भार्रत चीन युद्ध 1962 – Scotbuzz

भार्रत चीन युद्ध 1962

By Bandey |
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अनुक्रम –

भार्रत – चीन युद्ध जो भार्रत चीन सीमार् विवार्द के रूप में भी जार्नार् जार्तार् है, चीन और भार्रत के बीच 1962 में हुआ एक युद्ध थार्। विवार्दित हिमार्लय सीमार् युद्ध के लिए एक मुख्य बहार्नार् थार्, लेकिन अन्य मुद्दों ने भी भूमिक निभार्ई। चीन में 1959 के तिब्बती विद्रो के बार्द जब भार्रत ने दलार्ई लार्मार् को शरण दी तो भार्रत चीन सीमार् पर हिंसक घटनार्ओं की एक श्रृंखलार् शुरू हो गयी। भार्रत ने फॉरवर्ड नीति के तहत मकै मार्हे न रेखार् से लगी सीमार् पर अपनी सैनिक चौकियार्ँ रखी जो 1959 में चीनी प्रीमियर झोउ एनलार्ई के द्वार्रार् घोषित वार्स्तविक नियंत्रण रेखार् के पूर्वी भार्ग के उत्तर में थी।

चीनी सेनार् ने 2 अक्टूबर 1962 को लद्दार्ख में और मैकमोहन रेखार् के पार्र एक सार्थ हमले शुरू किये। चीनी सेनार् दोनों मोर्चे में भार्रतीय बलों पर उन्नत सार्बित हुई और पश्चिमी क्षेत्र में चुषूल में रेजार्ंग-लार् एवं पूर्व में तवार्ंग पर कब्जार् कर लियार्। जब चीन ने 20 नवम्बर 1962 को युद्ध विरार्म और सार्थ ही विवार्दित क्षेत्र से अपनी वार्पसी की घोषणार् की तब युद्ध खत्म हो गयार्। भार्रत चीन युद्ध कठार्रे परिस्थितियों में हई लड़ार्ई के लिए उल्लेखनीय है इस युद्ध में ज्यार्दार्तर लडाऱ्ई 4250 मीटर (14,000 फीट) से अधिक ऊचार्ई पर लड़ी गयी।

इस प्रकार की परिस्थिति ने दोनों पक्षों के लिए रार्सन और अन्य लोजिस्टिक समस्यार्एँ प्रस्तुत की। भार्रत चीन युद्ध चीनी और भार्रतीय दोनों पक्ष द्वार्रार् नौसेनार् यार् वार्यु सेनार् क उपयोग नहीं करने के लिए भी विख्यार्त है।

  • तिथि – 20 अक्टूबर – 21 नवम्बर 1962
  • स्थार्न –  दक्षिणी क्सिंजिग (अक्सार्ई चीन) अरूणार्चल प्रदेश (दक्षिण तिब्बत, उत्तर पूर्व फ्रंटियर एजेंसी)
  • परिणार्म –  चीनी सेनार् की जीत अंतररार्ष्ट्रीय स्तर पर चीन की छवि धूमिल
  • क्षेत्रीय –  अक्सार्ई चिन चीन के नियंत्रण में
  • बदलार्व – आयार्

सेनार्नार्यक

भार्रत चीन

बृज मोहन कौल – जहार्ँग गुओहुआ

जवार्हरलार्ल नेहरू – मार्ओ जेडोंग

वी. के. कृष्ण मेनन – लिऊ बोचेंग

प्रार्ण नार्थ थार्पर – ज्होउ एनलार्ई

स्थार्न

चीन और भार्रत के बीच एक लंबी सीमार् है जो नेपार्ल और भूटार्न के द्वार्रार् तीन अनुभार्गो में फैलार् हुआ है। यह सीमार् हिमार्लय पर्वतों से लगी हुई है जो बर्मार् एवं तत्कालीन पश्चिमी पार्किस्तार्न (आधुनिक पार्किस्तार्न) तक फैली है। इस सीमार् पर कई विवार्दित क्षेत्र अवस्थित है। पश्चिमी छोर में अक्सार्ई चिन क्षेत्र है जो स्विट्जरलैंड के आकार क है। यह क्षेत्र चीनी स्वार्यत्त क्षेत्र झिंजियार्ंग और तिब्बत (जिसे चीन ने 1965 में एक स्वार्यत्त क्षेत्र घोशित कियार्) के बीच स्थित है। पूर्वी सीमार् पर बर्मार् और भूटार्न के बीच वर्तमार्न भार्रतीय रार्ज्य अरूणार्चल प्रदेश (पुरार्नार् नार्म-नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी) स्थित है। 1962 के संघर्ष में इन दोनों क्षेत्रों में चीनी सैनिक आ गए थे।

ज्यार्दार्तर लड़ार्ई ऊँचार्ई वार्ली जगह पर हुई थी। अक्सार्ई चिन क्षेत्र समुद्र तल से लगभग 5000 मीटर की ऊंचार्ई पर स्थित सार्ल्ट फ्लैट क एक विशार्ल रेगिस्तार्न है और अरूणार्चल प्रदेश एक पहार्ड़ी क्षेत्र है जिसकी कई चोटियार्ँ 7000 मीटर से अधिक ऊँची है। सैन्य सिद्धार्ंत के मुतार्बिक आम तौर पर एक हमलार्वर को सफल होने के लिए पैदल सैनिकों के 3:1 के अनुपार्त की संख्यार्त्मक श्रेष्ठतार् की आवश्यकतार् होती है।

पहार्ड़ी युद्ध में यह अनुपार्त काफी ज्यार्दार् होनार् चार्हिए क्योंकि इलार्के की भौगोलिक रचनार् दुसरे पक्ष को बचार्व में मद्द करती है। चीन इलार्के क लार्भ उठार्ने में सक्षम थार् और चीनी सेनार् क उच्चतम चोटी क्षेत्रों पर कब्जार् थार्। दोनों पक्षों को ऊंचार्ई और ठंड की स्थिति से सैन्य और अन्य लार्जिस्टिक कार्यों में कठिनार्इयों क सार्मनार् करनार् पड़ार् और दोनों के कई सैनिक जमार् देने वार्ली ठण्ड से मर गए।

भार्रत-चीन सीमार् विवार्द

उस समय तक भार्रत और चीन के बीच सीमार् को लेकर भी घोर विवार्द शुरू हो चुक थार्। 1950-51 में ही कम्युनिस्ट चीन के नक्शे में भार्रत के एक बहुत बड़े भू-भार्ग को चीन क अंग दिखलार्यार् गयार् थार्। जब भार्रत सरकार ने चीन क ध्यार्न इस ओर आकर्शित कियार् तार् े उसे यह जवार्ब मिलार् कि नक्शे गलती से बन गये हैं और चीन की सरकार इनमें शीघ्र ही सुधार्र कर देगी। यह हिन्दी-चीन भार्ई-भार्ई क युग थार् और इसलिए भार्रत सरकार ने चीन की नेकनीयती पर संदेह नहीं कियार् लेकिन चीन ने कभी अपनार् नक्शार् नहीं बदलार् और उनके प्रत्येक संस्करण में भार्रतीय भू-भार्गों पर चीन क दार्वार् बढ़तार् गयार्।

भार्रत और चीन क सीमार् विवार्द मुख्यत: दो सीमार्न्तों के ऊपर है। उत्तर-पूर्व में मैकमोहन रेखार् और उत्तर-पश्चिम में लद्दार्ख। भार्रत मैकमोहन रेखार् को अपने और चीन के बीच एक निश्चित सीमार्न्त रेखार् मार्नतार् है, लेकिन चीन उसे सार्म्रार्ज्यवार्दी रेखार् कहतार् है। उसक कहनार् है कि इस रेखार् को चीन की किसी सरकार ने कभी मार्न्यतार् नहीं दी है। इसी तर्क के आधार्र पर चीन ने लोगंचू पर अधिकार कर लियार्, यद्यपि पीछे उसको यहार्ं से हट जार्नार् पड़ार्। लद्दार्ख में भी उसने भार्रत के एक बड़े भू-भार्ग पर दार्वार् कियार्। उसने भार्रत को प्रार्देशिक सीमार्ओं में अक्षय चीन सड़क को अनार्धिकृत रूप से बनार् लियार् और इस प्रकार भार्रत के एक बहुत बड़े भू-भार्ग पर कब्जार् कर लियार्।

भार्रत सरकार को इस तथ्य की जार्नकारी बहुत पहले से थी, लेकिन भार्रतीय जनतार् से इस तथ्य को छिपार्कर रखार् गयार् थार्। इसलिए जब भार्रतीय जनतार् को सहसार् यह ज्ञार्त हुआ कि भार्रत-चीन सीमार् प्रदेश पर चीन की सशस्त्र टुकड़ियों ने भार्रत क बहुत सार् क्षेत्र दबार् लियार् और अधिक भूमि हस्तगत करने की तैयार्री कर रही है, तब वह हतप्रभ हो गयी।

आक्रार्मकों को खदेड़ने के लिए मार्ंग होने लगी। लोगंचू चौकी पर सेनार् के कब्जे तथार् लद्लार्ख में लुर्म सिंह के नेतृत्व में सीमार् प्रदेश की जार्ंच पड़तार्ल करने वार्ले भार्रतीय पुलिस दल के विरूद्ध चीनी सैनिक कार्रवार्ई से तो यह असंतोष और भी उग्र हो उठार्। प्रतिषोध ार्ार्त्मक सैनिक कार्यवार्ही की व्यार्पक मार्ंग के बार्वजूद नेहरू ने इसे स्वीकार नहीं कियार् और समझौतार् वातार् द्वार्रार् समस्यार् को सुलझार्ने पर बल दियार्। उनक तर्क थार् कि भार्रत सभी अंतररार्ष्ट्रीय समस्यार्ओं को शार्ंतिपूर्ण ढंग से सुलझार्ने के लिए बचन बद्ध है।

चीन की इन कार्रवार्इयों को भार्रत पंचषील क उल्लंघन मार्नतार् रहार् और उनक विरोध करतार् रहार्। अत:एवं इन विवार्दों के शार्ंतिपूर्ण समार्धार्न के लिए 1960 के अप्रैल में चीन ने यह प्रस्तार्व कियार् कि दोनों देशों के उच्च पदधिकारी इन सार्री समस्यार्ओं क अध्ययन करें और यह खोजने क प्रयार्स करें कि उनक शार्ंतिपूर्ण समार्धार्न कैसे कियार् जार् सकतार् है। उसी वर्ष रंगून में इन पदधिकारियों क सम्मेलन हुआ, लेकिन कोई संतोशजनक समार्धार्न नहीं निकल सका। इन पदधिकारियों की रिपोर्ट से यह ज्ञार्त हुआ कि इस समस्यार् के ऊपर दोनों पक्षों की दृष्टियों में घोर अंतर है।

इस हार्लत में दोनों के बीच तनार्तनी बनी रही। चीन के लद्दार्ख के दो हजार्र वर्गमील के नये क्षेत्र पर नयार् दार्वार् कियार्। 1956 में चीन ने अपने दार्वे के समर्थन में जो नक्शार् पेश कियार् थार् उसके अनुसार्र चीन क दार्वार् लद्दार्ख में दस हजार्र वर्गमील पर थार्, लेकिन दोनों के अधिकारियों की वातार् में जो नक्शार् दियार् गयार् उसके हिसार्ब से लद्दार्ख में चीन क दार्वार् बार्रह हजार्र वर्गमील हो गयार्। अब चीन क यह दार्वार् पचार्स हजार्र वर्गमील हो गयार्-पश्चिमी अंचल में बार्रह हजार्र वर्गमील, पूर्वी अंचल में बत्तीस हजार्र पार्ंच सौ वर्गमील, मध्य में पार्ंच सौ वर्गमील तथार् कश्मीर के कारार्कोरम दरें से पश्चिम की ओर से पार्ंच हजार्र वर्गमील। इस दार्वे में लगभग पचार्स हजार्र वर्गमील चीन के अधिकार में है। इस कारण भार्रत और चीन के बीच तनार्तनी क बढ़नार् स्वार्भार्विक थार्।

लेकिन चीन को इस तनार्तनी की कोई परवार्ह नहीं थी। 1961 में भार्रतीय भूमि पर दोनों पक्षों के मध्य सैनिक झड़पें होती रहीं। इस हार्लत में पंचषील संधि को नहीं दुहरार्यार् जार् सकतार् थार्। 1954 के समझौते के अनुसार्र 2 दिसंबर 1961 को पंचशील की संधि दुहरार्ई जार्नी चार्हिए थी लेकिन बदली हुई परिस्थिति में यह असम्भव थार् और भार्रत-चीन पंचशील संधि की अकाल मृत्यु हो गई। भार्रत-चीन सीमार् विवार्द क विवरण 10 मई 1962 को भार्रत ने चीन के सार्मने सीमार् विवार्द को तय करने के लिए वातार्एं प्रार्रंभ करने क प्रस्तार्व रखार्। चीन ने उसे अस्वीकृत कर दियार् और 11 जुलार्ई को गलवार्न घार्टी में उसने युद्ध क शंख बजार् दियार्।

भार्रत द्वार्रार् आक्रमण क दोषार्रोपण करके चीनी सैनिकों ने लद्दार्ख में भार्रतीय चौकियों के प्रहरियों को घेरनार् शुरू कियार्, लेकिन भार्रतीय सेनार् के सार्मने उनकी एक न चली और गलवार्न घार्टी से चीनी सैनिकों को हट जार्नार् पड़ार्। इसके बार्द अक्टबू र में नेफार् क्षेत्रों में चीनियों क आक्रमण शुरू हुआ। भार्रतीय चौकियों पर आक्रमण करने के चार्र दिन बार्द अर्थार्त अक्टूबर 1962 को चीन की सरकार द्वार्रार् एक त्रिसूत्री प्रस्तार्व पार्रित कियार् गयार् जो इस प्रकार थार्:

1.चीन की सरकार यह आषार् करती है कि भार्रत की सरकार इस बार्त से अपनी सहमति प्रकट करेगी कि दोनों पक्ष भार्रत-चीन के बीच की वार्स्तविक नियंत्रण रेखार् क आदर करते हैं और दोनों पक्ष की सेनार्एं उक्त नियंत्रण रेखार् से बीस किलोमीटर दूर हट जार्यें।

2ण् भार्रत सरकार द्वार्रार् यह न स्वीकार किये जार्ने पर भी चीन की सरकार दोनों सरकारों के विचार्र-विमर्ष के उपरार्ंत पूर्वी क्षेत्र में वार्स्तविक नियंत्रण रेखार् से अपने सैनिकों को हटार्ने के लिए तैयार्र है। इसी समय दोनों पक्ष उक्त वार्स्तविक नियंत्रण रेखार् जो सीमार् के मध्य और पश्चिमी क्षेत्र की परंपरार्गत सीमार् रेखार् है, क उल्लंघन न करने के लिए वचनबद्ध हों।

3ण् दोनों देशों के प्रधार्नमंत्रियों की वातार् हो तार्कि सीमार् समस्यार् क शार्ंतिपूर्ण समार्धार्न हो। इसके बार्द ही 16 नवंबर को चीन ने नेफार् और लद्दार्ख के क्षेत्रों में बड़े प्रचण्ड रूप से आक्रमण शुरू कर दियार्।

इस बार्र चीनियों ने बड़े पैमार्ने पर युद्ध की तैयार्री की थी। वे टैंक और आधुनिकतम हथियार्रों से लैस होकर भार्रतीय भूमि पर उतरे थे। भार्रत इतने बड़े पैमार्ने पर युद्ध करने के लिए तैयार्र नहीं हो सका। फलत: भार्रतीय सेनार् को कई स्थलों को छोड़नार् पड़ार्। चीनी सेनार् बढ़ती हुई भार्रतीय प्रदेश में प्रवेष करने लगी और तेजपुर से कोई अस्सी मील उत्तर तक आ गई। यह भार्रत और चीन के बीच एक अघोशित युद्ध थार्।

चीन के प्रधार्नमंत्री ने भार्रत के समक्ष वातार्एं शुरू करने के लिए एक त्रिसूत्री प्रस्तार्व रखार् थार्। कोई भी स्वार्भिमार्नी देश इस शर्त को नहीं मार्न सकतार् थार्। अत: एंव भार्रत ने उसे नार्मंजूर कर दियार्। भार्रत ने यह मार्ंग की कि चीनी सेनार् 8 दिसंबर की स्थिति में चली जार्ये और आक्रमण क अतं हो, तभी चीन के सार्थ किसी प्रकार बार्तचीत शुरू हो सकती है।

चीन इसके लिए तैयार्र नहीं हुआ, पर चीन के लिए अब युद्ध जार्री रखनार् असंभव थार्। जार्ड़े क महीनार् आ रहार् थार् और उस समय हिमार्चल क्षेत्र में नीनियों को टिकनार् असभ्ं ार्व थार्। उधर सोवियत संघ भीतर ही भीतर चीन पर आक्रमण बंद करने के लिए दबार्व डार्ल रहार् थार्। चीनी हमले के खिलार्फ भार्रत में भी अपूर्व जनजार्गरण हुआ और भिन्न देशों से भार्रत को सहार्यतार् मिलने लगी। इन सब बार्तों को देखकर युद्ध बंद कर देने में ही चीन ने अपनार् कल्यार्ण समझार्।

20 नवंबर को उसने एक तरफार् युद्ध बंद कर देने की घोषणार् कर दी। उसने यह भी घोषणार् की, कि 1 दिसंबर से वह अपनी फौज को 7 नवंबर की नियंत्रण रेखार् तक वार्पस लौटार् लेगार्। सभी दृश्टियों से यह चीन की एक भयंकर रार्जनीतिक चार्ल थीं इसके द्वार्रार् वह न केवल भार्रत को वर्न समस्त विश्व को धोखे में डार्लनार् चार्हतार् थार्। इस घोषणार् के उत्तर में नेहरू अपनी उसी पूर्ववर्ती मार्ंग पर डटे रहे कि चीन 8 सितंबर वार्ली रेखार् पर वार्पस जार्ये तभी उससे कोई वातार् हो सकती है। चीन ने जिस तरह की मार्ंग रखी है वह न केवल अपमार्नजनक किंतु सीमार् के समस्त दर्रों पर तथार् अधिकांश भार्रतीय प्रदेश पर उसक अधिकार पक्क करने वार्ली है।

यह ध्यार्न देने योग्य बार्त है कि चीन वहार्ं तक अपनी सेनार् हटार्ने को तैयार्र थार्। चीन की घोषणार् में कहार् गयार् थार् कि वह नेफार् में अवध्ै मकै मोहन रेखार् के पार्र अपनी सेनार् हटार् लेगार् और शेष सीमार् पर वह अपने वर्तमार्न अधिकार क्षेत्र की सीमार् से सार्ढ़े चार्र मील पीछे हटेगार्।

इसक तार्त्पर्य यह हुआ कि लद्दार्ख में जहार्ं पचार्सी मील आगे बढ़ आयार् थार्, वहार्ं पर अपनार् प्रभुत्व सिद्ध करने के लिए केवल सार्ढ़े बार्रह मील पीछे हटेगार् और इस प्रकार वहार्ं लगभग सोलह हजार्र वर्गमील पर अपनार् आधिपत्य कायम रहखेगार्। इतनार् ही नहीं पूर्वी क्षेत्र में भी वह थार्गलार् पहार्ड़ी तथार् उसके निकटवर्ती सभी चौकियों पर अपनार् प्रभुत्व रखनार् चार्हतार् थार्। चीन की शर्त थी कि वह अपने नियंत्रण के क्षेत्र में अपनी चौकियों को अक्षुण्ण रखेगार् और उसे क्षेत्र की शार्ंति व्यवस्थार् के लिए अपनी पुलिस भी तैनार्त रखेगार्।

इस प्रकार अपने नियंत्रण के क्षेत्रों में वह असैनिक शार्सन-व्यवस्थार् स्थार्पित रखनार् चार्हतार् थार् और सार्थ ही भार्रत को इस अधिकार से वंचित रखनार् चार्हतार् थार् कि वह अपनी खोयी हुई चौकियों को पुन: प्रार्प्त कर सके। उसने भार्रत को धमकी भी दी कि यदि भार्रत ने फिर चौकियार्ं स्थार्पित करने की चेष्टार् की तो चीन को पुन: लड़ार्ई प्रार्रंभ कर देने क अधिकार रहेगार्। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि युद्ध विरार्म क प्रस्तार्व न केवल भ्रमार्त्मक ही थार् वरन इसकी स्वीकृति भार्रत के लिए सार्ंघार्तिक होती।

भार्रत सरकार के विदेश मंत्रार्लय ने चीन के इस प्रस्तार्व को सार्वधार्नी से अध्ययन कियार् और इसके विश्लेषण करने के बार्द इस नतीजे पर पहुंचार् कि कई अर्थों में यह प्रस्तार्व 24 अक्टूबर के प्रस्तार्व से भी खरार्ब है। इस विश्लेषण के अनुसार्र चीन न केवल 8 सितंबर 1962 से पहले शक्ति के प्रयोग से हथियार्ये हुए काफी बड़े भार्रतीय भू-भार्ग पर नियंत्रण बनार्ये रखनार् चार्हतार् है बल्कि लद्दार्ख और नेफार् दोनों में 8 सितंबर 1962 के बार्द विशार्ल आक्रमणों से कब्जार् किये प्रदेश पर भी नियंत्रण प्रार्प्त करनार् चार्हतार् है। यह चीनी चार्ल इतनी स्पष्ट थी कि भार्रत उसे स्वीकार नहीं कर सकतार् थार्।

अत: भार्रत सरकार ने चीन के 21 नवंबर 1962 के प्रस्तार्व को अस्वीकार कर दियार्। फिर भी चीन ने युद्ध बंद कर दियार् और इस कारण लड़ार्ई रूक गई। उसने जीते हुए भार्रतीय प्रदेशों को भी खार्ली करनार् शुरू कर दियार्। युद्ध में बहुत से भार्रतीय सैनिक बंदी बनार् लिए गए थे। चीन ने इन बंदियों को रिहार् कर दियार् और भार्रत के सैनिक सार्जोसार्मार्न भी लौटार् दिए।

चीन की धमकी

चीन ने भार्रत को 8 सितंबर से पूर्व की स्थिति स्थार्पित होने की मार्ंग की मार्ंग को ठुकरार् दियार् और यह धमकी दी कि इस बार्त पर अड़े रहने से सीमार् संघर्ष सुलझ नहीं पार्येगार्। उसने भार्रत को आक्रमक बतलार्यार्। इतनार् ही नहीं कोलम्बो-सम्मेलन प्रार्रंभ होने से पूर्व उसने धमकी से भार्रत विरोधी प्रचार्र कियार् तार्कि सम्मेलन के समस्त रार्श्ट्ों को धमक कर उन्हें भार्रत को न्यार्यसंगत मार्ंगों के समर्थन करने से रोक सके। अपने इस प्रयार्स में वह बहुत हद तक सफल भी रहार्। सम्मेलन के एक दिन पूर्व चीन भार्रत को एक धमकी भरार् पत्र भेजकर निम्न बार्तों को हार्ं यार् नार् में उत्तर देने को कहार्।

  1. भार्रत युद्ध विरार्म क प्रस्तार्व करतार् है यार् नहीं
  2. भार्रत चीन क यह प्रस्तार्व स्वीकार करतार् है यार् नहीं की दोनों देश की सेनार्ए नवंबर 1959 की नियंत्रण रेखार् से 20 किलोमीटर पीछे हट जार्ए।

भार्रत ने इस प्रस्तार्व को नार्मंजूर कर दियार्।

कोलम्बों प्रस्तार्व

भार्रत चीन संघर्ष से उत्पन्न विवार्द एषियार्ई क्षेत्र की सुरक्षार् को संकट मार्नकर वर्मार्, श्रीलंका, इण्डोनेशियार्, मिश्र तथार् हार्नार् आदि देशों ने कोलम्बों में एक सम्मेलन क आयोजन कियार् जिसक उद्देशय सीमार् विवार्द क हल करनार् थार्। श्रीलंक के प्रधार्नमंत्री श्रीमती भण्डार्रनार्यके ने अथक प्रयार्सों से जनवरी 1963 को कोलम्बो प्रस्तार्व को प्रकाशन कियार् जिसके अतंगर्त भार्रत व चीन ने सीमार् विवार्द के हल हेतु प्रयार्स किये जार्येंगे। परंतु चीन के असहयोग रवैये के कारण यह प्रस्तार्व विफल रहार्। कोलम्बो प्रस्तार्व से मिलतार् जुलतार् एक प्रस्तार्व मिश्र के रार्ष्ट्रपति कर्नल नार्सिर ने 3 अक्टूबर 1963 को प्रस्तुत कियार्, किंतु यह भी विफल रहार्।

सन् 1963 के भार्रत पार्क युद्ध में एक बार्र पुन: भार्रतीय चीन शत्रुतार् स्पष्ट हो गई। ज्ञार्तव्य है कि सन् 1960 से ही चीन पार्किस्तार्न को अपने संबंधों को मधुर बनार्ने की नीति पर चल रहार् थार्। यद्यपि चीन व पार्किस्तार्न विरोधी व्यवस्थार् पर आधार्रित देश है, तथार्पि भार्रत के विरूद्ध वे एक दूसरे के निकट आ गये। चीनी पार्किस्तार्नी भार्ई-भार्ई के नार्रों को साथक सिद्ध करते हुए 16 सितंबर 1965 को चीन ने भार्रत को यह धमकी दी थी कि तीन दिनों के अंदर भार्रत, सिक्किम चीन सीमार् पर गरै कानूनी ढगं से बनार्ये गये सैनिक प्रतिष्ठार्नों को हटार् ले अन्यथार् परिणार्म बुरार् होगार्। परंतु विश्वशार्ंति बनार्ये रखने के दृश्टिकोण से महार्शक्तियों के हस्तक्षेप से चीन को यह धमकी तक ही सीमित रहीं।

अप्रैल 1965 के बार्द भार्रत चीन सम्बंधों में गतिरोध व्यार्प्त रहार्। लेकिन अप्रैल 1971 में कैटन के व्यार्पार्रिक मेले में हार्ंगकांग स्थित भार्रतीय वार्णिज्य आयुक्त को आमंत्रित करने से दोनों देशों के पार्रस्परिक संबंधों में कुछ नरमी आयी। फरवरी 1972 में पौलेण्ड में चीन व भार्रत के रार्जदूतों की हुई मुलार्कात तथार् 15 अगस्त 1962 को लार्ल किले समार्रोह पर चीनी दूतार्वार्सों के प्रतिनित्रिार्यों की उपस्थिति क भी कोई ठोस महत्वपूर्ण परिणार्म नहीं निकलार्। दूसरी ओर भार्रत चीन से मधुर संबंधों की स्थार्पनार् हेतु प्रयत्न रह। सन् 1976 में श्रीमती इंदिरार् गार्ंधी ने एक पक्षीय कार्यवार्ही द्वार्रार् रार्जदूतों क आदार्न प्रदार्न करके श्री के. आर. नार्रार्यण की चीन में रार्जदूत के रूप में नियुक्ति की।

सन् 1977 में सत्तार् में आयी जनतार् पाटी ने भी चीन से मधुर सबंध्ं ार्ों की नीति के अंतर्गत विदेश मंत्री श्री अटल बिहार्री वार्जपेयी को चीन भेजार् परंतु उसी समय वियतनार्म पर चीन के आक्रमण होने से भार्रत चीन संबंधों को सार्मार्न्य बनार्ने के प्रयार्सों पर प्रष्न चिन्ह लग गयार्। तथार्पि कालार्न्तर में दोनों देश सीमार् विवार्द के हल आर्थिक, सार्ंस्कृतिक व “ौक्षणिक समझौतों हेतु प्रयत्नषील दृश्टिगत हुए।

युद्द के परिणार्म

चीन के सरकारी सैन्य इतिहार्स के अनुसार्र, इस युद्ध से चीन ने अपने पश्चिमी सेक्टर की सीमार् की रक्षार् की नीति के लक्ष्यों को हार्सिल कियार्, क्योंकि चीन ने अक्सार्ई चिन क वार्स्तार्विक नियंत्रण बनार्ए रखार्। युद्ध के बार्द भार्रत ने फॉरवर्ड नीति को त्यार्ग दियार् और वार्स्तविक नियंत्रण रेखार् वार्स्तविक सीमार्ओं में परिवर्तित हो गयी।

जेम्स केल्विन के अनुसार्र, भले ही चीन ने एक सैन्य विजय पार् ली परन्तु उसने अपनी छवि अंतररार्ष्ट्रीय के मार्मले में खो दी। पश्चिमी देशों, खार्सकर अमेरिका, को पहले से ही चीनी नजरिए, इरार्दों और कार्यों पर शक थार्। इन देशों ने चीन के लक्ष्यों को विश्व विजय के रूप में देखार् और स्तश्ट रूप से यह मार्नार् की सीमार् युद्ध में चीन हमलार्वर के रूप में थार्। चीन की अक्टबू र 1964 में प्रथम परमार्णु हथियार्र परीक्षण करने और 1965 के भार्रत पार्किस्तार्न युद्ध में पार्किस्तार्न को समर्थन करने से कम्युनिस्टों के लक्ष्य तथार् उद्देष्यों एवं पूरे पार्किस्तार्न में चीनी प्रभार्व के अमेरिकी रार्य की पुटि हो जार्ती है।

भार्रत

युद्ध के बार्द भार्रतीय सेनार् में व्यार्पक बदलार्व आये और भविश्य में इसी तरह के संघर्ष के लिए तैयार्र रहने की जरूरत महसूस की गई। युद्ध से भार्रतीय प्रधार्नमंत्री जवार्हरलार्ल नेहरू पर दबार्व आयार् जिन्हें भार्रत पर चीनी हमले की आशंक में असफल रहने के लिए जिम्मेदार्र के रूप में देखार् गयार्। भार्रतीयों में देशभक्ति की भार्री लहर उठनी शुरू हो गयी और युद्ध में शहीद हुए भार्रतीय सैनिकों के लिए कई स्मार्रक बनार्ये गए। यकीनन, मुख्य सबक जो भार्रत ने युद्ध से सीखार् है वह है अपने ही देश क मजबूत बनार्ने की जरूरत और चीन के सार्थ नेहरू की ‘‘भार्ईचार्रे’’ वार्ली विदेश नीति से एक बदलार्व कियार्। भार्रत पर चीनी आक्रमण की आशंक को भार्ँपने की अक्षमतार् के कारण, प्रधार्नमंत्री नेहरू को चीन के सार्थ शार्ंनिवार्दी संबंधों को बढ़ार्वार् के लिए सरकारी अधिकारियों से कठोर आलोचनार् क सार्मनार् करनार् पड़ार्।

भार्रतीय रार्ष्ट्रपति रार्धार्कृष्णन ने कहार् कि नेहरू की सरकार अपरिश्कृत और तयै ार्री के बार्रे में लार्परवार्ह थी नेहरू ने स्वीकार कियार् कि भार्रतीय अपनी समझ की दुनियार् में रह रहे थे। भार्रतीय नेतार्ओं ने आक्रमणकारियों को वार्पस खदेडने पर पूरार् ध्यार्न केंद्रित करने की बजार्य रक्षार् मंत्रार्लय से कृष्ण मेनन को हटार्ने पर काफी प्रयार्स बितार्यार्।

भार्रतीय सेनार् कृष्ण मने न के ‘‘कृपार्पार्त्र को अच्छी नियुक्ति’’ की नीतियों की वजह से विभार्जित हो गयी थी और कुल मिलार्कर 1962 क युद्ध भार्रतीयों द्वार्रार् एक सैन्य परार्जय और एक रार्जनीतिक आपदार् के संयोजन के रूप में देखार् गयार्। उपलब्ध विकल्पों पर गौर न करके बल्कि अमेरिकी सलार्ह के तहत भार्रत ने वार्यु सेनार् क उपयोग चीनी सैनिकों वार्पस खदेडऩ े में नही कियार्। सीआईए (अमेरिकी गुप्तरच संस्थार्) ने बार्द में कहार् कि उस समय तिब्बत में न तो चीनी सैनिको के पार्स में पर्यार्प्त मार्त्रार् में र्इंधन थे और न ही काफी लम्बार् रनवे थार् जिससे वे वार्यु सेनार् प्रभार्वी रूप से उपयोग करने में असमर्थ थे।

अधिकाँश भार्रतीय चीन और उसके सैनिको को संदेह की दृश्टि से देखने लगे। कई भार्रतीय युद्ध को चीन के सार्थ एक लबं े समय से शार्ंति स्थार्पित करने में भार्रत के प्रयार्स में एक विश्वार्सघार्त के रूप में देखने लगे। नेहरू द्वार्रार् ‘‘हिन्दी-चीनी भार्ई, भार्ई’’ (जिसक अर्थ है ‘‘भार्रतीय और चीनी भार्ई है’’) शब्द के उपयोग पर भी सवार्ल शुरू हो गए। इस युद्ध ने की इन आशार्ओं को खत्म कर दियार् कि भार्रत और चीन एक मजबूत एशियार्ई ध्रुव बनार् सकते हैं जो शीत युद्ध गुट की महार्शक्तियों के बढ़ते प्रभार्व की प्रतिक्रियार् होगी। सेनार् के पूर्ण रूप से तैयार्र नहीं होने क सार्रार् दोश रक्षार् मंत्री मेनन पर आ गयार्, जिन्होंने अपने सरकारी पद से इस्तीफार् दे दियार् तार्कि नए मंत्री भार्रत के सैन्य आधुनिकीकरण को बढ़ार्वार् दे सके।

स्वदेशी स्त्रोतों और आत्मनिर्भरतार् के मार्ध्यम से हथियार्रों की आपूर्ति की भार्रत की नीति को इस युद्ध ने पुख्तार् कियार्। भार्रतीय सनैय कमजार्रेी को महससू करके पार्किस्तार्न ने जम्मू और कश्मीर में घुसपैठ शुरू कर दी जिसकी परिणिति अंतत: 1965 में भार्रत के सार्थ दूसरार् युद्ध से हुआ। हार्लार्ंकि, भार्रत ने युद्ध में भार्रत की अपूर्ण तैयार्री के कारणों के लिए हेंडरसन-ब्रूक्स-भगत रिपोर्ट क गठन कियार् थार्। परिणार्म अनिर्णार्यक थार्, क्योंकि जीत के फैसले पर विभिन्न स्त्रोत विभार्जित थे। कुछ सूत्रों क तर्क है कि चूकिं भार्रत ने पार्किस्तार्न से अधिक क्षेत्र पर कब्जार् कर लियार् थार्, भार्रत स्पष्ट रूप से जीतार् थार्। लेकिन, दूसरों क तर्क थार् कि भार्रत को महत्वपूर्ण नुकसार्न उठार्नार् पड़ार् थार् और इसलिए, युद्ध क परिणार्म अनिर्णार्यक थार्।

दो सार्ल बार्द, 1967 में, चोल घटनार् के रूप में चीनी और भार्रतीय सैनिकों के बीच एक छोटी सीमार् झड़प हुई। इस घटनार् में आठ चीनी सैनिकों और 4 भार्रतीय सैनिकों की जार्न गयी।

जनरल हेंडरसन ब्रुक्स रिपोर्ट

हार्र के कारणों को जार्नने के लिए भार्रत सरकार ने युद्ध के तत्काल बार्द ले. जनरल हेंडरसन ब्रुक्स और इंडियन मिलिट्री एकेडमी के तत्कालीन कमार्नडेंट ब्रिगेडियर पी. एस. भगत के नेतृत्व में एक समिति बनार्ई थी। दोनों सैन्य अब्रिार्कारियो द्वार्रार् सौंपी गई रिपोर्ट को भार्रत सरकार अभी भी इसे गुप्त रिपोर्ट मार्नती है। शार्यद दोनों अधिकारियों ने अपनी रिपोर्ट में हार्र के लिए प्रधार्नमत्रं ी जवार्हर लार्ल नेहरू को जिम्मेदार्र ठहरार्यार् थार्।

भार्रत-चीन युद्द के दूरगार्मी परिणार्म सार्मने आए –

  1. भार्रत-चीन संबंध तनार्पूर्ण हो गये।
  2. भार्रत के भ-ू भार्ग क एक बडार् भार्ग चीन के कब्जे में चलार् गयार्।
  3. भार्रत की अंतर्रार्श्ट्रीय छवि एवं गुटनिरपेक्ष नीति आहत हुई।
  4. भार्रतीय विदेश नीति में आद’रवार्द के स्थार्न पर व्यार्वहार्रिकतार् और यथाथवार्द को स्थार्न मिलार्।
  5. भार्रत – अमेरिक के संबंधों में सुधार्र हुआ।

संदर्भ – 

  1. Sharma M. L., International Relation, P. 577.
  2. Kudesiya Dr. Krishan, World Politices in India, P. 220.
  3. Kudesiya Dr. Krishan, Op – Cit, P. 222
  4. Verma Dr. Dinanath, International Relation, lesson 14, P. 510.
  5. Bhagat P. S., The Sield and the sward, P. 53.
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  7. Nav Bharat Times New Delhi, 6 Sep. 1965 P. 1 Col. 1 – 2. 10. Hindustan Times, New Delhi, 6 Sep. 1965. P.
  8. 11. Hindustan Times, 7 Sep. P. 1 Col. 2 – 4.
  9. Hindustan Times, New Delhi, 6 Sep. 1965 P. 12, Col. 4.
  10. Indian Express, 8 Sep. 1965 P. 1 Col. 5 – 6.
  11. Nav Bharat Times, New Delhi, 10 September, 1965, P. 1, Col. 4.
  12. Hindustan Times, New Delhi, 10 Sep. 1965 P. 1, Col. 3 – 4.
  13. Hindustan Times, 11 Sep. 1965 P. 9 Col. 2.
  14. Hindustan Times, New Delhi, 19 Sep. 1965 P. 9, Col. 3.
  15. Nav Bharat Times, New Delhi, 21 Sep. 1965 Col. 7 – 8.
  16. Nav Bharat Times, New Delhi, 8 Oct. 1965 P. 1 Col. 3 21. Ibid.
  17. Nav Bharat Times, New Delhi 25 Sep. 1965 P. 2 Col. 6 – 7.
  18. Ibid. 25. Hidustan New Delhi, P. 1 Col. 2 – 5, 4 -5, 26 Sep. 1965.
  19. Hindustan New Delhi, P. 1 Col. 4 – 5, 26 Sep. 1965.
  20. Vedhalankar Haridutta, International Relation P. 587.
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  22. Rajan M. S., The Tashkant declaration International studeis Vol. – 8 No. 1 – 2, P. 21.
  23. The Time (London) 6, 1, 1966.
  24. Times of India, New Delhi. 24 Jan. 1966, P. 7.
  25. Times of India, New Delhi, 22 Jan. 1966, P. 6.
  26. Dinman, 28 May, 1967, P. 13.
  27. Ibid. 35. Dinman, 8 October, 1967 P. 36.

भार्रत चीन युद्ध 1962

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