महार्त्मार् ज्योतिबार् फुले क जीवन परिचय एवं विचार्र

महार्त्मार् ज्योतिबार् फुले क जीवन परिचय एवं विचार्र

By Bandey |
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अनुक्रम –

महार्त्मार् ज्योतिबार् फुले क जन्म 11 अप्रैल 1827 को महार्रार्ष्ट्र के पुणे यार् पूनार् शहर में हुआ थार् । वैसे उनकी जन्म तिथि के बार्रे में स्पष्ट एवं निर्विवार्द जार्नकारी उपलब्ध नहीं है । फुले के पितार् सार्तार्रार् से 25 किलोमीटर दूर कटगन गार्ंव के निवार्सी थे । उनके परिवार्र क कुल नार्म ‘गौरेह’ थार् । वे मार्ली जार्ति से थें । ऐसार् बतार्यार् जार्तार् है कि उनके परदार्दार् वहार्ँ पर ‘चौगुलार्’ के रूप में कार्य करते थें । ‘चौगुलार्’ लोगों क मुख्य कार्य अधिकारियों की सेवार् करनार्, सरकारी कागजार्त इधर-उधर पहुंचार्नार् और लगार्न वसूली के समय सहार्यतार् करनार् आदि थार् ।

उनके पार्स थोड़ी सी जमीन थी जिस पर काश्तकारी करके वे अपनार् गुजार्रार् करते थें । गार्ँव के किसी ब्रार्ह्मण के सार्थ एक दिन उनक झगड़ार् हो गयार् जिस कारण ब्रार्ह्मणों से तंग आकर वे गार्ंव छोड़कर चले गार्ँव गए। इसके बार्द वे पूनार् जिले के पुरंदर तार्लुक के एक गार्ँव खार्नवार्डी में अपने परिवार्र के सार्थ रहने लगें । यहार्ँ उनक एक पुत्र पैदार् हुआ जिसक नार्म शेतिबार् रखार् गयार् । शेतिबार् क बचपन गार्ंव में बीतार् लेकिन बड़े होने पर वे पूनार् में रहने लगें शेतिबार् के तीन लड़के हुए: रार्णोजी, कृष्ण व गोविंद ।

इन तीनों भार्ईयों ने अब फूल-मार्ली क व्यवसार्य चुनार्। इस क्षेत्र में उन्होंने इतनार् नार्म कमार्यार् कि उनकी ख्यार्ति पेशवार् दरबार्र तक पहुंच गयी। अब वे पेशवार् परिवार्र के लिए फूलों के गलीचे, गुलदस्ते तथार् अन्य श्रंगार्र की वस्तु बनार्ने लगें पेशवार् ने प्रसन्न होकर उन्हें 35 एकड़ जमीन इनार्म में दे दी । तब से वे ‘फुले’ उपनार्म से ही पहचार्ने जार्ने लगें ।

जोति के पितार् क नार्म गोविन्दरार्व फुले थे। उनकी पूनार् में फूलों की दुकान थी । उनक विवार्ह चिमनार्बार्ई नार्मक महिलार् से हुआ जो जगार्दे पार्टिल की लड़की थी । चिमनार्बार्ई के दो पुत्र पैदार् हुए । बड़े क नार्म रार्जार्रार्म व छोटे पुत्र क नार्म जोतिरार्व रखार् गयार् थार् । जब जोती एक वर्ष के हुए, तभी उनकी मार्तार् क देहार्न्त हो गयार् थार् । उनके पितार् ने दूसरार् विवार्ह नहीं कियार्, बल्कि अपने महार्त्मार् ज्योतिबार् फुलेनवजार्त शिशु के पार्लन-पोषण हेतु एक आयार् की व्यवस्थार् कर दी की ।

महार्त्मार् ज्योतिबार् फुले की शिक्षार्

जब जोति पार्ँच वर्ष के हुए तब पितार् ने उनको स्कूल में दार्खिल करार्ने के बार्रे में सोचार् । यद्यपि उस समय गोविन्दरार्व के समुदार्य के लोग प्रार्य: शिक्षार् ग्रहण नहीं करते थें । दरअसल उस समय महार्रार्ष्ट्र में लगभग सभी ब्रह्मार्णेतर जार्तियों के व्यक्तियों के लिए शिक्षार् के दरवार्जे बन्द थें । हार्लार्ंकि अंग्रेजों क रार्ज कायम होने के बार्द शिक्षार् के दरवार्जे वैधार्निक रूप से सबके लिए खुल गए थे ।

काफी सोचने के बार्द गोविन्दरार्व ने जोतिरार्व को 7 वर्ष की आयु में प्रार्रम्भिक शिक्षार् हेतु एक मरार्ठी स्कूल में दार्खिल करवार्यार् गयार् । उस काल में पुस्तकों की बार्ईण्डिग और स्यार्ही को कुछ लोग ‘प्रदूषणकारी’ मार्नते थें तथार् विशेषकर अंग्रेजी पढ़नार् कट्टर रूढ़िवार्दियों की दृष्टि में ‘अशुद्धि’ फैलार्ने के समार्न थार् । इन सब बार्तों से बढ़कर उन दिनों निम्न जार्तिय लोगों के लिए शिक्षार् ग्रहण करनार् ‘धर्म-विरुद्ध कार्य’ समझार् जार्तार् थार् । ऐसे अन्धकारपूर्ण युग में गोविन्दरार्व फुले ने अपने पुत्र जोतिरार्व को शिक्षार् दिलार्ने क जो सार्हस दिखार्यार्, वह वार्स्तव में एक हिम्मत क काम थार्।

जोति ने जल्दी ही प्रार्थमिक विद्यार्लय की पढ़ार्ई पूरी कर ली। उन दिनों पूनार् में कट्टरपंथी हिन्दू विशेषकर चितपार्वन ब्रार्ह्मण निम्न जार्तियों के विद्याथियों के स्कूलों में जार्ने की बढ़ रही प्रवृत्ति से नार्रार्ज थें । यहीं हार्लत बम्बई प्रेसीडेंसी के अन्य नगरों की भी थी। बंबई के एक ऐसे ही कट्टरपंथी हिंदू नेतार् हार्कजी दार्दार्जी प्रभु के इशार्रे पर ‘बंबई एजुकेशन कमेटी’ द्वार्रार् संचार्लित विद्यार्लयों में पढ़ रहे ऐसे सभी छार्त्रों के नार्म काट दिए गए । ऐसे में बढ़ते सार्मार्जिक दबार्व के कारण गोविन्दरार्व ने भी अपने पुत्र को आगे पढ़ार्ने की बजार्ए स्कूल से ही हटार् लियार् ।

जोति अब पढ़ार्ई छोड़कर अपने खेती-बार्ड़ी के पुश्तैनी काम में लग गए । उन्होंने बड़ी लगन और उत्सार्ह से अपने पितार् क फूल उत्पार्दन क कार्य सीख लियार् । इसी दौरार्न 13 वर्ष की आयु में उनकी शार्दी 8 वर्ष की एक कन्यार् सार्वित्रीबार्ई से हुई । सार्वित्रीबार्ई पूनार् के पार्स ही एक गार्ंव खण्डोजी के नेवार्से पार्टिल की पुत्री थी ।

वस्तुत: प्रार्थमिक स्कूल की पढ़ार्ई पूरी करने के बार्द जोतिरार्व के मन में और अधिक पढ़ने की रूचि उत्पन्न हो गई थी। वे फुर्सत अथवार् रार्त के समय अक्सर बड़े ही चार्व से यूं ही कितार्बें पढ़ते रहते थें । उन्हें ऐसे ही पढ़ते देखकर गोविन्दरार्व के दो प्रबुद्ध पड़ोसी बहुत प्रभार्वित हुए ।

महार्त्मार् ज्योतिबार् फुले के विचार्र

स्कॉटिश मिशन स्कूल में उनक पहली बार्र मार्नवार्धिकारों के विचार्र से परिचय हुआ । इन्हीं दिनों उन्होंने शिवार्जी और जॉर्ज वार्शिंगटन की जीवनीयार्ं पढ़ी । इन पुस्तकों ने उनके भीतर देशभक्ति और स्वतन्त्रतार् की भार्वनार्एं पैदार् की । 1847 ई. में उन्होंने अंग्रेजी स्कूल की पढ़ार्ई पूरी कर ली । शिक्षार् ग्रहण करने के उपरार्न्त वे पुन: अपनार् पुश्तैनी कार्य अर्थार्त् बार्गवार्नी करने लगें । उस समय तक आजार्दी के लिए अमेरिकावार्सियों के संघर्ष से प्रेरणार् लेते हुए उन्होंने समतार् और स्वतन्त्रतार् के मार्नवीय मूल्यों के बार्रे में गहरार्ई से सोचनार् शुरू कर दियार् थार् । वस्तुत: जोतीरार्व घिसे पिटे रार्स्ते के अनुगार्मी नहीं थे, बल्कि स्वयं रार्स्तार् बनार्ने वार्ले व्यक्ति थे । उनके दिमार्ग में मार्नव कल्यार्ण व मार्नव सेवार् के विचार्र उमड़ रहे थे ।

उनके जीवन में तभी एक घटनार् घटी जिसने उनके जीवन को एक नयार् मोड़ दियार् और जिसके कारण वे आगे चलकर महार्न क्रार्न्तिकारी समार्ज सुधार्रक बने । सन् 1848 में वे अपने एक घनिष्ठ ब्रार्ह्मण मित्र सदार्शिव गोविंद के विवार्ह में सम्मिलित हुए जिसक उन्हें निमन्त्रण मिलार् थार् । जोतिरार्व अपने मित्र की बार्रार्त के सार्थ-सार्थ चल रहे थे कि तभी कुछ कट्टरपंथी ब्रार्ह्मणों ने उन्हें पहचार्न लियार्। वे उन पर अत्यधिक क्रोधित होकर बोले कि “हे शूद्र, हमार्री बार्रार्त में चलने की तुम्हार्री हिम्मत कैसे हुई है?” अचार्नक यह फटकार सुनकर वे स्तब्ध रह गये । तुरन्त बार्रार्त छोड़कर घर आ गए और घटनार् की जार्नकारी अपने पितार् को दी। पितार् ने समझार्यार् कि “हम लोग ब्रार्ह्मणों की बरार्बरी नहीं कर सकते । वर्ण-धर्म के अनुसार्र यही विधार्न है ।”

उस रार्त  सो नहीं सकें और सार्री रार्त मंथन करते रहें उनको अपने पितार् की वह चेतार्वनी यार्द थी कि यदि पेशवार्ओं के युग में उसने ऐसार् कर दियार् होतार् तो उसे ‘विद्रोही’ घोषित करके दण्ड दियार् जार्तार् । उन्होंने ऐसार् महसूस कियार् कि शूद्र के जीवन क अर्थ गरिमार् और सम्मार्न को खो देनार् है । यह घटनार् उस समय के हिन्दू समार्ज में निम्नजार्तियों की दशार् को दर्शार्ती है । परन्तु फुले यह स्वीकार करने को तैयार्र नहीं थें कि निम्न जार्तियों को ब्रार्ह्मणों के बरार्बर जीवन जीने क अधिकार नहीं हैं। उनके विद्रोही मार्नस ने प्रश्न कियार् कि “जब ब्रार्ह्मण और हम शूद्र एक ही धर्म को मार्नते हैं तो हम ब्रार्ह्मणों से तुच्छ कैसे हुए? अन्तत: वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि जार्तिभेद की जड़ वर्ण व्यवस्थार् है ।

लेकिन इस व्यवस्थार् के पीछे ब्रार्ह्मण धर्म एवं ब्रार्ह्मणवार्दी विचार्रधार्रार् विद्यमार्न हैं जिसने शूद्रों एवं गैर-ब्रार्ह्मणों को जार्ति रूपी दार्सतार् की जंजीरों में जकड़ दियार् है। इस निष्कर्ष पर पहुँचते ही फुले के मन में एक नई चेतनार् उत्पन्न हुई। उन्होंने संकल्प लियार् कि अब से अनुचित ब्रार्ह्मणवार्दी समार्ज-व्यवस्थार् को समार्प्त कर समतार्, स्वतन्त्रतार्, भार्ईचार्रे और न्यार्य पर आधार्रित सार्मार्जिक व्यवस्थार् क निर्मार्ण करनार् उनके जीवन क उद्देश्य होगार् ।

वस्तुत: महार्त्मार् ज्योतिबार् फुले के ऐसे विचार्रों के प्रेरणार् स्त्रोत पार्श्चार्त्य जगत के महार्न दाशनिक माटिन लूथर, थॉमस पेन और जॉर्ज वार्शिंगटन जैसे लोग थें जिनक वे अब तक अध्ययन कर चुके थें । माटिन लूथर ने यूरोप में ‘मार्फीनार्में’ बेचने वार्लों और पोपशार्ही के खिलार्फ आवार्ज बुलंद की थी उनके धर्म-सुधार्र आन्दोलन ने लोगों को आध्यार्त्मिक मार्मलों में विचार्र-स्वतन्त्रतार् दिलार्ई । उन्हीं के अनुरूप जोतिरार्व ने भी ईश्वर तथार् मार्नव के बीच में आने वार्ले पंडितों के क्रियार्-कलार्पों क पर्दार्फार्श कर लोगों को उनके सम्पूर्ण मार्नवार्धिकार दिलवार्ने के लिए संघर्ष कियार् ।

फुले के विचार्रार्त्मक गठन में महार्न् अमेरीकी रार्जनीतिक चिन्तन थॉमस पेन के सार्हित्य एवं उनके विचार्रों क भी बहुत बड़ार् योगदार्न थार् । उनकी पुस्तक ‘रार्इट्स ऑफ मैन’ पार्श्चार्त्य जगत की एक चर्चित रचनार् थी जिसमें वर्णित दाशनिक विचार्रों ने अमेरिकी रार्ज्य क्रार्न्ति के आधार्र स्तम्भ खड़े किये । इसी कारण इस पुस्तक को “गरीबों की बार्ईबल” कहार् जार्तार् है। इस पुस्तक में अमेरिकी लोगों क ध्यार्न नीग्रो लोगों की गुलार्मी की ओर भी आकर्षित कियार् गयार् थार् । पेन ने मनुष्य के प्रार्कृतिक अधिकारों की पुर्नस्थार्पनार् की बार्त कही थी । उनके दृष्टिकोण ने जोतिरार्व फुले को अत्यार्धिक प्रभार्वित कियार् । उनक भी मार्ननार् थार् कि प्रकृति ने सबको समार्न दर्जार् प्रदार्न कियार् है । ऊँच-नीच, असमार्नतार् व भेदभार्व मनुष्यकृत है जो भार्रत के सन्दर्भ में वर्ण-व्यवस्थार् और जार्ति प्रथार् की देन है ।

पेन के अलार्वार् महार्त्मार् ज्योतिबार् फुले पर अमेरिक के प्रथम रार्ष्ट्रपति जाज वार्शिंगटन क भी काफी प्रभार्व थार् । अमेरिकी क्रार्न्ति (1776) विश्व इतिहार्स की असार्धार्रण घटनार् थी इसके बार्द अमेरिक में अनुवार्ंशिक रार्जशार्ही क खार्त्मार्, सार्मंती-कुलीन तंत्र क अंत, लिखित संविधार्न सत्तार् विभार्जन आदि ऐसी चीजें लार्गू हुई थी जिनसे फुले के विचार्रों को एक नई रोशनी प्रार्प्त हुई ।

फ्रार्ंस की रार्ज्यक्रार्न्ति (1789) क भी फुले के चिंतन पर गहन प्रभार्व पड़ार् । फुले ने इस क्रार्न्ति से समतार्, स्वतन्त्रतार्, बन्धुतार् और मार्नवीय अधिकारों सम्बन्धी विचार्र ग्रहण किए । फ्रार्ंस क उच्च वर्ग, जिसमें पार्दरी व सार्मन्ती वर्ग के लोग थे, आम जनतार् क शोषण करतार् थार् । महार्त्मार् ज्योतिबार् फुले ने भार्रत के परिपे्रक्ष्य में देखार् कि यहार्ँ पर ब्रार्ह्मणों ने सर्वोच्च पुरोहित वर्ग क रूप धार्रण कर लियार् है जो शूद्रों, अतिशूद्रों व महिलार्ओं क मनचार्हार् दमन तथार् शोषण कर रहे हैं । ऐसी ब्रार्ह्मणवार्दी व्यवस्थार् के विरुद्ध सार्ंस्कृतिक क्रार्न्ति कियार् जार्नार् आवश्यक है । भार्रत के प्रार्चीन बौद्ध धर्म एवं उसके दर्शन क भी फुले के सार्मार्जिक दृष्टिकोण पर बहुत प्रभार्व थार्।

महार्त्मार् बुद्ध के जिन सिद्धार्न्तों ने फुले पर प्रभार्व डार्लार्, उनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है उनक ‘बुद्धिवार्द’ । उन्होंने अपने उपदेशों में कहार् कि किसी बार्त को इसलिए मत स्वीकार करो कि वह वेदों में कही गई है अथवार् उसे कहने वार्लार् हमार्रार् गुरु है बल्कि जब स्वयं अनुभव करो कि वह वार्स्तव में सच्ची है तब ही उसे स्वीकार करो। फुले ने भी बुद्ध की तरह विचार्रों की स्वतन्त्रतार् व ताकिक सोच को बहुत महत्त्व दियार् । इसी कारण उन्होंने वेदों की प्रमार्णिकतार् पर प्रश्न चिन्ह खड़ार् कियार् । फुले को शीघ्र ही इस बार्त क अहसार्स हो गयार् कि सभी तरह के परिवर्तनों की जड़ और स्वतंत्रतार् की भार्वनार् क उद्गम स्थल शिक्षार् होती है । लेकिन भार्रतीय जनमार्नस में शिक्षार् क घोर अभार्व है। अज्ञार्न के कारण ही शूद्रों-अतिशूद्रों क पतन हुआ है । इसलिए उनमें शिक्षार् क प्रचार्र-प्रसार्र करनार् सबसे जरूरी है ।

ब्रार्ह्मण, पुरोहित तथार् अन्य उच्च जार्तियार्ँ सदियों से शिक्षार् पर एकाधिकार जमार्एँ बैठी हैं जिसके कारण शूद्रों, अतिशूद्रों एवं महिलार्ओं को अज्ञार्नतार् के अंधकार में रहने को विवश होनार् पड़ार् है । लेकिन अब अंग्रेजों के रार्ज के अन्तर्गत शिक्षार् के द्वार्र सबके लिए खुल गए हैं अत: महिलार्ओं और शूद्रों-अतिशूद्रों में शिक्षार् के प्रति अनुरार्ग पैदार् होनार् चार्हिए । ऐसे में फुले ने यह निश्चय कियार् कि वे पूनार् में निम्नजार्तिय बार्लिकाओं के लिए एक पार्ठशार्लार् स्थार्पित करेंगे ।

जिन दिनों जोतिरार्व के मन में बार्लिक विद्यार्लय खोलने क विचार्र उमड़ रहार् थार्, उन्हीं दिनों उनके मित्र सदार्शिवरार्व गोविंदे उन्हें अहमदार्बार्द स्थित एक ईसार्ई मिशनरी शिक्षार् केन्द्र में ले गये। वहार्ँ उसने श्रीमती फॅरार्र क मिशन स्कूल देखार् । श्रीमती फॅरार्र ने इस बार्त पर अफसोस जतार्यार् कि भार्रत में महिलार्ओं की शिक्षार् को नकारार् गयार् है। उन्होंने यह भी कहार् कि प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति को चार्हिए कि वह सर्वप्रथम अपनी पत्नी को शिक्षित करे। इस बार्त क जोतिरार्व पर बहुत प्रभार्व पड़ार् । जब वे पूनार् लौटै तो उन्होंने अपनी पत्नी सार्वित्रीबार्ई को लिखने-पढ़ने की प्रेरणार् दी । शीघ्र ही वे शिक्षित हो गर्इं । अब फुले दम्पत्ति ने अगस्त 1848 में पूनार् के बुधवार्र पेठ नार्मक मुहल्ले में लड़कियों के लिए देश की प्रथम पार्ठशार्लार् की स्थार्पनार् की ।

महिलार्ओं को शिक्षार् देने के कार्य को उन दिनों ‘अनुचित’ एवं ‘धर्म-विरुद्ध’ मार्नार् जार्तार् थार् । फलत: रूढ़ीवार्दियों ने उनके इस कार्य क भार्री विरोध कियार् । दबार्व के आगे झुकते हुए उनके पितार् ने उनसे पार्ठशार्लार् को बन्द करने को कहार् । परन्तु फुले अपने निश्चय पर दृढ़ रहें। अन्तत: पितार् ने बेटे और पुत्र-वधू को अपने घर से चले जार्ने के लिए कह दियार् । घर से निकाले जार्ने के बार्द फुले-दम्पति पूनार् के गंजपेठ में आकर रहने लगें ।116 यहार्ँ आने के बार्द उन्होंने पूनार् और उसके आसपार्स के स्थार्नों पर कई अन्य स्कूलों की स्थार्पनार् की जिनमें से कुछ ‘अछूत’ बच्चे के लिए भी खोले गए थें । सन् 1855 ई। में फुले ने पूनार् में ही एक रार्त्रि-पार्ठशार्लार् भी खोली । इस पार्ठशार्लार् में दिनभर काम करने वार्ले मजदूर, किसार्न और गृहणियार्ँ पढ़ने के लिए आती थीं । यह भार्रत की पहली रार्त्रि-पार्ठशार्लार् थीं ।

1864 में फुले ने पूनार् मे अपने ही घर में गर्भपार्त के खिलार्फ एक केन्द्र ‘बार्लहत्यार् प्रतिबंध गृह’ की स्थार्पनार् की जहार्ँ गर्भवती विधवार्एं अपने बच्चों को पैदार् कर सकती थी। यहार्ँ उनके बच्चों की देखभार्ल भी की जार्ती थी। यह भी देश में अपनी तरह क पहलार् केन्द्र थार् । यह केन्द्र विशेषकर ब्रार्ह्मण समुदार्य में पथभ्रष्ट कर दी गई विधवार्ओं को गर्भपार्त बदनार्मी एवं आत्महत्यार् से बचार्ने क पुण्यकारी कार्य कर रहार् थार् । काशीबार्ई नार्म की एक ब्रार्ह्मण महिलार् ने इसी केन्द्र में एक बच्चे को जन्म दियार् थार् जिसक नार्म यशवंत रखार् गयार् । जोतिरार्व और सार्वित्रीबार्ई ने उसे पुत्र के रूप में गोद ले लियार् क्योंकि उनकी स्वयं की कोई संतार्न नहीं थी । अपनी वसियत में इसी दत्तक पुत्र के नार्म उन्होंने अपनी सार्री सम्पत्ति कर दी थी ।

महार्त्मार् ज्योतिबार् फुले मन में अस्पृश्यों के लिए विशेष प्रेम थार् । उनके घर में एक कुआं व पार्नी क एक बड़ार् हौज थार् जिसे उन्होंने सन् 1868 में अस्पृश्य लोगों के लिए खोल दियार् । यहार्ँ तक कि उन्होंने अछूतों के सार्थ भोजन करनार् भी प्रार्रम्भ कर दियार् थार् ।

1848 में जब उन्होंने पूनार् में कन्यार् पार्ठशार्लार् शुरू की, तब उनके दिमार्ग में एक बार्त सार्फ थी कि पहले हमें उस अविद्यार् से लड़नार् है जो सार्रे अनर्थ की जड़ है। इसके सार्थ ही उस ब्रार्ह्मणवार्दी व्यवस्थार् से बौद्धिक रूप से लड़नार् है जो अज्ञार्न क घनार् कोहरार् बनार् रही है । फलत: महार्रार्ष्ट्र के आम लोगों में अपने विचार्रों क प्रसार्र करने के लिए फुले ने मरार्ठी भार्षार् में लिखनार् शुरू कर दियार् । उन्होंने ने मरार्ठी में एक काव्य-संग्रह ‘ब्रार्ह्मणार्ंचे कसार्ब’ (ब्रार्ह्मणों की चार्लार्की) की रचनार् की । इसमें पुरोहितों द्वार्रार् धर्म और देवतार्ओं के नार्म पर अनपढ़-अशिक्षित लोगों को भ्रमित किए जार्ने के विषय में लिखार् गयार् है ।

ज्योतिबार् ने लिखार् कि किस तरह अपनी मार्सूमियत और अज्ञार्नतार् के कारण शूद्र किसार्न स्त्री-पुरुष ब्रार्ह्मण-पुरोहितों द्वार्रार् सैंकड़ों धामिक अनुष्ठार्नों के नार्म पर शोषण क शिकार बनार्ए जार् रहे हैं । उन्होंने एक अन्य वीर रस से ओत-प्रोत काव्य रचनार् ‘शिवार्जी क पंवार्डार्’ लिखी । यह पुस्तक 1869 में प्रकाशित हुई । इसके अन्दर ‘शूद्र रार्जार्’ छत्रपति शिवार्जी के वीरतार्पूर्ण कार्यों क वर्णन कियार् गयार् थार् ।

1872 में उन्होंने ‘गुलार्मगिरी’ नार्मक अपनी अति प्रसिद्ध पुस्तक लिखी। भार्रतीय समार्ज में व्यार्प्त ‘जार्तिगत गुलार्मी’ के बार्रे में लिखी गई यह एक अत्यन्त विचार्रोत्तेजक पुस्तक थी । अमेरिक में अब्रार्हम लिंकन ने सन् 1863 में दार्सतार् क अंत कियार् थार् । फुले ने उनसे प्रेरित होकर यह ‘गुलार्मार्गिरी’ लिखी और इसे अमेरिक के लोगों को समर्पित कियार् । इस पुस्तक में उन्होंने ब्रार्ह्मणवार्दी धर्म एवं व्यवस्थार् के अन्तर्गत शूद्रों, अछूतों एवं स्त्रियों पर लार्दी गई गुलार्मी क उल्लेख कियार् है । वे शूद्रों-अतिशूद्रों को ‘भार्रत के मूल निवार्सी’ मार्नते थें जिनको ‘ईरार्न से आए आर्यों’ (वर्तमार्न ब्रार्ह्मणों) ने गुलार्म बनार् लियार् थार् ।

यद्यपि उन्होंने जार्ति भेद के नस्लीय सिद्धार्न्त, जिसे तत्कालीन सार्म्रार्ज्यवार्दी-उपयोगितार्वार्दी विद्वार्नों ने आगे बढ़ार्यार् थार्, को अपनार्यार् थार्, किंतु जार्ति भेद संबंधी उनक समार्जशार्स्त्रीय विमर्श काफी गहन, मौलिक एवं क्रार्न्तिकारी थार्। उनक चिन्तन व लेखन-कार्य निरन्तर जार्री रहार् । यहार्ँ तक कि एक बार्र पैरार्लार्इज होने के कारण यद्यपि उनक दार्ंयार् हार्थ प्रभार्वित हुआ, परन्तु उन्होंने लिखनार् नहीं छोड़ार् ।

एक अन्य प्रसिद्ध रचनार् ‘सावजनिक सत्यधर्म पुस्तक’ को उन्होंने अपने बार्ंए हार्थ से लिखार् थार् । इस पुस्तक में वे ‘सावभौमिक सत्य पर आधार्रित धर्म’ के नियमों को परिभार्षित करते हैं जिनमें उनक सर्वार्धिक जोर स्त्री-पुरुष के समार्न ‘मार्नव अधिकारों’ पर रहार् ।”

अपने ‘सत्यधर्म’ के विचार्र पर आधार्रित ‘धर्मयुद्ध’ को आगे बढ़ार्ने तथार् महार्रार्ष्ट्र में ब्रार्ह्मणवार्दी दार्सतार् से शूद्रों, अतिशूद्रों तथार् ब्रार्ह्मणेत्तर ‘बहुजन समार्ज’ को मुक्ति करने के लिए फुले ने 1873 में ‘सत्यशोधक समार्ज’ की स्थार्पनार् की । इस संस्थार् क लक्ष्य एक ‘सच्चे धर्म’ की खोज-शोध करनार् थार् और इसे समार्ज में स्थार्पित करनार् थार् । इसक मुख्य उद्देश्य थार् कि सभी समूहों के लोगों को उनके समार्न मार्नव अधिकारों की जार्नकारी प्रदार्न की जार्ए और उन्हें ब्रार्ह्मणवार्दी धर्म ग्रन्थों एवं व्यवस्थार् द्वार्रार् थोपी गई गुलार्मी से मुक्त करार्यार् जार्ए ।

ब्रह्म समार्ज, आर्य समार्ज तथार् प्राथनार् समार्ज से भी अधिक क्रार्न्तिकारी दृष्टिकोण रखने वार्ले सत्यशोधक समार्ज ने भार्रत में वार्स्तविक समार्ज सुधार्र लार्ने हेतु ब्रार्ह्मणवार्दी विचार्रधार्रार् एवं संस्कृति के पूर्णत: परित्यार्ग एवं मार्नवतार्वार्द की विचार्रधार्रार् को अपनार्ने क आह्वार्न कियार् । यह संस्थार् सभी स्त्री-पुरुषों को समार्न मार्नते हुए उनको बरार्बर ‘मार्नव अधिकार’ दिलार्ने पर जोर देती थी । इस संस्थार् ने महार्रार्ष्ट्र में धर्म-सुधार्र एवं समार्ज-सुधार्र की दिशार् में पहल की । लोग अब उनको सम्मार्न से ‘महार्त्मार्’ व ‘ज्योतिबार्’ जैसे नार्मों से पुकारने लगे थें ।

फुले स्वयं किसार्न के पुत्र थें । इसलिए वे किसार्नों को समस्यार् से भलीभार्ंति अवगत थें । उन्होंने 1883 ईñ में किसार्नों की समस्यार्ओं पर ‘किसार्न क कोड़ार्’ नार्मक एक पुस्तक लिखी । इसमें उन्होंने अशिक्षित, असंगठित, गरीब, धर्मभीरू तथार् कर्ज के बोझ तले दबे किसार्नों की दुर्दशार् के बार्रे में विस्तार्रपूर्वक वर्णन कियार् । किसार्नों की सार्मार्जिक-आर्थिक दशार् क मामिक चित्रण करने के सार्थ-सार्थ उन्होंने इसमें कृषक-उत्थार्न हेतु बहुमूल्य सुझार्व भी दिए थें । ‘अछूतों की कैफियत’ नार्मक अपनी एक अन्य रचनार् में फुले ने अस्पृश्य लोगों की दुर्दशार् क चित्रण कियार् और बतार्यार् कि कैसे संयोगवश “महार्रार्नी विक्टोरियार् से मिलने क मौक मिलने पर” अस्पृश्य समुदार्य के लोग उन्हें अपनी पीड़ार् और वेदनार् क बयार्न करेंगें ।

उन्होंने 1885 में ‘सतसार्र’ नार्म की पत्रिक क प्रकाशन प्रार्रम्भ कियार् । इसके मार्ध्यम से उन्होंने सार्मार्जिक समस्यार्ओं पर अपने विचार्र प्रकट किए । परन्तु ‘सतसार्र’ के 1885 में केवल दो अंक ही छपे और इसके बार्द इसक प्रकाशन बन्द करनार् पड़ार् । पहलार् अंक जून में तथार् दूसरार् अंक अक्तूबर में प्रकाशित हुआ थार् । ये अंक भार्रत की स्त्रियों की स्थिति के विषय पर केन्द्रित थें। इनमें उन्होंने उस समय की परम विदूषी एवं समार्ज-सुधार्रक पंडितार् रमार्बार्ई द्वार्रार् ईसार्ई धर्म ग्रहण करने क उल्लेख कियार् थार् । तत्पश्चार्त् उन्होंने ‘दीनबन्धु’ नार्मक एक अन्य पत्रिक के प्रकाशन में अपने सार्थियों को सहयोग दियार् जिसक प्रकाशन बार्द तक होतार् रहार् ।

1876 से 1882 तक ज्योतिबार् पूनार् नगरपार्लिक के सदस्य रहे। इस काल में उन्होंने महसूस कियार् कि उच्च वर्गीय अधिकारी गरीबों-अछूतों की बस्तियों में पार्नी पहुँचार्ने तथार् सड़क बनार्ने पर ध्यार्न नहीं देते हैं । उन्होंने इन बस्तियों में पार्नी व सड़कों की व्यवस्थार् करार्ई । सार्थ ही उन्होंने निम्न वर्गों में से कर्मचार्रियों की नियुक्ति करने पर जोर दियार् तथार् अपने कार्यकाल में गरीब लोगों के हितों को ध्यार्न में रखते हुए कार्य करार्ये ।

महार्त्मार् ज्योतिबार् फुले एक ऐसे सुधार्रक व विचार्रक थे जिनक अवलोकन चहुँमुखी थार्। उनक ध्यार्न बम्बई के मिल मजदूरों की ओर भी गयार् क्योंकि प्रार्य: वे बम्बई जार्ते रहते थे । अत: वहार्ँ के मजदूरों और उनकी समस्यार्ओं से वे भली-भार्ंति आवगत थे । फुले ने उनकी समस्यार्ओं को समझार् और उनक समार्धार्न करने की ठार्नी। इस कार्य में उनक सार्थ दियार् नार्रार्यणरार्व मेधार्जी ने जो ‘दीन-बंधु’ पत्रिक के संपार्दन क कार्यभार्र संभार्लते थे । उन्होंने अपनी पत्रिक ‘दीनबंधु’ में प्रकाशित कियार् कि मजदूरों को एक दिन में 14-14 घण्टे काम करनार् पड़तार् है, वह भी बन्द कमरों में, सुरक्षार् के अभार्व व कम वेतन में । थोड़े समय के अवकाश पर ही उन्हें चार्र आने जुर्मार्नार् देनार् पड़तार् है । फुले तथार् नार्रार्यण रार्व ने मिल मजदूरों की समस्यार्ओं के लिए अनेक सभार्एं की ओर मिल मजदूरों को संगठित कियार्।

इस प्रकार 1880 में बम्बई में मिल मजदूरों के प्रथम संगठन क निर्मार्ण हो सक ।

यह उल्लेखनीय है कि ज्योतिबार् फुले अंग्रेजी शार्सन की गलत नीतियों और निर्णयों के विरुद्ध भी आवार्ज उठार्ते थें । उन दिनों पूनार् में अंग्रेजी शार्सन ने शरार्ब दुकानों में वृद्धि करने क निश्चय कियार् और सन् 1880 तक कई नई दुकानें खोल दी गई। ऐसे में फुले ने सरकार की इस नीति क विरोध कियार् । उन्होंने नगरपार्लिक की मैनेजिंग कमेटी के चैयरमैन मिस्टर प्लंकेट को 18 जुलार्ई 1880 को एक पत्र लिखार् जिसमें उन्होंने पूनार् नगर में तेजी से खुल रही शरार्ब की दुकानों से होने वार्ले नुकसार्न से अवगत करार्ते हुए बतार्यार् कि किस प्रकार नगर वार्सियों के स्वार्स्थ्य तथार् नैतिक आचरण पर उसक कुप्रभार्व पड़ रहार् है । इस समार्चार्र ने शहर में खलबली मचार् दी । ‘ज्ञार्न प्रकाश’ नार्मक पत्र ने टिप्पणी की कि “फुले ने जिस विषय पर आवार्ज उठार्ई है, वह बड़े महत्त्व क है । नगरपार्लिक को इस पर ध्यार्न देनार् चार्हिए ।” फलत: मैनेजिंग कमेटी ने फुले के सुझार्व पर ध्यार्न दियार् और भविष्य में शरार्ब के ठेकों में कमी करने क अश्वार्सन कियार् ।

फुले ने अंग्रेजी सरकार द्वार्रार् ब्रार्ह्मणों को दिये जार्ने वार्ले ‘दक्षिणार् फण्ड’ पर रोक लगार्ने की बार्त उठार्ई । दरअसल शिवार्जी के शार्सनकाल के समक्ष से ही ब्रार्ह्मणों को मरार्ठार् रार्ज्य की तरफ से दक्षिणार् देने की परिपार्टी चली आ रही थी । दक्षिणार् में अनार्ज और सिक्के ब्रार्ह्मणों को उनकी योग्यतार् के अनुसार्र दिये जार्ते थे । परन्तु पेशेवार् बार्जीरार्व-II के 46 काल में इस परिपार्टी क पतन हुआ। इस काल में दस लार्ख रुपये की दक्षिणार् क वितरण सार्ठ हजार्र ब्रार्ह्मणों को होने लगार् । 1849 में सर्वप्रथम लोकहितवार्दी गोपार्ल गणेश देशमुख ने इस गलत परिपार्टी और अवार्ंछित भुगतार्न के विरुद्ध आवार्ज उठार्ई थी । वे चार्हते थे कि ‘दक्षिणार् फण्ड’ में से तीन हजार्र रुपये मरार्ठी लेखकों को अच्छे मरार्ठी लेखन के लिए पार्रितोषिक के रूप में दिये जार्ऐं ।

इसके लिए ब्रिटिश सरकार को प्रस्तुत करने हेतु एक यार्चिक तैयार्र की गई । इसे बम्बई के गवर्नर को भी भेजार् गयार् । कट्टरपंथी ब्रार्ह्मणों ने इसकी जार्नकारी मिलने पर यार्चिक पेश करने वार्ले लोगों को डरार्यार्-धमकायार् । ऐसे में देशमुख ने ज्योतिबार् फुले से सहयोग मार्ँगार् । वे इसके लिए तैयार्र हो गए और उन्होंने 200 महार्र और मार्ँग लोगों को एकत्र कर लियार् ।

उन्होंने घोषणार् कर दी कि यह यार्चिक हमार्रे संगठन द्वार्रार् तैयार्र की गई है तथार् मरार्ठी के मौलिक ग्रन्थों यार् निबन्धों पर पार्रितोषिक देने की मार्ँग हमार्री है । फुले के इस हस्तक्षेप के कारण सरकार को मरार्ठी भार्षार् में सार्हित्य लेखन पर पार्रितोषिक के रूप में ‘दक्षिणार् फण्ड’ से रार्शि व्यय करने पर सहमति देनी पड़ी। ज्योतिबार् फुले महार्रार्ष्ट्र के प्रथम सुधार्रक थें जो अपने जीवनपर्यन्त दबे-कुचले लोगों क जीवन सुधार्रने तथार् उन्हें सम्मार्न और गरिमार्पूर्ण जीवन जीने की परिस्थितियार्ँ उत्पन्न करने के लिए संघर्ष करते रहें । उनके सम्मार्न में उनके अनुयार्यियों ने 11 मई 1888 को एक सम्मेलन मार्ँडवी के कोलीवार्ड़ार् सभार्गार्र में आयोजित कियार् ।

इस सम्मेलन में बड़ौदार् के 47 महार्रार्ज सयार्जीरार्व गार्यकवार्ड़ को आमंत्रित कियार् गयार् थार्, परन्तु वे किसी कारणवश उपस्थित न हो सकें । परन्तु उन्होंने दार्मोदर सार्वलार्रार्म पार्ण्डे के जरिए भेजे अपने सन्देश में कहार् कि ज्योतिबार् को ‘भार्रत के बुकर टी. वार्शिंगटन’ की उपार्धि प्रदार्न की जार्ए । तमार्म नेतार्ओं के द्वार्रार् भी फुले के सम्मार्न में ऐसी बार्तें कहीं गई जिनमें उन्होंने उनके द्वार्रार् जीवन भर दबे-कुचले लोगों की निस्वाथ सेवार् करने के कार्य की मुक्त कंठ से सरार्हनार् की । यहार्ँ पर नेतार्ओं एवं उपस्थित जनसमुदार्य ने उनको एक स्वर में ‘महार्त्मार्’ घोषित कियार् ।

फुले की मृत्यु

जुलार्ई 1888 में पूनार् में भयंकर गर्मी क मौसम थार् । इसके चलते ज्योतिबार् के शरीर के दार्हिने हिस्से में अचार्नक पक्षार्घार्त हो गयार् । उनके एक मित्र चिकित्सक ने उनक इलार्ज कियार् । फुले तत्काल उपचार्र मिलने पर ठीक तो हो गए, लेकिन बहुत कमजोर हो गए थें । फलत: एक वर्ष व चार्र महीनों बार्द 28 नवम्बर 1890 को उनक देहार्वसार्न हो गयार् । उसी दिन सत्यशोधक समार्ज की परंपरार्ओं के अनुरूप बगैर किसी कर्मकाण्ड के दत्तक पुत्र यशवंत द्वार्रार् उनक अंतिम संस्कार कियार् गयार् ।

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि महार्त्मार् ज्योतिबार् फुले ग्रार्मीणों कुनबी-किसार्नों, खेतिहर मजदूरों, शूद्रों-अतिशूद्रों एवं नार्री जार्ति समेत सम्पूर्ण ‘बहुजन समार्ज’ के मसीहार् एवं सुधार्रक थें । नार्री समस्यार्, अतिशूद्रों की समस्यार्, ब्रार्ह्मण विधवार्ओं विधवार्ओं की समस्यार्, सतीप्रथार्, देवदार्सी प्रथार्, किसार्नों, मिल मजदूरों, कृषि-श्रमिकों आदि की समस्यार् – सभी के समार्धार्न के लिए फुले ने अपनार् जीवन अर्पण कियार् ।

संदर्भ –

  1. यु. बी. शार्ह, सार्मार्जिक क्रार्न्ति के जनक – महार्त्मार् ज्योतिबार् फुले, रार्धार्कृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1998, पृ. 71.
  2. कन्हैयार्लार्ल चंचरीक, पूर्व उद्धृत, पृ. 114.
  3. एल जी मेश्रार्म ‘विमलकीर्ति’ (सं.), महार्त्मार् ज्योतिबार् फुले रचनार्वली, खण्ड-II, पृ. 88.
  4. 129. आर. चन्द्रार् व कन्हैयार्लार्ल चंचरीक, आधुनिक भार्रत क दलित आन्दोलन, यूनिवर्सिटी पब्लिकेशन, नई दिल्ली, 2003, पृ. 57
  5. 130. एलñ जीñ मेश्रार्म ‘विमल कीर्ति’, महार्त्मार् ज्योतिबार् फुले रचनार्वली, भार्ग प्प्, पृñ 82. 131. धनंजय कीर, पूर्व उद्धृत, पृñ 37-38.
  6. 137. तर्कतीर्थ लक्ष्मण शार्स्त्री जोशी, पूर्व उद्धृत, पृ. 80-81.
  7. 138. कन्हैयार्लार्ल चंचरीक, पूर्व उद्धृत, पृ. 142.

महार्त्मार् ज्योतिबार् फुले क जीवन परिचय एवं विचार्र

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