मिथक क अर्थ, परिभार्षार्, प्रकार और भेद

मिथक क अर्थ, परिभार्षार्, प्रकार और भेद


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मिथक शब्द अंग्रेजी भार्षार् के मिथ शब्द क ही हिन्दी रूपार्न्तरण अथवार् पर्यार्यवार्ची है और अंग्रेजी भार्षार् के मिथ शब्द की व्युत्पत्ति यूनार्नी भार्षार् के मार्इथॉस से हुई है, जिसक अर्थ है आप्तवचन, मौखिक कथार् अथवार् अतक्र्य कथन अर्थार्त् एक ऐसी कथार् जिसे कहने और सुनने वार्ले इसे सृष्टि यार् ब्रहमार्ण्ड सम्बन्धी तथ्य समझते हैं। मिथ शब्द क विपरिताथक शब्द लोगोस (तर्क) को मार्नार् गयार् है। मिथक संस्कृत क प्रमार्णित शब्द नहीं है। संस्कृत के ‘मिथ’ शब्द के सार्थ कर्त्तार्वार्चक ‘क’ प्रत्यय को जोड़ने से ही इसकी निर्मित हुई है। संस्कृत में ‘मिथक’ शब्द के समीपवर्ती शब्दों के रूप में दो ही शब्दों क प्रार्धार्न्य रहार् है। प्रथम है ‘मिथस’ अथवार् ‘मिथ’, जिसक अर्थ है – ‘परस्पर सम्मिलन’ तथार् द्वितीय है ‘मिथ्यार्’ जिसक अर्थ है – झूठ तथार् असत्य। यदि मिथक क उद्धव ‘मिथस’ से मार्नार् जार्ए तो इस शब्द क अभिप्रार्य मार्त्र गप्प अथवार् कपोल कथार् से ही लगार्यार् जार् सकतार् है परन्तु सूक्ष्म दृष्टि से आकलन करने पर ज्ञार्त होतार् है कि इन दोनों ही शब्दों से भले ही भिन्न-भिन्न अर्थ प्रकट होते हों लेकिन दोनों के उच्चार्रण में एक सार् ही प्रयत्न लगतार् है कहने क तार्त्पर्य यह है कि दोनों ही शब्दों में अर्थ सार्म्य की प्रधार्नतार् न होते हुए भी ध्वनिसार्म्य की प्रधार्नतार् है।

मिथक की परिभार्षार्

बीसवीं शतार्ब्दी के प्रार्रिम्भक वर्षो में पार्श्चार्त्य विद्वार्नों में एक ‘प्रेसकाट’ (Prescatt) ने अपनी पुस्तक ‘प्रोयट्री एण्ड मिथ’ (Poetry and Myth) में कवितार् और मिथक के व्यार्पक विमर्श प्रस्तुत किए।

भार्रतीय सार्हित्य में मिथक क प्रयोग नवीन है। किन्तु इसक आधार्र हमार्री पुरार्कथार्एँ, देवकथार्एँ तथार् हमार्रे पौरार्णिक आख्यार्न हैं जो कि हमार्री प्रार्चीन धरोहर हैं। किसी भी शब्द विशेष यार् किसी तथ्य को परिभार्षित करने से तार्त्पर्य उसकी सम्पूर्ण विशेषतार् को सूक्ष्म रूप में समझार्ने से है। इसी हेतु पार्श्चार्त्य एवं भार्रतीय विद्वार्नों द्वार्रार् प्रदत्त परिभार्षार्ओं के आलोक में मिथक को समझार्ने क प्रयार्स कियार् गयार् है।

एनसार्इक्लोपीडियार् ब्रिटेनिका में कहार् गयार् है कि मिथ (मिथक) आदिम संस्कृति क एक अनिवाय और महत्वपूर्ण उपार्दार्न है, यह विश्वार्स को अभिव्यक्त विकसित और संहितार्बद्ध करतार् है, यह नैतिकतार् की सुरक्षार् करतार् है, उसे दृढ़ करतार् है, यह शार्स्त्र विधि धामिक अनुष्ठार्न की सक्षमतार् को प्रमार्णित करते हुए मनुष्य के निर्देशन के लिए व्यार्वहार्रिक नियमों क निर्धार्रण करतार् है। इस प्रकार मिथक मार्नव सभ्यतार् के लिए अत्यार्वश्यक उपार्दार्न है। यह केवल निरर्थक कथार् ही नहीं अपितु एक ठोस क्रियार् व्यार्पार्र यार् कलार्त्मक बिम्ब-विधार्न की प्रस्तुति ही नहीं करतार् बल्कि आदिम विश्वार्सों और नैतिक विवेक क एक व्यार्वहार्रिक दस्तार्वेज है’

एनसार्इक्लोपीडियार् ब्रिटेनिका में मिथक को परिभार्षित करते हुए कहार् है कि मिथक केवल दिमार्गी उपज यार् काल्पनिक चित्रों को व्यक्त करने क मार्ध्यम नहीं है, वरन् यह तो मार्नव के विश्वार्स, उसकी नैतिकतार्ओं क सार्क्षी है। मिथक तो धामिक अनुष्ठार्नों को प्रमार्णित करते हुए मनुष्य के लिए व्यार्वहार्रिक नियमों क प्रतिपार्दन करतार् है।

इस प्रकार इस विश्व कोश के अनुसार्र मिथक मार्नवीय सभ्यतार् क अतिआवश्यक मार्ध्यम है और यह सिर्फ कपोल-कथार् न होकर, जीवन के यथाथ अथवार् सत्यतार् क अनिवाय एवं महत्वपूर्ण तत्व है।

‘एनसार्इक्लोपीडियार् ऑफ रिलीजन एण्ड ऐथिक्स में श्री ए.जी गाडनर ने मिथक पर विचार्र प्रस्तुत करते हुए कहार् है कि मिथक प्रार्य: प्रत्यक्षत: यार् परोक्षत: कथार् रूप में होतार् है। सार्मार्न्य कथार् में यह इस रूप में अंशत: भिन्न होतार् है कि जिन मनुष्यों में यह कथार् प्रथम बार्र प्रचार्रित होती है, वे इसे अवश्य ही तत्वत: सत्य मार्नते हैं। इस प्रकार मिथक कथार् नीति कथार् यार् अन्योक्ति से उसी प्रकार भिन्न है, जिस प्रकार कहार्नी यार् कल्पित कथार् से।’

एनसार्इक्लोपीडियार् ऑफ रिलीजन एण्ड ऐथिक्स में ए.जी. गाडनर ने मिथक पर जो अपने विचार्र प्रस्तुत किये हैं, उसके आधार्र पर हम कह सकते हैं कि मिथकीय कहार्नियों तथार् कथार्ओं को यदि प्रथम बार्र सुनार् जार्ए तो उन पर विश्वार्स कियार् जार् सकतार् है, लेकिन मिथकीय कथार्एँ, नैतिक कथार्ओं से ठीक वैसे ही अलग हैं, जैसे कि कोई सच्ची कहार्नी किसी काल्पनिक से। कहने क तार्त्पर्य यह है कि मिथक हमार्रे सार्मने प्रस्तुत तो कथार् कहार्नी के रूप में होते हैं, लेकिन इनक आधार्र हमार्रे विश्वार्स की परिणति ही होती है।

सार्हित्य के समार्न जार्तीय आकांक्षार्ओं (धार्रणार्ओं, आदर्शो) क एक सुस्पष्ट मार्ध्यम है। इसके अनुसार्र मिथक को लोक-कथार्ओं के समार्न प्रधार्नत: औपन्यार्सिक कहार्नियार्ँ ही मार्नार् गयार् है, इन दोनों में मूलभूत अन्तर यह बतार्यार् गयार् है कि मिथक आलौकिक संसार्र की कहार्नियार्ँ हैं और इस प्रकार उनमें स्वभार्वत: ही धामिक तत्वों क समार्वेश हो जार्तार् है। इस मत के आधार्र पर मिथक में दो तत्व ही प्रमुख रूप से शार्मिल होते हैं – प्रथम उसक कथार्त्मक स्वरूप और दूसरार् – उसक धामिक तथार् लोकोत्तर वार्तार्वरण।’ ‘कैसल्स एनसार्इक्लोपीडियार् ऑफ लिट्रेचर भी मिथक को लोक प्रचलित कथार् स्वीकार करते हुए उसके धामिक तथार् आलौकिक पक्ष की ओर ही संकेत करतार् है।’ ‘चैम्र्बस कौम्पैक्ट इंगलिश डिक्शनरी में मिथक को ईश्वर धर्म नार्यक यार् लोक प्रचलित आस्थार्वार्न व्यक्ति की परम्परार्गत पुरार् कथार् कहार् गयार् है और मार्इथोलॉजी (पौरार्णिक कथार्) को मिथको क समूह।’

स्टैण्डर्ड डिक्शनरी ऑफ फोकलोर मार्इथोलॉजी एण्ड लीजेण्ड में मिथक के धामिक पक्ष को महत्वपूर्ण उपार्दार्न स्वीकार करते हुए किसी देवी-देवतार् के इतिवृत्त से सम्बन्धित देव कथार् की संज्ञार् से अभिहित कियार् गयार् है।’

‘एनसार्इक्लोपीडियार् ऑफ सोशल सार्इंसेज, कैसल्स एनसार्इक्लोपीडियार् ऑफ लिट्रेचर, चैम्र्बस कोम्पैक्ट इंगलिश डिक्शनरी, स्टैण्र्डड डिक्शनरी ऑफ फोकलोर मार्इथोलॉजी एण्ड लीजैण्ड,। इन सभी विश्व कोशों के अध्ययन से यह ज्ञार्त होतार् है कि, इन विश्व कोशों में मिथकों के धामिक तथार् आलौकिक रूप को ही दर्शार्यार् गयार् है। इन सभी के अनुसार्र मिथक को धामिक मार्न्यतार् प्रदार्न करते हुए उसके अन्तर्गत किसी विशेष देवी-देवतार् के प्रार्रम्भ से लेकर अन्त तक के उसके क्रियार्-कलार्पों को किसी लोक-गार्थार्, गार्थार् के मार्ध्यम से दर्शार्यार् गयार् है, और कोई ऐसार् व्यक्ति जिसकी इन कथार्ओं तथार् ईश्वर में पूर्ण आस्थार् हो, उसकी एक प्रार्चीन गार्थार् कह कर सम्बोधित कियार् गयार् है।

‘जर्मन विद्वार्न उसनेर गौटरमैन मार्इथोलॉजी इज द सार्इंस ऑफ मिथ कहते हुए मिथक को धामिक विचार्रों के विज्ञार्न से अभिहित करते हैं।’

जर्मन विद्वार्न ‘उसनेर गौटरमैन’ ने भी मिथक को एक ऐसार् विज्ञार्न कहकर सम्बोधित कियार् है, जिसमें कि हमार्री धामिक मार्न्यतार्एँ सुरक्षित रहती हैं। अधिकाँश विद्वार्नों ने मिथक क क्षेत्र धामिक मार्न्यतार् लोक गार्थार् तथार् प्रकृति को दर्शार्यार् है किन्तु कुछ विद्वार्न ऐसे भी हैं जो मिथक क प्रमुख क्षेत्र समार्ज को स्वीकार करते हैं, इनमें प्रमुख नार्म नाथप फ्रार्ई, अन्सर्ट कैसिरर, मैलिनोवोस्की, रैने वैलेक, एरिक फ्रार्म आदि के हैं।

‘मैलिनोवोस्की मिथ को एक सार्मार्जिक प्रक्रियार् मार्नते हैं, जिसमें वह परम्परार् को सम्पुष्ट करतार् है। परम्परार् क एक उदग् म, एक उच्चतर, श्रेष्ठतर अधिकतर अति प्रार्कृतिक यथाथतार् की आरम्भिक घटनार्ओं में खोजतार् है। तदुपरार्न्त परम्परार् को एक वृहतर मूल्य और प्रतिष्ठार् प्रदार्न करतार् है।’

मैलिनोवोस्की’ के अनुसार्र, मिथक हमार्रे समार्ज की एक महत्वपूर्ण क्रियार् है, जो कि हमार्री परम्परार्ओं के स्रोत को यथाथ की घटनार्क्रमों में तलार्शतार् है, तथार् हमार्री परम्परार्ओं क समर्थन करतार् हैं।

‘अन्स्र्ट कैसिरर मिथक क क्षेत्र प्रकृति की अपेक्षार् समार्ज को स्वीकार करते हुए मिथक के अतिप्रार्कृत स्वरूप को अस्वीकार करते हैं। वह मार्नते हैं कि मार्नव जीवन क प्रत्येक क्रियार्-कलार्प मिथक की सीमार् में आतार् है और मिथक के मूलभूत अर्थ व्यक्ति के सार्मार्जिक जीवन से उदभ् ार्ूत हैं। मिथक के दोहरे स्वरूप की व्यार्ख्यार् करते हुए कैसिरर मिथक को केवल पौरार्णिक वर्णिती क वार्हक ही नहीं मार्नते अपितु ज्ञार्न की दृष्टि से तार्त्विक भी मार्नते हैं। अर्थार्त् इसमें कथार् क घटनार्क्रम महत्वपूर्ण नहीं होतार् वरन् उसक तत्व महत्वपूर्ण होतार् है।’

हम कह सकते हैं कि, कैसिरर के अनुसार्र मिथक मार्नव जीवन क एक अभिन्न अंग है, तथार् मार्नव जीवन क प्रत्येक दैनिक कार्य मिथक के अन्तर्गत आतार् है, समार्ज में ऐसी कई मार्न्यतार्एँ प्रचलित हैं, जिसमें मनुष्य के सार्मार्जिक मूल्य निर्भर रहते हैं, जैसे – कैसिरर मिथक के दोनों रूपों को स्वीकार करते हुए लिखते हैं, जो हमार्री पुरार्तन संस्कृति हैं, उनमें मिथक तो हैं ही और यह हमार्रे समक्ष कथार् कहार्नी रूप में प्रचलित होते हैं, किन्तु इन कथार्-कहार्नियों को ज्ञार्न की दृष्टि से देखने पर यह और भी महत्वपूर्ण हो जार्ते हैं।

‘एरिक फ्रार्म भी कैसिरर की ही भार्ँति मिथक के सार्मार्जिक पक्ष को स्वीकारते हुये इसे अपनों के द्वार्रार्, अपनों को दियार् गयार् सन्देश मार्नते हैं, उनकी दृष्टि में मिथक ऐसी रहस्यपूर्ण भार्षार् है, जो अन्तर में व्यार्प्त भार्वों को बार्हरी यथाथ के रूप में अभिव्यक्त करती हैं’

उपर्युक्त परिभार्षार् के अध्ययन के आधार्र पर हम कह सकते हैं कि मिथक ऐसी रहस्यार्त्मक अभिव्यक्ति है, जो मनुष्य के अन्तस में निहित भार्वनार्ओं को उसकी वार्स्तविकतार् के आधार्र पर प्रस्तुत करती है।

मिथक: प्रकार और भेद

प्रत्येक देश क सार्हित्य भिन्न प्रकार क होतार् है, जो अपनी भिन्नतार् के कारण एक विशिष्ट महत्तार् रखतार् है। सार्हित्य को विशेष पहचार्न दिलार्ने में उसमें निहित तत्व उसे और अधिक सुदृढ़तार् प्रदार्न करते हैं। मिथकीय तत्त्वों के चिन्तन में कहार् जार् सकतार् है कि मिथक सार्हित्य को प्रभार्वशार्ली एवं द्वन्दमयी बनार्ते हैं। हर युग क सार्हित्य भी नार्नार्विध भिन्नतार् संजोय हुये रहतार् है। इसी भिन्नतार् के अनुसार्र मिथकीय पार्त्र चरित्र व घटनार्एं युगार्नुरूप स्वरूप धार्रण करते हैं। मिथकों को विद्वार्नों ने अपने-अपने अनुसार्र वर्गीकृत कियार् है, पार्श्चार्त्य काव्यशार्स्त्री ए.जी. गाडनर द्वार्रार् किये गये विभार्जन के अनुसार्र मिथकों की सम्पूर्ण वस्तुपरिधि को 12 श्रेणियों में विभार्जित कियार् गयार् है। उनके विभार्जन के आलोक के आधार्र पर मिथक के कुछ प्रकार प्रस्तुत हैं –

ऋतु परिवर्तर्नन के सन्दर्भ वार्ले मिथक

जिस प्रकार दिन-रार्त, सप्तार्ह, मार्स और वर्ष क सदैव एक ही तरह से आनार् निश्चित है, उसी प्रकार ऋतुओं क आगमन क भी एक निश्चित क्रम है। ये ऋतुएँ दिन और रार्त को प्रभार्वित करती हैं, जैसे कि गर्मियों के दिन बड़े व रार्तें छोटी होती हैं। सर्दी में क्रम विपरीत हो जार्तार् है। ऋतु चक्र को प्रभार्वित करने वार्ले ग्रहण आदि कारकों के सन्दर्भों में रार्हु जैसे मिथक इस श्रेणी में रखे जार् सकते हैं।

विशिष्ट प्रार्कृतिक सन्दर्भों के मिथक

विशिष्ट प्रार्कृतिक सन्दर्भों के मिथकों के अन्तर्गत प्रार्कृतिक आपदार्ओं क विवेचन इनकी प्रणार्ली क्रियार् को मिथकों के अन्र्तगत मार्नार् जार् सकतार् है। भूकम्प, ज्वार्लार्मुखी प्रलय से सम्बन्धित मिथ कथार्यें इसके अन्र्तगत समार्विष्ट की जार् सकती है। भूकम्प पृथ्वी की नीचे की प्लेटों के खिसकने के कारण से आते हैं, जबकि लोकमार्नस में इन्हें ईश्वर क प्रकोप मार्नार् जार्तार् है। इसी तरह ज्वार्लार्मुखी तथार् प्रलय आदि को अथवार् दैवी आपदार् मार्नकर मिथ कथार्ओं से जोड़ दियार् गयार् है। ‘कामार्यनी’ में प्रलयंकारी विनार्शलीलार् के पश्चार्त ‘मनु की चिन्तार्’ प्रसंग को भी प्रार्कृतिक मिथकों के अन्र्तगत रखार् जार् सकतार् है।

प्रार्कृतिक मिथक

मार्नव समार्ज द्वार्रार् प्रकृति प्रार्रम्भ से ही पूज्य रही है। भार्रतीय समार्ज में जल, वार्यु, अग्नि, नदी इत्यार्दि को देवतार् के रूप में देखार् गयार्। इनक जन्म, कार्यप्रणार्ली आदि से सम्बन्धित कथार् प्रसंग वार्ले मिथक इसी श्रेणी में आते हैं। जैसे गंगार्वतरण की कथार्।

सृष्टि जन्म सम्बन्धी मिथक

इस श्रेणी में संसार्र के उदय, उसके नियत कर्मों तथार् विनार्श आदि की जार्नकारी प्रार्प्त होती है। हिन्दू मार्न्यतार् के अनुसार्र ब्रहमार्, विष्णु, महेश इन तीनों को ही सम्पूर्ण सृष्टि क उत्पत्तिकर्त्तार्, पार्लनकर्तार् और संहार्रक मार्नार् जार्तार् है। इस प्रकार के मिथक इस कोटि में आते हैं। सृष्टि उत्पत्ति की मनुसम्बन्धी कथार् को भी इसकी सीमार् में लार्यार् जार् सकतार् है।

देवत्व सम्बन्धी मिथक

देवत्व सम्बन्धी मिथक से तार्त्पर्य ऐसे मिथकों से है, जिनके अन्तर्गत देवी-देवतार्ओं की कथार्ओं क वर्णन होतार् है। इन कथार्ओं में देवी-देवतार्ओं के जन्म, उनके दैत्य संहार्र तथार् जग कल्यार्ण क वर्णन होतार् है। इसी तरह गंगार् को पार्प नार्शिनी, गणेश को विघ्नहर्त्तार् और सरस्वती को वरदार्यिनी तथार् ज्ञार्नदार्यिनी सम्बोधन देने की कथार् और इनके जन्म आदि की कथार्ओं को देवत्व सम्बन्धी मिथक मार्नार् जार् सकतार् है।

प्रार्णी जन्म सम्बन्धी मिथक

संसार्र में मार्नव के अलार्वार् भी अनेकों ऐसे प्रार्णी हैं, जिन पर संसार्र में होने वार्ले हर छोटे-बड़े परिवर्तनों क प्रभार्व पड़तार् है। ऐसे ही प्रार्णियों के जन्म से सम्बन्धित मिथकों क वर्णन इस श्रेणी में होतार् है। जैसे कि हमार्रे हिन्दू समार्ज में प्रलय के पश्चार्त ् संसार्र क उदय हुआ तो मनु को प्रथम पुरूष तथार् श्रद्धार् को प्रथम स्त्री के रूप में दर्शार्यार् गयार् है, इनके पश्चार्त ् ही संसार्र में उत्पत्ति क क्रम आगे बढ़ार्। ठीक उसी प्रकार ग्रीक सभ्यतार् में आदम और हव्वार् को सृष्टि उत्पत्ति क कारण मार्नार् गयार् है। यह मिथक इस श्रेणी के प्रमुख उदार्हरण हैं।

जीव के आवार्गमन सम्बन्धी मिथक

कहार् जार्तार् है कि मनुष्य तथार् अन्य किसी भी प्रार्णी को अपने कर्मों के अनुसार्र ही फल भोगनार् होतार् है, हम अच्छार् यार् बुरार् जैसार् भी कर्म इस जन्म में करते हैं, उसक परिणार्म अगले जन्म में भोगनार् पड़तार् है। इसी के अनुसार्र जीव के आवार्गमन क सिद्धार्न्त प्रतिपार्दित होतार् है। जैसे कि मनुष्य की चौरार्सी लार्ख योनियार्ँ।

धीर उदार्त्त तथार् वीर नार्यकों सम्बन्धी मिथक

इस श्रेणी में ऐसे प्रार्चीन कथार् कहार्नियों क वर्णन होतार् है, जो कि एक निडर निष्ठार्वार्न कुशल नार्यक अथवार् योद्धार् के जीवन चरित्र को उजार्गर करती है। इन कहार्नियों में नार्यक के कुल के इतिहार्स तथार् उसक देश के प्रति समर्पण क भी विस्तृत ज्ञार्न होतार् है। श्री रार्म तथार् श्री कृष्ण के भी धीरोदार्त्त नार्यक होने क वर्णन, भीष्म क प्रतिज्ञार्बठ्ठ तथार् अर्जुन क श्रेष्ठ धर्नुधार्री के रूप में मार्न्यतार् व महार्नयोद्धार् कर्ण की श्रेष्ठ दार्नवीर के रूप में मार्न्यतार् इसी श्रेणी के मिथकीय उदार्हरण हैं।

सार्मार्जिक क्रियार्-कलार्पों, संस्थार्ओं सम्बन्धी मिथक

प्रत्येक मनुष्य प्रार्रम्भ से ही एक समार्ज में रहतार् है इसलिए उसे एक सार्मार्जिक प्रार्णी की संज्ञार् दी जार्ती है। सार्मार्जिक व्यवस्थार् को सुचार्रू रूप से चलार्ने के लिये सार्मूहिक प्रयार्सों से जो नियम-कानून प्रचलन में आते गये हैं। उन्हें इस मिथकीय श्रेणी के अन्र्तगत लार्यार् जार् सकतार् है जैसे विवार्ह नार्मक संस्थार् समार्ज को पतनोन्मुख होने से बचार्ती है – इस लोक विश्वार्स के कारण ही समार्ज में इसे मार्न्यतार् मिली है यह अलग बार्त है कि हर युग में इसक रूप अलग-अलग है।

मृत्यु के बार्द आत्मार् की स्थिति क मिथक

मार्नव शरीर नश्वर है तथार् आत्मार् अजर अमर। मनुष्य अपनी मृत्यु के पश्चार्त कहार्ँ जार्तार् है? यह सब मनुष्य के कर्मों के आधार्र पर ही तय होतार् है कि मनुष्य स्वर्ग क अधिकारी है अथवार् नरक का। पुर्नजन्म आदि को भी इसी श्रेणी में रखार् गयार् है। इस भौतिक शरीर के नष्ट हो जार्ने के बार्द भी आत्मार् विद्यमार्न रहती है यार् नहीं, उसक अस्तित्व है यार् नहीं। यह सभी रहस्यपूर्ण तथ्य इन्हीं मिथकों की श्रेणी में आते हैं।

दार्नवों से सम्बन्धित मिथक

जिस प्रकार भार्रतीय परम्परार् में देवतार्ओं के जन्म इत्यार्दि से सम्बन्धित मिथक हैं, उसी प्रकार से दैत्यों अथवार् दार्नवों से सम्बन्धित मिथक भी समार्ज में प्रचलित हैं। देवतार् तथार् दार्नव दो प्रकार की प्रवृत्तियार्ँ समार्ज में प्रार्रम्भ से ही विद्यमार्न थीं। देव अच्छार्ई तथार् दार्नव बुरार्ई के प्रतीक थे। यही तथ्य आज भी विद्यमार्न है। देवतार् तथार् असुरों के संग्रार्म की जो कथार् कहार्नियार्ँ समार्ज में प्रचलित हैं वो इसी श्रेणी के मिथक हैं। जैसे कि श्रीकृष्ण क कंस, जरार्सन्ध आदि के सार्थ युद्ध तथार् मार्ँ दुर्गार् द्वार्रार् महिषार्सुर, शुम्भ-निशुम्भ, रक्तबीज आदि दार्नव क वध और समुद्र मन्थन क वर्णन। इन सभी को इस वर्ग के अन्र्तगत देखार् जार् सकतार् है।

ऐतिहार्सिक सन्दर्भो के मिथक

इस श्रेणी के अन्तगर्त ऐसे तथ्य उदघार्टित होते है, जिनक सम्बन्ध प्रार्चीन ऐतिहार्सिक घटनार्ओं से है, ऐसे ऐतिहार्सिक पार्त्र जिनक प्रार्मार्णिक आधार्र इतिहार्स सम्मत होते हुए भी पौरार्णिकतार् के समीप पहुँच गयार् है। कवि चन्दरवरदार्ई द्वार्रार् ‘पृथ्वीरार्ज रार्सो’ की रचनार् में पृथ्वीरार्ज क ऐतिहार्सिक चरित्र जनमार्नस के आस्थार्-विश्वार्स के कारण मिथ चरित्र बन गयार् है।

ए.जी. गाडनर के अतिरिक्त भी कई ऐसे सार्हित्यकार हैं, जिन्होंने मिथकों क उनकी प्रकृति के अनुरूप वर्गीकरण कियार्। उन पर एक दृष्टि डार्लनार् आवश्यक है इसके अन्तर्गत सर्वप्रथम कॉक्स के अनुसार्र कियार् गयार् विभार्जन प्रस्तुत है –

(क) अन्तरिक्ष (द एथीरियल हैवैवेन्स) इनमें द्यौस,् वरूण, मित्र, इन्द्र, ब्रहमार् आदि से सम्बन्धित मिथक आते हैं।

(ख) आलोक (द लार्इट) सूर्य, सवितृ, सोम, उर्वशी, उषस ् आदि के मिथक।

(ग) अग्नि (द फार्यर) अग्नि से सम्बन्धित मिथक।

(घ) वार्यु (द विंडंडस्स् ) वार्यु, मार्रूत, रूद्र आदि के मिथक।

(ड़) जल

(च) मेघ

(छ) पृथ्वी

(ज) अधोलोक (द अंडर वर्ल्ड)

(झ) अन्धकार – वृत्र, पार्णि के मिथक।’

डॉ. सत्येन्द्र द्वार्रार् वर्गीकृत मिथकों के प्रकार इस तरह से हैं-

  1. विश्व निर्मार्ण की व्यार्ख्यार् करने वार्ले मिथक।
  2. प्रकृति के इतिहार्स की विशेषतार्यें बतार्ने वार्ले।
  3. मार्नवीय सभ्यतार् के मूल की व्यार्ख्यार् करने वार्ले।
  4. समार्ज व धर्म प्रथार्ओं के मूल अथवार् पूजार् के इष्ट के स्वभार्व तथार् इतिहार्स की व्यार्ख्यार् करने वार्ले।

डॉ. श्रीवार्स्तव के अनुसार्र, परम्परार् और प्रचलन क्षेत्र की दृष्टि से मिथकों को दो वर्गों में रखार् जार् सकतार् है – जनजार्तीय और पार्ठीय। ट्रार्इबल मिथकों में पवित्रतार्, अपवित्रतार् की धार्रणार् विशेष रूप से मिलती है, यद्यपि पार्ठीय परम्परार् में भी अभिचार्र-कर्म से सम्बन्धित मिथक सार्मग्री को किंचित हेय दृष्टि से देखार् ही गयार् है। ट्रार्इबल मिथकों क अध्ययन-विश्लेषण मार्नववार्दी और समार्जशार्स्त्रीय ज्ञार्न धार्रार्ओं में विशेष रूप से हुआ है और इस प्रयत्न के अन्तर्गत इन्हें लिपिबद्ध भी कियार् गयार् है। पार्ठीय (वैदिक, पौरार्णिक) मिथक दर्शन और धर्म की विचार्रणार्ओं के आधार्र बने रहे हैं। मिथकों को स्वतन्त्र विषय के रूप में लेकर चलने वार्ले अध्येतार्ओं ने दोनों धार्रार्ओं को अपनी विचार्र दृष्टि में रखार् है। वैषयिक दृष्टि से मिथकों को इस प्रकार श्रेणीबद्ध कर सकते हैं –

सृष्टिपरक मिथक

विश्व और इसकी वस्तुओं के उदय की कथार्एँ।

देववर्गीय मिथक

देवों के जन्म, कर्म और स्वरूप से सम्बन्धित कल्पनार्एँ तथार् कथार्एँ।

प्रार्णिवगीर्य मिथक

मार्नव और पशुओं के उदभव और कर्म, आखेट, कृषि से सम्बन्धित विश्वार्स कथार्एँ। विभिन्न प्रथार्ओ और संस्थार्ओं के उद्धव की कथार्एँ।

प्रकृतिपरक मिथक

ऋतु चक्र, ऋतु व्यवस्थार् (प्रकाश, अन्धकार, दिन-रार्त) आदि से सम्बन्धित कथार्एँ।

अस्तित्व वर्गीय मिथक

जन्म-मरण विषयक धार्रणार्एँ-कथार्एँ। प्रेत योनि, स्वर्ग-नरक आदि। दो उपभेद किये जार् सकते हैं – लोकात्मक और लोकोत्तर।

कर्मकाण्डीय मन्त्रार्त्मक मिथक

विभिन्न अनुष्ठार्नों (औत्सविक, सार्मार्जिक, धामिक) तथार् व्यार्धि के उपचार्र कर्म से सम्बन्धित मन्त्र।

इतिहार्सधर्मी मिथक

ऐतिहार्सिक घटनार्ओं को लेकर बनने वार्ले मिथक।

इनकी श्रृखंलार् जीवित वर्तमार्न तक चली आती है।

मिथकों के विभार्जन के उक्त आधार्रों को देखते हुए एक बार्त निश्चित रूप से ज्ञार्त होती है कि प्रार्य: अधिकांश मिथक प्रकृति तथार् ईश्वर से सम्बन्धित हैं जैसे – स्थूलत: सभी प्रकार के मिथकों को स्काटलैण्ड के प्रौफेसर एच.के. रोज द्वार्रार् वर्गीकृत- 1. सृष्टि सम्बन्धी मिथक 2. प्रलय सम्बन्धी मिथक 3. देवतार्ओं सम्बन्धी मिथक के अन्र्तगत समार्हित कियार् जार् सकतार् है। सृष्टि सम्बन्धित मिथकों में सृष्टि की उत्पत्ति एवं विनार्श से सम्बन्धित कथार्ओं को, प्रलय सम्बन्धी मिथक के अन्र्तगत विविध आपदार्ओं को तथार् देवतार्ओं सम्बन्धी मिथकों के अन्र्तगत देव उत्पत्ति, असुर संग्रार्म जैसी कथार्ओं को सम्मिलित कर सकते हैं।

इस प्रकार हमार्रे समक्ष रहने वार्ली प्रत्येक वस्तु-विशेष में मिथक विद्यमार्न होते हैं। चार्हे वह प्रकृति हो, समार्ज हो, हमार्रार् इतिहार्स हो यार् फिर कि हमार्रे धर्म, पुरार्ण, इत्यार्दि। सभी में मिथकों क अस्तित्व किसी न किसी रूप में विद्यमार्न है। यहार्ँ तक की हमार्रे दैनिक व्यवहार्र में भी मिथक अपनी उपस्थिति दर्ज करार् देते हैं।

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