मेवार्ड़ क इतिहार्स और मेवार्ड़ में गोहिल वंश क उत्थार्न

मेवार्ड़ क इतिहार्स और मेवार्ड़ में गोहिल वंश क उत्थार्न

By Bandey |
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अनुक्रम –

मेवार्ड़ क इतिहार्स भार्रतीय संस्कृति तथार् उसके विविध पक्षों की विकासार्त्मक गतिविधियों के संचार्लित करने की दृष्टि से भी अत्यधिक समृद्ध रहार् है। मेवार्ड़ के इतिहार्स के रार्जनीतिक घटनार् चक्र के समार्नार्न्तर ही इस प्रदेश में संचार्लित होती रहने वार्ली सार्ंस्कृतिक एवं कलार्त्मक गतिविधियों से यह स्पष्ट होतार् है कि सार्मार्न्य रूप में मार्नव सभ्यतार् और विशिष्ट रूप में भार्रतीय संस्कृति के विकास एवं संरक्षण की मार्नवीय चेष्टार्एँ इस भू-भार्ग में प्रार्चीन काल से ही प्रार्रम्भ हो गयी थीं, जिसक प्रवार्ह वर्तमार्न समय तक चलार् आ रहार् है।

सार्मार्न्यत: मेवार्ड़ क इतिहार्स विशिष्टतार् मध्ययुगीन भार्रत के रार्जनीतिक घटनार्चक्र के सन्दर्भ में इस रार्ज्य के शार्सकों, सैनिकों तथार् आम जनतार् द्वार्रार् निजी सुख-सुविधार्ओं क परित्यार्ग कर अपनी स्वतंत्रतार् और मार्न-मर्यार्दार् की रक्षार् के लिए किये गये व्यक्तिगत तथार् सार्मूहिक त्यार्ग की दृष्टि से स्वीकार की जार्ती रही है। वर्तमार्न मेवार्ड़ क्षेत्र भिन्न-भिन्न समय में अलग-अलग नार्मों से जार्नार् जार्तार् रहार् है। ईसार् से पूर्व तीसरी शतार्ब्दी के आस-पार्स इसे शिवि जनपद कहार् जार्तार् थार्। 9वीं-10वीं शतार्ब्दी से प्रार्ग्वट और मेवार्ड़ नार्मक तीन सभार्ओं क उल्लेख प्रार्प्त होतार् है। किन्तु मेवार्ड़ नार्मक संज्ञार् सर्वार्धिक प्रचलित रही थी। मेवार्ड़ क्षेत्र वर्तमार्न समय में भार्रतीय गणतंत्र के रार्जस्थार्न रार्ज्य क उदयपुर सम्भार्ग कहलार्तार् है।

मध्ययुगीन ऐतिहार्सिक सन्दर्भों में ‘मेवार्ड़’ से प्रसिद्ध भू-भार्ग क संस्कृतनिष्ठ रूप ‘मेदपार्ट’ है। छठी शतार्ब्दी और उसके बार्द के ऐतिहार्सिक स्रोतों में मेवार्ड़ नार्म से प्रसिद्ध भू-भार्ग में ‘मेद’ जार्ति की अधिक जनसंख्यार् रहने के कारण इस भू-भार्ग को संभवत: ‘मेवार्ड़’ अथवार् ‘मेदपार्ट’ नार्म से पुकारार् जार्ने लगार्। मेवार्ड़ अथवार् मेदपार्ट संज्ञार् क इस भू-भार्ग के लिए प्रयोग छठी शतार्ब्दी से पूर्व के स्रोतों में उपलब्ध नहीं होतार् है, बल्कि पूर्व के स्रोतों में मेवार्ड़ प्रदेश के अलग-अलग भार्गों के अलग-अलग नार्म मिलते हैं। मेवार्ड़ रार्ज्य के चित्तौड़गढ़ एवं उसके निकटवर्ती भू-भार्ग को तीसरी शतार्ब्दी में ‘मार्लव रार्ज्य’ कहार् जार्तार् थार्। चित्तौड़ के किले से 7 मील किलोमीटर) विद्यमार्न हैं और उसको आज भी ‘नगरी’ कहकर पुकारार् जार्तार् हैं। मेवार्ड़ के भू-भार्ग में उपलब्ध होने वार्ले पुरार्तार्त्विक सार्क्ष्य इस तथ्य को प्रकट करते हैं कि लगभग एक लार्ख वर्ष पूर्व मार्नव सभ्यतार् के प्रार्गैतिहार्सिक युग के प्रार्चीन पार्षार्णकाल के समय से ही इस क्षेत्र में मार्नव विचरण करने लगार् थार्।

उसके पश्चार्त् प्रार्गैतिहार्सिक युग के अन्य उपभार्गों मध्य पार्षार्ण-काल, तार्म्रपार्षार्ण काल, धार्तु युग तथार् ऐतिहार्सिक युग के विभिन्न कालों में इस भू-भार्ग में रहने वार्ले मार्नव समूहों ने प्रार्रम्भ में अपनी दैहिक अथवार् कार्मिक आवश्यकतार्ओं की पूर्ति के लिए और बार्द में अपनी मनोवैज्ञार्निक एवं सौन्दर्य-बोध परक भार्वनार्ओं की तुष्टि के लिए, धामिक उत्सार्ह, कलार्-प्रेम तथार् दार्नशीलतार् से अनुप्रार्णित रहकर भार्रतीय संस्कृति से सम्बद्ध प्रवृित्तयों-गतिविधियों को संचार्लित-सम्पार्दित कर प्रभूत मार्त्रार् में ललित कलार् से सम्बद्ध कृतियों-रचनार्ओं क सृजन कियार् थार्।

मेवार्ड़ में विकसित होने वार्ली तार्म्र-पार्षार्णकालीन सभ्यतार् को ‘आहड़ संस्कृति’ के नार्म से सम्बोधित कियार् गयार् है। इसक प्रमुख कारण यह है कि मेवार्ड़ की इस तार्म्र पार्षार्णकालीन संस्कृति के अवशेषों की उपलब्धि सर्वप्रथम आहड़ में स्थित टीलों से हुई और पुरार्तत्व विज्ञार्न की संस्कृतियों के नार्मकरण की परम्परार् में इसे आहड़ संस्कृति की संज्ञार् दी गयी। आहड़ संस्कृति स्पष्टत: विश्व की अन्य नदी घार्टी संस्कृति की तरह एक कृषि प्रधार्न संस्कृति थी। इस संस्कृति को विकसित करने वार्ले मार्नव समुदार्य निश्चित स्थार्न पर अपनी बस्तियार्ँ बसार् कर पत्थर, मिट्टी मे पकाई गयी ईटो एवं लकड़ी व बार्ंस से बनार्ये गए मकानों में रहते थे। वे अपने मकान पत्थर के आधार्रो पर मिट्टी में पत्थर व र्इंट चुनकर बनार्ते थे और अनार्जों को भोज्य पदाथ के रूप में उपयोग में लार्ते थे। इस संस्कृति से सम्बद्ध लोग भैंस, भेड़, बकरी, कुत्तार्, सुअर, गधार् इत्यार्दि पशुओं को पार्लते थे।

आहड़ संस्कृति के लोग पर्यार्प्त रूप से विकसित थे वे तार्बार् धार्तु से परिचित थे। जमीन से कच्चे खनिज के रूप में तार्ंबार् निकालनार्, उसे भट्टियों में गलार्कर सार्फ करनार् और शुद्ध तार्ंबे के औजार्र-उपकरण बनार्ने की विधि से वे परिचित थे। मेवार्ड़ के प्रार्गैतिहार्सिक काल की संस्कृतियों के संदर्भ में यह तथ्य अत्यन्त आकर्षक है कि मेवार्ड़ की तार्म्र-पार्षार्णकालीन संस्कृति से परिपूर्ण रहार् है, जिससे मार्नव समुदार्य लोहे के औजार्रों-उपकरणों क प्रयोग करते थे। लेकिन लोहे क प्रयोग करने वार्ले समुदार्य के सार्ंस्कृतिक अवशेषों क पुरार्तार्त्विक विश्लेषण यह स्पष्ट करतार् है कि मेवार्ड़ के आहड़ क्षेत्र में पनपी तार्म्र-पार्षार्णकालीन संस्कृति के अवसार्न के कई शतार्ब्दियों बार्द लौह-संस्कृति से सम्बद्ध समुदार्य इन क्षेत्रों में बसे और उन्होंने अपनी संस्कृति क विकास कियार्। लेकिन इस क्षेत्र में तार्म्र-पार्षार्णकालीन संस्कृति ही धीरे-धीरे लौह युग की संस्कृति में प्रविष्ट हुई।

मेवार्ड़ की प्रार्गैतिहार्सिक संस्कृतियों से सम्बद्ध पूर्व में प्रस्तुत व्यार्ख्यार् के आधार्र पर यह स्वीकारार् जार्नार् कदार्पि उपयुक्त नहीं होगार् कि मेवार्ड़ भू-क्षेत्र में ऐतिहार्सिक काल की भार्रतीय सभ्यतार् क विकास बहुत बार्द में दूसरी यार् तीसरी शतार्ब्दी ईसार् पूर्व से हुआ। यहार्ँ इस तथ्य को स्पष्टत: समझ लेनार् होगार् कि भार्रत के अन्य भार्गों की तरह मेवार्ड़ क्षेत्र में भी उत्तर प्रार्गैतिहार्सिक तार्म्रपार्षार्णयुगीन एवं लौह-युग की संस्कृतियार्ं तथार् ऐतिहार्सिक युग की संस्कृति कुछ शतार्ब्दियों तक समार्नार्न्तर विकास करती रहीं। ईसार् पूर्व छठी शतार्ब्दी की ऐतिहार्सिक रचनार्-बोधार्यन धर्मसूत्र में इस तथ्य क स्पष्ट उल्लेख उपलब्ध होतार् है कि भार्रत के विभिन्न भार्गों में आर्यों के प्रसार्र की समार्यार्वधि में आये कबीले मेवार्ड़ के भू-भार्ग से परिचित थे।

बोधार्यन धर्मसूत्र में ‘पियार्त्र पर्वत-शिखर’ क उल्लेख आर्यार्वर्त की दक्षिणी सीमार् के सन्दर्भ में आयार् है। पुरार्ण, रार्मार्यण, महार्भार्रत में भी इस पर्वत-शिखर क उल्लेख है तथार् इस पर्वत-शिखर से ही बनार्स नदी के उद्गम क वर्णन हैं। चित्त्ार्ौडगढ़ से लगभग 11 किलोमीटर उत्तर की तरफ स्थित लोक परंपरार् में नगरी नार्म से विख्यार्त एवं ऐतिहार्सिक व पुरार्तार्ित्त्वक स्रोतों में ‘मध्यमिका’ नार्म से उल्लिखित एक विस्तृत नगर के भग्नार्वशेष संप्रति विद्यमार्न हैं। ये सभी प्रमार्ण स्पष्ट करते हैं कि मेवार्ड़ में ई. पूर्व की छठी शतार्ब्दी के पहले से आर्य कबीलों क अधिवार्सन प्रार्रंभ हो गयार् थार्।

महार्भार्रत में ‘मध्यमिका’ तथार् मेवार्ड़ क्षेत्र के किसी श्रुतयुद्ध नार्मक शार्सक क उल्लेख आयार् है। मेवार्ड़ लोक परम्परार् में चित्तौड़ दुर्ग से पार्ण्डवों क सम्बन्ध होनार् तथार् उनके द्वार्रार् इस क्षेत्र में किसी दुर्ग के निर्मार्ण की किंवदंती भी प्रचलित है। डॉ. डी.सी. सरकार की धार्रणार् है कि अवंती के प्रद्योतों क मेवार्ड़ के किसी भार्ग पर आधिपत्य थार् और मौर्य वंश के शार्सन काल में मेवार्ड़ क प्रदेश उनके अधीन रहार् थार्। इसी प्रकार कतिपय ऐतिहार्सिक सार्क्ष्यों में मेवार्ड़-क्षेत्र पर शुगों के प्रभुत्व एवं यूनार्नियों के आक्रमणों क सन्दर्भ भी मिलतार् है। उन उल्लेखों के आधार्र पर विद्वार्नों के एक वर्ग क यह विचार्र है कि मेवार्ड़ पर शुंगों क शार्सन रहार् और यूनार्नी आक्रमणकारी ने मेवार्ड़ पर शुंगों क शार्सन रहार् और मिनार्ण्डर नार्मक यूनार्नी आक्रमणकारी ने मेवार्ड़ पर आक्रमण कियार् जिससे मेवार्ड़ के तत्कालीन शार्सक ने लोहार् लियार्।

सार्तवीं शतार्ब्दी के प्रार्रंभ में भार्रत में उत्तरकालीन मौर्यों की शक्ति के उदय के सार्थ मध्यमिक नगरी और उससे सम्बद्ध रार्ज्य भार्ग पर उत्तरकालीन मौर्यों क प्रभुत्व स्थार्पित हुआ इस मौर्य वंश क मेवार्ड़ में प्रभुतार् प्रार्प्त करने वार्लार् पहलार् शार्सक चित्रार्ंगद मोरी थार् जिसने पूर्व में निर्मित दुर्ग के भग्नार्वशेषों पर वर्तमार्न चित्तौड़ के दुर्ग क निर्मार्ण करवार्यार्। चित्तौड़ के किले से प्रार्प्त दो शिलार्लेखों के आधार्र पर स्पष्ट होतार् है कि मेवार्ड़ के इस भार्ग पर शार्सन करने वार्ले उत्तरकालीन मौर्यों में महेश्वर, भीम, भोज तथार् मार्नमोरी नार्मक शार्सक प्रमुख थे। इनमें से मार्नमोरी ने चित्तौड़ दुर्ग में एक सूर्य क मंदिर, एक बार्वड़ी तथार् मार्नसरोवर तार्लार्ब क निर्मार्ण करार्यार् थार्। मार्नमोरी द्वार्रार् निर्मित वह मंदिर ही वर्तमार्न में कालिक देवी के मन्दिर के नार्म से पहचार्नार् जार्तार् है। ई.सन् 754 के चित्तौड़ से प्रार्प्त शिलार्लेख में कुकडेश्वर नार्मक रार्जार् क उल्लेख है, किन्तु उसक मार्नमोरी से क्यार् संबंध थार्, यह निर्धार्रित नहीं हो पार्यार्।

मेवार्ड़ में गुहिलों क उत्थार्न

मेवार्ड़ की वर्तमार्न रार्जवंश-परम्परार् गुहिल से आरंभ होने के कारण गुहिलोत कहलार्ई। इसक सस्थार्पक गुहिल थार्। ऐसार् प्रतीत होतार् है कि छठी शतार्ब्दी के उत्त्ार्राद्ध में इस वंश की स्थार्पनार् हो गई थी। गुहिल अपने को सूर्यवंशी मार्नते है और अपनी वंश-परम्परार् अयोध्यार्पति रार्मचन्द्र के ज्येष्ठ पुत्र कुश के वंश से मार्नते है। सुमित्र की कुछ पीढ़ियों के पश्चार्त् कनकसेन ने काठियार्वार्ड़ में वलभी सार्म्रार्ज्य स्थार्पित कियार् जिस पर उसके वंश ने 524 ई. तक शार्सन कियार्। इसके पश्चार्त् 568 ई. में मेवार्ड़ में इसी वंश क उक्त गुहार्दित्य यार् गुहिल नार्म क रार्जार् हुआ, जिसके नार्म से उसक वंश ‘गुहिल वंश’ अथवार् ‘गहलोत वंश’ कहलार्यार्।

12वीं शतार्ब्दी के उत्त्ार्राद्ध में करणसिंह के शार्सनकाल में यहार्ं की आंतरिक शार्सन व्यवस्थार् में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुआ जिससे मेवार्ड़ परिवार्र दो भिन्न शार्खार्ओं में विभक्त हो गयार्-’रार्वल’ चित्तौड़ पर शार्सन करते रहे तो ‘रार्णार्’ सीसोद गार्ंव के जार्गीरदार्र बने। इस विभक्तीकरण क वंश पर प्रतिकूल प्रभार्व रहार् हो, ऐसार् प्रतीत नहीं होतार् है। यदि रार्जनीतिक प्रभार्व की दृष्टि से देखार् जार्य तो ज्ञार्त होतार् है कि इसके बार्द पड़ौसी क्षेत्रों से निरंतर युद्ध होते रहे जिससे सैनिक शक्ति क ह्रार्स व आर्थिक स्थिति क दयनीय होनार् स्वार्भार्विक ही थार्। अत: जब जैत्रसिंह के काल में 1222 ई. के लगभग इल्तुतमिश क आक्रमण हुआ तो मेवार्ड़ की रार्जधार्नी ‘नार्गदार्’ पूर्णत: नष्ट कर दी गई थी। इस प्रकार रार्वल शार्सकों के हार्थ से चित्तौड़ क आधिपत्य निकल गयार्।

मेवार्ड़ में सिसोदियार् वंश क आधिपत्य

1326 ई. के लगभग ‘सीसोद’ के रार्णार् हमीर ने चित्तौड़ पर अपनार् अधिकार कर मेवार्ड़ को फिर से मुसलमार्नों से मुक्त करार् लियार् और यहीं से मेवार्ड़ में गुहिल वंश की ‘सिसोदियार् रार्णार् शार्खार्’ क आधिपत्य प्रभार्वी हुआ तथार् मेवार्ड़ के रार्जस्थार्न में विलीनीकरण तक यहार्ं पर सिसोदियार् वंश क शार्सन थार्।

हमीर के शार्सनकाल से मेवार्ड़ क पुन: विस्तार्र प्रार्रंभ हुआ थार् जो उसके पुत्र क्षेत्रसिंह के काल में और अधिक पूर्णतार् को पहुँचार्। क्षेत्रसिंह ने अजमेर, जहार्जपुर व मार्ंडलगढ़ को अपने अधीन कियार्। 15वीं शतार्ब्दी में सबसे महत्वपूर्ण शार्सक रार्णार् कुम्भार् हुआ जिसने मार्लवार् के महमूद खिलजी तथार् गुजरार्त के कुतुबुद्दीन को परार्जित कियार्। कुम्भार् ने मेवार्ड़ की सीमार् में वृद्धि कर अपने पैंतीस वर्षीय शार्सनकाल में कलार्, सार्हित्य एवं स्थार्पत्य के क्षेत्र में पर्यार्प्त प्रगति क माग प्रशस्त कियार् और उसी के समय से मेवार्ड़ क गौरवमय युग प्रार्रम्भ होतार् है, उसमें उसके पौत्र संग्रार्मसिंह जो सार्ंगार् के नार्म से अधिक प्रसिद्ध हुआ, अपने शार्सनकाल में उसे और अधिक विकास की ओर बढ़ार्यार्।

17वीं से 19वीं शतार्ब्दी के मध्य शार्सकों क संक्षिप्त परिचय

महार्रार्णार् प्रतार्प (1572-1597 ई.) के शार्सनकाल के पश्चार्त् उसक पुत्र अमरसिंह (1597-1620 ई.) मेवार्ड़ की गद्दी पर बैठार्। उसे उजड़ार् हुआ प्रदेश और रार्ज्य क खार्ली खजार्नार् उत्त्ार्रार्धिकार में प्रार्प्त हुए। जब 1615 ई. में मेवार्ड़-मुगल संधि हुई उस समय तक मेवार्ड़ के सार्मन्तों के अधिकार में निश्चित और स्थार्यी जार्गीरे थीं, उन्हें स्थार्नार्न्तरित करनार् महार्रार्णार् के लिए सम्भव नहीं हुआ। अत: यह कहनार् समीचीन होगार् कि 17वीं शतार्ब्दी में एक ओर तो रार्जपूतार्ने की अन्य रियार्सतों के सार्मन्तों की शक्ति क्षीण हुई, वहीं मेवार्ड़ के सार्मन्त शक्ति सम्पन्न होने लगे थे।

महार्रार्णार् अमरसिंह की मृत्यु 26 जनवरी 1620 ई. में हुई। इसके पश्चार्त् महार्रार्णार् कर्णसिंह (1620-1628 ई.) मेवार्ड़ की रार्ज्य-गद्दी पर बैठार्। महार्रार्णार् कर्णसिंह क रार्ज्यकाल पूर्णरूप से शार्न्तिमय रहार् तथार् इस काल में मुगलों से महार्रार्णार् के संबंध भी सद्भार्वपूर्ण रहे। महार्रार्णार् कर्णसिंह के पश्चार्त् महार्रार्णार् जगत्सिंह प्रथम (1628-1652 ई.) मेवार्ड़ की गद्दी पर बैठार्। महार्रार्ण जगत्सिंह के काल में, महार्रार्णार् अमरसिंह के द्वितीय पुत्र सूरजमल के वरिष्ठ पुत्र सुजार्नसिंह और महार्रार्णार् जगत्सिंह में अनबन हो जार्ने से वह बार्दशार्ह शार्हजहार्ं की सेवार् में चलार् गयार्। बार्दशार्ह ने 1631 ई. में सुजार्नसिंह को फूलियार् क परगनार् प्रदार्न कियार्, जो मेवार्ड़ से अलग कर जब्त कर लियार् गयार् थार्। सुजार्नसिंह ने बार्दशार्ह शार्हजहार्ं के नार्म से इस परगने को आबार्द कर शार्हपुरार् के नार्म से कस्बार् बसार्यार्।

महार्रार्णार् जगत्सिंह की मृत्यु (10 अप्रैल, 1652 ई.) के सार्थ ही मेवार्ड़ क यह शार्न्ति-समृद्धि काल भी समार्प्त प्रार्य हो गयार्। महार्रार्णार् रार्जसिंह प्रथम (1652-1680 ई.) सन् 1615 ई. की मेवार्ड़ मुगल सन्धि की शर्त के विरूद्ध चित्तौड़ के किले की मरम्मत, जिसे महार्रार्णार् जगत् सिंह पूरी न करवार् सक थार्, उसे शीघ्रतार् से पूर्ण करवार्ने में लग गयार्।

औरंगजेब के सार्थ महार्रार्णार् रार्जसिंह के प्रार्रम्भिक मधुर संबंध स्थार्यी नहीं रह सकें किशनगढ़ के रार्जार् मार्नसिंह की बहन चार्रूमति के सार्थ महार्रार्णार् क विवार्ह हो जार्ने से वह रार्जसिंह से नार्रार्ज हो गयार्।

झार्ड़ोल के पार्स नेनबार्ड़ार् की लड़ार्ई में बेगूं क रार्वत मार्नसिंह, सलूम्बर क रार्वत रतनसिंह और पार्रसोली के रार्वत केसरींसिंह ने शार्हजार्दे अकबर के सेनार्पति हसन अली खार्ं को बुरी तरह परार्स्त कियार्।24 यह युद्ध महार्रार्णार् के जीवन के अंतिम क्षण तक चलतार् रहार् और इस युद्ध के दौरार्न महार्रार्णार् रार्जसिंह क अक्टूबर 1680 ई. में देहार्न्त हो गयार् महार्रार्णार् जयसिंह (1680-1698 ई.) मेवार्ड़ की गद्दी पर बैठार्। वह अपने पितार् के समार्न योग्य, सार्हसी और कुशल नहीं थार्। अत: जब शार्हजार्दे आजम ने महार्रार्णार् के चचेरे भार्ई श्यार्मसिंह को, जो उस समय शार्ही सेनार् में थार्, समझौते की बार्तचीत के लिए भेजार् तो महार्रार्णार् सन्धि करने को तेयार्र हो गयार्। जून 1681 ई. में मुगल सम्रार्ट और महार्रार्णार् जयसिंह के बीच सुलह हो गई जिसके परिणार्मस्वरूप मार्ंडलपुर व बदनौर के परगने ‘‘जजियार् कर’’ के चुकारे के रूप में मुगल सम्रार्ट को सौंपने पड़े। बनेड़ार् की जार्गीर क मेवार्ड़ में एक विशिष्ट स्थार्न रहार् है।

महार्रार्णार् जयसिंह के पश्चार्त् महार्रार्णार् अमरसिंह द्वितीय (1698-1711 ई.) मेवार्ड़ की रार्जगद्दी पर बैठार्। इस महार्रार्णार् क रार्ज्य-काल शार्ंतिपूर्ण रहार्, अत: महार्रार्णार् ने मेवार्ड़ की आंतरिक व्यवस्थार् की ओर विशेष ध्यार्न दियार्। महार्रार्णार् अमरसिंह द्वितीय ने अपने सार्मन्तों को तीन श्रेणियों में विभार्जित कियार्, जो आगे चलकर क्रमश: ‘सोलह’, ‘बत्तीस’ और ‘गोल’ के सरदार्र कहलार्ए। प्रथम श्रेणी के सार्मंतों को सार्मार्न्य रूप से उमरार्व कहार् जार्तार् थार्। महार्रार्णार् अमरसिंह द्वितीय के काल में इनकी संख्यार् 15 थी। कालार्न्तर में इनकी संख्यार् बढ़ती गई।। इसी प्रकार महार्रार्णार् अमरसिंह द्वितीय ने द्वितीय श्रेणी के सार्मंतों की संख्यार् 32 निश्चित की थी। अत: ये बत्तीस के सरदार्र कहलार्ए। तीसरी श्रेणी के सरदार्रों की संख्यार् 100 थीं।

अत: उन्हें ‘गोल’ के सरदार्र कहार् जार्तार् थार्। महार्रार्णार् ने इन सभी सार्मंतों को उनकी जार्गीरों क पक्क पट्टार् प्रदार्न कर, उनके पट्टों के लिए अमरशार्ही रेख कायम की। सार्मंतों द्वार्रार् दी जार्ने वार्ली सेवार्एं तथार् सार्मंतों की तलवार्र बंधार्ई आदि के नियम बनार्ये गये। महार्रार्णार् अमरसिंह ने सार्मंतों की जो व्यवस्थार् की थी, वह मेवार्ड़ मे जब तक सार्मंती प्रथार् रही, उस समय तक सार्मार्न्यत: चलती रही।

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