यज्ञ क अर्थ, स्वरूप एवं प्रकार

‘यज्ञ’ क भार्वाथ-परमाथ एवं उदार्र-कृत्य है। ‘यज्ञ’ शब्द पार्णिनीसूत्र ‘‘यजयार्चयतविच उप्रक्चरक्षो नड़्’’ में नड़् प्रत्यय लगार्ने पर बनतार् है अर्थार्त् यज्ञ शब्द ‘यज्’ धार्तु से बनार् है, यज् धार्तु के तीन अर्थ हैं- देवपूजन, दार्न और संगतिकरण। इस प्रकार हवि यार् हवन के द्वार्रार् देवतार्ओं क पूजन क नार्म ‘यज्ञ’ है। र्इश्वरीय दिव्य शक्तियों की आरार्धनार्, उपार्सनार्, उनकी समीपतार्, संगति तथार् अपनी समझी जार्ने वार्ली वस्तुओं को उनको अर्पण करनार्, यह यज्ञ की प्रक्रियार् है। देवगुण सम्पन्न सत्पुरुषों की सेवार् एवं संगति करनार् तथार् उन्हें सहयोग देनार् भी यज्ञ है। व्यार्वहार्रिक अर्थ में इसे यों भी कह सकते हैं कि बड़ों क सम्मार्न, बरार्बर वार्लों से संगति, मैत्री तथार् अपने से छोटों को, कम शक्ति वार्लों को दार्न यार् सहार्यतार् करनार् यज्ञ है। इस प्रकार र्इश्वर उपार्सनार्, सत् तत्व क अभिवर्द्धन एवं पार्रस्परिक सहयोग भी यज्ञ मार्ने जार्ते हैं। यों हवन के अर्थ में यज्ञ शब्द क प्रयोग तो प्रसिद्ध ही है। हवन द्वार्रार् उपर्युक्त तीनों प्रयोजन पूर्ण होते हैं।
देवार्नार्ं द्रव्यं हविषार्ं ऋक् सार्मप यजुशार्ंतथार्।
ऋत्वजार्ं दक्षिणार्नार्ं च संयोगी यज्ञ उच्चतेमत्स्य पुरार्ण।
देवों क हवि प्रदार्न, वेद मंत्रों क उच्चार्रण, ऋत्विजों को दक्षिणार्-इन तीनों कार्यों क संयोग यज्ञ कहलार्तार् है।
इज्यंते चत्वार्रो वेदार्: सार्ंग: सरहस्यार्: सच्छिश्येभ्य: संप्रदीयंते,
उपदिष्ययन्तेद्ध सदार्चार्य्यरैयेन वार् सार् यज्ञ:।
विद्वार्न आचायों द्वार्रार् सत्पार्त्र शिष्यों को अंग-उपार्ंगों सहित वेदों क पढ़ार्नार् यज्ञ है।
येन सदनुष्ठार्नेन इंद्रार्णि देवार्: सुप्रसन्नार्: सुवर्षश्टं कुर्यस्तत् पदार्भियोम्।
जिस कार्य से इंद्रार्दि देव प्रसन्न होकर उत्तम वर्षार् करें उसे यज्ञ कहते हैं।
येन सदनुष्ठार्नेन स्वर्गार्दि प्रार्प्ति: सुलभार्: स्यार्त् तत् यज्ञ पदार्भियोम्।
जिस अयोजन द्वार्रार् स्वर्ग आदि सद्गति को प्रार्प्त करनार् सुलभ हो वह यज्ञ है।
येन सदनुष्ठार्नेन आध्यार्त्मिक आधिदैविक आधिभौतिक तार्पत्रार्योन्मूलनंसुकरं स्यार्त्
तत यज्ञ पदार्भियोम्।
जिस सद् अनुष्ठार्न द्वार्रार् आध्यार्त्मिक, आधिभौतिक तीनों प्रकार के कष्टों क निवार्रण हो वह यज्ञ कहार् जार्तार् है।
संगतिकरण यजनं धर्म देश जार्ति मर्यार्दार् रक्षार्यै महार्पुरुषार्णार् मेकीकरणं यज्ञ:।
अर्थार्त श्रेष्ठ पुरुषों को धर्म, देश, जार्ति की मर्यार्दार् की रक्षार् के लिए संगठित एवं एकत्रित करनार् यज्ञ है।
इज्यन्ते संगतिक्रियन्ते विश्व कल्यार्णार्ार् महार्त्तो विद्वार्ंस: वैदिक शिरार्मण्य: निमंत्रयंते अस्मित्रिति यज्ञ:।
जहार्ँ विश्व कल्यार्ण के लिए श्रेष्ठ, विद्वार्न, वेदज्ञ पुरुषों को आमंत्रित एवं एकत्रित कियार् जार्तार् है वह यज्ञ है।
इज्यन्ते स्वकीय वंधुवार्वार्ंधवदय: प्रेम सम्मार्न भ्ज्ञार्ज: संगति करण्यार्य आहूयंते प्रार्थ्यते च येन कर्मणेति यज्ञ:।
जिस आयोजन में बंधु-बार्ंधवों, स्नेह-सम्बन्धियों को पार्रस्परिक संगठन के लिए प्रेम एवं सम्मार्न के सार्थ एकत्रित कियार् जार्तार् है वह यज्ञ है।
दार्नयजनं यथार् शक्ति काल पार्त्रार्दि विचार्र पुरस्पर द्रव्यार्दि त्यार्ग। अर्थार्त् देश काल पार्त्र क विचार्र करके सुद्देश्य के लिए जो धन दियार् जार्तार् है उसे यज्ञ कहते हैं।
इज्यन्ते भगवति सर्वस्वं येन वार्य यज्ञ:
भगवार्न को आत्मसमर्पण करने की क्रियार् यज्ञ है।
ऋशियों ने यज्ञ को इस संसार्र चक्र क धुरी कहार् है।
‘‘यज्ञो वै विश्वस्य भुवनस्य नार्भि:।’’ (ऋग्वेद)
गीतार् में भगवार्न कृश्ण ने यज्ञ को मनुश्य क जुड़वार् भाइ कहार् है।
‘सहयज्ञार्: प्रजार् सृष्टार् पुरोवार्च: प्रजार्पति:। (गीतार् 3/10)

यज्ञ क स्वरूप – 

यज्ञ क वार्स्तविक स्वरूप बतलार्ते हुए आचाय श्रीरार्म शर्मार् स्वष्ट करते हैं कि ‘‘अध्यार्त्म और विज्ञार्न क प्रत्यक्ष मार्ध्यम यज्ञ है। आत्मसंयम की तपश्चर्यार् और भार्वनार्त्मक केंन्द्रीकरण की योग-सार्धनार् क समन्वय ब्रह्मविद्यार् कहलार्तार् है। उसे अध्यार्त्म विज्ञार्न क भार्वपक्ष कह सकते हैं। द्वितीय क्रियार् पक्ष यज्ञ है।’’

‘यज्ञ विश्व बह्मार्ण्ड’ की नार्भि है- इसक तार्त्पर्य है कि ब्रह्मार्ण्ड के सूक्ष्म तत्वों क पोशण एवं विकास यज्ञ से ही सम्भव है। इसी तथ्य को स्वीकार करते हुए आचाय शर्मार् क विवेचन है कि मनुश्य अनेक सू़क्ष्म तत्त्वों को ब्रह्मार्ण्ड से निरन्तर ग्रहण करतार् है, अत: मनुश्य क भी कर्त्तव्य है कि वह भी ब्रह्मार्ण्ड क यह ऋण चुकाए। यह कथन अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं है कि ‘ यज्ञ समश्टि जगत क पार्लनकर्तार् है, क्योंकि यज्ञ क संबंध ब्रह्मार्ण्ड से है। अत: ब्रह्मार्ण्ड की दिव्यशक्तियों क अभ्युदय यज्ञ से ही संभव वस्तुत: अग्नि ‘यज्ञ’ क उपचार्र स्वरूप है, परन्तु वह अध्यार्त्म अर्थार्त् चेतन जगत क अत्यन्त प्रभार्व शार्ली ऊर्जार् केंद्र भी है। यज्ञ से ही व्यक्ति सूक्ष्म जगत से सम्पर्क करने में समर्थ होतार् है। अत: यज्ञ महत्वपूर्ण है। ऋशियों ने यज्ञीय ऊर्जार् के सम्बन्ध में विशद् अनुसंधार्न कियार् थार्। यज्ञ शब्द के तीन अर्थ हैं दार्न, देवपूजन, संगतिकरण। इन्हें प्रकारार्ंतर से उदार्रतार्, उत्कृष्टतार् एवं सहकारितार् की दिशार्धार्रार् कहार् जार् सकतार् है। यज्ञीय दर्शन को जीवन में उतार्रने वार्लार् कोर्इ भी व्यक्ति इसी जीवन में स्वस्थ, समृद्ध, एवं सुसंस्कृत रह सकतार् है। ऐसे व्यक्ति को आंतरिक प्रसन्नतार् एवं बार्ह्य प्रफुल्लतार् क अभार्व नहीं रहतार्। यज्ञकृत्य करार्ने और सम्मिलित होने वार्लों को प्रत्येक विधि-विधार्न की व्यार्ख्य करते हुए यह समझार्यार् जार्तार् है कि उनक चिंतन और चरित्र, दृष्टिकोण एवं व्यवहार्र निरन्तर उत्कृष्टतार् की ओर बढ़तार् रहे। उद्गार्तार् यही गार्ते हैं, अध्वर्यु यही सिखार्ते हैं, ब्रह्मार् इसी की योजनार् बनार्ते हैं और आचाय को ऐसी व्यवस्थार् बनार्नी होती है कि इसी प्रकार क भार्व उस समूचे वार्तार्वरण पर छार्यार् रहे। रोगोपचार्र के पीछे यही तथ्य छिपार् है कि नीतित्वार्न, निरोग, बलिष्ठ एवं दीर्घजीवी होतार् है। यज्ञ के पुनीत अनुष्ठार्न के सार्थ ही इसी नीतिदर्शन को प्रत्येक यार्चक को समझार्यार् जार्तार् है।

यज्ञ-विज्ञार्न की अनुसंधार्न प्रक्रियार् क शुभार्रंभ जिन पक्षों से कियार् गयार् है वे हैं यज्ञ से रोग निवार्रण, स्वार्स्थ्य, सवर्द्धन, प्रकृति संतुलन एवं वनस्पति संवर्द्धन, दैवी अनुकूलन, समार्ज, शिक्षण शक्ति जार्गरण तथार् यज्ञ की विकृतियों एवं विसंगतियों में सुधार्र। शोध की परिधि असीम है, परन्तु प्रार्रम्भिक प्रयार्स के रूप में यज्ञ विज्ञार्न के इन्हीं प्रमुख आठ पक्षों को प्रयोग-परीक्षण की कसौटी पर रखार् गयार् है।

यज्ञ-प्रक्रियार् की शोध के अनेकानेक आयार्म हैं हविष्य धूम्र, यज्ञार्वशिष्ट, मंत्रोच्चार्र में सन्निहित शब्दशक्ति, यार्जक गणों क व्यक्तित्व एवं उपवार्स, मौन प्रार्यश्चित आदि धर्मार्नुष्ठार्नों से जुड़ी तपश्चर्यार्एं। इन प्रयोजनों क शार्स्त्रों में उल्लेख तो है, पर उनके विधार्नों, अनुपार्तों और सतर्कतार्ओं क वैसार् उल्लेख नहीं मिलतार्, जिसके आधार्र पर समग्र उपचार्र बन पड़ने की निश्चततार् रह सके। यज्ञ-विद्यार् को सार्ंगोपार्ंग बनार्ने के लिए शार्स्त्रों के सार्ंकेतिक विधार्नों को वैज्ञार्निक एंव सर्वार्ंणपूर्ण बनार्नार् होगार्। यह कार्य पुरार्तन के आधुनिक शोध द्वार्रार् ही संभव है।

इस सम्बन्ध में जितनार् भी कुछ वर्णन अब तक वैज्ञार्निकों को उपलब्ध हुआ है, उससे इन प्रयोगों की प्रार्मार्णिकतार् क पतार् चलतार् है। पौरार्णिक आख्यार्नों में इन प्रयोगों की वैज्ञार्निकतार् क विस्तृत विवेचन तो नहीं है, परन्तु इस ओर संकेत अवश्य हैं। रार्म क जन्म, च्यवन ऋषि क आयुष्य, अपार्लार् क रोग निवार्रण यज्ञ-प्रक्रियार् द्वार्रार् ही संभव वर्णित किए गए हैं। चरक और सुश्रुत ने तो विधिवत नस्य विभार्ग स्थार्पित किये थे। धन्वंतरि ने जटिलतम रोगों की इस प्रक्रियार् द्वार्रार् ठीक कियार्, ऐसे वर्णन पढ़ने को मिलते हैं। वनौषधियों को देवोपम महत्तार् देकर उनक सदुपयोग क जैसार् वर्णन अध्यार्त्म ग्रंथों में कियार् गयार् है, उसे देखते हुए भार्रत के पुरार्तन गौरव के प्रति नतमस्तक हो जार्नार् पड़तार् है। आधुनिक परिप्रेक्ष्य में इन समस्त प्रतिपार्दनों को बुद्धिगम्य बनार्ने एवं तर्कबुद्धि के गले उतार्रने के लिए एक ऐसे ही तंत्र की आवश्यकतार् थी, जैसार् कि ‘ब्रह्मवर्चस शोध संस्थार्न’ की प्रयोगशार्लार् में स्थार्पित कियार् गयार् है।

यज्ञों में यजन हेतु विभिन्न हविष्य पदाथ प्रयुक्त होते हैं। हविष्य क निर्धार्रण हर विशिष्ट रोगी के लिए अलग-अलग कियार् जार्तार् है। बलवर्द्धक और रोगनिवार्रक दोनों ही तत्वों को ध्यार्न में रखनार् होतार् है। यज्ञ-चिकित्सार् के मूल स्वरूप को समझने के लिए वार्ष्पीकरण सिद्धार्न्त की वैज्ञार्निकतार् को समझनार् होगार्।

हविष्य के होमीकृत होने के पीछ ‘सूक्ष्मतार्’ क दर्शन छिपार् पड़ार् है। सूक्ष्मीकरण से शक्ति क विस्तार्र होतार् है। होम्योपैथी की दवार्एं इस सिद्धार्न्त पर कार्य करती हैं। दवार्ओं की सूक्ष्मतार् बढ़ार्कर उनकी पोटेन्सी में वृद्धि की जार्ती है। ‘डीशेन’ की दवार्ओं में सार्धार्रण जड़ी-बूटियों की अधिक पिसार्इ-कुटाइ करके उनकी आणविक ऊर्जार् को उभार्रार् जार्तार् है। फलत: वे अधिक लार्भदार्यक सिद्ध होती हैं। सूक्ष्मतार् क अपनार् स्वतंत्र विज्ञार्न है, जिसमें वस्तुओं की अदृश्य स्थिति क ही पतिपार्दन नहीं है, वरन यह सिद्धार्न्त भी सम्मिलित है कि स्थूल के अंतरार्ल में छिपार् सूक्ष्म कितनार् अधिक सार्मथ्र्यवार्न है।

औषधियों क वार्ष्पीकरण दो प्रकार के प्रभार्व छोड़तार् है। प्रथम तो उसकी सार्मथ्र्य कर्इ गुनी अधिक हो जार्ती है। दूसरार् उसक प्रभार्व निकटवर्ती व्यक्तियों, वार्तार्वरण, जीव-जन्तुुओं एवं वनस्पतियों पर पड़तार् है। मुख द्वार्रार् दी गर्इ औषधि पर आमार्शय के विभिन्न पार्चक रसों की प्रतिक्रियार् होती है। तदुपरार्ंत व्यक्ति विशेष की सार्मथ्र्य के अनुसार्र उसक कुछ अंश रक्त में जार्कर शेष मल-मूत्र माग से बार्हर उत्सर्जित कर दियार् जार्तार् है। इस प्रकार औषधि क प्रभार्व निश्चित ही मुखमाग द्वार्रार् दी गर्इ औषधि से अधिक और तुरन्त होतार् है। परन्तु उनके भी सूक्ष्म जीवकोशों-ऊतकों तक पहुंचने की पूरी संभार्वनार् सुनिश्चित नहीं है। वार्ष्पीकरण ऊर्जार् के मार्ध्यम से औषधि प्रवेश हेतु इसी माग को प्रयुक्त कियार् जार्तार् है।

पार्श्चार्त्य चिकित्सार् पद्धति में भी कर्इ औषधियार्ं श्वार्स माग से दी जार्ती हैं। श्वार्स रोगी को शीघ्र आरार्म दिलार्ने हेतु औषधि मस्तिष्क के ऊतकों में प्रार्ण-संचार्र हेतु ऑक्सीजन एवं ऑपरेशन हेतु मूिच्र्छत किए जार्ने के लिए औषधियार्ं इसी माग से दी जार्ती हैं। ऐसार् इसलिए कि प्रभार्व तुरन्त हो एवं सुनिश्चित हो। नार्सिक माग को इसीलिए प्रधार्नतार् दी गर्इ है कि औषधियार्ँ आंतरिक अवयवों एवं कोष्ठकों तक पहुंचकर अपनार् प्रभार्व समग्र रूप में शीघ्र दर्शार् सके।

शरीर वैज्ञार्निकों के अनुसार्र प्रत्येक श्वार्स अठ्ठार्रह बार्र प्रति मिनट के सार्थ प्रार्णवार्यु ऑक्सीजन क अंदर प्रवेश होतार् है। वह सह वार्युकोष्ठकों, एलविओलस के मार्ध्यम से रक्त में मिलती हैं। इसके सार्थ ही रक्त द्वार्रार् लार्ए गए ऊतकों के निष्कासित द्रव्य कार्बन डार्इऑक्सार्इड गैस के रूप में बार्हर नि:श्वार्स फेंक दिए जार्ते हैं। प्रति 4 सेकंड में होने वार्ली इस प्रक्रियार् द्वार्रार् जो संपर्क ऑक्सीजन क रक्त में होतार् है वह वार्युकोष्ठकों की संरचनार् की अद्भुततार् के कारण सहों गुनार् होतार् है। इस तरह जिस औषधि क सीमित मार्त्रार् में उपयोग अन्य भार्गों द्वार्रार् उसे शरीर के कुछ ही भार्गों तक पहुंचार्तार् है, वह उसे कर्इ गुने अनुपार्त में पूरे शरीर के विभिन्न कोष्ठकों तक पहुंचार्कर अपनार् प्रभार्व दिखार्ने में सफल होतार् है।

यज्ञों के प्रकार

इस महत्त्वपूर्ण यज्ञ कार्य के भेद-उपभेदों की गणनार् करनार् सार्धार्रण कार्य नहीं है। गीतार् के चतुर्थार्ध्यार्य के यज्ञनिरूपण-प्रकरण में यज्ञ के 15 मुख्य भेद बतलार्ए गये हैं। यदि इनकी विभिन्न शार्खार्ओं की गणनार् की जार्य, तो यज्ञ क्षेत्र को ‘अनन्त’ कहकर ही विश्रार्म करनार् पड़ेगार्। अतएव हम इन भेदों की ओर न जार्कर यज्ञकर्म के मुख्य शार्स्त्र कल्प और उसके विद्वार्नों की परम्परार् की ओर ही ध्यार्न देकर कुछ उपयोगी विचार्र उपस्थित करते हैं।
महर्षि वेदव्यार्स की उत्कृष्ट रचनार् श्रीमद्भार्गवत भगवार्न के श्रीमुख क यह वचन है-

वैदिकस्तार्न्त्रिको मिश्र इति मे त्रिविधोन्मुख:।। – 11/27/7

इसके अनुसार्र सार्मार्न्यत: वैदिक, तार्न्त्रिक और मिश्र ये तीन यज्ञार्नुष्ठार्न की शैलियार्ँ ज्ञार्त होती हैं। यहार्ँ तार्ंत्रिक शब्द से तंत्र दर्शन प्रतिपार्दन योगार्दिक्रियार्ओं का, तथार् कर्इ विचार्रक दक्षिण और वार्ममाग नार्म से प्रसिद्ध तंत्रपद्धति के कार्यों क निर्देश बतार्ते हैं। परन्तु यार्ंत्रिक विचार्रकों के अनुसार्र- कर्मणार्ं युगपद्भार्वस्तन्त्रम्’-1/7/1 इस कात्यार्यन महर्षि की परिभार्षार्नुसार्र एक कार्य में ही विभिन्न शार्खार्ओं में प्रतिपार्दित अनेकतार्ओं की अविरोधी संकलन करनार् ‘तंत्र‘ शब्द क अर्थ है। ऐसे ही कार्यों को ‘तार्ंत्रिक’ कार्यों के लिए आजकल स्मात शब्द क व्यवहार्र प्रचलित है। शार्स्त्रकारों ने स्मात शब्द की जो व्यार्ख्यार् की है, उससे भी अनेक शार्खार्ओं तथार् अनेक वेदों के कार्यों क एक जगह सम्मिश्रण मार्नार् गयार् है।

उक्त यार्ज्ञिक विचार्र से यज्ञ की श्रौत (वैदिक) स्मात (तार्ंत्रिक) और पौरार्णिक (मिश्र) ये तीन मुख्य शैलियार्ँ हैं।

1. श्रौतयज्ञ :-

श्रुति अर्थार्त दवेद के मंत्र और ब्रार्ह्मण नार्म के दो अंश हैं। इन दोनों में यार् दोनों में से किसी एक में सार्ंगोपार्ंग रीति से वर्णित यज्ञों को श्रौतयज्ञ कहते हैं। श्रौत कल्प में ‘यज्ञ’ और होम दो शब्द हैं। जिसमें खड़े होकर वषट् शब्द के द्वार्रार् आहुति दी जार्ती है और यार्ज्यार् पुरोनुवार्क्य नार्म के मंत्र पढ़े जार्ते हैं, वह कार्य ‘यज्ञ’ मार्नार् जार्तार् है। जिसमें बैठकर स्वार्हार् शब्द के द्वार्रार् आहुति दी जार्ती है यह होम कहार् जार्तार् है। श्रौतयज्ञ-इष्टियार्ग, पशुयार्ग और सोमयार्ग इन नार्मों से मुख्यतयार् तीन भार्गों में विभक्त है। श्रौतयज्ञों के विधार्न की एक स्वतंत्र परम्परार् है, उस प्रयोग परम्परार् क जिस कार्य में पूर्णतयार् उल्लेख हो उसे ‘प्रकृतिक यार्ग’ कहते हैं और जिस कार्य में विशेष बार्तों क उल्लेख और शेष बार्तें प्रकृतियार्ग से जार्नी जार्यें उसे विकृतियार्ग कहते हैं। अतएव श्रौतयज्ञों के तीन मुख्य भेदों में क्रमश: दर्शनपूर्णमार्सेष्टि, अग्रीपोमीय पशुयार्ग और ज्योतिष्टोम सोमयार्ग के प्रकृतियार्ग हैं। अर्थार्त् इन कर्मों में किसी दूसरे कर्म से विधि क ग्रहण नहीं होतार् हैं इन प्रकृतियार्गों के जो धर्म ग्रार्ही विकृतियार्ग है वे अनेक हैं। उनकी इयत्तार् क संकलन भिन्न-भिन्न शार्खार्ओं के श्रौतसूत्रों में कियार् गयार् है। यहार्ँं उनक बिनार् परिचय के नार्म गिनार्नार् अनुपयुक्त और अरोचक होगार्। अत: श्रौत यज्ञ क सर्व सार्मार्न्य परिचय इस प्रकार समझनार् चार्हिए।

श्रौतयज्ञ-आहवनीय, ग्राह्यपत्य, दक्षिणार्ग्नि इन तीन अग्नियों में होते हैं इसलिए उन्हें त्रेतार्ग्नियज्ञ भी कहते हैं। प्रार्य: सभी श्रौत यज्ञों में प्रत्यक्ष यार् अप्रत्यक्ष ढंग से कम यार् अधिक रूप से तीनों ही वेदों के मंत्रों क उच्चार्रण होतार् है, अत: श्रौत यज्ञ ‘त्रयी’ सार्ध्य हैं। इनमें यजमार्न स्वयं शरीर क्रियार् में उतनार् व्यस्त नहीं रहतार् जितनें अन्य ब्रार्ह्मण जिन्हें ऋत्विज कहते हैं वे कार्य संलग्न रहते हैं।

2. स्मात यज्ञ –

इनक श्रौत सूत्र कारों ने पार्क यज्ञ तथार् एकाग्नि शब्द से व्यवहार्र कियार् है। इनके मुख्यतयार् हुत, आहुत और प्रतिशत ये चार्र भेद है- जिन कार्यों में अग्नि में किसी विहित द्रव्य क हवन होतार् हो, वह हुत यज्ञ है। जिससे हवन न होतार् हो केवल किसी क्रियार् क करनार् मार्त्र हो वह अहुत यज्ञ है। जिसमें हवन और देवतार्ओं के उद्देश्य से द्रव्य क ‘बलि’ संज्ञार् से त्यार्ग हो, वह हुत यज्ञ है और जिसमें भोजन मार्त्र ही हो वह प्रतिशत यज्ञ है।

स्मात यज्ञ क आधार्र भूत अग्नि शार्स्त्रीय और लौकिक दोनों प्रकार होतार् है। शार्स्त्रीय अर्थार्त् आधार्न विधि के द्वार्रार् स्वीकृत अग्नि औपार्सन, आवसथ्य, गृह्य, स्मात आदि शब्दों से कहार् जार्तार् है। इस अग्नि में जिसने उसको स्वीकार कियार् है, उसके सम्बन्ध क ही हवन हो सकतार् है। सार्धार्रण अग्नि लौकिक अग्नि है। इसे संस्कारों द्वार्रार् परिशोधित भूमि में स्थार्पित करके भी स्मात यज्ञ होते हैं। स्मात यज्ञों की संख्यार् श्रौत यज्ञों की भार्ंति अत्यधिक नहीं है। इन यज्ञों की विधि और इयत्तार् बतार्ने वार्ले ग्रन्थ को ‘गृह्यसूत्र‘ यार् स्मात सूत्र कहते हैं। पंचमहार्यज्ञ, शोडसंस्कार और औध्वदैहिक (प्रचलित मृत्यु के बार्द की क्रियार्) प्रधार्नतयार् स्मात हैं। स्मृति ग्रन्थों में उपदिष्ट कार्य जिनक (विनार्यक शार्ंति आदि का) पूर्ण विधार्न उपनध गृह्यसूत्रों में नहीं मिलतार् है, वे भी यार्ज्ञिकों की परम्परार् में स्मात ही कहलार्ते हैं। स्मात यज्ञ में प्रार्य: अकेलार् व्यक्ति भी कार्य कर सकतार् है। हवन वार्ले कार्यों में एक ब्रह्मार् की तथार् भोजनार्दि में अनेक व्यक्तियों की आवश्यकतार् होती है। गृह्यसंस्कार ने स्मात यज्ञों में यजमार्न ब्रह्म और आचाय (नार्मभेद) इन तीन की आवश्यकतार् बताइ है।

इस समय शार्स्त्रीय अग्नि वार्ले कार्य प्रार्य: अग्नि वार्ले कार्य प्रार्य: लुप्त से हो गये हैं, क्योंकि इनमें भी अग्निरक्षार् आदि क कार्य आजकल की प्रवृत्ति के अनुकूल नहीं बैठ पार्तार्। जिनमें लौकिक अग्नि क ग्रहण है वे संस्कार, उपार्कर्म, अन्तेष्टि आदि प्रचलित हैं पर वे भी गिनी चुनी संख्यार् में हैं स्मात यज्ञों में मार्नव के नैतिक गुणों के विकास क फल अधिक है। आज की बढ़ती हुर्इ अनैतिकतार् में हमार्रे लिए भी एक कारण हो।

3. पौरार्णिक यज्ञ :-

श्रुति स्मृति कथित कार्यों के अधिकारी अनार्धिकारी सभी व्यक्तियों के लिए पौरार्णिक कार्य उपयोगी है। आज कल इन्हीं क प्रचार्र और प्रसार्र है। पौरार्णिक कार्यों में यज्ञ शब्द क प्रयोग कल्प सूत्रकारों की यार्ज्ञिक दृष्टि से उपयुक्त नहीं है। परन्तु गीतार् के व्यार्पक क्षेत्र से इनके लिए भी ‘यज्ञ’ शब्द क व्यवहार्र होतार् है। अतएव पौरार्णिक यज्ञों को हवन, दार्न, पुनरक्षण, शार्न्तिकर्म, पौष्टिक, इष्ट पूर्त्त व्रत, सेवार्, आदि के रूप से अनेक श्रेणियों में विभक्त कियार् गयार् है। जिन जार्तियों को वेद के अध्ययन क अधिकार है, वे पौरार्णिक यज्ञों को वेदमंत्रों सहित करते हैं और जिन्हें वेद क अधिकार नहीं है, उनको पौरार्णिक मंत्रों से ही करते हैं। हमने भी सभी वर्गों की उपयोगितार् की दृष्टि से इनक यह निर्देश कियार् है।

पौरार्णिक यज्ञों क विस्तार्र अधिक है, अतएव यहार्ँ इनक पृथक-पृथक विवेचन करनार् संभव नहीं हो सकतार्। सार्धार्रणतयार् पौरार्णिक यज्ञों में गणपति पूजन, पण्यार्हवार्चन, शोडशमार्तृक पूजन, वसोर्धार्रार् पूजन, नार्न्दी श्रार्द्ध, इन पार्ंच स्मात अंगों के सार्थ ग्रहयार्ग प्रधार्नपूजन आदि विशेष रूप से होतार् है। इन यज्ञों में लौकिक हजार्रों तक कार्यक्षम व्यक्ति कार्य के अनुसार्र ‘ऋत्विज्’ बनार्ए जार् सकते हैं। पौरार्णिक यज्ञों के विस्तार्र में न जार्कर यहार्ँ संक्षेप में श्रुति प्रतिपार्दित यज्ञों क परिचय दियार् जार् रहार् है। यों तो यज्ञ के अंसख्य भेद अर्थार्त प्रकार शार्स्त्रों में वर्णित हैं। उन सबक केवल नार्मोल्लेख भी इस छोटे से लेख में नहीं कियार् जार् सकतार्, तो उनके स्वरूप क वर्णन, उसके अनुष्ठार्न के प्रकार एवं अवार्न्तर अंग-उपार्ंग आदि क संक्षेपत: भी वर्णन यहार्ं किस तरह कियार् जार् सकतार् है। कर्इ यज्ञ तो ऐसे हैं, जिनके अनुष्ठार्न क न तो आज तक कोर्इ अधिकारी ही है न अनेक कारणों से उसक अनुष्ठार्न कियार् ही जार् सकतार् है। जैसे भगवार्न अनन्त, अपार्र हैं, वैसे ही उनके स्वरूप भूत वेद तथार् तत्प्रतिद्यार्त यज्ञ की महिमार् भी आनन्द अपार्र है।

यज्ञों के विविध प्रकार :- श्रुति में वैदिक कर्मों के पार्ंच विभार्ग बतलार्ये गये हैं- 1. अग्निहोत्र 2. दर्श-पूर्णमार्स, 3. चार्तुर्मार्स 4. पशु, 5. सोम। स्मृति में यज्ञों क विभार्ग निम्न प्रकार से कियार् है- 1. पार्कयज्ञ संस्थार्, 2. हविर्यज्ञ संस्थार्, 3. सोम संस्थार्। पार्क यज्ञ सस्थार् में- 1. औपार्सन होम, 2. वैश्वदेव, 3. पावण 4. अष्टका, 5. मार्सिश्रार्द्ध, 6 श्रार्वणार्, 7. शूलयण, 4. चार्तुर्मार्स, 5. निरूढ पशु बन्ध, 6. सौत्रार्यणि और 7. पिण्डपितृयज्ञ हैं। सोम संस्थार् में 1. अग्निष्टोम, 2. अत्यग्निष्टोम 3. उक्थ्य, 4. शोडशी, 5. वार्जपेय, 6. आतिरार्त्र और 7. अप्तोर्यार्म क समार्वेश होतार् है। इस तरह ‘‘गौतम धर्मसूत्र‘‘ में श्रौतस्मात कर्मों की संख्यार् मिलार्कर 21 यज्ञ बतलार्ये हैं। इनमें पार्कयज्ञ संख्यार्ओं क निरूपण गृह्यसूत्रों एवं ब्रार्ह्मणार्त्मक देवभार्ग में कियार् गयार् है।

इस तरह श्रौत-स्मात यज्ञों में से कुछ क नार्म निर्देशमार्त्र ऊपर कियार् गयार् है। इसक संक्षिप्त विवरण लिखने में एक वृहत् ग्रन्थ लिखनार् पड़ जार्येगार्। इन यज्ञों के अतिरिक्त बहुत से पौरार्णिक, तार्ंत्रिक एवं आगमोक्त यज्ञ हैं, जैसे कि विष्णुयार्ग, रुद्रयार्ग, महार्रुद्र, अतिरुद्र, गणेशयार्ग, चण्डयार्ग, गार्यत्री-यार्ग, सूर्ययार्ग, विनार्यकशार्ंति, ग्रहशार्ंति, अद्भुतशार्ंति, महार्शार्ंति, ऐन्द्रीशार्ंति, लक्षहोम, कोटिहोम, वैष्णवेष्टि, वैभवीष्टि, पार्द्यी, र्इष्टि, नार्रार्यणी, वार्रूदेवी, गार्रूढी, वैवूही, पार्वमार्नी, आनन्ती, वैश्वक्सेनी, सौदर्शनी, पवित्रष्टि, आदि अनेक यज्ञों क विधार्न पार्यार् जार्तार् है। प्रत्येक गृहस्थ के लिए परमार्वश्यक नित्य कर्तव्य उन पार्ंच महार्यज्ञों में से एक भी आज विरल आचरण देखने में आतार् है, जिनके न करने में दोष बतलार्यार् गयार् है। ये पार्ंच महार्यज्ञ हैं- ब्रह्मयज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ और मनुष्य यज्ञ इन्हीं के आहुत, हुत, प्रहुत, ब्रह्महुत और प्रार्शित नार्म बतलार्ये गये हैं।

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