मार्नक भार्षार् क अर्थ एवं परिभार्षार्
मार्नक भार्षार् को कर्इ नार्मों से पुकारते हैं। इसे कुछ लोग ‘परिनिष्ठित भार्षार्’ कहते हैं और कर्इ लोग ‘सार्धु भार्षार्’। इसे ‘नार्गर भार्षार्’ भी कहार् जार्तार् है । अंग्रेजी में इसे Standard Language’ कहते हैं। मार्नक क अर्थ होतार् है एक निश्चित पैमार्ने के अनुसार्र गठित। मार्नक भार्षार् क अर्थ होगार्, ऐसी भार्षार् जो एक निश्चित पैमार्ने के अनुसार्र लिखी यार् बोली जार्ती है। मार्नक भार्षार् व्यार्करण के अनुसार्र ही लिखी और बोली जार्ती है अर्थार्त् मार्नक भार्षार् क पैमार्नार् उसक व्यार्करण है। हम जब किसी अपरिचित व्यक्ति से मिलते हैं तो उससे मार्नक भार्षार् में ही बार्तचीत करते हैं, जब हम कक्षार् में किसी प्रश्न क उत्तर देते हैं तो हम मार्नक भार्षार् क ही प्रयोग करते हैं। हम पत्र-व्यवहार्र में मार्नक भार्षार् ही लिखते हैं। समार्चार्र पत्रों में जो भार्षार् लिखी जार्ती है, वह भी मार्नक ही होती है। आकाशवार्णी और दूरदर्शन के समार्चार्र मार्नक भार्षार् में ही प्रसार्रित किए जार्ते हैं। हमार्रे प्रशार्सन के सार्रे कामकाज मार्नक भार्षार् में ही सम्पन्न होते हैं। कहने क आशय यह है कि मार्नक भार्षार् हमार्रे बृहत्तर समार्ज को सार्ंस्कृतिक स्तर पर आपस में जोड़ती है और हम उसी के मार्ध्यम से एक-दूसरे तक पहुँचते हैं। मार्नक भार्षार् हमार्री बार्त दूसरों तक ठीक उसी रूप में पहुँचार्ती है जो हमार्रार् आशय होतार् है। अत: मार्नक भार्षार् सर्वमार्न्य भार्षार् होती है, वह व्यार्करण सम्मत होती है और उसमें निश्चत अर्थ सम्प्रेषित करने की क्षमतार् होती है। गठन और सम्प्रेषण की एकरूपतार् उसक सबसे बड़ार् लक्षण है। यह भार्षार् सार्ंस्कृतिक मूल्योंं क प्रतीक बन जार्ती है। धीरे-धीरे इस मार्नक भार्षार् की शब्दार्वली, उसक व्यार्करण, उसके उच्चार्रण क स्वरूप निश्चित और स्थिर हो जार्तार् है और इसक प्रसार्र और विस्तार्र पूरे भार्षार् क्षेत्र में हो जार्तार् है। इस प्रकार मार्नक भार्षार् की परिभार्षार् निम्नलिखित शब्दों में दी जार् सकती है :

‘‘मार्नक भार्षार् किसी भार्षार् के उस रूप को कहते हैं जो उस भार्षार् के पूरे क्षेत्र में शुद्ध मार्नार् जार्तार् है तथार् जिसे उस प्रदेश क शिक्षित और शिष्ट समार्ज अपनी भार्षार् क आदर्श रूप मार्नतार् है और प्रार्य: सभी औपचार्रिक स्थितियों में, लेखन में, प्रशार्सन और शिक्षार् के मार्ध्यम के रूप में यथार्सार्ध्य उसी क प्रयोग करतार् है।’’ 

इसी के आधार्र पर मार्नक भार्षार् के निम्नलिखित लक्षण निश्चित होते हैं :-

  1. वह व्यार्करणसम्मत होती है। 
  2. वह सर्वमार्न्य होती है। 
  3. उससे क्षेत्रीय अथवार् स्थार्नीय प्रयोगों से बचने की प्रवृत्ति होती है, अर्थार्त् वह एकरूप होती है। 
  4. वह हमार्रे सार्ंस्कृतिक, शैक्षिक, प्रशार्सनिक, संवैधार्निक क्षेत्रों क कार्य सम्पार्दित करने में सक्षम होती है। 
  5. वह सुस्पष्ट, सुनिर्धार्रित एवं सुनिश्चित होती है। उसके सम्प्रेषण से कार्इ भ्रार्न्ति नहीं होती। 
  6. वह नवीन आवश्यकतार्ओं के अनुरूप निरन्तर विकसित होती रहती है। 
  7. नये शब्दों के ग्रहण और निर्मार्ण में वह समर्थ होती है। 
  8. वैयक्तिक प्रयोगों की विशिष्टतार्, क्षेत्रीय विशेषतार् अथवार् शैलीगत विभिन्नतार् के बार्वजूद उसक ढार्ँचार् सुदृढ़ एवं स्थिर होतार् है। 
  9. उसमें किसी प्रकार की त्रुटि दोष मार्नी जार्ती है। 
  10. वह परिनिष्ठित, सार्धु एवं संभ्रार्न्त होती है। 

इस दृष्टि से आज हिन्दी भी एक मार्नक भार्षार् है अर्थार्त् जहार्ँ-जहार्ँ हिन्दी लिखी यार् पढ़ी जार्ती है यार् पढ़े-लिखे लोग उसक व्यवहार्र करनार् चार्हते हैें तो इस बार्त क ध्यार्न रखार् जार्तार् है कि वह व्यार्करणसम्मत हो और उसक व्यार्करण वही हो जो सर्वमार्न्य है।

मार्नक हिन्दी का अर्थ एवं विशिष्टतार्एँ 

मार्नक हिन्दी के अर्थ 

मार्नक हिन्दी भार्षार् क अर्थ हिन्दी भार्षार् के उस स्थिर रूप से है जो अपने पूरे क्षेत्र में शब्दार्वली तथार् व्यार्करण की दृष्टि से समरूप है। इसलिए वह सभी लोगों द्वार्रार् मार्न्य है, सभी लोगों द्वार्रार् सरलतार् से समझी जार् सकती है। अन्य भार्षार् रूपों के मुकाबले वह अधिक प्रतिष्ठित है। मार्नक हिन्दी भार्षार् ही देश की अधिकृत हिन्दी भार्षार् है। वह रार्जकाज की भार्षार् है। ज्ञार्न, विज्ञार्न की भार्षार् है, सार्हित्य-संस्कृति की भार्षार् है। अधिकांश विद्वार्न, सार्हित्यकार, रार्जनेतार् औपचार्रिक अवसरों पर इसी भार्षार् क प्रयोग करते हैं। आकाशवार्णी व दूरदर्शन पर जिस हिन्दी में समार्चार्र प्रसार्रित होते हैं, प्रतिष्ठित समार्चार्र पत्रों एवं पत्रिकाओं में जिस हिन्दी क प्रयोग होतार् है, जिस हिन्दी में सार्मार्न्यत: मूल लेखन व अधिकृत अनुवार्द होतार् है, वह मार्नक हिन्दी भार्षार् ही है। मार्नक हिन्दी भार्षार्, हिन्दी के विभिन्न रूपों में सर्वमार्न्य रूप है। वह रूप पूरी तरह सुनिश्चित व सुनिर्धार्रित है तथार्पि इसमें गतिशीलतार् भी है। 

मार्नक हिन्दी की विशिष्टतार्एँ 

मार्नक भार्षार् के जितने लक्षण ऊपर बतलार्ए गए हैं वे सभी लक्षण मार्नक हिन्दी भार्षार् में विद्यमार्न हैं। कुछ विद्वार्नों के अनुसार्र मार्नक भार्षार् में चार्र तत्त्वों क होनार् आवश्यक है- 

  1. ऐतिहार्सिकतार्, 
  2. मार्नकीकरण,
  3. जीवन्ततार् और 
  4. स्वार्यत्ततार्। ये चार्रों तत्त्व मार्नक हिन्दी भार्षार् में विद्यमार्न हैं । 

हिन्दी भार्षार् की ऐतिहार्सिकतार् तो सर्वविदित है। इसक एक गौरवशार्ली इतिहार्स है, विपुल सार्हित्यिक परम्परार् है। शतार्ब्दियों से लोग हिन्दी भार्षार् क प्रयोग करते आ रहे हैं। हिन्दी क मार्नक रूप भी गत शतार्ब्दी में आकार लेने लगार् थार्। रार्ष्ट्रीय आन्दोलन के दौरार्न हिन्दी क मार्नक स्वरूप विकसित होने लगार् और स्वतंत्रतार् के पश्चार्त तो हिन्दी क मार्नक स्वरूप सुनिश्चित व सुनिर्धार्रित हो गयार्। मार्नक हिन्दी में जीवन्ततार् भी है। जीवन्ततार् इसी से सिद्ध होती है कि प्रसिद्ध वैज्ञार्निक डॉ. जयन्त नार्रलीकर ‘ब्रह्मार्ण्ड के स्वरूप’ पर अपनार् व्यार्ख्यार्न मार्नक हिन्दी भार्षार् में देते हैं। कवितार् और कहार्नी से लेकर विज्ञार्न और दर्शन तक सभी क्षेत्रों में आज मार्नक हिन्दी भार्षार् क प्रयोग होतार् है। यह भार्षार् नए युग के सार्थ चलने में पूरी तरह सक्षम है। मार्नक हिन्दी में स्वार्यत्ततार् भी है। वह किसी अन्य भार्षार् पर टिकी हुर्इ नहीं है। उसकी स्वतंत्र शब्दार्वली और अपनार् व्यार्करण है। इन चार्रों तत्त्वों के प्रकाश में यही कहार् जार् सकतार् है कि मार्नक हिन्दी भार्षार् एक सशक्त गतिशील और सर्वमार्न्य भार्षार् है। 

मार्नक हिन्दी के स्वरूप एवं प्रकार 

मार्नक हिन्दी के स्वरूप 

हिन्दी की आधुनिक मार्नक शैली क विकास हिन्दी भार्षार् की एक बोली, जिसक नार्म खड़ीबोली है के आधार्र पर हुआ है। हिन्दी मार्नक भार्षार् है, जबकि खड़ीबोली उसकी आधार्रभूत भार्षार् क वह क्षेत्रीय रूप है जो दिल्ली, रार्मपुर, मुरार्दार्बार्द, बिजनौर, मेरठ, सहार्रनपुर आदि में बोलार् जार्तार् है। खड़ीबोली क्षेत्र में रहने वार्ले प्रार्य: प्रत्येक वर्ग के व्यक्ति द्वार्रार् जो कुछ बोलार् जार्तार् है वह खड़ीबोली है किन्तु जैसे ब्रज, बुन्देली, निमार्ड़ी अथवार् मार्रवार्ड़ी क्षेत्रो में हिन्दी की शिक्षार् प्रार्प्त व्यक्ति परस्पर सम्भार्षण अथवार् औपचार्रिक अवसरों पर मार्नक हिन्दी बोलते हैं वैसे ही खड़ीबोली क्षेत्र के व्यक्ति भी औपचार्रिक अवसरों पर मार्नक हिन्दी क प्रयोग करते हैं। हम इसको इस तरह समझें- मैथिलीशरण गुप्त चिरगार्ँव के थे। वे घर में बुन्देलखण्डी बोलते थे। हजार्रीप्रसार्द द्विवेदी बलियार् के थे, वे घर में भोजपुरी बोलते थे किन्तु ये सभी व्यक्ति जब सार्हित्य लिखते हैं तो मार्नक हिन्दी क व्यवहार्र करते हैं। संक्षेप में मार्नक भार्षार् अपनी भार्षार् क एक विशिष्ट प्रकार्यार्त्मक स्तर है। अब हम हिन्दी के निम्नलिखित चार्र वार्क्य लेंगे और देखेंगे कि मार्नक भार्षार् की कसौटी पर कौन-सार् वार्क्य सही उतरतार् है : 

  1. मैंने भोजन कर लियार् है। 
  2. मैंने खार्नार् खार् लियार् है। 
  3. मैंने खार्नार् खार् लियार् हूँ। 
  4. हम खार्नार् खार् लिये हैं। 

विभिन्न क्षेत्रीय एवं सार्मार्जिक भिन्नतार्ओं के आधार्र पर तीसरे एवं चौथे प्रकार्यार्त्मक स्तरों के अनेक भेद हो सकते हैं। किन्तु पहले यार् दूसरे वार्क्य क व्यवहार्र औपचार्रिक स्तर पर मार्नक भार्षार् में सर्वत्र होगार्। हिन्दी क सही रूप जो सर्वत्र एक-सार् है, सर्वमार्न्य है, व्यार्करणसम्मत है और सम्भ्रार्ंत है, मार्नक हिन्दी क वार्क्य है। 

मार्नक हिन्दी के प्रकार 

हिन्दी के अनेक रूप हैं और अनेक अर्थ हैं। हिन्दी के सार्रे रूपों को हम सुविधार् के लिए दो वर्गों में बार्ँट सकत हैं- 

  1. सार्मार्न्य हिन्दी 
  2. क्षेत्रीय बोलियार्ँ 

हिन्दी की क्षेत्रीय बोलियार्ँ छोटे-छोटे क्षेत्रों यार् छोटे-छोटे समुदार्यों के बीच ही प्रचलित हैं। सार्मार्न्य हिन्दी इन सब रूपों क महत्तम-समार्पवर्तक रूप है। यदि बोलीगत सार्रे रूप हिन्दी की परिधि पर हैं तो उनक एक रूप ऐसार् भी है जो केन्द्रवर्ती रूप है। वह केन्द्रवर्ती रूप ही मार्नक हिन्दी क रूप है। विभिन्न बोलियों के क्षेत्रीय अथवार् सार्मुदार्यिक रूपों क मार्नक भार्षार् के रूप में पर्यवसार्न कर्इ कारणों से होतार् है। इन कारणों को हम संक्षेप में निम्नार्नुसार्र उल्लिखित कर सकते हैं- 

  1. एक-सी शिक्षार् क प्रसार्र 
  2. यार्तार्यत की सुविधार्ओं क विस्तार्र 
  3. जनसंचार्र मार्ध्यमों की लोकप्रियतार् 
  4. महार्नगरों क विकास 
  5. सार्हित्य की वृद्धि और मुद्रित अक्षर की व्यार्पकतार् 
  6. सिनेमार् क प्रभार्व 
  7. सरकारी नौकरी में स्थार्नार्न्तरण 
  8. सैनिकों की भर्ती 
  9. रार्ष्ट्रीय एकतार् की चेतनार्। 

उपर्युक्त कारणों से धीरे-धीरे ऐसी हिन्दी क निर्मार्ण और प्रचलन हुआ जो हिन्दी के विभिन्न क्षेत्रों और समुदार्यों में समार्न रूप से समझी जार् सकती है और उसक व्यवहार्र कियार् जार् सकतार् है। 

हमार्रे देश में औद्योगिकीकरण जिस गति से हो रहार् है उससे भी क्षेत्रीय और सार्मुदार्यिक बोलियों के स्थार्न पर एक सार्मार्न्य भार्षार् फैल रही है। हिन्दी की शिक्षार् क प्रसार्र भी इन दिनों बहुत हुआ है। आकाशवार्णी और दूरदर्शन के प्रभार्व के कारण मार्नक हिन्दी सार्मार्न्य जन तक पहुँच रही है। 

हिन्दी भार्षार् के मार्नक और अमार्नक की पहचार्न 

मार्नक भार्षार् लिखने के काम आती है और बोलने के भी। लिखित और उच्चरित मार्नक हिन्दी के जो प्रयोग व्यार्करणसम्मत, सर्वमार्न्य, एकरूप और परिनिष्ठित है उनक संक्षिप्त विवरण निम्नार्नुसार्र है। 

  • बहुत से लोग बड़ी ‘र्इ’ की मार्त्रार् क गलत प्रयोग करते हैं, जैसे शक्ती, तिथी, कान्ती, शार्न्ती। वार्स्तव में इनके मार्नक रूप है- शक्ति, तिथि, कान्ति, शार्न्ति आदि। 
  • बहुत से लोग ‘ऋ’ को रि बोलते हैं जैसे रिण, रीतार्। यह अमार्नक प्रयोग है; किन्तु ‘ऋ’ अब शुद्ध स्वर नहीं रह गयार् है। उच्चार्रण में ‘रि’ को ‘ऋ’ क उच्चार्रण स्वीकार कर लियार् गयार् है किन्तु लिखने में संस्कृत शब्दों में ‘ऋ’ ही मार्नक प्रयोग है जैसे- ऋण, ऋतार् आदि। 
  • हिन्दी में अंग्रेजी के कुछ ऐसे शब्द प्रचलित हो गए हैं जिनमें ‘ॉ’ की ध्वनि होती है। जैसे- डॉक्टर, कॉलेज, ऑफिस। हिन्दी में डार्क्टर, कालेज, आफिस बोलनार् यार् लिखनार् अमार्नक प्रयोग मार्नार् जार्तार् है। 
  • कुछ शब्द ‘इ’ और ‘र्इ’ देनों मार्त्रार्ओं से लिखे जार्ते हैं जैसे- हरि/हरी, स्वार्ति/स्वार्ती। किन्तु व्यक्ति के नार्म क मार्नक रूप वही मार्नार् जार्तार् है जो नियम द्वार्रार् मार्न्य है यार् वह स्वयं लिखतार् है जैसे-डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यार्लय सही है, डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यार्लय नहीं, क्योंकि डॉ. हरीसिंह, अपनार् नार्म हरीसिंह लिखते थे। 
  • कुछ लोग कुछ शब्दों में बड़ी ‘र्इ’ के स्थार्न पर छोटी ‘इ’ की मार्त्रार् लगार्ते हैं। जैसे श्रीमति, मैथिलिशरण। ये अमार्नक प्रयोग है। इनके मार्नक रूप है- श्रीमती, मैथिलीशरण। 
  • ऐसे ही निम्नलिखित शब्दों के अन्त में ह्रस्व ‘उ’ क प्रयोग मार्नक है, दीर्घ ‘ऊ’ क नहीं 

मार्नक         अमार्नक 

इन्दु         इन्दू 

प्रभु         प्रभू 

शम्भु         शम्भू 

  • हिन्दी में ‘र’ के सार्थ जब ‘उ’ अथवार् ‘ऊ’ की मार्त्रार् लगार्यी जार्ती है तब उसक रूप होतार् है ‘रुपयार्’ अथवार् ‘रूप’। ऋ जिन शब्दों में हिन्दी में ‘औ’ की मार्त्रार् होती है, उनक उच्चार्रण ‘अ’ ‘उ’ की तरह करनार् चार्हिए, ओ की तरह नहीं। जैसे ‘औरत’ क मार्नक उच्चार्रण ‘अउरत’ की तरह होगार्, ‘ओरत’ की तरह नहीं। इसी प्रकार ‘ए’ क उच्चार्रण भी सार्वधार्नी से करनार् चार्हिए। ‘मैं’ क उच्चार्ार्रण ‘मँय’ की तरह होगार् ‘में’ की तरह नहीं। ‘सेनिक’, ‘गोरव’ उच्चार्रण अमार्नक है, ‘सैनिक’, ‘गौरव’ आदि मार्नक। 
  • संस्कृत के शब्दों में दो स्वरों को एक सार्थ लिखनार् अमार्नक है, जैसे ‘स्थाइ’ अमार्नक है, मार्नक ‘स्थार्यी’ है। 
  • हिन्दी में आजकल अनुनार्सिक चिह्न चन्द्रबिन्दु(ँ) के स्थार्न पर अनुस्वार्र लिखार् जार्ने लगार् है, जैसे ‘हँस’ के स्थार्न पर ‘हंस’। ऐसार् लोग लार्परवार्ही के कारण करते हैं। मुद्रण की सुविधार् के लिए भी अब हिन्दी में अनुनार्सिक चिह्न एवं चन्द्रबिन्दु के स्थार्न पर अनुस्वार्र लिखार् जार्ने लगार् है, जैसे कुंवर, मार्ं, बार्ंस आदि, परन्तु इनके मार्नक रूप हैं : कँुवर, मार्ँ, बार्ँस। 
  • जिन शब्दों के अन्त में ‘र्इ’ यार् ‘र्इ’ की मार्त्रार् (ी ) होती है उनक जब बहुवचन बनार्यार् जार्तार् है तो वह ह्रस्व ‘इ’ की मार्त्रार् में परिवर्तित हो जार्ती है, जैसे मिठाइ-मिठार्इयार्ँ, दवाइ-दवार्इयार्ँ, लड़की-लड़कियार्ँ आदि। इसी प्रकार यदि शब्द के अन्त में ‘ऊ’ की मार्त्रार् हो तो उनके बहुवचन में ह्रस्व ‘उ’ की मार्त्रार् हो जार्ती है, जैसे आँसू-आँसुओं, लड्डू-लड्डुओं आदि। 
  • मार्नक हिन्दी में अब ‘क’ के ‘क़’ क प्रयोग भी होने लगार् है। ‘क़’ विदेशी(फ़ार्रसी, अंग्रेजी) शब्दों में आतार् है जैसे ‘क़लम’। इसी प्रकार ख़, ग़, ज़, फ़ ध्वनियार्ँ भी हिन्दी में स्वीकार कर ली गयी हैं। ख़त, गै़रत, ज़नार्ब, सफ़ार्, बोलनार् पढ़े-लिखे होने की निशार्नी मार्नी जार्ती है। 
  • ‘व’ और ‘ब’ में भेद होतार् है। ‘व’ के स्थार्न पर ‘ब’ बोलनार् उचित नहीं है। इस प्रकार ‘ज्ञ’ और ‘क्ष’ केवल संस्कृत शब्दों में ही प्रयुक्त होतार् है। 
  • हिन्दी में ‘श’, ‘ष’, ‘स’ तीन अलग-अलग ध्वनियार्ँ हैं- सड़क, शेष, विष, “ार्टकोण आदि मार्नक शब्द रूप हैं 
  • ‘ष्ट’ और ‘ष्ठ’ क उच्चार्रण प्रार्य: भ्रम उत्पन्न करतार् है। इनके बोलने और लिखने में शुद्धतार् क ध्यार्न रखनार् चार्हिए, जैसे ‘इष्ट’, ‘नष्ट’, ‘भ्रष्ट’, ‘स्वार्दिष्ट’, ‘कनिष्ठ, ज्येष्ठ, घनिष्ठ, प्रतिष्ठार् आदि। 
  • रेफ लगार्ने में प्रार्य: भूल होती है। रेफ वार्स्तव में ‘र’ क हलन्त रूप है। यह जहार्ँ बोलार् जार्तार् है, सदैव उसके आगे के अक्षर पर लगतार् है। जैसे कर्म, धर्म, आशीर्वार्द आदि। आश्र्ार्ीवार्द लिखनार् गलत है। 
  • संस्कृत में रेफ से संयुक्त व्यंजन क द्वित्व होतार् भी है और नहीं भी होतार्। कर्त्तव्य, कर्तव्य, अर्द्ध, अर्ध, आय्र्य, आर्य, भार्य्र्यार्, भायार् आदि दोनों रूप मार्नक हैं। हिन्दी में भी ये दोनों रूप शुद्ध स्वीकारे गये हैं परन्तु निम्नलिखित शब्दों क द्वित्व अलग नहीं कियार् जार् सकतार् : महत्त्व, तत्त्व, उज्ज्वल, निस्संदेह, निश्शंक ही शुद्ध रूप हैं; महत्व, तत्व, उज्वल, निसंदेह, निशंक नहीं। 
  • हिन्दी में नयार्, गयार्, लार्यार् तो ठीक मार्ने जार्ते हैं। पर उनके स्त्रीवार्ची रूप कभी नयी, गयी, लार्यी लिखे जार्ते हैं, तो कभी नर्इ, गर्इ, लाइ। वार्स्तव में आर्इ और आयी, लाइ और लार्यी, भाइ और भार्यी में फर्क होतार् है। देखिए : 

       आर्इ        मार् (मरार्ठी में) 

       आयी        आयार् क्रियार् क स्त्रीलिंग रूप 

       लाइ        धार्न क खिलार् हुआ रूप 

       लार्यी        लार्यार् क स्त्रीलिंग रूप 

       भाइ        बन्धु 

       भार्यी       भार्यार् क्रियार् क स्त्रीलिंग रूप 

इस प्रकार ‘बनिए’ ओर ‘बनिये’ में भी अन्तर करनार् चार्हिए। ‘बनिए’ बननार् क्रियार् क रूप है जबकि ‘बनिये’ बनियार् क बहुवचन है। जिन शब्दों के एकवचन में य हो, उनके बहुवचन और स्त्रीलिंग रूपों में भी य ही होनार् चार्हिए। 

  • सम्बोधन में बहुत से लोग देशवार्सियों, भार्इयों जैसे प्रयोग करते हैं। यह अमार्नक हैं। सम्बोधन बहुवचन में ‘ओ’ क प्रयोग होनार् चार्हिए, ‘ओं’ क नहीं। 
  • हिन्दी में जन, गण, वृन्द जैसे शब्द बहुवचनवार्ची है अत: गुरुजन, विधार्यक गण, पक्षी वृन्द ही सही हैं. गुरुजनों, विधार्यक गणों पक्षी वृन्दों जैसे रूप आमार्नक हैं। 
  • हिन्दी के कारक चिह्नों में सबसे अधिक कठिनाइ ‘ने’ को लेकर होती है। मार्नक हिन्दी में ‘ने’ क प्रयोग कर्तार्-कारक में सकर्मक धार्तुओं से बने भूतकालिक क्रियार् रूपों के सार्थ होतार् है। जैसे : 
    1. मैंने कहार्।
    2. रार्म ने रार्वण को मार्रार् 
    3. मैंने गार्नार् गार्यार्ं 

किन्तु निम्न वार्क्यों में ‘ने’ क प्रयोग अमार्नक है- 

  1. मैं ने हँसार्। 
  2. रार्म ने बहुत रोयार्। 
  • मार्नक हिन्दी में विशेषण क लिंग, संज्ञार् के लिंग के अनुरूप बदलने की परिपार्टी नहीं है। संस्कृत में सुन्दर बार्लक किन्तु सुन्दरी बार्लिक जैसे प्रयोग प्रचलित है। हिन्दी में हम सुन्दर लड़की और सुन्दर लड़क कहते हैं। वार्स्तव में हिन्दी में संज्ञार् के लिंग के अनुरूप विशेषण क लिंग नहीं बदलार् जार्नार् चार्हिए।
  • निश्चयवार्चक अव्यय के रूप में हिन्दी में ‘न’, ‘नहीं’ और ‘मत’ मार्नक हैं, ‘नार्’ नहीं। इस तरह के वार्क्य ठीक नहीं हैं- ‘नार् वह बैठार् और नार् ही उसने बार्त की।’ 

वार्स्तव में भार्षार् के मार्नकीकरण की प्रक्रियार् एक लम्बी प्रक्रियार् है। अत: जिन शब्दों, अभिव्यक्तियों और वार्क्य रूपों क मार्नकीकरण हो चुक है, उनक पार्लन करनार् चार्हिए।

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