भ्रष्टार्चार्र क अर्थ, परिभार्षार् एवं प्रकार

भ्रष्टार्चार्र “भ्रष्ट और आचरण” दो पदों के योग से बनार् है। भ्रष्टार्चार्र शब्द क अर्थ है – निकृश्ट आचरण अथवार् बिगड़ार् हुआ आचरण। भ्रष्टार्चार्र सदार्चार्र क विलोम और कदार्चार्र क समार्नाथी मार्नार् जार्तार् हे। नीति न्यार्य, सत्य, ईमार्नदार्री आदि मौलिक और सार्त्विक वृत्तियों स्वाथ, असत्य और बेईमार्नी से सम्बन्धित सभी कार्य भ्रष्टार्चार्र से सम्बन्धित हैं।

भ्रष्टार्चार्र क अर्थ

भ्रष्टार्चार्र संस्कृत भार्षार् के दो शब्द “भ्रष्ट” और “आचार्र” से मिलकर बनार् है। “भ्रष्ट” क अर्थ होतार् है – निम्न, गिरार् हुआ, पतित, जिसमें अपने कर्त्तव्य को छोड़ दियार् है तथार् “आचार्र” शब्द क अर्थ होतार् है आचरण, चरित्र, चार्ल, चलन, व्यवहार्र आदि। अत: भ्रष्टार्चार्र क अर्थ है – गिरार् आचरण अथवार् चरित्र और भ्रष्टार्चार्री क अर्थ होतार् है – ऐसार् व्यक्ति जिसने अपने कर्तव्य की अवहेलनार् करके निजी स्वाथ के लिये कुछ ऐसे कार्य किए हैं, जिनकी उससे अपेक्षार् नहीं थी। आजकल स्वतंत्र भार्रत में यह शब्द प्रार्य: नेतार्ओं, जमार्खोरों, चोर बार्जार्रियों, मुनार्फार्खोरों आदि के लिये ज्यार्दार् प्रयोग कियार् जार्तार् है। अंग्रेजी के ‘करप्शन’ शब्द को ही हिन्दी में भ्रष्टार्चार्र कहार् जार्तार् है तथार् नई सभ्यतार् एवं भोगवार्दी मनोवृत्ति को भ्रष्टार्चार्र की जननी मार्नार् जार्तार् है।

रार्जनीतिक भ्रष्टार्चार्र से तार्त्पर्य मुख्य रूप से लोक सत्तार् क रार्जनीतिक सत्तार्धार्रियों अथवार् रार्जनेतार्ओं द्वार्रार् व्यक्तिगत लार्भ हेतु दुरुपयोग करने से है। लोकसत्तार् क दुरुपयोग करते हुए इनके द्वार्रार् सावजनिक सार्धनों क प्रयोग सावजनिक हितों के लिए न करके व्यक्तिगत हितों के लिए कियार् जार्तार् है। रार्जनीतिक कार्यों में धन के हस्तक्षेप ने रार्जनीतिक सत्तार्धार्रियों को स्वहितों की पूर्ति के लिए अधिक धन संग्रह हेतु प्रेरित कियार् है। उनक उद्देश्य सावजनिक सेवार्ओं के लक्ष्य से भटक कर व्यक्तिगत लार्भ प्रार्प्त करनार् हो गयार् है। और यह व्यक्तिगत लार्भ उनके द्वार्रार् सावजनिक हितों की उपेक्षार् करके सावजनिक सेवार्ओं हेतु उपलब्ध सार्धनों क व्यक्तिगत सेवार्ओं हेतु प्रयोग करके कियार् जार्तार् है। व्यक्तिगत हितों की पूर्ति एवं आवश्यकतार् से अधिक सेवार्ओं क लार्भ प्रार्प्त करने की महत्वकांक्षार् ने ही रार्जनीतिक भ्रष्टार्चार्र को बढार्वार् दियार् है। दूसरे शब्दों में, रार्जनेतार्ओं के सरकारी कार्यक्षेत्र. में दुव्र्यवहार्र को भी रार्जनीतिक भ्रष्टार्चार्र की संज्ञार् दी जार्ती है क्योंकि जो सत्तार् और प्रभुत्व किसी भी सावजनिक पदार्धिकारी को जनतार् की सेवार् के लिए प्रदार्न कियार् जार्तार् है, उन सभी क प्रयोग उनके द्वार्रार् अपनी विशेष स्थिति और शक्तियों के कारण व्यक्तिगत हितों की पूर्ति हेतु कियार् जार्तार् है। रार्जनीतिक भ्रष्टार्चार्र में ऐसी प्रक्रियार् निहित है जिसमें लोक व्यवस्थार् के लिए बनार्ए गए नियमों क प्रत्यक्ष अथवार् अप्रत्यक्ष रूप से उल्लंघन कियार् जार्तार् है। जब सावजनिक व्यय हेतु निर्धार्रित की गई धनरार्शि व्यक्तिगत लार्भ एवं स्वाथपूर्ति हेतु खर्च की जार्ने लगती है तो रार्जनीतिक भ्रष्टार्चार्र और अधिक ऊँचे स्तर पर पहुँच जार्तार् है। यह लार्भ मार्त्र व्यक्तिगत ही न रहकर पार्रिवार्रिक सदस्यों अथवार् समूहों को भी प्रार्प्त होतार् है। रार्जनीतिक भ्रष्टार्चार्र में रार्जनेतार्ओं द्वार्रार् सावजनिक कार्यार्लयों में गुप्त रूप से विषैले एवं निंदनीय कार्यों को सम्मिलित कियार् जार्तार् है। उनके द्वार्रार् लोकहित अथवार् लोकमत की उपेक्षार् करते हुए देश की वैधार्निक व्यवस्थार् सम्बन्धी नियमों क उल्लंघन कियार् जार्तार् है। सावजनिक सेवार्ओं को ईमार्नदार्री से उपलब्ध करार्ने में उनकी कोई रुचि नहीं रह जार्ती। रार्जनीतिक भ्रष्टार्चार्र में प्रार्य: बेईमार्नी से काम करार्ने के लिए रिश्वत के प्रलोभन दिय जार्ते हैं जिनमें वार्ंछित नियमों की पूरी तरह से उपेक्षार् की जार्ती है।

यद्यपि यह स्पष्ट रूप से नहीं कहार् जार् सकतार् कि कौन सार् कार्य रार्जनीतिक भ्रष्टार्चार्र में सम्मिलित कियार् जार्ए कौन सार् नहीं, तथार्पि यदि जनतार् द्वार्रार् रार्जनेतार्ओं के किसी कार्य के विरोध में उत्तेजनार्पूर्ण रोश दर्शार्यार् जार्तार् है तो वह निश्चित रूप से रार्जनीतिक भ्रष्टार्चार्र क हिस्सार् है।

भ्रष्टार्चार्र की परिभार्षार्

सेन्चूरियार् के अनुसार्र, “किसी भी रार्जनीतिक कार्य क भार्वनार् एवं परिस्थितियों के आधार्र पर परीक्षण करने के पष्चार्त् यदि समकालीन सिद्च्छार् एवं रार्जनीतिक नैतिकतार् के तर्क इस निष्कर्ष पर पहुँचते है कि व्यक्तिगत हितों के लिए सावजनिक हितों को बलिदार्न कियार् गयार् है तो निश्चित रूप से वह कार्य रार्जनीतिक भ्रष्टार्चार्र क अंग है।”

यहार्ँ भ्रष्टार्चार्र एवं रार्जनीतिक भ्रष्टार्चार्र में भेद करनार् भी अनिवाय हो जार्तार् है। यद्यपि प्रत्यक्ष रूप से दोनों शब्दों क एक ही अर्थ प्रतीत होतार् है, किन्तु वस्तुत: भ्रष्टार्चार्र रार्जनीतिक भ्रष्टार्चार्र से कहीं अधिक व्यार्पक है।
दिन-प्रतिदिन के कार्यों में लोकसेवकों द्वार्रार् अतिरिक्त आय प्रार्प्त करने के लिए अपनी शक्तियों क दुरुपयोग करके आम नार्गरिकों से कार्यों को करने के बदले में धन वसूलार् जार्तार् है जिसे हम शक्ति क दुरुपयोग अथवार् शक्ति की विकृति कह सकते हैं। कोई भी भ्रष्टार्चार्र युक्त कार्य किसी सावजनिक अथवार् सरकारी व्यवस्थार् के प्रति पूर्ण किये जार्ने वार्ले उत्तरदार्यित्वों क उल्लंघन है। किसी विशेष उपलब्धि हेतु सार्धार्रण हितों की उपेक्षार् करनार्ार् और व्यक्तिगत हितों को महत्व देनार् ही भ्रष्टार्चार्र है। यह प्रशार्सनिक, व्यार्पार्रिक, सार्मार्जिक, न्यार्यिक अथवार् रार्जनीतिक सभी प्रकार क हो सकतार् है। लेकिन रार्जनीतिक भ्रष्टार्चार्र, भ्रष्टार्चार्र की अपेक्षार् केवल रार्जनीतिक गतिविधियों तक संकुचित हो जार्तार् है। इसके अन्तर्गत हम केवल उन गलत कार्यों को सम्मिलित करते हैं जिनमें मुख्य रूप से रार्जनेतार्ओं द्वार्रार् अपने व्यक्तिगत उद्देश्यों को प्रार्प्त करने के लिए, सत्तार् क दुरुपयोग कियार् जार्तार् है। रार्जनीतिक भ्रष्टार्चार्र रार्जनेतार्ओं द्वार्रार् अपने अथवार् अपने से सम्बन्धित अन्य लोगों को प्रत्यक्ष अथवार् अप्रत्यक्ष रूप से लार्भार्न्वित करने हेतु रार्जनीतिक सत्तार् क औचित्यहीन एवं गलत ढंग से कियार् गयार् प्रयोग है। दूसरे शब्दों में, यह व्यक्तिगत प्रार्प्तियों के लिए कियार् जार्ने वार्लार् सावजनिक हितों क व्यार्पार्र है।

रार्जनीतिक भ्रष्टार्चार्र किसी भी रूप में रिश्वत के समार्नाथी शब्द के रूप में स्वीकार नहीं कियार् जार् सकतार्। जहार्ं एक ओर रार्जनीतिक भ्रष्टार्चार्र में कर्तव्यों की उपेक्षार् करने के लिए अनुचित प्रतिफल क प्रलोभन है वहीं दूसरी ओर रिश्वत लोकसेवकों को किसी काम को अपने हित पूर्ति के लिए दियार् जार्ने वार्लार् पैसार् है, जो उन्हें कीमत, इनार्म अथवार् उपहार्र के रूप में दियार् जार्तार् है। रिश्वत क प्रयोग मुख्य रूप से कर्त्तव्यों की अनदेखी अथवार् कर्त्तव्यों एवं शक्तियों क गलत प्रयोग करने के प्रतिफल में लोकसेवकों, अभिकर्तार्ओं, न्यार्यार्धीषों, गवार्हों, मतदार्तार्ओं आदि को बहुमूल्य उपहार्र प्रदार्न करके अथवार् मुद्रार् के रूप में कियार् जार्तार् है। रिश्वत और रार्जनीतिक भ्रष्टार्चार्र क अर्थ अलग-अलग होते हुए भी दोनों एक दूसरे से घनिश्ठ रूप में सम्बन्धित हैं, जिनको अलग नहीं कियार् जार् सकतार्। रिश्वत लेने वार्लार् व्यक्ति तो भ्रष्ट होतार् ही है किन्तु ऐसार् व्यक्ति भी भ्रष्टार्चार्र में लिप्त हो सकतार् है जिसक रिश्वत लेने से कोई सम्बन्ध नहीं है। रार्जनीतिक भ्रष्टार्चार्र किसी व्यक्तिगत लार्भ की प्रवृत्ति के बिनार् भी कियार् जार्नार् संभव है। कई बार्र जब व्यवस्थार्पिक सदस्यों द्वार्रार् अपने कर्त्तव्यों से विमुख होकर आर्थिक लार्भ के लिए अनुचित कार्य करते हैं तो वह रिश्वत के अभार्व में भी रार्जनैतिक भ्रष्टार्चार्र की श्रेणी में आ जार्तार् है। उन्हें किसी अन्य के द्वार्रार् कोई प्रलोभन नही दियार् जार्तार्। यह एक प्रकार क स्वभ्रष्टार्चार्र (auto corruption) है जो रार्जनेतार्ओं में स्वत: ही अपने हितों की पूर्ति के लिए उत्पé होतार् है। इस प्रकार रार्जनीतिक भ्रष्टार्चार्र में रिश्वत के मार्ध्यम से दूसरे लोगों की हितों की पूर्ति के लिए अनुचित कार्य किए जार्ते हैं। जबकि अपने हितों की पूर्ति के लिए रार्जनेतार्ओं द्वार्रार् अपने पद की शक्तियों क दुरुपयोग औचित्यहीनतार् के सार्थ कियार् जार्तार् है। अत: यह कहार् जार् सकतार् है कि रार्जनीतिक भ्रष्टार्चार्र में न्यूनार्धिक लार्भ प्रार्प्ति की दृष्टि से कियार् गयार् कोई भी कार्य सम्मिलित है जिसमें पद के कर्त्तव्यों क निर्वहन न करके शक्तियों क दुरुपयोग कियार् गयार् है। इसके सार्थ-सार्थ रार्जनीतिक भ्रष्टार्चार्र में भार्ई-भतीजार्वार्द एवं गबन पर आधार्रित गतिविधियों को भी सम्मिलित कियार् जार्तार् है।

रार्जनीतिक भ्रष्टार्चार्र व्यक्तिगत सार्ध्यों के लिए रार्जनीतिक संसार्धनों क असंस्वीकृत एवं औचित्यहीन प्रयोग है जिसमें मुख्य रूप से तीन तत्वों को सम्मिलित कियार् जार्तार् है – (1) रार्जनीतिक भ्रष्टार्चार्र और गैर रार्जनीतिक भ्रष्टार्चार्र में अंतर है। (2) रार्जनीतिक भ्रष्टार्चार्र एवं रार्जनीतिक प्रक्रियार् में अंतर है और (3) रार्जनीतिक भ्रष्टार्चार्र वर्तमार्न में सार्मार्जिक प्रक्रियार् क हिस्सार् बन गयार् है। व्यार्पक अर्थों में रार्जनीतिक भ्रष्टार्चार्र उन लोगों में व्यार्प्त है जो औपचार्रिक रार्जनीति में किसी पद पर आसीन हैं तथार् शक्ति क दुरुपयोग करते हैं। इसके सार्थ ही कुछ अन्य लोग, समूह एवं संस्थार्एं जो औपचार्रिक रार्जनीति क हिस्सार् नहीं हैं, परन्तु इनसे सम्बन्धित है वो भी रार्जनीतिक भ्रष्टार्चार्र क अंग मार्नी जार्ती हैं।

(David H. Bayley) कहते हैं कि “भ्रष्टार्चार्र एक सार्मार्न्य शब्दार्वली है जिसमें अपने व्यक्गित लार्भ के विचार्र के परिणार्मस्वरूप सत्तार् क दुरुपयोग भी आतार् है, जो जरूरी नहीं धन-संबंधी हो।” (J.S. Nye) भ्रष्टार्चार्र की परिभार्षार् इस प्रकार करते हैं, “ऐसार् व्यवहार्र जो एक सावजनिक भूमिक के औपचार्रिक कर्त्तव्यों से निजी (व्यक्तिगत, निकट परिवार्र, निजी गुट) आर्थिक लार्भ यार् स्तरीय लार्भ के कारण विचलित हो जार्तार् है, यार् कुछ प्रकार के निजी प्रभार्वों से प्रभार्वित हो कर नियमों क उल्लंघन करतार् है,10 भ्रष्टार्चार्र कहलार्तार् है”। ऐसे व्यवहार्र, जो “औपचार्रिक कर्त्तव्यों” क उल्लंघन करतार् है, के उदार्हरण हैं: घूसखोरी (एक विष्वस्त स्थिति वार्ले व्यक्ति के निर्णय को विकृत करने के लिए धन क प्रयोग), भार्ई-भतीजार्वार्द (संरक्षित पदों को योग्यतार् की अपेक्षार् पार्रिवार्रिक संबंधों के आधार्र पर बार्ंटनार्); बेईमार्नी से हथियार्नार् (सावजनिक सार्धनों क निजी प्रयोग के लिए अवैध आवंटन); तथार् किसी स्थिति के अनुकूल दंड शार्सन को लार्गू करने यार् कानून को लार्गू करने में जार्नबूझ कर असफल होनार्। इस परिभार्शार् के अनुसार्र कोई व्यवहार्र केवल तभी भ्रष्ट होतार् है जब यह किसी औपचार्रिक मार्नक अथवार् नियम क उल्लंघन करतार् है (जिसको विधि द्वार्रार् भ्रष्ट घोशित कियार् गयार् है)। वर्तमार्न प्रयोग में भ्रष्टार्चार्र क अर्थ अपने व्यक्तिगत अथवार् समूह के हित के लिये सावजनिक दार्यित्व के सार्थ धोखार् करनार् है। इस परिभार्शार् में यह बार्त पहले से स्वीकार कर ली जार्ती है कि लोक-अधिकारियों के पार्स कार्य के दो यार् अधिक विकल्पों में से एक को चुनने की शक्ति होती है, और सरकार के पार्स कुछ शक्ति यार् सम्पत्ति क स्रोत है जो लोक-अधिकारी अपने निजी लार्भ के लिए ले सकतार् है यार् प्रयोग कर सकतार् है।

भ्रष्टार्चार्र के कुछ अनिवाय तत्व

  1. यह एक लोक-अधिकारी द्वार्रार् अपनी स्थिति, स्तर अथवार् संसार्धनों क जार्नबूझ कर यार् ऐच्छिक दुरुपयोग है। 
  2. यह प्रत्यक्ष यार् परोक्ष रूप में कियार् जार् सकतार् है। 
  3. यह अपने निजी स्वाथ यार् लार्भ को बढ़ार्ने के लिये कियार् जार्तार् है, चार्हे वह आर्थिक लार्भ हो यार् शक्ति, सम्मार्न यार् प्रभार्व को बढ़ार्नार् हो। 
  4. यह व्यवहार्र के विधिवत, मार्न्य अथवार् सार्मार्न्य स्वीकृत नियमों क उल्लंघन करके कियार् जार्तार् है। 
  5. यह समार्ज यार् अन्य व्यक्तियों के हितों के प्रतिकूल कियार् जार्तार् है। आजार्दी के पूर्व भार्रतीयों ने स्वतन्त्र भार्रत के लिए अनेक सपने संजोये थे। उनमें से उनक एक प्रमुख सपनार् भ्रष्टार्चार्र मुक्त शार्सन व्यवस्थार् तथार् समार्ज क भी थार् परन्तु दुर्भार्ग्यवष उनक यह सपनार् महज सपनार् ही है। यह एक कटु सत्य है कि जैसे-जैसे नैतिकतार्पूर्ण, भ्रष्टार्चार्र मुक्त शार्सन व्यवस्थार् तथार् समार्ज निर्मार्ण की ओर बढने के प्रयार्स किये जार् रहे हैं वैसे-वैसे समार्ज में भ्रष्टार्चार्र एवं अनैतिकतार् के नये-नये रूप में नित नये कीर्तिमार्न भी स्थार्पित हो रहे हैं।

भ्रष्ट आचरण, इसके अन्तर्गत वह सभी भ्रष्ट आचरण में आते हैं जो नैतिकतार् के विरुद्ध होते हैं, अर्थार्त् कोई भी ऐसार् व्यवहार्र जो लोकाचार्र अथवार् सदार्चार्र के विपरीत है, वस्तुत: यह भ्रष्टार्चार्र है। कदार्चार्र, दुरार्चार्र, स्वेच्छार्चार्र, मिथ्यार्चार्र, छल-छद्म, अत्यार्चार्र, अन्यार्य, पक्षपार्त, पार्खण्ड, रिष्वतखोरी, कालार्बार्जार्री, गबन, तस्करी, विष्वार्सघार्त, देषद्रोह, व्यभिचार्र, आदि सब भ्रष्टार्चार्र के ही वंषज हैं। भ्रष्टार्चार्र क स्तर और प्रकार परिस्थितियों अथवार् संस्कृतियों पर निर्भर करतार् है। लेकिन बेईमार्नी स्वत: भ्रष्टार्चार्र की मूल अवस्थार् है, जो भ्रष्ट आचरण से भ्रष्ट व्यवस्थार् को जन्म देती है। भार्रतीय दण्ड संहितार् के अध्यार्य-9 में भ्रष्टार्चार्र को विस्तृत रूप में परिभार्शित कियार् गयार् है। इसमें उपबन्धित धार्रार् 161 प्रमुखत: लोक सेवकों में भ्रष्टार्चार्र से संबंधित है, जिनकी परिधि में घूस अथवार् रिष्वत और सहवर्ती अपरार्ध, विधि विरुद्ध कार्य एवं लोक सेवकों के प्रतिरूपण संबंधी कार्य आते हैं। धार्रार् 161 में उपबन्धित है कि वह व्यक्ति भ्रष्टार्चार्र क दोशी मार्नार् जार्येगार् जो कोई लोक सेवक होते हुए यार् होने को प्रत्यक्ष रखते हुए वैध पार्रिश्रमिक से भिन्न किसी प्रकार क भी परितोशण इस बार्त को करने के लिए यार् इनार्म के रूप में किसी व्यक्ति से प्रतिगृहीत यार् अभिप्रार्प्त करेगार् यार् प्रतिगृहीत करने को सहमत होगार् यार् अभिप्रार्प्त करने क प्रयत्न करने क प्रयार्स करेगार् कि वह लोक सेवक अपनार् कोई पदीय कार्य करे यार् प्रवृत्त रहें अथवार् किसी व्यक्ति को अपने पदीय कृत्यों के प्रयोग में कोई अनुग्रह दिखार्ये यार् दिखार्ने से प्रवृत्त रहें अथवार् केन्द्रीय सरकार यार् किसी रार्ज्य सरकार यार् संसद यार् किसी रार्ज्य के विधार्नमण्डल में यार् किसी लोक सेवक के यहार्ँ उसको वैसी हैसियत में किसी व्यक्ति क कोई उपकार यार् अपकार करे यार् करने क प्रयत्न करें।

उपरोक्त वार्क्यार्ंश में – “लोक सेवक प्रत्यार्क्षार् रखते हुए” क स्पश्टीकरण इस प्रकार दियार् गयार् है कि यदि कोई व्यक्ति, जो किसी पद पर नियुक्त होने की प्रत्यार्क्षार् न रखते हुए दूसरों को प्रवचनार् से यह विष्वार्स करार्कर कि वह किसी पद पर होने वार्लार् है और यह कि तब वह उनक उपकार करेगार्, उनसे परितोशण अभिप्रार्प्त करेगार् तो वह छल करने क दोशी हो सकेगार्, किन्तु वह इस धार्रार् में परिभार्शित अपरार्ध क दोशी नहीं है।

पुन: उक्त धार्रार् में पार्रितोशण शब्द क स्पष्टीकरण करण इस प्रकार से कियार् गयार् है कि ‘परितोशण शब्द धन संबंधी परितोशण तक यार् उन परितोशणों तक ही जो धन में आंके जार्ने योग्य है, निर्बन्धित नहीं है।’ इसमें सभी प्रकार के अवैतनिक सम्मार्न एवं अभिलार्शार्यें सम्मिलित हैं। वैध पार्रिश्रमिक से भिé किसी भी प्रकार क परितोशण इसके अन्तर्गत आतार् है।

संक्षेप में, उक्त विवेचन से यह स्पश्ट होतार् है कि लोक सेवकों द्वार्रार् अपने पद पर रहते हुए पद से संबंधित दार्यित्वों के निर्वहन के प्रति उदार्सीनतार् बरतने अथवार् विरत रहने अथवार् ऐसे कार्यों के संचार्लित करने जो उन्हें नहीं करने चार्हिए; पार्रितोशिक प्रार्प्त करनार् भ्रष्टार्चार्र की श्रेणी में आतार् है, जो अपरार्ध है। सार्मार्न्यतयार् पार्रितोशिक क आषय रिष्वत से लियार् जार्तार् है, जिसक दैनिक जीवन एवं सार्मार्न्य व्यवहार्र में अत्यधिक प्रचलन है। आज किसी अवैध कार्य को करने के लिए यार् वैध कार्य को अवैध तरीके से करने के लिए यार् अपरार्ध को दबार्ने अथवार् छिपार्ने के लिए प्रार्य: सेवकों को घूस अथवार् रिष्वत दी जार्ती है। यदि यह कह दियार् जार्ये तो अतिष्योक्ति नहीं होगी कि घूस अथवार् रिष्वत आज जन सार्मार्न्य के जीवन क एक अंग सार् हो गयार् है। घूस अथवार् रिष्वत को ही विधिक भार्शार् में परितोशण कहार् जार्तार् है। जिसमें सभी प्रकार के अवैतनिक सम्मार्न एवं अभिलार्शार्एँ सम्मिलित हैं, और वैध पार्रिश्रमिक से भिé किसी भी प्रकार क पार्रितोश्यार्ण इसके अन्तर्गत आतार् है।

यद्यपि भार्रतीय दण्ड संहितार् के उपरोक्त 161 से 165ए तक की धार्रार्ओं को अब समार्प्त करके उसके स्थार्न पर भ्रष्टार्चार्र निरोधक अधिनियम, 1988 को प्रवर्तन में लार् दियार् गयार् है, लेकिन भ्रष्टार्चार्र के सम्बन्ध में उक्त अधिनियम के अन्तर्गत दी गई परिभार्शार् को भ्रष्टार्चार्र निरोधक अधिनियम, 1988 में भी उसी रूप में शार्मिल कियार् गयार् है।

किसी भी समार्ज की व्यवस्थार् कायम रखने में जिन विधियों क महत्वपूर्ण प्रभार्व पड़तार् है उनमें भ्रष्टार्चार्र निवार्रण विधि को विषेश स्थार्न प्रार्प्त है। यह कानून समार्ज के प्रत्येक वर्ग के व्यक्तियों से संबंध रखतार् है। मार्ननीय उच्चतम न्यार्यार्लय ने वीरार् स्वार्मी बनार्म भार्रत संघ (1191(3) एमसीसी पृश्ठ 655) के प्रकरण में अभिनिर्धार्रित कियार् है कि नयार् भ्रष्टार्चार्र निवार्रण अधिनियम लोक सेवकों में भ्रष्टार्चार्र क निवार्रण ही नहीं करतार् बल्कि ईमार्नदार्र लोकसेवकों की परेशार्नी से भी रक्षार् करतार् है। इस अधिनियम में कुल 31 धार्रार्एँ हैं जिनमें से अपरार्ध एवं शार्स्तियों से संबंधित अध्यार्य 3 में वर्णित धार्रार् 7 से 16 कुल धार्रार्यें 10 हैं। भ्र.नि.अ. की धार्रार् 7 भार्रतीय दण्ड संहितार्, 1860 की धार्रार् 161 के समार्नार्न्तर है इस धार्रार् में ऐसे लोक सेवकों के लिए प्रार्वधार्न है जो रिष्वत प्रार्प्त करते हैं, यार् प्रार्प्त करने के लिए सहमत होते हैं अथवार् प्रार्प्त करने क प्रयार्स करते हैं। धार्रार् 8 भार्रतीय दण्ड संहितार् धार्रार् 162 के समार्नार्न्तर है। इस धार्रार् में वे सभी व्यक्ति आते हैं जो लोकसेवक हैं अथवार् नहीं है परन्तु लोक सेवक को भ्रष्ट अथवार् विधि विरुद्ध सार्धनों द्वार्रार् असर डार्लने के लिए पार्रितोशण प्रार्प्त करते हैं।

धार्रार् 9 भार्रतीय दण्ड संहितार् की धार्रार् 163 के समार्नार्न्तर है तथार् इस धार्रार् में वे सभी व्यक्ति आते हैं जो अपने लिए यार् किसी अन्य के लिए लोक सेवक पर प्रभार्व डार्लने के लिए परितोशण प्रार्प्त करते हैं।

धार्रार् 10 भार्रतीय दण्ड संहितार् की धार्रार् 164 के समार्नार्न्तर है तथार् इस धार्रार् में वे लोक सेवक आते हैं जो धार्रार् 8 व 9 अर्थार्त् भार्.द.सं. की धार्रार् 162 व 163 क दुश्प्रेशण करते हैं अर्थार्त् जो व्यक्ति रिष्वत प्रार्प्त करतार् है उसमें लोक सेवक की सहमति होती है।

धार्रार् 11 भार्रतीय दण्ड संहितार् की धार्रार् 165 के समार्नार्न्तर है इसमें वे लोक सेवक आते हैं जो उनके द्वार्रार् लोक सेवक की हैसियत से की गयी कार्यवार्ही यार् कारोबार्र में सम्पर्क में आते हैं उनसे यार् तो बिनार् प्रतिफल से यार् अपर्यार्प्त प्रतिफल के मूल्य वस्तु अभिप्रार्प्त करते हैं।

धार्रार् 12 भार्रतीय दण्ड संहितार् की धार्रार् 165(क) के समार्नार्न्तर है, इसमें वे व्यक्ति आते हैं जो लोक सेवक को रिश्वत देते हैं यार् रिश्वत क प्रस्तार्व रखते हैं यार् लोक सेवक रिश्वत लेने को रार्जी होंवे यार् नहीं होंवे। धार्रार् 13 भ्र.नि.अ. 1947 की धार्रार् 5 के समार्नार्न्तर है तथार् उसके पार्ंच खण्ड हैं :-

  1. जो धार्रार् 7 के अपरार्ध करने क अभ्यस्थ है।
  2. जो धार्रार् 9 क अपरार्ध करने क अभ्यस्थ है।

ग. जो लोक सेवक उसे लोक सेवक के रूप में सौंपी गई सम्पत्ति क बेईमार्नी से यार् कपटपूर्व दुर्विनियोग करतार् यार् सम्परिवर्तित करतार् है यह अपरार्ध भार्रतीय दण्ड संहितार् की धार्रार् 409 के समार्नार्न्तर है तथार् घ. इस उपधार्रार् के अन्तर्गत वे लोक सेवक आते हैं जो अपने पद क दुरुपयोग कर स्वयं के लिए यार् किसी अन्य के लिए भ्रष्ट यार् अवैध सार्धनों से यार् किसी लोक रुचि के बिनार् मूल्यवार्न वस्तु यार् धन संबंधित लार्भ अभिप्रार्प्त करतार् है इस अपरार्ध को लोक सेवक द्वार्रार् आपरार्धिक दुरार्चरण की संज्ञार् दी गई है, इसके अलार्वार्, ड़. यदि लोक सेवक यार् उसकी ओर से किसी व्यक्ति के आधिपत्य में ऐसे धन संबंधी सार्धन एवं सम्पत्ति हो जो उसकी ज्ञार्न स्रोतों से अनुपार्तिक हो अथवार् उसकी पदीयकालार्वधि के दौरार्न किसी संभव आधिपत्य में रही जिसक लोक सेवक समार्धार्नप्रदरूप से वितरण नहीं दे सकतार् तो उसे भी आपरार्धिक दुरार्चरण मार्नार् जार्येगार्।

धार्रार् 14 में धार्रार् 8, 9 धार्रार् 12 के अधीन अभ्यस्त अपरार्ध है तो दण्ड क विधार्न रखार् गयार् है धार्रार् 15 में जो धार्रार् 13(ग) यार् ़(घ) में वर्णित अपरार्ध करने क प्रयत्न करतार् है तो उसके दण्ड क विधार्न है तथार् धार्रार् 16 में न्यार्यार्लय के जुर्मार्नार् निधार्रण करते समय न्यार्यार्लय अभियुक्त व्यक्ति द्वार्रार् उपाजित सम्पत्ति क मूल्य विचार्र में रख सकेगार्, परिभार्शित कियार् गयार् है।

इस अधिनियम की धार्रार् 20 दार्ण्डिक मार्मलों में सबूत के भार्र के बार्रे में सार्मार्न्य नियम के अपवार्द की प्रस्तार्वनार् करतार् है, और सार्बित करने क भार्र अभियुक्त पर होतार् है, इस धार्रार् के अधीन उप धार्रणार् कानूनी होती है और इसलिए इस धार्रार् के अधीन लार्ये गये प्रत्येक मार्मले में प्रत्येक उपधार्रणों को जन्म देने के लिए न्यार्यार्लय पर बार्ध्यकारी प्रभार्व पड़तार् है, कारण यह है कि कानून की उपधार्रणार्एँ तथ्य की उपधार्रणों के मार्मलों में असम्यनविधि शार्स्त्र की एक शार्खार् क गठन करती है। इस विधि के अपरार्ध में पुलिस निरीक्षक से निम्न स्तर क अधिकारी अन्वेशण नहीं कर सकतार् है। अन्वेशण उच्च अधिकारी द्वार्रार् कियार् जार्तार् है, जिससे अन्वेशण की निश्पक्षतार् स्थार्पित होती है इसके अलार्वार् धार्रार् 19 में यह प्रार्वधार्न रखार् गयार् है कि केन्द्रीय सरकार, रार्ज्य सरकार अथवार् केन्द्र सरकार यार् रार्ज्य सरकार के उस अधिकारी की पूर्व स्वीकृति के बिनार् कोई भी न्यार्यार्लय प्रसंज्ञार्न नहीं ले सकतार् जो कि दोशी अधिकारी को सेवार् से पृथक करने में सक्षम है अत: किसी भी अधिकारी यार् कर्मचार्री के विरुद्ध कितनार् भी गंभीर आरोप है उसे सेवार् से पृथक करने वार्लार् अधिकारी स्वीकृति नहीं देतार् तो कोई कार्यवार्ही संभव नहीं है। परन्तु मार्ननीय दिल्ली उच्च न्यार्यार्लय ने गुरचरण सिंह बनार्म रार्ज्य 1970 कि.लार्.ज. पृश्ठ 674 में यह सिद्धार्न्त प्रतिपार्दित कियार् कि एक मंजूरी के लिए प्रार्वधार्न करने में विधार्न मण्डल क आशय मार्त्र उनके शार्सकीय कर्तव्यों के निर्वहन में लोकसेवकों को एक मुक्त संरक्षण प्रदार्न करनार् होतार् है इस धार्रार् क उद्देश्य यह नहीं होतार् है कि एक लोक सेवक जो अधिनियम की धार्रार् 6 में वर्णित विशेष अपरार्ध क दोशी है को मंजूरी की अवैधार्निकतार् को एक तकनीकी अभिवचन को प्रस्तुत करके आपरार्धिक कार्यों के परिणार्मों से बच निकलनार् चार्हिए। यह धार्रार् निर्दोश के लिए एक रक्षोपार्य है न कि दोशी व्यक्ति के लिए एक रक्षार् कवच है। परन्तु सेवार्निवृति के बार्द संरक्षण उपलब्ध नहीं है।

इस अधिनियम के प्रकरण विशेष न्यार्यार्लय द्वार्रार् ही सुने जार्ते हैं जो धार्रार् 3 के अन्तर्गत कम से कम सत्र न्यार्यार्धीश, अपर सत्र न्यार्यार्धीश यार् सहार्यक सत्र न्यार्यार्धीश के पद पर रह चुक हो उसे ही नियुक्ति दी जार्ती है। यह प्रकट होतार् है कि वरिष्ठ नार्गरिक अधिकारी द्वार्रार् ऐसे मार्मलों पर विचार्र कियार् जार्तार् है जिससे उचित न्यार्य मिलने की उम्मीद अधिक रहती है। इस अधिनियम के व्यार्पक प्रचार्र एवं प्रसार्र की आवश्यकतार् है जिससे भ्रष्टार्चार्र से समार्ज को मुक्ति दिलार्ई जार् सके।

भ्रष्टार्चार्र के प्रकार

वर्ल्ड बैंक ने भ्रष्टार्चार्र को छ: प्रकारों में वर्गीकृत कियार् है-

  1. प्रशार्सनिक भ्रष्टार्चार्र, 
  2. रार्जनीतिक भ्रष्टार्चार्र, 
  3. लोक भ्रष्टार्चार्र, 
  4. निजी भ्रष्टार्चार्र, 
  5. वृहद् भ्रष्टार्चार्र, 
  6. लघु भ्रष्टार्चार्र।

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