महार्त्मार् गार्ंधी क जीवन परिचय एवं शिक्षार् दर्शन

महार्त्मार् गार्ँधी क पूरार् नार्म मोहनदार्स करमचंद गार्ँधी थार्। उनक जन्म 2 अक्टूबर,1869 को गुजरार्त के काठियार्वार्ड़ जिले के पोरबन्दर नार्मक स्थार्न पर हुआ थार्। उनके पितार् करमचंद गार्ँधी पोरबन्दर रियार्सत के दीवार्न थे। बार्द में वे रार्जकोट और कुछ समय बार्द बीकानेर के भी दीवार्न बने। वे र्इमार्नदार्र, सार्हसी एवं उदार्र प्रकृति के व्यक्ति थे। उन्हें लोभ रंचमार्त्र छू नहीं गयार् थार्। महार्त्मार् गार्ँधी की मार्तार् पुतली बाइ सार्ध्वी, श्रद्धार्लु एवं धर्मपरार्यण महिलार् थी। बार्लक मोहन दार्स पर मार्तार्-पितार् के उच्च नैतिक संस्कारों क गहरार् असर पड़ार्।

महार्त्मार् गार्ंधी

गार्ँधी जी की सहज बार्ल्यवस्थार् पोरबंदर में प्रार्रंभ हुर्इ। प्रार्रम्भिक शिक्षार् क श्रीगणेश सार्त वर्ष की अवस्थार् में रार्जकोट पार्ठशार्लार् से हुआ। शैक्षिक दृष्टि से तो वे एक सार्मार्न्य छार्त्र थे पर वे निष्ठार्वार्न, विनयी एवं कर्त्तव्य के प्रति समर्पित थे। 1881 में इनक अल्फ्रेड हाइस्कूल में प्रवेश हुआ। हाइस्कूल मे इंस्पेक्टर के निरीक्षण के दौरार्न अध्यार्पक द्वार्रार् संकेत करने पर भी इन्होंने नकल नहीं की। यह इनके चरित्र की दृढ़तार् को प्रदर्शित करतार् है। बार्ल्यार्वस्थार् में गार्ँधी जी ने हरिश्चन्द्र नार्टक क मंचन देखार् तथार् श्रवण कुमार्र की पितश् भक्ति से सम्बन्धित चलचित्र क अवलोकन कियार्। इन दोनों क ही अमिट प्रभार्व बार्लक मोहन पर पड़ार्। श्रवण कुमार्र सी पितृ भक्ति तथार् हरिश्चन्द्र की सत्यवार्दितार् को उन्होंने अपने व्यक्तित्व क हिस्सार् बनार् लियार्। तेरह वर्ष की अल्पार्वस्थार् मे इनक विवार्ह कस्तूरबार् बाइ से हुआ। अपने बुरे अनुभवों के आधार्र पर गार्ँधी जी जीवन पर्यन्त बार्ल विवार्ह के विरोधी बने रहे। सन् 1885 मे इनके पितार्जी क देहार्वसार्न हो गयार्। पितार् की मृत्यु से इन्हें गहरार् धक्क लगार् और वे महसूस करते रहे कि पितार् के प्रति अपने कर्तव्यों के पार्लन मे वे अंतिम समय में चूक गये।

तमार्म विरोधों के बार्वजूद उच्च शिक्षार् ग्रहण करने गार्ँधी जी लंदन चले गये। 1891 र्इ0 में बैरिस्टर की परीक्षार् सफलतार्पूर्वक उत्तीर्ण कर वे भार्रत लौट आए। महार्त्मार् गार्ँधी के रार्जनीतिक जीवन क प्रार्रम्भ 1893 र्इ0 में मार्नार् जार्तार् है, जब वे एक भार्रतीय के मुकदमे की पैरवी हेतु दक्षिण अफ्रीक पहुँचे। रंगभेद के अन्यार्य के विरूद्ध इन्होंने सफलतार्पूर्वक आन्दोलन कर अपने सत्यार्ग्रह के सिद्धार्न्त क प्रार्रम्भ कियार्। भार्रतीयों के हितो की सुरक्षार् एवं बच्चों की शिक्षार् के लिए टार्ल्स्टॉय आश्रम की स्थार्पनार् की, जहार्ँ इन्होंने बुनियार्दी शिक्षार् के सिद्धार्न्त क विकास कियार्। शार्रीरिक श्रम को सम्मार्न एवं उत्पार्दन कार्य की महत्तार् इनके शिक्षार् सिद्धार्न्त क एक अनिवाय हिस्सार् बन गयी।

1914 तक दक्षिणी अफ्रीक में सत्य, अहिंसार्, सत्यार्ग्रह, कार्य आधार्रित शिक्षार् जैसे सिद्धार्न्तों क सफलतार्पूर्वक प्रतिपार्दन कर वे भार्रत लौटे। चम्पार्रण के किसार्न हो यार् अहमदार्बार्द के मिल मजदूर – वंचितों के पक्ष मे गार्ँधी जी लगार्तार्र संघर्ष करते रहे। शक्तिशार्ली अंग्रेजी सार्म्रार्ज्य के खिलार्फ वे लगार्तार्र सत्य एवं अंहिसार् के बल पर लड़ते रहे। इस दौरार्न इन्होंने सार्मार्जिक सुधार्र हेतु अनेक कार्यक्रम चलार्ये, जैसे मद्य निषेध, अश्पृश्यतार् निवार्रण आदि। 1937 मे इन्होंने बुनियार्दी शिक्षार् के अपने सिद्धार्न्त को विस्तृत रूप दियार्। गार्ँधी जी के संघर्षो एवं रचनार्त्मक कार्यों के परिणार्मस्वरूप भार्रत रार्जनीतिक-सार्मार्जिक दार्सतार् की बेड़ियों को तोड़ने में सफल रहार्। पर 30 जनवरी, 1948 को अहिंसार् क यह पुजार्री हिंसार् क शिकार हो गयार्। इस महार्मार्नव को श्रद्धार्ंजलि देते हुए प्रसिद्ध वैज्ञार्निक आइंस्टीन ने सही कहार् थार् ‘‘आनेवार्ली पीढ़ियार्ँ इस बार्त पर शार्यद ही विश्वार्स करेंगी कि हार्ड़-मार्ंस क कोर्इ ऐसार् आदमी इस धरती पर कभी चलार् थार्।’’

महार्त्मार् गार्ँधी की जीवन दृष्टि 

आधुनिक भार्रतीय जीवन और सोच पर सर्वार्धिक प्रभार्व महार्त्मार् गार्ँधी के विचार्रो क पड़ार्, क्योंकि उनक तत्त्व चिंतन केवल वैचार्रिक न होकर प्रत्यक्ष अनुभूति तथार् प्रयोग पर आधार्रित थार्। महार्त्मार् गार्ँधी के विचार्रो और कार्यों पर भार्रतीय चिन्तन विशेषत: उपनिषदो क तो प्रभार्व पड़ार् ही, सार्थ ही रस्किन, टार्ल्स्टॉय, थोरो जैसे विद्वार्नों के सार्मार्जिक-आर्थिक दृष्टिकोण क भी प्रभार्व पड़ार्। इन सबक समन्वित रूप गार्ँधी जी क सर्वोदय दर्शन है जिसमें केन्द्र बिन्दु व्यक्ति से बढ़कर समष्टि तक हो गयार् है। लक्ष्य है आत्मोदय के सार्थ-सार्थ सबक उदय।

गार्ँधी जी पर भार्रतीय दाशनिक परम्परार् क अत्यधिक प्रभार्व थार्। इस महार्न परम्परार् के दो श्रेष्ठ तत्त्वों- सत्य और अहिंसार् को गार्ँधी जी ने अपने सम्पूर्ण विचार्रों और कार्यों के केन्द्र मे रखार्।

सत्य 

गार्ँधी जी ने सत्य को अपनी आस्थार् के मूल केन्द्र में बतार्ते हुए कहार् ‘‘मेरे लिए सत्य सर्वोच्च सिद्धार्न्त है जिसमें अनेक अन्य सिद्धार्न्त भी अन्तभ्र्ार्ूत हो जार्ते है। यह सत्यवार्णी की सत्यतार् ही नहीं बल्कि विचार्रो की सत्यतार् है और यह केवल हमार्री मार्न्यतार् सम्बन्धी सत्य ही नहीं, बल्कि परम सत्य, सनार्तन सिद्धार्न्त अर्थार्त् र्इश्वर है।’’ गार्ँधी जी ने सत्य को सवर्थार् हितकर शक्ति मार्नते हुए कहार् ‘‘मृत्यु के बीच जीवन जार्गतार् है, असत्य के बीच सत्य जार्गतार् है और अन्धकार के बीच प्रकाश जार्गतार् है। अत: मेरार् निष्कर्ष है कि र्इश्वर जीवन है, सत्य है, ज्योति है, वह प्रेम है, वह परमेश्वर है।’’

गार्ँधी जी के अनुसार्र सत्य तथार् र्इश्वर एक दूसरे के पर्यार्य हैं। र्इश्वर प्रार्प्ति क सार्धन अहिंसार् है। अहिंसार् वह भौतिक आधार्र है जिसमें अन्य मार्नवीय गुण विकसित होते है।

अहिंसार् 

महार्त्मार् गार्ँधी क अहिंसार् क विचार्र अद्वितीय है। उन्होंने अहिंसार् के व्यक्तिवार्दी नैतिक आधार्र को सार्मार्जिक आधार्र प्रदार्न कियार्। गार्ँधी जी के अनुसार्र अहिंसार् केवल व्यक्ति क धर्म ही नहीं है, इसकी व्यार्प्ति रार्जनीति, अर्थनीति, शिक्षार्, विज्ञार्न आदि सभी क्षेत्रों में होनी चार्हिए।

गार्ँधी जी क मार्ननार् थार् कि न्यूनतम मार्त्रार् में भी सार्मार्जिक न्यार्य हिंसार् से प्रार्प्त नहीं कियार् जार् सकतार्। संसार्र में मार्नवतार् क अस्तित्व सत्य एवं अहिंसार् के कारण है। अहिंसार् क तार्त्पर्य है सभी प्रार्णियों के प्रति द्वेष क सम्पूर्ण अभार्व। अर्थार्त् सभी जीवों के प्रति सद्भार्व रखने क कार्यार्न्वित रूप ही अहिंसार् है। अहिंसार् के पथ पर चलने के लिए अटूट धैर्य और सार्हस की आवश्यकतार् है। अहिंसार् के भार्व से प्रेरित व्यक्ति को सत्तार् प्रार्प्त करने की कोशिश नही करनी पड़ती है, न ही सत्तार् प्रार्प्ति उसक उद्देश्य होतार् है। समार्ज के उपेक्षित तबके को न्यार्य तभी प्रार्प्त हो सकतार् है जब सरकार चलार्ने वार्ले भी अहिंसार् के सिद्धार्न्त क पार्लन करें। गार्ँधी जी के शब्दों में ‘‘मेरे विचार्र से जनतंत्र उसे कहते है जिसमें कमजोर से कमजोर को भी वही अधिकार और अवसर मिले जो सबसे अधिक शक्तिशार्ली को प्रार्प्त होतार् है। ऐसार् केवल अहिंसार् के द्वार्रार् ही संभव है।’’ एक अन्य स्थल पर अहिंसार् को शार्श्वत प्रेम से जोड़ते हुए महार्त्मार् गार्ँधी ने कहार् ‘‘ अहिंसार् क अर्थ है अनंत प्रेम और प्रेम क अर्थ है कष्ट सहने की असीम क्षमतार्।’’

गार्ँधी जी के रार्जनीतिक सिद्धार्न्त 

महार्त्मार् गार्ँधी ने रार्जनीति को कोर्इ स्वतंत्र पेशार् न मार्नकर जीवन क एक अंग मार्नार् जिस पर जीवन की मार्न्यतार्एं और मूल्य लार्गू होते हैं। मनुष्य क अंतिम लक्ष्य धर्मार्चरण है और रार्जनीति भी इसके अनुरूप होनी चार्हिए। वस्तुत: रार्जनीति धर्म की अनुगार्मिनी है।

महार्त्मार् गार्ँधी की रार्जनैतिक कल्पनार् ‘रार्मरार्ज्य’ की है। रार्म तार्नार्शार्ह नहीं थे, वे समस्त रार्ज्य के प्रतीक थे। वे केवल शार्सन ही नहीं करते थे वरन् स्वयं शार्सित भी थे। उनके द्वार्रार् रार्ज्य क परित्यार्ग इसी भार्वनार् क परिचार्यक है। मार्नव एवं समार्ज के नैतिक विकास में जब ‘रार्मरार्ज्य’ की स्थिति आती है तो दण्ड विधार्न को संचार्लित करने वार्ली रार्ज्यसत्तार् की आवश्यकतार् स्वत: ही समार्प्त हो जार्ती है।

गार्ँधी जी की रार्जनैतिक धार्रणार्ओं क मूल आधार्र ‘सर्वोदय’ है। ‘सर्वोदय’ क तार्त्पर्य है प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व के विकास क पूरार् अवसर मिले। महार्त्मार् गार्ँधी कहते हैं ‘‘मेरार् लक्ष्य समार्ज में एक ऐसी व्यवस्थार् को कायम करनार् है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को अपने उत्थार्न क समार्न अवसर एवं सुविधार्यें प्रार्प्त हों। ऐसे समार्ज को सर्वोदय समार्ज नार्म देनार् उचित होगार्।’’ गार्ँधी जी ने केवल समार्ज को ही नहीं वरन् व्यक्ति को भी अपने चिंतन क विषय बनार्यार्। उन्होंने जीवन को उसकी सम्पूर्णतार् में ग्रहण कियार् है। उनक विश्वार्स थार् कि व्यक्ति के पुनर्निर्मार्ण के बिनार् समार्ज क पुनर्निर्मार्ण असम्भव है।

महार्त्मार् गार्ँधी ने सत्तार् के अन्यार्यपूर्ण कार्यों क विरोध हिंसार् की जगह अहिंसक ढंग से करने हेतु जिस अमोघ अस्त्र क आविष्कार कियार्- वह है सत्यार्ग्रह। सत्यार्ग्रह क अर्थ है शार्न्तिपूर्ण आग्रह। इसक उद्देश्य है असत् रार्जनीति क अनुसरण करने वार्ली सरकार यार् अन्य सम्बन्धित व्यक्ति क हृदय परिवर्तन। सत्यार्ग्रह के द्वार्रार् ही गार्ँधी जी ने विश्व के सर्वार्धिक शक्तिशार्ली सार्म्रार्ज्य के विरूद्ध लड़ाइ जीती।

गार्ँधी जी के आर्थिक सिद्धार्न्त 

महार्त्मार् गार्ँधी भौतिकवार्द एवं उपभोक्तार्वार्दी संस्कृति के खिलार्फ थे। उनके आर्थिक विचार्र भी सत्य एवं अहिंसार् के सिद्धार्न्तों पर आधार्रित थे। वे धन एकत्र करने के लिए धनोपाजन करने के कट्टर विरोधी थे। उनकी दृष्टि मे धनी और निर्धन मे कोर्इ अन्तर नहीं है। जिनके पार्स आवश्यकतार् से अधिक धन है उनसे यह आग्रह कियार् जार् सकतार् है कि वे अपनी सम्पत्ति क प्रयोग उनके लिए भी करें जो निर्धन हैं। गार्ँधी जी ने कहार् ‘‘मैं चार्हतार् हूँ कि धनी लोग गरीबों के ट्रस्टी बनकर उनके लिए अपने धन क इस्तेमार्ल करें। क्यार् आपको पतार् है कि ‘टार्ल्स्टॉय फाम’ की स्थार्पनार् करते समय मैंने अपनी सार्री सम्पत्ति क त्यार्ग कर दियार् थार्।’’

गार्ँधी जी ने आर्थिक व्यवस्थार् के संचार्लन के लिए कुछ सार्धनों की सिफार्रिश की, ये मुख्य सार्धन हैं चरखार्, स्वदेशी तथार् खार्दी। उनक विचार्र थार् कि हम सुखी एवं नीति संगत जीवन तभी बितार् सकते हैं, जब हम अपनी सार्ंस्कृतिक आस्थार्ओं के अनुरूप कार्य करें। भार्रत की मूल संस्कृति ग्रार्मीण संस्कृति है, अत: इस देश के लिए चरखे क जो महत्व है वह बड़ी मशीनों क नहीं हो सकतार् है।

भूमंडलीकरण के नार्म पर यूरोप और अमेरिक के बढ़ते प्रभार्व एवं तृतीय विश्व को नए सिरे से आर्थिक उपनिवेश बनार्ने के प्रयार्सों के प्रति वे गंभीर थे। विकास की निरंतर प्रक्रियार् की गलती के प्रति वे सचेत थे। यूरोप और अमेरिक में अपनाइ गर्इ आधुनिकीकरण की प्रक्रियार् की अपर्यार्प्ततार् और दमनकारी चरित्र को पहले ही समझ गये थे। सार्थ ही शार्यद वे एकमार्त्र नेतार् थे जिन्होंने इन देशों की अंधी नकल करने के बजार्ए विकल्प के बार्रे में सोचार्। मार्नव के भविष्य के लिए विकल्प के रूप में उन्होंने ग्रार्म-आधार्रित अर्थतंत्र और कार्य आधार्रित शिक्षार् की कल्पनार् की थी। गार्ँधी जी के लिए शिक्षार् वार्स्तव में उनके संपूर्ण रार्जनीतिक कार्यक्रम क हिस्सार् थी।

महार्त्मार् गार्ँधी क शिक्षार्-दर्शन 

महार्त्मार् गार्ँधी औपनिवेशिक शिक्षार् व्यवस्थार् को भार्रत के लिए हार्निकारक मार्नते थे। गार्ँधी जी ने अंग्रेजों द्वार्रार् विकसित शिक्षार् पद्धति की तीन महत्वपूर्ण कमियार्ँ बताइ-

  1. यह विदेशी संस्कृति पर आधार्रित थी, जिसने स्थार्नीय संस्कृति लगभग समार्प्त कर दी थी। 
  2. यह हृदय और हार्थ की संस्कृति की उपेक्षार् कर पूर्णत: दिमार्ग तक ही सीमित रहतार् है। 
  3. विदेशी भार्षार् के मार्ध्यम से सही शिक्षार् संभव नहीं है।

 गार्ँधी जी ने अंग्रेजी शिक्षार् को मार्नसिक गुलार्मी क कारण बतार्यार्। वे कहते है ‘‘अंगे्रजी शिक्षार् लेकर हमने अपने रार्ष्ट्र को गुलार्म बनार्यार् है। अंग्रेजी शिक्षार् से दंभ, रार्ग, जुल्म वगैरह बढ़े है।’’

अत: गार्ँधी जी ने असहयोग आंदोलन के दौरार्न सरकारी शैक्षिक संस्थार्ओ के बहिष्कार क आह्वार्न कियार्। औपनिवेशिक शिक्षार् की जगह उन्होंने एक रार्ष्ट्रीय शिक्षार् प्रणार्ली के विकास क प्रयार्स कियार् जो मार्नव श्रम को उसक उचित स्थार्न देते हुए संवेदनशील हृदय तथार् मस्तिष्क क समन्वित विकास कर सके।

शिक्षार् से अभिप्रार्य 

महार्त्मार् गार्ँधी ने शिक्षार् को परिभार्षित करते हुए कहार् ‘‘शिक्षार् से मेरार् अभिप्रार्य बार्लक तथार् मनुष्य मे निहित शार्रीरिक, मार्नसिक एवं आत्मिक श्रेष्ठतम शक्तियों क अधिकतम विकास है।’’ गार्ँधी जी भार्रतीय जीवन को सुखी-सम्पन्न बनार्नार् चार्हते थे। वे व्यक्ति, समार्ज और देश की रार्जनैतिक, आर्थिक एवं सार्मार्जिक दार्सतार् क विरोध कर स्वतंत्रतार् एवं स्वार्वलम्बन के आकांक्षी थे। अत: शिक्षार् को वे सावभौमिक रूप मे प्रसार्रित करनार् चार्हते थे। उनक मंतव्य थार् कि सार्क्षरतार् न तो शिक्षार् क अन्त है न प्रार्रम्भ। यह मार्त्र एक सार्धन है, जिसके द्वार्रार् स्त्री एवं पुरूष को शिक्षित कियार् जार् सकतार् है।

महार्त्मार् गार्ँधी सच्ची शिक्षार् उसे मार्नते थे जो बार्लक की आध्यार्त्मिक, मार्नसिक और शार्रीरिक शक्तियों को विकसित करती है। वे चार्हते थे कि शिक्षार् द्वार्रार् मनुष्य के शरीर, मस्तिष्क, हृदय तथार् आत्मार् की सार्री शक्तियार्ँ पूर्ण रूप से विकसित हो। इन शक्तियों के विकास में समग्र एवं संतुलन की दृष्टि होनी चार्हिए। नए भार्रत क निर्मार्ण श्रम के प्रति निष्ठार् एवं संतुलित दृष्टिकोण वार्ले व्यक्तियों से ही हो सकतार् है।

गार्ँधी जी ने शार्रीरिक श्रम की नैतिकतार् पर आधार्रित शिक्षार् दर्शन क विकास कियार्। इसे उपनिवेशवार्द के आर्थिक और सार्ंस्कृतिक प्रभुत्ववार्दी शोषण के विकल्प के रूप में विकसित कियार् गयार्। गार्ँधी जी स्वत: स्फूर्त संवेदी तरीको से श्रमिकों की मार्नसिक दुनियार् से जुड़े हुए थे। उन्होंने अपनार् शिक्षार् दर्शन ग्रार्मीण समार्ज में श्रमिकों के बच्चों की आवश्यकतार्ओं और आकांक्षार्ओं की लय के सार्थ विकसित कियार्। शार्रीरिक श्रम पर उनक जोर अत्यधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि श्रमिकों के पार्स यही एक पूंजी होती है। औद्योगीकरण की प्रक्रियार् में श्रम को विमार्नवीय कियार् जार्तार् है और उसे खरीद बिक्री की वस्तु बनार् दियार् जार्तार् है। गार्ँधी जी की दृष्टि में आधुनिक मशीनी सभ्यतार् अनैतिक थी और अन्तत: विनार्श की ओर ले जार्एगी। विनार्श की इस प्रक्रियार् को जड़ से समार्प्त करने के एवं भार्रत के नवनिर्मार्ण हेतु उन्होंने बुनियार्दी शिक्षार् के सिद्धार्न्त क प्रतिपार्दन कियार्। यह जनतार् के स्वरार्ज हार्सिल करने के लिए जनतार् की शिक्षार् क रार्ष्ट्रीय कार्यक्रम थार्।

बुनियार्दी शिक्षार् यार् नर्इ तार्लीम क सिद्धार्न्त 

महार्त्मार् गार्ँधी ने अपने शिक्षार्-सिद्धार्न्त क विकास दक्षिण अफ्रीक में प्रवार्स के दौरार्न कियार्। सर्वोदय के सिद्धार्न्त के अनुरूप उन्होंने भार्रतीयों के सहयोगपूर्ण जीवन के लिए टार्ल्स्टॉय आश्रम की स्थार्पनार् की। बच्चों की शिक्षार् की व्यवस्थार् गार्ँधी जी ने स्वयं की। वे आत्मकथार् में लिखते है कि अक्षर ज्ञार्न के लिए अधिक से अधिक तीन घंटे रखे गए। उनक मार्तृभार्षार् के मार्ध्यम से ही शिक्षार् देने क आग्रह थार्। वे शार्रीरिक श्रम के महत्व पर प्रकाश डार्लते हुए टार्ल्स्टॉय आश्रम की शिक्षार् व्यवस्थार् के संदर्भ मे कहते हैं, ‘‘हमलोगों ने यह सुनिश्चित कियार् है कि सबको कोर्इ न कोर्इ धंधार् सिखार्यार् जार्ए। इसके लिए मि0 केलनबैक चप्पल बनार्नार् सीख आए, उनसे मैंने सीखकर बार्लको को सिखार्यार्। आश्रम में बढ़र्इ क काम जार्नने वार्लार् एक सार्थी थार् इसलिए यह काम भी कुछ हद तक बच्चों को सिखार्यार् जार्तार् थार्। रसोर्इ क काम तो लगभग सभी बार्लक सीख गए थे।’’

1937 से जब प्रार्न्तों मे कांग्रेस की सरकार बनी तो शिक्षार् क भार्र गार्ँधी जी एवं उनके शिष्यों के कंधो पर आयार्। मद्य निषेध पर गार्ँधी जी क जोर होने के कारण शिक्षार् के लिए पर्यार्प्त पैसे जुटार्ने में कांग्रेसी सरकार असफल हो रही थी। टार्ल्स्टॉय आश्रम के अनुभव के आधार्र पर महार्त्मार् गार्ँधी ने शिक्षार् को स्वार्वलंबी बनार्ने क विकल्प सार्मने रखार्। इनके द्वार्रार् प्रतिपार्दित बुनियार्दी शिक्षण की प्रमुख विशेषतार्ंए थी-

  1. 6 से 14 वर्ष तक के उम्र के सभी बच्चों एवं बच्चियों को अनिवाय एवं नि:शुल्क शिक्षार्। 
  2. पूरी शिक्षण व्यवस्थार् के केन्द्र मे कोर्इ शिल्प यार् हस्त उद्योग हो।
  3. शिक्षण क मार्ध्यम बच्चे की मार्तृभार्षार् हो।
  4. शिक्षार् स्वार्वलंबी हो- यार्नि खर्च क वहन अध्यार्पकों एवं छार्त्रों द्वार्रार् किए गए उत्पार्दन कार्यों से कियार् जार्ए।
  5. हिन्दी यार् हिन्दुस्तार्नी की शिक्षार् पूरे भार्रतवर्ष में अनिवाय हो। 

स्पष्टत: गार्ँधी जी लार्भ प्रदार्न करने वार्ले उत्पार्दक कार्य के जरिए शिक्षार् देनार् चार्हते थे। उनके अनुसार्र मुख्य प्रश्न आत्म-संतुष्टि क थार्। शार्रीरिक परिश्रम के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए महार्त्मार् गार्ँधी ने कहार् ‘‘ शार्रीरिक कार्य के प्रशिक्षण क उद्देश्य विद्यार्लय म्युजियम के लिए वस्तुंए बनार्नार् यार् खिलौने बनार्नार् नहीं होगार्, जिसक कोर्इ मूल्य न हो। इसक उद्देश्य ऐसी वस्तुंए बनार्नार् होनार् चार्हिए जो बेची जार् सकें। बच्चे इसे फैक्टरी की शुरूआती दिनों की तरह नहीं करेंगे, जब वे चार्बुक के डर से काम करते थे। वे इसलिए काम करेंगे क्योंकि इससे उनक मनोरंजन होतार् है और बौद्धिक प्रेरणार् मिलती है।’’

शिक्षार् क उद्देश्य 

1921 में यंग इंडियार् मे लिखे गए एक लेख मे वे अपनी कल्पनार् की शिक्षार् के संदर्भ मे कहते है ‘‘ऐसी शिक्षार् तीन उद्देश्य पूरार् करेगी, शिक्षार् को आत्मनिर्भर बनार्नार्, बच्चे के शरीर एवं दिमार्ग दोनों क ही विकास करनार् और विदेशी धार्गे और कपड़ों के बहिष्कार क रार्स्तार् खोलनार्, इस प्रकार बच्चों को आत्मनिर्भर एवं स्वतंत्र बनने के लिए तैयार्र करनार्।’’ वे कहते थे कि, ऐसी शार्लार्ओं मे बच्चों क खेल हल जोतनार् होगार्। ग्रार्मीण हस्तशिल्प के जरिए विद्याथियों को शिक्षित कर वे उन्हें दूरगार्मी अहिंसक सार्मार्जिक क्रार्ंति क वार्हक बनार्नार् चार्हते थे।

गार्ँधी जी ने शिक्षार् के व्यार्पक उद्देश्य निश्चित किये। इन्हें दो भार्गों में वर्गीकश्त कियार् जार् सकतार् है- वैयक्तिक उद्देश्य एवं सार्मार्जिक उद्देश्य।

1. वैयक्तिक उद्देश्य 

  1. चरित्र निर्मार्ण- महार्त्मार् गार्ँधी ने चरित्र निर्मार्ण को शिक्षार् क उच्चतम लक्ष्य मार्नार्। उनके अनुसार्र अगर विद्याथियों के चरित्र की नींव मजबूत पड़ जार्ए तो अन्य सब बार्तें स्वत: सीखी जार् सकती है। 
  2. सर्वार्ंगीण विकास- महार्त्मार् गार्ँधी केवल बौद्धिक विकास को विकलार्ंगतार् मार्नते थे। उन्होंने सर्वार्ंगीण विकास के लिए तीन ‘एच’ की शिक्षार् देनार् आवश्यक मार्नार्- हेड (मस्तिष्क), हैण्ड (हार्थ) और हाट (हृदय)। इन तीनों की समन्वित शिक्षार् ही व्यक्ति को उच्चतम विकास तक ले जार् सकती है। 

2. सार्मार्जिक उद्देश्य 

  1. स्वार्वलंबी नार्गरिक क निर्मार्ण- महार्त्मार् गार्ँधी देश के हर व्यक्ति को शार्रीरिक श्रम द्वार्रार् उत्पार्दन कार्य करते हुए देखनार् चार्हते थे। मार्नव श्रम की शिक्षार् देकर वे कुशल नार्गरिकों क निर्मार्ण करनार् चार्हते थे। 
  2. सर्वोदय समार्ज क विकास- गार्ँधी जी समार्ज के सभी व्यक्तियों को विकास क अवसर देने की वकालत करते थे। समार्ज के निर्धनतम व्यक्ति क विकास ही महार्त्मार् गार्ँधी क सपनार् थार्। वे इस क्रार्ंतिकारी उद्देश्य की प्रार्प्ति के लिए शिक्षार् को शक्तिशार्ली सार्धन मार्नते थे। 
  3. ग्रार्म स्वरार्ज की स्थार्पनार्- गार्ँधी जी केवल अंग्रेजी दार्सतार् से ही मुक्ति नहीं चार्हते थे वरन् वे मार्नव क मार्नव के द्वार्रार् शोषण की हर संभार्वनार् को समार्प्त करनार् चार्हते थे। इसके लिए वे ग्रार्म स्वरार्ज की स्थार्पनार् करनार् चार्हते थे। इस प्रकार महार्त्मार् गार्ँधी शिक्षार् के द्वार्रार् न केवल व्यक्ति वरन् समार्ज एवं रार्ष्ट्र की समस्त बुराइयों को समार्प्त करनार् चार्हते थे।

शिक्षार् क पार्ठ्यक्रम 

अपने शिक्षार्-सिद्धार्न्त के अनुरूप ही महार्त्मार् गार्ँधी ने बुनियार्दी शिक्षार् के पार्ठ्यक्रम क निर्मार्ण कियार्। बच्चे, समार्ज और देश के आवश्यकतार् को देखते हुए उन्होंने क्रियार्शील पार्ठ्यक्रम क निर्मार्ण कियार्। अपने द्वार्रार् प्रस्तार्वित नयी तार्लीम यार् बुनियार्दी शिक्षार् के लिए उन्होंने निम्नलिखित विषयों को अपनी पार्ठ्यचर्चार् मे स्थार्न दियार्-

  1. शिल्प यार् हस्त उद्योग (कताइ-बुनाइ, बार्गवार्नी, कृषि, काष्ठ कलार्, चर्मकार्य, मिट्टी क काम आदि मे से कोर्इ एक) 
  2. मार्तृभार्षार् 
  3. हिन्दी यार् हिन्दुस्तार्नी 
  4. व्यवहार्रिक गणित ( अंकगणित, बीजगणित, रेखार्गणित, नार्पतौल आदि) 
  5. सार्मार्जिक विषय (समार्ज क अध्ययन, नार्गरिक शार्स्त्र, इतिहार्स, भूगोल आदि) 
  6. सार्मार्न्य विज्ञार्न (बार्गवार्नी यार् वनस्पति विज्ञार्न, प्रार्णि विज्ञार्न, रसार्यन एवं भौतिक विज्ञार्न)
  7. संगीत एवं चित्रकलार् 8. स्वार्स्थ्य विज्ञार्न (सफाइ, व्यार्यार्म एवं खेलकूद)
  8. आचरण शिक्षार् (नैतिक शिक्षार्, समार्ज सेवार् आदि) 

यहार्ँ यह तथ्य ध्यार्न देने योग्य है कि गार्ँधी जी के पार्ठ्यक्रम में क्रार्फ्ट(शिल्प) और शिक्षार् नहीं है वरन् यह शिल्प के मार्ध्यम से शिक्षार् है। इस तरह के पार्ठ्यक्रम से बच्चे के मस्तिष्क, हृदय और हार्थ क समन्वित विकास होनार् संभव है।

शिक्षण विधि 

महार्त्मार् गार्ँधी ज्ञार्न की अखंडतार् पर विश्वार्स करते थे। वे केवल सुविधार् की दृष्टि से ज्ञार्न को शार्खार्ओं में विभक्त करते थे। महार्त्मार् गार्ँधी ने बच्चों को समन्वित रूप से शिक्षार् देने के लिए ‘‘समन्वय विधि’’ यार् ‘‘समवार्य विधि’’ क प्रयोग कियार्। इस विधि के केन्द्र मे किसी शिल्प यार् उद्योग यार् कार्यकलार्प को रखार्। अन्य विषयों को इससे जोड़कर पढ़ार्यार् जार्नार् चार्हिए। जैसे अगर कताइ-सिलाइ सिखार्ते हुए विभिन्न सभ्यतार्ओं में उपयोग किए जार्ने वार्ले वस्त्रों क ज्ञार्न देकर इतिहार्स क व्यवहार्रिक ज्ञार्न दियार् जार् सकतार् है। इसी तरह से कच्चे मार्ल की खरीद मे कितने पैसे लगे और तैयार्र किए समार्न को बेचने के बार्द कितनार् लार्भ हुआ, इसकी गणनार् अगर छार्त्र करें तो उन्हें गणित क जीवन मे उपयोग करनार् आ जार्येगार्।

समन्वय विधि के अन्य दो महत्वपूर्ण आयार्म है। प्रार्कृतिक वार्तार्वरण से समन्वय एवं सार्मार्जिक वार्तार्वरण से समन्वय।

प्रार्कृतिक वार्तार्वरण से समन्वय से तार्त्पर्य है प्रार्कृतिक परिवेश अथवार् काल परिवर्तन से होने वार्ले प्रार्कृतिक परिवर्तनों को केन्द्र बिन्दु मार्नकर विभिन्न विषयों क समन्वय। उदार्हरण स्वरूप जार्ड़े में गेहँू बुआर्इ एवं ग्रीष्म ऋतु में कटाइ से गेहँू के उत्पार्दन की प्रक्रियार्, भार्रत और विश्व में इसके उत्पार्दन क्षेत्र, गेहँू के लिए मिट्टी, खार्द, पार्नी, की आवश्यकतार् आदि कर्इ पक्षों की शिक्षार् दी जार्ती है।

 सार्मार्जिक वार्तार्वरण से समन्वय के अन्र्तगत सार्मार्जिक परिवेश तथार् समय-समय पर आने वार्ले सार्मार्जिक, धामिक एवं रार्ष्ट्रीय पर्व-त्योहार्र तथार् अन्य सार्ंस्कृतिक आयोजन आते हैं। इनके मार्ध्यम से भी भार्षार्, गणित, कलार् इत्यार्दि क प्रभार्वशार्ली अध्ययन करार्यार् जार्तार् है।

शिक्षार् क मार्ध्यम 

शिक्षार् के मार्ध्यम के रूप मे महार्त्मार् गार्ँधी मार्तृभार्षार् के पक्ष मे थे। वे अंग्रेजी को शोषण क एक मार्ध्यम मार्नते थे, जो अभिजार्त्य वर्ग और जन सार्मार्न्य के मध्य की दूरी को बढ़ार्तार् थार्। इसके लिए वे मार्तार्-पितार् को भी दोषी मार्नते थे। उन्होंने आत्मकथार् में कहार् ‘‘जो हिन्दुस्तार्नी मार्तार्-पितार् अपने बच्चों को बचपन से ही अंग्रेजी बोलने वार्लार् बनार् देते है वे उनके और देश के सार्थ द्रोह करते हैं। इससे बार्लक अपने देश की धामिक और रार्जनीतिक विरार्सत से वंचित रहतार् है। और उस हद तक वह देश की तथार् संसार्र की सेवार् के लिए कम योग्य बनतार् है। वे अंग्रेजी भार्षार् के किस हद तक विरोधी थे, यह उनके निम्नलिखित घोषणार् से स्पष्ट होतार् है- ‘‘मैं यदि तार्नार्शार्ह होतार् तो आज ही विदेशी भार्षार् में शिक्षार् दियार् जार्नार् बन्द कर देतार्। जो आनार्कानी करते उन्हें बर्खार्स्त कर देतार्। मैं पार्ठ्य पुस्तकों के तैयार्र किये जार्ने क इन्तजार्र न करतार्।’’

महार्त्मार् गार्ँधी कितार्बी पढ़ाइ, परीक्षार् की ओर झुकाव और रटने के विरूद्ध थे। उन्होंने बहुत कितार्बें न रखने की सलार्ह दी। उनक कहनार् थार् कि भार्रत जैसे गरीब देश में कितार्बें सोच समझ कर ही रखवार्नी चार्हिए और उनकी संख्यार् कम होनी चार्हिए। वे पार्ठ्य पुस्तको से अधिक महत्वपूर्ण अध्यार्पक को मार्नते थे। उनक कहनार् थार् ‘‘मेरार् ख्यार्ल है शिक्षक ही विद्याथियों की पार्ठ्य पुस्तक है।’’

(i) गार्ँधी जी की छार्त्र सकंल्पनार्- गार्ँधी जी हर बार्लक-बार्लिक में परमार्त्मार् क निवार्स मार्नते थे। सभी बार्लकों की आत्मार् समार्न है पर व्यक्तित्व में भिन्नतार् हो सकती है। गार्ँधी जी चौदह वर्ष तक के उम्र के सभी बच्चों को नि:शुल्क एवं अनिवाय शिक्षार् देने के पक्ष मे थे। वे शिक्षार् को बच्चों क मूलभूत अधिकार मार्नते थे।

गार्ँधी जी की दृष्टि में सुचार्रू रूप से अध्ययन करने के लिए पवित्र जीवन आवश्यक है। वे छार्त्रों को सम्बोधित करते हुए कहते हैं ‘‘तुम्हार्री शिक्षार् सर्वथार् बेकार है, यदि उसक निर्मार्ण सत्य और पवित्रतार् की नींव पर नहीं हुआ है। यदि तुम अपने जीवन की पवित्रतार् के बार्रे में सतर्क नही हुए तो सब व्यर्थ है, चार्हे तुम महार्न विद्वार्न ही क्यों न हो जार्ओ।’’

(ii) गार्ँधी जी की दृष्टि में अध्यार्पक- महार्त्मार् गार्ँधी विद्यार्थिर्यों के शार्रीरिक, मार्नसिक, बौद्धिक एवं आत्मिक विकास में शिक्षार् की भूमिक को अत्यन्त महत्वपूर्ण मार्नते थे। वे शिक्षकों के आचरण को शिष्यों के लिए अनुकरण योग्य होने पर हमेशार् जोर देते थे। वे अध्यार्पकों के कर्त्तव्य के संदर्भ मे कहते है ‘‘आत्मिक शिक्षार् अध्यार्पक कितार्बों के द्वार्रार् नहीं, बल्कि अपने आचरण के द्वार्रार् ही दे सकतार् है। मैं स्वंय झूठ बोलूँ और अपने शिष्यों को सच्चार् बनार्ने क प्रयत्न करूँ, तो वह व्यर्थ ही होगार्। डरपोक शिक्षक शिष्यों को वीरतार् नहीं सीखार् सकतार्। व्यभिचार्री शिक्षक शिष्यों को संयम किस प्रकार सिखार्येगार्? अध्यार्पकों को अपने लिए नहीं तो कम से कम शिष्यों के लिए अच्छार् बनार् रहनार् चार्हिए।’’

गार्ँधी जी विद्यार्थ्री के दोषों कें लिए बहुत हद तक शिक्षक को जिम्मेदार्र मार्नते हैं। टार्ल्स्टॉय आश्रम में दो विद्याथियों की अनुशार्सनहीनतार् पर स्वंय उन्होंने उपवार्स कर आश्रम के सम्पूर्ण वार्तार्वरण को शुद्ध कर दियार्। सार्थ ही महार्त्मार् गार्ँधी अध्यार्पक एवं छार्त्र में अन्तर नहीं मार्नते थे। टार्ल्स्टॉय आश्रम के संदर्भ मे उनक कहनार् है ‘‘टार्ल्स्टॉय आश्रम में शुरू से ही यह रिवार्ज डार्लार् गयार् थार् कि जिस काम को हम शिक्षक न करें, वह बार्लकों से न करार्यार् जार्य, और बार्लक जिस काम मे लगे हों, उसमें उनके सार्थ काम करने वार्लार् एक शिक्षक हमेशार् रहें।’’ इसलिए बार्लकों ने जो कुछ सीखार्, उमंग के सार्थ सीखार्।

गार्ँधी जी ‘वेतन’ तथार् ‘अध्यार्पन कार्य’ को एक दूसरे के सार्थ मिलार्नार् अनुचित मार्नते थे। शिक्षक केवल वेतन के लिए काम नहीं करतार् है। अगर वह अध्यार्पन को वेतन के सार्थ जोड़ दे तो वह अपने कर्त्तव्य को पूरार् नही कर सकतार् है। गार्ँधी जी के अनुसार्र अध्यार्पन कार्य में सबसे अधिक आवश्यक है समर्पण की भार्वनार्।

अनुशार्सन 

महार्त्मार् गार्ँधी ने अनुशार्सन सम्बन्धी अपने विचार्रों क विकास निम्नलिखित धार्रणार्ओं के आधार्र पर कियार्-

  1. बच्चे जन्मजार्त बुरे नही होते, वार्तार्वरण उन्हें अच्छार् यार् बुरार् बनार्तार् है। 
  2. प्रार्कृतिक एवं सार्मार्जिक परिवेश को स्वच्छ एवं सहयोग पर आधार्रित कर अनुशार्सन को बनार्ये रखार् जार् सकतार् है। 
  3. विद्याथियों के आचरण को सर्वार्धिक प्रभार्वित अध्यार्पक क आचरण करतार् है। 
  4. अनैतिक कार्य भी शार्रीरिक रोग के समार्न व्यार्धि है, इसे दूर करने के लिए शिक्षक की सहार्नुभूति आवश्यक है, दण्ड नहीं। 

गार्ँधी जी आत्म अनुशार्सन पर जोर देते थे। वे छार्त्रों को शार्रीरिक दण्ड देने के प्रबल विरोधी थे। अध्यार्पकों क उच्च चरित्र और पवित्र आचरण छार्त्रों को अनुशार्सन क पार्ठ पढ़ार्ने मे सर्वार्धिक प्रभार्वशार्ली है।

बुनियार्दी शिक्षार् की असफलतार् के कारण 

बुनियार्दी शिक्षार् क कार्यक्रम सार्मार्न्य असफल रहार्। प्रसिद्ध शिक्षार्शार्स्त्री जे0 पी0 नार्यक (1998) ने बुनियार्दी शिक्षार् की असंतोषजनक प्रगति के निम्नलिखित कारण बतार्ए-

  1. इसक सर्वप्रमुख कारण सत्तार्धार्री वर्ग द्वार्रार् बुनियार्दी शिक्षार् को अस्वीकार कियार् जार्नार् है। इन वर्गों मे शार्रीरिक श्रम के प्रति उदार्सीनतार् की परम्परार् रही है। उनक आकर्षण पुस्तक आधार्रित शिक्षार् पर रहार् है। इस वर्ग ने स्कूल के पार्ठ्यक्रम में शार्रीरिक श्रम और उत्पार्दक कार्य आरम्भ करने के विरोध मे सार्मार्जिक और मार्नसिक दबार्व डार्लार्। 
  2. जनसार्धार्रण द्वार्रार् भी बेसिक शिक्षार् प्रणार्ली की आलोचनार् की गर्इ। आम जनतार् सार्धार्रणत: उच्च एवं मध्य वर्ग क अनुकरण करनार् चार्हती है। वे इस बार्त से असहमत थे कि शहरी मध्य वर्ग को पुस्तक केन्द्रित अंगे्रजी शिक्षार् दी जार्ये और ग्रार्मीण बच्चों को शिल्प आधार्रित शिक्षार्। वे इसे दोयम दर्जे की शिक्षार् मार्नते थे। उन्होंने ने भी बुनियार्दी शिक्षार् को अस्वीकार कर दियार्। 
  3. इसके सार्थ अन्य तकनीकी समस्यार्ंए भी थी। बुनियार्दी विद्यार्लयों मे शिल्प की शिक्षार् दी जार्ती थी। इसके लिए कच्चे मार्ल की आपूर्ति में कठिनाइ होती थी। कृषि के लिए भूमि चार्हिए थी। सार्थ ही शिल्प सिखार्ने के लिए प्रशिक्षित अध्यार्पकों की सर्वथार् कमी थी। सार्थ ही तैयार्र उत्पार्दों को बेचने की सन्तोषजनक व्यवस्थार् नहीं की जार् सकी। 
  4. छार्त्रों की संख्यार् मे द्रुतगति से विस्तार्र की एक अन्य प्रमुख समस्यार् थी। यदि यह प्रयोग प्रार्रम्भ में सीमित पैमार्ने पर होतार् तो शार्यद सफल हो सकतार् थार्। अनेक स्कूलों मे जहार्ँ सही प्रकार के अध्यार्पक उपलब्ध हुए और आवश्यक सुविधार्ंए प्रदार्न की गयी, यह कार्यक्रम सफल भी हुआ, परन्तु कार्यक्रम के बड़े स्तर पर विस्तार्र के लिए आवश्यक संसार्धन उपलब्ध नहीं थे।
  5. वित्त की दृष्टि से बुनियार्दी विद्यार्लयों क अनुभव मिश्रित रहार्। इसके कारण प्रार्थमिक शिक्षार् के लिए सरकारी निवेश में किसी प्रकार की कमी नहीं हुर्इ। अत: स्वतंत्र भार्रत मे भी सरकारों ने इस कार्यक्रम मे विशेष रूचि नहीं दिखलाइ। 

इस प्रकार अभिजार्त वर्ग के विरोध के कारण बुनियार्दी शिक्षार् क क्रार्ंतिकारी प्रयोग असफल रहार्।

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