भार्रत में पंचार्यती रार्ज की स्थिति व सुदृढ़ीकरण के प्रयार्स

स्वतन्त्रतार् पूर्व पंचार्यतों की मजबूती व सुदृढ़िकरण हेतु विशेष प्रयार्स नहीं हुए इसके विपरीत पंचार्यती रार्ज व्यवस्थार् लड़खड़ार्ती रही। मध्य काल में मुस्लिम रार्जार्ओं क शार्सन भार्रत के विभिन्न हिस्सों में फैल गयार्। यद्यपि स्थार्नीय शार्सन की संस्थार्ओं की मजबूती के लिए विशेष प्रयार्स नहीं किये गये परन्तु मुस्लिम शार्सन ने अपने हितों में पंचार्यतों क काफी उपयोग कियार्। जिसके फलस्वरूप पंचार्यतों के मूल स्वरूप को धक्क लगार् और वे केन्द्र के हार्थों की कठपुतली बन गर्इ। सम्रार्ट अकबर के समय स्थार्नीय स्वशार्सन कों पुन: मार्न्यतार् मिली। उस काल में स्थार्नीय स्वशार्सन की इकाइयार्ं कार्यशील बनी। स्थार्नीय स्तर पर शार्सन के सार्रे कार्य पंचार्यतें ही करती थीं और शार्सन उनके महत्व को पूर्णत: स्वीकार करतार् थार्। लेकिन मुस्लिम काल के इतिहार्स को अगर समग्र रूप में देखार् जार्ए तो इस काल में स्थार्नीय स्वशार्सन की संस्थार्ओं को मजबूती नहीं मिल सकी।

ब्रिटिश काल के दौरार्न भी प्रार्चीन पंचार्यत व्यवस्थार् लड़खड़ार्ती रही। अंग्रजों शार्सन काल मे सत्तार् क केन्द्रीकरण हो गयार् और दिल्ली सरकार पूरे भार्रत पर शार्सन करने लगी। केन्द्रीकरण की नीति के तहत अंग्रेज तो पूरी सत्तार् अपने कब्जे में करके एकक्षत्र रार्ज चार्हते थे। भार्रत की विकेन्द्रीकरण की व्यवस्थार् उन्हें अपने मनसूबों को पूरार् करने में एक रुकावट लगी। इसलिये अंगेज्र ों ने हमार्री सदियों से चली आ रही स्थार्नीय स्वशार्सन की परम्परार् व स्थार्नीय समदु ार्य की तार्कत क तहस-नहस कर शार्सन की अपनी व्यवस्थार् लार्गू की। जिसमें छोट-छोटे सूबे तथार् स्थार्नीय स्वशार्सन की संस्थार्एं कमजोर बनार् दी गर्इ यार् पूरी तरह समार्प्त कर दी गर्इ। धीरे धीरे सब कुछ अंग्रेजी सरकार के अधीन होतार् गयार्। सरकार की व्यवस्थार् मजबूत होती गर्इ और समार्ज कमजोर होतार् गयार्। परिणार्म यह हुआ कि यहार्ं प्रशार्सन क परम्परार्गत रूप करीब-करीब समार्प्त प्रार्य हो गयार् और पंचार्यतों क महत्व काफी घट गयार्।

अंगेज्र ी रार्ज की बढ़ती तार्कत व प्रभार्व से आम आदमी दबार्व में थार्। समार्ज में असंतोष बढने लगार्, जिसके कारण 1909 में ब्रिटिश सरकार द्वार्रार् एक विकेन्द्रीकरण कमीशन की नियुक्ति की गर्इ। 1919 में ‘‘मार्ंटेस्क्यू चेम्सफोर्स सुधार्र’’ के तहत एक अधिनियम पार्रित करके पंचार्यतो को फिर से स्थार्पित करने क काम प्रार्ंतीय शार्सन पर छोड दियार् । अंग्रेजों की नियत तब उजार्गर हुर्इ जब एक तरफ पंचार्यतों को फिर से स्थार्पित करने की बार्त कही और दूसरी तरफ गार्ंव वार्लों से नमक तक बनार्ने क अधिकार छुड़ार् लियार्। इसी क्रम में 1935 में लाड वैलिग्टन के समय भी पंचार्यतों के विकास की ओर थोड़ार् बहुत ध्यार्न दियार् गयार् लेकिन कुल मिलार्कर ब्रिटिशकाल में पंचार्यतों को फलने फूलने के अवसर कम ही मिले।

स्वतन्त्रतार् प्रार्प्ति के बार्द भार्रत में पंचार्यती रार्ज 

स्वतन्त्रतार् प्रार्प्ति के पश्चार्त पंचार्यतों के पूर्ण विकास के लिये प्रयत्न शुरू हुए। रार्ष्ट्रपितार् महार्त्मार् गार्ँधी स्वरार्ज और स्वार्वलम्बन के लिये पंचार्यती रार्ज के प्रबलतम समर्थक थे। गार्ंधी जी ने कहार् थार्- “सच्चार् स्वरार्ज सिर्फ चंद लोगों के हार्थ में सत्तार् आ जार्ने से नहीं बल्कि इसके लिये सभी हार्थों में क्षमतार् आने से आयेगार्। केन्द्र में बैठे बीस व्यक्ति सच्चे लोकतन्त्र को नहीं चलार् सकते। इसको चलार्ने के लिये निचले स्तर पर प्रत्येक गार्ंव के लोगों को शार्मिल करनार् पड़ेगार्।” गार्ंधी जी की ही पहल पर संविधार्न में अनुच्छेद 40 शार्मिल कियार् गयार्। जिसमें यह कहार् गयार् कि रार्ज्य ग्रार्म पंचार्यतों को सुदृढ़ करने हेतु कदम उठार्येगार् तथार् पंचार्यतों को प्रशार्सन की इकार्इ के रूप में कार्य करने के लिये आवश्यक अधिकार प्रदार्न करेगार्। यह अनुच्छेद रार्ज्य क नीति निर्देशक सिद्धार्न्त बनार् दियार् गयार्। इसके अतिरिक्त ग्रार्मीण क्षेत्र के विकास के लिये विभिन्न कमीशन नियुक्त किये गये, जिन्होंने पंचार्यती रार्ज व्यवस्थार् को पुर्नजीवित करने में महत्वपूर्ण कार्य कियार्।

भार्रत में सन् 1952 में सार्मुदार्यिक विकास कार्यक्रम स्थार्पित किये गये। किन्तु प्रार्रम्भ में सार्मुदार्यिक विकास कार्यक्रमों को कोर्इ महत्वपूर्ण सफलतार् नहीं मिल सकी, इसक मुख्य कारण जनतार् क इसमें कोर्इ सहयोग व रुचि नहीं थी। सार्मुदार्यिक विकास कार्यक्रमों को सरकारी कामों के रुप में देख गयार् और गॉंववार्सी अपने उत्थार्न के लिए स्वयं प्रयत्न करने के स्थार्न पर सरकार पर निर्भर रहने लगी। इस कार्यक्रम के सूत्रधार्र यह आशार् करते थे कि जनतार् इसमें आगे आये और दूसरी ओर उनक विश्वार्स थार् कि सरकारी कार्यवार्ही से ही यह कार्यक्रम सफल हो सकतार् है। कार्यक्रम जनतार् ने चलार्नार् थार्, लेकिन वे बनार्ये उपर से जार्ते थे। जिस कारण इन कार्यक्रमों में लोक कल्यार्ण के कार्य तो हुए लेकिन लोगों की भार्गीदार्री इनमें नगण्य थी। ये कार्यक्रम लोगों के कार्यक्रम होने के बजार्य सरकार के कार्यक्रम बनकर रह गये। सार्मुदार्यिक विकास कार्यक्रम के असफल हार्ने के कारणों क अध्धयन करने के एक कमेटी गठित की गयी। जिसक नार्म बलवन्त रार्य मेहतार् समिति थार्।

बलवंत रार्य मेहतार् समिति 

1957 में सरकार ने पंचार्यतों के विकास पर सुझार्व देने के लिए श्री बलवंत रार्य मेहतार् की अध्यक्षतार् में एक समिति क गठन कियार्। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की इस रिपोर्ट में यह सिफार्रिश की गयी कि सार्मुदार्यिक विकास कार्यक्रमों को सफल बनार्ने के लिए पंचार्यती रार्ज संस्थार्ओं की तुरन्त स्थार्नपार् की जार्नी चार्हिए। इसे लोकतार्न्त्रिक विकेन्द्रीकरण क नार्म दियार् गयार्। मेहतार् कमेटी के अपनी निम्नलिखित शिफार्रिशें रखी।

  1. ग्रार्म स्तर पर ग्रार्म पंचार्यत, खण्ड(ब्लार्क) स्तर पर पंचार्यत समिति और जिलार् स्तर पर जिलार् परिषद। अर्थार्त् पंचार्यतों की त्रिस्तरीय संरचनार् बनार्यी जार्ये। 
  2. पंचार्यती रार्ज में लोगों को सत्तार् क हस्तार्नोतरण कियार् जार्नार् चार्हिए।
  3. पंचार्यती रार्ज संस्थार्एं जनतार् के द्वार्रार् निर्वार्चित होनी चार्हिए और सार्मुदार्यिक विकास कार्यक्रम के अधिकारी उनके अधीन होने चार्हिए। 
  4. सार्धन जुटार्ने व जन सहयोग के लिए इन संस्थार्ओं को पर्यार्प्त अधिकार दिये जार्ने चार्हिए।
  5. सभी विकास संबंधी कार्यक्रम व योजनार्एं इन संगठनों के द्वार्रार् लार्गू किये जार्ने चार्हिए। 
  6. इन संगठनों को उचित वित्तीय सार्धन सुलभ करवार्ये जार्ने चार्हिए। 

रार्जस्थार्न वह पहलार् रार्ज्य है जहार्ं पंचार्यती रार्ज की स्थार्पनार् की गयी।1958 में सर्वप्रथम पंंिडत जवार्हरलार्ल नेहरू ने 2 अक्टूबर को रार्जस्थार्न के नार्गौर जिले में पंचार्यती रार्ज क दीपक प्रज्जवलित कियार् और धीरे धीरे गार्ंवों में पंचार्यती रार्ज क विकास शुरू हुआ। सत्तार् के विकेन्द्रीकरण की दिशार् में यह पहलार् कदम थार्। 1959 में आन्ध्र प्रदेश में भी पंचार्यती रार्ज लार्गू कियार् गयार्। 1959 से 1964 तक के समय में विभिन्न रार्ज्यों में पंचार्यती रार्ज संस्थार्ओं को लार्गू कियार् गयार् और इन संस्थार्ओं ने कार्य प्रार्रम्भ कियार्। लेकिन इस रार्ज से ग्रार्मीण तबके के लोगों क नेतृत्व उभरने लगार् जो कुछ स्वार्थ्र्ार्ी लोगों की आँखों में खटकने लगार्, क्योंंिक वे शक्ति व अधिकारों को अपने तक ही सीमित रखनार् चार्हते थे। फलस्वरूप पंचार्यती रार्ज को तोड़ने की कोशिशें भी शुरू हो गयीं। कर्इ रार्ज्यों में वर्षों तक पंचार्यतों में चुनार्व ही नहीं करार्ये गये। 1969 से 1983 तक क समय पंचार्यती रार्ज व्यवस्थार् के ह्यस क समय थार्। लम्बे समय तक पंचार्यती रार्ज संस्थार्ओं के चुनार्व नहीं करवार्ये गये और ये संस्थार्एं निष्क्रीय हो गयी।

अशोक मेहतार् समिति 

जनतार् पाटी के सत्तार् में आने के बार्द पंचार्यतों को मजबूत करने के उद्देश्य से 12 दिसम्बर 1977 को पंचार्यती रार्ज संस्थार्ओं में आवश्यक परिवर्तन सुझार्ने के लिए में श्री “अशोक मेहतार्” की अध्यक्षार् में 13 सदस्यों की कमेटी गठित की गर्इ। समिति ने पंचार्यती रार्ज संस्थार्ओं मे आर्इ गिरार्वट के लिए कर्इ कारणों को जिम्मेदार्र बतार्यार्। इसमें प्रमुख थार् कि पंचार्यती रार्ज संस्थार्ओं को ग्रार्मीण विकास के कार्यक्रमों से बिल्कुल अलग रखार् गयार् है। अषोक मेहतार् समिति ने महसूस कियार् कि पंचार्यती रार्ज संस्थार्ओं की अपनी कमियार्ं स्थार्नीय स्वषार्सन को मजबूती नहीं प्रदार्न कर पार् रही है।

इस समिति द्वार्रार् पंचार्यतों को सुदृढ़ बनार्ने के लिए निम्न सुझार्व दिये गये- 

  • समिति ने दो स्तरों वार्ले ढार्ँचे- जिलार् परिषद को मजबूत बनार्ने और ग्रार्म पंचार्यत की जगह मण्डल पंचार्यत की सिफार्रिश की। अर्थार्त पंचार्यती रार्ज संस्थार्ओं के दो स्तर हों, जिलार् परिषद व मंडल परिषद। 
  • जिले को तथार् जिलार् परिषद को समस्त विकास कार्यों क केन्द्र बनार्यार् जार्ए। जिलार् परिषद ही आर्थिक नियोजन करें और जिले में विकास कायार्ंर् े में सार्मन्जस्य स्थार्पित करें और मंडल पंचार्यतों को निर्देशन दें। 
  • पंचार्यती रार्ज संस्थार्ओं के निर्वार्चन में जिलार् परिषद को मुख्य स्तर बनार्ने और रार्जनैतिक दलों की सक्रिय भार्गीदार्री पर बल दियार्।
  • पंचार्यतों के सदस्यों के नियमित चुनार्व की सिफार्रिश की। रार्ज्य सरकारों को पंचार्यती चुनार्व स्थगित न करने व चुनार्वों क संचार्लन मुख्य चुनार्व आयुक्त के द्वार्रार् किये जार्ने क सुझार्व दियार्।
  • कमेटी ने यह सुझार्व भी दियार् कि पंचार्यती रार्ज संस्थार्ओं को मजबूती प्रदार्न करने के लिये संवैधार्निक प्रार्वधार्न बहुत ही आवश्यक है। 
  • पंचार्यती रार्ज संस्थार्एं समिति प्रणार्ली के आधार्र पर अपने कायोर्ं क सम्पार्दन करें। 
  • रार्ज्य सरकारों को पंचार्यती रार्ज संस्थार्ओं के अधिकारों क अतिक्रमण नहीं करनार् चार्हिए। 

देश के कर्इ रार्ज्यों ने इन सिफार्रिशों को नहीं मार्नार्, अत: तीन स्तरों वार्ले ढार्ंचे को ही लार्गू रखार् गयार्। इस प्रकार अशोक मेहतार् समिति ने पंचार्यती रार्ज व्यवस्थार् में सुधार्र लार्ने के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण शिफार्रिशें की, किन्तु ग्रार्म पंचार्यतों को समार्प्त करने की उनकी शिफार्रिश पर विवार्द पैदार् हो गयार्। ग्रार्म पंचार्यतों की समार्प्ति क मतलब थार्, ग्रार्म विकास की मूल भार्वनार् को ही समार्प्त कर देनार्। समिति के सदस्य सिद्धरार्ज ढ़ड्डार् ने इस विषय पर लिखार् कि ‘‘मुझे जिलार् परिषदों और मंडल पंचार्यतों से कोर्इ आपत्ति नहीं है किन्तु समिति ने ग्रार्म सभार् की कोर्इ चर्चार् नहीं की, जबकि पंचार्यती रार्ज संस्थार्ओं की आधार्रभूत इकार्इ तो ग्रार्म सभार् को ही बनार्यार् जार् सकतार् थार्।’ ‘

जी.वी.के. समिति 

पंचार्यतों के सुदृढ़ीकरण की प्रक्रियार् में सन् 1985 में जी.वी.के. रार्व समिति गठित की गर्इ। समिति ने पंचार्यती रार्ज संस्थार्ओं को अधिक अधिकार देकर उन्हें सक्रिय बनार्ने पर बल दियार्। सार्थ ही यह सुझार्व भी दियार् कि योजनार् निर्मार्ण व संचार्लित करने के लिये जिलार् मुख्य इकार्इ होनार् चार्हिये। समिति ने पंचार्यतों के नियमित चुनार्व की भी सिफार्ार्रिश की।

डार्. एल. एम. सिंघवी समिति 

1986 में डार्. एल.एम. सिंघवीे समिति क गठन कियार् गयार्। सिंघवी सार्मिति ने ‘गार्ंव पंचार्यत’(ग्रार्म-सभार्) की सिफार्रिश करते हुये संविधार्न में ही नयार् अध्यार्य जोड़ने की बार्त कही जिससे पंचार्यतों की अवहेलनार् नार् हो सके। इन्होंने गार्ंव के समूह बनार् कर न्यार्य पंचार्यतों के गठन की भी सिफार्रिश की।

सरकारियार् आयोग और पी0 के0 थुंगर समिति 

1988 में सरकारियार् आयोग बैठार्यार् गयार् जो मुख्य रुप से केन्द्र व रार्ज्यों के संबंधों से जुड़ार् थार्। इस आयोग ने भी नियमित चुनार्वों और ग्रार्म पंचार्यतों को वित्तीय व प्रशार्सनिक शक्तियार्ं देने की सिफार्रिश की। 1988 के अंत में ही पी0 के0 थुंगर की अध्यक्षतार् में संसदीय परार्मर्श समिति की उपसमिति गठित की गयी। इस समिति ने पंचार्यती रार्ज संस्थार्ओं को संवैधार्निक दर्जार् देने की शिफार्रिश की।

भूतपूर्व प्रधार्नमंत्री स्व. रार्जीव गार्ंधी की सरकार ने गार्ंवों में पंचार्यतों के विकास की ओर अत्यधिक प्रयार्स करने शुरू किये। श्री रार्जीव गार्ंधीं क विचार्र थार् कि जब तक गार्ंव के लोगों को विकास प्रक्रियार् में भार्गीदार्र नहीं बनार्यार् जार्तार्, तब तक ग्रार्मीण विकास क लार्भ ग्रार्मीण जनतार् को नहीं मिल सकतार्। पंचार्यती रार्ज के द्वार्रार् वे गार्ंव वार्लों के, खार्सकर अनुसूचित जार्ति, जनजार्ति तथार् महिलार्ओं की सार्मार्जिक व आर्थिक स्थिति में बदलार्व लार्नार् चार्हते थे। उन्होंने इस दिशार् में कारगर कदम उठार्ते हुये 64वार्ं संविधार्न विधेयक ससंद में प्रस्तुत कियार्। लोकसभार् ने 10 अगस्त 1988 को इस विधेयक को अपनी मंजूरी दे दी। मगर रार्ज्य सभार् में सिर्फ पार्ंच मतों की कमी रह जार्ने से यह पार्रित न हो सका। फिर 1991 में तत्कालीन सरकार ने 73वार्ं संविधार्न संशोधन विधेयक को संसद में पेश कियार्। लोक सभार् ने 2 दिसम्बर 1992 को इसे सर्व सम्मति से पार्रित कर दियार्। रार्ज्य सभार् ने अगले ही दिन इसे अपनी मंजूरी दे दी। उस समय 20 रार्ज्यों की विधार्न सभार्एं कार्यरत थीं। 20 रार्ज्यों की विधार्न सभार्ओं में से 17 रार्ज्यों की विधार्न सभार्ओं ने संविधार्न संशोधन विधेयक को पार्रित कर दियार्। 20 अप्रैल 1993 को रार्ष्ट्रपति ने भी इस विधेयक को मंजूरी दे दी। तत्पश्चार्त् 73वार्ं संविधार्न संशोधन अधिनियम 24 अप्रैल से लार्गू हो गयार्। 

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