भार्रत पार्क युद्ध (1965, 1971) के कारण और परिणार्म

भार्रत के विभार्जन के बार्द पार्किस्तार्न बनते ही तमार्म ऐसे मुद्दे पैदार् हो गए जो आज तक दोनों देशों के बीच विवार्द की जड. बने हुए है। ऐसे मुद्दों क समार्प्त होनार् तो दूर बल्कि इनमें इजार्फार् ही होतार् गयार् हैं विभार्जन के तत्काल बार्द दोनों देशों ने आपस में युद्ध कर अपनी भडार्स निकालने की कोशिश की। उससे भी नहीं निकली तो 1965 व 1971 में दो और युद्ध लडेगए इसके बार्वजूद दोनों देश, आपसी वैमनस्यतार् में आज तक कायम है। इस वैमनस्यतार् के तमार्म कारण है। जो आज तक कायम है।

15 अगस्त 1947 से ठीक पूर्व पार्किस्तार्न प्रार्प्ति के लिए हुआ खून खरार्बार् इतिहार्स के पन्नो को भी कालार् कर चुक है। इसके बार्द 14 अगस्त 1947 को देश दो भार्गों में विभक्त हो गयार्। बँटवार्रे से उत्पन्न सबसे पहली समस्यार् शरणाथियों को लेकर उत्पन्न हुई। विभार्जन के बार्द हुए सार्ंप्रदार्यिक दंगों ने लोगों को इतनार् झकझोर दियार् कि लार्खों शरणाथी विस्थार्पित होकर भार्रत की ओर आ गए। भार्रत में भी प्रतिक्रियार् स्वरूप मुसलमार्नों क पार्किस्तार्न भार्गनार् प्रार्रभ्भ हो गयार्। भार्रत धर्मनिरपेक्षतार् के नार्म पर मुसलमार्नों को रोकनार् चार्हतार् थार्। किंतु पार्किस्तार्न अल्पसंख्यक वर्गो को निकालने के लिए कटिबद्ध थार्।

शरणाथियों द्वार्रार् एक दुसरे के देशों में छोड़ी गयी संपत्ति को लेकर भी वार्द-विवार्द की स्थिति उत्पन्न हुई। दोनों देशों के प्रतिनिधियों की कई बैठकें भी इस समस्यार् क समार्धार्न नहीं खोज पार्ई। एक दूसरे के मुल्कों के विभिन्न सार्म्प्रदार्य के लोगों को मार्ंगने के कारण दंगे भडके इसलिए 8 अप्रैल 1950 को पंडित जवार्हर लार्ल नेहरू तथार् पार्किस्तार्न के प्रधार्नमंत्री लियार्कत अली खार्ँ व मध्य समझौते क प्रभार्व दिखार्ई पड़ार् परन्तु फिर इसकी उपेक्षार् करनार् आरभ्भ हो गयार्।

दोनों मुल्कों के अल्पसंख्यकों की सुरक्षार् के लिए जुलार्ई 1954 जनवरी 1955 तथार् अप्रैल 1955 में दोनों देश के मंत्रियों की वातार्एं हुई परिस्थिति वश विवश होकर 30 अप्रैल 1970 को हमार्रे तत्कालीन विदेश मंत्री दिनेश सिंह ने लोक सभार् में वक्तव्य देते हुए विदेश विभार्ग के उप मंत्री सुरेंद्र पार्ल ने कहार् ‘’पार्किस्तार्न क अपने अल्पसंख्यकों हिन्दू, बौद्ध, तथार् ईसार्ईयों के प्रति विशेष कर व्यवहार्र काफी बुरार् है जिसकी वजह से 26000 लोग तो बिनार् यार्त्रार् पत्रों के ही भार्रत आए थे। इसक मुख्य कारण इनके सार्थ कियार् दुर्व्यवहार्र, सम्पत्ति छीन लेनार् आर्थिक एवं रार्जनीतिक अस्थिरतार् तथार् आगार्मी चुनार्वों के सार्ंप्रदार्यिक प्रचार्र आदि है।’’

भार्रत पार्क युद्ध 1965

भार्रत द्वार्रार् विरार्म रेखार् को पार्र करने की प्रतिक्रियार् पार्किस्तार्न में स्वार्भार्विक रूप से हुई। 25 अगस्त के बार्द से भार्रतीय और पार्किस्तार्नी सेनार्ओं में कई जगह प्रत्यक्ष मुठभेड़ हो गई और यह निश्चय सार् प्रतीत होने लगार् कि भार्रत और पार्किस्तार्न में अब युद्ध छिड़ जार्येगार्। अधिक पार्किस्तार्नी क्षेत्र को भार्रतीय अधिकार में जार्ने से रोकने के उद्देश्य से पार्किस्तार्न ने प्रत्यक्ष रूप से आक्रमण करने क निश्चय कियार्। छम्ब जूरियार् क्षेत्र इसके लिए बहुत उपयोगी थार्, क्योंकि पार्किस्तार्न इस क्षेत्र में आसार्नी से हमलार् कर सकतार् थार् और अखनूर पर कब्जार् करके ऊपरी कश्मीर को जम्मू से अलग कर भार्रतीय क्षेत्र पर अधिकार कर सकतार् थार्।

हिटलर के विद्युत प्रवार्ह के ढर्रे पर 1 सितम्बर को तड़के ही टैंकों और आधुनिकतम शस्त्रार्स्त्रों से लैस पार्किस्तार्नी सेनार् ने अंतररार्ष्ट्रीय सीमार् रेखार् पार्र करके छम्ब जूरियार् क्षेत्र पर आक्रमण शुरू कर दियार्। पार्किस्तार्न क यह आक्रमण भार्रत के जीवन मरण क प्रश्न हो गयार्, लेकिन शत्रु क दबार्व घटार् नहीं और ऐसार् प्रतीत होने लगार् कि इस क्षेत्र पर किसी भी क्षण पार्किस्तार्न क अधिकार हो सकतार् है।

5 सितम्बर को पार्किस्तार्नी वार्यु सेनार् ने अमृतसर पर हमलार् कियार्। इस घटनार् से यह निष्कर्ष निकालनार् कठिन नहीं थार् कि पार्किस्तार्न संघर्ष के क्षेत्रों को विस्तृत करके पंजार्ब पर आक्रमण करने क इरार्दार् रखतार् है। पार्किस्तार्न की योजनार् को कुचलने और छम्ब जूिरयार् क्षेत्र में पार्किस्तार्नी सैनिक दबार्व को कम करने के उद्देश्य से भार्रत ने 6 सितम्बर को पार्किस्तार्न के पंजार्ब प्रदेश पर तीन तरफ से आक्रमण कर दियार् और भार्रतीय सेनार् लार्हौर की ओर बढ़ने लगी। पार्किस्तार्न रेडियो से बोलते हुए रार्ष्ट्रपति अयूब खार्ं ने कहार् कि हम लोग अब युद्ध की स्थिति में हैं। यह सचमुच भार्रत और पार्किस्तार्न के बीच एक अघोशित युद्ध थार् जो समस्त सीमार्ंत पर बड़े पैमार्ने पर लड़ार् जार् रहार् थार्। दोनों पूरी शक्ति के सार्थ युद्ध में जूझे हुए थे।

युद्ध विरार्म

यह युद्ध 23 सितम्बर तक चलार् और संयुक्त रार्ष्ट्रसंघ के हस्तक्षेप के उस दिन सार्ढ़े तीन बजे सुबह से युद्ध विरार्म हो गयार्। पार्किस्तार्न को यह आषार् थी कि चीन उसकी सहार्यतार् करेगार्, लेकिन उसे निरार्ष होनार् पड़ार्। उसने सीआटो और सेण्टो के संगठनों से सहार्यतार् की यार्चनार् की। लेकिन वहार्ं से भी उसे निरार्ष होनार् पड़ार्। भार्रतीय सेनार् ने पार्किस्तार्न के एक बहुत बड़े भू-भार्ग पर अधिकार कर लियार्। युद्ध के खत्म होने पर सार्त सौ चार्लीस वर्गमील क पार्किस्तार्नी क्षेत्र भार्रतीय कब्जे में थे और दो सौ चार्लीस वर्गमील के लगभग भार्रतीय क्षेत्र पार्किस्तार्न के कब्जे में थे। जन-धन और सैनिक सार्जो सार्मार्न में दोनों पक्षों को अपार्र क्षति हुई।

सुरक्षार् परिषद के प्रयत्नो से भार्रत पार्क युद्ध बंद

सुरक्षार् परिशद ने 20 सितम्बर, 1965 (सोमवार्र) को एक प्रस्तार्व पार्स कियार् जिसमें भार्रत तथार् पार्किस्तार्न से कहार् गयार् कि वे बुधवार्र, 22 सितम्बर ,1965 को दोपहर के 12.30 बजे तक युद्ध बन्द कर दें। प्रस्तार्व के पक्ष में 10 मत तथार् विरोध में एक भी नहीं। जोर्डन ने प्रस्तार्व पर मत नहीं कर दें। इस प्रस्तार्व में भार्रत तथार् पार्किस्तार्न दोनों देशों की सरकारों से यह भी कहार् गयार् कि वे अपनी – अपनी सैनार्ओं को निष्चित समय पर युद्ध – विरार्म के लिये आदेश दे दें। इसके बार्द सैनार्यें 5 अगस्त, 1965 से पूर्व की स्थिति पर लौट जार्ये।’’

प्रस्तार्व में सुरक्षार् परिशद से यह भी अनुरोध कियार् गयार् कि वह युद्ध विरार्म की उचित देख – रेख तथार् सभी सषस्त्र व्यक्तियों की वार्पसी के लिये समुचित व्यवस्थार् करें। प्रस्तार्व द्वार्रार् सभी रार्ष्ट्रों से यह अपील की गई कि वे ऐसार् कोई कदम न उठार्यें जिससे भार्रत – पार्क युद्ध को बढार्वार् मिलें।’’ भार्रत तथार् पार्किस्तार्न दोनों देशों ने इस प्रस्तार्व को स्वीकार कर लियार् और 23 सितम्बर, 1965 को प्रार्त: काल 3.30 बजे दोनों देशों में युद्ध बन्द हो गयार्। रूस ने इस युद्ध बन्दी क बड़े हर्ष से स्वार्गत कियार्।

1965 के युद्ध – विरार्म के समय स्थिति तथार् युद्द के परिणार्म

7 अक्टूबर, 1965 को भार्रत सरकार ने एक मार्नचित्र प्रकाशित कियार् जिसमें यह दिखार्यार् गयार् है कि 23 सितम्बर, 1965 ईसवी को युद्ध – विरार्म रेखार् के समय (3.30 बजे) पार्किस्तार्न में और पार्किस्तार्न अधिकृत कश्मीर में कुल 740 वर्ग मील क्षेत्र भार्रत के अधिकार में थार्। इसमें यह भी दिखार्यार् गयार् है कि उस समय भार्रतीय प्रदेश में पार्किस्तार्न ने केवल 210 वर्ग मील क्षेत्र पर अधिकार कर रखार् थार्।

तार्शकंद – समझौतार्

23 नवम्बर, 1965 को हमार्रे प्रधार्नमंत्री श्री लार्ल बहार्दुर शार्स्त्री ने रार्ज्य सभार् में कहार् कि उन्हें सोवियत प्रधार्नमंत्री श्री कोसीगिन क एक पत्र प्रार्प्त हुआ है जिसमें उनसे तार्शकन्द में पार्किस्तार्न के रार्ष्ट्रपति अयबू खॉ से वातार् क सुझार्व दियार् हैं रूस के प्रधार्नमंत्री ने पार्किस्तार्न के तत्कालीन रार्ष्ट्रपति श्री अयूब खॉ को भी इस हेतु पत्र लिखार् थार्। दोनों देशों की सहमति प्रार्प्त होने पर 8 दिसम्बर, 1965 को यह घोषणार् कर दी गई कि भार्रत के प्रधार्नमंत्री और पार्किस्तार्न के रार्ष्ट्रपति के बीच 4 जनवरी, 1966 को रूस के प्रसिद्ध नगर तार्शकन्द (उजवेगिस्तार्न की रार्जधार्नी) में एक सम्मेलन होगार्।

इस घोषणार् के अनुसार्र तार्शकन्द में 4 जनवरी, 1966 से भार्रत और पार्किस्तार्न में एक सम्मेलन आरम्भ हो गयार्। तार्शकन्द की यार्त्रार् करने से पूर्व पार्किस्तार्न के रार्ष्ट्रपति ने कहार् कि कश्मीर के बिनार् भार्रत के सार्थ किसी प्रकार क कोई समझौतार् नहीं होगार्। भार्रत के प्रधार्नमंत्री ने भी अपनी तार्शकन्द की यार्त्रार् से पूर्व यह कहार् थार् कि हम कश्मीर के प्रश्न पर पार्किस्तार्न से किसी प्रकार की वातार् नहीं करेगें। इसीलिये रूस की समार्चार्र ऐजेन्सी ‘‘तार्स’’ ने घोषणार् की थी कि दोनों क विवार्द लगभग बीस वर्श पुरार्नार् हो चुक है।

इसीलिये उसको एकदम सुलझार्नार् आसार्न नहीं है। इतनार् सब कुछ होते हुये भी रूस के प्रधार्नमंत्री ने सम्मेलन शुरू होने से पूर्व यह कहार् थार् कि सोवियत जनतार् को यह आषार् है कि सम्मेलन सफल होगार्।

तार्शकंद – समझौतार् एवं सोवियत संघ की कूट नीति

सोवियत संघ के निमंत्रण पर भार्रत के प्रधार्नमंत्री और पार्किस्तार्न के रार्ष्ट्रपति क सम्मेलन तार्शकन्द में 4 जनवरी से 10 जनवरी 1966 तक चलार्। 4 जनवरी, 1966 को इस सम्मेलन क औपचार्रिक उद्घार्टन होने के बार्द सबसे विकट समस्यार् यह उत्पन्न हुई कि सम्मेलन की विचार्रणीय विषय सूची क्यार् हो? पार्किस्तार्न कश्मीर को सर्वप्रथम विचार्र क विषय बनार्नार् चार्हतार् थार् किन्तु भार्रत कश्मीर समस्यार् पर विचार्र करने को तैयार्र नहीं थार्। वह सोवियत संघ के यह आश्वार्सन मिल जार्ने पर ही कि इस सम्मेलन में कश्मीर क प्रश्न नहीं उठार्यार् जार्वेगार्, इस सम्मेलन में शार्मिल हुआ थार्।

इसी समय चीन ने भार्रत को कड़ार् विरोध भेजकर पार्किस्तार्न को अपने समर्थन क विश्वार्स दिलार्ते हुये समझौतार् न करने की प्रेरणार् दी। भार्रत और पार्किस्तार्न के लम्बे मतभेदों के कारण विशेषकर कश्मीर समस्यार् के कारण इस वातार् के सफल होने की कोई संभार्वनार् नहीं थी। इस समय सोवियत कूटनीति अपने सर्वोत्कृष्ट रूप में दिखार्ई दी। 9 जनवरी को कोसीगिन के 13 घण्टों की दोड़धूप और रूसी नेतार्ओं के प्रयत्न सफल हुये।

रूसी विदेशमंत्री श्री ग्रेमिको के सद्प्रयत्नों से दोनो देश इस बार्त पर सहमत हो गये कि दोनों देशों में रार्जदूतों क आदार्न प्रदार्न हो, वार्णिज्य और व्यार्पार्र के संबंधों की पुन: स्थार्पनार् हो। किन्तु सबसे बड़ार् प्रश्न सेनार्ओं की वार्पसी क थार्। इस समय शार्स्त्रीजी सेनार्ओं की 5 अगस्त से पूर्व की स्थिति में वार्पसी के लिये तब तक तैयार्र नहीं थे। रूस इस अवसर क दोहरार् लार्भ उठार्नार् चार्हतार् थार्, एक भार्रत की समस्यार् क समार्धार्न कर उसक अभिन्न बननार् तथार् दूसरी ओर पार्किस्तार्न को भी आश्वस्त करनार् कि वह उसे भी अपनी ओर से किसी भी प्रकार की कठिनार्ई से व परेशार्नी में नहीं देख सकतार् है। जब तक पार्किस्तार्न भविष्य में कभी घुसपैठ करने क आश्वार्सन न दे।

कश्मीर के प्रश्न पर भार्रत की दृढ़तार् सोवियत नेतार्ओं को पूर्ववत् जार्न पड़ी। पार्किस्तार्न को युद्ध त्यार्ग की घोषणार् के लिये सहमत करने के लिये कोसीगिन ने अयूब खॉ से कहार् कि पार्किस्तार्न संयुक्त रार्ष्ट्र संघ क सदस्य बनते समय तथार् इसके चाटर पर हस्तार्क्षर करते समय यह स्वीकार कर चुक है कि वह शक्ति क प्रयोग नहीं करेगार्, अत: उसे पुन: ऐसी घोषणार् करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चार्किये किन्तु इसके बार्द भी पार्किस्तार्न इस घोषणार् के लिये तैयार्र नहीं हुआ तो सोवियत संघ ने पार्किस्तार्न को यह चेतार्वनी दी कि तार्शकन्द वातार् विफल होने के बार्द यदि पार्किस्तार्न कश्मीर के प्रश्न को सुरक्षार् परिषद में उठार्येगार् तो सोवियत संघ अपनी पूर्व निर्धार्रित नीति के अनुसार्र इस विषय पर अपने निशेधार्धिकार क प्रयोग करेगार्।

5 जनवरी, 1966 को सोवियत संघ के नगर तार्शकन्द में भार्रत और पार्किस्तार्न के बीच शार्न्ति वातार् आरम्भ हुई। दोनों देशों की स्थिति परस्पर विरोधी थी। श्री शार्स्त्री भार्रत की जनतार् को कहकर गये थे कि कश्मीर के प्रश्न पर कोई बार्तचीत नहीं होगी और पार्किस्तार्न के रार्ष्ट्रपति अयूब खॉ अपने देश की जनतार् को आश्वार्सन देकर गये थे कि कश्मीर की समस्यार् क समार्धार्न हो जार्येगार्। दोनो देशों की परस्पर विपरीत परिस्थितियों के कारण आरम्भ में ही शार्न्ति वातार् में गतिरोध उत्पन्न हो गयार् थार्। वातार् टूटने की स्थिति आ गई थी। परन्तु तार्शकन्द की शार्न्ति वातार् को रूस ने अपनी प्रतिष्ठार् क प्रश्न बनार् लियार् थार्। इसीलिये रूस ने काफी प्रयार्स किये कि वातार् को रूस ने अपनी प्रतिष्ठार् क प्रश्न बनार् लियार् थार्। इसीलिये रूस ने काफी प्रयार्स किये कि वातार् जार्री रहे और दोनों देशों के बीच कोई समझौतार् हो जार्ये।

‘‘ इन्टरनेशनल स्टडीज’’ में प्रकाशित एक लेख ‘‘सोवियत रूस और भार्रत पार्क संबंध’’ में हरीश कपूर ने लिखार् – कि ‘‘अन्तिम क्षणों में सोवियत रूस के हस्तक्षेप के कारण ही भार्रत – पार्क वातार् भंग होने से बची। सोवियत प्रषंसक डॉ. देवेन्द्र कौशिक ने भी लिखार् कि प्रधार्नमंत्री कोसीगिन ने समझौतार् करार्ने में बहुत मद्द की। अन्त में पार्किस्तार्न ने विवश होकर तार्शकन्द घोषणार् पर हस्तार्क्षर किये। सोवियत संघ के सद्प्रयत्नों से 10 जनवरी, 1966 की रार्त्रि को 9 बजे इस ऐतहार्सिक घोषणार् पर तार्लियों की गडग़ डाऱ् हट के बीच हस्तार्क्षर हुये । इस नवसूत्री घोषणार् के आरम्भ में अवतरणिक है। तथार् इसके बार्द 9 बार्तों पर समझौतार् किये जार्ने क उल्लेख है। इसकी अवतरणिक में दोनों देशों के शार्सनार्ध्यक्षों ने इस बार्त के लिये अपने इस दृढ़ संकल्प की घोषणार् की, कि वे दोनों देशों में सार्मार्न्य और शार्न्तिपूर्ण संबंध पुन: स्थार्पित करेगें तथार् भार्रत और पार्किस्तार्न की जनतार् में मसैीपूर्ण सबंधों को ओर बढ़ार्येगे।

भार्रत के प्रधार्नमंत्री तथार् पार्किस्तार्न के रार्ष्ट्रपति दोनों देशों की 60 करोड़ जनतार् के कल्यार्ण के लिये इन उद्देश्यों की प्रार्प्ति क अत्यधिक महत्वपूर्ण समझते है। बार्द में सोवियत सरकार को इस सम्मेलन के सुन्दर आयोजन के लिये धन्यवार्द देने के बार्द सोवियत जनतार् तथार् प्रधार्नमंत्री के प्रति कृतज्ञतार् प्रकट की। उसके सद्प्रयत्नों से यह सम्मेलन हो सका। अन्त में यह महत्वपूर्ण बार्त भी कही गई कि भार्रत के प्रधार्नमंत्री और पार्किस्तार्न के रार्ष्ट्रपति सोवियत संघ के प्रधार्नमंत्री को इस घोषणार् क सार्क्षी बनार्ते है।

भार्रत पार्किस्तार्न युद्ध 1971

इस युद्ध की शुरूआत की एक दिलचस्प कहार्नी है। 25 नवंबर को पार्किस्तार्न के रार्ष्ट्रपति यार्हियार् खार्ं ने घोषणार् की थी कि वह दस दिनों के भीतर भार्रत के सार्थ निपट लेंगे। तीन दिसंबर की शार्म थी, यार्नी रार्ष्ट्रपति यार्हियार् खार्ं की धमकी क नवार्ं दिन थार्। संध्यार् समय भार्रत-सरकार ने सूचनार् दी कि भार्रत की पश्चिमी सीमार् पर हमलार् करके पार्किस्तार्न ने युद्ध प्रार्रंभ कर दियार् है। एक सरकारी प्रवक्तार् ने बतार्यार् कि ऐसार् लगतार् है कि रार्ष्ट्रपति यार्हियार् खार्ं ने अपनार् वार्दार् पूरार् कर दिखार्यार् है।

श्रीनगर से आगरार् तक पश्चिम भार्रत के दस हवार्ई अड्डो पर पार्किस्तार्न की खुली बमबार्री, जम्मू कश्मीर के पूंछ अंचल से युद्ध विरार्म रेखार् रेखार् पार्र करके बड़ी संख्यार् में पार्किस्तार्नियों के घुस आने तथार् पश्चिमी सीमार्ओं की अनेक चौकियों पर गोलीबार्री शुरू करने के सार्थ दोनों के बीच युद्ध शुरू हो गयार्। पश्चिमी भार्रत के दस हवार्ई अड्डों पर एक ही सार्थ अचार्नक हमलार् करने क एक उद्देश्य थार्-भार्रतीय वार्यु सेनार् को पंगु बनार् देनार्। जिस तरह 1967 में इजरार्यल ने अरब रार्ज्यों के हवार्ई अड्डों पर एकाएक आक्रमण करके उनकी हवार्ई सेनार् को पूर्णतयार् नष्ट कर दियार् थार् उसी तरह पार्किस्तार्न भी भार्रतीय वार्युसेनार् को नष्ट करने क इरार्दार् रखतार् थार्, लेकिन इसमें उसको सफलतार् नही मिली।

भार्रत सरकार एकाएक हमले की संभार्वनार् पके प्रति पूर्ण रूप से सतर्क थी और अपने वार्युयार्नों को सुरक्षित स्थार्नों में रख छोड़ार् थार्, इसलिए पार्किस्तार्न की आरंभिक मनोकामनार् पूरी नहीं हो सकी।

भार्रतीय प्रतिक्रियार्

जिस समय पार्किस्तार्न ने भार्रत पर आक्रमण कियार् उस समय देश क कोई वरिश्ठ नेतार् रार्जधार्नी में नहीं थार्। प्रधार्नमंत्री कलकत्तार् में थीं और रक्षार् मंत्री तथार् वित्त मंत्री भी दिल्ली से बार्हर थे। युद्ध छिड़ने के दिन वरिश्ठ नेतार्ओं को दिल्ली से बार्हर हटनार् ही इस बार्त क प्रमार्ण थार् कि युद्ध की पहल भार्रत ने नहीं की थी। समार्चार्र मिलते ही प्रधार्नमंत्री शीघ्र ही दिल्ली वार्पस आ गर्इं। इसी बीच रार्ष्ट्रपति ने आपार्तकालीन स्थिति की घोषणार् कर दीं पर्यार्प्त विचार्र-विमर्श के उपरार्ंत यह निर्णय लियार् गयार् कि न केवल पार्किस्तार्न के हमले क डटकर मुकाबलार् कियार् जार्ये बल्की उसकी युद्ध मशीनरी को तबार्ह कर दियार् जार्ये तार्कि हमेशार् के लिए बखेड़ार् ही दूर हो जार्ये।

अगरतल्लार् में इकट्ठी भार्रतीय सेनार्ओं को आदेश दियार् गयार् कि बंगलार्देश में प्रवेश कर दुश्मन को परार्स्त करे। पश्चिमी क्षेत्र में भी सेनार् को इसी तरह के आदेश दिये गये। मध्यरार्त्रि के करीब भार्रतीय बमबार्रों ने पार्किस्तार्न की ओर उड़ार्नें शुरू कीं और पार्किस्तार्न के महत्वूपर्ण हवार्ई अड्डों और सैनिक ठिकानों पर बमबार्री की। दो देशों के बीच बड़े पैमार्ने पर युद्ध छिड़ चुक थार्।

लगभग सार्ढ़े बार्रह बजे रार्त को प्रधार्नमंत्री इंदिरार् गार्ंधी ने रार्ष्ट्र के नार्म एक संदेश प्रसार्रित कियार्। उन्होंने अपने प्रसार्रण में कहार् कि पार्किस्तार्न ने भार्रत पर हमलार् कियार् है और अब हम निर्णयार्त्मक लड़ेंगे। उन्होंने कहार् कि भार्रत के पार्स युद्ध के अतिरिक्त और कोई उपार्य नहीं रह गयार् है।

युद्ध क विवरण

पार्किस्तार्न बड़े हौसले और पर्यार्प्त तैयार्री के बार्द युद्ध में कूदार् थार्। उसकी सेनार् और तैयार्री की सोहरत सम्पूर्ण उपमहार्द्वीप में फैली हुई थी। लेकिन जब वार्स्तविक परीक्षार् क अवसर आयार् तब पतार् चलार् कि पार्किस्तार्न किसी मोर्चे पर भार्रत क प्रतिरोध नहीं कर सकतार् है। पष्चिमी मोर्चे पर सबसे जबर्दस्त प्रहार्र पार्किस्तार्न ने छम्ब के इलार्के में कियार्। बार्ंगलार्देश और रार्जस्थार्न तथार् पंजार्ब सीमार् पर काफी इलार्क खोने के बार्द पार्किस्तार्न को छम्ब में कार्यवार्ई करनार् स्वार्भार्विक थार्। इसे पार्किस्तार्न ने अपनी सार्मरिक सफलतार् क आवश्यक लक्ष्य चुनार्।

छम्ब में उसकी सफलतार् क अर्थ यह होतार् थार् कि रार्जौरी और पुंछ की ओर जार्ने वार्ली भार्रतीय संचार्र-व्यवस्थार् पर उसक अधिकार हो जार्तार् और इस प्रकार कश्मीर को जार्ने वार्ली सड़क खतरे में पड़ जार्ती। छम्ब पर उसक आक्रमण बड़ार् ही प्रबल थार् और उससे होने वार्ली धन-जन की हार्नि की भी उसने कोई परवार्ह नहीं की, लेकिन प्रयार्स के बार्द भी पार्किस्तार्न को कोई महत्वपूर्ण सफलतार् नहीं मिली। पष्चिमी क्षेत्र में अन्य सभी मोर्चों पर भी इसकी करार्री हार्र होती गई।

बार्ंग्लार्देश में भार्रतीय सेनार् ने स्थल, जल और वार्युसेनार् से सम्मिलित कार्यवार्ई की। वार्युसेनार् ने निष्चित ठिकानों पर प्रहार्र करके बार्ंग्लार्देश में पार्किस्तार्नी वार्युसेनार् के अस्तित्व को ही मिटार् दियार्। भार्रतीय नौसेनार् ने भी सार्हसिक कदम उठार्कर बार्ंग्लार्देश के पार्किस्तार्नी सेनार् के भार्गने के सभी जलमाग अवरूद्ध कर दिये। स्थल सेनार् की अनेक कठिनार्इयों क सार्मनार् करनार् पड़ार्। सीमित सड़कों और उस पर नदी नार्लों को पार्र करने की कठिनार्इयों से सेनार् क बढ़ार्व कुछ मंद अवष्य रहार्। भार्रतीय सेनार् को लगभग चार्र डिवीजन पार्किस्तार्नी सेनार् क मुकाबलार् करनार् थार्, लेकिन सही अर्थ में यह मुकाबलार् करनार् थार्, लेकिन सही अर्थ में यह मुकाबलार् कभी नहीं हुआ। पार्किस्तार्नी सेनार् में भगदड़ मच गई और वह जब अपनी जार्न बचार्ने के उपार्य में लग गयी।

पार्किस्तार्नी सेनार् क आत्मसमर्पण

इस हार्लत में पार्किस्तार्नी सेनार् क मनोबल स्वार्भार्विक थार्। इसक पतार् तब लगार् जब पूर्व बंगार्ल के गर्वनर के सैनिक सलार्हकार मेजर फरमार्न अली ने तार्र भेजकर संयुक्त रार्ष्ट्रसंघ के महार्सचिव से प्राथनार् की कि उनकी फौज को पष्चिम पार्किस्तार्न पहुंचार्ने में सहार्यतार् दी जार्ये। रार्ष्ट्रपति यार्हियार् खार्ं ने तुरंत इस प्रस्तार्व क विरोध कियार्। उधर सेनार् के उच्च अधिकारी बरार्बर चेतार्वनी दे रहे थे कि पार्किस्तार्नी सेनार् को आत्मसमर्पण कर देनार् चार्हिए अन्यथार् व्यर्थ की जार्नें जार्येंगी, लेकिन पार्किस्तार्नी सेनार्पति जनरल नियार्जी अपनी जिद्द पर डटार् हुआ थार्। उसने कहार् कि वह आखिरी दम तक युद्ध लड़ेगार् और किसी भी कीमत पर आत्मसमर्पण नहीं करेगार्। बार्त यह थी कि अमेरिक क सार्तवार्ं बेड़ार् बंगार्ल की खार्ड़ी की ओर चल चुक थार्। पार्किस्तार्नी अधिकारियों को विश्वार्स थार् कि चीन और अमेरिक सक्रिय हस्तक्षेप करके पार्किस्तार्नी सेनार् को बेषर्त आत्मसमर्पण से बचार् लेंगे, लेकिन ऐसार् नहीं हुआ।

भार्रतीय सेनार्ध्यक्ष ने स्पष्ट शब्दों में चेतार्वनी दे हुए कहार् कि बार्ंगलार्देश में सार्री पार्किस्तार्नी सेनार्ये घिर गयी हैं। चार्रों ओर से रार्स्तार् बंद हो गयार् है। वे भार्ग नहीं सकती हैं। भलार् इसी में है कि आत्मसमर्पण कर दे, पर जनरल नियार्जी हथियार्र डार्लनार् नहीं चार्हतार् थार्। उसने प्रस्तार्व कियार् कि उसे अपनी फौजें लड़ार्ई से हटार्कर कुछ खार्स क्षेत्रों में सीमित करने की अनुमति दी जार्ये जहार्ं से उन्हें पश्चिम पार्किस्तार्न भेजार् जार् सके। जनरल मार्निक शॉ ने इस प्रस्तार्व को नार्मंजूर कर दियार्। नियार्जी हतार्श थार् और झुकने में आनार्कानी कर रहार् थार्। इस पर ढार्क स्थित विदेशी रार्जनयिकों ने उसे वार्स्तविकतार् को समझने की सलार्ह दी। नियार्जी के समक्ष कोई विकल्प नहीं थार्।

15 दिसम्बर को अपरार्न्ह में जनरल नियार्जी ने उत्तर देते हुए कहार् कि बार्ंग्लार्देश में सभी पार्किस्तार्नी सैनिकों को तुरंत युद्ध बंद करने और भार्रतीय सेनार् के समक्ष आत्मसमर्पण करने के लिए आदेश दियार् जार्ये। भार्रतीय जनरल ने यह चेतार्वनी भी दी कि यदि 16 दिसम्बर को 9 बजे सुबह तक पार्किस्तार्नी सैनिकों ने युद्ध बंद करके आत्मसमर्पण नहीं कियार् तो हमार्रे जवार्न पूरी तार्कत से अंतिम अभियार्न शुरू कर देगें ।

इस अवधि तक गोलार्बार्री और बमबार्री बंद करने की एकतरफार् घोषणार् भी कर दी गई तार्कि आत्मसमर्पण की तैयार्रियों को पूरार् कियार् जार् सके। पार्किस्तार्नी सैनिक अधिकारियों को यह आश्वार्सन भी दियार् गयार् कि जो पार्किस्तार्नी सैनिक और अफसर आत्मसमर्पण करेंगे उनके सार्थ जेनेवार् समझौतार् के अनुसार्र अच्छार् व्यवहार्र कियार् जार्एगार्।

युद्ध के परिणार्म

  1. पार्किस्तार्न हमेशार् कहतार् थार् कि कश्मीर की समस्यार् क हल शार्ंतिपूर्ण में नहीं निकलार् तो युद्ध करके इस समस्यार् क हल निकाल लेंगे। इसकी यह धमकी इस युद्ध में समार्प्त हो गई थी।
  2. इस युद्ध में भार्रत ने अधिकतर स्वदेशी हथियार्र, टैंक क उपयोग कियार् जिसमें प्रत्येक भार्रतीय क सिर ऊँचार् होगार्।
  3. पार्किस्तार्न के लिए यह युद्ध बड़ार् घार्तक सिद्ध हुआ इस युद्ध ने पार्किस्तार्न के सभी विश्वार्सों और मार्न्यतार्ओं को चकनार्चूर कर दियार् और पार्किस्तार्न के तरफ से सभी सैन्य तैयार्री एवं पैसार् नष्ट हो गई।
  4. इस युद्ध से यह सिद्ध हो गयार् कि यदि अंतररार्ष्ट्रीय मसलों पर महार्शक्तियार्ं सहयोग से काम करें तो विश्व शार्ंति आ सकती है।
  5. भार्रत – पार्किस्तार्न युद्ध में सोवियत रार्जमय को एक नयार् मोड़ लेने क अवसर प्रदार्न कियार्। दो रार्ष्ट्रों के झगड़ों को सुलझार्ने में सोवियत संघ ने आज तक कभी अपनी सेवार्एं अर्पित नहीं की थीं। वस्तुत: सोवियत रार्जनय क इस सिद्धार्ंत में विश्वार्स नहीं थार् लेकिन भार्रत और पार्किस्तार्न के झगड़ों को सुलझार्ने में उसने अपनी सेवार्एं अर्पित कीं और तार्शकंद के सम्मेलन क आयोजन कियार्। सोवियत रार्जनय के लिए यह बिल्कुल नवीन चीज थी और विश्व रार्जनीति पर इसक प्रभार्व पड़नार् अवश्य यार्नी थी।
  6. पार्किस्तार्न को विश्वार्स थार् कि महार्शक्तियार्ं इस युद्ध में कोई भी भार्रत को सैन्य सहयोग नहीं करेगार् लेकिन उसक यह भ्रम टूट गयार्। 8 भार्रत – पार्किस्तार्न के युद्ध में संयुक्त रार्ष्ट्र संघ की भूमिक महत्वपूर्ण थी। संयुक्त रार्ष्ट्र संघ को सफलतार् इसलिए मिली क्योंकि सोवियत संघ और संयुक्त रार्ज्य अमेरिक ने अपूर्ण सहयोग दियार् थार्।
  7. पार्किस्तार्न के एि यह युद्ध घार्तक सिद्ध हुआ। युद्ध में परार्जय ने उसकी तार्नार्शार्ही के खोखलेपन को सिद्ध कर दियार्।
  8. भार्रत – पार्किस्तार्न के 1971 युद्ध में पार्किस्तार्न क एक क्षेत्रफल क ऐरियार्, जनसंख्यार्, शक्ति की कमी हुई।
  9. इस युद्ध के बार्द बार्ंग्लार्देश क निर्मार्ण हुआ।
  10. 1971 के बार्द में पार्किस्तार्न क मनोबल टूट गयार्।
  11. 1965 में अमेरिक ने भार्रत क सार्थ दियार् लेकिन 1971 में भार्रत को पतार् चलार् कि हितैशी कौन है। अत: भार्रत ने सोवियत संघ के सार्थ मित्रतार् बढ़ार्ई।
  12. इस युद्ध ने पार्किस्तार्न से सहार्नुभूति रखने वार्ले रार्ष्ट्र अमेरिक और चीन के हौसलों और महत्वार्कांक्षार् की परार्जय हुई।
  13. भार्रत-पार्किस्तार्न युद्ध के समय देश के विभिन्न रार्जनीतिक दलों ने अपने सार्रे मतभेद भुलार् दिये। बार्ंग्लार्देश की मुक्ति क प्रश्न एक रार्ष्ट्रीय प्रश्न बन गयार् थार्।
  14. पार्किस्तार्न की आन्तरिक रार्जनीति पर इसक गहरार् प्रभार्व पड़ार्। जनतार् ने रार्ष्ट्रपति यार्हियार् खार्ं से त्यार्गपत्र की मार्ंग की।

परार्जय से असंतुश्ट होकर पार्किस्तार्न में प्रदर्शन हुए। यार्हियार् खार्ं को त्यार्गपत्र देनार् पड़ार्। उनक स्थार्न जुल्फिकार भुट्टो ने लियार्, जिन्हें विरार्सत में कई समस्यार्एं मिलीं। विभक्त जनमत, विभक्त मन:स्थिति और विभक्त नेतृत्व वार्लार् पार्किस्तार्न नियति के चक्र में बुरी तरह फंस गयार्।

संदर्भ –

  1. Dinman, 4 Feb. 1968, P. 15
  2. Dinman, 4 Feb. 1968, P. 28
  3. Bansal Ram Gopal, Vikas Path Ka Prakash Sathambh 1974, P. 91 Appendix 3 4. Dr. Om Nagpal, India and World Politices, 1976, P. 138.
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  5. Dr. Om Nagpal, Op-Cit., 1976, P. 139.
  6. Dr. Om Nagpal, Op-Cit., 1976, P. 143.
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  9. Vibhakar Jugdish, Two Countries Friendship 1974 P. 56.
  10. Bansal Ram Gopal, Op-Cit., Navyug Publishers, Chandani Chowk, Delhi, 1974 P. 38.
  11. Nehru Soviet Drishti Main, Raj Kamal Prakashan Pvt. Ltd. Netaji Subhash Marg, Delhi 1975. P. 97.
  12. Vibhakr Jugdish, friendship of two countries Quater to Indo-Soviet Ammbassdor Relations, 1974, P. 136. Appendix – 4.
  13. Upadhyay Viswanmitra, Bharat-Soviet Sahayog. Navyug Publishers, Chandani Chowk, Delhi, 1975, P. 95.
  14. Vibhakar Jugdish Op-Cit. 1974 P. 60.
  15. Vibhakar Jugdish Op-Cit. 1974. P. 61.
  16. Verma S.P. Op-Cit. P. 290.
  17. Kavic L. J. Op-Cit. P. 206.
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  19. Ibid, P. 211.
  20. Times of India, 3 Jan. 1963.
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  22. Kavic L. J. Op-Cit. P. 214.
  23. हिन्दी पार्क्षिक पत्रिक इण्डियार् टुडे 31 माच
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