रार्जकोषीय नीति क अर्थ, उद्देश्य, महत्व एवं उपकरण

रार्जकोषीय नीति के अभिप्रार्य, सार्धार्रणतयार्, सरकार की आय, व्यय तथार् ऋण से सम्बन्धित नीतियों से लगार्यार् जार्तार् है। प्रो0 आर्थर स्मिथीज ने रार्जकोषीय नीति को परिभार्षित करते हुए लिखार् है कि- ‘‘रार्जकोषीय नीति वह नीति है जिसमें सरकार अपने व्यय तथार् आगम के कार्यक्रम को रार्ष्ट्रीय आय, उत्पार्दन तथार् रोजगार्र पर वार्ंछित प्रभार्व डार्लने और अवार्ंछित प्रभार्वों को रोकने के लिए प्रयुक्त करती है। इस सम्बन्ध में श्रीमती हिक्स (Mrs. Hicks) क कहनार् है कि ‘‘रार्जकोषीय नीति क सम्बन्ध उस पद्धति से है जिसमें लोक-वित्त के विभिन्न अंग अपने प्रार्थमिक कत्त्ार्व्यों को पूरार् करने के लिए सार्मूहिक रूप से आर्थिक नीति के उद्देश्यों को आगे बढ़ार्ने के लिए प्रयोग में लार्ये जार्ते हैं।’’

उपर्युक्त परिभार्षार् के अनुसार्र, अर्थव्यवस्थार् में सर्वोच्च उद्देश्यों की प्रार्प्ति के लिए रार्जकोषीय नीति व्यय, ऋण, कर, आय, हीनाथ प्रबन्धन आदि की समुचित व्यवस्थार् बनार्ये रखती है, जैसे-आर्थिक विकास, कीमत में स्थिरतार्, रोजगार्र, करार्रोपण, सावजनिक आय-व्यय, सावजनिक ऋण आदि। इन सबकी व्यवस्थार् रार्जकोषीय नीति में की जार्ती है। रार्जकोषीय नीति के आधार्र पर सरकार करार्रोपण करती है। वह यह देखती है कि देश में लोगों की करदार्न क्षमतार् बढ़ रही है अथवार् घट रही है। इन सब बार्तों क अनुमार्न लगार्कर ही सरकार करों क निर्धार्रण करती है। व्यय नीति में भी वे निर्णय शार्मिल किये जार्ते हैं जिनक अर्थव्यवस्थार् पर प्रभार्व पड़तार् है। ऋण नीति क सम्बन्ध व्यक्तियों के ऋणों के मार्ध्यम से क्रय शक्ति को प्रार्प्त करने से होतार् है। सरकारी ऋण-प्रबन्ध नीति क सम्बन्ध ब्यार्ज चुकाने तथार् ऋणों क भुगतार्न करने से होतार् है। रार्जकोषीय नीति आय, व्यय व ऋण के द्वार्रार् सार्मार्जिक उद्देश्यों की पूर्ति करती है। स्मरण रहे, रार्जकोषीय नीति और वित्त्ार्ीय नीति में अन्तर होतार् है। रार्जकोषीय नीति के अन्तर्गत मुख्य रूप से चार्र बार्तों को सम्मिलित कियार् जार्तार् है:

  1. सरकार की करार्रोपण नीति (Taxation Policy), 
  2. सरकार की व्यय नीति (Expenditure Policy), 
  3. सरकार की ऋण नीति (Public Debt Policy), 
  4. सरकार की बजट नीति (Budgetary Policy), 

रार्जकोषीय नीति के उद्देश्य 

किसी भी देश की रार्जकोषीय नीति क मुख्य उद्देश्य सैद्धार्न्तिक रूप से, क्रियार्त्मक वित्त प्रबन्धन (Functional Finance Managemnat) तथार् कार्यशील वित्त प्रबन्धन की व्यवस्थार् करनार् है। दूसरे शब्दों में आर्थिक विकास के लिए आवश्यक एवं पर्यार्प्त मार्त्रार् में धन की व्यवस्थार् करनार् रार्जकोषीय नीति क मुख्य कार्य है। यद्यपि रार्जकोषीय नीति के उद्देश्य किसी रार्ष्ट्र विकास के लिए उसकी परिस्थितियों, विकास सम्बन्धी आवश्यकतार्ओं और विकास की अवस्थार् के आधार्र पर निर्धार्रित किये जार्ते है फिर भी सार्मार्न्य दृष्टि से अल्प-विकसित एवं विकासशील देशों की रार्जकोषीय नीति के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित कहे जार् सकते हैं :

1. पूंजी निर्मार्ण – 

अल्प विकसित देशों में प्रति व्यक्ति वार्स्तविक आय के कम होने के कारण बचतें बहुत कम होती हैं जिसके फलस्वरूप विनियोग हेतु आवश्यक पूंजी क अभार्व बनार् रहतार् है। निम्न आय, अल्प बचतें, कम विनियोग और निम्न उत्पार्दकतार् के कारण निध्र्मार्नतार् के दुष्चक्र (Vicious Circle of Poverty) जन्म लेने लगते है, जिनको तोड़नार् रार्जकोषीय नीति क प्रमुख उद्देश्य मार्नार् जार्तार् है। चूंकि इन देशों में आय के स्तर को देखते हुए, उपभोग की प्रवृित्त (Propensity to Consume) अधिक होती है इसलिए रार्जकोषीय नीति के अन्तर्गत करार्रोपण द्वार्रार् चार्लू उपभोग को कम करके, बचत में वृद्धि करने के प्रयत्न किए जार्ते हैं, तार्कि पूंजी निर्मार्ण के लिए आवश्यक धनरार्शि प्रार्प्त हो सके। प्रो. रार्गनर नर्कसे क मत है कि-’’अल्प-विकसित देशों मे करार्रोपण नीति क उद्देश्य रार्ष्ट्रीय आय में उसी अनुपार्त में वृद्धि करनार् है जो पूंजी निर्मार्ण में लगार्यार् जार्तार् है।’’ यदि अल्प-विकसित देशों में अनार्वश्यक उपभोग पर करार्रोपण द्वार्रार् वार्ंछित रोक न लगार्यी जार्ए तो इसके कुछ घार्तक परिणार्म हो सकते है, जैसे-

  1. देश में पूंजी निर्मार्ण क कार्य यार् तो अवरुद्ध बनार् रहेगार् अथवार् अत्यन्त मन्द गति से होगार्, 
  2. आर्थिक विकास के फलस्वरूप होने वार्ली आय वृद्धि पूर्णतयार् उपभोग कर ली जार्येगी, 
  3. देश की मुद्रार् स्फीतिक दशार्एँ उत्पन्न होने लगेंगी। 

2. रार्ष्ट्रीय आय में वृद्धि – 

पूंजी निर्मार्ण के अलार्वार् रार्जकोषीय नीति क दूसरार् महत्वपूर्ण उद्देश्य रार्ष्ट्रीय आय में वृद्धि करनार् है। यद्यपि रार्ष्ट्रीय आय वृद्धि और रार्जकोषीय नीति क केाइ प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है तथार् रार्जकोषीय नीति परोक्ष रूप से, रार्ष्ट्रीय आय में वृद्धि के लिए सहार्यक सिद्ध हो सकती है। इस दृष्टि से रार्जकोषीय नीति के अन्तर्गत सदैव इस बार्त क प्रयत्न कियार् जार्नार् चार्हिए कि-

  1. करार्रार्पेण द्वार्रार् प्रार्प्त बचतो क तत्काल विनियार्गे कियार् जार्एगार् 
  2. सार्वर्ज निक व्यय आरै सार्वर्ज निक ऋणों की अधिकांश मार्त्रार् नव-निमाण व विकास कायोर्ं की ओर गतिशील की जार्ए, 
  3. देश में निजी उद्यमकर्तार्ओं को कर छूट द्वार्रार् अथवार् वित्त्ार्ीय सहार्यतार् प्रदार्न करके, विनियोग करने के लिए प्रेरित कियार् जार्ए। यह ठीक है कि अल्प-विकसित देशों में नव-प्रवर्तन और उद्यमियों क अभार्व होतार् है। परन्तु प्रो. स्पैंगलर क मत है कि- यह नीति ‘‘ऐसे बहुत से सार्हसियों की कमी को पूरार् कर सकती है।’’ यदि रार्जकोषीय नीति क निर्धार्रण उपर्युक्त उपार्यों की दृष्टि में रखकर कियार् जार्ए तो निश्चित है कि इसमें विनियोजन कार्य को प्रोत्सार्हन मिलेगार् जिससे रार्ष्ट्रीय आय में वृद्धि होगी। 

3. आय व धन वितरण की विषमतार्ओं को कम करनार् – 

आय व धन के वितरण की समार्नतार् बनार्ए रखनार् आर्थिक विकास क केवल लक्ष्य ही नहीं वरन् एक पूर्व आवश्यकतार् भी है। अत: सरकार को चार्हिए कि अपनी रार्जकोषीय नीति क निर्मार्ण इस प्रकार से करे कि धन वितरण की विषमतार्एँ देश में कम से कम हो सकें। इस दृष्टि से रार्जकोषीय नीति के अन्तर्गत निम्न उपार्यों को समिलित कियार् जार् सकतार् है:-

  1. धनी वर्ग पर प्रगतिशील कर (Progressvie Taxes) लगार्ए जार्एँ जिससे कि सरकार को अतिरिक्त रूप से आय प्रार्प्त हो सके पर करों की मार्त्रार् कम रखी जार्ए।
  2. निर्धन अथवार् अल्प आय वर्ग कर करों की मार्त्रार् कम रखी जार्ए। ;पपपद्ध विलार्सितार् की वस्तुओं पर भार्री मार्त्रार् में कर लगार्कर, उन पर किये जार्ने व्यय को विनियोगिक क्षेत्रों की ओर हस्तार्न्तरित कियार् जार्ए। 
  3. सरकार को अपनार् अधिकांश व्यय सार्मार्जिक सेवार्ओं अथवार् विशेष रूप से उन मदों पर करनार् चार्हिए जिनसे निर्धनों को अधिक लार्भ पहुंचतार् हो। 
  4. रार्जकोषीय नीति क ढार्ँचार् इस प्रकार होनार् चार्हिए कि अनुपाजित आय पर यथार्चित रोक लगार्यी जार् सके और विकास के लिए आय (Economic Surplus) की उपलब्धि हो सके। 

अधिकांश प्रतिष्ठित अर्थशार्स्त्रियों क मत थार् कि धन वितरण की विषमतार्एँ पूंजी निर्मार्ण व आर्थिक विकास के लिए आवश्यक है। इसक कारण इन लोगों की दृष्टि में बचत सदैव धनी वर्ग द्वार्रार् की जार्ती है। आज इस मार्न्यतार् के विपरीत प्रो. ड्यूनबरी के विचार्रों के आधार्र पर अब यह सिद्ध कियार् जार् चुक है कि धन की असमार्नतार्ओं की अपेक्षार्, धन के समार्न वितरण होने पर, बचतों के प्रार्प्त होने की सम्भार्वनार् अधिक होती है। इसी प्रकार के कुछ अन्य लोगों द्वार्रार् यह तर्क भी प्रस्तुत कियार् जार्तार् है कि अल्प विकसित देशों में रार्जकोषीय नीति क उद्देश्य आर्थिक विषमतार्ओं को कम करने के स्थार्न पर उत्पार्दन में वृद्धि करनार् होनार् चार्हिए। यह धार्रणार् भी निर्मूल व निरार्धार्र है। देश के आर्थिक विकास हेतु धन वितरण की विषमतार्ओं क कम कियार् जार्नार् अत्यार्वश्यक है।

4. मुद्रार् स्फीतिक दशार्ओं पर नियंत्रण लगार्नार् – 

अल्प-विकसित देशों में विकास की आवश्यकतार्ओं को देखते हुए पूंजी क सर्वथार् अभार्व होतार् है। प्रार्य: देखने में आतार् है कि धन की इस कमी को सम्बन्धित सरकारें हीनाथ प्रबन्ध् ार्न के अन्तर्गत नोट छार्प कर पूरार् करती है। जिससे मुद्रार् स्फीतिक दशार्एँ उत्पन्न होने लगती हैं। बढ़ती हुर्इ कीमतें, न केवल समार्ज के लिए कष्टप्रद हैं बल्कि विकास की लार्गत में भी अनार्वश्यक वृद्धि कर देती हैं। इस दृष्टि से रार्जकोषीय नीति क महत्वपूर्ण कार्य ‘प्रभार्वपूर्ण मार्ँग’ (Effective Demand) को कम करके मुद्रार् प्रसार्र पर रोक लगार्नार् है। मुद्रार् प्रसार्रिक दबार्वों को नियन्त्रित करने के लिए आवश्यक है कि-

  1. जनतार् की अतिरिक्त क्रय शक्ति को करो अनिवाय बचतों एवं सावजनिक ऋणों आदि को द्वार्रार् कम कियार् जार्ए। 
  2. कुछ विशष प्रकार के मुद्रार् स्फीति विरोधी कर (Anti Inflationary Taxes) जैसे अधिलार्भ कर (Super Tax) उपहार्र कर, व्यय कर, विशेष उत्पार्दन कर तथार् विलार्सितार् की वस्तुओं पर कर आदि लगार्ए जार्ने चार्हिए। 
  3. प्रत्यक्ष करो के अतिरिक्त तरल सम्पतियों कैश बैलेन्सेज व पूंजीगत सम्पतियों पर भी कर लगार्ये लार्ने चार्हिए। 
  4. करार्रोपण नीति क आधार्र प्रगतिशील होनार् चार्हिए। 
  5. कर नीति ऐसी होनी चार्हिए कि एेि च्छक बचतो को प्रोत्सार्हित कर सके और अतिरिक्त क्रय शक्ति को नियन्त्रित कर सके। कुछ अर्थशार्स्त्रियों क मत है कि यदि रार्जकोषीय नीति द्वार्रार् प्रभार्व पूर्ण मार्ँग को कम करके, मुद्रार् प्रसार्र पर प्रतिबन्ध लगार्ने क प्रयत्न कियार् गयार् तो इससे उत्पार्दन व विनियोग की प्रेरणार्एँ समार्प्त हो जार्येंगी । जिसके फलस्वरूप आर्थिक विकास क कार्य अवरुद्ध होने लगेगार्। वार्स्तव में ऐसार् सोचनार् भ्रमपूर्ण होगार् क्योंकि प्रभार्वपूर्ण मार्ँग को कम करने क अभिप्रार्य अनार्वश्यक उपभोग को कम करनार् है। 

5. रोजगार्र से सुअवसरों में वृद्धि करनार् – 

रार्जकोषीय नीति के विभिन्न उद्देश्यों में एक उद्देश्य अर्थव्यवस्थार् में पूर्ण रोजगार्र की स्थिति को बनार्ए रखनार् है। प्रो. लुइस क मत है कि देश में उपलब्ध जनशक्ति (Manpower) को पूर्ण रोजगार्र दिलार्यें, बिनार् आर्थिक विकास क लक्ष्य अधूरार् है। यह काम सरकार क है कि वह अपनी मौद्रिक व रोजकोषीय नीति के अन्तर्गत एक ऐसार् वार्तार्वरण तैयार्र करे कि जिसमें सभी लोगों को यथार्शक्ति कार्य करने क सुअवसर उपलब्ध हो सके। संयुक्त रार्ष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के अनुसार्र-’’मार्नवीय हितों को देखते हुए केन्द्रीय सरकार क यह प्रथम कर्तव्य है कि वह उन लोगों को, जो काम करने के योग्य तथार् काम करने के इच्छुक है, उपयोगी ढंग की रोजगार्र दशार्एँ उपलब्ध करार्ए।’’

रार्जकोषीय नीति क महत्व  

रार्जकोषीय नीति में समय-समय पर परिवर्तन होते आये हैं। प्रार्चीन काल में यह मार्नार् जार्तार् थार् कि रार्जकोषीय नीति केवल संकट काल में ही सहार्यक हो सकती है। सार्मार्न्य परिस्थितियों में इसक कोर्इ महत्व नहीं है। समय के बीतने के सार्थ-सार्थ अर्थव्यवस्थार् क स्वरूप परिवर्तित होने लगार्। मुद्रार् क अविष्कार, औद्योगिकीकरण, आर्थिक प्रणार्लियों क जन्म, जनसंख्यार् की वृद्धि, व्यार्पार्र-चक्रों क आनार्, बेरोजगार्री क बढ़नार्, विकास व्यय व युद्ध व्ययें में वृद्धि, मंदीकाल आदि अनेक समस्यार्ओं ने विश्व की अर्थव्यवस्थार् को प्रभार्वित कर दियार् थार्। इन सब समस्यार्ओं के समार्धार्न के लिए यह आवश्यक हो गयार् थार् कि रार्ज्य की आर्थिक क्रियार्ओं में वृद्धि की जार्य। अब रार्ज्य की आर्थिक क्रियार्ओं में निरन्तर वृद्धि होने लगी है। अत: इन समस्यार्ओं के समार्धार्न के लिए रार्जकोषीय नीति की आवश्यकतार् होने लगी।

1930 की विश्वव्यार्पी मन्दी को दूर करने की समस्यार् के लिए प्रो. कीन्स ने रार्जकोषीय नीति की सहार्यतार् लेकर इस बार्त को प्रार्मार्णिकतार् के सार्थ सिद्ध कर दियार् थार् कि बेरोजगार्री और मंदी जैसी समस्यार्ओं को हल कियार् जार् सकतार् है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि देश की अर्थव्यवस्थार् के संचार्लन में रार्जकोषीय नीति क महत्वपूर्ण स्थार्न है। वर्तमार्न समय में तो बिनार् इसके काम नहीं चल सकतार् है। कार्यार्त्मक वित्त के रूप में रार्जकोषीय नीति क महत्वपूर्ण स्थार्न है।

1. मन्दी काल में रार्जकोषीय नीति – 

मन्दी काल में रार्जकोषीय नीति क उद्देश्य उपभोग-प्रवृित्त में वृद्धि करने के उपार्य करनार् तथार् सावजनिक व्यय अथवार् निवेशों में वृद्धि करनार् होगार्, यदि सरकार द्वार्रार् सावजनिक व्यय बढ़ार् दियार् गयार्, तो निजी उद्योगों तथार् व्यार्पार्र-वार्णिज्य में स्फूर्ति आ जार्येगी, जब निजी विनियोग में विस्तार्र होतार् है, तो सरकारी व्यय में कमी कर दी जार्ती है जिससे आर्थिक क्रियार् में कोर्इ शिथिलतार् नहीं आती है। इस प्रकार रोजगार्र में वृद्धि होगी तथार् आय बढ़ेगी तो उपभोग स्वत: ही बढ़ जार्येगार्।

मन्दी के समय कर की दरों में कमी करनार् लार्भदार्यक होतार् है, परन्तु व्यार्वहार्रिक रूप से कर की दरों में कमी करनार् आसार्न काम नहीं है। अत: उचित यह है कि सरकार अपनार् व्यय बढ़ार्ये, परन्तु कर न बढ़ार्ये जार्यें। जब सरकार द्वार्रार् कियार् गयार् व्यय करों से प्रार्प्त होने वार्ली आय से अधिक होतार् है, तो घार्टे क बजट बनार्यार् जार्तार् है। घार्टे की पूर्ति जनतार् से ऋण लेकर की जार्ती है। इससे निष्क्रिय नकद कोषों क उपयोग होतार् है और निजी खर्चों में कोर्इ कमी नहीं आती है। यदि ऋण बैंको से लियार् जार्तार् है, तो अधिक सार्ख क सृजन होतार् है। इसक भार्र किसी पर नहीं पड़तार् है और अर्थव्यवस्थार् को लार्भ होतार् है। सड़कों, रेलों, स्कूलों, नदी-घार्टी योजनार्ओं आदि पर व्यय करके दीर्घकालीन लार्भ प्रार्प्त किये जार् सकते हैं। घार्टे की वित्त व्यवस्थार् मन्दी काल में रोजगार्र बढ़ार्ने क प्रभार्वपूर्ण तरीक है। ध्यार्न रहे कि हीनाथ प्रबन्ध क उपयोग आवश्यकतार् से अधिक न हो।

2. मुद्रार् स्फीति काल में रार्जकोषीय नीति  – 

स्फीति काल में मुद्रार् क चलन अधिक होतार् है, परन्तु मुद्रार् की क्रय-शक्ति में कमी हो जार्ती है। इस स्थिति को नियन्त्रित करने के लिए व्यय को नियन्त्रित करनार् आवश्यक है। यदि मुद्रार् स्फीति युद्ध अथवार् प्रार्कृतिक प्रकोपों अथवार् आर्थिक विकास के कारण हो रही है, तो व्ययों में कमी करनार् कठिन हो जार्तार् है। सरकारी व्ययों में कमी न होने से करों में वृद्धि करके मुद्रार् स्फीति को रोक जार् सकतार् है। करों क निर्धार्रण इस प्रकार से कियार् जार्ये कि लोगों की उपभोग प्रवृित्त्ार् में कमी की जार् सके। दूसरी ओर बचतों को प्रोत्सार्हित करने की योजनार् भी बनार्यी जार्नी चार्हिए। लोगों के आय प्रवार्ह को रोक जार्नार् चार्हिए। सरकार को आकर्षक ब्यार्ज-दरों की सहार्यतार् से लोगो की तरलतार् पसन्दी को कम करनार् चार्हिए।

रार्जकोषीय नीति की सीमार्एँ 

  1. करार्रार्पेण की प्रक्रियार् में यकायक परिवर्तन करनार् आसार्न काम नही  होतार् है। करों में वृद्धि करने से जनआक्रोश भड़क सकतार् है और सरकार करों को कम नहीं करनार् चार्हती है। 
  2. समयार्नसु ार्र सरकारी व्ययार् ें में परिवतर्न करनार् कठिन काम है क्यार्ेिं क सार्वर्ज निक योजनार्ओं को जल्दी-जल्दी बदलार् नहीं जार् सकतार् है। 
  3. सरकारी व्यय प्रार्य: निजी व्यय क ही स्थार्न ले पार्तार् है, सावजनिक व्यय क जितनार् अधिक विस्तार्र होतार् जार्तार् हैं, निजी व्यय कम होतार् जार्तार् है। उदार्हरण के लिए, यदि सरकार स्वयं उद्योग-धन्धों क संचार्लन करने लगे, तो निजी विनियोग कम हो जार्येगार्। अत: यह कहनार् कि सावजनिक व निजी व्यय में वृद्धि करके रार्जकोषीय नीति को प्रभार्वी कियार् जार् सकतार् है, गलत होगार्। 
  4. रार्जकोषीय नीति स्फीति की स्थिति को नियन्त्रित करने में सफल नहीं हो पार्ती है, मंदी-काल में भी रार्जकोषीय नीति द्वार्रार् रोजगार्र बढ़ार्ने में अनेक व्यार्वहार्रिक कठिनार्इयार्ँ सार्मने आती हैं। 
  5. रार्जकोषीय नीति पर रार्जनीतिक दबार्व होतार् है, क्यार्ेिं क रार्जस्व तथार् व्यय से सम्बन्धित सभी परिवर्तनों के लिए संसद की स्वीकृत लेनी होती है। 

उपर्युक्त व्यार्ख्यार् से स्पष्ट है कि रार्जकोषीय एवं मौद्रिक नीति के सम्मिलित प्रयार्सों से अर्थव्यवस्थार् सही दिशार् दी जार् सकती है।

रार्जकोषीय नीति के उपकरण

1. करार्रोपण अथवार् सावजनिक आय- 

आर्थिक विकास क आधार्र कर नीति तथार् सरकार की आय होती है। अत: करार्रोपण करदार्न क्षमतार् के आधार्र पर कियार् जार्नार् उचित है। करार्रोपण इस प्रकार से कियार् जार्य कि उसक बुरार् प्रभार्व काम करने की इच्छार् व योग्यतार् पर न पड़े, सार्थ ही सरकार को आय भी प्रार्प्त हो सके।

2. सावजनिक व्यय- 

रार्जकोषीय नीति क यह महत्वपण्ूर् ार् उपकरण है, सावजनिक व्यय क उद्देश्य लोक कल्यार्ण होनार् चार्हिए। सावजनिक व्यय उत्पार्दक होनार् चार्हिए जिससे आधार्रभूत ढार्ँचे को व्यवस्थित कियार् जार् सके। सावजनिक व्यय इस प्रकार से कियार् जार्य कि इसक बुरार् प्रभार्व काम करने की इच्छार् व योग्यतार् पर नहीं पड़े। देश की आवश्यकतार् के अनुरूप ही सावजनिक व्यय होनार् चहिए। उदार्हरण के लिए, शिक्षार्, स्वार्स्थ्य, विद्युत, सिंचाइ, यार्तार्यार्त, श्रम कल्यार्ण, बीमार् सुरक्षार्, वृद्धार्वस्थार् पेंशन, बार्ल विकास आदि कार्यक्रमों पर अधिक ध्यार्न दियार् जार्नार् अर्थव्यवस्थार् के विकास में सहार्यक होगार्। यदि सावजनिक व्यय गैर-विकास के कार्यक्रमों में कियार् जार्तार् है, तो इसक परिणार्म अच्छार् नहीं होगार्।

3. सावजनिक ऋण नीति – 

रार्जकोषीय नीति के अन्तर्गत सावजनिक ऋणों क भी महत्वपूर्ण स्थार्न होतार् है। ये ऋण आन्तरिक एवं बार्ह्य दोनों प्रकार के होते है। एक विकासशील देश सार्धनों की कमी के कारण अपनार् समुचित विकास नहीं कर पार्तार् है फलत: उसे ऋण लेकर अपनी अर्थव्यवस्थार् क संचार्लन करनार् होतार् है। यदि ऋणों क उपयोग सोच-समझ कर कियार् जार्तार् है, तो इसक लार्भ देश को मिलतार् है। अविवेकपूर्ण ऋण से मूलधन व ब्यार्ज की अदार्यगी की समस्यार् पैदार् हो जार्ती है।

4. बजटीय नीति – 

रार्जकोषीय नीति क यह महत्वपण्ूर् ार् विभार्ग है, बजट वर्षभर क लेखार्-जोखार् प्रस्तुत करतार् है। इसमें आय व व्यय क हिसार्ब होतार् है। बजट सरकार क मागदर्शक होतार् है। इसमें करों, शुल्कों तथार् घार्टे की पूर्ति की व्यवस्थार् तथार् व्ययों क विवरण होतार् है। वर्तमार्न में बजटों क महत्व नहीं रह गयार् है। प्रत्येक सरकार जनहित में आय से अधिक व्यय करके समार्ज व देश में अपनी प्रसिद्धि व सार्ख को बनार्नार् चार्हती है। अत: आज घार्टे के बजटों क चलन है, परन्तु प्रत्येक सरकार लगार्तार्र असार्मार्न्य घार्टे के बजट को नहीं बनार्नार् चार्हती है, क्योंकि एक सीमार् के बार्द घार्टे क बजट देश की अर्थव्यवस्थार् को चौपट कर देतार् है।

भार्रतीय की रार्जकोषीय नीति 

भार्रत की रार्जकोषीय नीति के प्रमुख अंग वे हैं जिनकी चर्चार् ऊपर की गयी है। आगे विस्तार्र से भार्रत के सन्दर्भ में इन अंगो की व्यार्ख्यार् की गयी है। यहार्ँ रार्जकोषीय नीति क जो आधार्र स्तम्भ बजट है उसके बार्रे में जार्नकारी देनार् आवश्यक है।

1. बजट –

देश के वित्त मन्त्री द्वार्रार् सार्ल भर क जो लेखार् भार्रत की संसद में स्वीकृति के लिए रखार् जार्तार् है उसे बजट कहार् जार्तार् है। इसमें विशेष रूप से आय-व्यय क लेखार् होतार् है जिसे हम वाषिक आर्थिक विवरण भी कहते है। बजट के भार्ग (Parts of the Budget) – भार्रत सरकार के बजट को दो भार्गों में बार्टार् गयार् है- 1. रार्जस्व बजट तथार्, 2. पूँजीगत बजट

1. रार्जस्व बजट  – 

रार्जस्व बजट में (i) रार्जस्व आय अथवार् प्रार्प्तियों क तथार् (ii) रार्जस्व व्यय क विवरण होतार् है।

  1. रार्जस्व आय (Revenue Receipts) – रार्जस्व आय अथवार् रार्जस्व प्रार्प्तियों (Revenue Receipts) के अन्तर्गत उस आय को रखार् जार्तार् है जिसक सम्बन्ध उसी वित्त्ार्ीय वर्ष से होतार् है। इसे चार्लू खार्तार्, नार्म से भी जार्नार् जार्तार् है। इस खार्ते में आय के उन स्त्रोतों को शार्मिल कियार् जार्तार् है जिनके बदले में कोर्इ भुगतार्न नहीं करनार् होतार् है, जैसे करों द्वार्रार् प्रार्प्त आय, सावजनिक उपक्रमों के द्वार्रार् अर्जित लार्भ सरकारी उधार्रों पर प्रार्प्त ब्यार्ज तथार् गैर-कर आय। रार्जस्व प्रार्प्तियों से सरकार की देयतार्ओं में किसी प्रकार से वृद्धि नहीं होती है। रार्जस्व प्रार्प्तियों के दो भार्ग है, कर आगम व गैर-कर आगम।
  2. रार्जस्व व्यय (Revenue Expenditure) – रार्जस्व व्यय को दो भार्गों में बार्ँटार् गयार् है-(अ) गैर-विकासार्त्मक व्यय।(ब) विकासार्त्मक व्यय।
    1. गैर-विकासार्त्मक व्यय – इसके अन्तर्गत प्रमुख व्यय हैं, जैसे-सरकारी सेवार्ओं पर होने वार्लार् व्यय। उदार्हरण के लिए-प्रतिरक्षार् व्यय, प्रशार्सनिक सेवार्ओं पर व्यय, आर्थिक सेवार्ओं पर व्यय तथार् सार्मार्जिक तथार् सार्मुदार्यिक सेवार्ओं पर व्यय, ब्यार्ज अदार्यगी, अनुदार्न व सब्सिडी आदि पर व्यय।
    2. विकासार्त्मक व्यय – इसके अन्तर्गत प्रमुख व्यय है, जैस-े सार्मार्जिक एवं सार्मुदार्यिक सेवार्ओं पर व्यय, सार्मार्न्य आर्थिक सेवार्ओं पर व्यय, कृषि, उद्योग, खनिज, उवर्रक सब्सिडी, विद्युत, सिचाइ, लोक निर्मार्ण, परिवहन तथार् रार्ज्यों क सार्ंविधिक अनुदार्न आदि।

2. पूँजी बजट – 

पूँजीगत बजट के दो भार्ग है- (i) पूँजीगत व्यय तथार् (ii) पूँजीगत प्राप्तियार्ँ। नीचे दोनों की संक्षिप्त व्यार्ख्यार् दी जार् रही है-

  1. पूँजीगत व्यय (Capital Expenditure) – पूँजीगत व्यय तो चार्लू वर्ष में होते हैं, परन्तु इनक लार्भ भविष्य में मिलतार् है। इसके अन्तर्गत प्रमुख प्रमुख रूप से- अस्पतार्ल के भवनों क निर्मार्ण, डार्क्टर तथार् नसों की नियुक्ति, दवार्एँ, वेतन आदि आते हैं। 
  2. पूँजीगत प्रप्तियार्ँ – (Capital Receipts) – इसके अन्तर्गत आय के उन समस्त स्त्रोतों को रखार् जार्तार् है, जिनक हमें बदले में भुगतार्न करनार् आवश्यक होतार् है। लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि भुगतार्न उसी वित्त्ार्ीय वर्ष में न होकर आगार्मी किसी वित्त्ार्ीय वर्ष में किये जार्ते हैं। इसके अन्तर्गत, निबल घरेलू ऋण, निबल विदेशी ऋण, ऋण वार्पसी, लोक लेखार् प्रार्प्तियार्ँ आदि आते हैं। 

भार्रत की रार्जकोषीय नीति के दोष –

  1. लोचतार् क अभार्व – रार्जकोषीय नीति क लोचपूर्ण न होनार् इस बार्त के लिए कहार् जार्तार् है कि हमार्रे देश की कर प्रणार्ली को जितनार् लोचदार्र होनार् चार्हिए थार् वह इतनी लोचदार्र नहीं है। बार्र-बार्र कर प्रणार्ली में सुधार्र के लिए अनेक समितियों क गठन भी कियार् गयार्, परन्तु इनसे भी बहुत बड़ार् फार्यदार् नहीं हुआ। भार्रत सरकार को करों से जितनी आय प्रार्प्त होनी चार्हिए थी वह उसे प्रार्प्त नहीं हो सकी है। 
  2. अव्यार्वहार्रिक कर प्रणार्ली – भार्रत की कर प्रणार्ली परम्परार्गत है। इसमें परिवर्तन तो किये जार्ते रहे हैं, परन्तु अभी भी हम इसे वैज्ञार्निक स्वरूप नहीं दे पार्ये हैं। 
  3. घार्टे की वित्त व्यवस्थार् – देश के प्रत्येक बजट मे  घार्टे की वित्त व्यवस्थार् को अपनार्यार् जार्तार् रहार् है। इसमें नियन्त्रण क न लगार्यार् जार्नार् वित्त्ार्ीय कुप्रबन्ध क द्योतक है। लगार्तार्र घार्टे के बजटों के बनार्ये जार्ने के कारण कीमतों में वृद्धि व मुद्रार् प्रसार्र की समस्यार् बनी हुर्इ है।
  4. बचतों क कम होनार् – भार्रत में आज की बचत दर जीडीपी की 23.4 प्रतिशत है जबकि सिंगार्पुर में 49.9 प्रतिशत, मलेशियार् में 4.7 प्रतिशत, व चीन में 39 प्रतिशत है। बचतों के कम होने के कारण पूँजी के निर्मार्ण में भी कमी होती है। हमार्रे देश की रार्जकोषीय नीति बचतों को प्रोत्सार्हित करने में सफल नहीं हो पार्यी है।
  5. प्रशार्सनिक व्ययों में वृद्धि – देश मे  प्रशार्सनिक व्ययार् ें में भार्री वृद्धि होती आयी है। आन्तरिक एवं बार्ह्म सुरक्षार् सम्बन्धी व्यय तो करने ही होते हैं, उन्हें रोक नहीं जार् सकतार् हैं परन्तु प्रशार्सनिक व्ययों में कुछ व्यय ऐसे हैं जिन्हें हम अपव्यय कह सकते हैं। व्ययों को नियन्त्रित करने के अनेक प्रयत्न किये जार्ते रहे हैं, परन्तु अपव्ययों को रोक नहीं जार् सक है। अनुत्पार्दक व्ययों क देश की अर्थव्यवस्थार् पर बुरार् प्रभार्व पड़ रहार् है।
  6. विदेशी ऋणों में वृद्धि – सावजनिक व्ययों में लगार्तार्र वृद्धि और आन्तरिक सार्धनों में कमी के कारण देश को विदेशी ऋणों पर निर्भर रहनार् पड़ार् है। आज भी देश, विदेशी ऋणों की देनदार्री में बुरी तरह से फँस चुक है। प्रतिवर्ष बहुत बड़ी रार्शि ब्यार्ज के भुगतार्न में व्यय करनी पड़ती है। अत: रार्जकोषीय नीति को इसमें भी सफलतार् नहीं मिली है। उपर्यक्त दोषों के कारण भार्रत की रार्जकोषीय नीति अपने उद्देश्यों में सफल नहीं हो पार् रही है।

रार्जकोषीय नीति में सुधार्र के उपार्य 

  1. काले धन के कारण देश में दार्हे री अर्थव्यवस्थार् की लगार्तार्र वृद्धि हो रही है। इससे देश को भार्री क्षति क सार्मनार् करनार् पड़ रहार् है। अत: इसे रोकने के उपार्य खोजे जार्यें। 
  2. प्रत्यक्ष करों की दर में वृद्धि की जार्य, सार्थ ही परोक्ष करों क विस्तार्र कियार् जार्य। 
  3. गैर-योजनार्गत व्ययों में कमी की जार्नी चार्हिए। 
  4. सावजनिक उपक्रमों की व्यवस्थार् में सुधार्र लार्यार् जार्य। 
  5. विदेशी ऋणों पर निर्भरतार् को कम कियार् जार्नार् चार्हिए। 
  6. बढ़ते हुए रार्जस्व घार्टे को कम कियार् जार्य। 
  7. रार्जकोषीय घार्टार् उस वर्ष की अनुमार्नित जीडीपी के 2 प्रतिशत से अधिक नहीं होनार् चार्हिए। 
  8. रार्जकोषीय नीति व मौद्रिक नीति में आपसी तार्लमले बैठार्यार् जार्य।

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