मार्नव विकास की अवधार्रणार्, उद्देश्य एवं महत्व

किसी देश के सार्मार्जिक, आर्थिक तथार् सार्ंस्कृतिक उत्थार्न में, उस देश में उपलब्ध मार्नव संसार्धन अथवार् आर्थिक रूप से क्रियार्शील जनसंख्यार् की महत्वपूर्ण भूमिक होती है। मार्नव शक्ति क आकार तथार् उसक गुणार्त्मक स्वरूप देश के विकास की दिशार्, एवं विकास के पथ को निर्धार्रित करती है। मार्नव ही उत्पार्दन क सार्धन बन कर आर्थिक विकास को गति प्रदार्न करतार् है। 1990 में सर्वप्रथम प्रकाशित मार्नव विकास प्रतिवेदन ने मार्नव विकास को, लोगों के सार्मने, विकल्प के विस्तार्र की प्रक्रियार् के रूप में परिभार्षित कियार् है। इनमें सव िधक महत्वपूर्ण है विस्तृत और स्वस्थ जीवन, शिक्षार् प्रार्प्ति और अच्छार् जीवन स्तर को पार्नार्। अन्य विकल्प हैं, रार्जनीतिक स्वतंत्रतार्, मार्नवार्धिकारों क आश्वार्सन और आत्म-सम्मार्न के विविध तत्व। ये सभी जरूरी विकल्प हैं जिनके अभार्व में दूसरों अवसरों में बार्धार् पड़ती है। अत: मार्नव विकास, लोगों के विकल्पों में विस्तार्र के सार्थ-सार्थ प्रार्प्त होने वार्ले कल्यार्ण के स्तर को ऊँचार् करने की प्रक्रियार् है। पॉल स्ट्रीटन ने ठीक ही लिखार् है कि मार्नव विकास की संकल्पनार्, मार्नव को कर्इ दशकों के अतंरार्ल के बार्द पुन: केन्द्रीय मंच पर प्रस्थार्पित करती है। इन बीते दशकों में तकनीकी संकल्पनार्ओं की भूल-भुलैयार् में यह बुनियार्दी दृष्टि अस्पष्ट बनी है।

प्रसिद्ध अर्थशार्स्त्री महबूब उल हक, जिनके निर्देशन में सर्वप्रथम मार्नव विकास सूचकांक क निर्मार्ण कियार् गयार् थार्, के अनुसार्र, ‘‘मार्नव विकास में सभी मार्नवीय विकल्पों क विस्तार्र आ जार्तार् है। ये विकल्प चार्हे आर्थिक, सार्मार्जिक, सार्ंस्कृतिक अथवार् रार्जनीतिक हों।’’ यह कभी-कभी कहार् जार्तार् है कि आय में वृद्धि से अन्य सभी विकल्पों क विस्तार्र होतार् है, किन्तु यह सत्य नहीं है। मार्नव के सार्मने अनेक विकल्प हैं, जो आर्थिक कल्यार्ण से कहीं आगे जार्ते हैं। ज्ञार्न, स्वार्स्थ्य, स्वच्छ भौतिक पर्यार्वरण, रार्जनीतिक स्वतंत्रतार् और जीवन के सरल आनन्द आय पर निर्भर नहीं है।

अत: संकुचित अर्थों में मार्नव विकास क अर्थ है, मार्नव की शिक्षार् तथार् प्रशिक्षण पर व्यय करनार् जबकि विस्तृत अर्थ में, स्वार्स्थ्य, शिक्षार् तथार् समस्त सेवार्ओं पर किये जार्ने वार्ले व्यय से लगार्यार् जार्तार् है।

मार्नव विकास उद्देश्य 

  1. सार्मार्जिक नीति, कार्यक्रम व सेवार्ओं को बेहतर बनार्ने के लिए एक एकीकृत उपार्गम को अपनार्नार् व क्रियार्न्वित करनार्, 
  2. मार्नव विकास व सार्मार्जिक विकास में उन्नति के लिए रार्ष्ट्रीय स्तर की क्षमतार्ओं क निर्मार्ण करनार्, 
  3. मार्नव विकास से सम्बन्धित विभिन्न प्रकार के नेटवर्क व सार्झेदार्रियों को विकसित करनार् व सशक्त बनार्नार्, 
  4. सार्मार्जिक व मार्नव विकास से संबंधित कार्यक्रमों व सेवार्ओं को बेहतर बनार्नार् व उनमें सार्मन्जस्य स्थार्पित करनार्,
  5. बेहतर मार्नव-विकास के लिए ज्ञार्न व उपार्गमों को सुदृढ़ बनार्नार्, 
  6. प्रार्थमिक, मार्ध्यमिक व उच्च स्तर पर शिक्षार् की उपयुक्त व्यवस्थार् करनार्, 
  7. प्रौढ़ शिक्षार् को बढ़ार्वार् देनार् तथार् उसकी समुचित व्यवस्थार् करनार्, 
  8. कार्य-प्रशिक्षण को बढ़ार्वार् देनार्, तथार् 
  9. ऐसी स्वार्स्थ्य सुविधार्ओं की व्यवस्थार् करनार् जो लोगों की जीवन-प्रत्यार्शार्, शक्ति, उत्सार्ह तथार् कार्यक्षमतार् में वृद्धि कर सकें। 

मार्नव विकास क महत्व 

किसी देश क आर्थिक विकास उस देश में उपलब्ध मार्नव पूँजी के स्टॉक तथार् संचय की दर पर निर्भर करतार् है। विकासशील देशों में नियोजित आर्थिक विकास की प्रक्रियार् में मार्नव के विकास पर समुचित ध्यार्न नहीं दियार् जार्तार्। यही कारण है कि इन देशों में विकास के वार्ंछित लक्ष्य नहीं प्रार्प्त हो पार्ते है तथार् वहार्ँ विकास की दर निम्न रहती है। आज अधिकांश विकासवार्दी अर्थशार्स्त्री इस बार्त के पक्षधर है कि मार्नव-पूँजी में अधिक से अधिक विनियोग कियार् जार्नार् चार्हिए तार्कि आर्थिक विकास के सर्वार्धिक महत्वपूर्ण घटक मार्नव संसार्धन क समुचित विकास कियार् जार् सके।

किसी भी देश की जनसंख्यार् क जितनार् अधिक हिस्सार् शिक्षित, कुशल एवं प्रशिक्षित, होकर रोजगार्र में लगार् हुआ है, वह देश उतनार् ही तेजी से विकास करेगार्। आर्थिक विकास की दृष्टि से भौतिक पूँजी की अपेक्षार् मार्नव पूँजी को कहीं अधिक महत्वपूर्ण समझार् जार्तार् है क्योंकि मार्नवीय सार्धनों की कुशलतार् एवं दक्षतार् पर ही आर्थिक विकास क ढार्ंचार् खड़ार् कियार् जार् सकतार् है। प्रसिद्ध अर्थशार्स्त्री माशल क भी विचार्र थार् कि ‘‘सबसे मूल्यवार्न पूँजी वह है जो मार्नव-मार्त्र में विनियोजित की जार्ये।’’

पॉल स्ट्रीटन के अनुसार्र-

  1. मार्नव विकास ऊँची उत्पार्दकतार् क सार्धन है। भली प्रकार से पोषित, स्वस्थ, शिक्षित, कुशल और सतर्क श्रम शक्ति सर्वार्धिक महत्वपूर्ण उत्पार्दक परिसंपत्ति है। अत: पोषण, स्वार्स्थ्य सेवार्, शिक्षार् में निवेश उत्पार्दकतार् के आधार्र पर उचित है। 
  2. यह मार्नव पुनरूत्पार्दन को धीमार् करके परिवार्र के आकार को छोटार् करने में सहार्यतार् पहुँचार्तार् है। यह सभी विकसित देशों क अनुभव है कि शिक्षार् के स्तर में सुधार्र, अच्छी स्वार्स्थ्य सुविधार्ओं की उपलब्धतार् और बार्ल मृत्यु दर में कमी से जन्म दर में गिरार्वट आती है। शिक्षार् में सुधार्र से लोगों में छोटे परिवार्र के प्रति चेतनार् पैदार् होती है और स्वार्स्थ्य में सुधार्र व बार्ल मृत्यु दर में कमी से लोग ज्यार्दार् बच्चों की जरूरत महसूस नहीं करते।
  3. भौतिक पर्यार्वरण की दृष्टि से भी मार्नव विकास अच्छार् है। गरीबी में वनों के विनार्श, रेगिस्तार्न के विस्तार्र और क्षरण में कमी आती है। 
  4. गरीबी में कमी से एक स्वस्थ समार्ज के गठन, लोकतंत्र के निर्मार्ण और सार्मार्जिक स्थिरतार् में सहार्यतार् मिलती है। 
  5. मार्नव विकास से सार्मार्जिक उपद्रवों को कम करने में सहार्यतार् मिलती है और इससे रार्जनीतिक स्थिरतार् बढ़ती हैं।

मार्नव विकास के सूचक 

मार्नव विकास एक वृहद् अवधार्रणार् है जिसके अन्तर्गत विभिन्न सार्मार्जिक-आर्थिक व रार्जनीतिक तत्व आते हैं। किन्तु UNDP ने मार्नव विकास के मुख्यत: तीन सूचक बतार्यें हैं –

  1. जीवन प्रत्यार्शार् अर्थार्त् एक विस्तृत और स्वस्थ जीवन। जिस देश के नार्गरिकों की औसत आयु जितनी अधिक होगी वह देश उतनार् ही अधिक विकसित समझार् जार्येगार्। 
  2. ज्ञार्न अर्थार्त् एक देश में विभिन्न शिक्षण संस्थार्नों में नार्मार्ंकन करार्ने वार्ले लोगों की संख्यार्। किसी देश में बार्लिग सार्क्षरतार् दर और समग्र प्रार्थमिक, मार्ध्यमिक और उच्च नार्मार्ंकन के अनुपार्त के द्वार्रार् इसको मार्पार् जार्तार् है। 
  3. आर्थिक विकास अर्थार्त् प्रति व्यक्ति आय। लोगों क आर्थिक विकास मार्नव विकास क एक अन्य सूचक है जो लोगों क अच्छार् जीवन स्तर दर्शार्तार् है। एक देश में लोगों की प्रति व्यक्ति आय जितनी अधिक होगी उस देश में मार्नव-विकास उतनार् ही अधिक होगार्।

मार्नव विकास के सिद्धार्न्त 

1. सिगमण्ड फ्रार्यड : व्यक्तित्व क मनोविश्लेषणार्त्मक सिद्धार्न्त 

फ्रार्यड ने करीब 40 सार्ल के अपने नैदार्निक अनुभवों के बार्द व्यक्तित्व के मनोविश्लेषणार्त्मक सिद्धार्न्त क प्रतिपार्दन कियार्। इस सिद्धार्न्त की व्यार्ख्यार् निम्नार्ंकित तीन मुख्य भार्गों में बार्ंट कर की जार्ती है :-

  1. व्यक्तित्व की संरचनार्।
  2. व्यक्तित्व की गतिकी।
  3. व्यक्तित्व क विकास।
  1. व्यक्तित्व की संरचनार्- फ्रार्यड ने व्यक्तित्व की संरचनार् क वर्णन करने के लिए निम्नार्ंकित दो प्रार्रूपों क निर्मार्ण कियार् है-
    1. आकारार्त्मक प्रार्रूप- मन के आकारार्त्मक पार्रूप से तार्त्पर्य पहलू से होतार् है जहार्ँ संघर्षमय परिस्थिति की गत्यार्त्मकतार् उत्पन्न होती है। फ्रार्यड ने इसे तीन स्तरों में बार्ंटार् है- चेतन, अर्द्धचेतन, तथार् अचेतन।
    2. गत्यार्त्मक यार् संरचनार्त्मक प्रार्रूप- इससे तार्त्पर्य उन सार्धनों से होतार् है जिनके द्वार्रार् मूल प्रवृत्तियों से उत्पन्न मार्नसिक संघषोंर् क समार्धार्न होतार् है। ऐसे सार्धन यार् प्रतिनिधि तीन है :-
      1. उपार्हं- यह व्यक्तित्व क जैविक तत्व है जिनमें प्रवृत्तियों की भरमार्र होती है जो जन्मजार्त होती है तथार् जो असंगठित, कामकु , आक्रार्मकतार्पूर्ण तथार् नियम आदि को मार्नने वार्ली नहीं होती है। उपार्हं की प्रवृत्तियार्ं ‘‘आनन्द सिद्धार्न्त’’ द्वार्रार् निर्धरित होती हैं। 
      2. अहं- अहं मन क वह हिस्सार् है जिसक संबंध वार्स्तविकतार् से होतार् है तथार् जो बचपन में उपार्हं की प्रवृत्तियों से ही जन्म लेतार् है। अहं वार्स्तविकतार् सिद्धार्न्त द्वार्रार् नियंत्रित होतार् है तथार् वार्तार्वरण की वार्स्तविकतार् के सार्थ इसक संबंध सीधार् होतार् है। 
      3. परार्हं- परार्हं को व्यक्तित्व की नैतिक शार्खार् में मार्नार् गयार् है जो वयक्ति को यह बतलार्तार् है कि कानै कार्य अनैि तक है यह आदर्शवार्दी सिद्धार्न्त द्वार्रार् निदेर् िशत एवं नियंत्रित होतार् है। 
  2. व्यक्तित्व की गतिकी– फ्रार्यड के अनुसार्र मार्नव जीव एक जटिल तंत्र है जिसमें शार्रीरिक ऊर्जार् तथार् मार्नसिक ऊर्जार् दोनों ही होते हैं। शार्रीरिक ऊर्जार् से व्यक्ति शार्रीरिक क्रियार्यें जैसे- दौड़नार्, सार्ँस लेनार्, लिखनार् आदि क्रियार्यें करतार् है तथार् मार्नसिक ऊर्जार् से व्यक्ति मार्नसिक कार्य जैसे-स्मरण, प्रत्यक्ष चिन्तन आदि करतार् है। फ्रार्यड के अनुसार्र इन दोनों तरह की ऊर्जार्ओं क स्पर्श बिन्दू उपार्हं होतार् है। फ्रार्यड ने इन ऊर्जार्ओं से सम्बन्धित कुछ ऐसे संप्रत्यय क विकास कियार् है जिनसे व्यक्तित्व के गत्यार्त्मक पहलुओं जैसे- मूलप्रवृत्ति, चिन्तार् तथार् मनोरचनार्ओं क वर्णन होतार् है।
  3. व्यक्तित्व क विकास- फ्रार्यड ने व्यक्तित्व के विकास की व्यार्ख्यार् दो दृष्टिकोण से की है। पहलार् दृष्टिकोण इस बार्त पर बल डार्लतार् है कि वयस्क व्यक्तित्व बार्ल्यार्वस्थार् के भिन्न-2 तरह की अनुभूतियों द्वार्रार् नियंत्रित होती है तथार् दूसरे दृष्टिकोण के अनुसार्र जन्म के समय लैंगिक ऊर्जार् बच्चों में मौजूद होती है जो विभिन्न मनोलैंगिक अवस्थार्ओं से होकर विकसित होती है। फ्रार्यड के इस दूसरे दृष्टिकोण को मनोलैंगिक विकास क सिद्धार्न्त कहार् जार्तार् है। इस सिद्धार्न्त की 5 अवस्थार्एं क्रम में निम्नार्ंकित हैं:-
    1. मुखार्वस्थार् 
    2. गुदार्वस्थार् 
    3. लिंग प्रधार्नार्वस्थार् 
    4. अव्यक्तार्वस्थार् 
    5. जननेन्द्रियार्वस्थार् 

मनोलैंगिक अवस्थार्ओं से होकर व्यक्ति की लंैि गक ऊर्जार् क धीरे-धीरे विकास होतार् जार्तार् है जिससे व्यक्ति बार्ल्यार्वस्थार् के निष्क्रियतार् को त्यार्ग कर वयस्कावस्थार् में सार्मार्जिक रूप से उपयोगी एवं सुखमय जीवन जीतार् है।

2. एडलर क वैयक्तिक मनोविज्ञार्न क सिद्धार्न्त 

एडलर क मत है कि प्रत्येक व्यक्ति मुख्य रूप से एक सार्मार्जिक न कि जैविक प्रार्णी होतार् है। व्यक्तित्व क निर्धार्रण वैयक्तिक सार्मार्जिक वार्तार्वरण तथार् उनक अन्त: क्रियार्ओं द्वार्रार् न कि जैविक आवश्यकतार्ओं द्वार्रार् निर्धार्रित होतार् है। यौन को एडलर ने व्यक्तित्व निर्धार्रिण क उतनार् महत्वपूर्ण कारक नहीं मार्नार् जितनार् कि फ्रार्यड ने मार्नार् थार्।

एडलर के सिद्धार्न्त क क एक महत्वपूर्ण पूर्वकल्पनार् यह है कि सभी मनोवैज्ञार्निक घटनार्एँ व्यक्ति के भीतर आत्म-संगत ढंग से एकीकृत होती है। इस पूर्वकल्पनार् के तहत उनके सिद्धार्न्त में व्यक्तित्व के मौलिक एकतार् पर पर्यार्प्त बल डार्लार् गयार् है। इसी तरह से विभिन्नतार्एं एवं विषमतार् एक आत्म-संगत संपूर्णतार् में संगठित हो जार्ती हैं। एडलर ने अपने सिद्धार्न्त में यह बतलार्यार् कि मन तथार् शरीर, चेतन तथार् अचेतन एवं तर्क तथार् संवेग में कोर्इ स्पष्ट अतंर करनार् संभव नहीं हैं।

एडलर क मत थार् कि व्यक्ति क व्यवहार्र व्यक्तिगत अनुभूतियों द्वार्रार् नहीं बल्कि कल्पनार् यार् भविष्य प्रत्यार्शार्ओं द्वार्रार् पे्ररित होतार् है।

एडलर के सिद्धार्न्त में जीवन शैली को एक महत्वपूर्ण भार्ग मार्नार् गयार् है। जीवन शैली में सिर्फ व्यक्ति क जीवन लक्ष्य ही नहीं बल्कि उसक आत्म-संप्रत्यय, दूसरों के प्रति भार्व तथार् पर्यार्वरण के अन्य वस्तुओं के प्रति मनोवृत्ति आदि भी सम्मिलित होतार् है। व्यक्ति की जीवन शैली, पर्यार्वरण, आनुवार्ंशिकतार्, सफलतार् के लक्ष्य, सार्मार्जिक अभिरूचि तथार् सृजनार्त्मक शक्ति आदि क प्रतिफल होतार् है। जीवन शैली को एक प्रमुख नियंत्रण बल एडलर ने मार्नार् है।

3. सुल्लीवार्न क व्यक्तित्व सिद्धार्न्त 

सुल्लीवार्न क मत थार् कि व्यक्ति जन्म से ही वार्तार्वरण के विभिन्न वस्तुओं एवं व्यक्तियों के सार्थ अन्त: क्रियार् करतार् है और उस अन्त:क्रियार् से उसके व्यवहार्र क निर्धार्रण होतार् है । व्यक्ति क विकास इन्ही अन्तर वैयक्तिक व्यवहार्र के संदर्भ में होतार् है।

इनके अनुसार्र मार्नव एक ऐसार् ऊर्जार् तंत्र है जो आवश्यकतार्ओं द्वार्रार् उत्पन्न तनार्वों को हमेशार् कम करने की कोशिश करतार् है। उन्होंने तनार्व को दो भार्गों में बार्ंटार् है। आवश्यकतार्ओं द्वार्रार् उत्पन्न तनार्व तथार् चिन्तार् द्वार्रार् उत्पन्न तनार्व जब व्यक्ति अपनी आवश्यकतार्ओं को संतुष्ट नहीं कर पार्तार् है जो उससे एक विशेष अवस्थार् उत्पन्न होती है, जिससे भार्वशून्यतार् विकसित होती है। सुल्लीवार्न ने व्यक्तित्व विकास की सार्त अवस्थार्ओं क वर्णन कियार् है।

इनक मत है कि व्यक्तित्व में परिवर्तन विकास के किसी भी अवस्थार् में हो सकतार् है, परन्तु ऐसे परिवर्तन एक अवस्थार् से दूसरी अवस्थार् के अंतरण में सर्वार्धिक होतार् है। एक बच्चार् दूसरों क किस तरह से प्रत्यक्षण करतार् है और वह दूसरों के प्रति किस तरह की प्रतिक्रियार् करतार् है, पर व्यक्तित्व क विकास निर्भर करतार् है जो व्यक्तित्व विकास के विभिन्न अवस्थार्ओं को एक सूत्र में बार्ंधतार् है। उनके द्वार्रार् बतलार्ये गए व्यक्तित्व क विकास की सार्त अवस्थार्एं निम्नार्ंकित है –

  1. शैशवार्स्थार् 
  2. बार्ल्यार्वस्थार् 
  3. तरूणार्वस्थार् 
  4. प्रार्क् किशोरार्वस्थार् 
  5. आरम्भिक किशोरार्वस्थार्
  6. उत्तर किशोरार्वस्थार् 
  7. परिपक्वतार् 

सुल्लीवार्न ने व्यक्तित्व विकास में सार्मार्जिक एवं सार्ंस्कृतिक कारकों पर बल डार्ल कर यह स्पष्ट कर दियार् कि ये कारक व्यक्तित्व के एक प्रमख्ु ार् निर्धार्रक है। सुल्लीवार्न पहले ऐसे नव-फ्र्रार्यडवार्दी है जिन्होंने व्यक्तित्व के विकास की व्यार्ख्यार् में जन्म से लेकर परिपक्वतार् तक की अवधि क एक चरणबद्ध वर्णन कियार् है ।

4. इरिक इरिक्सन :- व्यक्तित्व क मनोसार्मार्जिक सिद्धार्न्त 

इरिक्सन के सिद्धार्न्त क केन्द्रीय बिन्दु यह है कि मार्नव क विकास कर्इ पूवर् िनश्चित अवस्थार्एं जो सर्वजनीन होती है  से होकर होतार् है । जिस प्रक्रियार् द्वार्रार् वे अवस्थार्एं विकसित होती है। वह विशेष नियम द्वार्रार् नियंत्रित होती है। इस नियम को पश्चजार्त नियम कहार् जार्तार् है। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘चार्इल्डहुड एण्ड सोसार्इटी’ में इरिक्सन ने मनोसार्मार्जिक अहं विकास के आठ अवस्थार्एं बतलार्यी हैं, और पश्चजार्त् नियम के अनुसार्र विकास की प्रत्येक अवस्थार् होने क एक आदर्श समय होतार् है और प्रत्येक अवस्थार् एक क्रम में एक के बार्द एक आती है और उनमें व्यक्तित्व क विकास जैविक परिपक्वतार् तथार् सार्मार्जिक एवं ऐतिहार्सिक बलों के अन्त: क्रियार् के फलस्वरूप होतार् है । इनके सिद्धार्न्त को निम्नार्ंकित बिन्दुओं के मार्ध्यम से समझार् जार् सकतार् है-

  1. प्रत्येक मनोसार्मार्जिक अवस्थार् में एक संक्रार्न्ति होतार् है। संक्रार्न्ति से तार्त्पर्य व्यक्ति के जीवनकाल के एक ऐसार् परिवर्तन बिंदु से होतार् है जो उस अवस्थार् में जैविक परिपक्वतार् तथार् सार्मार्जिक मार्ंग दोनों के अन्त: क्रियार् के फलस्वरूप व्यक्ति में उत्पन्न होतार् है। 
  2. प्रत्येक मनोसार्मार्जिक संक्रार्न्ति में धनार्त्मक तथार् ऋणार्त्मक दोनों ही तत्व होते हैं। प्रत्येक अवस्थार् में उसके जैविक परिपक्वतार् तथार् नये-नये सार्मार्जिक मार्ंग के कारण संघर्ष क होनार् इरिक्सन अवश्यभार्वी मार्नते है। यदि इस संघर्ष को व्यक्ति संतोषजनक ढंग से समार्धार्न कर लेतार् है तो इससे उसके विकसित अहं मे ऋणार्त्मक तत्व अवशोषित हो जार्ते है और व्यक्तित्व विकास अवरूद्ध होने की संभार्वनार् कम हो जार्ती है। 
  3. मनोसार्मार्जिक विकास की प्रत्येक अवस्थार् में संक्रार्न्ति क समार्धार्न कर लेने पर व्यक्ति में एक विशेष मनोसार्मार्जिक शक्ति की उत्पत्ति होती है जिसे इरिक्सन ने ‘सदार्चार्र’ की संज्ञार् दी है। 
  4. प्रत्येक मनोसार्मार्जिक अवस्थार् क निर्मार्ण उससे पहले की अवस्थार् में हुए विकासों से संबंधित होतार् है।
  5. इरिक्सन द्वार्रार् प्रतिपार्दित व्यक्तित्व सिद्धार्न्त में मनोसार्मार्जिक विकास की आठ अवस्थार्ओं के नार्म इस प्रकार है :- 
    1. शैशवार्स्थार्: विश्वार्स बनार्म अविश्वार्स 
    2. प्रार्रंभिक बार्ल्यार्वस्थार्: स्वतंत्रतार् बनार्म लज्जार्शीलतार् 
    3. खेल अवस्थार्: पहल शक्ति बनार्म दोशितार् 
    4. स्कूल अवस्थार्: परिश्रम बनार्म हीनतार् 
    5. किशोरार्वस्थार्: अहं पहचार्न बनार्म भूमिक संभ्रार्ति 
    6. तरूण वयस्कावस्थार्: घनिष्ठ बनार्म विलगन 
    7.  मध्य वयस्कावस्थार्: जननार्त्मकतार् बनार्म स्थिरतार् 
    8. परिपक्वतार्: अहं सम्पूर्ण बनार्म निरार्शार्

5. कर्ट लेविन: व्यक्तित्व क क्षेत्र सिद्धार्न्त 

इस सिद्धार्न्त की एक सार्मार्न्य पूर्वकल्पनार् यह है कि प्रार्णी क व्यवहार्र उन सभी कारकों द्वार्रार् प्रभार्वित होतार् है जो उसके क्षेत्र यार् वार्तार्वरण में उपस्थित होते हैं। लेविन ने व्यक्ति सिद्धार्न्त को निम्नार्ंकित तीन प्रमुख भार्गों में समझार् जार् सकतार् है-

  1. व्यक्तित्व की संरचनार्
  2. व्यक्तित्व की गतिकी
  3. व्यक्तित्व क विकास

(1) व्यक्तित्व की संरचनार्- लेविन ने व्यक्तित्व की संरचनार् की व्यार्ख्यार् करने के लिए गणित के एक विशेष शार्खार् जिसे संस्थिति विज्ञार्न जार्तार् है, क सहार्रार् लियार्। इस आधार्र पर उन्होंने व्यक्तित्व की संरचनार् को निम्नार्ंकित चार्र भार्गों में बार्ंटार् :-

  1. व्यक्ति
  2. मनोवैज्ञार्निक वार्तार्वरण
  3. जीवन समष्टि
  4. वार्स्तविकतार् के स्तर

(2) व्यक्तित्व की गतिकी- लेविन ने कुछ गत्यार्मक संप्रत्ययों क प्रतिपार्दन कियार् है  जिनसे यह स्पष्ट रूप से पतार् चलतार् है कि किसी भी दी गयी परिस्थिति में व्यक्ति किस तरह क व्यवहार्र करतार् है। ऐसे गत्यार्त्मक संप्रत्ययों में निम्नार्ंकित प्रमुख है :-

  1. ऊर्जार्
  2. तनार्व
  3. आवश्यकतार्
  4. कर्षण शक्ति
  5. सदिश ।

(3) व्यक्तित्व क विकास- लेविन ने व्यक्तित्व के विकास की व्यार्ख्यार् करने के लिए निम्नार्ंकित दो तरह के प्रत्ययों को महत्वपूर्ण बतलार्यार् है :-

  1. व्यवहार्रार्त्मक परिवर्तन- लेविन के अनुसार्र जैसे-जैसे व्यक्ति क विकास होते जार्तार् है अर्थार्त् उसकी आयु में वृद्धि हो जार्ती है, उसमें तरह-तरह के व्यवहार्रिक परिवर्तन होते जार्ते हैं। शिशुओं के व्यवहार्र में पूरे शरीर में एक विसरित क्रियार् होती हैं जिसे उन्होंने सार्धार्रण अन्तर निर्भरतार् कहार् है।
  2. विभेदीकरण एवं एकीकरण- लेविन ने विभेदीकरण को परिभार्षित करते हुए कहार् है कि इससे तार्त्पर्य संपूर्ण व्यक्ति के स्वतंत्र हिस्सों यार् भार्गों में वृद्धि से होतार् है। परंतु व्यक्तित्व क विकास सिर्फ विभेदीकरण की प्रक्रियार् से अपने आप में ही अधूरार् ही रह जार्तार् है क्योंकि इससे यह स्पष्ट नहीं होतार् है कि उम्र बीतने के सार्थ व्यक्ति क व्यवहार्र क्यों अधिक संगठित एवं समन्वित होतार् चलार् जार्तार् है। इस पक्ष की व्यार्ख्यार् करने के लिए उन्होंने एकीकरण के संप्रत्यय क प्रतिपार्दन कियार्। इसके मार्ध्यम से लेविन यह व्यार्ख्यार् कर सकने में समर्थ हो पार्ये है कि व्यक्ति तथार् मनोवैज्ञार्निक पर्यार्वरण के विभिन्न क्षेत्र एक पदार्नुक्रम ढंग से संगठित होकर करतार् है। इस तरह के संगठन क स्पष्ट अभार्व हमें शिशुओं के व्यवहार्र में मिलतार् है परन्तु व्यस्कों में इस तरह क अभार्व एकीकरण की प्रक्रियार् क संपन्न हो जार्ने से नहीं मिलतार् है।

6. एब्रार्हम मैसलो : व्यक्तित्व क मार्नवतार्वार्दी सिद्धार्न्त 

मैसलो ने अपने सिद्धार्न्त में प्रार्णी के अनूठार्पन क उसके मूल्यों के महत्व पर तथार् व्यक्तिगत वर्धन तथार् आत्म-निर्देश की क्षमतार् पर सर्वार्धिक बल डार्लार् है। इस बल के कारण ही उनक मार्ननार् है कि संपूर्ण प्रार्णी क विकास उसके भीतर से संगठित ढंग से होतार् है। इन आन्तरिक कारकों की तुलनार् में वार्ºय कारणों जैसे आनुवार्ंशिकतार् तथार् गत अनुभूतियों क महत्व नगण्य होतार् है। अधिक बल दिये जार्ने के कारण उनके सिद्धार्न्त को व्यक्तित्व क सम्पूर्ण-गत्यार्त्मक सिद्धार्न्त भी कहार् गयार् है। मैसलो के सिद्धार्न्त को निम्नार्ंकित दो मुख्य भार्गों में प्रस्तुत कियार् जार् सकतार् है :-

  1. व्यक्तित्व एवं अभिप्रेरण क पदार्नुक्रमिक मॉडल- इनक विश्वार्स थार् कि अधिकांश मार्नव व्यवहार्र की व्यार्ख्यार् कोर्इ न कोर्इ व्यक्तिगत लक्ष्य पर पहंचु ने की पव्र ृत्ति से निदेर् िशत होतार् है मार्नव अभिप्रेरक जन्मजार्त होते है और उन्हें प्रार्थमिकतार् यार् शक्ति के आरोही पदार्नुक्रम सुव्यवस्थित कियार् जार् सकतार् है। ऐसे अभिपेर्र कों को पार््र थमिकतार् यार् शक्ति के आरोही क्रम में इस प्रकार बतलार्यार् गयार् है।
    1. शार्रीरिक यार् दैहिक आवश्यकतार्
    2. सुरक्षार् की आवश्यकतार्
    3. संबद्धतार् एवं आवश्यकतार् 
    4. सम्मार्न की आवश्यकतार्
    5. आत्म-सिद्धि की आवश्यकतार् 
  2. स्वस्थ व्यक्तित्व – आत्मसिद्ध व्यक्ति क विकास मैसलो के सिद्धार्न्त की एक प्रमुख विशेषतार् यह है कि यह सिद्धार्न्त मार्नसिक रूप् से स्वस्थ व्यक्तियों के अध्ययन पर आधार्रित है। मैसलो ने इन व्यक्तियों की पहचार्न करने के लिए कुछ विशेषतार्ओं क वर्णन भी कियार् है। मैसलो ने अपने व्यक्तित्व सिद्धार्न्त में यह भी बतलार्यार् है कि व्यक्ति में आत्म-सिद्ध को किस तरह से प्रोत्सार्हित कियार् जार् सकतार् है। इन्होंने आत्म सिद्ध को बढ़ार्ने यार् प्रोत्सार्हित करने के लिए स्कूल को सबसे उत्तम स्थार्न बतलार्यार् है और कहार् है कि छार्त्रों को अपनी स्वतंत्र पहचार्न बनार्ने में रूचियुक्त व्यवसार्य की खोज करने तथार् उत्तम मूल्यों क समझने के लिए किये गए प्रयार्सों से आत्म-सिद्ध क विकास होतार् है।

7. बी.एफ. स्कीन्नर व्यक्तित्व क व्यवहार्रार्त्मक सीख क सिद्धार्न्त 

स्कीन्नर के लिए मार्नव व्यक्तित्व, उद्दीपकों के प्रति सीखे गए अनुक्रियार्ओं क एक संग्रहण एवं स्पष्ट व्यवहार्रों यार् आदत तंत्रों क एक समुच्चय है। इसलिए व्यक्तित्व से स्कीन्नर क तार्त्पर्य सिर्फ उन व्यवहार्रों से होतार् है, जिसे वस्तुनिष्ठ रूप से पेक्ष््र ार्ण कियार् जार्ए यार् जिसमें आसार्नी से हेर-फेर कियार् जार् सके।

स्कीन्नर क सिद्धार्न्त कुछ सिद्धार्न्तों जैसे मनोविश्लेषणार्त्मक सिद्धार्न्त, संज्ञार्नार्त्मक सिद्धार्न्त तथार् मार्नवतार्वार्दी सिद्धार्न्त क विरोधी है। स्कीन्नर ने व्यक्तित्व की व्यार्ख्यार् करने में आतंरिक प्रक्रियार्ओं जैसे-प्रणोद, अभिपेर्र कों तथार् अचेतन आदि के महत्व को अस्वीकार कर दियार्, क्योंकि इनक पेक्ष््र ार्ण नहीं कियार् जार् सकतार् है।

स्कीन्नर ने मार्नव जीव को एक रिक्त जीव कहार् है। रिक्त जीव कहने क उद्देश्य मार्नव व्यवहार्र की उत्पत्ति में आतंरिक प्रक्रियार्ओं की भूमिकाओं पर कटार्क्ष करनार् तथार् इस बार्त पर बल डार्लनार् थार् कि मार्नव जीव के भीतर कुछ भी ऐसार् नहीं होतार् है जो वैज्ञार्निक ढंग से व्यक्ति के व्यवहार्रों की व्यार्ख्यार् कर सके। इनके सिद्धार्न्त की एक विशेषतार् यह भी है कि इन्होंने अपनार् अध्ययन सार्मार्न्य, असार्मार्न्य यार् असार्धार्रण व्यक्तियों पर न करके पशुओं पर विशेषकर चूहों एवं कबूतरों पर कियार् और कहार् कि चूंकि उनके सिद्धार्न्त क संबंध सभी तरह के व्यवहार्रों से है अत: इन पशुओं के व्यवहार्र क अध्ययन करके मार्नव के व्यवहार्रों को भी आसार्नी से समझार् जार् सकतार् है। स्कीन्नर के व्यक्तित्व सिद्धार्न्त मार्नव प्रकृति के कुछ खार्स पहलुओं जैसे-निर्धायतार्, अधिभूतवार्द, पर्यार्वरणीयतार्, परिवर्तनशीलतार् वस्तुनिष्ठतार् प्रतिक्रियार्शीलतार् तथार् ज्ञेयतार् पर अधिक बल डार्लतार् है तथार् अन्य पहलुओं जैसे विवेकपूर्ण तथार् समस्थिति विषमस्थिति को पूर्णरूपेण अस्वीकृत कियार् है क्योंकि स्कीन्नर ने मार्नव व्यवहार्र के आतंरिक स्रोतों पर बल नहीं दियार् है ।

इनके अनुसार्र व्यक्तित्व क अध्ययन व्यक्ति के जननिक प्रष्ठभूमि तथार् विशिष्ट शिक्षण इतिहार्स क क्रमबद्ध एवं परिशुद्ध मूल्यार्ंकन के आधार्र पर संभव है।

8. अल्बर्ट बार्ण्डुरार्- सार्मार्जिक संज्ञार्नार्त्मक क सिद्धार्न्त 

स्टैण्डफोर्ट के प्रसिद्ध मनोवैज्ञार्निक अल्बर्ट बार्ण्डुरार् अपने सार्मार्जिक संज्ञार्नार्त्मक सिद्धार्न्त जिस औपचार्रिक रूप से सार्मार्जिक सीख क सिद्धार्न्त कहार् जार्तार् है, में दार्वार् करते हैं कि मार्नव एक ज्ञार्नार्त्मक जीव है जिसकी सक्रिय सूचनार्त्मक प्रक्रियार् उसके सीखने, व्यवहार्र तथार् विकास में महत्वपूर्ण भूमिक निभार्ती है। बार्ण्डरु ार् कहते है कि मनुष्य के सीखार्ने की प्रक्रियार् चूहे के सीखने की प्रक्रियार् से बहुत भिन्न होती है। क्योंकि मनुष्य में चूहें की तुलनार् में कही अधिक ज्ञार्नार्त्मक क्षमतार्एं होती है। सार्मार्जिक संज्ञार्नार्त्मक सिद्धार्न्त एक सीख संबंधी सिद्धार्न्त है जो इस धार्रणार् पर आधार्रित है कि मनुष्य दूसरों को देखकर सीखतार् है तथार् मनुष्य की वैचार्रिक प्रक्रियार् व्यक्तित्व की समझ पर केन्द्रित है। यह सिद्धार्न्त व्यक्ति की नैतिक क्षमतार् वे नैतिक प्रदर्शन के मध्य अंतर पर जोर देतार् है।

‘मनुष्य दूसरों को देखकर सीखतार् है’ इस बार्त को अच्छी तरह समझार्ने के लिए बार्ण्डुरार् ने एक प्रयोग कियार् जिसे ‘बोबो गुड़ियार् क व्यवहार्र: आक्रार्मकतार् क एक अध्ययन कहार् जार्तार् है। इस प्रयोगों में बार्ण्डुरार् ने बच्चों के समूह को एक वीडियों दिखार्यार् जिसमें उग्र व हिंसक क्रियार्एं थी इस प्रयोग के मार्ध्यम से बार्ण्डुरार् ने निष्कर्ष निकालार् कि जिन बच्चों ने वह हिंसक वीडियों देखार् थार् उन्हें गुडियार्यें अधिक आक्रार्मक व हिसंक प्रतीत होती थीं बजार्य उन बच्चों के जिन्होंने वह वीडियों नहीं देखार् थार्। यह प्रयोग सार्मार्जिक संज्ञार्नार्त्मक सिद्धार्न्त को स्पष्ट करतार् है क्योंकि यह बतार्तार् है कि किस प्रकार मनुष्य मीडियार् में देखी गर्इ घटनार्ओं के प्रत्युत्तर में व्यवहार्र करतार् है। इस प्रयोग के संबंध में बच्चों ने हिंसार् के प्रकार के प्रत्युत्तर में व्यवहार्र कियार् जिसे उन्होंने सीधे वीडियो देखकर सीखार् थार्। बैण्डुरार् द्वार्रार् प्रतिपार्दित सार्मार्जिक संज्ञार्नार्त्मक सिद्धार्न्त निम्नार्ंकित दो मुख्य प्रस्तार्वनार्ओं पर आधार्रित हैं :-

  1. अधिकतर मार्नव व्यवहार्र अर्जित होते है, अर्थार्त व्यक्ति उन्हें अपने जीवन-काल में सीखतार् है।
  2. मार्नव व्यवहार्र के सम्पोषण एवं विकास की व्यार्ख्यार् करने के लिए सीखने क नियम पर्यार्प्त हैं। 

बैण्डुरार् के सिद्धार्न्त को औपचार्रिक रूप से सार्मार्जिक-सीख क सिद्धार्न्त भी कहार् जार्तार् है। इस सिद्धार्न्त में मार्नव स्वभार्व के कुछ खार्स-खार्स पूर्वकल्पनार्ओं जैसे-विवेकपूर्णतार्, पर्यार्वरणीयतार् परिवर्तनशीलतार् तथार् ज्ञेयतार् आदि पर अधिक बल डार्लार् गयार् हैं बैण्डुरार् क मत है कि व्यक्ति दूसरों के व्यवहार्रों क पेक्ष््र ार्ण करके तथार् उसे दोहरार्कर वैसार् ही व्यवहार्र करनार् सीख लेतार् है। इस संबंध मेंं बैण्डुरार् रॉंस तथार् रार्ँस ने एक लेार्कप्रिय प्रयोग कियार् है। इस प्रयोग में स्कूल के बच्चों को वयस्क द्वार्रार् तीन से चार्र फीट की एक गुड़ियार् जिसे बोबो गुड़ियार् क नार्म दियार् गयार् थार्, को उछार्लते हुए मार्रते हुए एवं उसके प्रति आक्रार्मकतार् करते हुए दिखलार्यार् गयार्। जब इन बच्चों को उसी गुड़ियार् के सार्थ अकेलार् छोड़ दियार् गयार् तो देखार् गयार् कि उनके द्वार्रार् भी वैसार् ही आक्रार्मक व्यवहार्र उस गुड़ियार् के प्रति दिखलार्यार् गयार्। बार्द के प्रयोगों में जब बच्चों के टेलीविजन पर ऐसे ही आक्रार्मक दृश्य दिखलार्ये गए तो उनक व्यवहार्र उन बच्चों की तुलनार् में अधिक आक्रार्मक हो गए जिन्हें ऐसे दृश्य टेलीविजन पर नहीं दिखलार्यें गए थे।

बैण्डुरार् के सिद्धार्न्त में अन्योन्यनिर्धायतार् क संप्रत्यय एक काफी महत्वपूर्ण संप्रत्यय है। इसके मार्ध्यम से बैण्डुरार् यह स्पष्ट करनार् चार्हते थे कि मार्नव व्यवहार्र संज्ञार्नार्त्मक, व्यवहार्रार्त्मक तथार् पर्यार्वरणी निर्धार्रकों के बीच सतत अन्योन्य अन्त: क्रियार् क एक प्रतिफल होतार् है। इस तरह क अन्योन्य अन्त: क्रियार् की प्रक्रियार् को बैण्डुरार् ने अन्योन्य निर्धायतार् की संज्ञार् दी है।

मार्नव विकास की अवस्थार्एं 

समार्ज वैज्ञार्निकों मार्नव विकास की अवस्थार्ओं को गर्भधार्रण से लेकर पूरे जीवनकाल को निम्नार्ंकित 10 भार्गों में विभार्जित कियार् है।

  1. पूर्वप्रसूतिकाल – यह अवस्थार् गर्भधार्रण से प्रार्रम्भ होकर जन्म तक की होती है। 
  2. शैशवार्वस्थार् –यह अवस्थार् जन्म से प्रथम 10-14 दिनों तक की है। 
  3. बचपनार्वस्थार् – यह अवस्थार् जन्म के दो सप्तार्ह से प्रार्रंभ होकर दो सार्ल तक की होती है।
  4. बार्ल्यार्वस्थार् – यह अवस्थार् 2 सार्ल से प्रार्रम्भ होकर 10 यार् 12 सार्ल तक की होती है। बार्लिकाओं में 10 वर्ष तक तथार् बार्लकों में यह 12 वर्ष तक होती है। इसे मनोवैज्ञार्निकों ने निम्नार्ंकित दो भार्गों में बार्ंटार् है – 
  • प्रार्रंभिक बार्ल्यार्वस्थार् : यह अवस्थार् 2 सार्ल से प्रार्रंभ होकर सार्ल तक की होती है। 
  • उत्तर बार्ल्यार्वस्थार् : यह अवस्थार् 6 वर्ष से प्रार्रंभ होकर बार्लिकाओं में 10 वर्ष की उम्र तक तथार् बार्लकों में 6 वर्ष से प्रार्रंभ होकर 12 वर्ष की उम्र तक होती है। इस अवस्थार् से बार्लक-बार्लिकाओं में यौन परिपक्वतार् आ जार्ती है । 
  • तरूणार्वस्थार् यार् प्रार्कृकिशोरार्वस्थार् – लड़कियों में यह अवस्थार् 11 वर्ष से 13 की तथार् लड़कों में यह अवस्थार् 12 सार्ल 14 की होती है। इस अवस्थार् में बार्लिक क शरीर एक वयस्क के शरीर क रूप ले लेतार् है। 
  • प्रार्रंभिक किशोरार्वस्थार् – यह अवस्थार् 13-14 सार्ल से प्रार्रंभ होकर 17 सार्ल तक की होती है। इस अवस्थार् में शरीरिक विकास तथार् मार्नसिक विकास बार्लकों में अधिकतम होतार् है और उनमें विवेक तथार् उचित-अनुचित क खयार्ल अधिक नहीं रहतार् है। 
  • परवत्र्ती किशोरार्वस्थार् –यह अवस्थार् 17 सार्ल से 19-20 सार्ल तक की होती है। इस अवस्थार् में बार्लक पूर्णरूपेण शरीरिक तथार् मार्नसिक रूप से स्वतंत्र हो जार्तार् है और अपने भविष्य के बार्रे में तरह-तरह की योजनार्एँ बनार्नार् शुरू कर देतार् है। बार्लक तथार् बार्लिकाओं में विपरीत लिंग के व्यक्तियों के प्रति अभिरूचि अधिक हो जार्ती है । 
  • प्रार्रंभिग वयस्कतार् – यह अवस्थार् 21 सार्ल से 40 सार्ल की होती है। इस अवस्थार् में व्यक्ति शार्दी कर अपनी घर-परिवार्र बसार्तार् है और किसी व्यवसार्य में लग जार्तार् है तथार् आने आत्मविकास को मजबूत कर आगे बढ़तार् है। 
  • मध्यार्वस्थार् – यह अवस्थार् 40-60 सार्ल की होती है । इसमें व्यक्ति द्वार्रार् अपनी पूर्वप्रार्प्त उपलब्धि तथार् आकांक्षार्ओं को काफी सुदृढ़ कियार् जार्तार् है। 
  • बुढ़ार्पार् यार् सठियार्वस्थार् – यह अवस्थार् 60 सार्ल से मृत्यु तक की होती है। इस अवस्थार् में शरीरिक तथार् मार्नसिक शक्ति धीरे-धीरे क्षीण होती है और सार्मार्जिक कार्यो में व्यक्ति क लगार्व कम होतार् है चलार् जार्तार् है। 
  • मार्नव विकास : नीतियार्ँ व कार्यक्रम 

    मार्नव विकास की अवधार्रणार् मार्नवीय विकास से संबंधित है जिसक मुख्य उद्देश्य किसी भी रार्ष्ट्र से जनसंख्यार् के सार्मार्जिक, आर्थिक, रार्जनीतिक तथार् सार्ंस्कृतिक पक्षों को प्रभार्वित करनार् है। चूँकि मार्नवीय विकास एक बृहद् अवधार्रणार् है अत: इसके अंतर्गत समार्ज के विभिन्न वर्गों व उनसे संबंधित मुद्दों को ध्यार्न में रखते हुए नीतियों एवे कार्यक्रमों क निर्मार्ण कियार् जार्तार् है।

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