी भी बिल पर अपनी सहमति रोक सकतार् है यार् किसी भी एक बिल (वित्तीय बिल को छोड़कर) को रार्ज्य विधार्नसभार् को पुन: विचार्र के लिए वार्पस कर सकतार् है। परन्तु यदि वह बिल दूसरी बार्र पार्स हो जार्तार् है तो रार्ज्यपार्ल इस पर अपनी सहमति प्रकट कर अपने अर्थार्त् हस्तार्क्षर करने से इन्कार नहीं कर सकतार्। वह रार्ज्य विधार्नपार्लिक के द्वार्रार् पार्स कुछ बिलों को रार्ष्ट्रपति की स्वीकृति प्रार्प्त करने के लिए सुरक्षित रख सकतार् है। इनमें अनिवाय सम्पत्ति ग्रहण करने से यार् उच्च न्यार्यार्लय के अधिकारों को ठेस पहुंचार्ने से संबंधित बिल शार्मिल होते हैं। जब रार्ज्य विधनपार्लिक क अधिवेशन न चल रहार् हो तो रार्ज्यपार्ल अध्यार्देश जार्री कर सकतार् है। रार्ज्यपार्ल के द्वार्रार् जार्री ऐसे अध्यार्देश की शक्ति वैसी ही होती है जोकि विधार्नसभार् के द्वार्रार् पार्स कानून की होती है। जब रार्ज्य विधार्नपार्लिक क अधिवेशन जिस दिन से आरंभ होतार् है उससे 6 सप्तार्ह पश्चार्त् यह अध्यार्देश लार्गू नहीं रहतार्। यह तो भी समार्प्त हो जार्तार् है यदि रार्ज्य विधार्नपार्लिक इस अध्यार्देश को अस्वीकार करने क प्रस्तार्व पार्स कर देती है।

वित्तीय शक्तियार्ं

रार्ज्य विधार्नपार्लिक में एक वित्तीय बिल रार्ज्यपार्ल की पूर्ण स्वीकृति लेकर ही प्रस्तुत कियार् जार् सकतार् है। वह वाषिक बजट रार्ज्य विधार्न पार्लिक में प्रस्तुत करने के लिए कहतार् है। रार्ज्य क आकस्मिक घटनार् फंड (Contigency Fund) उसके अधिकार में होतार् है और वह इसमें से किसी भी व्यय के आदेश दे सकतार् है और बार्द में इसकी स्वीकृति रार्ज्य विधार्नसभार् से प्रार्प्त की जार्ती हैं वार्स्तव में इन सभी शक्तियों क प्रयोग रार्ज्यपार्ल रार्ज्य मन्त्रि-परिषद् की परार्मर्श के अनुसार्र करतार् है।

न्यार्यिक शक्तियार्ं

रार्ज्यपार्ल की कुछ न्यार्यिक शक्तियार्ं भी हैं। वह जिलार् न्यार्यार्धीशों और अन्य न्यार्यार् अधिकारियों के चयन, उनकी नियुक्तियों और पदोन्नतियों को प्रभार्वित कर सकतार् है। अनुच्छेदों 161 के अधीन रार्ज्य की कार्यपार्लिक के अधिकार-क्षेत्र में पड़ते किसी भी विषय से संबंधित किसी भी कानून के उल्लंघन के कारण दोषी ठहरार्ए और बन्दी बनार्ए किसी भी व्यक्ति के दण्ड को क्षमार् कर सकतार् है, उसके दण्ड को कम कर सकतार् है यार् आम मार्पफी दे सकतार् है, यार् उसकी केद के दण्ड को स्थगित, क्षमार् यार् कम कर सकतार् है। रार्ष्ट्रपति संबंधित रार्ज्य की उच्च न्यार्यार्लय के चीफ जस्टिस और अन्य न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति समय उस रार्ज्य के रार्ज्यपार्ल से भी परार्मर्श करतार् है।

फुटकल शक्तियार्ं

उपर्युक्त वर्णित शक्तियों के सार्थ-सार्थ रार्ज्यपार्ल कुछ अन्य कार्य भी करतार् है। वह रार्ज्य लोक सेवार् आयोग (एस पी एस सी) से वाषिक रिपोर्ट प्रार्प्त करतार् है और इस पर टिप्पणियों के लिए इसको मन्त्रि-परिषद् के पार्स प्रस्तुत करतार् है। फिर वह यह रिपोर्ट और इस पर मन्त्रि-परिषद् की टिप्पणियार्ं विधार्नसभार् के स्पीकर के सुपुर्द करतार् है तार्कि वह इसको विधार्नसभार् में रख सके। यदि वह यह अनुभव करतार् है कि रार्ज्य प्रशार्सन संविधार्न के अनुसार्र नहीं चलार्यार् जार् रहार् तो वह अनुच्छेद 356 के अधीन रार्ष्ट्रपति रार्ज्य लार्गू होने की स्थिति में रार्ज्यपार्ल रार्ज्य प्रशार्सन के वार्स्तविक मुखियार् के रूप में कार्य करतार् है। रार्ष्ट्रपति की ओर से वह कानून और नीतियार्ं लार्गू करके रार्ज्य क प्रशार्सन चलार्तार् है। रार्ष्ट्रपति के रार्ज्य क वार्स्तविक अर्थ रार्ज्यपार्ल क शार्सन होतार् है। वह रार्ज्य सरकार यार् रार्ज्य विधार्नसभार् भंग करने क भी अधिकार रखतार् है। अनुच्छेद 356 के अधीन अपने अधिकारों क प्रयोग करते समय रार्ज्यपार्ल अपने स्व-विवेक से भी कार्य कर सकतार् है।

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