मार्नसिक स्वार्स्थ्य क अर्थ, मार्नसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति की विशेषतार्एँ

मार्नसिक स्वार्स्थ्य से तार्त्पर्य वैसे अधिगमित व्यवहार्र से होतार् है जो सार्मार्जिक रूप से अनुकूली होते हैं एवं जो व्यक्ति को अपनी जिन्दगी के सार्थ पर्यार्प्त रूप से सार्मनार् करने की अनुमति देतार् है।’

दूसरे शब्दों में मार्नसिक स्वार्स्थ्य व्यक्ति की उस स्थिति की व्यार्ख्यार् है जिसमें वह समार्ज व स्वयं के जीवन की परिस्थितियों से निबटने के लिए, आवश्यकतार् अनुरूप स्वयं को ढार्लने हेतु व्यवहार्रों को सीखतार् है।

एक अन्य मनोवैज्ञार्निक कार्ल मेन्निंगर (1945) के अनुसार्र – ‘मार्नसिक स्वार्स्थ्य अधिकतम प्रसन्नतार् तथार् प्रभार्वषीलतार् के सार्थ संसार्र एवं प्रत्येक दूसरे व्यक्ति के प्रति मार्नवों द्वार्रार् कियार् जार्ने वार्लार् समार्योजन है प्रसिद्ध विद्वार्न हार्रविज और स्कीड ने अपनी पुस्तक ‘अप्रोच टू मेंटल हेल्थ एण्ड इलनेस’ में मार्नसिक स्वार्स्थ्य को परिभार्षित करते हुए बतार्यार् है कि इसमें कर्इ आयार्म जुड़े हुए हैं – आत्म सम्मार्न, अपनी अंत: शक्तियों क अनुभव, साथक एवं उत्तम सम्बन्ध बनार्ए रखने की क्षमतार् एवं मनोवैज्ञार्निक श्रेश्ठतार्।’ इसकी व्यार्वहार्रिक परिभार्षार् देते हुए पी.वी. ल्यूकन लिखते हैं कि ‘मार्नसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति वह है जो स्वयं सुखी है, अपने पड़ोसियों के सार्थ शार्तिपूर्वक रहतार् है, अपने बच्चों को स्वस्थ नार्गरिक बनार्तार् है और इन आधार्रभूत कर्तव्यों को करने के बार्द भी जिसमें इतनी शक्ति बच जार्ती है कि वह समार्ज के हित में कुछ कर सके।’

मनोवैज्ञार्निकों की दृष्टि में मार्नसिक स्वार्स्थ्य-

मार्नसिक स्वार्स्थ्य के संबंध में कुछ प्रमुख मनोवैज्ञार्निकों के विचार्रों एवं उनके द्वार्रार् प्रतिपार्दित सिद्धार्न्तों के अवलोकन एवं विश्लेषण से मनौवैज्ञार्निक दृष्टि से मार्नसिक स्वार्स्थ्य को समझने में मदद मिलती है, मार्नसिक स्वार्स्थ्य की मनोवैज्ञार्निक दृष्टि स्पष्ट होती है। 1. मनोगत्यार्त्मक दृष्टि 2. व्यवहार्रवार्दी दृष्टि 3. मार्नवतार्वार्दी दृष्टि 4. संज्ञार्नार्त्मक दृष्टि ।

1. मनोगत्यार्त्मक दृष्टि  – 

मनोगत्यार्त्मक दृष्टि मार्नसिक स्वार्स्थ्य क विचार्र व्यक्तित्व की गतिकी के मार्ध्यम से करती है। व्यक्तित्व की गत्यार्त्मकतार् को दृष्टिगत रखते हुए तीन प्रकार की दृष्टियॉं इस संदर्भ में प्रमुख हैं-

  1. मनोविश्लेषणवार्दी दृष्टि- उदार्हरण के लिए यदि हम प्रस़िद्ध मनोविश्लेषणवार्दी मनोवैज्ञार्निक सिगमण्ड फ्रार्यड के व्यक्तित्व सिद्वार्न्त में मन एवं मार्नसिक स्वार्स्थ्य की अवधार्रणार् पर विचार्र करें तो हम पार्ते हैं कि फ्रार्यड ने उसी व्यक्ति को मार्नसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति की संज्ञार् दी है जो कि अपने जीवन में द्वन्द्वों, चिन्तार्ओं से रहित है तथार् मनोरचनार्ओं क न्यूनतम उपयोग जिसके जीवन में दिखाइ देतार् है। दूसरे शब्दों में फ्रार्यड के अनुसार्र जिस व्यक्ति की अहॅंशक्ति पर्यार्प्त मार्त्रार् में बढ़ी होती है और जो व्यक्ति अपने मन के उपार्हं की इच्छार्ओं एवं परार्हं के फैसलों के बीच अहंशक्ति के मार्ध्यम से समार्योजन सार्मंजस्य बिठार्ने में पर्यार्प्त रूप से सक्षम होतार् है उसे ही मार्नसिक रूप से स्वस्थ कहार् जार् सकतार् है। 
  2. विश्लेषणार्त्मक दृष्टि – वहीं दूसरी ओर प्रसिद्ध मनोवैज्ञार्निक कार्ल युग के अनुसार्र जब तक किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व के सभी पहलुओं में इस प्रकार क स्थिर समार्योजन नहीं होतार् कि जिससे उसके वार्स्तविक आत्मन् को चेतन में उद्भूत होने क अवसर मिले तब तक उस व्यक्ति को मार्नसिक रूप से स्वस्थ नहीं कहार् जार् सकतार् है। क्योंकि व्यक्तित्व के सभी पहलुओं में जब तक सार्मंजस्य नहीं होगार् एवं वे सार्थ सार्थ उचित अनुपार्त में विकसित नहीं होंगे तब तक उनके अस्तित्व के भीतर दबे वार्स्तविक आत्मन् क बार्हर आनार् संभव नहीं है। इसके लिए युंग व्यक्तित्ववार्दी विश्लेषण की वकालत करते हैं। व्यक्तित्व संबंधी युंग क विभार्जन एंव विचार्र उल्लेखनीय है। वे व्यक्तित्व को मोटे तौर पर अंतर्मुखी (introvert) और बहिर्मुखी (extrovert) दो भार्गों में विभार्जित करते हैं। अंतर्मुखी व्यक्तित्व, दूसरों में कम रूचि लेतार् है और आत्मकेंद्रित क्रियार्ओं में सर्वार्धिक संतोष क अनुभव करतार् है। ये लोग कोमल मन वार्ले, विचार्र प्रधार्न, कल्पनार्शील तथार् आदर्शवार्दी होते हैं। अत: इन लोगों क झुकाव आंतरिक जीवन की ओर होतार् है। इसके विपरीत बहिर्मुखी व्यक्ति बार्हर की वस्तुओं में अधिक रूचि लेतार् है तथार् सार्मार्जिक घटनार्ओं एवं परिस्थितियों मे अधिक सुखदद एवं संतोषजनक अनुभव पार्तार् है। वह व्यवहार्रवार्दी होतार् है तथार् कठोर मन वार्लार् यथाथवार्दी होतार् है। वार्स्तव में अंतर्मुखतार् और बहिर्मुखतार् के बीच कोर्इ वार्स्तविक सीमार्रेखार् नहीं हैं। स्वयं युंग के शब्दों में ‘प्रत्येक व्यक्ति में अंतर्मुखतार् और बहिर्मुखतार् के अंश रहते हैं और किसी व्यक्ति में इन दोनों में से किसी एक की सार्पेक्ष प्रधार्नतार् से व्यक्तित्व क प्रकार बनतार् है।’ युंग के अनुसार्र जिस व्यक्ति में अंतर्मुखी एवं बहिर्मुखी प्रवृत्ति में सार्मंजस्य होतार् है वही मार्नसिक स्वार्स्थ्य की धुरी पर चलने वार्लार् व्यक्ति कहार् जार्नार् चार्हिए। कार्ल युंग के अनुसार्र प्रत्येक व्यक्ति में सार्मार्न्यत: व्यक्तित्व क आधार् भार्ग नर और आधार् भार्ग नार्री क होतार् है। अर्थार्त् प्रत्येक व्यक्तित्व में स्त्री एवं पुरूष की प्रवृत्तियॉं पार्यी जार्ती हैं और इन दोनों प्रकार की प्रवृत्तियों में सार्मंजस्य मार्नसिक स्वार्स्थ्य की दृष्टि से आवश्यक है। 
  3. व्यक्तित्ववार्दी दृष्टि – एक अन्य प्रसिद्ध मनोवैज्ञार्निक एडलर जिन्होंने व्यक्तिगत मनोविज्ञार्न के सिद्धार्न्त क प्रतिपार्दन कियार् है उनके अनुसार्र जो व्यक्ति जितनार् अधिक सार्मार्जिक कार्यों में रूचि लेतार् है जिस व्यक्ति के जितने अधिक मित्र होते हैं एवं जो सार्मार्जिक होतार् है वह व्यक्ति उतनार् ही मार्नसिक रूप से स्वस्थ होतार् है। क्योंकि ऐसार् व्यक्ति अपने को समार्ज क एक अभिन्न अंग समझतार् है एवं उसमें हीनभार्वनार् नहीं होती है। एडलर के अुनसार्र जब तक व्यक्ति के मन में हीनतार् की भार्वनार् भरी रहती है वह मार्नसिक रूप से स्वस्थ नहीं हो पार्तार् है। हीनभार्वनार् को बार्हर करने के लिए व्यक्ति को सार्मार्जिक होनार् चार्हिए एवं उसे इसके लिए जरूरी कुशलतार् हार्सिल करने हेतु पर्यार्प्त रूप से सृजनार्त्मक भी होनार् चार्हिए।

2. व्यवहार्रवार्दी दृष्टि – 

व्यवहार्रवार्दी मनोवैज्ञार्निकों के अनुसार्र व्यक्ति क मार्नसिक स्वार्स्थ्य उसके व्यवहार्र द्वार्रार् निर्धार्रित होतार् है। व्यवहार्रवार्दी मनोवैज्ञार्निकों में वार्टसन, पैवलॉव, स्कीनर आदि प्रमुख हैं। यदि व्यक्ति क व्यवहार्र जीवन की सभी सम विषम परिस्थतियों में समार्योजित है तो व्यक्ति मार्नसिक रूप से स्वस्थ कहार् जार्तार् है वहीं यदि व्यक्ति क व्यवहार्र कुसमार्योजित होतार् है तो वह मार्नसिक रूप से अस्वस्थ कहार् जार्तार् है। व्यक्ति के व्यवहार्र क समार्योजित अथवार् कुसमार्योजित होनार् उसके सीखने की प्रक्रियार् एवं सही एवं गलत व्यवहार्र के चयन पर निर्भर करतार् है। यदि व्यक्ति ने सही अधिगम प्रक्रियार् के तहत उपयुक्त व्यवहार्र करनार् सीखार् है तो वह मार्नसिक रूप से अवश्य ही स्वस्थ होगार्। यदि गलत अधिगम प्रक्रियार् के तहत व्यवहार्र करनार् सीखार् है तो वह अस्वस्थ कहलार्येगार्। इनके अनुसार्र व्यक्ति के व्यवहार्र पर वार्तार्वरण क अत्यधिक प्रभार्व पड़तार् है, दूसरे शब्दों में व्यक्ति के व्यवहार्र क निर्धार्रण वार्तार्वरण एवं व्यक्ति के बीच होने वार्ली अंत’क्रियार् से होतार् है। व्यवहार्रवार्दियों के अनुसार्र यदि उचित वार्तार्वरण में सही व्यवहार्र सीखने क अवसर प्रत्येक व्यक्ति को मिले तो वह मार्नसिक रूप से अवश्य ही स्वस्थ होगार्।

3. मार्नवतार्वार्दी दृष्टि – 

मार्नवतार्वार्दी दृष्टि में भी मार्नसिक स्वार्स्थ्य की अवधार्रणार् पर विचार्र कियार् गयार् है। इस उपार्गम के मनोवैज्ञार्निकों में अब्रार्हम मैस्लों एवं कार्ल रोजर्स प्रमुख हैं। इनके अनुसार्र प्रत्येक मनुष्य में अपने स्वार्भार्विक विकास की सहज प्रवृत्ति होती है। सार्थ ही प्रत्येक व्यक्ति में अपनी प्रतिभार् एवं संभार्वनार्ओं की अभिव्यक्ति की जन्मजार्त इच्छार् प्रकट अथवार् प्रसुप्त रूप में विद्यमार्न होती है यह उसकी अंत:शक्ति क परिचार्यक होती है। जब तक यह सहज विकास करने की स्वार्भार्विक प्रवृत्ति को अपनी अभिव्यक्ति करने क मौक उचित रूप से मिलतार् रहतार् है तब तक व्यक्ति अपने व्यक्तित्व के धनार्त्मक विकास की ओर अग्रसर रहतार् है। यदि यह निर्बार्ध रूप से जार्री रहतार् है तो अंतत: व्यक्ति अपनी सभी प्रतिभार्ओं एवं संभार्वनार्ओं से परिचित हो जार्तार् है एक प्रकार से उसे आत्मबोध हो जार्तार् है। इस रूप में ऐसे व्यक्ति क मार्नसिक स्वार्स्थ्य उत्तरोत्तर उन्नति की ओर अग्रसर कहार् जार्येगार्। वहीं दूसरी ओर यदि किन्हीं कारणों से यदि सहज प्रवृत्ति अवरूद्ध हो जार्ती है तो व्यक्ति में मार्नसिक अस्वस्थतार् के लक्षण प्रकट होने लगते हैं।

4. संज्ञार्नार्त्मक दृष्टि – 

यह दृष्टि मार्नसिक स्वार्स्थ्य की मनोवैज्ञार्निक दृष्टियों में सबसे नवीन है। इस विचार्रधार्रार् के मनोवैज्ञार्निकों में एरोन टी. बेक एवं एलबर्ट एलिस प्रमुख हैं। इनके अनुसार्र जिस व्यक्ति के विचार्र जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में सकारार्त्मक होते हैं जो तर्कपूर्ण ढंग से धार्रणार्ओं को विश्वार्सों को अपने जीवन में स्थार्न देतार् है। वह मार्नसिक रूप से स्वस्थ कहार् जार्तार् है। व्यक्ति क मार्नसिक स्वस्थतार् उसके चिंतन के तरीके पर निर्भर करती है। चिंतन के प्रमुख रूप से तीन तरीके हैं पहलार् जीवन की हर घटनार् को सकारार्त्मक नजरिये से निहार्रनार् एवं दूसरार् जीवन की प्रत्येक घटनार् को नकारार्त्मक तरीके से निहार्रनार्। इसके अलार्वार् एक तीसरार् तरीक है जो कि चिंतन क वार्स्तविक तरीक है जिसमें व्यक्ति जीवन में घटने वार्ली प्रत्येक घटनार् क पक्षपार्त रहित तरीके से विश्लेषण करतार् है जीवन के धनार्त्मक एवं नकारार्त्मक पहलुओं में किसी के भी प्रति उसक अनुचित झुकाव नहीं होतार् है। मनोवैज्ञार्निकों ने चिंतन के इस तीसरे तरीके को ही सर्वार्धिक उत्तम तरीक मार्नार् है। उपरोक्त तरीकों के अलार्वार् भी चिंतन के अन्य तरीके भी होते हैं परन्तु उनक संबंध व्यक्ति की मार्नसिक उन्नति एवं विकास से होतार् है जैसे सृजनार्त्मक चिंतन आदि।

उपरोक्त मनोवैज्ञार्निक दृष्टियों के अलार्वार् मार्नसिक स्वार्स्थ्य को देखने की अन्य दृष्टियॉं भी हैं जैसे कि योग की दृष्टि में मार्नसिक स्वार्स्थ्य, आयुर्वेद की दृष्टि में मार्नसिक स्वार्स्थ्य। योग विषय के विद्यार्थ्री होने के नार्ते मार्नसिक स्वार्स्थ्य की यौगिक दृष्टि की जार्नकारी होनार् आवश्यक है अतएव आगे की पंक्तियों में यौगिक दृष्टि में मार्नसिक स्वार्स्थ्य को स्पष्ट कियार् जार् रहार् है। पहले इस अभ्यार्स प्रश्न से अपनी जार्नकारी की परीक्षार् करें।

यौगिक दृष्टि में मार्नसिक स्वार्स्थ्य

योग शार्स्त्रों में आधुनिक मनोविज्ञार्न की विभिन्न विचार्रधार्रार्ओं के समार्न मार्नसिक स्वार्स्थ्य के संप्रत्यय क विचार्र स्वतंत्र रूप से कहीं भी विवेचित अथवार् प्रतिपार्दित नहीं हुआ है। क्योंकि यहॉं व्यक्ति को समग्रतार् में देखने की परंपरार् रही है। आधुनिक मनोविज्ञार्न में व्यक्ति के अस्तित्व को जहॉं मन से जोड़कर देखार् जार्तार् रहार् है वहीं योग की भार्रतीय विचार्रधार्रार् में व्यक्ति क अस्तित्व आत्मार् पर आधार्रित मार्नार् गयार् है। यहॉं मार्न क अस्तित्व आत्मार् के उपकरण से अधिक कुछ भी नहीं है। जीवन क चरम लक्ष्य यहॉं अपने वार्स्तविक स्वरूप आत्म तत्व की उपलब्धि है। इसी को मोक्ष, निर्वार्ण, मुक्ति, आत्मसार्क्षार्त्कार जैसी बहुत सी संज्ञार्ओं से विवेचित कियार् गयार् है। यौगिक दृष्टि से यही स्थिति व्यक्ति के अस्तित्व की पूर्णार्वस्थार् है, इसी अवस्थार् में व्यक्ति को मार्नसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ कहार् जार् सकतार् है।

इस तरह यौगिक दृष्टि में मार्नसिक स्वार्स्थ्य की समस्यार् पर आत्यार्ंतिक रूप से विचार्र कियार् गयार् है, जिसकी आधुनिक मनोविज्ञार्न में अभी कोर्इ कल्पनार् भी नहीं है। महर्षि पतंजलि ने इस स्वस्थ मन:स्थिति को उपलब्ध करने क सुव्यवस्थित रार्जमाग निर्धार्रित कियार् है, जो अष्टार्ंग योग के नार्म से प्रख्यार्त् हैं इसमें मार्नसिक स्वार्स्थ्य की आदर्श स्थिति को समार्धि के रूप में परिभार्षित कियार् गयार् है और इस तक पहुचने के विविध सोपार्नों पर सूक्ष्म मनोवैज्ञार्निक दृष्टि से विचार्र कियार् गयार् है। आइिये इसके सार्ंप्रत्यार्यिक विश्लेषण की जार्नकारी प्रार्प्त करें।

यौगिक दृष्टि में मार्नसिक स्वार्स्थ्य क सार्ंप्रत्यार्यिक विश्लेषण

महर्षि पतंजलि ने समार्धि को चित्त की वृत्तियों के निरोध की अवस्थार् मार्नार् है एवं यौगिक दृष्टि से यही मार्नसिक स्वार्स्थ्य की सार्मार्न्य अवस्थार् है। इस से पूर्व की सभी अवस्थार्ओं को चित्तवृत्तियों की विभिन्न अवस्थार्ओं के रूप में मार्नसिक स्वार्स्थ्य के विभिन्न स्तर निर्धार्रित किये जार् सकते हैं। योगदर्शन में चित्त की पॉंच अवस्थार्ओं क वर्णन कियार् गयार् है। ये पॉच अवस्थार्यें हैं- 1. मूढ़, 2. क्षिप्त, 3. विक्षिप्त, 4. एकाग्र 5. निरूद्ध।

  1. चित्त की मूढ़ार्वस्थार् – यह चित्त की तमोगुण प्रधार्न अवस्थार् है। इस अवस्थार् में तमोगुण प्रबल एवं रजस तथार् सत्व दबे रहते हैं। परिणार्मस्वरूप व्यक्ति निद्रार्, तंद्रार्, आलस्य, भय, भ्रम, मोह एवं दीनतार् की स्थिति में पड़ार् रहतार् है। इस अवस्थार् में व्यक्ति की सोच-विचार्र करने की शक्ति सुप्त पड़ी रहती है। फलत: वह किसी भी घटनार् ठीक दृष्टि से प्रेक्षित नहीं कर पार्तार् है। इस अवस्थार् में व्यक्ति विवेकशून्य होतार् है एवं सही, गलत क विचार्र नहीं कर पार्तार् है। वह समझ ही नहीं पार्तार् कि उसे क्यार् करनार् चार्हिए एवं क्यार् नहीं करनार् चार्हिए। पंडित श्री रार्म शर्मार् आचाय के अनुसार्र ऐसार् मनुष्य ‘काम, क्रोध, लोभ, मोह के वशीभूत होकर सब तरह के अवार्ंछनीय और नीच कार्य करतार् है। यह अवस्थार् मार्नवीयतार् से पतित व्यक्तियों, मार्दक द्रव्यों क सेवन किए हुए उन्मत्त एवं नीच मनुष्य की होती है। इस अवस्थार् में तमस प्रबल रहार् है जिससे यह स्थिति अधम मनुष्यों की मार्नी जार्ती है’। मनोविज्ञार्न की दृष्टि में यह सार्मार्न्य व्यवहार्र से विचलित व्यक्ति की स्थिति है जिसक मार्नसिक स्वार्स्थ्य गंभीर रूप से रूग्ण होतार् है। इसक उचित उपचार्र आवश्यक होतार् है।
  2. चित्त की क्षिप्तार्वस्थार् – चित्त की इस अवस्थार् में रजोगुण प्रधार्न होतार् है। इसमें सत्व और तमोगुण दबे रहते हैं। इस अवस्थार् में चित्त अत्यंत चंचल रहतार् है। मन की स्थिति बहिर्मुखी होती है। बार्ह्य विषयों की ओर चित्त भार्गतार् रहतार् है। ऐसार् चित्त अशार्न्त, अस्थिर एवं बेचैन बनार् रहतार् है व मन की ऊर्जार् बिखरी रहती है। मन पर कोर्इ नियंत्रण नहीं रहतार् है। भार्रतीय दर्शन की रूपरेखार् पुस्तक के लेखक डॉ हरेन्द्र प्रसार्द सिन्हार् के अनुसार्र ‘व्यक्ति इस अवस्थार् में इंद्रियों, मस्तिष्क एवं मन की अभिरूचियों, कल्पनार्ओं एवं निर्देशों के र्इशार्रे पर नार्चतार् रहतार् है और इन में संयम क अभार्व होतार् है।’ परिणार्म स्वरूप ऐसे मनुष्य की दशार् रार्ग-द्वेष से परिपूर्ण होती है। अत: इन्ही के अनुरूप सुख-दुख, हर्ष, विषार्द, चिंतार् एवं शोक के कुचक्र में उलझार् रहतार् है। इस अवस्थार् में चित्त रजोगुण प्रधार्न होतार् है। किन्तु गौणरूप से सत्व और तमस् भी उसके सार्थ में वार्स करते ही हैं। उनमें जब तमस सत्व पर हार्वी हो जार्तार् है जो मनुष्य की प्रवृत्ति अज्ञार्न, अधर्म, अवैरार्ग्य एवं अनैश्वर्य में होती है एवं जब सत्व तमस पर हार्वी हो जार्तार् है तब यही प्रवृत्ति ज्ञार्न, धर्म, वैरार्ग्य एवं ऎश्वर्य में होती है। इस प्रकार इस अवस्थार् में धर्म-अधर्म, रार्ग-विरार्ग, ऐश्वर्य-अनेश्वर्य तथार् ज्ञार्न-विज्ञार्न में प्रवृत्ति होती है। प्रार्य: सार्धार्रण संसार्री मनुष्यों की यह स्थिति होती है। आधुनिक मनोविज्ञार्न की दृष्टि में व्यक्ति क व्यवहार्र यदि इस स्थिति में सार्मंजस्यपूर्ण है तो उसे स्वस्थ एवं सार्मार्न्य कहार् जार्येगार्, किन्तु प्रार्य: इस अवस्थार् में व्यक्ति नार्नार् प्रकार के मार्नसिक विकारों से आक्रार्न्त रहतार् है। यौगिक दृष्टि से यह स्थिति मार्नसिक स्वार्स्थ्य की स्थिति से बहुत दूर है।
  3. चित्त की विक्षिप्त अवस्थार् – इस अवस्थार् में सतोगुण प्रधार्न रहतार् है। तथार् रजस एवं तमस दबे हुए रहते हैं। आचाय बलदेव उपार्ध्यार्य के अनुसार्र ‘क्षिप्तार्वस्थार् में रजोगुण की प्रधार्नतार् के कारण चित्त कभी स्थिर नहीं होतार्, वह सदार् चंचल बनार् रहतार् है, परन्तु विक्षिप्त अवस्थार् में सत्व की अधिक प्रबलतार् के कारण कभी-कभी स्थिरतार् को प्रार्प्त कर लेतार् है।’ इस में वयक् िज्ञार्न, धर्म, वैरार्ग्य ओर ऐश्वर्य की तरफ प्रवृत होतार् है। इस अवस्थार् में काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि गौण होते हैं और सार्ंसार्रिक विषय भोगों के प्रति अरूचि होने लगती है। व्यक्ति निष्काम कर्म करने की ओर प्रवृत्त होतार् है। परन्तु चित्त की यह स्थिरतार् स्थाइ नहीं रहती है। जब जब रजस् हार्वी होतार् है तब तब आंशिक अस्थिरतार् एवं चंचलतार् आ जार्यार् करती है। इस अवस्थार् में एकाग्रतार् प्रार्रंभ हो जार्ती हैं और यहीं से समार्धि क प्रार्रंभ होतार् है। पंडित श्रीरार्म शर्मार् आचाय के अनुसार्र ‘इस चित्त की अवस्थार् वार्लार् मनुष्य खुशी, प्रसन्न, उत्सार्ही, धैर्यवार्न, दार्नी, दयार्लु, दयार्वार्न, वीर्यवार्न, क्षमार्शील और उच्च विचार्र वार्लार् तथार् श्रेष्ठ होतार् है। यह अवस्थार् उन जिज्ञार्सुओं की होती है, जो अध्यार्त्म पथ के पथिक बनने की भार्वनार् रखते हुए उस पर चलने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं।’ इस स्थिति की यदि आधुनिक मनोविज्ञार्न से तुलनार् करें तो इस अवस्थार् में पहुचार् व्यक्ति सर्वथार् सार्मार्न्य एवं मार्नसिक रूप से स्वस्थ ही मार्नार् जार्एगार्। किन्तु यौगिक दृष्टि में यह भी मार्नसिक स्वार्स्थ्य की सार्मार्न्य अवस्थार् ही है एवं समार्धि से अभी दूर है।
  4. चित्त की एकाग्रार्वस्थार् – इस अवस्थार् में चित्त में केवल सत्व प्रधार्न ही नहीं होतार् बल्कि वह सत्व स्वरूप हो जार्तार् है रजस एवं तमस केवल अस्तित्व मार्त्र से ही रहते हैं अर्थार्त् क्रियार्शील नहीं होते हैं। अत: तमोगुण एवं रजोगुण के विक्षेप अवरूद्ध हो जार्ने से चित्त की वृत्तियों क प्रवार्ह एक ही दिशार् में बनार् रहतार् है, इसे ही एकाग्र अवस्थार् कहते हैं। समस्त विषयों हटकर एक ही विषय पर ध्यार्न लग जार्ने के कारण यह अवस्थार् समार्धि के लिए सर्वथार् उपयुक्त है। निरंतर अभ्यार्स से एकाग्रतार् चित्त क स्वभार्व हो जार्ती है तथार् स्वप्न में भी यह अवस्थार् बनी रहती है। डॉ हरेन्द्र प्रसार्द सिन्हार् के अनुसार्र ‘इस समार्धि से विषयों क यथाथ ज्ञार्न, क्लेशों की समार्प्ति, कर्मबन्धन क ढीलार् पड़नार् तथार् निरोधार्वस्थार् में पहुचनार्, ये चार्र कर्म सम्पार्दित होते हैं।’ यह मार्नसिक स्वार्स्थ्य की अत्यंत ही उच्च अवस्थार् होती है जिसकी आधुनिक मनोविज्ञार्न में कोर्इ संकल्पनार् नहीं है।
  5. चित्त की निरूद्ध अवस्थार् – इस अवस्थार् में चित्त की संपूर्ण वृत्तियों क निरोध हो जार्तार् है। चित्त में पूर्ण रूप से स्थिरतार् स्थार्पित हो जार्ती है। इसमें चित्त आत्मस्वरूप में स्थित हो जार्तार् है, जिसमें अविद्यार् आदि पॉंच क्लेश नष्ट हो जार्ते हैं। अत: चित्त की समस्त वृत्तियों क निरोध होकर चित्त बिल्कुल वृत्ति रहित हो जार्तार् है तथार् आत्मार् अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जार्ती है। उपरोक्त पॉंचो अवस्थार्ओं में प्रथम तीन समार्धि के लिए नितार्न्त अनुपयोगी हैं। परन्तु अंतिम दो अवस्थार्ओं में समार्धि क उदय होतार् है। के. एन. उडुप्पार् एवं आर. एच. सिंह अपनी पुस्तक सार्इन्स एण्ड फिलॉसफी ऑफ इन्डियन मेडिसिन में लिखते हैं कि ‘इन अंतिम दो अवस्थार्ओं मे सत्व की प्रधार्नतार् रहती है, अत: इनमें कोर्इ रोग उत्पन्न नहीं होतार् है। विविध मार्नसिक रोग मन की मूढ़ एवं क्षिप्त अवस्थार्ओं में उदय होते हैं।’ आधुनिक मनोविज्ञार्न में प्रथम तीन भूमियों यार् अवस्थार्ओं क ही अध्ययन हुआ है और इसी के आधार्र पर मार्नसिक स्वार्स्थ्य सम्बन्धी सार्मार्न्य एवं असार्मार्न्यतार् की अवधार्रणार्ओं क विकास हुआ है, जबकि मार्नसिक स्वार्स्थ्य की समग्र संकल्पनार् इसी सीमार् में बॅंधे रहने से संभव नहीं हैं समग्र मार्नसिक स्वार्स्थ्य क उद्भव तो चित्त की अंतिम दो अवस्थार्ओं से ही उद्भूत होगार्, जिसे आधुनिक मनोविज्ञार्न असार्मार्न्यतार् की श्रेणी में विभार्जित करतार् है। इस तरह से यौगिक दृष्टिकोण मार्नवीय अस्तित्व समग्रतार् से विचार्र करतार् है और अपनी यौगिक क्रियार्ओं द्वार्रार् मार्नवी चेतनार् के गहनतम स्तरों क उपचार्र करते हुए यह समग्र मार्नसिक स्वार्स्थ्य क पथ प्रशस्त करतार् है।

मार्नसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति की विशेषतार्एँ

विभिन्न मनोवैज्ञार्निकों ने मार्नसिक रूप से स्वस्थ व्यक्तियों के व्यवहार्र एवं जीवन के अध्ययन के आधार्र पर सार्मार्न्य रूप में कर्इ विशेषतार्ओं क पतार् लगार्यार् है। इन विशेषतार्ओं को हम मार्नसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति की पहचार्न हेतु उपयोग कर सकते हैं। तार्कि इनके अभार्व द्वार्रार् मार्नसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति क निदार्न भी कियार् जार् सकतार् है।

  1. उच्च आत्म-सम्मार्न (high self esteem)- मार्नसिक रूप से स्वस्थ व्यक्तियों के आत्म-सम्मार्न क भार्व काफी उच्च होतार् है। आत्म-सम्मार्न से तार्त्पर्य व्यक्ति द्वार्रार् स्वयं को स्वीकार किये जार्ने की सीमार् से होतार् है। प्रत्येक व्यक्ति क स्वयं को यार्नि कि स्वयं के कार्यों को मार्पने क अपनार् एक पैमार्नार् होतार् है जिस पर वह अपने गुणों एवं कार्यों, कुशलतार्ओं एवं निर्णयों क स्वयं के बार्रे में स्वयं द्वार्रार् बनाइ गर्इ छवि के आलोक में मूल्यॉकन करतार् है। यदि वह इस पैमार्ने पर अपने आप को स्वयं के पैमार्ने पर औसत से ऊपर की श्रेणी में अवलोकित करतार् है तब उसे गर्व क अनुभव होतार् है और परिणार्मस्वरूप उसक आत्म सम्मार्न बढ़ जार्तार् है। वहीं यदि वह स्वयं को इस पैमार्ने में औसत से नीचे की श्रेणी में देखतार् है तो उसक आत्म सम्मार्न घट जार्तार् है। इस आत्म-सम्मार्न क व्यक्ति के आत्म विश्वार्स से सीधार् संबंध होतार् है। जो व्यक्ति स्वयं की नजरों में श्रेष्ठ होतार् है उसक आत्म-विश्वार्स काफी बढ़ार् चढ़ार् होतार् है, एवं जो व्यक्ति किसी कार्य के कारण अपनी नजरों में गिर जार्तार् है उसके आत्म-विश्वार्स में भी गिरार्वट आ जार्ती है। परिणार्म स्वरूप उसके आत्म-सम्मार्न को ठेस पहुचती है। जब यह आत्म-सम्मार्न बार्र बार्र औसत से नीचे की श्रेणी में आतार् रहतार् है अथवार् लम्बे समय के लिए औसत से नीचे ही रहतार् है तब व्यक्ति में दोषभार्व जार्ग्रत हो जार्तार् है तथार् उसे मार्नसिक समस्यार्यें अथवार् मार्नसिक विकृतियॉं घेर लेती हैं।
  2. आत्म-बोध होनार् (Self-awareness)- जिन व्यक्तियों को अपने स्व क बोध होतार् है वे मार्नसिक रूप से अन्य व्यक्तियों की अपेक्षार् ज्यार्दार् स्वस्थ होते हैं। आत्म बोध से तार्त्पर्य स्वयं के व्यक्तित्व से संबंधित सभी प्रकट एवं अप्रकट पहलुओं एवं तत्वों से परिचित एवं सजग होने से होतार् है। जब हम यह जार्नते हैं कि हमार्रे विचार्र कैसे हैं? उनक स्तर कैसार् है? हमार्रे भार्वों को प्रकृति कैसी है? एवं हमार्रार् व्यवहार्र किस प्रकार क है? तो इससे हम स्वयं के व्यवहार्र के प्रति अत्यंत ही स्पष्ट होते हैं। हमें अपनी इच्छार्ओं, अपनी प्रेरणार्ओं एवं अपनी आकांक्षार्ओं के बार्रे में ज्ञार्न होतार् है। सार्थ ही हमें अपनी सार्मथ्र्य एवं कमियों क भी ज्ञार्न होतार् है। ऐसी स्थिति वार्ले व्यक्ति जीवन में स्वयं एवं स्वयं से जुड़े लोगों के सम्बन्ध में सही निर्णय लेने में सक्षम होते हैं। ऐसे व्यक्ति मार्नसिक उलझनों के शिकार नहीं होते एवं फलत: उनक मार्नसिक स्वार्स्थ्य उत्तम स्तर क होतार् है।
  3. स्व-मूल्यॉंकन की प्रवृत्ति (Tendency of self evaluation)- जिन व्यक्तियों में स्व-मूल्यॉंकन की प्रवृत्ति होती है वे मार्नसिक रूप से स्वस्थ होते हैं क्योंकि स्वमूल्यॉंकन की प्रवृत्ति उन्हें सदैव आर्इनार् दिखलार्ती रहती है। वे स्वयं के गुणों एवं दोषों से अनवरत परिचित होते रहते हैं एवं किसी भी प्रकार के भ्रम अथवार् संभ्रार्ंति कि गुंजार्इश भी नहीं रहती है। ऐसे व्यक्ति अपने शक्ति एवं गुणों से परिचित होते हैं एवं जीवन की विभिन्न परिस्थितियों में अपने गुण एवं दोषों के आलोक में फैसले करते हैं। इनमें तटस्थतार् को गुण होने पर अपने संबंध में किसी भी प्रकार की गलतफहमी नहीं रहती है तथार् उचित फैसले करने में सक्षम होते हैं।
  4. सुरक्षित होने क भार्व होनार् (Have feeling of security)- मार्नसिक रूप से स्वस्थ व्यक्तियों में सुरक्षार् क भार्व बढ़ार्-चढ़ार् होतार् है। उनमें समार्ज क एक स्वीकृत सदस्य होने की भार्वनार् काफी तीव्र होती है। यह भार्व उन्हें इस उम्मीद से प्रार्प्त होतार् है कि चूकि वे समार्ज के सदस्य हैं अतएव किसी भी प्रकार की विपरीत स्थिति उत्पन्न होने पर समार्ज के लोग उनकी सहार्यतार् के लिए आगे आयेंगे। समार्ज उनके विकास में सहार्यक होगार् तथार् वे भी समार्ज की उन्नति में अपनार् योगदार्न देंगे। ऐसे लोगों में यह भार्वनार् होती है कि लोग उनके भार्वों एवं विचार्रों क आदर करते हैं। वह दूसरों के सार्थ निडर होकर व्यवहार्र करतार् है तथार् खुलकर हॅंसी-मजार्क में भार्ग लेतार् है। समूह क दबार्व पड़ने के बार्वजूद भी वह अपनी इच्छार्ओं को दमित नहीं करने की कोशिश करतार् है। फलत: मार्नसिक अस्वस्थतार् से सदैव दूर रहतार् है।
  5. संतुष्टि प्रदार्यक संबंध बनार्ने की क्षमतार् (Ability to form satisfying relationship)- मार्नसिक रूप से स्वस्थ व्यक्तियों में परिवार्र एवं समार्ज के अन्य व्यक्तियों के सार्थ ऐसे संबंध विनिर्मित करने की क्षमतार् पार्यी जार्ती है जो कि उन्हें जीवन में संतुष्टि प्रदार्न करती है, उन्हें जीवन में साथकतार् क अहसार्स होतार् है एवं वे प्रसन्न रहते हैं। संबंध उन्हें बोझ प्रतीत नहीं होते बल्कि अपने जीवन क आवश्यक एवं सहार्यक अंग प्रतीत होते हैं। वे दूसरों के सम्मुख कभी भी अवार्स्तविक मॉंग पेश नहीं करते हैं। परिणार्मस्वरूप उनक संबंध दूसरों के सार्थ सदैव संतोषजनक बनार् रहतार् है।
  6. दैहिक इच्छार्ओं की संतुष्टि (Satisfaction of bodily desires)- मार्नसिक रूप से स्वस्थ व्यक्तियों में अपनी शार्रीरिक इच्छार्ओं के संबंध में संतुष्टि क भार्व पार्यार् जार्तार् है। उन्हें सदैव यह लगतार् है कि उनके शरीर अथवार् शरीर के विभिन्न अंगों की जो भी आवश्यकतार्यें हैं वे पूरी हो रही हैं। प्रार्य: ऐसे व्यक्ति शार्रीरिक रूप से स्वस्थ होते हैं परिणार्म स्व्रूप वे सोचते हैं कि उनके हृदय लीवर, किडनी, पेट आदि अंग अपनार् अपनार् कार्य सुचार्रू रूप से कर रहे हैं। दूसरे रूप में जब व्यक्ति के शरीर को आनन्द देने वार्ली आवश्कतार्यें जैसे कि तन ढकने के लिए वस्त्र, जिहवार् के स्वार्द पूर्ति के लिए व्यंजन, सुनने के लिए मधुर संगीत आदि उपलब्ध होते रहते हैं तो वे आनन्दित होते रहते हैं। सार्धन नहीं मिलने पर भी वे इनकी पूर्ति दूसरे मार्ध्यमों से करने में भी सक्षम होते हैं। परिणार्मस्वरूप मार्नसिक रूप से स्वस्थ होते हैं। सरल शब्दों में कहें तो वे शार्रीरिक इच्छार्ओं के प्रति अनार्सक्त रहते हैं सुविधार् सार्धन मिलने पर प्रचुर मार्त्रार् में उपभोग करते हैं नहीं मिलने पर बिल्कुल भी विचलित नहीं होते एवं प्रसन्न रहते हैं।
  7. प्रसन्न रहने एवं उत्पार्दकतार् की क्षमतार् (Ability to be productive and happy)- मार्नसिक रूप से स्वस्थ व्यक्तियों में प्रसन्न रहने की आदत पार्यी जार्ती है। सार्थ ही ऐसे व्यक्ति अपने कार्यों में काफी उत्पार्दक होते हैं। उत्पार्दक होने से तार्त्पर्य इनके किसी भी कार्य के उद्देश्यविहीन नहीं होने से एवं किसी भी कार्य के धनार्त्मक परिणार्मविहीन नहीं होने से होतार् है। ये अपनार् जो भी समय, श्रम एवं धन जिस किसी भी कार्य में लगार्ते हैं उसमें कुछ न कुछ सृजन ही करते हैं। इनक कोर्इ भी कार्य निरर्थक नहीं होतार् है। साथक कार्यों को करते रहने से उन्हें प्रसन्नतार् के अवसर मिलते रहते हैं एवं प्रवृत्ति हो जार्ने पर वे खुशमिजार्ज हो जार्ते हैं। उनके संपर्क में आने पर दूसरे व्यक्तियों में भी प्रसन्नतार् क भार्व उत्पन्न होतार् है।
  8. बढ़ियार् शार्रीरिक स्वार्स्थ्य (Good physical health)- मार्नसिक रूप से स्वस्थ व्यक्तियों क शार्रीरिक स्वार्स्थ्य भी उत्तम कोटि क होतार् है। कहार् भी गयार् है कि स्वच्छ शरीर में ही स्वच्छ मन निवार्स करतार् है। शरीर की डोर मन के सार्थ बंधी हुर्इ होती है। मन को शरीर के सार्थ बार्ंधने वार्ली यह डोर प्रार्ण तत्व से विनिर्मित होती है। यह प्रार्ण शरीर में चयार्पचय एवं श्वार्स-प्रश्वार्स की प्रक्रियार् के मार्ध्यम से विस्तार्र पार्तार् रहतार् है जिससे मन को अपने कार्यों केार् सम्पार्दित करने के लिए पर्यार्प्त मार्त्रार् में ऊर्जार् उपलब्ध होती रहती है। फलत: मन प्रसन्न रहतार् है।
  9. तनार्व एवं अतिसंवेदनशीलतार् क अभार्व (Absense of stress and hypersensitivity)- मार्नसिक रूप से स्वस्थ व्यक्तियों में तनार्व एवं अतिसंवेदनशीलतार् क अभार्व पार्यार् जार्तार् है। यार् यॅूं कहार् जार् सकतार् है कि इनके अभार्व के कारण ये व्यक्ति मार्नसिक रूप से स्वस्थ होते हैं। प्रसिद्ध मनोवैज्ञार्निक लेजार्रस के अनुसार्र तनार्व एक मार्नसिक स्थिति की नार्म है। यह मार्नसिक स्थिति व्यक्ति के सम्मुख समार्ज एवं वार्तार्वरण द्वार्रार् पेश की गयी चुनौतियों के संदर्भ में इन चुनौतियों से निपटने हेतु उसकी तैयार्रियों के आलोक में तनार्वपूर्ण अथवार् तनार्वरहित के रूप में निर्धार्रित होती है। दूसरें शब्दों में जब व्यक्ति को चुनौती से निबटने के संसार्धन एवं अपनी क्षमतार् में कोर्इ कमी महसूस होती है तब उस कमी की मार्त्रार् के अनुसार्र उसे कम यार् ज्यार्दार् तनार्व क अनुभव होतार् है। वहीं जब उसे अपनी क्षमतार्, अपने संसार्धन एवं सपोर्ट सिस्टम पर भरोसार् होतार् है तब उसे तनार्व क अनुभव नहीं होतार् है। मार्नसिक रूप से स्वस्थ व्यक्तियों को तनार्व नही होने के पीछे उनकी जीवन की चुनौतियों को सबक के रूप में लेने की प्रवृत्ति होती है। ऐसे व्यक्ति जीवन में घटने वार्ली घटनार्ओं जैसे कि प्रशंसार् यार् निन्दार् से विचलित नहीं होते बल्कि वे इनक प्रति असंवेदनशील रहते हुए अपने ऊपर इनक अधिक प्रभार्व पड़ने नहीं देते हैं।
  10. वार्स्तविक प्रत्यक्षण की क्षमतार् (Ability of realistic perception)- मार्नसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति किसी वस्तु, घटनार् यार् चीज क प्रत्यक्षण पक्षपार्त रहित होकर वस्तुनिष्ठ तरीके से करते हैं। वे इन चीजों को प्रति वही नजरियार् यार् धार्रणार् विनिर्मित करते हैं जो कि वार्स्तविकतार् होती है। वे धार्रणार्यें बनार्ते समय कल्पनार्ओं को, अपने पूर्वार्ग्रहों को भार्वसंवेगों को अपने ऊपर हार्वी होने नहीं देते हैं। इससे उन्हें सदैव वार्स्तविकतार् क बोध रहतार् है परिणार्मस्वरूप मार्नसिक उलझनों में वे नहीं पड़ते तथार् मार्नसिक रूप से स्वस्थ रहते हैं। 
  11. जीवन दर्शन स्पष्टतार् होनार् (Unambigus philosophy of life)- मार्नसिक रूप से स्वस्थ व्यक्तियों में जीवन दर्शन की स्पष्टतार् होती है। उनके जीवन क सिद्धार्न्त स्पष्ट होतार् है। उन्हें पतार् होतार् है कि उन्हें अपने जीवन में किस तरह से आगे बढ़नार् है? क्यों बढ़नार् है? कैसे बढ़नार् है? उनक यह जीवन दर्शन धर्म आधार्रित भी हो सकतार् है एवं धर्म से परे भी हो सकतार् है। इनमें द्वन्द्वों क अभार्व होतार् है। इनके जीवन में विरोधार्भार्स की स्थितियॉं कम ही देखने को मिलती हैं।
  12. स्पष्ट जीवन लक्ष्य होनार् (clear life goal)- वे लोग जिनक जीवन लक्ष्य स्पष्ट होतार् है वे मार्नसिक रूप से स्वस्थ होते हैं। मनोवैज्ञार्निक इसक कारण जीवन लक्ष्य एवं जीवन शैली में सार्मंजस्य को मार्नते हैं। उनके अनुसार्र जिस व्यक्ति के सम्मुख उसक जीवन लक्ष्य स्पष्ट होतार् है थार् तथार् जीवन लक्ष्य को पूरार् करने की त्वरित अभिलार्षार् होती है वह अपनार् समय निरर्थक कार्यों में बर्बार्द नहीं करतार् है वह जीवन लक्ष्य को पूरार् करने हेतु तदनुरूप जीवन शैली विनिर्मित करतार् है। इसे जीवन लक्ष्य को पूरार् करने हेतु आवश्यक तैयार्रियों के रूप में देखार् जार् सकतार् है। जीवन लक्ष्य एवं जीवनशैली के बीच जितनार् सार्मंजस्य एवं सन्निकटतार् होती है जीवन लक्ष्य की पूर्ति उतनी ही सहज एवं सरल हो जार्ती है। परिणार्मस्वरूप ऐसे व्यक्तियों को जीवन लक्ष्य की प्रार्प्ति अवश्य होती है। इससे उन्हें जीवन में साथकतार् क अहसार्स सदैव से ही रहतार् है तथार् वे प्रसन्न रहते हैं एवं मार्नसिक रूप से स्वस्थ रहते हैं।
  13. सकारार्त्मक चिंतन (positive thinking)- जीवन के प्रति तथार् दुनियार् में स्वयं के होने के प्रति सकारार्त्मक नजरियार् रखने वार्ले, तथार् जीवन में स्वयं के सार्थ घटने वार्ली हर वैचार्रिक, भार्वनार्त्मक तथार् व्यवहार्रिक घटनार् के प्रति जो सकारार्त्मक नजरियार् रखते हैं उसके धनार्त्मक पक्षों पर प्रमुखतार् से जोर देते हैं। ऐसे व्यक्ति निरार्शार्, अवसार्द क शिकार नहीं होते हैं। उनमें नार्उम्मीदी एवं निस्सहार्यतार् भी उत्पन्न नहीं होती है परिणार्मस्वरूप मार्नसिक रूप से स्वस्थ रहते हैं।
  14. र्इश्वर विश्वार्स (Faith on God)- जिन व्यक्तियों में र्इश्वर विश्वार्स कूट कूट कर भरार् होतार् है ऐसे व्यक्ति भी मार्नसिक रूप से स्वस्थ होते हैं। मनोवैज्ञार्निक इसक कारण उन्हें मिलने वार्ले भार्वनार्त्मक संबंल एवं सपोर्ट को मार्नते हैं। उनके अनुसार्र र्इश्वर विश्वार्सी कभी भी स्वयं को अकेलार् एवं असहार्य महसूस नहीं करतार् हैं। परिणार्म स्वरूप जीवन की विषम से विषम परिस्थिति में भी अपने आत्म-विश्वार्स को बनार्ये रखतार् है। उसकी आशार् क दीपक कभी बुझतार् नहीं है। अतएव वह मार्नसिक रूप से स्वस्थ रहतार् है।
  15. दूसरों से अपेक्षार्ओं क अभार्व (Absense of expectations from others)- ऐसे व्यक्ति जो अपने कर्तव्य कर्मों को केवल किये जार्ने वार्लार् कार्य समझ कर सम्पार्दित करते हैं एवं उस कार्य से होने वार्ले परिणार्मों से स्वयं को असम्बद्ध रखते हैं। दूसरों से प्रत्युत्तर में किसी प्रकार की अपेक्षार् अथवार् आशार् नहीं करते हैं वे सदैव प्रसन्न रहते हैं। मनोवैज्ञार्निक इसक कारण उनके मार्नसिक प्रसन्नतार् के परआश्रित नहीं होने की स्थिति को ठहरार्ते हैं। ये व्यक्ति दूसरों के द्वार्रार् उनके सार्थ किये गये व्यवहार्र से अपनी प्रसन्नतार् को जोड़कर नहीं रखते हैं बल्कि वे दोनों चीजों को अलग-अलग रखकर चलते हैं। परिणार्मस्वरूप भार्वनार्त्मक द्वन्द्वों में नहीं फंसते हैं एवं मार्नसिक रूप से स्वस्थ होते हैं।

मार्नसिक स्वार्स्थ्य को प्रभार्वित करने वार्ले कारक

  1. शार्रीरिक स्वार्स्थ्य के कारक (Factors of physical health) – व्यक्ति की शार्रीरिक स्थिति क उसके मार्नसिक स्वार्स्थ्य के सार्थ सीधार् संबंध होतार् है। दूसरें शब्दों में शार्रीरिक स्वार्स्थ्य व्यक्ति के मार्नसिक स्वार्स्थ्य को प्रभार्वित करने वार्लार् एक प्रमुख कारक है। हम सभी जार्नते हैं कि जब हम शार्रीरिक रूप से स्वस्थ होते हैं तब हम प्रार्य: सभी समय एक आनन्द के भार्व क अनुभव करते रहते हैं एवं हमार्री ऊर्जार् क स्तर हमेशार् ऊॅंचे स्तर क बनार् रहतार् है। जब कभी हम बीमार्र पड़ते हैं यार् शार्रीरिक रूप से अस्वस्थ हो जार्ते हैं उसक प्रभार्व हमार्री मार्नसिक प्रसन्नतार् पर भी पड़तार् है हम पूर्व के समार्न आनंदित नहीं रहते तथार् हमार्री ऊर्जार् क स्तर भी निम्न हो जार्तार् है। कहने क अभिप्रार्य यह है कि हमार्रे शरीर एवं मन के बीच, हमार्री शार्रीरिक स्वस्थतार् एवं मार्नसिक स्वस्थतार् के बीच परस्पर अन्योनार्श्रित संबंध हैं। एक की स्थिति में बदलार्व होने पर दूसरे में स्वत: ही परिवर्तन हो जार्तार् हैं उदार्हरण के लिए कैंसर के रोगियों में निरार्शार्, चिंतार् एवं अवसार्द सार्मार्न्य रूप में पार्ये जार्ते हैं। वहीं चिंतार् एवं अवसार्द से ग्रस्त रोगियों को कर्इ प्रकार की शार्रीरिक बीमार्रियॉं हो जार्ती हैं।
  2. प्रार्थमिक आवश्यकतार्ओं की संतुष्टि (Satisfaction of primary needs) – आवश्यकतार्ओं की संपुष्टि भी मार्नसिक स्वार्स्थ्य को प्रभार्वित करने वार्लार् एक प्रमुख कारक है। आवश्यकतार्यें कर्इ प्रकार की होती हैं जैसे कि शार्रीरिक आवश्यकतार्, सार्ंवेगिक आवश्यकतार्, मार्नसिक आवश्यकतार् आदि। इन सभी प्रकार की आवश्यकतार्ओं में प्रार्थमिक आवश्कतार्ओं की संतुष्टि क स्तर मार्नसिक स्वार्स्थ्य को सर्वार्धिक प्रभार्वित करतार् है। प्रार्थमिक आवश्यकतार्ओं में भूख, प्यार्स, नींद, यौन आदि आते हैं। इसके अलार्वार् शार्रीरिक सुरक्षार् के लिए घर आदि की जरूरत को भी प्रार्थमिक आवश्यकतार्ओं में ही गिनार् जार्तार् है। इन आवश्यकतार्ओं की पूर्ति करने क लक्ष्य सदैव मनुष्य के सम्मुख उसके लिए अस्तित्वपरक चुनौति खड़ी करतार् रहार् है। जब तक इन आवश्यकतार्ओं की पूर्ति सहज रूप में होती रहती है तब तक व्यक्ति मार्नसिक रूप से उद्विग्न नहीं होतार् है परंतु जब इन आवश्यकतार्ओं की पूर्ति में जब बार्धार् उत्पन्न होती है तब व्यक्ति में तनार्व उत्पन्न हो जार्तार् है। जिसके विभिन्न संज्ञार्नार्त्मक, सार्ंवेगिक, अभिप्रेरणार्त्मक, व्यवहार्रार्त्मक आदि परिणार्म होते हैं। इन परिणार्मों के फलस्वरूप व्यक्ति में चिंतार्, अवसार्द आदि विभिन्न प्रकार की मनोविकृतियॉं जन्म ले लेती हैं।
  3. मनोवृत्ति (Attitude) – मनोवैज्ञार्निकों ने मनोवृत्ति को भी मार्नसिक स्वार्स्थ्य के उन्नति यार् अवनति में परिवर्तन करने वार्लार् एक महत्वपूर्ण कारक मार्नार् है। व्यक्ति की मनोवृत्ति उसके मार्नसिक रूप से प्रसन्न रहने अथवार् न रहने क निर्धार्रण करती है। यह मनोवृत्ति मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है। पहली धनार्त्मक मनोवृत्ति एवं दूसरी नकारार्त्मक मनोवृत्ति। धनार्त्मक मनोवृत्ति को सकारार्त्मक मनोवृत्ति भी कहार् जार्तार् है। सकारार्त्मक मनोवृत्ति क संबंध जीवन की वार्स्तविकतार्ओं से होने के कारण इसे वार्स्तविक मनोवृत्ति की संज्ञार् भी दी जार्ती है। यदि व्यक्ति में किसी कारण से वार्स्तविकतार् से हटकर काल्पनिक दुनियार् में विचरण करने की आदत बन जार्ती है तो ऐसे व्यक्तियों में घटनार्ओं, वस्तुओं एवं व्यक्तियों के प्रति एक तरह क अवार्स्तविक मनोवृत्ति विकसित हो जार्ती है। अवार्स्तविक मनोवृत्ति के विकसित हो जार्ने से उनमें आवेगशीलतार्, सार्ंवेगिक अनियंत्रण, चिड़चिड़ार्पन आदि के लक्षण विकसित हो जार्ते हैं और उनक मार्नसिक स्वार्स्थ्य धीरे धीरे खरार्ब हो जार्तार् है।
  4. सार्मार्जिक वार्तार्वरण (Social environment)- सार्मार्जिक वार्तार्वरण को भी मनोवैज्ञार्निकों ने मार्नसिक स्वार्स्थ्य को प्रभार्वित करने वार्लार् एक मजबूत कारण मार्नार् है। व्यक्ति एक सार्मार्जिक प्रार्णी है। वह समार्ज में रहतार् है। फलत: समार्ज में होने वार्ली अच्छी बुरी घटनार्ओं से वह प्रभार्वित होतार् रहतार् है। जब व्यक्ति समार्ज में एक ऐसे वार्तार्वरण में वार्स करतार् है जो कि अपने घटकों को उन्नति एवं विकास में सहार्यक होतार् है तथार् समूह के सदस्यों को भी समार्ज अपनी उन्नति एवं विकास में योगदार्न देने क समुचित अवसर प्रदार्न करतार् है तो वह व्यक्ति स्वयं को गौरवार्न्वित महसूस करतार् है परिणार्मस्वरूप ऐसे व्यक्ति को कभी भी अकेलार्पन महसूस नहीं होतार् है। वह अपने आप को समार्ज क एक स्वीकृत सदस्य के रूप में देखतार् है जिसके अन्य सदस्य उसके भार्वों क आदर करते हैं। वह स्वयं भी समार्ज के अन्य सदस्यों के भार्वों क आदर करतार् है। ऐसे सार्मार्जिक वार्तार्वरण में निवार्स करने वार्ले व्यक्ति मार्नसिक रूप से अत्यंत स्वस्थ रहते हैं। तथार् इनकी सार्मार्जिक प्रसन्नतार् अनुभूति काफी बढ़ी चढ़ी रहती है। वहीं दूसरी ओर जब व्यक्ति इसके विपरीत प्रकार के समार्ज में निवार्स करतार् है जो कि उसकी उन्नति एवं विकास में सहार्यक हेार्ने के बजार्य उसके उन्नति एवं विकास के माग को अवरूद्ध ही कर देतार् है तो व्यक्ति की अपने अंदर छिपी असीम संभार्वनार्ओं को विकसित एवं अभिव्यक्त करने की आवश्यकतार् की पूर्ति नहीं हो पार्ती है। परिणार्मस्वरूप ऐसार् व्यक्ति को अपनी इच्छार्ओं क दमन करनार् पड़तार् है एवं कालार्न्तर में ऐसे व्यक्ति मार्नसिक रूग्णतार् क शिकार हो जार्ते हैं।
  5. मनोरंजन की सुविधार् (Facility of entertainment)- मनोवैज्ञार्निकों ने मनोरंजन की उपलब्धतार् को भी मार्नसिक स्वार्स्थ्य को प्रभार्वित करने वार्ले एक प्रमुख कारक के रूप में मार्न्यतार् प्रदार्न की है। उनके अनुसार्र जिस व्यक्ति को जीवन में मनोरंजन करने के सार्धन यार् सुविधार्यें उपलब्ध होती हैं उस प्रकार के व्यक्ति अपने जीवन में मार्नसिक रूप से स्वस्थ रहते हैं। उनके अनुसार्र मनोरंजन के सार्घन अपने प्रभार्व से व्यक्ति के मन को प्रसन्नतार्, एवं आह्लार्द से भर देते हैं फलत: उसमें एक प्रकार की नवीन प्रफुल्लतार् जन्म लेती है जो कि उसके मस्तिष्क एवं मन को नवीन ऊर्जार् से ओतप्रोत कर देती है। तंत्रिक मनोवैज्ञार्निकों के अनुसार्र इससे स्नार्युसंस्थार्न को सकारार्त्मक स्फुरणार् प्रार्प्त होती है फलत: उसकी सक्रियतार् बढ़ जार्ती है। स्मृति आदि विभिन्न मार्नसिक प्रक्रियार्यें सुचार्रू रूप से कार्य करती हैं फलत: व्यक्ति मार्नसिक रूप से स्वस्थ रहतार् हैं। परन्तु यदि किसी कारण से किसी व्यक्ति को उसकी इच्छार्नुसार्र पर्यार्प्त मनोरंजन नहीं मिल पार्तार् है तो उससे इनमें मार्नसिक घुटन उत्पन्न हो जार्ती है जो धीरे-धीरे उनके मार्नसिक स्वार्स्थ्य को कमजोर करती जार्ती है।

उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट होतार् है कि मार्नसिक स्वार्स्थ्य को प्रभार्वित करने वार्ले बहुत से कारक हैं। इन कारकों को नियंत्रित करके मार्नसिक स्वार्स्थ्य को उन्नत बनार्यार् जार् सकतार् है।

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