मौलिक अधिकार के प्रकार एवं विशेषतार्एं
भार्रत संविधार्न में सार्त मौलिक अधिकार वर्णित थे। यद्यपि वर्ष 1976 में 44वें संविधार्न संशोधन द्वार्रार् मौलिक अधिकारों की सूची में से संपत्ति क अधिकार हटार् दियार् गयार् थार्। तब से यह एक कानूनी अधिकार बन गयार् है। अब कुल छ: मौलिक अधिकार है।

  1. समार्नतार् क अधिकार (अनुच्छेद 14 से 18)
  2. स्वतंत्रतार् क अधिकार (अनुच्छेद 19 से 22)
  3. शोषण के विरूद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 से 24)
  4. धामिक स्वतंत्रतार् क अधिकार (अनुच्छेद 25 से 28)
  5. सार्ंस्कृतिक एवं शैक्षणिक अधिकार (अनुच्छेद 29 से 30)
  6. संवैधार्निक उपचार्रों क अधिकार (अनुच्छेद 32)

समार्नतार् क अधिकार 

भार्रतीय समार्ज के व्यार्प्त असमार्नतार्ओं एवं विषमतार्ओं को दूर करने के लिए संविधार्न के अनुच्छेद 14 से 18 में समार्नतार् के अधिकार क उल्लेख कियार् गयार् है।

  1. विधि के समक्ष समार्नतार् – अनुच्छेद 14 के अनुसार्र ‘‘भार्रत रार्ज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समार्नतार् से वंचित नहीं कियार् जार्वेगार्। आशय कानून की दृष्टि से सब नार्गरिक समार्न है।
  2. सार्मार्जिक समार्नतार् – अनुच्छेद 15 के अनुसार्र रार्ज्य किसी नगरिक के विरूध धर्म वंश जार्ति लिंग जन्म स्थार्न आदि के आधार्र पर नार्गरिकों के प्रति जीवन के किसी क्षेत्र में पक्षपार्त नहीं कियार् जार्वेगार्।
  3. अवसर की समार्नतार् – अनुच्छेद 16 की व्यवस्थार् के अनुसार्र रार्ज्य की नौकरियों के लिए सभी को समार्न अवसर प्रार्प्त होंगे।
  4. अस्पृश्यतार् क अंत –  अनुच्छेद 17 के अनुसार्र अस्पृश्यतार् क अंत कर दियार् गयार् है। किसी भी दृष्टि में अस्पृश्यतार् क आचरण करनार् कानून दृष्टि में अपरार्ध एवं दण्डनीय होगार्।
  5. उपार्धियों क अंत – अनुच्छेद 18 के अनुसार्र ‘‘सेनार् अथवार् शिक्षार् संबंधी उपार्धियों के अलार्वार् रार्ज्य अन्य कोर्इ उपार्धियार्ँ प्रदार्न नहीं कर सकतार्।

        समार्नतार् के अधिकार के अपवार्द 

        1. सार्मार्जिक समार्नतार् में सबको समार्न मार्नते हुए भी रार्ज्य स्त्रियों तथार् बच्चों को विशेष सुविधार्एं प्रदार्न कर सकतार् है और इसी प्रकार रार्ज्य सार्मार्जिक तथार् शिक्षार् की दृष्टि से पिछडे़ वर्गों, अनुसूचित जार्तियों तथार् अनुसूचित जनजार्तियों की उन्नति के लिए विशेष नियम बनार् सकतार् है।
        2. सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जार्तियों एवं जनजार्तियों के लिए कुछ स्थार्न सुरक्षित कर दिये गये हैं तथार् रार्ज्य द्वार्रार् जन्म-स्थार्न एवं निवार्स-स्थार्न तथार् आयु संबंधी योग्यतार् क निर्धार्रण कियार् जार् सकतार् है। 
        3. संविधार्न में उपार्धियों की व्यवस्थार् न होते हुए भी देश में सन् 1950 से भार्रत रत्न, पद्म विभूषण और पद्म श्री आदि उपधियार्ं भार्रत सरकार द्वार्रार् प्रदार्न की जार्ती हैं। सन् 1977 में जनतार् पाटी के सत्तार्रूढ़ होने पर इन उपार्धियों क अंत कर दियार् गयार् है और सार्थ ही उपार्धि प्रार्प्त व्यक्तियों द्वार्रार् उपार्धियों क प्रयोग को प्रतिबन्धित भी कर दियार् गयार् थार्, परंतु 24 जनवरी 1980 से इंद्रिरार् काँग्रेस द्वार्रार् भार्रत रत्न तथार् अन्य उपार्धियों एवं अलंकरणों को पुन: प्रार्रंभ कर दियार् गयार् थार्।

          स्वतंत्रतार् क अधिकार 

          स्वतंत्रतार् एक सच्चे लोकतत्र की आधार्रभूत स्तंभ होती है। संविधार्न के अनुच्छेद 19 से 22 तक इन अधिकारों क उल्लेख है।

          1. विचार्र एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रतार् – अनुच्छेद 19 के अनुसार्र भार्रत के प्रत्येक नार्गरिक को भार्षण लेखन एवं अन्य प्रकार से अपने विचार्र व्यक्त करने क अधिकार है।
          2. शार्ंतिपूर्व एवं नि:शस्त्र सभार् करने की स्वतंत्रतार् – अनुच्छेद 19 के अनुसार्र प्रत्येक नार्गरिक को शार्ंतिपूर्ण ढंग से बिनार् हथियार्रों के सभार् यार् सम्मेलन आयोजित करने क अधिकार है।
          3.  समुदार्य और संघ बनार्ने की स्वतंत्रतार् – भार्रतीय संविधार्न द्वार्रार् नार्गरिकों को समुदार्य और संघ बनार्ने की स्वतंत्रतार् प्रदार्न की गयी है। द भ्रमण की स्वतंत्रतार् – प्रत्येक भार्रतीय को को संपूर्ण भार्रत में बिनार् किसी रोकटोक के भ्रमण करने तथार् निवार्स की स्वतंत्रतार् है।
          4. अपरार्ध के दोष सिद्ध के विषय में संरक्षण की स्वतंत्रतार्- संविधार्न के अनुच्छेद 20 अनुसार्र कोर्इ भी व्यक्ति अपरार्ध के लिए तब तक दोषी नहीं ठहरार्यार् जार् सकतार् जब तक कि वह किसी ऐसे कानून क उल्लंधन न करे जो अपरार्ध के समय लार्गू थार् और वह उससे अधिक दण्ड क पार्त्र न होगार्।
          5. जीवन और शरीर रक्षण की स्वतंत्रतार् – संविधार्न के अनुच्छेद 21 के अनुसार्र किसी व्यक्ति को अपने प्रार्ण यार् शार्रीरिक स्वतंत्रतार् से विधि द्वार्रार् स्थार्पित प्रक्रियार् को छोड़कर अन्य किसी से वंचित नहीं कियार् जार् सकतार्।
          6. बंदीकरण से संरक्षण की स्वतंत्रतार् – संविधार्न के अनुच्छेद 22 के द्वार्रार् बंदी बनार्ये जार्ने वार्ले व्यक्ति को कुछ संवैधार्निक अधिकार प्रदार्न किये गये है। 
          इसके अनुसार्र कोर्इ भी व्यक्ति को बंदी बनार्ये जार्ने के कारण बतार्यें बिनार् गिरफ्तार्र यार् हिरार्सत में नहीं लियार् जार् सकतार् है। उसे यह अधिकार है कि वह अपनी पसंद के वकील की रार्य ले सकतार् है, मुकदमार् लड़ सकतार् है। अभियुक्त को 24 घण्टें के अंदर निकटत्म दण्डार्धिकारी के सार्मने प्रस्तुत कियार् जार्नार् होतार् है।

            स्वतंत्रतार् के अधिकार के अपवार्द 

            1. स्वतंत्रतार् क अधिकार असीमित नहीं है। रार्ष्ट्रीय हित और सावजनिक हित की दृष्टि से संसद कोर्इ भी नियम बनार्कर स्वतंत्रतार् के अधिकार को सीमित कर सकती है। 
            2. सिक्खों को उनके धर्म के अनुसर कटार्र धार्रण करने सभार् यार् सम्मेलन आयोजित करने क अधिकार दियार् गयार् है।
            3. कोर्इ भी नार्गरिक ऐसे समुदार्य यार् संघ क संगठन नहीं कर सकतार्, जिसक उद्देश्य रार्ज्य के कार्य में बार्धार् उत्पन्न करनार् हो 
            4. अनुच्छेद 22 के द्वार्रार् प्रदार्न किये गये अधिकार शत्रु-देश के निवार्सियों पर लार्गू नहीं होते।

              शोषण के विरूद्ध अधिकार 

              संविधार्न के अनुच्छेद 23 व 24 के अनुसार्र कोर्इ व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति क शोषण नहीं कर सकेगार्। इस संबंध में निम्न व्यवस्थार्एं की गयी है-

              1. मनुष्यों क क्रय-विक्रय निषेध – संविधार्न के अनुच्छेद 32 (1) के अनुसार्र मनुष्यों, स्त्रियों और बच्चों के क्रय-विक्रय को घोर अपरार्ध और दण्डनीय मार्नार् गयार् है।
              2.  बेगार्र क निषेध – संविधार्न के अनुच्छेद 24 के अनुसार्र, 14 वर्ष से कम आयु वार्ले बार्लकों को कारखार्नों अथवार् खार्नों में कठोर श्रम के कार्यों के लिए नौकरी में नहीं रखार् जार् सकेगार्।
              3. शोषण के विरूद्ध अधिकार क अपवार्द – इस अधिकार की व्यवस्थार् में सावजनिक उद्देश्य से अनिवाय श्रम की कोर्इ योजनार् लार्गू करने क रार्ज्य को अधिकार है। वस्तुत: शोषण के विरूद्ध अधिकार क उद्देश्य एक वार्स्तविक सार्मार्जिक लोकतंत्र की स्थार्पनार् करनार् है।

                धामिक स्वतंत्रतार् क अधिकार 

                धामिक स्वतंत्रतार् क अभिप्रार्य यह है कि किसी धर्म में आस्थार् रखने यार् न रखने के बार्रे में रार्ज्य कोर्इ हस्तार्क्षेप नहीं करेगार्। संविधार्न के अनुच्छेद 25 से 28 तक भार्रत के सभी नार्गरिकों के लिए धामिक स्वतंत्रतार् की व्यवस्थार् की गयी है। इस अधिकार के अंतर्गत निम्नलिखित स्वतंत्रतार्एं प्रदार्न की गयी हैं-

                1. धामिक आचरण एवं प्रचार्र की स्वतंत्रतार् – संविधार्न के अनुच्छेद 25 के अनुसार्रप्रत्येक व्यक्ति को अपने अत:करण की मार्न्यतार् के अनुसार्र किसी भी धमर् को अबार्ध रूप में मार्नने, उपार्सनार् करने आरै उसक प्रचार्र करने की पूर्ण स्वतंतत्रतार् है
                2. धामिक कार्यों के प्रबन्ध की स्वतंत्रतार् –  संविधार्न के अनुच्छदे 26 के द्वार्रार् सभी धमोर्ं के अनुयार्यियों को धामिक और दार्नदार्त्री संस्थार्ओं की स्थार्पनार् औ उनके संचार्लन धामिक मार्मलों क प्रबंध, धामिक संस्थार्ओं द्वार्रार् चल एवं अचल संपत्ति अर्जित करने रार्ज्य के कानूनों के अनुसार्र प्रबंध करने की स्वतंत्रतार् प्रदार्न की गर्इ है।
                3. धामिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रतार् –  संविधार्न के अनुच्छदे 26 के द्वार्रार् सभी धमोर्ं के अनुयार्यियों को धार्मिर्क और दार्नदार्त्री सस्ं थार्ओं की स्थार्पनार् और उनके संचार्लन, धामिक मार्मलों क प्रबंध, धामिक संस्थार्ओं द्वार्रार् चल एवं अचल संपत्ति अर्जित करके रार्ज्य के कानूनों के अनुसार्र प्रबध करने की स्वतंत्रतार् प्रदार्न की गयी है।
                4. व्यक्तिगत शिक्षण-संस्थार्ओं में धामिक शिक्षार् देने की स्वतंत्रतार् –  संविधार्न के अनुच्छेद 28 की व्यवस्थार् के अनुसार्र किसी रार्जकीय (रार्ज्य निधि से पूर्णत: पोषित) शिक्षण संस्थार् में किसी धर्म की शिक्षार् नहीं दी जार् सकती है।
                5. धामिक स्वतंत्रतार् के अधिकार के अपवार्द –  धामिक कट्टरतार् एवं धामिक उन्मार्द को रोकने के लिये रार्ष्ट्रीय एकतार् के उद्देश्य से सावजनिक हित में सरकार द्वार्रार् इस अधिकार पर प्रतिबंध लगार्यार् जार् सकतार् है।

                  संस्कृति और शिक्षार् संबंधी अधिकार

                  संविधार्न के अनुच्छेद 29 व 30 के द्वार्रार् नार्गरिकों को संस्कृति एवं शिक्षार् संबंधी दो अधिकार दिये गये है।

                  1. अल्पसंख्यार्कों के हितों क संरक्षण –  अनुच्छेद 29 के अनुसार्र अल्पसंख्यार्कों को अपनी भार्षार् लिपि यार् संस्कृति को सुरक्षित रखने क पूर्ण अधिकार है।
                  2. अल्पसंख्यकों को अपनी शिक्षण संस्थार्ओं की स्थार्पनार् एवं प्रशार्सन क अधिकार –  अनुच्छेद 30 के अनुसार्र धर्म यार् भार्षार् पर आधार्रित सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रूचि के अनुसार्र शिक्षण संस्थार्ओं की स्थार्पनार् और उनके प्रशार्सन क अधिकार है। यह अधिकार अल्पसंख्यार्कों को उनकी संस्कृति तथार् भार्ष के संरक्षण हेतु रार्ज्य से मिल रहे सहयोग को सुनिश्चित करतार् है।

                    संवैधार्निक उपचार्रों क अधिकार 

                    भार्रतीय संविधार्न में संवैधार्निक उपचार्रों क प्रार्वधार्न इंग्लैंड की कानूनी व्यवस्थार् क अनुकरण है। इंग्लैण्ड में यह कॉमन लॉ की अभिव्यक्ति है। इंग्लैण्ड में संविधार्न उपचार्र की रीट इस कारण जार्री की जार्ती थी कि सार्मार्न्य विधिक उपचार्रों उपयप्ति हैं। आगे चलकर ये रीट उच्च न्यार्यार्लय प्रदार्न करने लगार्, क्योंकि उसके मार्ध्यम से ही सम्रार्ट न्यार्यिक शक्तियों क प्रयोग करतार् थार्।

                    भार्रतीय संविधार्न ने नार्गरिकों को केवल मौलिक अधिकार ही प्रदार्न नहीं किये हैं, वरन् उनके संरक्षण की भी पूर्ण व्यवस्थार् की गयी है। अनुच्छेद 32 से 35 के अंतर्गत प्रत्येक नार्गरिक को यह अधिकार दियार् गयार् है कि वह अपने मौलिक अधिकारों की रक्षार् के लिए उच्च न्यार्यार्लय तथार् उच्चतम न्यार्यार्लय की शरण ले सकतार् है। संवैधार्निक उपचार्रों के अधिकार के महत्व के विषय में डॉभीमरार्व अम्बेडकर ने कहार् थार्; ‘‘यदि मुझसे कोर्इ यह पूछे कि संविधार्न क वह कौन-सार् अनुच्छेद है, जिसके बिनार् संविधार्न शून्यप्रार्य हो जार्येगार् तो मैं अनुच्छेद 32 की ओर संकेत करूंगार्। यह अनुच्छेद तो संविधार्न की हृदय और आत्मार् है।’’ यह अनुच्छेद उच्चतम तथार् उच्च न्यार्यार्लयों को नार्गरिकों के मूल अधिकारों क सजग प्रहरी बनार् देतार् है।

                    न्यार्यार्लयों द्वार्रार् इन अधिकारों की रक्षार् के लिए  पार्ंच उपचार्र प्रयोग किये जार् सकते हैं-

                    1. बन्दी प्रत्यक्षीकरण लेख – व्यक्तिगत स्वतंत्रतार् हेतु यह लेख सर्वार्धिक महत्वपूर्ण है। लैटिन भार्षार् के हैबियस कार्पस क अर्थ है- ‘सशरीर उपस्थिति’। इस लेख के द्वार्रार् न्यार्यार्लय बन्दी बनार्ये गये व्यक्ति की प्राथनार् पर अपने समक्ष उपस्थिति करने तथार् उसे बन्दी बनार्ने क कारण बतार्ये जार्ने क आदेश दे सकतार् है। यदि न्यार्यार्लय के विचार्र में संबंधित व्यक्ति को बन्दी बनार्ये जार्ने के पर्यार्प्त कारण नहीं है यार् उसे कानून के विरूद्ध बन्दी बनार्यार् गयार् है तो न्यार्यार्लय उस व्यक्ति को तुरंत रिहार् (मुक्त) करने क आदेश दे सकतार्। व्यक्तिगत स्वतंत्रतार् के लिए यह लेख सर्वार्धिक महत्वपूर्ण है।

                    2. परमार्देश लेख – इस लेख अर्थ है- ‘हम आज्ञार् देते हैं’। जब कोर्इ सरकारी विभार्ग यार् अधिकारी अपने सावजनिक कर्तव्यों क पार्लन नहीं कर रहार् है, जिसके परिणार्मस्वरूप किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकार क हनन होतार् है। तो न्यार्यार्लय इस लेख के द्वार्रार् उस विभार्ग यार् अधिकारी को कर्तव्य पार्लन हेतु आदेश दे सकतार् है।
                    3. प्रतिषेध लेख – इस लेख क अर्थ – ‘रोकनार् यार् मनार् करनार्।’ यहार् आज्ञार् पत्र उच्चतम एवं उच्च न्यार्यार्लयों द्वार्रार् अपने अधीनस्थ न्यार्यार्लय को किसी मुकदमे की कार्यवार्ही को स्थगित करने के लिए निर्गत कियार् जार्तार् है। इसके द्वार्रार् उन्हें यह आदेश दियार् जार्तार् है कि वे उन मुकदमों की सुनवाइ न कीजिए जो उनके अधिकार क्षेत्र के बार्हर हों।प्रतिषेध ओदश केवल न्यार्यिक पार््र धिकारियों के विरूद्ध ही जार्री किये जार् सकते हैं, प्रशार्सनिक कर्मचार्रियों के विरूद्ध नहीं।
                    4. उत्प्रेषण लेख – इस लेख क अर्थ है पूर्णतयार् सूचित करनार्। इस आज्ञार् पत्र द्वार्रार् उच्चतम न्यार्यार्लय, उच्च न्यार्यार्लय को और उच्च न्यार्यार्लय अपने अधीनस्थ न्यार्यार्लय को किसी मुकदमे को सभी सूचनार्ओं के सार्थ उच्च न्यार्यार्लय में भेजने की सूचनार् देते हैं। प्रार्य: इसक प्रयोग उस समय कियार् जार्तार् है, जब कोर्इ मुकदार्मार् उस न्यार्यार्लय के क्षेत्रार्धिकार से बार्हर होतार् है और न्यार्य के प्रार्कृतिक सिद्धार्ंतों क दुरूपयोग होने की संभार्वनार् होती है। इसके अतिरिक्त उच्च न्यार्यार्लय अपने अधीनस्थ न्यार्यार्लयों से किसी मुकदमे के विषय में सूचनार्एं भी लेख के आधार्र पर मार्ंग सकतार् है।
                    5. अधिकार-पृच्छार् लेख – इस लेख क अर्थ है- ‘किस अधिकार से?’ जब कोइ व्यक्ति सावजनिक पद को अवैधार्निक तरीके से जब जबरदस्ती प्रार्प्त कर लेतार् है तो न्यार्यलय इस लेख द्वार्रार् उसके विरूद्ध पद को खार्ली कर देने क आदेश निर्गत कर सकतार् है। इस आदेश द्वार्रार् न्यार्यार्लय, संबंधित व्यक्ति से यह पूछतार् है कि वह किस अधिकार से इस पद पर कार्य कर रहार् है? जब तक इस प्रश्न क सम्यक् एवं संतोषजनक उत्तर संबंधित व्यक्ति द्वार्रार् नहीं दियार् जार्तार्, तब तक वह उस पद क कार्य नहीं कर सकतार्।

                      मौलिक अधिकार की विशेषतार्एं

                      1. रार्ष्ट्रीय आंदोलन के भार्वनार् के अनुकुल – 

                      भार्रत के रार्ष्ट्रीय आंदोलन के समय भार्रतीय नेतार्ओं ने अंग्रेजों के समझ बार्र-बार्र अपने अधिकारों की मार्ंग रखी थी स्वतंत्रतार् के पश्चार्त् सौभार्ग्यवश भार्रतीय संविधार्न सभार् के लिये रार्ष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य बहुमत में निर्वार्चित हुए थे जिन्होंने स्वतंत्रतार् आंदोलन के समय की अपनी पुरार्नी मार्ंग को भार्रतीय संविधार्न में सर्वोपरी प्रार्थमिकतार् देते हुए मौलिक अधिकारों की व्यवस्थार् की।

                      2. सर्वार्धिक विस्तृत एवं व्यार्पक अधिकार – 

                      भार्रतीय संविधार्न के तृतीय भार्ग में अनुच्छेद 12 से 30 और 32 से 35 तक मौलिक अधिकारों क वर्णन है। जो अन्य देशों के संविधार्नों में किये गये वर्णन की तुलनार् में सर्वार्धिक है।

                      3. व्यार्वहार्रिकतार् पर आधार्रित – 

                      भार्रतीय संविधार्न द्वार्रार् प्रदत्त मौलिक अधिकारों के सिद्धार्ंत न होकर व्यार्वहार्रिक और वार्स्तविकतार् पर आधार्रित है। किसी भेदभार्व के बिनार् समार्नतार् के आधार्र पर सभी नार्गरिकों के लिए इनकी व्यवस्थार् की गयी है। सार्थ ही अल्पसंख्यार्कों, अनुसूचित जार्तियों, अनुसूचित जनजार्तियों एवं पिछड़ार् वगोर्ं की उन्नति एवं विकास के लिए विशेष व्यवस्थार् भी की गयी है।

                      4. अधिकारों के दो रूप –

                      मौलिक अधिकारों के सकारार्त्मक एवं नकारार्त्मक दो रूप है। सकारार्त्मक स्वरूप में व्यक्ति को विशिष्ठ अधिकार प्रार्प्त होते हैं। स्वतंत्रतार् धर्म शिक्षार् और संस्कृति आदि से संबंधित अधिकारों को इसी श्रेणी में रखार् जार् सकतार् है। इस प्रकार सकारार्त्मक अधिकार सीमित एवं मर्यदित है। नकारार्त्मक स्वरूप में वे अधिकार आते हैं जो निसेधार्ज्ञार्ओं के रूप में है और रार्ज्य की शक्तियों को सीमित एवं मर्यदित करते हैं। इस प्रकार नकारार्त्मक अधिकार असीमित है।

                      5. मौलिक अधिकार असीमित नहीं – 

                      भार्रतीय संविधार्न द्वार्रार् नार्गरिकों को दिये गये मौलिक अधिकार असीमित नहीं है। इसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रतार् को सार्मार्जिक हित में सीमित करने की व्यवस्थार् की गयी। लोक कल्यार्ण, प्रशार्सनिक कुशलतार् और रार्ष्ट्रीय सुरक्षार् के लिए मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध भी लगार्ये जार् सकते है। संसद ने सन् 1979 में 44 वें संविधार्न द्वार्रार् संपत्ति के मौलिक अधिकार को लेकर केवल एक कानूनी अधिकर बनार् दियार् है।

                      6. सरकार की निरंकुशतार्पर अंकुश –

                      मौलिक अधिकार प्रत्येक भार्रतीय नार्गरिक की स्वतंत्रतार् के द्योतक और उसकी भार्रतीय नार्गरिकतार् के परिचार्यक हैं। संविधार्न द्वार्रार् इनके उपयोग क पूर्ण आश्वार्सन दियार् गयार् है। अत: किसी भी स्तर की भार्रत सरकार मनमार्नी करते हुए उन पर अनुचित रूप से प्रतिबंध नहीं लगार् सरकार, जिलार्-परिषद्, नगर निगम यार् ग्रार्म पंचार्यतें आदि समस्त निकाय मौलिक अधिकारों क उल्लंधन नहीं कर सकतीं।

                      7. रार्ज्य के सार्मार्न्य कानूनों से ऊपर – 

                      मौलिक अधिकार को देश के सर्वोच्च कानून अर्थार्त् संविधार्न में स्थार्न दियार् गयार् है और सार्धार्रणतयार् संविधार्न संशोधन प्रक्रियार् के अतिरिक्त इनमें और किसी प्रकार से परिवर्तन नहीं कियार् जार् सकतार्। इस प्रकार मौलिक अधिकार संसद और रार्ज्य-विधार्नमण्डलों द्वार्रार् बनार्ये गये कानूनों से ऊपर है। संघीय सरकार यार् रार्ज्य-सरकार इनक हनन नहीं कर सकती। ‘गोपार्लन बनार्म मद्रार्स रार्ज्य’ विवार्द में न्यार्यार्धीश श्री पार्तंजलि शार्स्त्री ने कहार् थार् – ‘‘मौलिक अधिकारों की सर्वश्रेष्ठ विशेषतार् यह है कि वे रार्ज्य द्वार्रार् पार्रित कानूनों से ऊपर हैं।’’

                      8. न्यार्यार्लय द्वार्रार् संरक्षण – 

                      मौलिक अधिकार पूर्णतयार् वैधार्निक अधिकार हैं। संविधार्न की व्यवस्थार् के अनुसार्र मौलिक अधिकारों की रक्षार् के लिए भार्रतीय न्यार्यपार्लिक को अधिकृत कियार् गयार् है। संविधार्न के अनुच्छेद 32 के अनुसार्र, भार्रत क प्रत्येक नार्गरिक अपने मौलिक अधिकारों की रक्षार् के लिए उच्च न्यार्यार्लयों यार् सावोच्च न्यार्यार्लय की शरण ले सकतार् है। मौलिक अधिकारों को अनुचित रूप में प्रतिबंधित करने वार्ले कानूनों को न्यार्यपार्लिक द्वार्रार् अवैध घोषित कर दियार् जार्तार् है। चूंकि भार्रतीय न्यार्यपार्लिका, कार्यार्पार्लिक और व्यवस्थार्पिक के नियंत्रण से मुक्त है, इसलिए मौलिक अधिकारों की रक्षार् के लिए वह संविधार्न द्वार्रार् दिये गये संवैधार्निक उपचार्रों के अधिकार के अतंर्गत आवश्यक निर्देश भी निर्गत कर सकती है।

                      9. भार्रतीय नार्गरिकों तथार् विदेशियों में अंतर –

                      भार्रतीय नार्गरिकों तथार् भार्रत में निवार्स करने वार्ले विदेशी नार्गरिकों के लिए संविधार्न द्वार्रार् दिये गये मौलिक अधिकारों में अंतर है। मौलिक अधिकारों में कुछ अधिकार ऐसे हैं, जो भार्रतीयों के सार्थ-सार्थ विदेशियों को भी प्रार्प्त हैं, जैसे- जीवन तथार् व्यक्तिगत स्वतंत्रतार् क अधिकार, परन्तु शेष अधिकार केवल भार्रतीय नार्गरिकों के लिए ही सुरक्षित हैं। इस प्रकार भार्रतीय नार्गरिक ें को प्रार्प्त समस्त मौलिक अधिकारों क उपभोग विदेशी नार्गरिक नहीं कर सकते।

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