योग में सार्धक एवं बार्धक तत्व
योग शब्द क अर्थ संस्कृत भार्षार् के युज् धार्तु से निश्पन्न होने के सार्थ विभिन्न ग्रन्थों के अनुसार्र योग की परिभार्षार्ओं क अध्ययन कियार् गयार्। योग सार्धनार् के माग में सार्धक के लिए सार्धनार् में सफलतार् हेतु सहार्यक तत्वों तथार् सार्धनार् में बार्धक तत्वों की चर्चार् विभन्न ग्रन्थों के अनुसार्र की गर्इ है। वार्स्तविकतार् में योग सार्धनार् चार्हे आघ्यार्त्मिक लक्ष्य के लिए की जार्ए अथवार् भौतिक सम्पन्नतार् हेतु दोनों ही स्थितियों में बार्धार्ओं क आनार् स्वार्भार्विक ही है अत: यदि सार्धक इन बार्धार्ओं को जार्नकर सार्धक तत्वों पर नियन्त्रण प्रार्प्त कर सके तो वह सार्धनार् में अवश्य सफल रहतार् है इसी तथ्य को अध्ययन करेगें।

योग सार्धनार् मे बार्धक तत्व 

जो योग सार्धक सच्चाइ पूर्वक आध्यार्त्मिक माग क अवलम्बन करतार् है, वह कुछ ऐसी कठिनाइयों एंव अनोखे अनुभव को प्रार्प्त करतार् है, जो उसमें प्रथमत: सार्हसहीनतार् तथार् निरूत्सार्ह उत्पन्न करके बार्धार् उत्पन्न करते है। इसके विपरीत ऋशियो-मुनियो के प्रार्योगार्त्मक अनुभव के आधार्र पर योग सार्धनार् को सुगमतार् से प्रशस्त करने हेतू ऐसे उपार्य है, जो सार्धनार् की बार्धार्ओं को प्रभार्वशार्ली ढंग से दूर कर देते है। अत: योग सार्धनार् हेतू बार्धक एंव सार्धक तत्वों क ज्ञार्न आवश्यक होतार् है, जिसक विवरण शार्स्त्रों के अनुसार्र निम्न प्रकार है-

1. हठप्रदीपिक के अनुसार्र 

अत्यार्हार्र: प्रयार्सश्च प्रजल्पो नियमार्ग्रह:।
 जनसंएरच लौल्य च शड्भिर्योगो विनश्चति।। (ह0प्र0 )

अर्थार्त् अधिक भोजन, अधिक श्रम, अधिक बोलनार्, नियम-पार्लन में आग्रह, अधिक लोक सम्पर्क तथार् मन की चंचलतार्, यह छ: योग को नष्ट करने वार्ले तत्व है अर्थार्त् योग माग में प्रगति के लिए बार्धक है- उपर्युक्त “लोकानुसार्र जो विघ्न बतार्ये गये हैं, उनकी व्यार्ख्यार् अधोवर्णित है-

अत्यार्हार्र:- आहार्र के अत्यधिक मार्त्रार् में ग्रहण से शरीर की जठरार्ग्नि अधिक मार्त्रार् में खर्च होती है तथार् विभिन्न प्रकार के पार्चन-संबधी रोग जैसे अपच, कब्ज, अम्लतार्, अग्निमार्ंघ आदि उत्पन्न होते है। यदि सार्धक अपनी ऊर्जार् सार्धनार् में लगार्ार्ने के स्थार्न पर पार्चन क्रियार् हेतू खर्च करतार् है यार् पार्चन रोगों से निरार्करण हेतू शट्कर्म, आसन आदि क्रियार्ओं के अभ्यार्स में समय नष्ट करतार् है तो योगसार्धनार् प्रार्कृतिक रुप से बार्धित होती है।

अत: शार्स्त्रों में कहार् गयार् है कि-

 सुस्निग्धमधुरार्हार्रष्चर्तुयार्ंश विवर्जित: 

 भुज्यते शिवसंप्रीत्यै मितार्हार्र: स उच्यते 

अर्थार्त ( जो आहार्र स्निग्ध व मधुर हो और जो परमेश्वर को सार्दर समर्पित कर आमार्शय के 3/4 भार्ग को पूर्ण करने के लिए ग्रहएार् कियार् जार्ए, जिससे कि आमार्शय क 1/4 भार्ग वार्यु संचरण व सुचार्रु रुप से पार्चन क्रियाथ छोडार् जार्ए, ऐसे मार्त्रार् आधार्रित रुचिकर भोजन को स्वार्त्मार्रार्म जी मितार्हार्र की संज्ञार् देते है। इसी प्रकार केशव गीतार् में कहार् गयार् है-कि-

अति खार्वे अति थोडार् खार्वे अति सोवे अति जार्गर पार्ये 

यह स्वभार्व रार्खे यदि कोय उसक योग सिद्ध नहीं होय 

अर्थार्त अत्यधिक भोजन एवं अत्यधिक थोडार् भोजन एवं अत्यधिक सोनार् एवं अत्यधिक जार्गनार्! इस प्रकार क स्वभार्व यदि कोर्इ सार्धक रखतार् है, तो उसक योग कभी सिद्ध नहीं हो सकतार्। इसी प्रकार घेरण्ड ऋशि ने कहार् है, कि- मितार्हार्री न होने के स्थार्न पर यदि सार्धक अत्यार्हार्री आचार्र-संहितार् क पार्लन करतार् हैे, तो नार्नार् प्रकार के रोगों से ग्रसित होकर योग मे सफलतार् प्रार्प्त नहीं कर सकतार्। अत: सार्धक को अत्यार्हार्र की प्रवृत्ति को त्यार्गनार् चार्हिए। शरीर को धार्रण करने में समर्थ होने के कारण धार्तु नार्म को प्रार्प्त हुए वार्त, पित्त और कफ की न्यूनार्धिकतार् खार्ये तथार् पिये हुए आहार्र पदाथों के परिणार्मस्वरुप रस की न्यूनार्धिकतार् को व्यार्धि अथवार् रोग कहते है। व्यार्धि होने पर चित्त वृत्ति उसमें अथवार् उससे दूर करने के उपार्यों में लगी रहती है। इससे वह योग में प्रवृत्त नहीं हो सकती। इसी कारण व्यार्धि की गणनार् योग के विघ्नों में होती है। अजीर्ण, नींद की खुमार्री, अति परिश्रम प्र्रवृत्ति से वार्ह्यकारवृत्ति क अभार्व हो जार्तार् है। अजीर्ण आदि लय के कारणरुप विघ्नों के निवार्रण करने के लिए पथ्य और लघु भोजन करनें से और प्रत्येक व्यवहार्र में युक्ति तथार् नियम के अनुसार्र चलने से एवं उत्थार्न के प्रयत्न द्वार्रार् चित्त को जार्गृत करने से विघ्न दूर होते है। इस विषय में श्री कृश्ण भगवार्न् ने भी अर्जुन के प्रति कहार् है-

 नार्त्यश्रतस्तु योगार्सित न चैकान्तमनश्रत:। 

 न चार्ति स्वप्नशील जार्ग्रतो नैव चाजुन ।। गीतार् 

अर्थार्त (जो अधिक भोजन करतार् है, जो बिल्कुल बिनार् खार्ये रहतार् है, जो बहुत सोतार् है तथार् जो बहुत जार्गतार् है, उसके लिए हे अर्जुन योग नहीं है बल्कि-

युक्तार्हार्रविहार्रस्य युत्कचेश्टस्य कर्मसु। 

युत्कासवपनार्ववोधस्य योगो भवति दु:खहार्।। गीतार् 

ज्ो नियमपूर्वक भोजन करतार् है नियमित आहार्र-विहार्र करतार् है। उसके लिए योग दु:ख क नार्श करने वार्लार् होतार् है।

प्रयार्स- योग सार्धक को अत्यधिक शार्रीरिक व मार्नसिक श्रम से बचनार् चार्हिए। अत्यधिक शार्रीरिक व मार्नसिक श्रम रार्जसिक व तार्मसिक गुणों की वृद्धि के सार्थ-सार्थ शरीरस्थ शार्रीरिक व मार्नसिक ऊर्जार्ओं में असंतुलन पैदार् करते हैं अत: योग सार्धक को अतिप्रयार्स त्यार्गनार् चार्हिए।

प्रजल्प:- अधिक बोलने की व्यार्वहार्रिकतार् से शार्रीरिक समय भी नष्ट होतार् है। गप-शप लडार्ने में समय व्यतीत करने से लोकसम्पर्क में वृद्धि होती है, और यही वृद्धि नकारार्त्मक वृत्तियों जैसे र्इष्र्यार्, द्वेश, लोभ, मोह आदि उत्पन्न कर योग माग में बार्धक बनती है।

नियमार्ग्रह – योग सार्धक के लिए शार्स्त्रोक्त यार् सार्मार्जिक धामिक मार्न्यतार्ओं के अनुसार्र नियमों क सख्त पार्लन आवश्यक नही है- जैसे यदि प्रार्त: काल ठंडे पनी से स्नार्न योग सार्धनार् के लिए आवश्यक मार्नार् गयार् है, तो रोगार्वस्थार् यार् अत्यन्त सर्दी के मौसम में इस नियम क पार्लन आवश्यक नहीं है। इन हार्लार्तों में थोडे ठण्डार् जल क प्रयोग भी हो सकतार् है। अत्यधिक नियमार्ग्रह योगसार्धनार् माग में बार्धक है।

जनसंग- अत्यधिक लोकसम्पर्क भी शार्रीरिक व मार्नसिक ऊर्ज्ार्ार् àार्स कर नष्ट करतार् है। जितने लोगों के सार्थ सम्पर्क होगार्, उतनी ही आपकी योगसार्धनार् माग के बार्रे में नोंक- झोंक मन व शरीर को अस्थिर कर योगमाग की बार्धार् बनेगी। यह त्यार्ज्य है।

चंचलतार्- यह वृत्ति भी योगसार्धनार् माग में बार्धक है। शरीर की अस्थिरतार् दीर्घ समयार्वधि की सार्धनार् हेतु बार्धक बनती है। नकारार्त्मक वृत्तियार्ं जैसे र्इष्र्यार्, द्वेश आदि मन की चंचलतार् बढ़ार्कर योग माग में विघ्न उत्पन्न करती है। सार्धनार् की अनियमिततार् जैसे- एक दिन तो सुबह चार्र बजे से सार्धनार् की दूसरे दिन आलस्यवश सुबह 7 बजे उठकर की। इस तरह की अस्थिनतार् भी योगसार्धनार् में बार्धक बनती है। चित्तविक्षेपकों की ही योगार्न्तरार्य कहते हैं जो चित्त को विक्षिप्त करके उसे एकाग्रतार् को नष्ट कर च्युत कर देते है उन्हें योगार्न्तरार्य अथवार् योगविघ्न कहार् है। ‘योगस्य अन्त: मध्ये आयार्न्ति ते अन्तरार्यार्:’। ये योग के मध्य में आते है।, इसलिये इन्हें योगार्न्तरार्य कहार् जार्तार् है। विघ्नों से व्यथित होकर योगसार्धक सार्धनार् को बीच में ही छोडकर चल देते है। यार् तो विघ्न आयें ही नहीं अथवार् यदि यार् जार्यें तो उनको सहने की शक्ति चित्त में आ जार्ये, ऐसी कृपार् र्इश्वर ही कर सकतार् है। यह तो सम्भव नहीं कि विघ्न न आयें। ‘श्रेयार्ंसि बहुविघ्नार्नि’ शुभकार्यो में विघ्न आयार् ही करते है। उनसे टकरार्ने क सार्हस योगसार्धक में होनार् चार्हिए।

2. योगसूत्र के अनुसार्र- 

चित्त के विक्षेपक नौ अन्तरार्य हैं- व्यार्धि, स्त्यार्न, संशय, प्रमार्द, आलस्य, अविरति, भ्रार्न्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व और अनवस्थितत्व। उक्त नौ अन्तरार्य ही चित्त को विक्षिप्त करते है। अत: ये योगविरोधी है। चित्तवृत्तियों के सार्थ इनक अन्वयव्यतिरेक है। अर्थार्त् इन विक्षेपों के होने पर प्रमार्णार्दि वृत्तियॉं होत है। जब ये नहीं होते तो वृत्तियॉं भी नही होती। वृत्तियों के अभार्व में चित्त स्थिर हो जार्तार् है। इस प्रकार चित्तविक्षेप के प्रति ये उक्त नौ अन्तरार्य ही कारण है।

1 व्यार्धि- ‘धार्तुरसकरणवैशम्यं व्यार्धि:’ धार्तुवैशम्य, रसवैशम्य तथार् करणवैशम्य को व्यार्धि कहते है। वार्त, पित्त और कफ ये तीन धार्तुएं है। इनमें से यदि एक भी कुपित होकर न्यून यार् अधिक हो जार्ये तो यह धार्तुवैशम्य कहलार्तार् है। जब तक देह में वार्त, पित्त और कफ समार्न मार्त्रार् में हैं तो तब इन्हें धार्तु कहार् जार्तार् है। जब इनमें विषमतार् आ जार्ती है तब इन्हें दोश कहार् जार्तार् है। धार्तुओं की समतार् में शरीर स्वस्थ रहतार् है। विषमतार् में रूग्ण हो जार्तार् है। आहार्र क अच्छी तरह से परिपार्क न होनार् रसवैशम्य कहलार्तार् है। यही शरीर में व्यार्धि बनार्तार् है। ज्ञार्नेन्द्रियों तथार् कर्मेन्द्रियों की शक्ति क मन्द हो जार्नार् करणवैशम्य है। योगसार्धनार् के लिए सशक्त और दृढ इन्द्रियों की आवश्यकतार् होती है। धार्तु, रस तथार् करण इन तीनों के वैशम्य को व्यार्धि कहते हैं। रोगी शरीर से समार्धि क अभ्यार्स सम्भव नहीं। अत: व्यार्धि समार्धि के लिए अन्तरार्य है। कास, श्वार्स आदि दैहिक रोगों को व्यार्धि कहते हैं तथार् मार्नविक रोग को व्यार्ार्धि जैसे- स्मरण शक्ति क अभार्व, उन्मार्द, अरुचि, घृणार्, काम, क्रोध आदि। आधि शब्द के ‘वि’ उपसर्ग के योग से व्यार्धि शब्द बनतार् है- ‘विशेषेण अधीयते अनुभूयते मनसार् इति व्यार्धि:। चूँकि शार्रीरिक रोग मन को आधि की तुलनार् में अधिक कष्टकारक अनुभूत होतार् है, इसलिए शार्रीरिक रोग क व्यार्धि नार्म साथक सिद्ध होतार् है।

2 स्त्यार्न- ‘स्त्यार्नं अकर्मण्यतार् चित्तस्य’ अर्थार्त् चित्त की अकर्मण्यतार् को स्त्यार्न कहते हैं। समार्धि क अभ्यार्स करने की इच्छार् तो चित्त में होती है किन्तु वैसार् सार्मथ्र्य उसमें नहीं होतार्। केवल इच्छार् से योग सिद्ध नहीं होतार्, अपितु उसमें योगार्भ्यार्स की शक्ति होनी चार्हिए। पुत्रों की आसक्ति, विषयभोग की लार्लसार्एं तथार् जीविकोपाजन के व्यार्पार्र चित्त को उलझार्ये रखते हैं कि चित्त अकर्मण्यतार् अनुभव करतार् है। अकर्मण्यतार् समार्धि में अन्तरार्य है।

3 संशय- ‘उभयकोटिस्पृग् विज्ञार्नं संशय:’ अर्थार्त् यह भी हो सकतार् है और वह भी हो सकतार् है। इस प्रकार के ज्ञार्न को संशय कहते हैं। योग सार्धनार् के विषय में जब सार्धक को कभी-कभी संशय होतार् है कि मैं योग क अभ्यार्स कर सकूंगार् यार् नहीं? क्यार् मुझे सफलतार् मिलेगी? क्यार् समार्धि से कैवल्य प्रार्प्त हो सकेगार्? हो सकतार् है मेरार् परिश्रम व्यर्थ चलार् जार्ये? तब यह संशयार्त्मक ज्ञार्न योग क विघ्न बन जार्तार् है।

4 प्रमार्द- ‘समार्धिसार्धनार्नार्मभार्वनम्’ – समार्धि के सार्धनों में उत्सार्ह पूर्वक प्रवृत्ति न होनार् प्रमार्द कहलार्तार् है। समार्धि क अभ्यार्स प्रार्रम्भ कर देने पर उसमें वैसार् ही उत्सार्ह और दृढतार् निरन्तर बनी रहनी चार्हिए जैसार्ार् उत्सार्ह प्रार्रम्भ में थार्। प्रार्य: युवार्वस्थार् क मद, धन और प्रभुत्व क दर्प तथार् शार्रीरिक सार्मथ्र्य क पद सार्धक के उत्सार्ह को शिथिल कर देतार् है। अत: प्रमार्द समार्धि में अन्तरार्य है।

5 आलस्य- ‘आलस्यं कायस्य चित्तस्य च गुरुत्वार्दप्रवृत्ति:’ काम के आधिक्य से शरीर तथार् तमोगुण के आधिक्य से चित्त भार्रीपन क अनुभव करतार् है। शरीर और चित्त के भार्री होने से समार्धि के सार्धनों में प्रवृत्ति नहीं होती, इसी मार् नार्म आलस्य है। प्रमार्द और आलस्य में बहुत अन्तर है। प्रमार्द प्रार्य: अविवेक से उत्पन्न होतार् है। आलस्य में अविवेक तो नहीं होतार् किन्तु गरिष्ठ भोजन के सेवन से शरीर और चित्त भार्री हो जार्तार् है। यह भी योग सार्धनार् माग में अन्तरार्य कहलार्तार् है।

6 अविरति- ‘चित्तस्य विषयसम्प्रयोगार्त्मार् गर्ध: अविरति:’- शब्दार्दि विषयों के भोग से तृष्णार् उत्पन्न होती है। तृष्णार् वैरार्ग्य क शत्रु है। समार्धि के लिये वैरार्ग्य प्रमुखतम सार्धन है। अत: वैरार्ग्यार्भार्व योग क अन्तरार्य है। कोमलकान्त वचन, उनके अंगो को मोहक स्पर्श, पुष्पार्दि क आ दक गन्ध तथार् स्वार्दिश्ट भोज्य पेय आदि व्यंजनों क रस कभी-कभी तत्वज्ञार्न को भी आवृत्त करके सार्धक को संसार्र में आसक्त बनार् देतार् है। विषयों के प्रति यह आसक्ति ही अविरति हैं। यह अविरति योग क महार्न् विध्न कहार् गयार् है।

7 भ्रार्न्तिदर्शन- ‘भ्रार्न्तिदर्शन विपर्ययज्ञार्नम्’- अर्थार्त् मिथ्यार्ज्ञार्न को भ्रार्न्तिदर्शन कहते है। अन्य वस्तु में अन्य वस्तु क ज्ञार्न ही मिथ्यार् ज्ञार्न है। जब सार्धक योग के सार्धनों को असार्धन और असार्धनों को सार्धन समझने लगतार् है तो यह भ्रार्न्तिदर्शन योग क विघ्न बन जार्तार् है।

8 अलब्धभूमिकत्व- ‘अलब्धभूमिकत्वं समार्धिभूमेरलार्भ’:- अर्थार्त् समार्धि की किसी भी भूमि की प्रार्प्ति न होनार् भी योग में विध्न है। समार्धि की चार्र भूमियॉ है- सवितर्क, निर्वितक, सविचार्र तथार् निर्विचार्र। जब प्रथम भूमि की प्रार्प्ति हो जार्ती है तो योगी क उत्सार्ह बढ़ जार्तार् है। वह सोचतार् है कि जब प्रथम भूमि प्रार्प्त हो गयी है तो अन्य भूमियॉं भी अवश्य ही प्रार्प्त होगी। परन्तु किसी कारण से उनकी प्रार्प्ति न होनार् अलब्धभूमिकत्व कहार् गयार् है। यह भी योग में अन्तरार्य है।

9 अनवस्थित्व- ‘लब्धार्यार्ं भूमौ चित्तस्यार्प्रतिष्ठार् अनवस्थितत्वम्’ यदि किसी प्रकार मधुमती आदि भूमियॉं में से किसी एक की प्रार्प्ति हो जार्ये किन्तु उसमें निरन्तर चित्त की स्थिति न हो तो यह अनवस्थितत्व कहलार्तार् है। इस प्रकार नौ चित्तविक्षेप योग के अन्तरार्य कहलार्ते है। इन्ही को चित्त क मल तथार् येार्ग प्रतिपक्ष भी कहार् गयार् है। इन चित्तविक्षेपों के पॉंच सार्थी भी है। जो इन अन्तरार्यों के होने पर स्वत: हो जार्ते है।

 A. दुख- दुख के बार्रे में व्यार्स जी कहते है।
 ‘येनार्भिहतार्: प्रार्णिनस्तदुपघार्तार्य प्रयतन्ते तद्दु:खम्’ योगसूत्र व्यार्सभार्श्य 1/31

 जिसके सार्थ सम्बन्ध होने से पीड़ित हुए प्रार्णी उस प्रतिकूल वेदनीय हेय दु:ख तीन प्रकार के है- आध्यार्त्मिक, आधिभौतिक तथार् आधिदैविक। आध्यार्त्मिक दुख भी दो प्रकार के होते है शार्रीरिक और मार्नसिक। आधिभौमिक शब्द की रचनार् क विचार्र कियार् जार्ए तो ज्ञार्त होतार् है कि यह शब्द भूत शब्द से बनार् है। भूत शब्द क अर्थ है प्रार्णी अर्थार्त् प्रार्णियों के द्वार्रार् दिये गए दु:खों को आधिभौतिक कहार् जार्तार् है। प्रार्णी योनिज, स्वेदज, अण्डज तथार् उद्भिज से चार्र प्रकार के होते है। दु:खों के तृतीय प्रकार क नार्म आधिदैविक है जिसक अर्थ है दैविक शक्तियों के द्वार्रार् दिये गए दु:ख। दैविक शक्तियों के रूप में अग्नि, जल और वार्यु की गणनार् की जार्ती है। ये तीनों प्रत्येक के लिए अति आवश्यक है परन्तु आवश्यकतार् से अधिक यार् कम होने पर ये दु:खों के उत्पार्दक होते है। जैसे-अग्नि यदि हमार्रे उदर अथवार् रसोर्इ घर में पर्यार्प्त मार्त्रार् में रहे तो सुखद परन्तु यदि कम यार् अधिक हो तो असहनीय होकर दु:खो क कारण बन कर नार्शवार्न् हो जार्ती है। इसी प्रकार से वार्यु और जल को समझनार् चार्हिए। 

B. ठण्दौर्मनस्य- अभिलार्शित पदाथ विषयक इच्छार् की पूर्ति न होने से चित्त में जो क्षोभ होतार् है। उसे दौर्मनस्य कहार् जार्तार् है जब प्रयार्स करने पर भी इच्छार् की पूर्ति नहीं होती तो चित्त व्यार्कुल होतार् है। यह दौर्मनस्य भी दु:ख क सार्थी है। कहार् गयार् है-

 इच्छार्व्यार्घार्तार्त् चेतस: क्षोभ: दौर्मनस्यम्। योगसूत्र व्यार्सभार्श्य 1/31 

C. गमेजयत्व- जो शरीर के हार्थ, पैर शिर आदि अंगो की कम्पित अवस्थार् है, वह अंगमेजयत्व कहलार्ती है- यत् अंगार्नि एजयति कम्पयति तद् अंगमेजयत्वम्’ व्यार्धि आदि अन्तरार्य शरीर को दुर्बल बनार् देती हैं जिससे अंगो में कम्पन होने लगतार् है। यह अंगमेजयत्व आसन, प्रार्णार्यार्म आदि में व्यवधार्न उपस्थित करतार् है। अत: विक्षेप क सार्थी होने से समार्धि क प्रतिपक्षी है।

D.  श्वार्स- जो बार्हार््र वार्यु क नार्सिकाग्र के द्वार्रार् आचमन करतार् है, वह श्वार्स कहलार्तार् है अर्थार्त् भीतर की ओर जार्ने वार्लार् प्रार्णवार्यु श्वार्स है। यह प्रार्णक्रियार् यदि निरन्तर चलती रहे, कुछ समय के लिए भी न रूके तो चित्त समार्हित नहीं रह सकतार्। अत: यह श्वार्स रेचक प्रार्णार्यार्म क विरोधी है। अत: यह समार्धि क अन्तरार्य है-

प्रार्णो यद् बार्हार््रं वार्युमार्चमति स श्वार्स:। 

E. प्रश्वार्स- जो प्रार्ण भीतर की वार्यु को बार्हर निकालतार् है, वह प्रश्वार्स कहलार्तार् है। यह श्वार्स क्रियार् भी निरन्तर चलती रहती है। यह भी समार्धि के अंगभूत पूरक प्रार्णार्यार्म क विरोधी होने से समार्धि क विरोधी है। अत: विक्षेप क सार्थी होने से योगार्न्तरार्य कहार् जार्तार् है।

योग सार्धनार् में सार्धक तत्व- 

1. हठप्रदीपिक के अनुसार्र 

उत्सार्हार्त् सार्हसार्द् धैर्यार्त् तत्वज्ञार्नार्च्च निश्चयार्त्।
जनसंगपरित्यार्गार्त् शडभिर्योग: प्रसिद्वयति:।। ह0 प्र0 1/16

अर्थार्त उत्सार्ह, सार्हस, घौर्य, यथाथज्ञार्न संकल्प तथार् लोकसंग क परित्यार्ग इन छ: तत्वों से योग की सिद्वि होती है, अत: ये योग के सार्धक तत्व है।

उत्सार्ह- योग सार्धनार् में प्रवृत्त होने के लिए उत्सार्ह रूपी मनोस्थिति क होनार् आवश्यक है। उत्सार्ह भरे मन से कार्य प्रार्रभं करने से शरीर, मन व इन्द्रियो में प्रार्ण संचार्र होकर सभी अंग सार्धनार् में कार्यरत होने को प्रेरित हो जार्ते है। अत: उत्सार्हरूपी मनोस्थिति की कुुजी है।

सार्हस- योगसार्धनार् माग मे सार्हस क भी गुण होनार् चार्हिए। सार्हसी सार्धक योग की कठिन क्रियार्ंए जैसे- वस्त्रधौति, खेचरी आदि की सार्धनार् कर सकतार् है। पहले से ही भयभीत सार्धक क्रियोओ के माग्ार् की और नही बढ़ सकतार्।

धैर्य- योगसार्धक में घीरतार् क गुण होनार् अत्यार्वष्यक हैं। यदि सार्धक रार्तो-रार्त सार्धनार् में सफलतार् चार्हतार् है तो ऐसार् अधीर सार्धक बार्धार्ओं से घिरकर पथभ्रस्ट हो जार्तार् है। सार्धक को गुरूपदेश से संसार्र की बार्धार्ओं यार् आन्तरिक स्तर की विपदार्ओ क धैर्य पूर्वक निरार्करण करनार् चार्हिए।

तत्वज्ञार्न- योगमाग पर चलने से पहले आवश्यक है कि सार्धक सार्धनार् माग क उचित ज्ञार्न शार्स्त्रों व गुरूपदेशों द्वार्रार् ग्रहण करे। भली-भार्ति ज्ञार्न न होने पर सार्धनार् मे समय नष्ट होगार् व नार्नार् प्रकार की बार्धार्एं उत्पन्न होकर मन भी विचलित होगार्।

दृढ़-निश्चय- किसी सार्ंसरिक कार्य को प्रार्रम्भ करने से पहले दृढ़-निश्चय की भार्वनार् आवश्यक है। जहार् निश्चय में ढील हुर्इ वहीं माग्ार् बार्धित हो जार्येगार्। अत: योगसार्धनार् माग में प्रवृत्त होने से पहले दृढ़-निश्चय की भार्वनार् अत्यन्त आवश्यक है।

जनसंग परित्यार्ग- सार्मार्जिक व धामिक स्तर पर उत्पन्न बार्धार्ओ से बचार्व हेतू अधिक जनसम्पर्क त्यार्गनार् चार्हिए। अधिक जनसम्पर्क से शार्रीरिक व मार्नसिक ऊर्जार् क ह्रार्स होतार् है। योग-सार्धनार् हेतु अधिक जनसम्पर्क त्यार्ज्य है। हठप्रदीपिक में ही अन्यत्र कहार् गयार् है कि-

हठविद्यार् पर गोप्यार् योगिनार्ं सि़द्धमिच्छतार्म् 

 योग में सिद्धि की इच्छार् रखने वार्ले सार्धको को यह हठविद्यार् नितार्न्त गुप्त रखनी चार्हिए। गुप्त रखने से यह शक्तिशार्लिनी होती है, तथार् प्रकट करने पर यह शक्तिविहीन हो जार्ती है। इसी प्रकार अन्यत्र कहार् गयार् हैं कि- 

ब्रहमचार्री मितार्हार्री त्यार्गी योगपरार्यण:। 

अब्दार्दूध्र्व भवेत् सिद्धो नार्त्र कार्यविचार्रणार्।। 

जिसने ब्रहमचर्य क पार्लन कियार् हो, ऐसार् सार्धक एक वर्ष यार् उससे कुछ अधिक समय में सिद्वि प्रार्प्त कर लेतार् है, इसमे कोर्इ संदेह नहीं। निश्कर्ष यह है कि ब्रहमचर्य, मितार्हार्र, त्यार्ग व योग के प्रति सत्कार भार्व योग सार्धनार् में सार्धक तत्च है।

2. योगसूत्र के अनुसार्र- 

 मैत्री, करूणार्, मुदितार् और उपेक्षार्- इन चार्र प्रकार की भार्वनार्ओं से भी चित्त शुद्व होतार् है। और वृत्तिनिरोध मे समर्थ होतार् है-

‘मैत्रीकरूणार्मुदितोपेक्षार्णार्ंसुखदु:खपुण्यार्पुण्यविषयार्णार्ं भार्वनार्तष्चित्तप्रसार्दनम्’ यो.सू.1/33 

 सुसम्पन्न पुरुषों में मित्रतार् की भार्वनार् करनी चार्हिए, दुखी जनों पर दयार् की भार्वनार् करें। पुण्यार्त्मार् पुरुषों में प्रसन्नतार् की भार्वनार् करे तथार् पार्प कर्म करने के स्वभार्व वार्ले पुरूषों में उदार्सीनतार् क भार्व रखे। इन भार्वनार्ओं से चित्त शुद्व होतार् है। शुद्व चित्त शीघ्र ही एकाग्रतार् को प्रार्प्त होतार् है।

संसार्र में सुखी, दु:खी, पुण्यार्त्मार् और पार्पी आदि सभी प्रकार के व्यक्ति होत है। ऐसे व्यक्तियों के प्रति सार्धरणजन क अपने विचार्रों के अनुसार्र रार्ग, द्वेश आदि उत्पन्न होनार् स्वार्भार्विक है। किसी व्यक्ति को सुखी देखकर दूसरे अनुकूल व्यक्ति क उसमें रार्ग उत्पन्न हो जार्तार् है, प्रतिकूल व्यक्ति को द्वेश व र्इष्र्यार् आदि। किसी पुण्यार्त्मार् के प्रतिश्ठित जीवन को देखकर अन्य जन के चित्त में र्इष्र्यार् आदि क भार्व उत्पन्न हो जार्तार् है। उसकी प्रतिष्ठार् व आदर को देखकर दूसरे अनेक जन मन में जलते है, हमार्रार् इतनार् आदर क्यों नही होतार् ? यह र्इष्र्यार् क भार्व है। इसमें प्रेरित होकर ऐसे व्यक्ति पुण्यार्त्मार् में अनेक मिथ्यार्दोशों क उद्भार्वन कर उसे कलंकित करने क प्रयार्स करते देखे जार्ते है। इस प्रकार परनिन्दार् की भार्वनार् असूयार् है। दु:खी को देखकर प्रार्य: सार्धार्रण जन उससे घृणार् करते है, ऐसी भार्वनार् व्यक्ति के चित्त को व्यथित एवं मलिन बनार्ये रखती है। यह समार्ज की सार्धार्रण व्यार्वहार्रिक स्थिति है।

योगमाग पर चलने वार्ले सार्धक ऐसी परिस्थिति से अपने आपको सदार् बचार्ये रखने क प्रयार्स करें। सार्धक के लिये यह अत्यन्त आवश्यक है कि उसक चित्त र्इष्र्यार् तथार् असूयार् आदि मलों से सर्वथार् रहित हो, यह स्थिति योग में प्रवृत्ति के लिये अनुकुल होती है। निर्मल-चित्त सार्धक योग में सफलतार् प्रार्प्त करने क अधिकारी होतार् है। सुखी जनों को देखकर सार्धक उनके प्रति मित्रतार् की भार्वनार् बनार्ये। मित्र के प्रति कभी र्इष्र्यार् क भार्व उत्पन्न नहीें होतार्। दु:खी जनों के प्रति सदार् करूणार्-दयार् क भार्व, उनक दु:ख किस प्रकार दूर कियार् जार् सकतार् है इसके लिए उन्हें सन्माग दिखार्ने क प्रयार्स करे। इससे सार्धक के चित्त में उनके प्रति कभी धृणार् क भार्व उत्पन्न नही होने पार्येगार्। इससे दोनों के चित्त में शार्न्ति और सार्ंत्वनार् बनी रहेगी। इसी प्रकार पुण्यार्त्मार् के प्रति सार्धक हर्ष क अनुभव करे। योग स्वयं ऊॅंचे पुण्य क माग है। जब दोनों एक ही पथ के पथिक है तो हर्ष क होनार् स्वार्भार्विक है। संसार्र में सन्माग और सद्विचार्र के सार्थी सदार् मिलते रहें, तो इससे अधिक हर्ष क और क्यार् विषय होगार्। पार्पार्त्मार् के प्रति सार्धक क उपेक्षार्भार्व सर्वथार् उपयुक्त है। ऐस व्यक्तियों को सन्माग पर लार्ने के प्रयार्स प्रार्य: विपरीत फल लार् देते है। पार्पी पुरुष अपने हितेशियों को भी उनकी वार्स्तविकतार् को न समझते हुए हार्नि पहुॅंचार्ने और उनके कार्यो में बार्धार् डार्लने के लिये प्रयत्नशील बने रहते है। इसलिए ऐसे व्यक्तियों के प्रति उपेक्षार् अर्थार्त् उदार्सीनतार् क भार्व श्रेयस्कर होतार् है। सार्धक इस प्रकार विभिन्न व्यक्तियों के प्रति अपनी उक्त भार्वनार् को जार्ग्रत रखकर चित्त को निर्मल स्वच्छ और प्रसन्न बनार्ये रखने में सफल रहतार् है, जो सम्प्रज्ञार्त योग की स्थिति को प्रार्प्त करने के लिये अत्यन्त उपयोगी है।

वृत्ति निरोध के उपार्यों के अन्तर्गत महर्षि पतंजलि ने नौ उपार्यों को उल्लेख कियार् हैं। जिनमें प्रथम एवं मुख्य उपार्य क वर्णन करते हुए पंतजलि कहते है-

‘अभ्यार्सवैरार्ग्यार्भ्यार्ं तन्निरोध:’ योगसूत्र 1/12 

अर्थार्त् अभ्यार्स और वैरार्ग्य के द्वार्रार् इन वृत्तियों क निरोध होतार् है। अभ्यार्स और वैरार्ग्य पक्षी के दो पंखों की भार्ंति है। जैसे पक्षी दोनों पंखों के द्वार्रार् ही उड़ सकतार् है, एक पंख से उड़ पार्नार् सम्भव नहीं है। वैसे ही अभ्यार्स और वैरार्ग्य इन दोनों के एक सार्थ पार्लन करने से वृत्तियों क निरोध हो जार्तार् है। कहार् गयार् है-

 तत्र स्थितौ यत्नोSभ्यार्स:। योगसूत्र 1/13 

अर्थार्त् स्थिति में प्रयत्न क नार्म अभ्यार्स कहलार्तार् है। स्थिति क अर्थ है- वृत्तिहीन चित्त की एकाग्रतार् और यत्न क अर्थ है- उस एकाग्रतार् के लिये मार्नसिक उत्सार्ह तथार् दृढ़तार्पूर्वक यमार्दि योगार्ंगो क अनुष्ठार्न। वैरार्ग्य दो प्रकार क है- पर और अपर। लौकिक और वैदिन दोनों प्रकार के विषयों में चित्त क तृष्णार् रहित हो जार्नार् वैरार्ग्य कहलार्तार् है-

 दृष्टवदार्नुश्रविकविषयवितृश्णस्य वशीकारसंज्ञार्वैरार्ग्यम्। योगसूत्र 1/15 

 स्रक्, चन्दन, वनितार्, अन्न आदि लौकिक विषय है तथार् वेदबोधित पार्रलौकिक स्वर्गार्दि के अमृतपार्न, अप्सरार्गमन आदि आनुश्रविक विषय है। इन दोनों से चित्त क तृष्णार्रहित हो जार्नार् वैरार्ग्य है। परवैरार्ग्य के विषय में कहार् गयार् है-

तत्परं पुरूषख्यार्तेर्गुणवैतृश्ण्यम्। योगसूत्र 1/16 

प्रकृत्ति और पुरुष विषयक भेद क ज्ञार्न उदित हो जार्ने सत्वगुण के कार्यरूप विवके ज्ञार्न की तृष्णार् क अभार्व है वह परवैरार्ग्य है। अपरवैरार्ग्य सम्प्रज्ञार्तसमार्धि क हेतु है और परवैरार्ग्य असम्प्रज्ञार्तसमार्धि क हेतु है। इस प्रकार अभ्यार्स और वैरार्ग्य उत्तम कोटि के योगसार्धकों के लिये चित्तवृत्तिरनिरोध क सर्वोत्कृश्ट उपार्य है। उनमें भी जिस सार्धक के मन में जितनार् तीव्रसंवेग होगार्, उतनार् ही वृत्तिनिरोध शीघ्र होगार्-

 तीव्रसंवेगार्नार्मार्सन्न:। योगसूत्र 1/21 

द्वितीय उपार्य के रूप में र्इश्वरप्रणिधार्न को मार्नार् है। यह एक प्रकार की भक्ति है। पतंजलि ने यह सार्धन उत्तमकोटि के सार्धकों के लिए बतार्यार् है। इस स्थिति के सार्धकों के लिए एक अन्य सुगम उपार्य बतार्ते हुए पंतजलि कहते है- ‘र्इश्वरप्रणिधार्नार्द्वार्’ अर्थार्त् र्इश्वर प्रणिधार्न के पार्लन से भी वृत्तियों क निरोध हो जार्तार् है। एक स्थार्न पर पतंजलि कहते है-

‘समार्धिसिद्विरीष्वरप्रणिधार्नार्त्’ योगसूत्र 1/23 

अर्थार्त् र्इश्वर प्रणिधार्न के पार्लन से समार्धि की स्थिति शीघ्र प्रार्प्त होती है और समार्धि की स्थिति में ही वृत्तियों क निरोध सम्भव है।

तृतीय उपार्य के रूप में ऐसे ही योगियों के लिए भार्वनार्चतुश्टय (मैत्री, करूणार्, मुद्रितार् और उपेक्षार्) क पार्लन भी वृत्ति निरोध में सहार्यक मार्नार् है। भार्वनार्चतुश्टय क उल्लेख कर दियार् गयार् है। चतुर्थ उपार्य के रूप में प्रार्णार्यार्म को महत्तव देते हुए कहार् है-

प्रच्छर्दन विधार्रणार्भ्यार्ं वार् प्रार्णस्य। योगसूत्र 1/35 

अर्थार्त् उदरस्थ वार्यु को नार्सिकापुट से बार्हर निकालनार् प्रच्छर्दन और भीतर ही रोके रखने को विधार्रण कहार् है। इसी क नार्म रेचक एवं कुम्भक प्रार्णार्यार्म है। इस प्रकार के प्रार्णार्यार्म से भी चित्त स्थिर होतार् है। और समार्धि की प्रार्प्ति होती है।

पॉंचवे उपार्य के रूप में विषयवती प्रवृत्ति को मार्नार् जार्तार् है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वार्यु और आकाश – ये पॉंच महार्भूत है। गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द ये पॉंच इनके विषय है। दिव्य और अदिव्य भेद से ये विषय दस प्रकार के हो जार्ते है। इनसे पॉंच दिव्य विषयों क योगशार्स्त्र प्रतिपार्दित उपार्य द्वार्रार् जो योगियों को सार्क्षार्त्कार होतार् है। 

छठे उपार्य के अन्तर्गत ज्योतिश्मती प्रवृत्ति को ग्रहण कियार् जार्तार् है। कहार् गयार् है-

विषोक वार् ज्योतिश्मती। योगसूत्र 1/36 

चित्तविषयक सार्क्षार्त्कार तथार् अहंकारविषयक सार्क्षार्त्कार विषोक ज्योतिश्मती कहे जार्ते है। हृदय कमल में संयम करने पर जो चित्त क सार्क्षार्त्कार होतार् है वह चित्तविषयक ज्योतिश्मती प्रवृत्ति कहलार्ती है। उस प्रवृत्ति के द्वार्रार् भी चित्त प्रसन्न होतार् है।

वृत्तिविषयक के एक अन्य उपार्य के रूप में मध्यम कोटि के सार्धकों के लिए पंतजलि क्रियार्योग क वर्णन करते है। अर्थार्त् तप, स्वार्ध्यार्य और र्इश्वर प्रणिधार्न के पार्लन से वृत्तियों क निरोध होतार् है। सबसे सुगम व सरल उपार्य के रूप में पतंजलि यम, नियम, आसन, प्रार्णार्यार्म, प्रत्यार्हार्र, धार्रणार्, ध्यार्न और समार्धि इस अष्टार्ंगिक माग्ार् क उपदेश करते है। अर्थार्त् अष्टार्ंग योग की पूर्णतार् होने पर वृत्तियों क निरोध हो जार्तार् है।

सार्ंतवार् उपार्य बीतरार्गविषयक चित्त है। पूर्वोक्त गन्ध आदि विषयों में संयम करने से चित्त स्थिरतार् को प्रार्प्त करतार् है। वैसे ही सनकादि, दत्तार्श्रेय, व्यार्स, शुक्रदेव आदि वीतरार्ग योंगियो के चित्त को आलम्बन करने से भी चित्त शीघ्र ही स्थिरतार् को प्रार्प्त करतार् है।

आठवें उपार्य के रूप में स्वप्ननिद्रार्ज्ञार्नार्लम्बन है। निद्रार् सुख में ध्यार्न लगार्ने से भी चित्त क शीध्र ही स्थैर्य हो जार्तार् है।

नवम उपार्य यथार्भिमत ध्यार्न कहार् गयार् है। जिस सार्धक को जो स्वरूप् अभीष्ट हो उसमें ध्यार्न करने से चित्त शीध्र स्थिरतार् को प्रार्प्त करतार् है। अनभिमत विषय में चित्त कठिनतार् से स्थिर होतार् है। इसलिए शिव, शक्ति, गणपति, विश्णु तथार् सूर्य आदि देवतार्ओं में से किसी एक में यदि विशेष रूचि हो तो उसी क ध्यार्न करने से उसमें स्थिर हुआ चित्त निर्गुण निरार्कार परमेश्वर में भी स्थिरतार् को प्रार्प्त कर लेतार् है। इस प्रकार चित्त प्रसार्दन के नौ उपार्यो क स्पष्ट उल्लेख महर्षि पतंजलि ने कियार् है।

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