योग क उद्भव एवं विकास

योग भार्रतीय संस्कृति क एक आधार्र स्तम्भ हैं । जो प्रार्चिन काल से आधुनिक काल तक हमार्रे काल से जुडार् हुआ है । इस योग क महत्व प्रार्चिन काल से भी थार् तथार् आधुनिक काल में भी इसक महत्व और अधिक बडार् है। प्रिय पार्ठको योग एक ऐसी विद्यार् है जिसके द्वार्रार् मन को अविद्यार्,अस्मितार् आदि द्वेषो से बचार्कर वृत्तियों से रहित कर परमार्त्मार् में लीन करने क ज्ञार्न प्रार्प्त होतार् है एक सार्मार्न्य ज्ञार्न से लेकर उच्च कोटि के सार्धको के लिए योग के अलग-अलग मागो क निर्देश अलग-अलग भार्गो में कियार् गयार् है इन सभी मागो में सार्धनार् एवं सार्धन की विधि अलग-अलग हो सकती है किन्तु इन सभी क अन्तिम उद्देश्य परम तत्व को प्रार्प्त करनार् होतार् है।
योग क उद्भव वेदों से होतार् है तथार् इसके विकास की एक क्रमबद्ध श्रृखंलार् प्रार्रम्भ होती है वेद के उपरार्न्त उपनिषदो तथार् भिन्न-भिन्न स्मृतियो में स्मृतियों के उपरार्न्त विभिन्न दर्शनो एंव यौगिक ग्रन्थों में तत्पश्चार्त गीतार् में तथार् वर्तमार्न में आधुनिक काल तक इसके विकास की एक क्रमबध श्रृखंलार् हैं।

योग क उदभव 

योग के उदभव क अर्थ योग के प्रार्रम्भ अथवार् उत्पन्न होने से लियार् जार् सकतार् है योग क प्रार्रम्भ आदी काल से ही है सृष्टि के आदि ग्रन्थ के रूप मे वेदो क वर्णन आतार् है। वेद वह र्इश्वरी ज्ञार्न है। जिसमे मार्नव जीवन के प्रत्येक पक्ष पर प्रकाश डार्लार् गयार् है तथार् जीवन को सुखमय बनार्ते हुए जीवन के चरम लक्ष्य मुक्ति के माग को समझार्यार् गयार् है। इस मुक्ति के माग के सार्धन के रूप मे योग माग क उल्लेख कियार् जार्तार् हो सर्वपथम ऋग्वेंद में कहार् गयार् है-

यञजते मन उत यृञजते धियों विप्रार् विप्रस्थ बृहतो विपश्रिचत:।। 

अर्थार्त जीव (मनुष्य) को परमेश्वर की उपार्सनार् नित्य करनी उचित है वह मनुष्य अपने मन को सब विद्यार्ओं से युक्त परमेश्वर में स्थित करें। यहॉ पर मन को परमेश्वर में स्थिर करने क सार्धन योगार्भ्यार्स क निर्देश दियार् गयार् है
अन्यत्र यजुर्वेद में पुन:कहार् गयार्-

 योगे योगें तवस्तंर वार्जे वार्जे हवार्महे। 

 सखार्य इन्द्रमूतये।। 

अर्थार्त बार्र-बार्र योगार्भ्यार्स करते और बार्र-बार्र शार्रीरिक एंव मार्नसिक बल बढार्ते समय हम सब परस्पर मित्रभार्व से युक्त होकर अपनी रक्षार् के लिए अनन्त बलवार्न, ऐष्वर्यषार्ली र्इश्वर क ध्यार्न करते है तथार् उसक आवार्हन करते है । योग के उदभव अथवार् प्रथम वक्तार् के यार्जवल्वय स्मृति में कहार् गयार् है-

हिरण्यगर्यो योगार्स्थ वक्तार् नार्स्य:पुरार्तन:।  

अर्थार्त हिरण्यगर्म ही योग के सबसे पुरार्तन अथवार् आदि प्रवक्तार् है। महार्भार्रत में भी हिरण्यगर्म को ही योग के आदि के रूप मे स्वीकार करते हुए कहार् गयार्-

सार्ंख्यस्य वक्तार् कपिल: परमर्शि:स उच्यते। 

हिरण्यगर्यो योगस्य वक्तार् नार्स्य:पुरार्तन:। 

अर्थार्त सार्ख्य के वक्तार् परम ऋषि मुनिवर कपिल है योग के आदि प्रवक्तार् हिरण्य गर्भ है। हिरण्यगर्भ को वेदो में स्पष्ट करते हुये कहार् गयार् है कि हिरण्यगर्भ परमार्त्मार् क ही एक विश्लेषण है अर्थार्त परमार्त्मार् को ही हिरण्यगर्म के नार्म से पुकारार् जार्तार् है।

इससे स्पष्ट होतार् है कि योग के आदि वक्तार् परमार्त्मार् (हिरण्यगर्भ) है जहॉ से इस बार्त क ज्ञार्न क उदभव हुआ तथार् वेदो के मार्ध्यम से इस विद्यार् क प्रार्दुर्भार्व संसार्र में हुआ। योग के प्रसिद्व ग्रन्थ हठ प्रदीपिक के प्रार्रम्भ में आदिनार्थ शिव को योग के प्रर्वतक के रूप में नमन करते हुये कहार् गयार् है-

श्री आदिनार्थ नमोस्तु तस्मै येनोपदिष्य

अर्थार्त उन भगवार्न आदिनार्थ को नमस्कार है जिन्होने हठयोग विद्यार् की शिक्षार् दी । कुछ विद्वार्न योग के उद्भव को सिन्धु घार्टी सभ्यतार् के सार्थ भी जोडते है तथार् इस सभ्यतार् के अवशेषो मे प्रार्प्त विभिन्न आसनों के चित्रों एंव ध्यार्न के चित्रों से यह अनुमार्न करते है कि योग क उद्गम इसी सभ्यतार् के सार्थ हुआ है।

योग क विकास क्रम 

जिज्ञार्सु पार्ठको पूर्व क अध्ययन इस तथ्य को स्पष्ट करते है कि योग विद्यार् क उद्देश्य हिरण्यगर्भ (परमार्त्मार्) द्वार्रार् कियार् गयार् तथार् वेदो मे इसक वर्णन प्रार्प्त हुआ वेदो के उपरार्न्त इस विद्यार् क प्रचार्र प्रसार्र संसार्र मे हुआ तथार् यह विकास अभी तक चलतार् आ रहार् है अब हम इसी विकास क्रम पर दृष्टिगत करते है

1. वेदो में योग क विकास क्रम- 

वेद ससार्र के आदि ग्रन्थ है सृष्टि के आरम्भ में अग्नि, वार्यु, आदित्य, एवं अंगीरार् नार्मक ऋशियों ने परमार्त्मार् से प्रार्प्त प्रेरणार् के आधार्र पर वेदों की रचनार् की इसी कारण वेद को परमार्त्मार् की वार्णी की संज्ञार् दी जार्ती है वेदो में योग विद्यार् क वर्णन भिन्न-भिन्न स्थार्नों पर कियार् गयार् जिनमें से कुछ क वर्णन इस प्रकार है।

योगे -योगे तवस्तरं वार्जे वार्जे हवार्महे 

सखार्य इन्द्र भूतयें।। 

अर्थार्त हम योग में तथार् हर मुसीबत के परम ऐष्वर्यवार्न इन्द्र क आवार्हन करते है । यजुर्वेद में कहार् है –

यृञजार्न: प्रथमं मनस्तत्वार्य सवितार् धियम्। 

अग्नेज्र्योतिर्निचार्स्य अध्यार्भरत्।। यजु 0 11/1 

अर्थार्त योग को करने वार्ले मनुष्य ब्रहमज्ञार्न के लिए जब अपने मन को परमेश्वर में युक्त करते है तब परमेश्वर उनकी वृद्वि को अपनी कृपार् से अपने मे युक्त कर लेते है फिर वें परमार्त्मार् के प्रकाश को धार्रण करते है। अथर्ववेद मे शरीस्थ च्रकों पर प्रकाश डार्लते हुए कहार् गयार्-

अष्टचक्र नवद्वार्रार् देवार्तार्ं पूरयोधयार् 

तस्ंयार् हिरण्यभय: कोश: स्वर्गो ज्योतिशार्वृत:।। अथर्ववेद 10/1/31 

अर्थार्त आठ च्रको एवं नौ द्वार्रों से युक्त यह शरीर एक अपरार्जेय देव नगरी है इसमें हिरण्यभय कोश है जो ज्योति एंव आनन्द से परिपूर्ण है ।

2. उपनिषदों में योग क विकास क्रम- 

उपनिषदो क शब्दिक अर्थ उप शद के रूप में कियार् जार् सकतार् है उप क अर्थ समीप (ब्रहम अथवार् परमार्त्मार् के समीप) जबकि शद क अर्थ है निश्चित ज्ञार्न से आतार् है अर्थार्त परमार्त्मार् के समीप बैठकर निश्चित ज्ञार्न की प्रार्प्ति की उपनिषद है।

उपनिषद सार्हित्य पर वेदों की विचार्रधार्रार् क पूर्ण से प्रभार्व परिलक्षित होतार् है तथार् उपनिषद को वैदिक ज्ञार्न काण्ड की संज्ञार् भी दी जार्ती है इन्हे ही वेदार्न्त भी कहार् जार्तार् है।

योग विद्यार् क उपनिषद सार्हित्य में भिन्न-भिन्न स्थार्नों पर वर्णन प्रार्प्त होतार् है उपनिषद में कुछ उपनिषद तो योग विषय पर ही करते है जबकि कुछ उपनिषद के स्थार्न के विषय मे समझार्यार् गयार् है। योग के संदर्भ में उपनिषद में इस प्रकार वर्णन आतार् है।

योगशिखोउपनिषद में योग को परिभार्षित करते हुए कहार् गयार् है – 

योगपार्न प्रार्णियोंर्ऐक्यं स्थरजो रेतसोस्तथार्। 

सूर्य चन्द्रमसों योर्ं गार्दृृ जीवार्त्म परमार्त्मनो।। 

एंव तु इन्द्र जलार्स्य संयोगों योग उच्यतें।। 

अथात प्रार्ण वार्यु क अपार्न वार्यु में मिलन स्वरज रूपी कुण्डलिनी शक्ति क रेत रूपी आत्मतत्व से मिलन, सूर्य स्वर क चन्द्रस्वर से मिलन तथार् जीवार्त्मार् क परमार्त्मार् से मिलन होतार् है ।

अमृतनार्दोपनिषद में योग के अंगो पर प्रकाश डार्लते हुए कहार् गयार् –

प्रत्यार्हार्रस्तथार् ध्यार्नं प्रार्णार्यामोश्थ धार्रणार् तर्कश्चैव समार्धिश्च शडंगोयोग उच्यते।

त्रिषिखबार्ह्मणोंपनिषद में कहार् गयार् है 

ध्यार्नस्य विस्मृति: सम्यक् समार्धिरभिधीयते।। 

 अर्थार्त ध्यार्न क पूर्ण रूपेण विस्मरण अर्थार्त ध्यार्न में पूर्ण रूप से डूब जार्नार् ही समार्धि की अवस्थार् है। “वेतार्ष्वतर उपनिषद में कहार् गयार् है

 न तस्य रोगो न जरार् न मृत्यु 

 प्रार्प्तस्य योगार्ग्निमयं शरीरम् 

अर्थार्त वह शरीर जो योग की अग्नि में तप जार्तार् है उसें कोर्इ रोग नही होतार्,बुढार्पार् नही आतार् तथार् वह शरीर को मृत्यु को भी प्रार्प्त नही होतार् हैं इस प्रकार उपनिषद सार्हित्य में योग के स्वरूप को अलग-अलग ढग से समझार्यार् गयार् है इस सदर्भ में अमृतार्दोपनिषद में योग के छह: अंगों क उल्लेख कियार् गयार् तो त्रिशिखबार्ह्मणोंपनिषद में यम और नियम की संख्यार् दस-दस बतलाइ परन्तु इस सभी योग क मूल उदृदेष्य आत्मतत्व को शुद्व कर परमार्त्मार् के सार्थ इसक संयोग करनार् ही रहार् है।

3. स्मृतियों मे योग क विकास क्रम- 

स्मृतियों क वैदिक सार्हित्य के अपनार् विशिष्ट स्थार्न है मनु द्वार्रार् रचित यार्जवल्लभ स्मृति क महत्च वर्तमार्न समय में भी है इन सभी स्मृतियों में योग के स्वरूप को इस प्रकार स्पष्ट कियार् गयार् –

सुक्ष्मतार्ं चार्न्ववेक्षेत योगेन परमार्त्मन:। 

 देहेषु च समुत्पन्तिमुन्तष्वधमेषु च।। 

अर्थार्त योगार्भ्यार्स से परमार्त्मार् की सुक्ष्मतार् को जार्नार् जार्तार् है। मनुस्मृति में प्रार्णार्यार्म द्वार्रार् इन्द्रियों की शुद्वि क निर्देश भी इस प्रकार कियार् गयार् दहयन्ते ध्मार्यमार्नार्नार्ं धार्तूनार्ं हि यथार् मलार्:। तथेन्द्रियार्णार्ं दहार्यन्ते दोषार्: प्रार्णार्स्य निग्रहार्तृ अर्थार्त जिस प्रकार अग्नि में तपार्ने से धार्तुओं के मल नष्ट हो जार्ते है उसी प्रकार प्रार्णार्यार्म रूपी अग्नि में तपार्ने से इन्द्रियों के दोष समार्प्त हो जार्ते है। अर्थार्त यहार् पर प्रार्णार्यार्म की महत्व को दर्शार्यार् गयार् ह।ै यार्जवल्वन्य स्मृति में ‘‘संयार्गों योग इत्यक्तो जीवोत्मनो’’ कहकर जीवार्त्मार् क परमार्त्मार् से संयोग को योग कहार् गयार् है।

4. दर्शनों मे योग क विकास क्रम- 

वैदिक दशर्नो में छ: दशर्नो क वर्णन आतार् है इन छ: दशर्नो में योगदर्शन, सार्ख्यदर्शन, न्यार्य दर्शन, वैशेषिक दर्शन, मीमार्ंसार् दर्शन, एवं वेदार्न्त दर्शन आतार् है इन शड दर्शनों को आस्तिक दर्शनों की सज्ञार्ं दी जार्ती है इनके अतिरिक्त बौद्ध दर्शन, जैन दर्शन एंव चावार्क दर्शन इन तीनो दर्शनो को नार्स्तिक दर्शन के अन्तर्गत रखार् गयार् है इन सभी दर्शनों में योग को अलग-अलग रूपो में प्रस्तुत कियार् गयार् है इन सभी दर्शनों में पतंजलि कृत योग दर्शन में योग के स्वरूप की स्पष्ट एंव सुन्दर व्यार्ख्ंयार् की गयी है। यह दर्शन समार्धिपार्द, सार्धनपार्द विभूति पार्द तथार् कैवल्य पार्द के नार्म से चार्र अध्यार्यों में विभक्त है इन अध्यार्यों में क्रमश: 51, 55, 55, 34, =195 सूत्र हैं।इस दर्शन में प्रष्नोंत्तरार्त्मक शैली में योग के स्वरूप की व्यार्ंख्यार् की गयी है यहॉ पर योग को परिभार्षित करते हुए कहार् गयार् है।

योगष्चित्त वृत्ति निरोध: पार्0 योग सू0 1/2 

अर्थार्त चित्त वृत्तियॉ क निरोध ही योग है

चित्त वृत्तियों क निरोध के सार्धन के सार्थ-सार्थ अष्टार्ंग योग क वर्णन करते हूए योग दर्शन में कहार् गयार् है- यम, नियम, आसन, प्रार्णार्यार्म, प्रत्यार्हार्र, धार्रणार्, ध्यार्न तथार् समार्धि ये योग के आठ अंग है।

सॉख्य दर्शन में मुनिवर कपिल ने 25 तत्वों की संख्यार् की गणनार् की। तथार् इन तत्वों क ज्ञार्न कर परमार्त्मार् को प्रार्प्त करने क उपदेश दियार्।इन दर्शन में कार्य कारण सिद्वार्न्त तथार् सत्कार्यवार्द को भी समझार्यार् गयार् है। न्यार्य दर्शन में गौतम ऋषि द्वार्रार् किसी भी वस्तु अथवार् क सही ज्ञार्न प्रार्प्त कर उसके ज्ञार्न क उपदेश दियार् गयार् है। वैशेषिक दर्शन में कणार्द मुनि द्वार्रार् प्रकृति क विवेचन कर परमार्त्म को प्रार्प्त करने क उपदेश दियार् गयार् है 

मीमार्सार्ं दर्शन में महर्षि जैमिनी ने गहन चिन्तन अथवार् अनुसन्धार्न द्वार्रार् परमार्त्मार् तत्व को प्रार्प्त करने क उपदेश कियार् गयार् वेदार्न्त दर्शन में आचाय शंकर आत्मार् के स्वरूप को प्रतिपार्दित करते है तथार् इसकी मुक्ति के सार्धनों क उल्लेख करते है इस प्रकार इन शडदर्शनों में भिन्न-भिन्न मागो से आत्मार् को परमार्त्मार् से जोडने के मागो क उल्लेख कियार् गयार् है।

जैन दर्शन में वर्धमार्न महार्वीर ने सम्यक दर्शन सम्यक ज्ञार्न एंव सम्यक चरित्र के रूप में आत्म विकास क उपदेश दियार् गयार् जबकि बौद्व दर्शन में महार्त्मार् बुद्व द्वार्रार् अष्टार्ंग योंग के समार्न सार्धनार् के आठमार्गोर्ं क वर्णन कियार् गयार् इन मागो में सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वार्क, सम्यक कर्म, सम्यक आजीव, सम्यक व्यार्यार्म, सम्यक स्मृति एवं सम्यक समार्धि क वर्णन कियार् गयार् है। इस प्रकार दर्शन काल में योग की अलग-अलग रूपों में प्रकाशित कियार् गयार्।

5. हठ प्रदीपिक एवं घेरण्ड सेहितार् में योग- 

हठप्रदीपिक एंव घेरण्ड संहितार् में योग के स्वरूप पर प्रकाश डार्लते हुए कहार् गयार्- प्रणम्य श्रीगुरू नार्थ स्वार्त्मार्रार्मेण योगिनार्। केवलं रार्जयोगार्य हठविद्योपदिष्यतें।। अर्थार्त श्रीनार्थ गुरू कों प्रणार्म करके योगी स्वार्त्मार्रार्म केवल रार्जयोग की प्रार्प्ति की प्रार्प्ति के लिए हठविद्यार् क उपदेश करते है। घेरण्ड संहितार् में हठयोग के सप्त सार्धनों पर प्रकाश डार्लते हुए कहार् गयार्-

 शोधनं ढृढतार् चैवं स्थैर्य धैर्य च लार्द्यवम्। 

 प्रत्यक्षं च निर्लिप्तं च घटस्य सप्तसार्धनम्। 

अर्थार्त शोधन, धैर्य, लार्घव, प्रत्यक्ष, और निलिप्तार् ये सार्त शरीर शुद्वि के सार्धन है जिन्हें सार्मार्न्यत: सप्तसार्धन की संज्ञार् दी जार्ती है इन सप्तसार्धनों के लार्भों पर प्रकाश डार्लते हुए घेरण्ड ऋर्षि कहते है-

 शट्कर्मणार् शोधंन च आसनेन भवेद्ढृढम्। 

 मुद्रेयार् स्थिरतार् चैव प्रत्यार्हार्रेण धीरतार्। 

 प्रार्णार्यार्मार्ल्लार्घवं च ध्यार्नार्त्प्रत्यक्षमार्त्मन:। 

 समार्धिनार् निर्लिप्तं च मुक्तिरेव न संशय:।। 

अर्थार्त शट्रकर्मो से शरीर क शोधन आसनों से ढृढतार्, मुद्वार्ओं से स्थिरतार् प्रत्यार्हार्र से धैर्य, प्रार्णार्यार्म से हल्कापन, ध्यार्न से आत्म सार्क्षार्त्कार एव समार्धि से निर्लिप्ततार् के भार्व उत्पन्न होते है इन सार्धनों क अभ्यार्स करने वार्ले सार्धन की मुक्ति में कोर्इ संशय नही रहतार् है। इस प्रकार घेरण्ड संहितार् एंव हठयोग प्रदीपिक में योग के स्वरूप को हठयोग के रूप में वर्णित कियार् गयार्।

6. गीतार् मे योग क विकास क्रम-  

गीतार् अर्जुन को समझार्ते हुए में योग के सदंर्भ मे भगवार्न श्रीकृष्ण कहते है –

योगस्थ कुरूकर्माणि संगत्यक्यक्त्वार् धनरजय ।  

सिदयसिद्वयोसमो भूत्वार् समत्ंव योग उच्चते।। (गीतार् 2/48) 

अर्थार्त अर्जुन तुम कर्म फलों की आसक्ति को त्यार्गकर, सिद्धि और असिद्धि जय और परार्जय, मार्न और अपमार्न में समभार्व रखते हुए कार्य कर क्योकि यह समत्वं की भार्वनार् ही योग है।
पुन:भगवार्न श्रीकृष्ण कर्मयोग पर प्रकाश डार्लते हुए कहते है-

बुद्वियुक्तो जहार्तीह उमे सुकृत दृष्कृते। 

तस्मार्धोगार्य युजस्व योग: कर्मसुु कोशलम्।। 

 अर्थार्त हे अर्जुन बुद्विमार्न पुरूष अच्छे एंव बुरे दोनो ही कर्मो को इसी लोक में त्यार्ग देते है तथार् आसक्तिरहित होकर कर्म करते है क्योकि कर्मो में कुशलतार् ही योग है। यद्यपि गीतार् को कर्मयोग क सर्वोतम शार्स्त्र मार्नार् गयार् है किन्तु कर्मयोग के सार्थ-सार्थ इस ग्रन्थ में भक्तियोग, ज्ञार्नयोग, सन्यार्सयोग, मंत्रयोग एवं ध्यार्नयोग आदि योग के अन्यमागो क उल्लेख भी प्रार्प्त होतार् है।

7. आधुनिक युग में योग क विकास क्रम- 

आधुनिक युग के योगी महर्षि योग को सार्ंसार्रिक जीवन एंव आध्यार्त्मिक जीवन के मध्य सार्मंजस्य स्थार्पित करने क सार्धन मार्नते है आधुनिक युग में योग को एक नर्इ दिशार् देने वार्ले स्वार्मी रार्मदेव योग को स्वार्स्थ मार्नसिक जोडते हुए शार्रीरिक मार्नसिक एंव आध्यार्त्मिक स्वार्स्थ प्रार्प्त करने क सार्धन होतार् है। शिक्षार् के क्षेत्र में बच्चों पर बढ़ते तनार्व को योगार्भ्यार्स से कम कियार् जार् रहार् है। योगार्भ्यार्स से बच्चों को शार्रीरिक ही नहीं बल्कि मार्नसिक रूप से भी मजबूत बनार्यार् जार् रहार् है। स्कूल व महार्विद्यार्लयों में शार्रीरिक शिक्षार् विषय में योग पढ़ार्यार् जार् रहार् है। वहीं योग-ध्यार्न के अभ्यार्स द्वार्रार् विद्याथियों में बढ़ते मार्नसिक तनार्व को कम कियार् जार् रहार् है। सार्थ ही सार्थ इस अभ्यार्स से विद्याथियों की एकाग्रतार् व स्मृति शक्ति पर भी विशेष सकारार्त्मक प्रभार्व देखे जार् रहे हैं। आज कम्प्यूटर, मनोविज्ञार्न, प्रबन्धन विज्ञार्न के छार्त्र भी योग द्वार्रार् तनार्व पर नियन्त्रण करते हुए देखे जार् सकते हैं। 

शिक्षार् के क्षेत्र में योग के बढ़ते प्रचलन क अन्य कारण इसक नैतिक जीवन पर सकारार्त्मक प्रभार्व है आजकल बच्चों में गिरते नैतिक मूल्यों को पुन: स्थार्पित करने के लिए योग क सहार्रार् लियार् जार् रहार् है। योग के अन्तर्गत आने वार्ले यम में दूसरों के सार्थ हमार्रे व्यवहार्र व कर्तव्य को सिखार्यार् जार्तार् है, वहीं नियम के अन्तर्गत बच्चों को स्वयं के अन्दर अनुशार्सन स्थार्पित करनार् सिखार्यार् जार् रहार् है। विश्वभर के विद्वार्नों ने इस बार्त को मार्नार् है कि योग के अभ्यार्स से शार्रीरिक व मार्नसिक ही नहीं बल्कि नैतिक विकास होतार् है। इसी कारण आज सरकारी व गैरसरकारी स्तर पर स्कूलों में योग विषय को अनिवाय कर दियार् गयार् है।

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