योगवशिष्ठ में योग क स्वरूप

योगवशिष्ठ में योग क स्वरूप 

योग वशिष्ठ योग क एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। अन्य योग ग्रन्थों की भार्ँति योग वशिष्ठ में भी योग के विभिन्न स्वरूप जैसे- चित्तवृत्ति, यम-स्वरूप, नियम-स्वरूप, आसन, प्रार्णार्यार्म, प्रत्यार्हार्र, ध्यार्न, समार्धि, मोक्ष आदि क वर्णन वृहद् रूप में कियार् गयार् है।

योग वशिष्ठ के निर्वार्ण-प्रकरण में वशिष्ठ मुनि श्री रार्म जी को योग के स्वरूप के बार्रे में वर्णन करते हुए कहते हैं कि संसार्र सार्गर से पार्र होने की युक्ति क नार्म योग है और वह दो प्रकार क है। एक सार्ंख्य बुद्धि ज्ञार्न योग और दूसरार् प्रार्ण से रोकने क नार्म योग बतार्यार् है।

एको योगस्तथार् ज्ञार्नं संसार्रोत्तरेणक्रमे। 

समार्वुपार्मौ द्वार्वेव प्रोक्तार्वेक फलदौ।। निर्वार्ण प्रकरण सर्ग 18/7 

इन दोनों प्रकार के योग के द्वार्रार् दु:खरूप संसार्र से तरार् जार् सकतार् है। शिव भगवार्न् ने दोनों क फल एक ही बतार्यार् है। ये योग के दोनों युक्तियार्ँ योग जिज्ञार्सु पर निर्भर है। किसी जिज्ञार्सु को योग सरल है और किसी को ज्ञार्न योग। परन्तु दोनों योग में अभ्यार्स की अत्यन्त आवश्यकतार् है। 

असार्ध्य: कस्यचिद्योग: कस्यचिज्ज्ञार्न निश्चय:। 

ममत्वभिमत: सार्धो सुसार्ध्यो ज्ञार्न निश्चयत:।। निर्वार्ण प्रकरण सर्ग 13/8  

बिनार् अभ्यार्स के कुछ नहीं प्रार्प्त होतार्। यद्यपि शार्स्त्रों में ‘योग’ शब्द से उपर्युक्त दोनार्ं ही प्रकार के कहे गये है

तथार्पि इस ‘योग’ शब्द की प्रार्ण निरोध के अर्थ में ही अधिक प्रसिद्धि है। महर्षि पतंजलि ने चित्त की वृत्ति के निरोध को योग की संज्ञार् दी है।

योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:। यो0 सू0 1/2 

1. चित्तनिरुपण :- 

योग वशिष्ठ में मन को चित्त की संज्ञार् दी गयी है। वशिष्ठ जी कहते है कि हे रार्म! यह मन भार्वनार्मार्त्र है और भार्वनार् क अर्थ है विचार्र। परन्तु विचार्र क्रियार् क रूप है। विचार्र की क्रियार् से सम्पूर्ण फल प्रार्प्त होते हैं।

मनोहि भार्वनार्मार्त्रं भार्वनार्स्पंदधर्मिणी। 

क्रियार्तद्भार्वितार्रूपं फलं सर्वोनु धार्वति।। उपशम प्रकरण सर्ग 96-1 

यह मन स्वयं भी संकल्प शक्ति से युक्त है। इस लोक में जैसे गुणी क गुण से हीन होनार् सम्भव नहीं है, उसी प्रकार मन क कल्पनार्त्मक क्रियार् शक्ति से रहित होनार् असम्भव है। मन जिसक अनुसंधार्न करतार् है, उसी क सम्पूर्ण कर्मेन्द्रिय वृत्तियार्ँ सम्पार्दन करती है। इसलिए मन को कर्म कहार् गयार् है। मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त, कर्म, कल्पनार्, स्मृति, वार्सनार्, अविद्यार्, प्रयत्न, संस्मृति, इन्द्रिय, प्रकृति, मार्यार्, आदि सभी मन की ही संज्ञार् है। 

मनोबुद्धिरहंकारश्रिवतंकर्मार्थकल्पनार्। 

संस्मृतिर्वार्सनार्विद्यार्प्रयत्न: स्मृतिरेव च।। 

इन्द्रियं प्रकृतिर्मार्यार्क्रियार्चेतीतरार् अपि। 

चित्रार्: शब्दोक्रयो ब्रह्मन्संसार्रभ्रमहेतव:।। उ0 प्र0 सर्ग 96/13-14 

संसार्र क कारण मन की कल्पनार् ही है। चित्त को चेत्य क संयोग होने पर ही संसार्र भ्रम होतार् है। अन्य जितनी संज्ञार् मन की कही गयी है वे सब मन के फुरने से एकदम फुरती है।

मन के स्वरूप के बार्रे में बतार्ते हुए योगवशिष्ठ में कहार् गयार् है कि यह मन न तो जड़ है और न चेतन ही है।

मन इत्युव्यते शमन जडंन चिन्मयम्।। उ0 प्र0 सर्ग 96/41 

जड़ और चेतन की गार्ंठ को मन कहते हैं और संकल्प-विकल्प की कल्पनार् ही मन है। यह संसार्र उसी मन से पैदार् हुआ है। यह जड़ चेतन दोनों में चलार्यमार्न है। यह कभी जड़ की तरफ और कभी चेतन की तरफ चलार् जार्तार् है। इस मन की कर्इ संज्ञार् है। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार और जीव इत्यार्दि मन की ही संज्ञार् है। जैसे कोर्इ नट सवार्ंग रचने से अनेक संज्ञार् पार्तार् है, ठीक उसी प्रकार मन संकल्प से अनेक संज्ञार् प्रार्प्त करतार् है।

यथार् गच्छति शैलुषोरूपार्ण्यलंतथैवहि। 

मनोनार्मार्न्यनेकानि धत्तककर्मार्रं व्रजेत्।। उ0 प्र0 सर्ग 96/43 

यह सम्पूर्ण विस्तृत जगत् मन से ही व्यार्प्त है। मन से भिन्न तो केवल परमार्त्मार् ही शेष रहते हैं। मन के नार्श होने पर सर्वार्श्रयदार्यक परब्रह्मपरमेश्वर ही अवशिष्ट रहतार् है और उसी के प्रमार्द के कारण मन इस जगत् की रचनार् करतार् है। मन ही क्रियार् है। मन के द्वार्रार् ही शरीर बनतार् है और मरतार् है। मन के नष्ट होने पर कर्म आदि क सम्पूर्ण भ्रम नार्श हो जार्तार् है। जिस पुरुष ने मन पर विजय प्रार्प्त कर लियार् है, वह जन्म-मरण के बन्धन से रहित हो जार्तार् है, मोक्ष को प्रार्प्त कर लेतार् है।

2. योग वशिष्ठ में चित्तप्रसार्दन- 

योग वशिष्ठ के उपशम प्रकरण के 13 वें सर्ग में चित्त की शार्न्ति के उपार्य क वर्णन करते हुए कहार् है कि जैसे पूर्व काल में वेदार्नुसार्र अन्य महार्पुरुषों एवं रार्जार् जनक आदि ने जो आचरण कियार् है, वैसार् ही आचरण करके आप भी मोक्ष पद को प्रार्प्त करो। बुद्धिमार्न् पुरुष स्वयं ही परमपद को प्रार्प्त होते हैं। जब तक आत्मार् प्रसन्न नहीं होतार् तब तक इन्द्रियों को दमन करके अपनार् काम करते रहो। जब वह आत्मार्रूपी सर्वगत् परमार्त्मार् और र्इश्वर प्रसन्न हो जार्एगार् तो फिर अपने आप ही प्रकाश दीखेगार्। इसलिए हे रार्म! रार्जार् जनक आदि ने जिस-जिस तरह आचरण किये हैं उसी प्रकार आप भी ब्रह्मलक्ष्मी होकर आत्मपद में स्थित हो और इस संसार्र में विचरण करो। इससे आपको तनिक भी दु:ख नहीं होगार्।

प्रसन्ने सर्वगेदे वेदे वेशे परमार्त्मनि 

स्वयं मार्लोकिते सर्वार्: क्षीयंते दु:खदृष्टय:।। उ0 प्र0 सर्ग 13/4 

हे रार्म! यह मन अति चंचल है। इसको शार्न्त करने के लिए आप अपने में यह समझों कि न मैं हूँ और न कोर्इ है। अनिष्ठ पदाथ भी कुछ नहीं है। इससे यह शार्न्त हो जार्येगार्। अवस्तित्त्वमिदं वस्तुयस्येति ललितंमन:। उ0 प्र0 सर्ग 13/24 जो रार्ग-द्वेष से मुक्त है, मिट्टी के ढेले, पत्थर और स्वर्ण को एक समार्न समझतार् है तथार् संसार्र की वार्सनार्ओं क त्यार्ग कर चुक है, ऐसार् योगी मुक्त कहलार्तार् है। उसकी सब क्रियार्ओं में अहंभार्व नहीं होतार्, तथार् वह सुख-दु:ख में भी समार्न भार्व रखतार् है। जो इष्ट और अनिष्ट की भार्वनार् क त्यार्ग करके प्रार्प्त हुए कार्य को कर्त्तव्य समझकर ही उसमें प्रवृत्त होतार् है, उसक कहीं भी पतन नहीं होतार्। महार्मते! यह जगत् चेतन मार्त्र ही है- इस प्रकार के निश्चय वार्लार् मन जब भोगों क चिन्तन त्यार्ग देतार् है, तब वह शार्न्ति को प्रार्प्त हो जार्तार् है। 

चित्सत्तार्मार्त्रमेवेदमितिश्रवयवन्मन: 

त्यक्तभोगार्भिमनशंममेतिमहार्मते।। उ0 प्र0 सर्ग 13/46 

3. यम-नियम निरुपण 

योगवशिष्ठ में योग सार्धनार् करने वार्ले सार्धकों को निर्वार्ण प्रार्प्ति के लिए यम-नियमों क अभ्यार्स आवश्यक बतार्यार् है। 

वशिष्ठ जी कहते हैं कि जो अपने पूर्वजों के उपदेश को ध्यार्न में रखकर उन पर शुभार्चरण करते है वह धर्मार्त्मार् कहलार्तार् है और पार्प माग से बचतार् है। धर्मार्त्मार् भी दो प्रकार के होते हैं। एक प्रवृत्ति वार्लार् दूसरार् निवृत्ति वार्लार् धर्मार्त्मार्। प्रवृत्ति माग वह है जिसमें शार्स्त्रोक्त करने योग्य शुभ कर्म करे और दार्न पूण्य सदार्चरण करके अपने कृत्य कर्म क फल चार्हे। निवृत्ति माग वह है जिसमें संसार्र के सभी सुखों को मिथ्यार् समझे, अपने अन्त:करण को स्वभार्व से ही स्वच्छ रखे, अपने पवित्र विचार्र करके स्वार्ध्यार्य द्वार्रार् सत्यशार्स्त्रों क अध्ययन कर अपनी बुद्धि को तीव्र करे और अपनी दृष्टि समार्न रखे। योग वशिष्ठ के निर्वार्ण प्रकरण में आगे कहार् है कि जो जिज्ञार्सु योग सार्धक है उसे चार्हिए कि अपने ज्ञार्न की वृद्धि के लिए तीर्थस्थार्नों में स्नार्न, दार्न तथार् सत्यशार्स्त्रों पर विचार्र करतार् हुआ सत्संग भी करे। उसक खार्न-पार्न तथार् लेनार् देनार् सभी कुछ विचार्र युक्त होनार् चार्हिए। सार्थ ही क्रोध रहित होकर शुभार्चरण करे और पवित्र माग पर चले। क्रमश: सभी इन्द्रिय-जन्य विषयों क त्यार्ग करे और अपनी सम्पूर्ण इच्छार्ओं को दबार्कर केवल दयार् नार्म की इच्छार् को अपनार्वे अर्थार्त् सब पर दयार्भार्व रखतार् हुआ सन्तोष को प्रार्प्त होवे। ऐसार् व्यक्ति लोभ, मोह तथार् दंभ आदि से सर्वथार् अलग रहतार् है। समस्त भोगों को त्यार्ग कर देने के कारण उसक हृदय प्रतिक्षण शुभ गुणों से युक्त रहतार् है। वह फूलों की शय्यार् को सुखदार्यी नहीं समझतार्, इसके विपरीत वन एवं पर्वत की कन्दरार् क निवार्स ही श्रेष्ठ समझतार् है। इस प्रकार वह कुँआ, बार्वड़ी, सरोवर एवं नदियों में स्नार्न तथार् भूमि यार् पत्थर पर शयन करतार् हुआ, निरन्तर अपने वैरार्ग्य में अभिवृद्धि करतार् जार्तार् है और फिर धार्रनार् व ध्यार्न द्वार्रार् चित्त में स्थिरतार् लार्कर, आत्मचिन्तन करतार् हुआ, समस्त सार्ंसार्रिक भोगों से पूर्णतयार् विरक्त हो जार्तार् है। 

4. प्रार्णार्यार्म निरुपण 

योग वशिष्ठ में प्रार्णार्यार्म क भी उल्लेख कियार् गयार् है। प्रार्ण के सम्बन्ध में कहार् गयार् है कि यह प्रार्ण हृदय देश में स्थित रहतार् है। अपार्न वार्यु में भी निरन्तर स्पन्द शक्ति तथार् सत्गति करतार् है। यह अपार्न वार्यु नार्भि-प्रदेश में स्थित रहतार् है। “प्रार्णार्पार्नसमार्नार्धैस्तत: सहृदयार्निल:।” (नि0 प्र0 24/25) किसी भी प्रकार के यन्त्र के बिनार् प्रार्णों की हृदय कमल के कोश में होने वार्ली जो स्वभार्विक बहिर्मुखतार् है, विद्वार्न् लोग उसे ‘रेचक’ कहते हैं। बार्रह अंगुल पर्यन्त बार्ह्य प्रदेश की ओर नीचे गये प्रार्णों क लौटकर भीतर प्रवेश करते समय जो शरीर के अंगों के सार्थ स्पर्श होतार् है उसे ‘पूरक’ कहते हैं। अपार्न वार्यु के शार्न्त हो जार्ने पर तब वह हृदय में प्रार्ण वार्यु क अभ्युदय नहीें होतार्, तब वह वार्यु की कुंभकावस्थार् रहती है, जिसक योगी लोग अनुभवन करते हैं इसी को ‘आभ्यन्तर कुम्भक’ कहते हैं। बार्ह्य नार्सिक के अग्रभार्ग से लेकर बरार्बर सार्मने बार्रह अंगुल पर्यन्त आकाश में जो अपार्न वार्यु की निरन्तर स्थिति है, उसे पण्डित लोग ‘बार्ह्यकुंभक’ कहते हैं। 

अपार्नस्यबहिष्ठंतमपरं पूरकं विदु:। 

बार्ह्यार्नार्भ्यंतरार्श्रवैतार्न्कुंभकादीनार्रतम्।। नि0 प्र0 25/19 

प्रार्णार्यार्म क फल के बार्रे में उल्लेख करते हुए योग वशिष्ठ के निर्वार्ण प्रकरण में कहार् गयार् है कि प्रार्ण और अपार्न के स्वभार्वभूत ये जो बार्ह्य और आभ्यन्तर कुम्भकादि प्रार्णार्यार्म है, उनक भलीभार्ँति तत्त्व रहस्य जार्नकर निरन्तर उपार्सनार् करने वार्लार् पुरुष पुन: इस संसार्र में उत्पन्न नहीं होतार्। 

प्रार्णार्पार्नस्वभार्वार्ंस्तार्न् बृद्धार्भूयोन जार्यते। 

अष्टार्वेते महबुद्धेरार्त्रिंदिवमनुस्मृतार्:।। नि0 प्र0 25/20 

अपार्न के रेचक और प्रार्ण के पूरक के बार्द जब अपार्न स्थित होतार् है तो प्रार्ण क कुम्भक होतार् है। उस कुम्भक में स्थित होने पर प्रार्णी तीनों तार्पों से मुक्त हो जार्तार् है। क्योंकि वह अवस्थार् आत्मतत्त्व की होती है। उस कुम्भक की अवस्थार् में जो सार्क्षी भूत सत्तार् है वही वार्स्तव में आत्मतत्त्व है। उसमें स्थित होने से प्रार्ण की स्थिरतार् वार्ली देश, काल आदि की अवस्थार् में स्थिर हुआ मन क मनत्त्व भार्व नष्ट हो जार्तार् है। 

स्वच्छंकुंभकमभ्यनभूय: परितप्यते। 

अपार्नेरेचकाधार्रं प्रार्णपूरार्ंतस्थितम्।। नि0 प्र0 25/53 

इस प्रकार प्रार्णार्यार्म क अभ्यार्स करने वार्ले पुरुष क मन विषयार्कार वृत्तियों के होने पर भी बार्ह्यविषयों में रमण नहीं करतार्। जो शुद्ध और तीक्ष्ण बुद्धि वार्ले महार्त्मार् इस प्रार्ण विषयक दृष्टि क अवलम्बन करके स्थित हैं, उन्होंने प्रार्पणीय पूर्ण ब्रह्म परमार्त्मार् को प्रार्प्त कर लियार् है और वे ही समस्त खेदों से रहित हैं।  

5. प्रत्यार्हार्र निरुपण:- 

 महर्षि पतंजलि के अनुसार्र मन के रुक जार्ने पर नेत्रार्दि इन्द्रियों क अपने-अपने विषयों के सार्थ सम्बन्ध नहीं रहतार् अर्थार्त् इन्द्रियार्ं शार्न्त होकर अपनार् कार्य बन्द कर देती है, इस स्थिति क नार्म प्रत्यार्हार्र है। 

स्वार्विषयार्संप्रयोगे चित्तस्वरूपार्नुकार इवेन्द्रियार्णार्ं प्रत्यार्हार्र:। यो0 सू0 2/54 

योगवशिष्ठ में प्रत्यार्हार्र के स्वरूप क वर्णन करते हुए कहार् है कि इस जगत् में कहीं भी चपलतार् से रहित मन नहीं देखार् जार्तार्। जैसे उष्णतार् अग्नि क धर्म है वेसे ही चंचलतार् मन का। चेतन तत्त्व में जो यह चंचल क्रियार् शक्ति विद्यमार्न है, उसी को तुम मार्नसी शक्ति समझो। इस प्रकार जो मन चंचलतार् से रहित है, वही मरार् हुआ कहलार्तार् है। वही तप है और वही मोक्ष कहलार्तार् है। मन के विनार्श मार्त्र से सम्पूर्ण दु:खों की शार्न्ति हो जार्ती है और मन के संकल्प मार्त्र से परम सुख की प्रार्प्ति होती है। 

मनोविलयमार्त्रेणदु:खशार्ंतिरवार्प्यते। 

मनोमननमार्त्रेण दु:खं परमवार्प्यते।। उत्पत्ति प्रकरण 112/9 

यह मन की चपलतार् अविद्यार् से उत्पन्न होने के कारण अविद्यार् कही जार्ती है। उसक विचार्र के द्वार्रार् नार्श कर देनार् चार्हिए। विषय चिन्तन क त्यार्ग कर देने से अविद्यार् और उस चित्त सत्त्तार् क अन्त:करण में लय हो जार्तार् है। और ऐसार् होने से मोक्ष सुख की प्रार्प्ति होती है। जिसने मनरूपी पार्श को अपने मन के द्वार्रार् ही काटकर आत्मार् क उद्धार्र नहीं कर लियार्, उसे दूसरार् कोर्इ बन्धन नहीं छुड़ार् सकतार्। विद्वार्न् पुरुष को चार्हिए कि जो-जो वार्सनार्, जिसक दूसरार् नार्म मन है, उदित होती है, उस-उस क परित्यार्ग करे- उसे मिथ्यार् समझ कर छोड़ दे। इससे अविद्यार् क क्षय हो जार्तार् है। भार्वनार् की भार्वनार् न करनार् ही वार्सनार् क क्षय है। इसी को मन क नार्श एवं अविद्यार् क नार्श भी कहते हैं।

यार्योदेतिम नोनार्म्नीवार्सनार्सितार्ंतरार्। 

तार्ंतार्ंपरिहरेत्प्रार्ज्ञस्ततोSविद्यार्क्षयो भवेत्।। उ0 प्र0 112/22 

इस प्रकार से निश्चय मन वार्लार् जब भोगों क चिन्तन त्यार्ग देतार् है, तब वह शार्न्ति को प्रार्प्त हो जार्तार् है। 

6. ध्यार्न निरुपण :- 

धार्रणार् वार्ले स्थार्न पर एक वस्तु के ज्ञार्न क प्रवार्ह बनार् रहनार् ध्यार्न कहलार्तार् है। 

तत्र प्रत्ययैकतार्नतार् ध्यार्नम्। यो0 सू0 3/2 

योगवशिष्ठ में ध्यार्न के बार्रे में वर्णित करते हुए उपशम प्रकरण में कहार् है कि प्रार्णार्यार्म द्वार्रार् अपने मन को नियन्त्रण कर नेत्रों को बन्द करके ध्यार्न क अभ्यार्स करनार् चार्हिए। इसमें ओंकार क ध्यार्न करनार् बतलार्यार् है। ओंकार में अकार, उकार और मकार तीन शब्द है जो क्रमश: अकार से ब्रह्मार्, उकार से विष्णु तथार् मकार से शिव क द्योतक है तथार् जो अर्धमार्त्रार् है वह तुरीयार् है। इस प्रकार अकार से ब्रह्मार् क स्मरण करें, उकार से विष्णु क स्मरण करें तथार् मकार से शिव क ध्यार्न करते हुए तुरीयार्पद को प्रार्प्त करने क प्रयत्न करनार् चार्हिए। यही ध्यार्न क स्वरूप है। 

7. समार्धि निरुपण :- 

समार्धि के स्वरूप के बार्रे में वशिष्ठ जी, श्रीरार्म से कहते हैं कि अब तुम समार्धि क लक्षण सुनो। यह जो गुणों क समूह गुणार्त्मक तत्त्व है, उसे अनार्त्म तत्त्व मार्नकर अपने आप को केवल इनक सार्क्षीभूत चेतन जार्नो और जिसक मन स्वभार्व सत्तार् में लगकर शीतल जल के समार्न हो गयार् है उसको ही समार्धिस्थ जार्ननार् चार्हिए। 

इमं गुणसमार्हार्रमनार्त्मत्वेन पश्यत:। 

अंत: शीतलतार्यार्सौसमार्धिरिति कथ्यते।। उ0 प्र0 56/7 

इसी क नार्म समार्धि है। जो मैत्री, करुणार् मुदितार् और उपेक्षार् आदि गुणों में स्थित होकर आत्मार् के दर्शन से शार्न्तिमार्न् हुआ है, उसको समार्धि कहते हैं। 

हे रार्म! जिसको ऐसार् निश्चय हो गयार् है कि मैं शुद्ध चिदार्नन्द स्वरूप हँू और दृश्यों से मेरार् कोर्इ सम्बन्ध नहीं, उसके लिए घर और बार्हर एक समार्न हैं, फिर वह चार्हे कहीं रहे। अन्त:करण क शार्न्त होनार् ही महार्न् तपों क फल है। जिसने उपर से तो इन्द्रियों क हनन कर लियार् है मगर मन से संसार्र के पदाथों की चिन्तार् करतार् रहतार् है, उसकी समार्धि व्यर्थ है। उसक तो समार्धि में बैठनार् ऐसार् है जैसे कोर्इ उन्मत्त होकर नृत्य करे। देखने में तो व्यवहार्र करे, मगर मन वार्सनार् से अलग हो तो उसको बुद्धिमार्न् पुरुष समार्धि के समार्न मार्नते हैं। 

वार्स्तव में वही स्वस्थ आत्मार् कहलार्ने क अधिकारी है और उसी को ‘समार्धि’ कहते हैं। जिसके हृदय से संसार्र क रार्ग-द्वेष समार्प्त हो गयार् और जिसने शार्न्ति प्रार्प्त कर ली, उसको सदिव्य समार्धिस्थ जार्ननार् चार्हिए। 

प्रशार्न्तजगदार्स्थोंतर्वीतशोकभयैषण:। 

स्थोभवतियेनार्त्मार् ससमार्धिरितिस्मृत:।। उ0 प्र0 56/20 

सम्पूर्ण भार्व पदाथों में आत्मार् को अतीत जार्ननार् समार्हित चित्त कहलार्तार् है। समार्हित चित्त वार्लार् व्यक्ति चार्हे कितने ही जन समूह में क्यों न रहे, मगर उसक किसी से कोर्इ सम्बन्ध नहीं रहतार्, क्योंकि उसक चित्त हमेशार् अन्तर्मुख रहतार् है। वह सोते-बैठते, खार्ते-पीते, चलते-फिरते जगत् को आकाशरूप मार्नतार् है। ऐसे प्रार्णी को अन्तर्मुखी कहते हैं। क्योंकि उसक हृदय शीतल होने के कारण उसको सम्पूर्ण जगत् शीतल ही भार्सतार् है। वह जब तक जीतार् है तब तक शीतल ही रहतार् है।

8. मोक्ष (मुक्ति निरुपण) 

मोक्ष क वर्णन करते हुए वशिष्ठ जी, श्री रार्म से कहते हैं, कि लोक में दो प्रकार की मुक्ति होती है – एक जीवनमुक्ति और दूसरी विदेहमुक्ति। जिस अनार्शक्त बुद्धि वार्ले पुरुष की इष्टार्निष्ट कर्मों के ग्रहण त्यार्ग में अपनी कोर्इ इच्छार् नहीं रहती, अर्थार्त् जिस की इच्छार् क सर्वथार् अभार्व हो जार्तार् है, ऐसे पुरुष की स्थिति को तुम जीवनमुक्त अवस्थार् -सदेहमुक्ति समझो। अर्थार्त् देह क विनार्श होने पर पुनर्जन्म से रहित हुर्इ वही जीवनमुक्ति विदेहमुक्ति कही जार्ती है। 

असंसक्तमतेर्यत्यार्गदार्नेषु कर्मणार्म्। 

नैषणार्तार्ित्स्थतिं विद्धि त्वं जीवन्मुक्तार्मिह।। 

सैव देहक्षयेरार्मपुनज्र्जननवर्जितार्। 

विदेहमुक्तार् प्रोक्तार् तत्स्थार्नार्यार्ंति दृश्यतार्म्।। उ0 प्र0 42/12-13 

जिन्हें विदेहमुक्ति हो गर्इ है वे फिर जन्म धार्रण करके दृष्यतार् को नहीं प्रार्प्त होते, ठीक उसी तरह, जैसे भुनार् हुआ बीज जमतार् नहीं है। 

मोक्ष की प्रार्प्ति ज्ञार्न से होती है, कर्म से नहीं। वशिष्ठ जी कहते हैं कि- हे रघुनन्दन! परब्रह्म परमार्त्मार् देवतार्ओं के भी देवतार् हैं। उसके ज्ञार्न से ही परम सिद्धि (मोक्ष) की प्रार्प्ति होती है, क्लेशयुक्त सकाम कर्मों से नहीं। संसार्र बन्धन की निवृत्ति यार् मोक्ष की प्रार्प्ति के लिए ज्ञार्न ही सार्धन है। 

अयंसदेव इत्येव संपरिज्ञार्नमार्त्रत:। 

जंतोर्नजार्यते दु:खजीवन्मुक्तत्त्वमेति च। उ0 प्र0 6/6 

सकाम कर्म क इसमें कोर्इ उपयोग नहीं है। क्योंकि मृगतृष्णार् में होने वार्ले जल के भ्रम क निवार्रण करने के लिए ज्ञार्न क उपयोग ही देखार् गयार् है। ज्ञार्न से ही उस भ्रम की निवृत्ति होती है, किसी कर्म से नहीं। सत्संग तथार् सत्शार्स्त्रों के स्वार्ध्यार्य में तत्पर होनार् ही ब्रह्मज्ञार्न की प्रार्प्ति में हेतु है। वह स्वार्भार्विक सार्धन ही मोह जार्ल क नार्शक होतार् है जिससे जीव के दु:ख क निवार्रण होकर वह जीवनमुक्त अवस्थार् को प्रार्प्त होतार् है। 

नन्दलार्ल दशोरार्। योग वशिष्ठ (महार्रार्मार्यण) पृ0 143 

इसलिए आत्मार् को सत्य जार्नकर उसी की भार्वनार् करो और संसार्र को असत् जार्नकर इसकी भार्वनार् को त्यार्ग कर दो, क्योंकि सबक अधिष्ठार्न आत्मतत्त्व ही है। वह आत्मतत्त्व शुद्धरूप परमशार्न्त और परमार्नन्द पद है। उसको प्रार्प्त कर लेने पर परम सुख की प्रार्प्ति होती है।

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