मार्ंग क अर्थ एवं नियम
मार्ँग क अर्थ किसी वस्तु को प्रार्प्त करने से है। कितुं अर्थशार्स्त्र में वस्तु को प्रार्प्त करने की इच्छार् मार्त्र को मार्ँग नहीं कहते बल्कि अर्थशार्स्त्र क संबध एक निश्चित मूल्य व निश्चित समय से होतार् है। मार्ँग के, सार्थ निश्चित मूल्य व निश्चित समय होतार् है। प्रो. मेयर्स – “किसी वस्तु की मार्ँग उन मार्त्रार्ओं की तार्लिक होती है। जिन्हें क्रेतार्गत एक निश्चित समय पर उसकी सभी संभार्वित मूल्यों पर खरीदने के लिये तैयार्र होते है। “

मार्ँग के आवश्यक तत्व 

मार्ँग कहलार्ने के लिए निम्न तत्वों क होनार् आवश्यक है-

  1. इच्छार् – मार्ँग कहलार्ने के लिये उपभोक्तार् की इच्छार् क होनार् आवश्यक है। अन्य इच्छार् की उपस्थिति के बार्वजूद यदि उपभोक्तार् उस वस्तु को प्रार्प्त करने की इच्छार् नहीं करतार् तो उसे मार्ँग नहीं कहते।
  2. सार्धन-मार्ँग कहलार्ने के लिए मनुष्य की इच्छार् के सार्थ पर्यार्प्त धन (सार्धन) क होनार् आवश्यक है। एक भिखार्री कार खरीदने की इच्छार् रख सकतार् है, परंतु सार्धन के अभार्व में इस इच्छार् को मार्ँग संज्ञार् नहीं दी जार् सकती। 
  3. खर्च करने की तत्परतार् –मार्ँग कहलार्ने के लिये मुनष्य के मन में इच्छार् व उस इच्छार् की पूर्ति के लिये पयाप् त सार्धन के सार्थ-सार्थ उस धन को उस इच्छार् की पूर्ति के लिए व्यय करने की तत्परतार् भी होनी चार्हिए। जैसे- यदि एक कजं सू व्यक्ति कार खरीदने की इच्छार् रखतार् है और उसके पार्स उसकी पूर्ति के लिए धन की कमी नहीं है, परतुं वह धन खर्च करने के लिए तैयार्र नहीं है तो इसे मार्ँग नहीं कहेगें।
  4. निश्चित मूल्य – मार्ँग क एक महत्वपूर्ण तत्व निश्चित कीमत क होनार् है अर्थार्त् किसी उपभोक्तार् के द्वार्रार् मार्ँगी जार्ने वार्ली वस्तु क संबंध यदि कीमत से नहीं कियार् गयार् तो उस स्थिति में मार्गँ क आशय पूर्ण नहीं होगार्। उदार्हरण के लिए, यदि यह कहार् जार्य कि 500 किलो गेहँू की मार्ँग है, तो यह अपूर्ण हो। उसे 500 किलो गेहँू की मार्ँग 3 रू. प्रति किलो की कीमत पर कहनार् उचित होगार्।
  5. निश्चित समय – प्रभार्वपूर्ण इच्छार्, जिसके लिए मनुष्य के पार्स धन हो और वह उसे उसकी पूर्ति के लिए व्यय करने इच्छकु भी है और किसी निश्चित मूल्य से संबधित है, लेि कन यदि वह किसी निश्चित समय से संबधित नहीं है तो मार्ँग क अर्थ पूर्ण नहीं होगार्। इस प्रकार, किसी वस्तु की मार्ँग, वह मार्त्रार् है जो किसी निश्चित कीमत पर, निश्चित समय के लिए मार्ँगी जार्ती है। 

मार्ँग तार्लिका 

मार्ँग तार्लिक एक निश्चित समय में विभिन्न कीमतों पर वस्तु की खरीदी जार्ने वार्ली मार्त्रार् को बतार्ती है। मार्ँग तार्लिक दो प्रकार की होती है-

  1. व्यक्तिगत मार्ँग तार्लिका
  2.  बार्जार्र मार्ँग तार्लिका 

(1) व्यक्तिगत मार्ँग तार्लिक – 

व्यक्तिगत मार्ँग तार्लिक में एक व्यक्ति के द्वार्रार् एक निश्चित समय-अवधि में वस्तु की विभिन्न कीमतों पर वस्तु की खरीदी जार्ने वार्ली मार्त्रार्ओं को दिखार्यार् जार्तार् है। इस मार्ँग तार्लिक को बार्यीं ओर वस्तु की कीमत तथार् दार्यीं ओर वस्तु की मार्ँगी जार्ने वार्ली मार्त्रार् को दिखार्यार् जार्तार् है। तार्लिक से यह स्पष्ट है-

तार्लिका

 व्यक्तिगत मार्ँग सन्तरे क मूल्य
(प्रति इकार्इ रू. में)
सन्तरे की मार्ँग
(इकार्इयों में)
1
2
3
4
1000
700
400
200
100

उपर्युक्त तार्लिक से यह स्पष्ट है कि जैसे- जैसे सन्तरे की कीमत में वृद्धि होती है। वैसे-वैंसे सन्तरे की मार्गँ में कमी होती है। जब सन्तरे की कीमत प्रति इकार्इ 1 रू. थी तब सन्तरे की मार्ँग 1000 इकार्इ की थी, किन्तु सन्तरे के मूल्य में वृद्धि 5 रू. प्रति इकार्इ हो जार्ने पर सन्तरे की मार्ँग घटकर 100 इकाइयार्ँ हो गयी है। इस प्रकार मार्ँग तार्लिक वस्तु के मूल्य एवं मार्ँगी गयी मार्त्रार् के बीच विपरीत संबंध को स्पष्ट कर रही है।

(2) बार्जार्र मार्ँग तार्लिका- 

बार्जार्र मार्ँग तार्लिक एक निश्चित समय अवधि में वस्तु की विभिन्न कीमतों पर उनके सभी खरीददार्रों द्वार्रार् वस्तु की मार्ँगी गयी मार्त्रार्ओं के कुल यार्गे को बतार्ती है। उदार्हरणाथ, मार्न लीजिए बार्जार्र में वस्तु के A,B एवं C तीन खरीददार्र है। अत: वस्तु की विभिन्न कीमतों पर इन लोगों के द्वरार् अलग-अलग खरीदी जार्ने वार्ली वस्तु की मार्त्रार्ओं क योग बार्जार्र मार्ँग तार्लिक होगी। निम्न तार्लिक से यह स्पष्ट है-

तार्लिका

उपर्युक्त तार्लिक के प्रथम खार्ने जिसमें सन्तरे की कीमत प्रति इकार्इ रू. को दिखयार् गयार् है, तथार् अन्तिम खार्ने में जिसमें बार्जार्र में सन्तरे के विभिन्न खरीददार्रों द्वार्रार् मार्ँगी गयी कलु मार्त्रार् को दिखार्यार् गयार् है। ये दोनों खार्ने मिलकर बार्जार्र मार्ँग तार्लिक क निर्मार्ण करते है।

इस प्रकार मार्ँग तार्लिक से स्पष्ट है कि वस्तु के मूल्य में कमी हार्ने पर वस्तु की मार्ँग बढ  जार्ती है तथार् मूल्य में वृद्धि होने पर वस्तु की मार्ँगी गयी मार्त्रार् में कमी हो जार्ती है।

व्यक्तिगत तथार् बार्जार्र मार्ँग तार्लिक में अंतर 

व्यक्तिगत तथार् बार्जार्र मार्ँग तार्लिक में प्रमुख अंतर निम्नार्ंकित हैं-

  1. बार्जार्र मार्गँ तार्लिक व्यक्तिगत मार्गँ तार्लिक की अपेक्षार् अधिक समतल तथार् सतत् होती है। इसक कारण यह है कि, व्यक्ति क व्यवहार्र असार्मार्न्य हो सकतार् है। जबकि व्यक्तियों के समुदार्य क व्यवहार्र सार्मार्न्य हुआ करतार् है।
  2. व्यक्तिगत मार्ँग तार्लिक क व्यार्वहार्रिक महत्व अधिक नहीं है, जबकि बार्जार्र मार्ँग तार्लिक क मूल्य नीति, करार्रोपण नीति तथार् अथिर्क नीति के निधार ण पर अत्यधिक प्रभार्व पडत़ार् है।
  3. व्यक्तिगत मार्ँग तार्लिक बनार्नार् सरल है। जबकि बार्जार्र मार्ँग तार्लिक बनार्नार् एक कठिन कार्य है। इसके दो कारण हैं- 
    1. धन की असमार्नतार्ओं क होनार्, तथार् 
    2. व्यक्तियों के दृष्टिकोणों में अतं र पार्यार् जार्नार्। 

मार्ँग वक्र

“जब मार्ँग की तार्लिक को रेखार्चित्र के रूप मेंं प्रस्तुुत कियार् जार्तार् है तब हमेंे मार्ँग वक्र प्रार्प्त होतार् है इस प्रकार “मार्ँग तार्लिक क रेखीय चित्रण ही मार्ँग वक्र कहलार्तार् है।”

मार्ँग वक्र

 उपर्युक्त रेखार्चित्र में OX आधार्र पर सन्तरे की इकाइयार्ँ और OY लम्ब रेखार् पर सन्तरे की प्रति इकार्इ कीमत को दिखार्यार् गयार् है। DD मार्गँ वक्र है जो कि A,B,C,D एवं E बिन्दुओं को जोडत़े हुए खीचार् गयार् है। DD मार्ँग वक्र में स्थित प्रत्यके बिन्दु विभिन्न कीमतों पर वस्तु की खरीदी जार्ने वार्ली मार्त्रार् को बतार्तार् है। उदार्हरण के लिए, । बिन्दु पर सन्तरे की प्रति इकार्इ कीमत 5 रू. होने पर उपभोक्तार् सन्तरे की 1 इकाइयार्ँ खरीदतार् है, जबकि E बिन्दु पर वह सन्तरे की कीमत प्रति इकार्इ 1 रू. होने पर 5 इकाइयार्ँ खरीदतार् है। इससे स्पष्ट है कि जब सन्तरे की कीमत घट जार्ती है तब उसकी मार्ँग बढ़ जार्ती है। इसलिए मार्ँग वक्र क ढार्ल ऋणार्त्मक है।

मार्ँग को प्रभार्वित करने वार्ले तत्व 

  1. वस्तु की कीमत –किसी वस्तु की मार्ँग को प्रभार्वित करने वार्ले सबसे प्रमुख तत्व उसकी कीमत है। वस्तु की कीमत में परिवर्तन के परिणार्मस्वरूप उसकी मार्ँग भी परिवर्तित हो जार्ती है। प्रार्य: वस्तु की कीमत के घटने पर मार्ँग बढ़ती है तथार् कीमत के बढ़ने पर मार्ँग घटती है।
  2. उपभोक्तार् की आय – उपभोक्तार् की आय किसी भी वस्तु की मार्ँग क दूसरार् सबसे महत्वपूर्ण निधारक तत्व है। यदि वस्तु की कीमत मे कोर्इ परिवतर्नन हो तो आय बढ़ने पर वस्तु की मार्ँग बढ़ जार्ती है तथार् आय कम होने पर वस्तु की मार्ँग भी कम हो जार्ती है। गिफिन वस्तुओं (निकृष्ट वस्तुओ) के संबध में उपभोक्तार् क व्यवहार्र इसके विपरीत होतार् है।
  3. धन क वितरण- समार्ज में धन क वितरण भी वस्तुओं की मार्ँग को प्रभार्वित करतार् है। यदि धन क वितरण असमार्न है, अर्थार्त ् धन कुछ व्यक्तियों के हार्थों में ही केन्द्रित है तो विलार्सितार्पूर्ण वस्तुओं की मार्ँग बढेग़ी। इसके विपरीत, धन क समार्न वितरण है, अर्थार्त् अमीरी-गरीबी के बीच की दूरी अधिक नहीं है, तो आवश्यक तथार् आरार्मदार्यक वस्तुओं की मार्ँग अधिक की जार्येगी। 
  4. उपभोक्तार्ओं की रूचि –उपभोक्तार्ओं की रूचि, फैशन, आदत, रीति-रिवार्ज के कारण भी वस्तु की मार्ँग प्रभार्वित हो जार्ती है। जिस वस्तु के प्रति उपभोक्तार् की रूचि बढ़ती है, उस वस्तु की मार्ँग भी बढ़ जार्ती है जैसे – यदि लोग कॉफी को चार्य की अपेक्षार् अधिक पसंद करने लगते है। तो कॉफी की मार्ँग बढ  जार्येगी तथार् चार्य की मार्ँग कम हो जार्येगी।
  5. सम्बन्धित वस्तुुओं की कीमत- किसी वस्तु की मार्ँग पर उस वस्तु की संबंधित वस्तु की कीमत क भी प्रभार्व पडत़ार् है। संबधित वस्तुएँ दो प्रकार की हार्ती हैं- 
    1. प्रतिस्थार्पन वस्तुएँ वे हैं जो एक-दसूरे के बदले में प्रयार्गे की जार्ती है जैसे- चार्य व कॉफी। यदि चार्य की कीमत बढत़ी है और कॉफी की कीमत पूर्वत् रहती है। तो चार्य की अपेक्षार् कॉफी की मार्ँग बढेग़ ी। 
    2. पूरक वस्तुएँ वे है। जिनक उपयार्गे एक सार्थ कियार् जार्तार् है; जसै – डबलरोटी व मक्खन। अब यदि रोटी की कीमत बढ़ जार्ये तो उसकी मार्ँग घटेगी, फलस्वरूप मक्खन की मार्ँगीार्ी घटेगी।
  6. मौसम एवं जलवार्यु-वस्तु की मार्ँग पर मार्सै म एवं जलवार्य ु आदि क भी प्रभार्व पड़तार् है जैसे- पंखार्, कूलर, फ्रीज, ठण्डार् पेय आदि की मार्ँग गर्मियों में बढ जार्ती है। इसी प्रकार ऊनी कपडे, हीटर आदि की मार्ँग सर्दियों में बढ़ जार्ती है। इसी प्रकार छार्त,े बरसार्ती कोट आदि की मार्गँ बरसार्त के दिनों में बढ जार्ती है। 

मार्ँग में परिवर्तन बनार्म मार्ँगी गयी मार्त्रार् मेंं 

अथवार्मार्ँग क विस्तार्र यार् संकुचन बनार्म मार्ँग में वृद्धि यार् कमी 

(अ) मार्ँग में विस्तार्र तथार् संकुचन- अन्य बार्तें यथार्स्थिर रहने पर, जब किसी वस्तु की कीमत में कमी होने के कारण उस वस्तु की अधिक मार्त्रार् खरीदी जार्ती है तो उसे मार्गँ क विस्तार्र कहते है। इनके विपरीत, अन्य बार्तें यथार्स्थिर रहने पर, जब वस्तु की कीमत में वृद्धि के कारण उस वस्तु की पहले से कम मार्त्रार् खरीदी जार्ती है, तब उसे ‘मार्ँग क संकुचन’ कहते है। 

(ब) मार्ँग में वृिद्ध तथार् कमी- वस्तु की कीमत के यथार्स्थिर होने के बार्वजूद, यदि उपभोक्तार् की आय में वृद्धि होने यार् स्थार्नार्पन्न वस्तु की वृद्धि उपभोक्तार् की रूचि यार् पसदं गी के कारण वस्तु की मार्ँगी गयी मार्त्रार् में वृद्धि हो जार्ती है, तो इसे ‘मार्ँग में वृद्धि’ कहते है। मार्गँ की वृद्धि की स्थिति में मार्ँग वक्र स्थिर न रहकर दार्हिनी ओर खिसक जार्तार् है। 

मार्ँग नियम के अपवार्द 

अथवार् 

क्यार् मार्ँग -वक्र ऊपर भी उठ सकतार् है 

मार्ँग क नियम कुछ परिस्थितियों में लार्गू नहीं होतार् है। इन परिस्थितियों को मार्ँग के नियम क अपवार्द कहार् जार्तार् है। इन परिस्थितियों में वस्तु की कीमतों में वृद्धि होने पर वस्तु की मार्ँग भी बढ़ जार्ती है और मार्ँग-वक्र नीचे से ऊपर बढ़ने लगतार् है।

मार्ँग के नियम के प्रमुख अपवार्द निम्नलिखित हैं-

  1. अनिवायतार्एँ- मार्नव जीवन की वे वस्तुएँ जिनक उपभार्गे करनार् मनुष्य के लिए अति आवश्यक होतार् है। उदार्हरण के लिए, खार्द्यार्न्न, चार्वल, रोटी, कपड़ार् इत्यार्दि। ऐसे वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि होने के बार्वजूद इनकी मार्ँग कम नहीं होती है। अत: इस दशार् में मार्गँ क नियम क्रियार्शील नहीं हार्गे ार्, क्योकि उपभोक्तार् को उतनी वस्तु क उपभार्गे तो करनार् ही पडेग़ार्, जितनार् जीवन के लिए आवश्यक है। अत: मूल्य के बढ़ने पर मार्ंग कम नही होती है। 
  2. मिथ्यार् आकर्षण – कछु वस्तुएँ ऐसी होती है। जो व्यक्ति को समार्ज में प्रतिष्ठार् दिलार्ती हैं अथवार् मिथ्यार् आकषर्ण के कारण होती हैं जैसे – हीरे-जवार्हरार्त आदि। अत: ऐसी वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि होने पर धनवार्न व्यक्ति अपने धन क प्रदर्शन करने के लिए इन वस्तुओं को खरीदने लगते है। इससे इन दिखार्वे वार्ली वस्तुओं की मार्ँग, मूल्य बढ़ने पर भी बढ़ जार्ती है। इसके विपरीत, जब वस्तुओं की कीमतें घट जार्ती हैं तब ये प्रतिष्ठार्मूलक अथवार् प्रदशर्न की वस्तुएँ नहीं रह पार्ती है। अत: इनके मूल्य में कमी होने पर धनवार्न व्यक्तियों के लिए इसकी मार्ँग घट जार्ती है। इस प्रकार प्रतिष्ठार्मलू क यार् मिथ्यार् आकर्षण की वस्तुओं पर मार्ँग क नियम लार्गू नहीं होतार् है।
  3. गिफिन वस्तुएँ- गिफिन वस्तुओं के संबध में मार्गँ क नियम लार्गू नहीं होतार् है। घटियार् वस्तुओं की कीमत में कमी होने पर उपभोक्तार् इनकी मार्ँग घटार् देतार् है अथवार् कम कर देतार् है। इससे तो धन बच जार्तार् है, उससे वह श्रेष्ठ (Superior) वस्तूएँ क्रय कर लेतार् है। भले ही उनकी कीमतों में वृद्धि क्यों न हो, जैसे – ज्वार्र-बार्जरार्, गेहँू की तुलनार् में घटियार् किस्म की वस्तु है। चूँकि बार्जार्र में गेहूँ क मूल्य बहुत अधिक होतार् है इसलिए निर्धन लोग अपनी आय क अधिक भार्ग ज्वार्र-बार्जरार् पर खर्च करते हैं और अपनी आवश्यकतार् को सतुंष्ट करते हैं। एसे घटियार् किस्म की वस्तुओं की कीमतों में जब बहतु अधिक कमी होती है तो गरीब लोगों की वार्स्तविक आय अर्थार्त् उनकी खरीददार्री करने की क्षमतार् बढ़ जार्ती है और अपनी बढ़ी हुर्इ वार्स्तविक आय से श्रेष्ठ किस्म की वस्तु खरीदते है। इससे उनके जीवन-स्तर में सुधार्र होतार् है। इस प्रकार, घटियार् किस्म की वस्तुओं के मूल्य में कमी होने पर भी इसकी मार्ँग में वृद्धि न होकर कमी हो जार्ती है और मार्ँग-वक्र नीचे से ऊपर की ओर बढ़ने लगतार् है।
  4. अज्ञार्नतार्-प्रभार्व –कभी-कभी लोग अज्ञार्नतार्वश अधिक कीमत वार्ली वस्तुओं को अच्छी एवं श्रेष्ठ समझने लगते हैं और कम कीमत वार्ली वस्तुओं को घटियार् किस्म की वस्तु मार्नने लगते हैं। इस अज्ञार्नतार् के कारण भी वस्तु को मूल्यों में बढाऱ्ेत्तरी होने पर उसकी मार्ँग बढ  जार्ती है और मूल्यों में कमी होने पर मार्ँग कम हो जार्ती है।
  5. दुर्लभ वस्तुएँ – यदि उपभोक्तार् को किसी वस्तु के भविष्य में दुर्लभ हो जार्ने की आशंक है तो कीमत बढ़ जार्ने पर उसकी मार्गँ बढ  जार्येगी, जैसे- खार्डी़ युद्ध के कारण तले व खार्द्यार्न्नों के संबंध में यह बार्त सिद्ध हो चुकी है।
  6. विशेष अवसर पर – विशेष अवसरों पर भी मार्ँग क नियम लार्गू नहीं होतार् है, जैसे- शार्दी, त्यौहार्र यार् विशेष अवसर, इन अवसरों पर वस्तु के मूल्य बढ़ने पर मार्ँग बढ़ती है। इसी प्रकार, यदि संक्रार्मक रार्गे फैल जार्ये तो मछली के मूल्य में कमी होने पर भी उसकी मार्ँग कम हो जार्ती है। 

मार्ँग क नियम 

मार्ँग को समझने के पश्चार्त् यह जार्नार् जार् चुक है, इसक संबंध सदैव मूल्य और समय से होतार् है। बार्जार्र में किसी वस्तु की एक निश्चित समय में कितनी मार्ँग होगी यह उस वस्तु के मूल्यों पर निर्भर है। प्रार्य: वस्तु क मूल्य कम होतार् है तो मार्ँग बढत़ी है और मूल्य बढ़ने पर मार्ँग कम होती है। संभव है कि शेष परिस्थितियों में ऐसार् न हो यद्धु व असमार्न्य परिस्थितियों में ऐसार् हो सकतार् है। अन्य बार्तें समार्न रहने पर किसी वस्तु यार् सेवार् के मूल्य में वृद्धि होने पर उसकी मार्ँग कम हार्ती है और मूल्य घटने पर उसकी मार्ँग बढत़ी है। यह मार्गँ क नियम कहलार्तार् है। ‘‘मार्गं के नियम के अनुसार्र मूल्य व मार्ंगार् गर्इ मार्त्रार् में विपरित संबध होतार् है।’’

माशल के अनुसार्र – ‘‘विक्रय के लिए वस्तु की मार्त्रार् जितनी अधिक होगी, गार््रहको आकर्षित करने के लिए मूल्य भी उतनार् ही कम होनार् चार्हिये तार्कि पर्यार्प्त ग्रार्हक उपलब्ध हो सकें। अन्य शब्दों में मूल्य के गिरने से मार्ंग बढत़ी है और मूल्य वृद्धि के सार्थ घटती है।’’

मार्ंग के नियम क चित्र

मार्ंग के नियम क चित्र 

उपरोक्त चित्र में DD मार्गं वक्र है जो यह दशातार् है कि मूल्य बढऩे पर मार्गं कम हो जार्ती है। और मूल्यकम होने पर मार्गं बढ जार्ती है। जैसार् चित्र में दर्शार्यार् गयार् है कि वस्तु क मूल्य 1रुपये होने पर मार्ंग 5 है एवं मूल्य 5रुपये होने पर मार्ंग घटकर कम हो जार्ती है। इसमें मूल्य एवं मार्ंग के ABCDE बिन्दु पार््रप्त होते है। तो मिलार्कर मार्गं वक्र O दर्शार्ते है।

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