महार्मनार् पं0 मदनमोहन मार्लवीय क जीवन परिचय

महार्मनार् के समय भार्रत की रार्जनीतिक-सार्मार्जिक स्थिति 

पूरी उन्नीसवीं शतार्ब्दी भार्रत में अंग्रेजी सार्म्रार्ज्य के विस्तार्र क इतिहार्स है। इस शतार्ब्दी में लगभग संपूर्ण भार्रत पर अंग्रेजो क प्रभुत्व स्थार्पित हो गयार्। देशी रियार्सतों में भी वार्स्तविक सत्तार् अंग्रेज अधिकारियों के हार्थों में ही थी। भार्रतीयों की हर प्रकार की स्वतंत्रतार् छीन ली गर्इ थी। वे हर तरह से गोरों के गुलार्म हो चुके थे।

अपने ही देश में भार्रतीय दूसरे दर्जे की प्रजार् हो चुके थे। गोरे अपने को भार्रतीयों से श्रेष्ठ प्रजार्ति मार्नते थे। अत: वे भार्रतीयों को घृणार् के भार्व से देखते थे। शहर में अंग्रेजों की बस्तियार्ं अलग थी। उनके सार्थ भार्रतीय यार्त्रार् नहीं कर सकते थे। अंग्रेजो के पाक, मनोरंजन स्थल आदि में भार्रतीय प्रवेश तक नहीं पार् सकते थे। अंग्रेजो के सार्मने भार्रतीय घोड़े यार् किसी अन्य वार्हन पर चढ़ कर नहीं जार् सकते थे।

परम्परार्गत भार्रतीय उद्योगों क अंग्रेजो ने जार्न-बूझ कर विनार्श कियार्। भार्रत से कच्चे मार्ल को इंग्लैंड ले जार्कर वे वहार्ँ से तैयार्र मार्ल भार्रत लार्कर ऊँचे दार्मों पर बेचते थे। सोने की चिड़ियार् भार्रत संसार्र के निर्धनतम देशों मे से एक होतार् गयार्।

अंग्रेजों के पूर्व रार्जार् यार् रार्जवंश के परिर्वतन से भार्रतीय कश्“ार्कों पर कोर्इ प्रभार्व नही पड़तार् थार्। वे अपनी भूमि के स्वार्मी बने रहते थे। कृषि उनके लिए केवल एक आर्थिक क्रियार्-कलार्प नहीं वरन् जीने की शैली थी। पर अंग्रेजों ने किसार्नों के शोषण के लिए नर्इ भूमि व्यवस्थार् लार्गू की। स्थार्यी बन्दोबस्त, महलवार्री एवं रैयतवार्री व्यवस्थार्ओं के द्वार्रार् भूमि पर किसार्नों क परम्परार्गत अधिकार समार्प्त कर दियार् गयार्। अब जमीन पर उसी क अधिकार थार् जो अंग्रेजी सरकार को सबसे अधिक लगार्न दे सके। खुशहार्ल भार्रतीय किसार्न दरिद्र होतार् गयार्। आश्चर्य नहीं कि अंग्रेजों के काल में अनेक दुर्भिक्ष हुए- जिनसें लार्खों किसार्नों, उनके बच्चों और औरतों की मौत हुर्इ। इतिहार्सकार विपन चन्द्र के अनुसार्र पूरार् गंगार्-यमुनार् क दोआब अकाल मृत्यु के शिकार हुए किसार्नों की हड्डियों से श्वेत हो गयार्।

शैक्षिक-सार्ंस्कृतिक क्षेत्र में भी अंग्रेज भार्रतीयों को हमेशार् के लिए मार्नसिक और बौद्धिक रूप से गुलार्म बनार्ए रखनार् चार्हते थे। वे भार्रतीयों को ‘श्वेत लोगो क बोझ’ मार्नते थे। जिसे ‘व्हार्इट मेनस् बर्डेन’ के नार्म से इतिहार्स में जार्नार् जार्तार् है। चार्ल्र्स ग्रार्ंट (1792) से लेकर लाड मैकाले (1835) तक सभी भार्रतीयों को निम्न सार्मार्जिक, सार्ंस्कृतिक और शैक्षिक स्तर के व्यक्ति मार्नते थे। मैकाले तो भार्रतीयों को स्थार्यी रूप से बौद्धिक गुलार्मी के लिए तैयार्र कर रहे थे। इन सबके विरूद्ध 1857 में भार्रतीय जनमार्नस ने अंग्रेजों के विरूद्ध क्रार्ंति की घोषणार् कर दी। पर 1857 के संघर्ष में भार्रतीय असफल रहे और अंग्रेजी सत्तार् को दी जार् रही चुनौती समार्प्त हो गर्इ।

जीवन-वृत्त 

1857 की क्रार्ंति की असफलतार् के बार्द भार्रतीय जनमार्नस निरार्श सार् हो गयार् थार्। ऐसे में 25 दिसम्बर, 1861 को तीर्थरार्ज प्रयार्ग में बार्लक मदन मोहन क जन्म हुआ। इन्होंने आगे चलकर न केवल भार्रतीय संस्कृति क संरक्षण कियार् वरन् शिक्षार् के द्वार्रार् परम्परार्गत तथार् आधुनिक ज्ञार्न-विज्ञार्न के समन्वित विकास एवं प्रसार्र से परार्धीन रार्ष्ट्र के आत्मविश्वार्स एवं स्वार्भिमार्न को बढ़ार्यार्।

मदन मोहन मार्लवीय के पितार्मह प्रेमधर जी संस्कृत के बड़े विद्वार्न थे। धर्म के प्रति उनकी बड़ी गहरी निष्ठार् थी। पितार्मह की तरह पितार्मही भी धर्मनिष्ठ और शील सम्पन्न थी। मदन मोहन के पितार् पं0 ब्रजनार्थ पं0 प्रेमधर की ही तरह धर्मनिष्ठ,जव संस्कृत के विद्वार्न तथार् रार्धार्कृष्ण के अनन्य भक्त थे। परिवार्र की आर्थिक दशार् काफी दयनीय होते हुए भी वे कभी दार्न नहीं लेते थे। मदन मोहन की मार्तार् श्रीमती मूनार् देवी जी स्वभार्व की बड़ी सरल और हृदय की बड़ी कोमल थी।

मदन मोहन पर परिवार्र की आर्थिक दशार् का, मार्तार् के शील तथार् स्नेह का, पितार् और पितार्मह के धर्म के प्रति अनुरार्ग क गहरार् प्रभार्व पड़ार्। उनक जीवन धर्मनिष्ठ, भगवद्भक्ति, दीनबन्धु समार्जसेवी के रूप में विकसित हुआ। उन्होंने अपनी पिचहत्तरवीं वर्षगार्ंठ पर कहार् ‘‘पितार्मह, पितार्मही, पितार् और मार्तार् बड़े धर्मार्त्मार्, सदार्चार्र और नि:स्वाथ ब्रार्ह्मण थे, उन्हीं के प्रसार्द से मैं इतनार् काम कर सक हूँ।’’

मदन मोहन को पार्ँच वर्ष की आयु में विद्यार्रंभ करार्यार् गयार्। उन्हें प्रार्च्य और पार्श्चार्त्य दोनों ही तरह की शिक्षार्ओं क गहराइ से अनुशीलन करने क अवसर मिलार्। पहार्ड़ार् एवं सार्मार्न्य गणित पढ़ने वे एक महार्जनी पार्ठशार्लार् में जार्ते थे। उसके उपरार्ंत उन्होंने धर्मज्ञार्नोपदेश पार्ठशार्लार् में संस्कृत, धर्म और शार्रीरिक शिक्षार् पाइ। फिर वे धर्म प्रविर्द्धनी पार्ठशार्लार् के विद्यार्थ्री बने। इस प्रकार उन्हें परम्परार्गत भार्रतीय ज्ञार्न, धर्म, दर्शन क अच्छार् अभ्यार्स हो गयार्।

सन् 1868 में प्रयार्ग में गर्वनमेण्ट हाइस्कूल खुलार्। मदन मोहन ने इसमें प्रवेश लियार्। यहार्ँ बड़े परिश्रम से अंग्रेजी की शिक्षार् ग्रहण की। सार्थ ही सार्थ वे संस्कृत क भी ज्ञार्न प्रार्प्त करते रहे। एन्ट्रेस उत्तीर्ण करने के उपरार्ंत मदन मोहन म्योर सेन्ट्रल कॉलेज में पढ़ने लगे। मार्सिक छार्त्रवृत्ति मिल जार्ने से उनक आर्थिक संकट कुछ हद तक कम हुआ। 1881 में एफ0ए0 की परीक्षार् उत्तीर्ण की और 1884 में कलकत्तार् विश्वविद्यार्लय से बी0ए0 की परीक्षार् विशेष योग्यतार् के सार्थ उत्तीर्ण की। पार्रिवार्रिक जिम्मेदार्रियों के कारण वे एम0ए0 की परीक्षार् में नही बैठ सके। उन्होंने सरकारी उच्च विद्यार्लय में पहले 40 रूपये और बार्द में 60 रू0 मार्सिक वेतन पर अध्यार्पक पद स्वीकार कर लियार्।

समार्ज सेवार् के प्रति मदन मोहन मार्लवीय की लगन छार्त्र जीवन से ही दिखती है। समार्ज सेवार् हेतु छार्त्र जीवन में ही उन्होंने ‘सार्हित्य सभार्’ एवं ‘हिन्दू समार्ज’ नार्मक संस्थार्ओं की स्थार्पनार् की थी। सरकारी नौकरी महार्मनार् को बार्ँधे नही रख सकी। तीन वर्षों तक सरकारी नौकरी में रहने के बार्द उन्होंने नौकरी छोड़ दी। 1886 में कांग्रेस के द्वितीय अधिवेशन में महार्मनार् के भार्षण ने रार्ष्ट्रीय नेतार्ओं को काफी प्रभार्वित कियार्। अब वे कालार्काँकर आकर दैनिक समार्चार्र पत्र ‘हिन्दुस्तार्न’ क सम्पार्दन करने लगे। 1887 से 1889 तक इस कार्य को सफलतार् पूर्वक कियार्। महार्मनार् की बहुमुखी प्रतिभार् इसी तथ्य से स्पष्ट है कि समार्चार्र पत्र के सम्पार्दन के सार्थ-सार्थ उन्होंने वकालत की पढ़ाइ जार्री रखी। 1891 में वकालत की परीक्षार् उत्तीर्ण कर आप इलार्हार्बार्द उच्च न्यार्यार्लय में वकालत करने लगे।

अधिवक्तार् के रूप में महार्मनार् को बहुत अधिक सफलतार् मिली और उनकी ख्यार्ति चार्रों ओर फैल गर्इ। अब उनक सार्मार्जिक-रार्जनीतिक कार्य क्षेत्र काफी विस्तृत हो गयार् थार्। वे देश को रार्जनीतिक नेतृत्व देने के लिए तैयार्र थे। 1909 और 1918 में वे कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। इस प्रकार वे देश के अग्रणी नेतार् के रूप में कांग्रेस और देश को नेतृत्व प्रदार्न करते रहे। महार्मनार् मूलत: एक शिक्षार्विद् और एक अध्यार्पक थे। भार्रत रार्ष्ट्र की नींव को मजबूत करने हेतु वे शिक्षार् क प्रचार्र-प्रसार्र चार्हते थे। इसी सपने को सार्कार करने के लिए 4 फरवरी, 1916 को विद्यार् की नगरी बनार्रस में उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यार्लय की स्थार्पनार् की। जीवन पर्यन्त वे देश, समार्ज और रार्ष्ट्र की सेवार् करते रहे। अन्तत: 12 नवम्बर, 1946 सूर्य के अवसार्न बेलार् में इस महार्मार्नव क देहार्वसार्न हो गयार्।

जीवन-दृष्टि 

महार्मनार् की जीवन-दृष्टि के दो आधार्र थे: र्इश्वर भक्ति और देश भक्ति। इन दोनों क उत्कृष्ट संश्लेषण, र्इश्वरभक्ति क देशभक्ति में अवतरण तथार् देशभक्ति की र्इश्वरभक्ति में परिपक्वतार् उनकी जीवन-दृष्टि क विशेष पक्ष थार्। महार्मनार् क विश्वार्स थार् कि मनुष्य के पशुत्व को र्इश्वरत्व में परिणत करनार् ही धर्म है।

महार्मनार् सच्चो अर्थों में तपस्वी थे। सार्त्विक तप के सार्रे पक्ष उनमें विद्यमार्न थे। श्रीमद्भगवतगीतार् में वर्णित कायिक, वार्चिक और मार्नसिक तप के वे सार्धक थे। काम-क्रोध-लोभ-मोह से स्वंय को बचार्नार्, सदार् शुद्ध संकल्पयुक्त रहनार्, विषयवृत्ति पर विजय प्रार्प्त करनार्, व्यवहार्र में छल-कपट से अपने को दूर रखनार् उनक मार्नसिक तप थार्। असत्य, दु:खदार्यी, अप्रिय और खोटे वचनों क त्यार्ग; तथार् प्रिय, सत्य, मधुर शब्दों क प्रयोग उनक वार्चिक तप थार्।

दूसरों की सहार्यतार् करनार्, समार्ज की सेवार् करनार्, देश और जार्ति के लिए अपने शरीर को होने वार्ले कष्टों की परवार्ह न करनार् उनक शार्रीरिक तप थार्। महार्मनार् प्रखर रार्ष्ट्रवार्दी और उच्चकोटि के देशभक्त थे। देश की स्वतंत्रतार्, रार्ष्ट्र के गौरव की वृद्धि, तथार् जनतार् की सर्वार्गींण उन्नति उनकी देश सेवार् के मुख्य लक्ष्य थे। वे जार्ति, भार्षार्, सम्प्रदार्य, क्षेत्र के आधार्र पर भार्रतीयों के मध्य बढ़ते दुरार्व को समार्प्त कर भार्रत को एक शक्तिशार्ली रार्ष्ट्र और संप्रभु देश के रूप में देखनार् चार्हते थे।

महार्मनार् क कार्यक्षेत्र अत्यन्त ही विस्तृत और व्यार्पक थार्। समार्जसेवार् क शार्यद ही ऐसार् कोर्इ पक्ष हो जो उनके कार्य परिधि में न आयार् हो। सनार्तन धर्म क प्रचार्र, प्रार्चीन भार्रतीय संस्कृति क उत्थार्न, हिन्दू हितों की रक्षार्, हिन्दी क प्रचार्र, गौमार्तार् की सेवार्, सार्मार्जिक कुरीतियों क विरोध, स्वंय सेवकों क संगठन, ज्ञार्न-विज्ञार्न की विभिन्न शार्खार्ओं की वृद्धि, शिक्षार् क विस्तार्र, मल्ल-शार्लार्ओं क उद्घार्टन, वंचितों के कष्टों क निवार्रण, हरिजनों क उत्थार्न, लोकतार्ंत्रिक मर्यार्दार्ओं की प्रतिष्ठार्, रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् क विकास, प्रगतिशील सिद्धार्न्तों क प्रतिपार्दन, देश-काल के अनुकूल संस्कृति क विकास आदि सभी क्षेत्रों में उनक योगदार्न अत्यधिक महत्वपूर्ण है।

महार्मनार् आदर्शवार्दी विचार्रक 

महार्मनार् के आर्दशवार्दी विचार्रक एवं शिक्षार्शार्स्त्री होने में कोर्इ सन्देह नहीं है। वे शिक्षार् को अध्यार्त्म से अलग नही करते थे। उन्हें सनार्तन यार् शार्श्वत जीवन मूल्यों पर पूर्ण विश्वार्स थार्। सत्य को उन्होंने कभी भी परिवर्तनशील नहीं मार्नार्। महार्मनार् ऐसी शिक्षार् के पक्षपार्ती थे जो विद्यार्थ्री में आत्म-अनुशार्सन की भार्वनार् बढ़ार्ये तथार् व्यक्तित्व क सर्वार्गींण विकास करे। महार्मनार् चार्हते थे कि विद्यार्थ्री में नैतिकतार्, मार्नवतार्, दृढ़ संकल्प, नि:स्वाथ सेवार् के गुण हों। वे उच्च चरित्र को अत्यधिक महत्व प्रदार्न करते थे। महार्मनार् क स्पष्ट मत थार् कि जो व्यक्ति अपने धर्म में विश्वार्स करेगार्, धर्म के माग क अनुसरण करेगार् उसमें मार्नवतार् होगी और वह स्वयं तथार् समार्ज के लिए उत्तरदार्यी होगार्। महार्मनार् मार्लवीय में ये सार्रे गुण थे।

सनार्तन धर्म क उपार्सक 

महार्मनार् सनार्तन धर्मार्वलम्बी थे। सनार्तन धर्म क अर्थ है: शार्श्वत धर्म यार् शार्श्वत नियम। इनक आधार्र मार्नव जार्ति क प्रार्चीनतम ग्रंथ वेद है। वे सनार्तन यार् हिन्दू धर्म के प्रबल समर्थक थे। परन्तु महार्मनार् ने हिन्दू धर्म को संकीर्ण रूप में नहीं देखार्। सनार्तन धर्म के मूलभूत सिद्धार्न्तों की उनकी व्यार्ख्यार् निश्चय ही बहुत उदार्र थी। उनके अनुसार्र मार्नवतार् की भार्वनार्, सावभौमिक प्रेम तथार् मार्नवमार्त्र के प्रति उनकी गहरी निष्ठार् ने संभवत: उन्हें उस हद सार्मार्जिक सुधार्र करने से रोक जिस हद तक वे सक्षम थे।

निस्वाथ सेवार् भार्व 

महार्मनार् व्यक्ति को समष्टि क अंग मार्नते थे और नि:स्वाथ सेवार् द्वार्रार् जीवन में समष्टि को आत्मसार्त करनार् मार्नव क पुनीत कर्त्तव्य मार्नते थे। उनक जीवन समार्जिकतार् से ओत प्रोत थार्। महार्मनार् सच्चे अर्थों में युगपुरूष थे। उन्होंने देश की आवश्यकतार्ओं तथार् जनतार् के कष्टों को अपने जीवन में आत्मसार्त कर जनतार् की आकांक्षार्ओं की पूर्ति में तथार् देश के गौरव की वृद्धि में अपनार् सार्रार् जीवन लगार् दियार्। उनक त्यार्ग और सेवार् भार्व उनके समकालीन रार्जनेतार्ओं के लिए एक उदार्हरण थार्। गोपार्ल कृष्ण गोखले ने महार्मनार् के संदर्भ में कहार् ‘‘त्यार्ग तो मार्लवीय जी महार्रार्ज क है। वे निर्धन परिवार्र में उत्पन्न हुए और बढ़ते-बढ़ते प्रसिद्ध वकील होकर सहस्त्रों रूपयार् मार्सिक कमार्ने लगे। उन्होंने वैभव क स्वार्द लियार् और जब हृदय से मार्तृभूमि की सेवार् की पुकार उठी, तो उन्होंने सब कुछ त्यार्ग कर पुन: निर्धनतार् स्वीकार कर ली।’’

स्वदेशी आन्दोलन 

महार्मनार् क मार्ननार् थार् कि स्वदेशी आन्दोलन को बल प्रदार्न करनार् भार्रतवार्सियों क धामिक कर्त्तव्य हैं। वे कहते थे कि स्वदेशी ही देश के आर्थिक संकटों के निवार्रण क एकमार्त्र सार्धन है। इसके मूल में दुर्भार्वनार् अथवार् घृणार् नहीं है और न इसमें रार्जनीतिक विद्वेष है। देश की निर्धनतार् को कम करने तथार् देशवार्सियों को रोजगार्र और भोजन देने के लिए स्वदेशी ही अंगीकार करनार् भार्रतवार्सियों क धामिक कर्त्तव्य है।

रार्ष्ट्रीय पुनर्निमार्ण क कार्यक्रम 

महार्मनार् ने रार्ष्ट्रीय पुनर्निमार्ण के लिए व्यार्पक सिद्धार्न्त क प्रतिपार्दन कियार्। उनक कहनार् थार् कि देश के नैतिक, बौद्धिक और आर्थिक सार्धनों क परिवर्धन करने के लिए रार्जनीतिक सुधार्रों के आन्दोलन के अतिरिक्त लोगों में लोक कल्यार्ण और लोक सेवार् की भार्वनार् उत्पन्न करनार् आवश्यक है। देश के विकास के लिए शैक्षिक तथार् औद्योगिक कार्यकलार्प आवश्यक है। उन्होंने औद्योगिक आयोग (1916-18) के समक्ष अपने प्रतिवेदन में कहार् कि यथोचित आधार्र पर उद्योगों के लिए आवश्यक पूँजी देश में जमार् की जार् सकती है। महार्मनार् चार्हते थे कि देश के रार्जनीतिक पुनर्निमाण और प्रगति के लिए धामिक उत्सार्ह और समर्पण की भार्वनार् से काम करनार् आवश्यक है। गुरू गोविन्द सिंह ने जिस भक्ति भार्वनार् से अपनार् काम कियार् और अपने अनुयार्यियों के सार्थ समार्नतार् क जो व्यवहार्र कियार् उससे महार्मनार् अत्यधिक प्रभार्वित थे।

जनतंत्र मे आस्थार् 

महार्मनार् को र्इश्वर की सर्वव्यार्पकतार् में अटूट विश्वार्स थार्। उन्होंने भार्रत में सर्वत्र स्वतंत्रतार्, समार्नतार् तथार् न्यार्य के सिद्धार्न्तों को अपनार्ये जार्ने पर बल दियार्। 1918 में दिल्ली कांग्रेस में अपने अध्यक्षीय भार्षण में उन्होंने इस तथ्य पर जोर देते हुए कहार् ‘‘मेरार् निवेदन है कि आप अपनी पूरी शक्ति के सार्थ इस बार्त की मार्ँग करने क संकल्प लें कि अपने देश में आपको भी विकास की वे ही सुविधार्यें मिले जो इंग्लैंड में अंग्रेजो को मिली है। यदि आप इतनार् संकल्प कर लें और अपनी जनतार् में स्वतंत्रतार्, समार्नतार् तथार् बंधुत्व के सिद्धार्न्तों को फैलार्यें तथार् प्रत्येक को यह अनुभव करने दें कि उसमें भी वही र्इश्वरीय प्रकाश की किरण विद्यमार्न है, जो उच्च से उच्च स्थिति के व्यक्ति में विद्यमार्न है… तो निश्चय समझिए कि आपने अपने भविष्य क निर्णय स्वंय कर लियार् है।’’

हिन्दी आन्दोलन के प्रणेतार् 

महार्मनार् के समय सर्वत्र अंग्रेजी क वर्चस्व थार्। शिक्षार् क मार्ध्यम, विशेष रूप से उच्च शिक्षार् का, अंग्रेजी थार्। उच्च न्यार्यार्लयों में जहार्ँ अंग्रेजी भार्षार् में ही सार्रे कार्यों क सम्पार्दन होतार् थार्, वहीं निम्नस्तरीय न्यार्यार्लयों में उर्दू भार्षार् को यह गौरव प्रार्प्त थार्। इस तरह हिन्दी अपने ही देश में पूर्णत: उपेक्षित थी। महार्मनार् हिन्दी को उसक उचित स्थार्न दिलार्ने के लिए जीवन पर्यन्त आन्दोलनरत रहे। इन सबक चरम 2 माच, सन् 1898 क स्मृतिपत्र थार् जो उन्होंने संयुक्त प्रार्ंत (वर्तमार्न उत्तर प्रदेश) के गर्वनर सर एण्टनी मैकडार्नल को सौंपार्। इसमें इन्होनें आँकड़ों एवं आधिकारिक विद्वार्नों की उक्तियों के सहार्रे हिन्दी को उसक उचित स्थार्न देने क आग्रह करते हुए कहार् ‘‘पश्चिमोत्तर प्रार्ंत तथार् अवध (वर्तमार्न उत्तर प्रदेश) की जनतार् में शिक्षार् क प्रसार्र करनार् आवश्यक है। गुरूत्तर प्रमार्णों से यह सिद्ध कियार् जार् चुक है कि इस कार्य में तभी सफलतार् प्रार्प्त होगी जब कचहरियों और सरकारी कार्यार्लयों में नार्गरी अक्षरों क प्रयोग कियार् जार्ने लगेगार्। अत: इस शुभ कार्य में जरार्-सार् भी विलम्ब नही होनार् चार्हिए और न रार्ज्य कर्मचार्रियों तथार् अन्य लोगों के विरोध पर ही ध्यार्न देनार् चार्हिए। हमें आशार् है कि बुद्धिमार्न और दूरदश्र्ार्ी शार्सक जिनके प्रबल प्रतार्प से लार्खों जीवों ने इस घोर अकाल रूपी काल से रक्षार् पाइ है, अब नार्गरी अक्षरों को जार्री करके इन लोगों की भार्वी उन्नति और वृद्धि के बीज बोएँगे और विद्यार् के सुखकर प्रभार्व के अवरोधों को अपनी क्षमतार् से दूर करेंगे।’’ अत: 1900 र्इ0 में कचहरियों की भार्षार् हिन्दी भी कर दी गर्इ। यह महार्मनार् और उनके सहयोगियों की महार्न सफलतार् थी। अब हिन्दी भार्षार् और नार्गरी में बड़ी संख्यार् में विद्यार्थ्री शिक्षार् ग्रहण करने लगे।

महार्मनार् आजीवन हिन्दी क प्रचार्र-प्रसार्र करते रहे। वे 1884 में ही हिन्दी उद्धार्रिणी प्रतिनिधि सभार् के सक्रिय सदस्य बनें जो बार्द में नार्गरी प्रवर्धन सभार् कहलार्यी। 10 अक्टूबर, 1910 को मार्लवीय जी की अध्यक्षतार् में हिन्दी सार्हित्य सम्मेलन क पहलार् अधिवेशन हुआ। महार्मनार् और रार्जर्षि पुरूषोत्तम दार्स टंडन के नेतृत्व में हिन्दी सार्हित्य सम्मेलन ने हिन्दी और नार्गरी के प्रचार्र हेतु भगीरथ प्रयार्स किये।

महार्मनार् हिन्दी को शिक्षार् क सशक्त मार्ध्यम बनार्नार् चार्हते थे। इसके लिए उन्होंने हिन्दी भार्षार् में उच्चस्तरीय पार्ठ्य पुस्तकों की रचनार् करने और अन्य भार्षार्ओं की अच्छी पुस्तकों क हिन्दी में अनुवार्द करने पर जोर दियार्। उन्हीं के शब्दो में ‘‘जो स्कूल-कालेज स्थार्पित किए गए है, उनमें लड़के हिन्दी पढ़ें। यूरोपीय इतिहार्स, काव्य, कलार्-कौशल आदि की पुस्तकें हिन्दी में अनुवार्दित हों। हिन्दी में उपयोगी पुस्तकों की संख्यार् बढ़ाइ जार्ये। सरकार ने हिन्दी जार्री कर दी है। अब हमें चार्हिए, हम हिन्दी की उत्तमोत्तम पार्ठ्य-पुस्तकें तैयार्र करें।’’

अपने वचनों के अनुरूप ही महार्मनार् ने हिन्दी के विकास के लिए अनवरत कार्य कियार्। उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यार्लय में हिन्दी एवं संस्कृत के पठन-पार्ठन की उत्तम व्यवस्थार् की। हिन्दी के अनेक गणमार्न्य विद्वार्न एवं रचनार्कार यथार् श्यार्मसुन्दर दार्स, आचाय रार्मचन्द्र शुक्ल, अयोध्यार् सिंह उपार्ध् यार्य ‘हरिऔध’, आचाय हजार्री प्रसार्द द्विवेदी ने काशी हिन्दू विश्वविद्यार्लय में हिन्दी क अध्यार्पन कर अपने को धन्य मार्नार्।

पत्रकारितार् के भी मार्ध्यम से महार्मनार् हिन्दी क अनवरत विकास करते रहे। वे हिन्दी के प्रथम दैनिक समार्चार्र पत्र हिन्दुस्तार्न के सम्पार्दक रहे। इसमें पं0 प्रतार्प नार्रार्यण मिश्र एवं बार्लमुकुन्द गुप्त उनके सहयोगी थे। 1908 में उन्होंने ‘अभ्युदय’ नार्मक सप्तार्हिक पत्र निकालार् जो क्रार्ंति के संदेश क वार्हक थार्। इसके अतिरिक्त अनेक पत्र-पत्रिकाओं जैसे- मर्यार्दार्, अभ्युदय, सनार्तन धर्म, गोपार्ल आदि के प्रेरणार्स्रोत महार्मनार् ही थे।

शिक्षार् सिद्धार्न्त 

महार्मनार् सही अर्थों में शिक्षार् को सर्वार्धिक प्रभार्वशार्ली शक्ति मार्नते थे। वे भार्रत के सार्ंस्कृतिक-सार्मार्जिक और रार्जनीतिक-आर्थिक परार्भव क कारण भार्रतीयों की निरक्षरतार् एवं अशिक्षार् को मार्नते थे। उनक कहनार् थार् कि ‘‘यदि देश क अभ्युदय चार्हते हो तो सब प्रकार से यत्न करो कि देश में कोर्इ बार्लक यार् बार्लिक निरक्षर न रहे।’’ उनके अनुसार्र देश की दुर्दशार् को समार्प्त करने क एकमार्त्र सार्धन सार्क्षरतार् एवं शिक्षार् है। अत: उन्होंने अपने जीवन के अधिक महत्वपूर्ण भार्ग को शिक्षार् में लगार्यार्।

महार्मनार् शिक्षार् को मार्नव-जीवन के सर्वार्गींण विकास क सार्धन मार्नते थे। उनकी दृष्टि में शिक्षार् वह है जो विद्यार्थ्री की शार्रीरिक, बौद्धिक तथार् भार्वार्त्मक शक्तियों को परिपुष्ट और विकसित कर सके तथार् भविष्य में किसी व्यवसार्य द्वार्रार् र्इमार्नदार्री से जीवन-निर्वार्ह करने के योग्य बनार् सके। महार्मनार् शिक्षार् के द्वार्रार् युवार् वर्ग को कलार्त्मक और सौन्दर्यपूर्ण जीवन के लिए तैयार्र करनार् चार्हते थे। वे शिक्षार् को रार्ष्ट्रप्रेम जार्गृत करने वार्ली शक्ति बनार्नार् चार्हते थे तार्कि नर्इ पीढ़ी निस्वाथ भार्व से समार्ज एवं रार्ष्ट्र की सेवार् कर सके।

मदन मोहन मार्लवीय शिक्षार् को मार्नव मार्त्र क अधिकार मार्नते थे तथार् इसक समुचित प्रबन्ध करनार् रार्ज्य क कर्त्तव्य मार्नते थे। वे शिक्षार् की एक ऐसी रार्ष्ट्रीय प्रणार्ली विकसित होते देखनार् चार्हते थे जिसमें प्रार्रम्भिक और मार्ध्यमिक विद्यार्लयों में शिक्षार् नि:शुल्क हो। वे कहते थे ‘‘सब स्तर पर शिक्षार् क ऐसार् प्रबन्ध हो कि कोर्इ बच्चार् निर्धन होने के कारण उससे वंचित न रह पार्ये।’’ उनक मार्ननार् थार् कि शिक्षार् के व्यार्पक विस्तार्र से सार्मार्जिक कुरीतियों और आर्थिक विषमतार्ओं को दूर कियार् जार् सकतार् है।

महार्मनार् पुरूषों की शिक्षार् से अधिक महत्वपूर्ण स्त्रियों की शिक्षार् को मार्नते थे। इसक कारण यह है कि वे ही देश की भार्वी संतार्न की मार्तार्ंए हैं। उनकी इच्छार् थी कि रार्ष्ट्रीय कार्यक्रम के आधार्र पर स्त्रियों को इस तरह शिक्षित कियार् जार्ये कि उनमें प्रार्चीन तथार् आधुनिक संस्कृतियों के बेहतर पक्षों क समन्वय हो। वे नार्रियों को इतनार् सबल बनार्नार् चार्हते थे कि वे भार्रत के पुनर्निमार्ण में वे महत्वपूर्ण भूमिक निभार् सकें।

शिक्षार् क उद्देश्य 

महार्मनार् को शिक्षार् में वह शक्ति दिखती थी जो व्यक्ति, समार्ज और रार्ष्ट्र तीनों के विकास के लिए आवश्यक है। इसके लिए उन्होंने शिक्षार् के व्यार्पक उद्देश्य निर्धार्रित किए।

  1. व्यक्तित्व क सर्वार्गींण विकास- महार्मनार् शिक्षार् के द्वार्रार् सम्पूर्ण व्यक्तित्व क विकास चार्हते थे। केवल बौद्धिक विकास को वे अर्थहीन मार्नते थे। विद्यार्थ्री के बौद्धिक, शार्रीरिक, मार्नसिक एवं भार्वार्त्मक पक्षों के समन्वित विकास को महार्मनार् ने शिक्षार् क परम लक्ष्य मार्नार्।
  2. शार्रीरिक विकास- महार्मनार् क मार्ननार् थार् कि दुर्बल शरीर वार्ले व्यक्ति सबल रार्ष्ट्र क निर्मार्ण नहीं कर सकते। उनके अनुसार्र शिक्षार् व्यवस्थार् क एक महत्वपूर्ण उद्देश्य शार्रीरिक विकास है। ‘मेरार् बचपन’ नार्मक लेख में महार्मनार् ने लिखार् ‘‘स्वार्स्थ्य के तीन खम्भे हैं- आहार्र, शयन और ब्रह्मचर्य। तीनों की युक्तिपूर्वक सेवन करने से स्वार्स्थ्य अच्छार् रहेगार्।’’ वे चार्हते थे कि प्रत्येक विद्यार्थ्री पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य क पार्लन करे तथार् प्रतिदिन नियम से व्यार्यार्म करे। उनक मार्ननार् थार् कि ब्रह्मचर्य ही व्यक्ति को आत्मबल देतार् है, जिसके द्वार्रार् व्यक्ति संसार्र में सब कष्टों और कठिनाइयों क सार्हस के सार्थ सार्मनार् कर सकतार् है।
  3. चरित्र गठन हेतु शिक्षार्- महार्मनार् की दृष्टि में चरित्र गठन शिक्षार् क सर्वप्रमुख उद्देश्य है। विनम्रतार् विहीन ज्ञार्न, उनकी दृष्टि में निरर्थक है। वे व्यक्ति के उत्कर्ष और रार्ष्ट्र की उन्नति के लिए उज्ज्वल चरित्र को बौद्धिक तथार् व्यवसार्यिक विकास से कहीं अधिक महत्वपूर्ण मार्नते थे। उनके अनुसार्र सदार्चार्र मनुष्य क परमधर्म है, उसक पार्लन मनुष्य क पुनीत कर्तव्य तथार् उसकी वृद्धि उसक पुरूषाथ है।
  4. रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् क विकास- महार्मनार् मार्लवीय ने शिक्षार् के एक महत्वपूर्ण उद्देश्य रार्ष्ट्रभक्ति की भार्वनार् क विकास बतार्यार्। उनके अनुसार्र शिक्षित व्यक्ति को रार्ष्ट्र के प्रति नि:स्वाथ भक्ति भार्व रखनार् चार्हिए। उन्होंने कहार् ‘‘यह भार्रत हमार्रार् देश है। सभी बार्तों के विचार्र से इसके समार्न संसार्र में कोर्इ दूसरार् देश नहीं है। हमको इस बार्त के लिए कृतज्ञ और गौरवार्न्वित होनार् चार्हिए कि उस कृपार्लु परमेश्वर ने हमें इस पवित्र देश में पैदार् कियार्।’’ महार्मनार् ने भार्रतीय रार्ष्ट्रीयतार् क आधार्र ‘हिन्दुत्व’ मार्नार्। अत: वे हिन्दुत्व पर आधार्रित रार्ष्ट्रभक्ति की शिक्षार् क उद्देश्य बनार्नार् चार्हते थे। यहार्ँ यह तथ्य उल्लेखनीय है कि महार्मनार् की ‘हिन्दू’ की धार्रणार् बड़ी व्यार्पक थी। भार्रत के सभी निवार्सियों को वे हिन्दू मार्नते थे। वस्तुत: हिन्दुत्व को वे एक श्रेष्ठ जीवन शैली के रूप में देखते थे। वे हिन्दुत्व पर आधार्रित भार्रतीय संस्कृति क हर तरह से विकास करनार् चार्हते थे।
  5. सेवार् भार्वनार् क विकास- महार्मनार् की दृष्टि में सेवार् से बड़ार् कोर्इ धर्म नहीं है। वे सभी जीवों में र्इश्वर क अंश देखते थे। उनक मार्ननार् थार् कि पीड़ित, वंचित, दुखी व्यक्ति की सेवार् वस्तुत: ब्रह्म प्रार्प्ति क सबसे उपयुक्त सार्धन है। वे विद्यार्थ्री में सेवार् एवं सदार्चार्र क भार्व प्रार्रम्भ से ही विकसित करनार् चार्हते थे। इस प्रकार महार्मनार् मदन मोहन मार्लवीय ने शिक्षार् क अत्यन्त ही विस्तृत उद्देश्य रखार्। वे शिक्षार् द्वार्रार् रार्ष्ट्रभक्त, सदार्चार्री, चरित्रवार्न, स्वार्वलम्बी भार्रतीय नार्गरिक क निर्मार्ण करनार् चार्हते थे।

पार्ठ्यक्रम 

पार्ठ्यक्रम क निर्मार्ण शैक्षिक आदर्शों और उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कियार् जार्तार् है। पार्ठ्यक्रम से ही इस तथ्य क निर्धार्रण होतार् है कि किस स्तर पर किस चीज की शिक्षार् देनी है। पार्ठ्यक्रम कोर्इ निर्धार्रित वस्तु नही है जो हर समय हर स्थार्न पर एक जैसी रहे। हर समार्ज और देश अपनी आवश्यकतार्नुसार्र पार्ठ्यक्रम निर्धार्रित करतार् है। अर्थार्त् देश, काल और परिस्थिति के अनुसार्र पार्ठ्यक्रम क निर्मार्ण होतार् है और नर्इ परिस्थितियों में पार्ठ्यक्रम में संशोधन और परिमाजन होतार् रहतार् है।

महार्मनार् ने यह महसूस कियार् कि संकुचित पार्ठ्यक्रम द्वार्रार् रार्ष्ट्रीय उद्देश्यों को प्रार्प्त नहीं कियार् जार् सकतार् है। अत: उन्होंने बनार्रस हिन्दू विश्वविद्यार्लय में अत्यन्त ही लचीले पार्ठ्यक्रम को अपनार्यार्। महार्मनार् ने अपने विश्वविद्यार्लय में प्रार्चीन से लेकर अर्वार्चीन- सभी उपयोगी विषयों को स्थार्न देने क प्रयार्स कियार्। महार्मनार् देश के विकास हेतु विज्ञार्न की शिक्षार् आवश्यक मार्नते थे, अत: उन्होंने आधुनिक विज्ञार्न की शिक्षार् पर जोर दियार्।

व्यक्ति आत्मनिर्भर बने अत: बुनाइ, रंगाइ, धुलाइ, धार्तुकर्म, काष्ठ-कलार्, मीनार्कारी आदि की शिक्षार् पर मार्लवीय ने बल दियार्। भार्रत एक कृषि प्रधार्न देश है अत: महार्मनार् ने इस ओर विशेष ध्यार्न देते हुए कृषि के आधुनिकतम उपकरणों के प्रयोग की शिक्षार् की उच्चतम व्यवस्थार् की। वे चार्हते थे कि मार्ध् यमिक स्तर पर कृषि सम्बन्धी शिक्षार् दी जार्ये तथार् उच्च स्तर पर भी इस विषय में अनुसन्धार्न किये जार्ये।

इसके सार्थ-सार्थ महार्मनार् ने चिकित्सार् विज्ञार्न, आयुर्वेद, नक्षत्र विज्ञार्न, भार्षार् आदि सभी की शिक्षार् पर जोर दियार् जिससे विद्यार्थ्री अपनी रूचि के अनुसार्र शिक्षार् प्रार्प्त कर सके। महार्मनार् ने वस्तुत: बनार्रस हिन्दू विश्वविद्यार्लय को प्रार्चीन एवं नवीन ज्ञार्न क संगम स्थल बनार् दियार्। प्रार्चीन भार्रतीय आयुर्वेद के सार्थ आधुनिक शल्यशार्स्त्र क मेल, आयुर्वेदिक औषधियों क वैज्ञार्निक परीक्षण तथार् उन पर अनुसन्धार्न, विभिन्न विषयों पर प्रार्च्य और पार्श्चार्त्य ज्ञार्न क तुलनार्त्मक और समन्वयार्त्मक अध्ययन, प्रार्चीन भार्रतीय संस्कृति, दर्शनशार्स्त्र, सार्हित्य और इतिहार्स के गम्भीर अध्ययन-अध्यार्पन, वेद-वेदार्ंग तथार् संस्कृत सार्हित्य की शिक्षार् के अतिरिक्त आधुनिक ज्ञार्न-विज्ञार्न, धार्तु विज्ञार्न, खनन कार्य, इंजीनियरिंग तथार् कृषि विज्ञार्न क अध्ययन इसकी विशेषतार् थी।

महार्मनार् मार्लवीय चार्हते थे कि विद्यार्लय में संगीत, काव्य, नार्ट्यकलार्, चित्रकलार्, मूर्तिकलार्, वार्स्तुकलार् आदि ललितकलार्ओं की शिक्षार् क प्रबन्ध हो। उनके विचार्र में कलार् विहीन जीवन शुष्क और नीरस होतार् है, जबकि ललितकलार्ओं क ज्ञार्न उनको परखने की क्षमतार् तथार् शुद्ध भार्वनार्ओं के सार्थ उनके प्रति अभिरूचि और उनक सम्यक अभ्यार्स जीवन को सरस और आनन्दमय बनार्तार् है।

महार्मनार् के अनुसार्र धामिक शिक्षार् ही चरित्र निर्मार्ण क आधार्र है। अत: वे शिक्षार् में धर्म को उचित स्थार्न देनार् चार्हते थे। पर धर्म क उनक संप्रत्यय अत्यन्त ही उदार्र थार्। वे धामिक असहिष्णुतार् के विरूद्ध थे। जिस धर्म की शिक्षार् वे देनार् चार्हते थे उसके संदर्भ में वे कहते हैं ‘‘धर्म यह है कि प्रार्णी को प्रार्णी के सार्थ सहार्नुभूति हो, एक-दूसरे को अच्छी अवस्थार् में रखकर प्रसन्न हों और गिरी हुर्इ अवस्थार् में सहार्यतार् दें।’’

अध्यार्पकों एवं छार्त्रों के कर्तव्य 

वे विश्वविद्यार्लय के मार्ध्यम से काशी को सरस्वती की अमरार्वती बनार् देने क पार्वन उद्देश्य रखते थे। इस उद्देश्य की प्रार्प्ति के लिए उन्होंने अध्यार्पकों के कर्तव्य बतार्ये-

  1. धर्म और शार्स्त्र क पार्लन करेंगे।
  2. सदार्चार्री रहेंगे 
  3. देश सेवार् के कार्यों में रत रहेंगे। 
  4. विद्यार्थ्री के सर्वार्ंगिण विकास हेतु हर संभव प्रयार्स करेंगे। 

छार्त्रों को कार्यों हेतु निर्देश दिये गये-

  1. व्यार्यार्म करके शरीर को बलशार्ली बनार्यें।
  2. पहले स्वार्स्थ्य सुधार्रें फिर विद्यार् पढ़ें। 
  3. शार्म को खेलें, मैदार्न में विचरें। 
  4. जल्दी भोजन करें और नियम से नित्य अध्ययन करें।
  5. धामिक उत्सवों, एकादशी कथार् तथार् गीतार् प्रवचनों आदि में उपस्थित रहें। 
  6. अपनी रक्षार् आप करें। 
  7. समय के पार्बन्द बनें और इसे नष्ट न करें। 

महार्मनार् अध्यार्पकों में उच्च चरित्र देखनार् चार्हते थे तार्कि छार्त्र उनसे प्रेरणार् ग्रहण कर स्वंय चरित्रवार्न, सदार्चार्री और समार्जसेवी बन सके। इसी उद्देश्य से विश्वविद्यार्लय को आवार्सीय बनार्यार् गयार्।

इस प्रकार महार्मनार् अध्यार्पक एवं विद्यार्थ्री दोनों से ही उत्तम चरित्र और श्रेष्ठ व्यवहार्र की आशार् रखते थे।

महार्मनार् द्वार्रार् स्थार्पित शैक्षिक संस्थार्यें 

महार्मनार् मदन मोहन मार्लवीय शिक्षार् को रार्ष्ट्र की उन्नति क अमोघ अस्त्र मार्नते थे। अत: उन्होंने शैक्षिक संस्थार्ओं की स्थार्पनार् अपने जीवन क महत्वपूर्ण लक्ष्य बनार्यार्। इसके लिए वे किसी से भी दार्न लेने में संकोच नही करते थे, पर दार्न के धन को शैक्षिक संस्थार्ओं की स्थार्पनार् और विकास पर ही लगार्ते थे, व्यक्तिगत कार्यों हेतु नहीं। उन्होंने निम्नलिखित प्रमुख शैक्षिक संस्थार्ओं क निर्मार्ण करार्यार्-

हिन्दू बोर्डिंग हार्उस 

महार्मनार् उचित शिक्षार् हेतु छार्त्रार्वार्स के महत्व को समझते थे। अत: उन्होंने 1901 में इलार्हार्बार्द विश्वविद्यार्लय के म्योर सेन्ट्रल कॉलेज के लिए 230 कमरों क एक विशार्ल छार्त्रार्वार्स क निर्मार्ण करार्यार्। यह छार्त्रार्वार्स 1903 में बनकर तैयार्र हुआ। इसके निर्मार्ण में ढ़ाइ लार्ख से अधिक रूपये खर्च हुए थे, जिसमें एक लार्ख रूपये की रार्शि उन्हें प्रार्न्तीय सरकार से मिली थी, शेष रार्शि उन्होंने चन्दार् से इकट्ठार् कियार्। प्रार्रम्भ में इस छार्त्रार्वार्स क नार्म ‘मैकडोनल हिन्दू बोर्डिंग हार्उस’ रखार् गयार् पर महार्मनार् के देहार्वसार्न के उपरार्ंत इसक नार्म बदलकर मार्लवीय हिन्दू बोर्डिंग हार्उस कर दियार् गयार्।

गौरी पार्ठशार्लार् 

महार्मनार् सार्रे समार्ज की उन्नति के लिए नार्री शिक्षार् को आवश्यक मार्नते थे। वे देश सेवार् के लिए नार्री को भी उतनार् ही महत्वपूर्ण मार्नते थे जितनार् पुरूष को। वे तेजस्वी और सुशील मार्तार्ंए चार्हते थे।

महार्मनार् छार्त्रार्ओं के शार्रीरिक और मार्नसिक स्वार्स्थ्य और चरित्र गठन पर पढ़ाइ से कम जोर नहीं देते थे। वे कहते थे ‘‘वही (चरित्र) तो स्त्री-शिक्षार् क पार्वन स्रोत है। स्रोत कलुषित होने से शिक्षार् विकृत होकर हार्नि पहुँचार्ती है।’’ सन् 1904 में मार्लवीय जी ने रार्जर्षि पुरूषोत्तम दार्स टंडन और बार्लकृष्ण भट्ट के सहयोग से गौरी पार्ठशार्लार् की स्थार्पनार् की। यह आजकल उच्चतर मार्ध्यमिक महार्विद्यार्लय हो गयार् है। इसमें एक हजार्र से भी अधिक लड़कियार्ँ पढ़ती हैं।

काशी हिन्दू विश्वविद्यार्लय 

अपने सपनों एवं उद्देश्यों को सार्कार रूप देने के लिए तथार् शिक्षार् के व्यार्पक प्रचार्र-प्रसार्र के लिए महार्मनार् ने काशी में हिन्दू विश्वविद्यार्लय की स्थार्पनार् की। 1 अक्टूबर, 1915 को बनार्रस हिन्दू यूनिवर्सिटी एक्ट पार्स हुआ और 4 फरवरी, 1916 को भार्रत के वार्यसरार्य लाड हाडिंग ने इसक शिलार्न्यार्स कियार्।

यह विश्वविद्यार्लय अपने में कर्इ महत्वपूर्ण विशेषतार्यें समार्हित किये हुये है। अंग्रेजी सार्हित्य तथार् आधुनिक मार्नविकी और विज्ञार्न के सार्थ-सार्थ हिन्दू धर्म एवं विज्ञार्न, भार्रतीय इतिहार्स एवं संस्कृति एवं विभिन्न प्रार्च्य विधार्ओं क अध्ययन इस विश्वविद्यार्लय की विशेषतार् है।

कलार् संकाय में विभिन्न विषयों के पार्ठ्यक्रम में आधुनिक पार्श्चार्त्य विद्वार्नों के सार्थ ही सार्थ प्रार्चीन भार्रतीय विद्वार्नों के विचार्रों और सिद्धार्न्तों क ज्ञार्न भी शार्मिल थार्। दर्शनशार्स्त्र के विद्याथियों को कांट और हीगल के सार्थ अनिवायत: कपिल और शंकर के सिद्धार्न्तों क भी अध्ययन करनार् होतार् थार्। रार्जनीति के विद्याथियों को भार्रतीय रार्जनीतिक विचार्रों और संस्थार्ओं क अध्ययन करनार् होतार् थार्।

महार्मनार् स्वतंत्र विचार्रों के निभ्र्ार्ीक व्यक्ति थे। उनके योग्य संरक्षण में विश्वविद्यार्लय के रार्जनीतिशार्स्त्र विभार्ग में स्वतंत्रतार् प्रार्प्ति के डेढ़ दशक पूर्व ही भार्रतीय रार्ष्ट्रीय आन्दोलन क इतिहार्स, आधुनिक भार्रतीय सार्मार्जिक और रार्जनीतिक विचार्र तथार् समार्जवार्दी सिद्धार्न्तों क इतिहार्स आदि विषयों क अध्यार्पन स्वतंत्रतार् के वार्तार्वरण में, पूरी निष्ठार् के सार्थ कियार् जार्तार् थार्। दूसरे विश्वविद्यार्लयों के लिए यह अकल्पनीय बार्त थी।

महार्मनार् आर्थिक विकास में आधुनिक विज्ञार्न और तकनीक की भूमिक से भली भार्ँति परिचित थे। धन की कमी होने के बार्वजूद महार्मनार् ने विश्वविद्यार्लय में धार्तु विज्ञार्न, खनन विज्ञार्न, भू विज्ञार्न, विद्युत इंजीनियरिंग, यार्ंत्रिक इंजीनियरिंग, रसार्यन विज्ञार्न, शिल्प, औषधि निर्मार्ण, चिकित्सार् की शिक्षार् आदि की समुचित व्यवस्थार् करार्यी।

विश्वविद्यार्लय क निरन्तर विकास हो रहार् है। इसके तीन संस्थार्न- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल सार्इंसेज और इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चर सार्इंसेज काफी प्रसिद्ध है। विश्वविद्यार्लय में वर्त्तमार्न में चौदह संकाय और सौ से भी अधिक विभार्ग है। मुख्य परिसर से लगभग सार्ठ किलोमीटर दूर मिर्जार्पुर के समीप एक नवीन परिसर, ‘रार्जीव गार्ँधी परिसर’ ने काम करनार् प्रार्रम्भ कर दियार् है। भय यह है कि विकास की इस रफ्तार्र में कहीं काशी हिन्दू विश्वविद्यार्लय महार्मनार् के उद्देश्यों को विस्मश्त न कर बैठे।

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