मन क अर्थ एवं विशेषतार्एं

मन शब्द से हम सभी परिचित हैं। प्रार्य: इस शब्द क प्रयोग हम करते देखे जार्ते हैं। इस इकार्इ में हम इस शब्द के बार्रे में विस्तार्र से अध्ययन करेंगे। मन शब्द क प्रयोग कर्इ अर्थों में कियार् जार्तार् है। जैसे- मार्नस, चित्त, मनोभार्व तथार् मत इत्यार्दि। लेकिन मनोविज्ञार्न में मन क तार्त्पर्य आत्मन्, स्व यार् व्यक्तित्व से है। यह एक अमूर्त सम्प्रत्यय है। जिसे केवल महसूस कियार् जार् सकतार् है। इसे न तो हम देख सकते है। और न ही हम इसक स्पर्श कर सकते है। दूसरे शब्दों में मस्तिष्क के विभिन्न अंगों की प्रक्रियार् क नार्म मन है। प्रसिद्ध मनोविश्लेषणवार्दी मनोवैज्ञार्निक सिगमण्ड फ्रार्यड के अनुसार्र मन क सिद्धार्न्त एक प्रकार क परिकल्पनार्त्मक सिद्धार्न्त है। फ्रार्यड के अनुसार्र- ‘‘मन से तार्त्पर्य व्यक्तित्व के उन कारकों से होतार् है जिसे हम अन्तरार्त्मार् कहते है। तथार् जो हमार्रे व्यक्तित्व में संगठन पैदार् करके हमार्रे व्यवहार्रों को वार्तार्वरण के सार्थ समार्योजन करने में मदद करतार् है।’’ रेबर के अनुसार्र- ‘‘मन क तार्त्पर्य परिकल्पिक मार्नसिक प्रक्रियार्ओं एवं क्रियार्ओं की सम्पूर्णतार् से है, जो मनोवैज्ञार्निक प्रदत्त व्यार्ख्यार्त्मक सार्धनों के रूप में काम कर सकती है। अत: मन की हम मार्त्र कल्पनार् कर सकते हैं। इसको न तो किसी ने देखार् है और न ही हम इसकी कल्पनार् कर सकते हैं।’’

मन की अवस्थार्एँ 

मन की अवस्थार्ओं से तार्त्पर्य इसके विभिन्न पहलुओं से है। मन आत्मार् यार् व्यक्तित्व के दो पक्ष होते हं-ै जिन्हें आकारार्त्मक पक्ष और गत्यार्त्मक पक्ष कहते हैं-मन के आकारार्त्मक पक्ष से तार्त्पर्य जहार्ँ संघर्षमय परिस्थिति की गत्यार्त्मकतार् उत्पन्न होती है मन क यह पहलू वार्स्तव में व्यक्तित्व के गत्यार्त्मक शक्तियों के बीच होने वार्ले संघर्षों क एक कार्यस्थल होतार् है। मन के गत्यार्त्मक पक्ष से तार्त्पर्य उन सार्धनों से होतार् है जिसके द्वार्रार् मूल-प्रवृत्तियों से उत्पन्न मार्नसिक संघर्षों क समार्धार्न होतार् है। यहार्ँ हम सबसे पहले मन के आकारार्त्मक पक्ष के बार्रे में समझेंगे।

मन के आकारार्त्मक पक्ष 

आकारार्त्मक पक्ष क अध्ययन हम तीन भार्गों में बार्ँट कर करेंगे।

  1. चेतन मन 
  2. अर्द्ध चेतन मन 
  3. अचेतन मन

1. चेतन मन 

मन क वह भार्ग जिसक सम्बन्ध तुरन्त ज्ञार्न से होतार् है, यार् जिसक सम्बन्ध वर्तमार्न से होतार् है। जैसे- कोर्इ व्यक्ति लिख रहार् है तो लिखने की चेतनार् है, पढ़ रहार् है तो पढ़ने की चेतनार् है। व्यक्ति जिन शार्रीरिक और मार्नसिक क्रियार्ओं के प्रति जार्गरूक रहतार् है वह चेतन स्तर पर घटित होती है। इस स्तर पर घटित होने वार्ली सभी क्रियार्ओं की जार्नकारी व्यक्ति को रहती है। यद्यपि चेतनार् में लगार्तार्र परिवर्तन होते रहते हैं परन्तु इसमें निरन्तरतार् होती है अर्थार्त् यह कभी खत्म नहीं होती है।

चेतन मन की विशेषतार्एँ 

  1. यह मन क सबसे छोटार् भार्ग है। 
  2. चेतन मन क वार्ºय जगत की वार्स्तविकतार् के सार्थ सीधार् सम्बन्ध होतार् है। 
  3. चेतन मन व्यक्तिगत, नैतिक, सार्मार्जिक एवं सार्ंस्कृतिक आदर्शों से भरार् होतार् है। 
  4. यह अचेतन और अर्द्धचेतन पर प्रतिबन्ध क कार्य करतार् है।
  5. चेतन मन में वर्तमार्न विचार्रों एवं घटनार्ओं के जीवित स्मृति चिºन होते हैं। 

2. अर्द्ध चेतन मन 

अर्द्धचेतन क तार्त्पर्य वैसे मार्नसिक स्तर से होतार् है। जो वार्स्तव में में न तो पूरी तरह से चेतन हैं और ही पूरी तरह से अचेतन। इसमें वैसी इच्छार्एँ, विचार्र, भार्व आदि होते हैं। जो हमार्रे वर्तमार्न चेतन यार् अनुभव में नहीं होते हैं परन्तु प्रयार्स करने पर वे हमार्रे चेतन मन में आ जार्ती है। अर्थार्त् यह मन क वह भार्ग है, जिसक सम्बन्ध ऐसी विषय सार्मग्री से है जिसे व्यक्ति इच्छार्नुसार्र कभी भी यार्द कर सकतार् है। इसमें कभी-कभी व्यक्ति को किसी चीज को यार्द करने के लिए थोड़ार् प्रयार्स भी करनार् पड़तार् है। जैसे- अलमार्री में रखी कितार्बों में से जब किसी कितार्ब को ढूँढते हैं और कुछ समय के बार्द कितार्ब न मिलने पर परेशार्न हो जार्ते हं।ै फिर कुछ सोचने पर यार्द आतार् है कि वह कितार्ब हमने अपने मित्र को दी थी। अर्थार्त् अर्द्धचेतन मन चेतन व अचेतन के बीच पुल क काम करतार् है।

अर्द्ध चेतन मन की विशेषतार्एँ 

  1. मन क वह भार्ग जो चेतन से बड़ार् व अचेतन से छोटार् होतार् है। 
  2. अचेतन से चेतन में जार्ने वार्ले विचार्र यार् भार्व अर्द्धचेतन से होकर गुजरते हैं। 
  3. अर्द्धचेतन में किसी चीज को यार्द करने के लिए कभी-कभी थोड़ार् प्रयार्स करनार् पड़तार् है। 

3. अचेतन मन 

हमार्रे कुछ अनुभव इस तरह के होते हैं जो न तो हमार्री चेतनार् में होते हैं और न ही अर्द्धचेतनार् में। ऐसे अनुभव अचेतन होते हैं। अर्थार्त् यह मन क वह भार्ग है जिसक सम्बन्ध ऐसी विषय वस्तु से होतार् है जिसे व्यक्ति इच्छार्नुसार्र यार्द करके चेतनार् में लार्नार् चार्हे, तो भी नहीं लार् सकतार् है।

अचेतन में रहने वार्ले विचार्र एवं इच्छार्ओं क स्वरूप कामुक, असार्मार्जिक, अनैतिक तथार् घृणित होतार् है। ऐसी इच्छार्ओं को दिन-प्रतिदिन के जीवन में पूरार् कर पार्नार् सम्भव नहीं है। अत: इन इच्छार्ओं को चेतनार् से हटार्कर अचेतन में दबार् दियार् जार्तार् है और वहार्ँ पर ऐसी इच्छार्एँ समार्प्त नहीं होती है। बल्कि समय-समय पर ये इच्छार्एँ चेतन स्तर पर आने क प्रयार्स करती रहती है।

फ्रार्यड ने इस सिद्धार्न्त की तुलनार् आइसबर्ग से की है। जिसक 9/10 भार्ग पार्नी के अन्दर और 1/10 भार्ग पार्नी के बार्हर रहतार् है। पार्नी के अन्दर वार्लार् भार्ग अचेतन तथार् पार्नी के बार्हर वार्लार् भार्ग चेतन होतार् है तथार् जो भार्ग पार्नी के ऊपरी सतह से स्पर्श करतार् हुआ होतार् है वह अर्द्धचेतन कहलार्तार् है।

 अचेतन मन की विशेषतार्एँ 

  1. अचेतन मन अर्द्धचेतन व चेतन से बड़ार् होतार् है।
  2. अचेतन में कामुक, अनैतिक, असार्मार्जिक इच्छार्ओं की प्रधार्नतार् होती है।
  3. अचेतन क स्वरूप गत्यार्त्मक होतार् है। अर्थार्त् अचेतन मन में जार्ने पर इच्छार्एँ समार्प्त नहीं होती है। बल्कि सक्रिय होकर ये चेतन में लार्टै आनार् चार्हती है। परन्तु चेतन मन के रोक के कारण ये चेतन में नहीं आ पार्ती है और रूप बदलकर स्वप्न व दैनिक जीवन की छोटी-मोटी गलतियों के रूप में व्यक्त होती है और जो अचेतन के रूप को गत्यार्त्मक बनार् देती है।
  4. अचेतन के बार्रे में व्यक्ति पूरी तरह से अनभिज्ञ रहतार् है क्योंकि अचेतन क सम्बन्ध वार्स्तविकतार् से नहीं होतार् है।
  5. अचेतन मन क छिपार् हुआ भार्ग होतार् है। यह एक बिजली के प्रवार्ह की भार्ँति होतार् है। जिसे सीधे देखार् नहीं जार् सकतार् है परन्तु इसके प्रभार्वों के आधार्र पर इसको समझार् जार् सकतार् है। 

स्पष्ट है कि अचेतन अनुभूतियों एवं विचार्रों क प्रभार्व हमार्रे व्यवहार्र पर चेतन, अर्द्धचेतन अनुभूतियों एवं विचार्रों से अधिक होतार् है। इसी कारण चेतन व अर्द्धचेतन क आकार चेतन की अपेक्षार् बड़ार् होतार् है।

चेतन, अर्द्धचेतन तथार् अचेतन मन क तुलनार्त्मक अध्ययन –

  1. चेतन मन क वह भार्ग है जिसक सम्बन्ध तुरन्त ज्ञार्न से होतार् है। अर्द्धचेतन मन क वह भार्ग है जिसक सम्बन्ध ऐसी विषय-सार्मग्री से होतार् है, जिसे व्यक्ति इच्छार्नुसार्र कभी भी यार्द कर सकतार् है। 
  2. चेतन मन क आकार छोटार् अर्द्धचेतन मन क आकार उससे बड़ार् और अचेतन मन क आकार सबसे बड़ार् होतार् है। 
  3. चेतन मन में केवल वर्तमार्न अनुभव की स्मृतियार्ँ रहती है। परन्तु अचेतन क सम्बन्ध पिछले अनुभव से होतार् है और अर्द्धचेतन में ऐसे अनुभव से होतार् है जो पिछली अनुभूतियार्ँ (अनुभव) तो होती है। परन्तु आवश्यकतार् पड़ने पर हम उनक प्रत्यार्वहन कर सकते हैं। 
  4. चेतन मन क विषय व्यक्त एवं स्पष्ट होतार् है। अचेतन मन में विषय पूरी तरह से दमित होते हैं और अर्द्धचेतन मन में विषय आंशिक रूप से दमित होते हैं। 

मन के गत्यार्त्मक पहलू 

मन के गत्यार्त्मक पक्ष से तार्त्पर्य उन सार्धनों से होतार् है जिसके द्वार्रार् मूल प्रवृत्तियों से उत्पन्न मार्नसिक संघर्षों क समार्धार्न होतार् है। मूल प्रवृत्तियों से तार्त्पर्य वैसे जन्मजार्त और शार्रीरिक उत्तेजन से होतार् है जिसके द्वार्रार् व्यक्ति के सभी तरह के व्यवहार्र निर्धार्रित किये जार्ते हैं। मूल प्रवृत्तियार्ँ दो तरह की होती हैं-

  1. जीवन मूल प्रवृत्ति 
  2. मृत्यु मूल प्रवृत्ति 

जीवन मूल प्रवृत्ति में व्यक्ति सभी तरह के रचनार्त्मक कार्य करतार् है और मृत्यु मूल्य प्रवृत्ति में व्यक्ति सभी तरह के विध्वंसार्त्मक कार्य करतार् है। सार्मार्न्य व्यक्तित्व में इन दोनों तरह की मूल प्रवृत्तियों में सन्तुलन पार्यार् जार्तार् है और जब इन परस्पर विरोधी मूल प्रवृत्तियों में संघर्ष होतार् है तो व्यक्ति उनक समार्धार्न करने की कोशिश करतार् है। इस तरह के समार्धार्न के लिए मुख्य रूप से तीन प्रवृत्तियों क वर्णन कियार् गयार् है- उपार्हं, अहम्, नैतिक मन।

1. उपार्हं से तार्त्पर्य 

जन्म के समय शरीर की संरचनार् में जो कुछ भी निहित होतार् है वह पूर्णत: उपार्हं होतार् है। अर्थार्त् जन्मजार्त और वंशार्नुगत है। तार्त्कालिक सन्तुष्टि की इच्छार्एँ और विचार्र ही उपार्हं की प्रमुख विषय सार्मग्री है। वार्तार्वरण की वार्स्तविकतार् से उपार्हं क कोर्इ सीधार् सम्बन्ध नहीं होतार् है। इसक नैतिक, ताकिकतार्, समय, स्थार्न और मूल्यों आदि से कोर्इ सम्बन्ध नहीं होतार् है।

2. उपार्हं के कार्य 

इसक मुख्य कार्य शार्रीरिक इच्छार्ओं की सन्तुष्टि से है। यह किसी भी प्रकार के तनार्व से तुरन्त छुटकारार् पार्नार् चार्हतार् है। तुरन्त तनार्व को दूर करनार् ही सुखवार्द नियम कहार् गयार् है। दूसरे शब्दों में उपार्हं अपने उद्देश्यों की पूर्ति सुखवार्द नियम के आधार्र पर करतार् है। सुख की प्रार्प्ति और दु:ख को दूर करने के लिए उपार्हं के दो मुख्य कार्य हैं-

  1. सहज क्रियार्एँ- ये जन्मजार्त और स्वयं चलने वार्ली होती है। जैसे पलक झपकनार्, छींकनार् आदि। सभी व्यक्ति इन क्रियार्ओं को करने के बार्द संतोष क अनुभव करते हैं। 
  2. प्रार्थमिक क्रियार्एँ- तनार्व को दूर करने के लिए प्रार्थमिक क्रियार्एँ व्यक्ति के सार्मने उस वस्तु की प्रतिभार् बनार्ती है। जैसे- एक प्यार्से व्यक्ति के सार्मने पार्नी की प्रतिमार् प्रस्तुत कर उसकी प्यार्स की सन्तुष्टि करनार्। यहार्ँ पार्नी की प्रतिमार् उपस्थित करनार् एक प्रार्थमिक प्रक्रियार् क कार्य है। 

3. अहम् से तार्त्पर्य 

यह मन के गत्यार्त्मक पहलू क दूसरार् भार्ग है। यह जन्म के समय बच्चे में मौजूद नहीं होतार् है बल्कि बार्द में विकसित होतार् है। बार्लक की आयु बढ़ने के सार्थ-सार्थ वह वार्तार्वरण की वार्स्तविकतार् की ओर बढ़ने लगतार् है। आयु बढ़ने के सार्थ-सार्थ वह ‘मेरार्’ और ‘मुझे’ जैसे शब्दों क अर्थ समझने लगतार् है। धीरे-धीरे वह समझने लगतार् है कि कौन सी वस्तु उसकी है और कौन सी वस्तु दूसरों की। यह उपार्हं क एक मुख्य भार्ग है। जो वार्ºय वार्तार्वरण के प्रभार्व के कारण विकसित होतार् है।

4. अहम् के कार्य 

अहमं् क मुख्य कार्य वार्ºय वार्तार्वरण के खतरों से जीवन की रक्षार् करनार् है। यह अपने लक्ष्य को वार्स्तविकतार् के नियम के आधार्र पर पूरार् करतार् है। यह सुखवार्दी नियम क विरोधी नहीं है बल्कि उपयुक्त परिस्थिति के आते ही तार्त्कालिक सन्तुष्टि में सहार्यतार् करतार् है क्योंकि यह व्यक्तित्व क बौद्धिक पक्ष है। अत: तुरन्त सन्तुष्टि के लिए उपयुक्त परिस्थिति को खोजने यार् उत्पन्न करने क कार्य भी करतार् है। अहमं् को व्यक्तित्व क निर्णय लेने वार्लार् मार्नार् गयार् है। यह थोड़ार् चेतन, थोड़ार् अर्द्धचेतन और थोड़ार् अचेतन होतार् है। इसके द्वार्रार् इन तीनों स्तरों पर निर्णय लियार् जार्तार् है।

5. नैतिक मन से तार्त्पर्य 

यह मन के गत्यार्त्मक पक्ष क सबसे अन्तिम भार्ग है और यह व्यक्तित्व क नैतिक पक्ष है। जैसे-जैसे बच्चार् बड़ार् होतार् जार्तार् है, वह अपनार् तार्दार्त्म्य मार्तार्-पितार् के सार्थ स्थार्पित करने लगतार् है और बच्चार् यह सीख लेतार् है कि क्यार् उचित है और क्यार् अनुचित है, क्यार् नैतिक है और क्यार् अनैतिक। इस तरह सीखने से नैतिक मन की शुरूआत होती है। यह आदर्शवार्दी सिद्धार्न्त द्वार्रार् निर्देशित और नियंत्रित होतार् है। बचपन में सार्मार्जीकरण के दौरार्न बच्चार्, मार्तार्-पितार् द्वार्रार् दिये गये उपदेशों को अपने अहम्ं में संजोए रखतार् है और यही बार्द में नैतिक मन क रूप ले लेतार् है। यहार्ँ विकसित होकर एक ओर उपार्हं की कामुक, आक्रार्मक एवं अनैतिक प्रवृत्तियों पर रोक लगार्तार् है तो दूसरी ओर अहं को वार्स्तविक एवं यथाथ लक्ष्यों से हटार्कर नैतिक लक्ष्यों की ओर ले जार्तार् है। नैतिक मन व्यक्ति के कामुक एवं आक्रार्मक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण दमन के मार्ध्यम से करतार् है। जबकि नैतिक मन दमन क प्रयोग स्वयं नहीं करतार् है बल्कि वह अहमं् को दमन के प्रयोग क आदेश देकर ऐसी इच्छार्ओं पर नियंत्रण करतार् है और यदि अहम्ं इस आदेश क पार्लन नहीं करतार् है तो व्यक्ति में अनेक दोष-भार्व उत्पन्न हो जार्ते हैं।

6. नैतिक मन के कार्य 

यह सार्मार्जिकतार् तथार् नैतिकतार् क कार्य करतार् है। यह अहम्ं के उन सभी कार्यों पर रोक लगार्तार् है जो सार्मार्जिक और नैतिक नहीं है। नैतिक मन क अहमं के प्रति कार्य और व्यवहार्र वैसार् ही होतार् है जैसार् एक बच्चे के प्रति मार्तार्-पितार् क व्यवहार्र होतार् है। अत: नैतिक मन के मुख्य कार्य हं-ै

  1. उपार्हं के अनैतिक, असार्मार्जिक और कामुक संवेगों पर रोक लगार्नार्। 
  2. अहमं के आवेगों को नैतिक और सार्मार्जिक लक्ष्यों की ओर ले जार्ने की कोशिश करनार्। 
  3. पूर्ण सार्मार्जिक और आदर्श प्रार्णी बनार्ने के लिए प्रार्णी बनार्ने के लिए प्रयार्स करनार्। 

7. उपार्हं, अहम्ं और नैतिक मन में सम्बन्ध 

उपार्हं, अहमं और नैतिक मन तीनों क ही सम्बन्ध व्यक्ति के व्यक्तित्व से है और ये तीनों इकाइयार्ँ गतिशील हैं। उपार्हं आनन्द (सुख) सिद्धार्न्त, अहम्ं वार्स्तविकतार् सिद्धार्न्त और नैतिक मन आदर्शवार्दी सिद्धार्न्त से नियंत्रित होतार् है। सार्मार्न्य व्यक्तित्व में इन तीनों ही अंगों में पर्यार्प्त मार्त्रार् में मेल पार्यार् जार्तार् है। इन तीनों इकाइयों में जितनी ही खींचार्तार्नी होती है, व्यक्ति क व्यक्तित्व उतनार् ही अधिक असार्मार्जिक हो जार्तार् है और उसके व्यक्तित्व क विघटन उतनार् ही अधिक होतार् है। जबकि सार्मार्न्य व्यक्तित्व के लिए आवश्यक है कि इन तीनों में आपस में समार्योजन बनार् रहे। जब इन तीनों में कोर्इ एक यार् दो इकार्इ अधिक प्रभार्वशील हो जार्ती है तो इनमें आपस में समार्योजन बिगड़ जार्तार् है। अहम्ं व्यक्तित्व क केन्द्र होतार् है। यह उपार्हं, नैतिक मन और वार्तार्वरण की वार्स्तविकतार्ओं के बीच समार्योजन बनार्कर व्यवहार्र करतार् है। इसे हम निम्न तरह से समझ सकते हैं-

नैतिक मन

 पर्यार्वरण की वार्स्तविकतार्एँ  →  अहम  ← सक्रियतार् यार् व्यवहार्र

उपार्हं

उपार्हं, नैतिक मन और वार्तार्वरण की वार्स्तविकतार्ओं के मध्य अहम्ं जितनार् ही अधिक समार्योजन करने में सक्षम होगार्, व्यक्ति क व्यक्तित्व उतनार् अधिक स्थार्यी होगार्। उपार्हं और नैतिक मन को हम इस उदार्हरण द्वार्रार् समझ सकते हैं- एक सुनसार्न सड़क पर एक युवती को देखकर युवक के मन में विचार्र आतार् है कि मं ै इसे छेड़ू। इस प्रकार क विचार्र उपार्हं है। फिर उसके मन में विचार्र आतार् है कि यहार्ँ छेड़नार् ठीक नहीं है। यहार्ँ किसी ने देख लियार् तो पिटाइ हो जार्येगी, थोड़ी दूर आगे जहार्ँ इसे कोर्इ नहीं देखेगार् वहार्ँ छेड़नार् अधिक उपयुक्त होगार्। इस प्रकार क विचार्र अहमं है। फिर उस युवक के मन में विचार्र आतार् है कि नहीं? इसे छेड़नार् अच्छी बार्त नहीं है। यह युवती किसी की बेटी होगी यार् किसी की बहन होगी। समार्ज में इस तरह क व्यवहार्र अच्छार् नहीं मार्नार् जार्तार् है। इस प्रकार क विचार्र नैतिक मन है।

जब व्यक्ति में उपार्हं की इच्छार् तीव्र होती है तो व्यक्ति सुखवार्दी, स्वार्थ्र्ार्ी और अनियंत्रित होतार् है और जब व्यक्ति में अहमं की इच्छार् प्रबल होती है तो उसमें मैं की अधिकतार् होती है। जिस व्यक्ति में नैतिक मन तीव्र होतार् है वह व्यक्ति आदर्शवार्दी होतार् है। उसमें भले-बुरे क विचार्र अधिक होतार् है।

8. उपार्हं, अहम्ं और नैतिक मन के बीच समार्नतार्एँ एवं विभिन्नतार्एॅ 

फ्रार्यड के अनुसार्र एक स्वस्थ-सार्मार्न्य व्यक्ति में तीनों ही काफी समन्वित ढंग से कार्य करते हैं तथार् इसमें किसी प्रकार क संघर्ष नहीं होतार् है। इन तीनों में कुछ समार्नतार्एँ और भिन्नतार्एँ भी पार्यी जार्ती हैं जो इस प्रकार हैं-

समार्नतार्एँ 

  1. उपार्हं, अहम्ं, नैतिक मन तीनों ही मन के गत्यार्त्मक पहलू के काल्पनिक भार्ग है। जिन्हें अन्य वस्तुओं की भार्ँति दिखार्यार् नहीं जार् सकतार् है। 
  2. किसी भी मार्नसिक संघर्ष में तीनों शार्मिल रहते हैं। अन्तर सिर्फ मार्त्रार् क होतार् है। 

विभिन्नतार्एँ 

  1. उपार्हं बच्चों में जन्म से ही मौजूद रहतार् है। एक वर्ष के बार्द बच्चों में अहं क विकास होतार् है और जब बच्चार् तीन-चार्र वर्ष क हो जार्तार् है तब वह अपने मार्तार्-पितार् के सार्थ सम्बन्ध (तार्दार्त्म्य) स्थार्पित कर लेतार् है तथार् उनके द्वार्रार् कही गयी बार्तों को ग्रहण करने लगतार् है। फलत: बच्चे में नैतिक मन क विकास होने लगतार् है। अहमं
  2. पार्हं आनन्द सिद्धार्न्त (सुखवार्दी), अहम्ं वार्स्तविकतार् सिद्धार्न्त तथार् नैतिक मन आदर्शवार्दी सिद्धार्न्त से नियंत्रित होतार् है।
  3. उपार्हं तथार् परार्हं को वार्ºय वार्तार्वरण की वार्स्तविकतार् से कोर्इ मतलब नहीं होतार् है जबकि अहमं् क वार्ºय वार्तार्वरण की वार्स्तविकतार् से सीधार् सम्बन्ध होतार् है।
  4. उपार्हं पूरी तरह से अचेतन होतार् है जबकि अहम्ं और नैतिक मन दोनों ही थोड़ार् चेतन, थोड़ार् अर्द्धचेतन और थोड़ार् अचेतन होते हैं।
  5. अहमं एक समार्योजक के रूप में कार्य करतार् है जबकि उपार्हं और नैतिक मन की प्रवृत्ति परस्पर विरोधी होती है। 
  6. उपार्हं पूरी तरह से अनैतिक होतार् है जबकि नैतिक मन पूरी तरह से नैतिक होतार् है।

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