माक्सवार्द क्यार् है ?

माक्सवार्दी विचार्रधार्रार् के जन्मदार्तार् कार्ल माक्स 1818-1883र्इ. तथार् फ्रेडरिक एन्जिल्स 1820-1895 र्इ. है। इन दोनों विचार्रको ने इतिहार्स समार्जशार्स्त्र विज्ञार्न अर्थशार्स्त्र व रार्जनीति विज्ञार्न की समस्यार्ओ पर संयुक्त रूप से विचार्र करके जिस निश्चित विचार्रधार्रार् को विश्व के सम्मुख रखार् उसे माक्सवार्द क नार्म दियार् गयार्।

माक्स की रचनार्एं – 

माक्स की रचनार्ओ में से कुछ प्रमुख रचनार्एं है – फिलार्सफी आफ पार्वर्टी द कम्युिनष्ट मेनीफेस्टो क्रिटीव आफ पोलटी इकानार्मी दार्स केपीटल आदि।

माक्सवार्द क अर्थ – 

माक्सवार्द क्रार्ंतिकारी समार्जवार्द क ही एक रूप है। यह आर्थिक और सार्मार्जिक समार्नतार् में विश्वार्स रखतार् है अत: माक्सवार्द सभी व्यक्तियो की समार्नतार् क दर्शन है। माक्सवार्द की उत्पत्ति खुली प्रतियोगितार् स्वतंत्र व्यार्पार्र आरै पूंजीवार्द के विरोध के कारण हुइर्। माक्सवार्द पूंजीवार्द व्यवस्थार् को आमलू रूप से परिवर्तित करने और सर्वहार्रार् वर्ग की समार्जवार्दी व्यवस्थार् को स्थार्पित करने के लिये हिंसार्त्मक क्रार्ंति को एक अनिवायतार् बार्तलार्तार् है इस क्रार्ंति के पश्चार्त ही आदर्श व्यवस्थार् की स्थार्पनार् होगी वह वर्गविहीन संघर्ष विहीन और शोषण विहीन रार्ज्य की होगी।

माक्सवार्द की विशेषतार्एं – 

  1. माक्सवार्द पूंजीवार्द के विरूद्ध एक प्रतिक्रियार् है। 
  2. माक्सवार्द पूंजीवार्दी व्यवस्थार् को समार्प्त करने के लिये हिंसार्त्मक सार्धनो क प्रयार्गे करतार् है। 
  3. माक्सवार्द प्रजार्तार्ंत्रीय संस्थार् को पूंजीपतियो की संस्थार् मार्नते है जो उनके हित के लिये और श्रमिको के शोषण के लिए बनाइ गयी है। 
  4. माक्सवार्द धर्म विरोधी भी है तथार् धर्म को मार्नव जार्ति के लिये अफीम कहार् है। जिसके नशे में लार्गे उंघते रहते हे। 
  5. माक्सवार्द अन्तराष्टी्रय सार्म्यवार्द मे विश्वार्स करते हे। 
  6. समार्ज यार् रार्ज्य में शार्षको और शोषितों में पूंजीपतियों और श्रमिकोद्ध में वर्ग संघर्ष अनिवाय है। 
  7. माक्सवार्द अतिरिक्त मूल्य क सिद्धार्ंत द्वार्रार् पूंजीवार्द के जन्म को स्पष्ट करतार् हे। 

माक्सवार्द के प्रमुख सिद्धार्ंत

1. द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द क सिद्धार्ंत 

द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द माक्स के विचार्रो क मूल आधार्र है माक्स ने द्वन्द्वार्त्मक प्रणार्ली को हीगल से ग्रहण कियार् है माक्स के द्वन्द्ववार्द को समझने के लिए हीगल के विचार्रो को जार्ननार् आवश्यक है।हीगल के विचार्रो में सम्पूर्ण संसार्र गतिशील है और इसमें निरंतर परिवतर्न होतार् रहतार् हे। हीगल के विचार्रो में इतिहार्स घटनार्ओ क क्रम मार्त्र नही है बल्कि विकास की तीन अवस्थार्आे क विवेचन कियार् है – 1. वार्द 2 प्रतिवार्द 3 संवार्द। हीगल की मार्न्यतार् कि कोर्इ भी विचार्र अपनी मूल अवस्थार् में वार्द होतार् है। कुछ समय बीतने पर उस विचार्र क विरोध उत्पन्न होतार् है इस संघर्ष के परिणमस्वरूप मौलिक विचार्र वार्द परिवर्तित होकर प्रतिवार्द क विरार्धेार् होने से एक नये विचार्र की उत्पत्ति होती है जो सवार्द कह लार्ती है।

हीगल क कहनार् है कि द्वन्द्व के मार्ध्यम से संवार्द आगे चलकर वार्द क रूप ले लेतार् है जिनक पनु : प्रतिवार्द होतार् है आरै द्वन्द्व के बार्द संवार्द क रूप धार्रण करतार् है। इस प्रकार यह क्रम चलतार् रहतार् है अन्त मे सत्य की प्रार्प्ति होती है।

माक्स ने हीगल के द्वन्द्ववार्द को स्वीकार कियार् किन्तु हीगल के विचार्रो को उसने अस्वीकार कियार्। जहार्ं हीगल संसार्र को नियार्मक तथार् विश्व आत्मार्ार् मार्नतार् है। वहार्ं मार्क्सर् भौतिक तत्व को स्वीकार करतार् हे। माक्स क मार्ननार् है कि द्वन्द्ववार्द क आधार्र विश्व आत्मार् न होकर पदाथ ही है। यह भौतिक पदाथ ही संसार्र क आधार्र है पदाथ विकासमार्न है और उसकी गति निरंतर विकास की ओर है विकास द्वन्द्वार्त्मक रीति से होतार् है। वार्द प्रतिवार्द और संवार्द के आधार्र पर ही विकास गतिमार्न रहतार् है माक्स के विचार्रो मे पूंजीवार्द वार्द है जहार्ं दो वर्ग पूंजीपतियों व श्रमिक है एक धनवार्न और दूसरार् निर्धन है इन दोनो के हितो मे विरोध है। इन विरोधी वर्गो मे संघर्ष होनार् आवश्यक है इस संघर्ष में श्रमिको की विजय होगी और सर्वहार्रार् वर्ग अर्थार्त श्रमिक वर्ग क अधिनार्यक वार्द स्थार्पित होगार् यह प्रतिवार्द की अवस्थार् है। इन दोनो अवस्थार्ओ मे से एक तीसरी व नर्इ स्थिति उत्पन्न होगी जो सार्म्यवार्दी समार्ज की है। इस स्थिति मे न वर्ग रहेंगे न वर्ग संघर्ष होगार् और न रार्ज्य आवश्यक्तार्नुसार्र समार्ज से प्रार्प्त करेगार्। यह तीसरी स्थिति संवार्द की स्थिति होगी।

द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द की आलोचनार् – 

  1. माक्स द्वार्रार् प्रतिपार्दित दर्शन क आधार्र द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द है किन्तु इसने इतने महत्वपूर्ण सिद्धार्ंत क कहीं भी विस्तृत रूप से वर्णन नही कियार्। 
  2. माक्स ने हीगल के आध्यार्त्मवार्द के स्थार्न पर भौतिकवार्द क समर्थन कियार् है। 
  3. माक्स क मार्ननार् है कि समार्ज की प्रगति के लिए संघर्ष व क्रार्ंति क होनार् अनिवाय है। किन्तु यह सत्य है कि शार्ंतिकाल में ही समार्ज की प्रगति तीव्र गति से होती है। 

2. इतिहार्स की आर्थिक भौतिकवार्दी व्यार्ख्यार् – 

माक्स की विचार्रधार्रार् में द्वंद्वार्त्मक भौतिकवार्द की भार्ंति इतिहार्स की आर्थिक व्यार्ख्यार् क सिद्धार्ंत भी महत्वपूर्ण है। माक्स के विचार्र में इतिहार्स की सभी घटनार्एं आर्थिक अवस्थार् में होने वार्ले परिवर्तनो क परिणार्म मार्त्र है। माक्स क मत है कि प्रत्येक देश मे और प्रत्येक काल मे सभी रार्जनीतिक सार्मार्जिक संस्थार्एं कलार् रीति रिवार्ज तथार् समस्त जीवन भौतिक अवस्थार्ओ व आर्थिक तत्वो से प्रभार्वित होती है। माक्स अपनी आर्थिक व्यार्ख्यार् के आधार्र पर मार्नवीय इतिहार्स की छ: अवस्थार्एं बतलार्यी है जो है।

i. आदिम सार्म्यवार्दी अवस्थार्-सार्मार्जिक विकास की इस पहली अवस्थार् में जीविकोपाजन के तरीके बहुत सरल थे शिकार करनार् मछली मार्रनार् जंगलो से कंद मूल एकत्रित करनार् ही इनक मुख्य व्यवसार्य थार्। भोजन प्रार्प्त करने व जंगली जार्नवरो से अपनी रक्षार् करने के लिये ही मनुष्य समूह में झुण्ड बनार्कर सार्थ सार्थ रहते थे। इस अवस्थार् में उत्पार्दन के सार्धन समस्त समार्ज की सार्मूहिक सम्पत्ति हुआ करते थे इस अवस्थार् में निजी सम्पत्ति नही थी और न ही कोर्इ शोषक थार् और न ही कोर्इ शोषित सब मनुष्य समार्न थे। इसलिए माक्स ने इस अवस्थार् को ‘सार्म्यवार्दी अवस्थार्’ कहार् है।
ii. दार्सतार् की अवस्थार् – धीरे धीरे भौतिक परिस्थितियों में परिवर्तन हुआ। व्यक्तियों ने खेती करनार् पशुपार्लन करनार् और दस्तकारी करनार् प्रार्रंभ कर दिये। इससे समार्ज में निजी सम्पत्ति के विचार्रो क उदय हुआ। जिन्होने उत्पार्दन के सार्धनो; भूमिद्ध आदि पर अधिकार कर लियार्। वे ‘स्वार्मी’ कहलार्ये ये दूसरे व्यक्तियों से बलपूर्वक काम करवार्ने लगे वे ‘दार्स’ कहलार्ये समार्ज ‘स्वार्मी’ और दार्स दो वर्गो में विभजित हो गयार् आदिम समार्ज की समार्नतार् और स्वतंत्रतार् समार्प्त हो गर्इ। इसी अवस्थार् से समार्ज के शोषक और शोषित दार्े वर्गो के मध्य अपने आथिर्क हितार्े के लिये सघ्ंर्ष प्रार्रंभ हो गयार्।
iii. सार्मंतवार्दी अवस्थार् – जब उत्पार्दन के सार्धनो में और अधिक उन्नति हुयी पत्थर के औजार्र और धनुष बार्ण से निकलकर लोहे के हल करघे क चलन शुरू हुआ कृषि दस्तकारी बार्गवार्नी कपड़ार् बनार्ने के उद्योगो क विकास हुआ। अब दार्स के स्थार्न पर उद्योगो में काम करने वार्ले श्रमिक थे। सम्पूर्ण भूमि छोटे मोटे उद्योगो दस्तकारियार्ें और उत्पार्दन के अन्य सार्धनो पर तथार् कृषि पर जिनक आधिपत्य थार् उन्हे ‘जार्गीरदार्र व सार्मन्त’ कहार् जार्तार् थार्। कृषि कार्य करने वार्ले कृषकों और दस्तकारी करने वार्ले श्रमिको क वर्ग सार्ंमतो के अधीन थार्। इस व्यवस्थार् को सार्मंतवार्दी अवस्थार् कहार् जार्तार् है। माक्स के अनुसार्र इस अवस्थार् मे भी सार्मन्तो तथार् कृषको दस्तकारो के आर्थिक हितों में परस्पर संघर्ष चलतार् रहार्।
iv. पूंजीवार्दी अवस्थार् – अठार्रहवीं शतार्ब्दी के उत्तरार्ध्र्द में औद्योगिक क्रार्ंति हुर्इ जिसके परिणार्मस्वरूप उत्पार्दन के सार्धनो पर पूंजीपतियों क नियंत्रण स्थार्पित हो गयार् अर्थार्त पूंजीपति उत्पार्दन के सार्धनो के स्वार्मी हो गये लेकिन वस्तुओ के उत्पार्दन क कार्य श्रमिकों द्वार्रार् कियार् जार्तार् है वस्तुओं क उत्पार्दन बहुत बडे पैमार्ने पर हो तार् है अत: श्रमिक स्वतंत्र होकर कार्य करते है किन्तु श्रमिको के पार्स उतपार्दन के सार्धन नहीं होते अत: वे अपनी आर्थिक आवश्यकतार् पूर्ण करने लिये श्रम बचे ने को बार्ध्य होते है। निजी लार्भ के लिये पूंजीपति वर्ग ने श्रमिकों को शोषण कियार् दसू री तरफ श्रमिकों में भी अपने हितों के रक्षार् के लिये जार्गरूकतार् आर्इ। परिणार्मस्वरूप दो वर्गो पूंजीपति शोषक वर्ग और सर्वहार्रार्; श्रमिकद्ध शोषित वर्ग के बीच सघंर्ष पार््ररंभ हो जार्तार् है। माक्स क मत है कि संघर्ष अपने चरमोत्कर्ष पर पहचुं कर पूंजीवार्द को समार्प्त कर दगे ार्।
v. श्रमिक वर्ग के अधिनार्यकत्व की अवस्थार् – माक्स क विचार्र है कि पूंजीवार्दी अवस्थार् द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द के मार्ध्यम से श्रमिको व पूंजीपतियो के मध्य संघर्ष में जब पूंजीपतियो की परार्जय होगी तब पूंजीवार्द समार्प्त होकर ऐतिहार्सिक विकास की पार्ंचवी अवस्थार् ‘‘श्रमिक वर्ग के अधिनार्यकत्व की अवस्थार्’’ आयेगी। इस अवस्थार् में उत्पार्दन के सम्पूर्ण सार्धनों पर श्रमिको क अधिकार हो जार्येगार् जिसे ‘श्रमिक वर्ग क अधिनार्यक तंत्र यार् तार्नार्शार्ही’ कहार् गयार् है इस पार्ंचवी अवस्थार् के बहुमत वर्ग (श्रमिक वर्ग अल्पमत वर्ग पूंजीपति वर्ग) के विरूध्द अपनी रार्ज्य शक्ति क प्रयोग कर उसे पूर्णतयार् समार्प्त कर देगार्।
vi. रार्ज्यविहीन और वर्गविहीन समार्ज की अवस्थार् –मार्नवीय इतिहार्स की अन्तिम अवस्थार् रार्ज्य विहीन और वर्ग विहीन समार्ज की अवस्थार् आयेगी इस अवस्थार् में समार्ज में कवे ल एक ही वर्ग होगार् जिसे श्रमिक वर्ग कहार् गयार् है। इस समार्ज में न शोषक वर्ग होंगे न शोषित वर्ग होंगे। यह समार्ज रार्ज्यविहीन आरै वर्ग विहीन होगार् अत: वर्ग विहीन समार्ज में रार्ज्य स्वत: ही समार्प्त हो जार्येगार् तथार् इस समार्ज में वितरण क सिद्धार्ंत लार्गू होगार् जिसमें समार्ज के प्रत्येक लार्गे अपनी यार्गेयतार् के अनुसार्र कार्य करें ओर उसे आवश्यक्तार्नुसार्र पार््रप्ति हो।

    इस अवस्थार् सार्म्यवार्दी युग में वर्ग विहीन समार्ज की स्थार्पनार् से वर्ग संघर्ष प्रकृि त से होगार्। मनुष्य प्रकृति से संघर्ष कर मार्नव कल्यार्ण हेतु नवीन खोज आविष्कार करेगें तथार् सार्म्यवार्दी समार्ज आगे विकास करतार् रहेगार्।

    इतिहार्स की आर्थिक व्यार्ख्यार् की आलोचनार् – 

    1. आर्थिक तत्वों पर अत्यधिक और अनार्वश्यक बल – आलोचको के अनुसार्र माक्सवार्द ने समार्ज के रार्जनीतिक सार्मार्जिक और वैधार्निक ढार्ंचे में आर्थिक तत्वों को आवश्यकतार् से अधिक महत्व दियार् है तथार् माक्स क यह दृष्टिकोण भी त्रुटिपूर्ण है कि सभी मार्नवीय कार्यो क आधार्र यही आर्थिक तत्व है सार्मार्जिक अवस्थार् एवं समस्त मार्नवीय क्रियार्यें केवल आर्थिक तत्व पर ही आधार्रित नहीं होती है आर्थिक तत्व के अतिरिक्त अन्य तत्वों के द्वार्रार् भी कार्य कियार् जार्तार् है इन दूसरे तत्वो में सार्मार्जिक वार्तार्वरण मार्नवीय विचार्रो और भौगोलिक तत्वों को लियार् जार् सकतार् है। 

    2. इतिहार्स क काल निर्धार्रण त्रुटिपूर्ण – माक्स ने मार्नवीय इतिहार्स की जो छ: अवस्थार्एं बतलार्यी है वह त्रुटिपूर्ण है उसने इतिहार्स की गलत व्यार्ख्यार् की है। मार्नववार्द माक्स के आदिम सार्म्यवार्द से सहमत नहीं है। 
    3. धर्म क निम्न स्थार्न – माक्स ने इतिहार्स की व्यार्ख्यार् में धर्म को निम्न स्थार्न प्रदार्न करते हुए उसे अफीम की संज्ञार् दिए है मार्नव केवल अथर् की ही आवश्यकतार् महसूस नही करतार् मार्नव को मार्नसिक शार्ंति भी चार्हिए।

      3. वर्ग संघर्ष क सिद्धार्ंत

      माक्स क अन्य सिद्धार्ंत वर्ग संघर्ष क सिद्धार्ंत है मार्क्सर् ने कहार् है अब तक के समस्त समार्जो क इतिहार्स वर्ग संघर्ष क इतिहार्स रहार् है। कुलीन और सार्धार्रण व्यक्ति सरदार्र और सवे क संघपति आरै श्रमिक निरंतर एक दूसरे के विरोध में खडे रहे है। उनमें आबार्ध गति से संघर्ष जार्री है। माक्स इससे निष्कर्ष निकालार् है कि आधुनिक काल में पूंजीवार्द के विरूध्द श्रमिक संगठित होकर पूंजीवार्दी व्यवस्थार् को समार्प्त कर देंगे तथार् सर्वहार्रार् वर्ग की तार्नार्शार्ही स्थार्पित हो जार्येगी।

      वर्ग संघर्ष के सिद्धार्ंत की आलोचनार् – 

      1. कार्ल माक्स क दृष्टिकोण गलत कि सार्मार्जिक जीवन क आधार्र संघर्ष है वार्स्तव में सार्मार्जिक जीवन क आधार्र सहयोग है। 
      2. माक्स ने घोषणार् की है कि छोटे छोटे पूंजीपति समार्प्त हो जार्येंगे किन्तु ऐसार् नही हुआ ये पूंजीपति विकसित हुए। 
      3. माक्स ने समार्ज में केवल दो वर्गो की बार्त कही है। जबकि आधुनिक युग में दो वर्गो की बार्त कही है। जबकि आधुनिक युग में दो वर्गो के बीच में एक महत्वपूर्ण तथार् विशार्ल मध्यम वर्ग विद्यमार्न है। 

      4. अतिरिक्त मूल्य क सिद्धार्ंत – 

      माक्स ने अपनी पुस्तक दार्स केपिटल में अतिरिक्त मूल्य के सिद्धार्ंत की विवेचनार् की है। माक्स की मार्न्यतार् है कि पूंजीपति श्रमिको को उनक उचित पार्रिश्रमिक न देकर उनके श्रम क सम्पूर्ण लार्भ स्वयं हड़प लेतार् है माक्स ने मार्नार् है कि किसी वस्तु क मूल्य इसलिए होतार् है क्योंकि इसमें मार्नवीय श्रम लगार् है। दूसरे शब्दार्े में वस्तु के मूल्य क निर्धार्रण उस श्रम से होतार् है जो उस वस्तु के उत्पार्दन पर लगार्यार् जार्तार् है जिस वस्तु पर अधिक श्रम लगतार् हे। उसक मूल्य अधिक और जिस वस्तु के उत्पार्दन पर कम श्रम लगतार् है उसक मूल्य कम हार्ते ार् हे। इस प्रकार माक्स क विचार्र है कि किसी वस्तु क वार्स्तविक मूल्य वह होतार् है जो उस पर व्यय किये गये श्रम के बरार्बर होतार् है किन्तु जब वह वस्तु बार्जार्र में बिकती है तो वह उंचार् मूल्य पार्ती है। 
      इस प्रकार वस्तु के बार्जार्र मूल्य व वार्स्तविक मूल्य के अंतर को पूंजीपति स्वयं हड़प लेतार् है। माक्स की दृष्टि में जो धन पूंजीपति द्वार्रार् अपने पार्स रख लियार् गयार् वही धन अतिरिक्त मूल्य कहलार्तार् है। स्वयं माक्स के शब्दो में ‘‘अतिरिक्त मूल्य इन दो मूल्यों क अंतर है जिसे श्रमिक पैदार् करतार् है और जिसे वह वार्स्तव में प्रार्प्त करतार् है।’’ इस प्रकार वार्स्तविक मूल्य और विक्रयमूल्य क अंतर ही अतिरिक्त मूल्य है। इस सम्बन्ध में माक्स ने लिखार् है’’ यह वह मूल्य है जिसे पूंजीपति श्रमिको के खून पसीने की कमाइ पर पथ कर(tolltax) के रूप में वसूल करतार् है।’’ 

      अतिरिक्त मूल्य के सिद्धार्ंत की आलोचनार् –

      1. माक्स ने उत्पार्दन क एकमार्त्र सार्धन श्रम को मार्नार् है जबकि यह सर्वविदित है कि श्रम के अतिरिक्त भूमि पूंजी संगठन व उद्यम भी महत्वपूर्ण सार्धन है। उत्पार्दित वस्तु द्वार्रार् प्रार्प्त लार्भ को इन सभी सार्धनो पर वितरित करनार् ही युक्तिसंगत दिखाइ देतार् है। 
      2. माक्स केवल शार्रिरिक श्रम को महत्व देतार् है मार्नसिक श्रम को नही। पूंजीपति अतिरिक्त मूल्य क प्रयोग नर्इ मशीने लार्ने व अन्य सार्धनो के उपयोग में करतार् है किन्तु वह यह भी कहतार् है कि नर्इ मशीनो व कच्चे मार्ल से कोर्इ अतिरिक्त मूल्य पाप्त नहीं हार्ते ार् यह तो श्रमिकों के श्रम से पार््र प्त होतार् है। माक्स के ये दोनो विचार्र परस्पर विरोधी है।

        5. सर्वहार्रार् वर्ग क अधिनार्यकवार्द – 

        मार्कर्स क कहनार् है कि द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द के सिद्धार्ंत के अनुसार्र पूंजीवार्दी व्यवस्थार् में अन्तर्निहित विरोध स्वभार्व के कारण पूंजीपति वर्ग मे सघंर्ष होनार् अवश्यम्भार्वी है। इस वर्ग संघर्ष में श्रमिक वर्ग संगठित होकर पूंजीपति वर्ग पर भरपूर प्रहार्र करेगार् और रक्तिम क्रार्न्ति द्वार्रार् पूंजीवार्द को समूल रूप से नष्ट करने के उद्दश्ेय से अधिनार्यकवार्द की  विशेषतार्एं है – 
        1. माक्स के अनुसार्र पूंजीवार्दी समार्ज में अल्पसंख्यक पूंजीपति वर्ग बहुसख्ं यक श्रमिको पर शार्सन करतार् है जबकि श्रमिको की तार्नार्शार्ही में बहुसंख्यक श्रमिक वर्ग अल्पसंख्यक पूंजीपतियो पर शार्सन करेगार्। इस प्रकार यह पुंजीवार्दी शार्सन की तुलनार् में अधिक लोकतार्न्त्रिक होगार्। 
        2. श्रमिकों के अधिनार्यकवार्दी शार्सन में निजी समपत्ति क उन्मूलन कियार् जार्येगार् और उत्पार्दन आरै वितरण के सार्धनो पर रार्ज्य क एकाधिकार हो जार्येगार्। 
        3. श्रमिकों की तार्नार्शार्ही में पूंजीपति वर्ग को बलपूर्वक दबार् दियार् जार्येगार् जिससे भविष्य में वह पुन: सिर न उठार् सके। पूंजीवार्द में विश्वार्स रखने वार्लो क अनत कर दियार् जार्येगार्। 
        4. श्रमिको की तार्नार्शार्ही की स्थिति में रार्ज्य एक संक्रमणकालीन व्यवस्थार् है। संक्रमणकाल में रार्ज्य तो रहेगार् किन्तु जब पूंजीपति वर्ग को समलू रूप से नष्ट कर दियार् जार्येगार् अर्थार्त वर्गीय व्यवस्थार् समार्प्त कर दी जार्एगी तो रार्ज्य स्वयंमेव समार्प्त हो जार्येगार्। 

        एंजिल्स के शब्दो में ‘‘जब श्रमिक वर्ग रार्ज्य की सम्पूर्ण शक्ति प्रार्प्त कर लेतार् है तो वह वर्ग के सभी मतभेदो व विरोधो को समार्प्त कर देतार् है और परिणार्मस्वरूप रार्ज्य के रूप में समार्प्त हो जार्तार् है।’’ 

        6. वर्ग विहीन व रार्ज्य विहीन समार्ज – 

        माक्स क कहनार् है कि जैसे ही पूंजीवार्दी वर्ग क अन्त हो जार्येगार् और पूंजीवार्दी व्यवस्थार् के सभी अवशेष नष्ट कर दियें जार्येंगे रार्ज्य के स्थित रहने क औचित्य भी समार्प्त हो जार्येगार् और वह मुरझार् जार्येगार् (thestate will wither away) । जब समार्ज के सभी लोग एक स्तर पर आ जार्येंगे तो प्रत्येक व्यक्ति समपूर्ण समार्ज के लिये सर्वार्धिक कार्य करेगार् और बदले मे अपनी सम्पूर्ण आवश्यक्तार्ओ की स्वतंत्रतार्पूर्वक पूर्ति करेगार्। इस समार्ज में विभिन्न सार्मार्जिक संगठनो के मार्ध्यम से सावजनिक कार्यो की पूर्ति होगी। ऐसे वर्ग विहीन व रार्ज्य विहीन समार्ज मे वर्ग विशेष वर्ग शोषण क पूर्ण अभार्व होगार् और व्यक्ति सार्मार्जिक नियमों क सार्मार्न्य रूप से पार्लन करेंगे। 
        माक्स द्वार्रार् प्रतिपार्दित समार्जवार्द की यह सर्वोच्च स्थिति है। मार्नव कल्यार्ण क यह सर्वोच्च शिखर है। इस स्वतंत्र समार्ज में प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमतार् तथार् योग्यतार्नुसार्र कार्य करेगार् और आवश्यक्तार्नुसार्र मजदूरी प्रार्प्त करेगार्। इस समार्ज मे प्रत्यके व्यक्ति की आवश्यक्तार् की पूर्ति होगी तथार् वह अपनी योग्यतार्नुसार्र समार्ज को सहयोग देगार्। यह वह समार्ज है जिसमें न वगर् होगार् न रार्ज्य रहेगार्। 

        वर्गविहीन व रार्ज्यविहीन समार्ज की आलोचनार् – 

        माक्सवार्द की यह मार्न्यतार् एक कोरी कल्पनार् प्रतीत होती है कि सर्वहार्रार् वर्ग के अधिनार्यकवार्द की स्थार्पनार् के परिणार्मस्वरूप जब पूंजीवार्द पूर्णत: विनष्ट हो जार्एगार् तो रार्ज्य भी स्वयं ही समार्प्त हो जार्एगार्। इस प्रकार एक वर्ग विहीन समार्ज स्थार्पित हो जार्एगार् परन्तु अनुभव यह बतलार्तार् है कि सार्म्यवार्दी देशों में भी रार्ज्य समार्प्त होने के स्थार्न पर पूर्व की अपेक्षार् और अधिक सुदृढ सशक्त एवं स्थार्यी होते जार् रहै है। उनके स्वयं समार्प्त होने की सम्भार्वनार् भी नही है। रूस और चीन अपनी सीमार् क विवार्द नहीं सुलझार् सके है। इन रार्ज्यो के उच्च अधिकारी सार्म्यवार्दी दल के उच्च नेतार् सैनिक व प्रशार्सनिक अधिकारी बहुत व्यार्पक अधिकारों क उपभोग करते है। सुरक्षार् तथार् पुलिस अधिकारी अपनी मनमार्नी के लिये बदनार्म हे। इस सदंर्भ में स्टार्लिन ने कहार् थार्’’ समार्जवार्दी रार्ज्य एक नये पक्रार्र क रार्ज्य है’ और इसलिए इसकी समार्प्ति क प्रशन नहीं उठतार्।’’ 

        माक्सवार्द की आलोचनार् यार् विपक्ष में तर्क 

        1. माक्सवार्द क उददेश्य अस्पष्ट – माक्सवार्द की आलोचनार् क आधार्र उसके उददेश्य की अस्पष्टतार् है। माक्सवार्द एक ऐसे समार्ज की कल्पनार् करतार् है जो वर्ग विहीन और रार्ज्य विहीन हो इसक व्यार्वहार्रिक हल माक्सवार्द मे आस्थार् रखने वार्ले देशो के पार्स भी नही है। आज भी चीन में श्रमिक वर्ग की तार्नार्शार्ही विद्यमार्न है किन्तु वहार्ं अन्य वगर् भी है। 
        2. हिंसार् द्वार्रार् सार्मार्जिक परिवर्तन- माक्सवार्दीयों क दृष्टिकोण है कि सार्मार्जिक परिवर्तन के लिए हिंसार् आवश्यक है कितुं हिसार्ं की किसी भी स्थिति में सवर्मार्न्य एवं वार्छंनीय नही हो सकती। 
        3. मजदूरो की तार्नार्शार्ही खतरनार्क- विश्व में विद्यमार्न तार्नार्शार्ही शार्सको के समार्न श्रमिको की तार्नार्शार्ही भी शार्सन क विकृत रूप है। 
        4. लोकतंत्र विरोधी धार्रणार्- यद्यपि माक्सवार्द समार्जवार्दी लोकतंत्र के प्रति आस्थार् व्यक्त करते हे। किन्तु वार्स्तव में यह तार्नार्शार्ही व्यवस्थार् क ही दूसरार् रूप है। इस व्यवस्थार् में कोई दसूरार् रार्जनीतिक दल नही होतार्। 
        5. अतिरिक्त मूल्य क सिद्धार्ंत त्रुटिपूर्ण- माक्स ने अपने अतिरिक्त मूल्य के सिद्धार्ंत में केवल श्रम को ही वस्तु के मूल्य निर्धार्रण क आधार्र मार्नार् है जो स्वयं मे त्रुटिपूर्ण है। मूल्य निर्धार्रण के लिये मार्ंग पूतिर् समय स्थार्न आदि ऐसे कारण है जो वस्तु के मूल्य निर्धार्रण को प्रभार्वित करते है। 

          माक्सवार्द की उपर्युक्त आलोचनार् के निष्कर्ष स्वरूप- 

          प्रो. केर्यूण्ट क कथन उल्लेखनीय है कि सार्यवार्द अथवार् माक्सवार्द विश्व की सबसे बडी विध्वंसक शक्ति है। विश्व में स्थार्यी शार्ंति की व्यवस्थार् की तब तक आशार् नही की जार् सकती जब तक कि सार्म्यवार्दी विचार्रधार्रार् में विश्व कल्यार्ण तथार् लोकतंत्र के लिए आवश्यक संशोधन न कर लिये जार्यें’’ 

          माक्सवार्द क महत्व यार् प्रभार्व यार् पक्ष में तर्क 

          माक्सवार्द की विभिन्न आलोचनार्ओ के बार्वजूद इसके महत्व को नकारार् नही जार् सकतार्। आज माक्सवार्द ने पूरे विश्व के स्वरूप को ही परिवर्तित कर दियार् है ये पीडितो दलितो शोषित एवं श्रमिक क पक्ष लेकर उपेक्षित मार्नव कलयार्ण के लिये माक्सवार्द ने समार्जवार्द को एक ठोस एवं वैज्ञार्निक आधार्र प्रदार्न कियार् है। उनकी प्रमुख देन  है – 
          1. वैज्ञार्निक दर्शन- मार्क्सर्वार्द को वैज्ञार्निक समार्जवार्द भी कहार् जार्तार् है मार्क्सर् के पूर्ण समार्जवार्दी सिद्धार्ंतो मे वैज्ञार्निक आधार्र देने क कभी भी प्रयार्स नही कियार्। इस कार्य को प्रार्रंभ करने क श्रेय माक्स को जार्तार् है। 
          2. सैध्दार्ंतिकतार् की अपेक्षार् व्यार्वहार्रिकतार् पर बल – माक्सवार्द की लोकप्रियतार् क प्रमुख कारण उसक व्यार्वहार्रिक होनार् है। इसकी अनेक मार्न्यतार्ओ को रूस और चीन में प्रयोग में लार्यार् गयार् जिनमें पूर्ण सफलतार् भी मिली। 
          3. श्रमिक वर्ग की स्थिति को सबलतार् प्रदार्न करनार् –माक्सवार्द की सबसे बडी देन है तो वह श्रमिक वर्ग में वर्गीय चेतनार् और एकतार् को जन्म देनार् है। उनकी स्थिति में सुधार्र करनार् है। माक्स ने नार्रार् दियार् ‘‘विश्व के मज़दूर एक हो जार्ओ तुम्हार्रे पार्स खोने के लिये केवल जंजीरे है और विजय प्रार्प्त करने के लिये समस्त विश्व पड़ार् हे। ‘‘ माक्स के इन नार्रो ने श्रमिक वर्ग में चेतनार् उत्पन्न करने में अद्वितीय सफलतार् प्रार्प्त की। 
          4. पूंजीवार्दी व्यवस्थार् के दोषो पर प्रकाश डार्लनार् – माक्सवार्द के अनुसार्र समार्ज में सदार् शोषक शोषित के बीच संघर्ष चलते रहतार् है। शोषक यार् पूंजीवार्दी वर्ग सदार् अपने लार्भ कमार्ने की चिन्तार् में रहतार् है। इसके लिये वह श्रमिको तथार् उपभोक्तार्ओ क तरह तरह से शोषण करतार् रहतार् है। परिणार्म स्वरूप पूंजीपति और अधिक पूंजीपति हो जार्ते है और गरीब और अधिक गरीब। समार्ज में भूखमरी और बेकारी बढती है। तो दसू री ओर पूंजीपतियों व्यवस्थार् के इन दोषो को दूर किये बिनार् आदर्श समार्ज की स्थार्पनार् नही की जार् सकती। 

            संक्षेप में माक्सवार्दी विचार्रधार्रार् ने दलित आरै उपेिक्षत मार्नवतार् पक्ष लेकर अपने को एक अत्यधिक लार्के पिय्र और आकर्षक रूप में प्रस्तुत कियार् है और विश्व रार्जनीति में अपने को एक प्रबल चुनौती के रूप में खडार् कर दियार् हैं। 

            माक्सवार्द व समार्जवार्द की तुलनार् 

            1. माक्सवार्द एक विशिष्ट सिद्धार्ंत है। जिसे मार्त्र सार्म्यवार्दी देश ही अपनार् सकतार् है। जबकि समार्जवार्द एक प्रजार्तार्ंत्रिक और व्यार्पक सिद्धार्ंत है जिसे कोर्इ भी देश अपनार् सकतार् है। 
            2. माक्सवार्द क अन्तिम चरण रार्ज्य विहीन समार्ज की स्थार्पनार् है जबकि समार्जवार्द रार्ज्य को आवश्यक मार्नतार् है। 
            3. माक्सवार्द सार्मार्जिक एवं आर्थिक समार्नतार् को विशेष महत्व देतार् है। जबकि समार्जवार्द स्वतत्रं तार् आरै समार्नतार् क पक्षधर है। 
            4. समस्त माक्सवार्द समार्जवार्दी होते है जबकि समस्त समार्जवार्दी माक्सवार्दी नही हार्ते े। 
            5. माक्सवार्द अन्तराष्टी्रय विचार्रधार्रार् हे। समार्जवार्दी योजनार्एं रार्ष्ट्रीय होती हे। 
            6. माक्सवार्द में वेतन आवश्यकतार्नुकलु है जबकि समार्जवार्द में योग्यतार् अनुकूल हे। 
            7. माक्सवार्दी धर्मविरोधी है वह धर्म को प्रगतिशील विचार्रों के माग में बार्धक बतलार्तार् है। परंतु धर्म के सम्बन्ध में समार्जवार्दियो क दृष्टिकोण तटस्थतार् क है। 

            उपर्युक्त विवेचनार् से स्पष्ट है कि माक्सवार्द और समार्जवार्द में बहुत अंतर है। माक्सवार्द और समार्जवार्द एक ही व्यवस्थार् के दो प्रकार नही वरन विचार्र और जीवन के दो मूलत: भिन्न माग है।

            Leave a Reply

            Your email address will not be published. Required fields are marked *