भार्रत के संविधार्न की प्रमुख विशेषतार्एँ

भार्रत क संविधार्न अपने व्यार्पक आकार, एकात्मक-संघवार्द, लचक और कठोरतार् के मिश्रण तथार् विभिन्न संकटकालीन स्थिति क समार्धार्न करने के लिए विशेष प्रार्वधार्नों सहित एक अनुपम संविधार्न है जोकि 1950 से लेकर आज तक सफलतार् से कार्य कर रहार् है। संविधार्न के निर्मार्तार्ओं क यह प्रयार्स थार् कि रार्ष्ट्र को एक नयार् व्यवहार्र-कुशल संविधार्न प्रदार्न कियार् जार्ए जोकि रार्ष्ट्र की एकतार् और अखण्डतार् तथार् विकास प्रार्प्त करने में समर्थ हो और रार्ष्ट्र-निर्मार्ण और सार्मार्जिक-आर्थिक पुनर्निर्मार्ण को सुनिश्चित करने के लिए आधार्र दे सके। इसीलिए उन्होंने अन्य संविधार्नों की उन विशेषतार्एँ जोकि भार्रतीय दृष्टिकोण तथार् रार्ष्ट्रीय आवश्यकतार्ओं के लिए उपयुक्त और आवश्यक थीं, भार्रतीय संविधार्न में शार्मिल करने क प्रयार्स कियार् और वे काफी सीमार् तक अपने इस उद्देश्य में सफल भी रहे। संविधार्न निर्मार्ण सभार् में बोलते हुए डार्. अम्बेडकर ने कहार् थार् कि मैं समझतार् हूँ कि यह (संविधार्न) व्यवहार्र-कुशल है, यह लचकीलार् है और यह अमन और युद्व दोनों समय पर देश को एकजुट रखने के लिए काफी शक्तिशार्ली है। सत्य ही मैं यह कह सकतार् हूं, यदि संविधार्न के अधीन परिस्थितियार्ं दूषित हो जार्ती हैं तो इसक कारण यह नहीं होगार् कि हमार्रार् संविधार्न कमजोर है, बल्कि हमें यह कहनार् पड़ेगार् कि इसक कारण मार्नवीय त्रुटि है।

भार्रत के संविधार्न की प्रमुख विशेषतार्एँ

लिखित और विस्तृत संविधार्न

भार्रत क संविधार्न एक लिखित और विस्तृत दस्तार्वेज़ है। इसमें 444 अनुच्छेद हैं जो 22 भार्गों में विभार्जित हैं इसमें 12 अनुसूचियार्ं शार्मिल हैं और इसमें 103 संवैधार्निक संशोधन भी शार्मिल किए जार् चुके हैं। जैनिंगष (Jennings) इसको फ्विश्व क सबसे बड़ार् लिखित संविधार्नय् घोषित करते हैं। यह अमरीकी संविधार्न, जिसके 7 अनुच्छेद और 27 संशोधन हैं, जार्पार्नी संविधार्न, जिसके 103 अनुच्छेद हैं और प्रफार्ंसीसी संविधार्न, जिसके 92 अनुच्छेद हैं, से कहीं बड़ार् है। संविधार्न के निर्मार्तार् किसी भी विषय के प्रति उपेक्षार् क अवसर नहीं देनार् चार्हते थे क्योंकि वे स्वतन्त्रतार् के पश्चार्त् देश में विद्यमार्न सार्मार्जिक-आर्थिक-रार्जनीतिक समस्यार्ओं के प्रति पूर्णतयार् सचेत थे। अनेकों अनुपम विशेषतार्एँ शार्मिल करने जैसे रार्ज्य नीति के निर्देशक सिद्वार्न्त, संकटकाल स्थिति की व्यवस्थार्एँ, भार्षार्यी व्यवस्थार्एँ, अनुसूचित जार्तियों, जनजार्तियों और अन्य पिछड़ी श्रेणियों से सम्बन्धित व्यवस्थार्एँ, निर्वार्चन आयोग, संघीय लोक सेवार् आयोग और रार्ज्य लोक सेवार् आयोगों आदि जैसी संवैधार्निक संस्थार्ओं की व्यवस्थार्ओं ने संविधार्न को काफी लम्बार् कर दियार्। केन्द्र और रार्ज्यों के लिए सार्झार् संविधार्न बनार्ने के निर्णय ने भी इसकी लम्बार्ई बढ़ार्ई। इसके सार्थ ही मौलिक अधिकारों, संघ रार्ज्य सम्बन्धों, संविधार्न की अनुसूचियों आदि जैसी व्यवस्थार्ओं को विस्तार्र में लिखने के कारण भी इसक विस्तार्र हुआ। इन्हीं कारणों से संविधार्न लगभग 400 पृष्ठों की एक पुस्तक बन गयार्। पिफर समय-समय पर पार्स हुए संवैधार्निक संशोधन ने इसके आकार को और अधिक विस्तृत कर दियार्।


संविधार्न के व्यार्पक आकार के कारण ही इसकी वकीलों क स्वर्ग कह कर आलोचनार् की गई और अधिक शब्दों के प्रयोग ने इसको अधिक जटिल और कठोर बनार् दियार्। परन्तु, जैसार् कि पहले ही लिखार् जार् चुक है, संविधार्न के विशार्ल आकार क कारण थार् जहार्ं तक संभव हो सके प्रत्येक विषय को स्पष्ट रूप में लिखने और समार्धार्न करने क निर्णय। 1950 से संविधार्न के लार्गू होने पर इसके कार्य-व्यवहार्र से पतार् लगतार् है कि इसके बहुत बड़े आकार ने बार्धार् नहीं डार्ली। कुछ व्यवस्थार्एँ जैसे कि धार्रार् 31 के अधीन सम्पत्ति क अधिकार (जिसको अब भार्ग iii में से निकाल दियार् गयार् है) को छोड़ कर संविधार्न के बड़े ने इसकी व्यार्ख्यार् करने में कोई विशेष समस्यार् खड़ी नहीं की। बल्कि शार्न्ति और युद्व दोनों अवसरों पर देश को उत्तम व्यवस्थार् और आवश्यक स्थार्यित्व प्रदार्न करने क कार्य कियार् है।

स्वनिर्मित और पार्रित हुआ संविधार्न

भार्रत क संविधार्न एक ऐसार् संविधार्न है जो भार्रत के लोगों की अपनी निर्वार्चित प्रभुसत्तार्पूर्ण प्रतिनिधि संस्थार् संविधार्न निर्मार्ण सभार् के द्वार्रार् तैयार्र कियार् गयार् है। यह सभार् दिसम्बर, 1946 में केबिनेट मिशन योजनार् के अधीन गठित की गई थी। इसने अपनार् प्रथम अधिवेशन 9 दिसम्बर, 1946 को कियार् और 22 जनवरी 1947 को अपनार् उद्देश्य प्रस्तार्व पार्स कियार् थार्। इसके पश्चार्त् इसने संविधार्न निर्मार्ण क कार्य ठीक दिशार् में तीव्रतार् से आरम्भ कियार् और यह अन्तत: 26 नवम्बर, 1949 को संविधार्न पार्रित करने और अपनार्ने की स्थिति में पहुंची। इस प्रकार भार्रतीय संविधार्न स्वनिर्मित है और इसे उचित रूप में पार्रित कियार् गयार् है। कुछ आलोचक इस आधार्र पर इस विचार्र को स्वीकार नहीं करते कि संविधार्न निर्मार्ण सभार् बहुत थोड़े-से मतदार्तार्ओं ने ही निर्वार्चित की थी जोकि जनसंख्यार् के 20 प्रतिशत भार्ग से भी कम थे और यह भी सार्म्प्रदार्यिक चुनार्व मण्डलों के आधार्र पर निर्वार्चित की गई थी। परन्तु बहुत बड़ी संख्यार् में विद्वार्न् इस आलोचनार् को स्वीकार नहीं करते। उनक कहनार् है कि संविधार्न निर्मार्ण सभार् पूर्णतयार् प्रतिनिधि संस्थार् थी और इसको लार्गों के द्वार्रार् दिए प्रभुसत्तार् सम्पन्न अधिकारों क प्रयोग करते हुए इसने संविधार्न क निर्मार्ण कियार् थार्।

संविधार्न की प्रस्तार्वनार्

भार्रत के संविधार्न की प्रस्तार्वनार् एक अच्छी तरह तैयार्र कियार् दस्तार्वेष है जोकि संविधार्न के दर्शन और उद्देश्यों क वर्णन करती है। यह घोषणार् करती है कि भार्रत एक ऐसार् प्रभुसत्तार् सम्पन्न, समार्जवार्दी, धर्म-निरपेक्ष, लोकतन्त्रीय-गणरार्ज्य जिसमें लोगों की न्यार्य, स्वतन्त्रतार् और समार्नतार् प्रदार्न करने और भार्ईचार्रिक सार्ंझ, व्यक्तिगत आदर, रार्ष्ट्र की एकतार् और अखण्डतार् को उत्सार्हित करने और स्थार्पित रखने क वचन दियार् गयार् है। प्रस्तार्वनार् के आरम्भ में प्रस्तार्वनार् को भार्रतीय संविधार्न क भार्ग नहीं मार्नार् गयार् थार् परन्तु सर्वोच्च न्यार्यार्लय के द्वार्रार् केशवार्नंद भार्रती केस में दिए गए निर्णय के पश्चार्त् इसको संविधार्न क एक भार्ग मार्न लियार् गयार् है। इसमें 42वार्ं संशोधन (1976) के द्वार्रार् संशोध्न कियार् गयार् और शब्द ‘समार्जवार्द’, ‘धर्म-निरपेक्ष’ और ‘अखण्डतार्’ इसमें शार्मिल किए गए।

भार्रत एक प्रभुसत्तार् सम्पन्न, समार्जवार्दी, धर्म

निरपेक्ष लोकतन्त्रीय, गणरार्ज्य है जैसे कि प्रस्तार्वनार् में घोषणार् की गई है, भार्रत एक प्रभुसत्तार् सम्पन्न, समार्जवार्दी, धर्म-निरपेक्ष, लोकतन्त्रीय गणरार्ज्य है। ये विशेषतार्एँ भार्रतीय रार्ज्य के पार्ंच प्रमुख लक्षणों को प्रकट करती हैं:

  1. भार्रत एक प्रभुसत्तार्-सम्पन्न रार्ज्य है – प्रस्तार्वनार् घोषित करती है कि भार्रत एक प्रभुसत्तार् सम्पन्न रार्ज्य है। यह इसलिए आवश्यक थार् कि भार्रत पर ब्रिटिश शार्सन समार्प्त हो चुक थार् और भार्रत ब्रिटिश सार्म्रार्ज्य के अधीन नहीं रहार् थार्। इसने 15 अगस्त, 1947 को ब्रिटिश शार्सन की समार्प्ति के पश्चार्त् भार्रत को तकनीकी रूप में मिले औपनिवेशिक स्तर के समार्प्त होने की भी पुष्टि भी इसमें की गई। संविधार्न निर्मार्ण सभार् के द्वार्रार् संविधार्न को अपनार्ने से यह औपनिवेशिक स्थिति समार्प्त हो गई और भार्रत पूर्णतयार् स्वतन्त्र देश के रूप में विश्व मार्नचित्र पर उभर कर सार्मने आयार्। इसने स्वतन्त्रतार् के संघर्ष के परिणार्म की घोषणार् की और इस बार्त की पुष्टि की कि भार्रत आंतरिक और बार्ह्य रूप में अपने निर्णय स्वयं लेने और इनको अपने लोगों और क्षेत्रों के लिए लार्गू करने के लिए स्वतन्त्र है।
  2. भार्रत एक समार्जवार्दी रार्ज्य है – चार्हे कि आरम्भ से ही भार्रतीय संविधार्न में समार्जवार्द की भार्वनार् शार्मिल थी, परन्तु इसे स्पष्ट करने के लिए प्रस्तार्वनार् में समार्जवार्द क शब्द शार्मिल करने के लिए इसमें 1976 में संशोधन कियार् गयार्। इससे इस तथ्य क पतार् लगतार् है कि भार्रत सभी प्रकार के शोषण की समार्प्ति करके और आय, स्त्रोतों की सम्पत्ति की उचित बार्ंट करके अपने लोगों के लिए सार्मार्जिक, आर्थिक और रार्जनीतिक न्यार्य प्रार्प्त करने के लिए प्रतिबद्व है। परन्तु यह माक्स/क्रार्न्तिकारी ढंगों से नहीं बल्कि शार्न्तिपूर्वक, संवैधार्निक और लोकतन्त्रीय ढंगों के द्वार्रार् प्रार्प्त किए जार्ने के प्रति बचनबद्व है। यह शब्द, कि भार्रत एक समार्जवार्दी देश है, क वार्स्तव में अर्थ यह है कि भार्रत एक लोकतन्त्रीय समार्जवार्दी देश है। इससे सार्मार्जिक आर्थिक न्यार्य के प्रति वचनबद्व तार् क पतार् लगतार् है जोकि देश के द्वार्रार् लोकतन्त्रीय व्यवहार्र और संगठित नियोजन के द्वार्रार् प्रार्प्त की जार्नी है। किन्तु 1991 में उदार्रीकरण निजीकरण और विश्विकरण की नई आर्थिक नीति अपनार्ए जार्ने के बार्द इस पर प्रश्न चिन्ह लगार्यार् गयार् है।
  3. भार्रत एक धर्म-निरपेक्ष रार्ज्य है – 42वें संशोधन के द्वार्रार् भार्रत रार्ज्य की अन्य विशेषतार्ओं के सार्थ-सार्थ शब्द फ्धर्म-निरपेक्षतार्य् भी प्रस्तार्वनार् में शार्मिल कियार् गयार्। इसके शार्मिल करने क सार्मार्न्य तौर पर अर्थ यह है कि यह भार्रतीय संविधार्न के धर्म-निरपेक्ष स्वरूप को और अधिक स्पष्ट करतार् है एक रार्ज्य (देश) होने के नार्ते भार्रत किसी भी धर्म को कोई विशेष दर्जार् नहीं देतार्। भार्रत क कोई सरकारी धर्म नहीं है। इससे यह मौलिकवार्दी यार् धर्म आधार्रित रार्ज्यों, जैसार् कि पार्किस्तार्न और अन्य मुस्लिम देशों के रार्ज्यों से अलग बन जार्तार् है। हार्ँ, सकारार्त्मक पहलू यह है कि भार्रत में सभी धर्मों को एक-समार्न अधिकार और स्वतन्त्रतार् देकर धर्म-निरपेक्षतार् की नीति अपनार्ई गई है। अनुच्छेदों 25 से 28 तक संविधार्न अपने सभी नार्गरिकों को धामिक स्वतन्त्रतार् क अधिकार देतार् है। यह बिनार् किसी पक्षपार्त के अपने सभी नार्गरिकों को समार्न अधिकार देतार् है, अल्प-संख्यकों की विशेष रूप में सुरक्षार् देने क प्रयार्स करतार् है। रार्ज्य नार्गरिकों की धामिक स्वतन्त्रतार् में हस्तक्षेप नहीं करतार् और धामिक उद्देश्यों के लिए किसी भी प्रकार क कोई कर नहीं लगार् सकतार्।
  4. भार्रत एक लोकतन्त्रीय रार्ज्य है – संविधार्न की प्रस्तार्वनार् भार्रत को एक लोकतन्त्रीय रार्ज्य घोषित करती है। भार्रत क संविधार्न एक लोकतन्त्रीय प्रणार्ली स्थार्पित करतार् है- सरकार की सत्तार् लोगों की प्रभुसत्तार् पर निर्भर है। लोगों को समार्न रार्जनीतिक अधिकार प्रार्प्त है। जैसे कि सावजनिक वयस्क मतार्धिकार, चुनार्व लड़ने क अधिकार, सरकारी पद प्रार्प्त करने क अधिकार, संगठन स्थार्पित करने क अधिकार और सरकार की नीतियों की आलोचनार् और उनक विरोध करने क अधिकार। इन अधिकारों के आधर पर ही लोग रार्जनीति की प्रक्रियार् में भार्ग लेते हैं। वे अपनी सरकार क निर्वार्चन स्वयं करते हैं। चुनार्व निर्धार्रित अन्तरार्ल के बार्द यार् पिफर जब भी इनकी आवश्यकतार् हो, तब करवार्ए जार्ते हैं। यह चुनार्व स्वतन्त्र, उचित और निष्पक्ष होते हैं सरकार अपनी सभी कार्यवार्हियों के लिए लोगों के प्रति उत्तरदार्यी होती है। लोग चुनार्वों के द्वार्रार् सरकार बदल सकते हैं। कोई भी वह सरकार सत्तार् में नहीं रह सकती जिसमें लोगों के प्रतिनिधियों क विश्वार्स न हो। अप्रैल, 1997 में प्रधार्नमन्त्री एच. डी. देवगौड़ार् की सरकार को त्यार्ग-पत्र देनार् पड़ार् थार् क्योंकि यह लोकसभार् में विश्वार्स क प्रस्तार्व प्रार्प्त करने में असफल रही थी। अप्रैल, 1998 में श्री अटल बिहार्री वार्जपेयी के नेतृत्व में बी. जे. पी. गठबंधन सरकार ने शार्सन-भार्र संभार्लार् परन्तु यह सरकार भी अप्रैल, 1999 में एक वोट की कमी के कारण लोकसभार् से अपनार् विश्वार्स मत प्रार्प्त न कर सकी। इसने अपनार् त्यार्ग-पत्र दे दियार् और 12वीं लोकसभार् भंग कर दी गई तथार् एक बार्र पिफर लोगों को अपनी सरकार चुनने क अवसर दियार् गयार्। सितम्बर-अक्तूबर 1999 के चुनार्वों में लोगों ने रार्ष्ट्रीय लोकतन्त्रीय गठबंधन को बहुमत दियार् और 13 अक्तूबर 1999 को इस गठबंधन ने भार्रत में एक नई लोकतन्त्रीय सरकार क गठन कियार् जोकि अप्रैल 2004 तक सत्तार्रूढ़ रही। पिफर 14वीं लोकसभार् के चुनार्व परिणार्मों के आधार्र पर कांग्रेस के नेतृत्व में यू. पी. ए. सरकार क गठन मई 2004 में हुआ। 2009 के चुनार्व में यह दोबार्रार् सत्तार् में आई और यह आज तक सत्तार्रूढ़ है। इस प्रकार में एक गतिमार्न लोकतन्त्रीय प्रणार्ली है। इसमें सरकार बदलने क कार्य शार्न्तिपूर्ण एवं व्यवस्थित ढंग से कियार् जार्तार् है। सरकार जनतार् और जनमत क प्रतिनिधत्व करती है और अपने प्रत्येक कार्य के लिए जनतार् के समक्ष उत्तरदार्यी होती है। भार्रतीय लोकतन्त्र को विश्व क सबसे बड़ार् लोकतन्त्र होने क सम्मार्न प्रार्प्त है इसके पीछे भार्रतीय संविधार्न क अभूतपूर्व योगदार्न है।
  5. भार्रत एक गणरार्ज्य है – संविधार्न की प्रस्तार्वनार् भार्रत को एक गणरार्ज्य घोषित करती है। भार्रत पर किसी रार्जार् यह उसके द्वार्रार् मनोनीत मुखियार् के द्वार्रार् शार्सन नहीं चलार्यार् जार्तार्। भार्रत के रार्ष्ट्रपति को संसद के तथार् रार्ज्यों की विधार्न सभार्ओं के सदस्यों से बने निर्वार्चन मण्डल के द्वार्रार् चुनार् जार्तार् है और वह पार्ँच सार्ल के कार्यकाल के लिए कार्य करतार् है। भार्रत के एक गणरार्ज्य होने की स्थिति क रार्ष्ट्रमण्डल की भार्रतीय सदस्यतार् क किसी भी ढंग से कोई टकरार्व नहीं है।

भार्रत रार्ज्यों क एक संघ है

संविधार्न क अनुच्छेद 1 घोषित करतार् है: भार्रत रार्ज्यों क एक मिलन है। यह भार्रत को न तो एक संघार्त्मक रार्ज्य और न ही एक एकात्मक रार्ज्य घोषित करतार् है। इस विचार्र से दो महत्त्वपूर्ण पक्ष सार्मने आते हैं। फ्पहलार् यह कि भार्रत एक ऐसार् संघ नहीं जो प्रभुसत्तार् सम्पन्न रार्ज्यों के द्वार्रार् परस्पर सहमति के परिणार्म के रूप में अस्तित्व में आयार् हो, जैसे कि संयुक्त रार्ज्य अमरीक और दूसरी बार्त यह है कि भार्रत की भार्गीदार्र इकाइयों (प्रदेशों) को इससे अलग होने क कोई अधिकार नहीं है। संविधार्न के द्वार्रार् भार्रत को 29 भार्ग ए, भार्ग बी, भार्ग सी और भार्ग डी में बार्ंटार् गयार् थार्। 1956 में पुनर्गठन के पश्चार्त् भार्रत क 16 रार्ज्यों और 3 केन्द्र प्रशार्सित क्षेत्रों में पुनर्गठन कियार् गयार्। धीरे-धीरे कई परिवर्तनों के द्वार्रार् और सिक्कम के भार्रतीय संघ में शार्मिल हो जार्ने पर रार्ज्यों की संख्यार् बदलती रही है। भार्रत में अब 28 रार्ज्य और 7 केन्द्र प्रशार्सित क्षेत्र हैं।

संघीय ढार्ंचार् और एकात्मक भार्वनार्

भार्रत क संविधार्न एकात्मक भार्वनार् वार्ली संघीय संरचनार् ही स्थार्पित करतार् है। विद्वार्न् भार्रत को एक अर्ध-फेडरेशन (Quasi-Federation) (के. सी. बीयर) यार् एकात्मक आधर वार्ली पैफडरेशन यार् एकीकृत संघार्त्मक कह देते हैं। एक संघार्त्मक रार्ज्य के समार्न भार्रत क संविधार्न ये व्यवस्थार्एँ स्थार्पित करतार् है: (i) केन्द्र और रार्ज्यों में शक्तियों क विभार्जन (ii) एक लिखित और कठोर संविधार्न (iii) संविधार्न की सर्वोच्चतार् (iv) स्वतन्त्र न्यार्यपार्लिक जिसको कि शक्तियों के विभार्जन के बार्रे मे केन्द्र-रार्ज्य झगड़ों के निर्णय क भी अधिकार है, और (v) दो-सदनीय संसद। परन्तु बहुत ही शक्तिशार्ली केन्द्र, सार्झार् संविधार्न, एकल नार्गरिकतार्, संकटकाल स्थिति की व्यवस्थार्, सार्झार् चुनार्व कमीशन, सार्झी अखिल भार्रतीय सेवार्ओं की व्यवस्थार् करके संविधार्न स्पष्ट रूप में एकात्मक भार्वनार् को प्रकट करतार् है। संघवार्द और एकात्मकवार्द क मिश्रण भार्रतीय समार्ज के बहुलवार्दी स्वरूप और क्षेत्रीय विभिन्नतार्ओं को ध्यार्न में रख कर और रार्ष्ट्र की एकतार् और अखण्डतार् की आवश्यकतार् के कारण कियार् गयार् है। प्रथम ने संघवार्द के पक्ष में निर्णय लेने के लिए विवश कियार् और दूसरी ने एकात्मकतार् की भार्वनार् को अपनार्नार् आवश्यक बनार् दियार्। इस प्रकार भार्रत क संविधार्न न तो पूर्णतयार्संघीय है और न हीं एकात्मक बल्कि यह दोनों क मिश्रण है। यह आंशिक रूप में संघीय और आंशिक रूप में एकात्मक रार्ज्य है।

कठोरतार् और लचकशीलतार् क मिश्रण

भार्रत क संविधार्न कई विषयों पर संशोधन के लिए एक कठोर संविधार्न है। इसकी कुछ व्यवस्थार्एँ बहुत कठिन ढंग से संशोधित की जार् सकती हैं जबकि दूसरे कुछ प्रार्वधार्नों में बड़ी आसार्नी से संशोधन कियार् जार् सकतार् है। कुछ मार्मलों में संसद संविधार्न के कुछ भार्ग को केवल एक कानून पार्रित करके ही संशोधित कर सकती है। उदार्हरण के रूप में नए रार्ज्य बनार्ने, किसी रार्ज्य के क्षेत्र बढ़ार्ये यार् घटार्ने, नार्गरिकतार् से सम्बन्धित नियम, किसी रार्ज्य की विधार्न परिषद् को स्थार्पित करने यार् समप्त करने से सम्बन्धित संशोधन आसार्नी से पार्रित किए जार् सकते हैं। यहार्ँ अनुच्छेद 249 के अधीन यह किसी रार्ज्य विषय को रार्ज्य सभार् दो तिहार्ई बहुमत से एक रार्ष्ट्रीय महत्त्व क विषय घोषित कर सकती है और उसे एक वर्ष के लिए केन्द्रीय संसद के कानून निर्मार्ण के अधिकार क्षेत्र में लार् सकती है। इसी प्रकार अनुच्छेद 312 के अधीन इसी ढंग के द्वार्रार् वह कोई भी अखिल भार्रतीय सेवार् संगठित कर सकती है यार् समार्प्त कर सकती है। यह विशेषतार् संविधार्न की लचकशीलतार् को दर्शार्ती है।

परन्तु अनुच्छेद 368 के अधीन संविधार्न में संशोधन के लिए व्यवस्थार् की गई है:

  1. अधिकतर संवैधार्निक व्यवस्थार्ओं में संशोधन संसद के द्वार्रार् कुल सदस्यों की बहुसंख्यार् से और विद्यमार्न सदस्यों के दो-तिहार्ई बहुमत से दोनों सदनों द्वार्रार् एक संशोधन बिल पार्स कर के कियार् जार् सकतार् है।
  2. कुछ विशेष संवैधार्निक व्यवस्थार्ओं में संशोधन के लिए एक अत्यंत कठोर व्यवस्थार् की गई है। पहले कुछ विषयों के सम्बन्ध में एक संशोधन प्रस्तार्व संसद के कुल सदस्यतार् के बहुमत और उपस्थित सदस्यों के दो-तिहार्ई बहुमत से और दोनों सदनों में अलग-अलग प्रस्तार्वों क पार्स होनार् आवश्यक है और उसके पश्चार्त् इसकी पुष्टि के कम-से-कम आर्ध रार्ज्यों की रार्ज्य विधार्न सभार्ओं से होनार् आवश्यक है। इस ढंग के द्वार्रार् संशोधन निम्न विषयों पर कियार् जार्तार् है: (i) रार्ष्ट्रपति के चुनार्व क ढंग (ii) संघीय की कार्यपार्लिक की शक्तियों की क्षेत्र सीमार् (iii) रार्ज्य कार्यपार्लिकाओं की शक्ति की क्षेत्र-सीमार् (iv) संघीय न्यार्यपार्लिक से सम्बन्धित प्रार्वधन (v) रार्ज्यों के उच्च न्यार्यार्लयों से सम्बन्धित प्रार्वधार्न (vi) वैधार्निक शक्तियों क विभार्जन (vii) संसद में रार्ज्यों क प्रतिनििध्त्व (viii) संविधार्न में संशोधन क ढंग और (ix) संविधार्न की सार्तवीं अनुसूची।

परन्तु वार्स्तव में संविधार्न लचकीलार् सिद्व हुआ है। इस बार्त क प्रमार्ण यह है कि 1950 से 2005 तक संविधार्न में 92 संशोधन किए गए। कांग्रेस की प्रभार्वी स्थिति (1950-77), (1980-89) के कारण संविधार्न में वार्तार्वरण के अनुसार्र परिवर्तन किए गए और कई संकटकाल स्थितियों जैसार् कि पंजार्ब और जम्मू और कश्मीर में केन्द्रीय शार्सन की अवधि बढ़ार्ने के लिए भी कुछ संशोधन किए गए। यहार्ँ तक कि 1989 में बनी सार्झे मोर्चे की सरकार, को भी अपने शार्सन के एक वर्ष में 4 संशोधन करने पड़े। अब तक संविधार्न में 103 संशोधन पार्स हो चुके हैं। और 86 संशोधन बिल पार्स किए जार्ने की प्रक्रियार् में हैं।

मौलिक अधिकार

भार्ग III में अनुच्छेद 12-35 के अधीन भार्रत क संविधार्न अपने नार्गरिकों को मौलिक अधिकार प्रदार्न करतार् है। आरम्भ में 7 मौलिक अधिकार दिए गए थे परन्तु बार्द में मौलिक अधिकारों की श्रेणी में से (42वीं संवैधार्निक संशोधन 1976 द्वार्रार्) सम्पत्ति क अधिकार समार्प्त कर दियार् गयार् और इस प्रकार मौलिक अधिकारों की संख्यार् घट कर 6 रह गई है। परन्तु प्रत्येक मौलिक अधिकार में बहुत-से अधिकार और स्वतन्त्रतार्एँ शार्मिल हैं। नार्गरिकों के 6 मौलिक अधिकार हैं:

  1. समार्नतार् क अधिकार (अनुच्छेद 14-18) – इसके अनुसार्र, कानून के सार्मने सभी नार्गरिक समार्न हैं, इसमें किसी भी प्रकार क भेदभार्व न किए जार्ने की व्यवस्थार् की गई है। सभी को समार्न अवसर प्रदार्न करने, छूत-छार्त की कुप्रथार् समार्प्त करने और उपार्धियार्ं समार्प्त करने की व्यवस्थार् भी की गई है।
  2. स्वतन्त्रतार् क अधिकार (अनुच्छेद 19-22) – अनुच्छेद 19 में 6 मौलिक स्वतन्त्रतार्एँ शार्मिल हैं-भार्षण देने और अपने विचार्रों को प्रकट करने की स्वतन्त्रतार्, संगठन/संस्थार्एँ स्थार्पित करने की स्वतन्त्रतार्, बिनार् शस्त्र लिए शार्न्तिपूर्वक सभार्एँ करने की स्वतन्त्रतार्, भार्रत में सभी स्थार्नों पर घूमने की स्वतन्त्रतार्, किसी भी क्षेत्र में जार्कर बसने की स्वतन्त्रतार् और कोई भी व्यवसार्य, व्यार्पार्र यार् रोषगार्र अपनार्ने की स्वतन्त्रतार्। अनुच्छेद 20 व्यक्तिगत स्वतन्त्रतार् और अभियुक्तों के अधिकारों को सुरक्षार् प्रदार्न करतार् है। अनुच्छेद 21 व्यवस्थार् करतार् है कि कानून के अनुसार्र की जार्ने वार्ली किसी कार्यवार्ही के बिनार् किसी भी व्यक्ति को जीवित रहने और स्वतन्त्रतार् के अधिकार से विहीन नहीं रखार् जार् सकतार्। अब 86वें संवैधार्निक संशोधन में 21-। धार्रार् शार्मिल की गई जिसके द्वार्रार् 6 से 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों को शिक्षार् क अधिकार प्रदार्न कियार् गयार् है। अनुच्छेद 22 के अधीन रार्ज्य द्वार्रार् किसी व्यक्ति की गिरफ्रतार्री के सम्बन्ध में प्रार्वधार्न दर्ज किए गए हैं तार्कि किसी भी नार्गरिक की स्वतन्त्रतार् को स्वेच्छार्चार्री ढंग से पुलिस सीमित न कर सके।
  3. शोषण के विरुद् अधिकार (अनुच्छेद 23-24) – यह मौलिक अधिकार औरतों को खरीद-बेच, बेगार्र (बंधुआश्रम) और खतरे वार्ले स्थार्नों पर बार्ल मषदूरी की मनार्ही करतार् है।
  4. धर्म की स्वतन्त्रतार् क अधिकार (अनुच्छेद 25-28)- इस अधिकार में चेतनार्, धर्म और पार्ठ-पूजार् की स्वतन्त्रतार् शार्मिल है। यह सभी धर्मों को अपने-अपने धामिक स्थार्नों क निर्मार्ण करने और इनको चलार्ने की स्वतन्त्रतार् देतार् है। अनुच्छेद 27 में यह व्यवस्थार् की गई है कि किसी भी व्यक्ति को किसी धर्म के प्रचार्र के लिए पैसार् एकत्रित करने के लिए कोई कर देने के लिए विवश नहीं कियार् जार् सकतार्। रार्ज्य किसी भी धर्म के लिए कोई कर नहीं लगार् सकतार् और अनुदार्न देते समय रार्ज्य धर्म के आधार्र पर कोई पक्षपार्त नहीं कर सकतार्। अनुच्छेद 28 सरकारी और सरकारी सह्यतार् लेने वार्ले स्कूलों और कॉलजों में धामिक शिक्षार् देने की मनार्ही करतार् है।
  5. सार्ंस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार (अनुच्छेद 29-30) – इस के अधीन संविधार्न में अल्पसंख्यकों के अधिकारों, उनकी भार्षार्ओं और संस्कृतियों को सुरक्षित रखने और विकसित करने की व्यवस्थार् है। यह उनको अपनी शिक्षार् संस्थार्एँ स्थार्पित करने, बनार्ए रखने और चलार्ने क अधिकार भी देतार् है।
  6. संवैधार्निक उपचार्रों क अधिकार (अनुच्छेद 32) – यह मौलिक अधिकार पूर्ण अधिकार पत्र की आत्मार् है। यह न्यार्यार्लयों के द्वार्रार् मौलिक अधिकारों को लार्गू करने और उनकी सुरक्षार् करने की व्यवस्थार् करतार् है। यह सर्वोच्च न्यार्यार्लय को मौलिक अधिकार लार्गू करने के लिए आवश्यक निर्देश और आदेश जार्री करने क अधिकार देतार् है।

भार्रतीय नार्गरिकों के अब छ: मौलिक अधिकार हैं। सम्पत्ति क अधिकार अब मौलिक अधिकारों की सूची से निकालार् हुआ है और यह अब अनुच्छेद 300-ए के अधीन एक कानूनी अधिकार है।

मौलिक अधिकार प्रदार्न करते और इनकी गार्रंटी देते हुए, संविधार्न ने इन पर कई अपवार्द भी लार्गू किए हैं। यह प्रतिबन्ध सावजनिक शार्न्ति और कानून व्यवस्थार्, नैतिकतार्, रार्ज्य की सुरक्षार् और भार्रत की प्रभुसत्तार् और भू-क्षेत्रीय अखण्डतार् स्थार्पित रखने के हित में लार्गू किए गए हैं। इससे भी अधिक इन अधिकारों में अनुच्छेद 368 के अधीन बतार्ए गए ढंग के अनुसार्र संशोधन कियार् जार् सकतार् है और अनुच्छेद 352 के अधीन रार्ष्ट्रीय संकटकाल स्थिति के समय ये स्थगित भी किए जार् सकते हैं।

रार्ष्ट्रीय मार्नव अधिकार आयोग और मार्नव अधिकारों की सुरक्षार्

भार्रत के लोगों के सभी लोकतन्त्रीय और मार्नव अधिकारों को अधिक अच्छी तरह से सुरक्षार् प्रदार्न करने के लिए केन्द्रीय संसद ने 1993 में मार्नव अधिकारों की सुरक्षार् के बार्रे अधिनियम पार्स कियार्। इसके अधीन भार्रत के एक सेवार्-मुक्त न्यार्यार्धीश के नेतृत्व में मार्नव अधिकारों की सुरक्षार् के लिए रार्ष्ट्रीय मार्नव अधिकार आयोग स्थार्पित कियार् गयार्। यह एक स्वतन्त्र आयोग है इसे लोगों के मार्नव अधिकारों के उल्लंघन को रोकने के लिए और मार्नव अधिकारों क उल्लंघन सिद्व हो जार्ने पर पीड़ित लोगों के लिए क्षतिपूर्ति करने क आदेश देने के लिए एक नार्गरिक न्यार्यार्लय क दर्जार् प्रार्प्त है। आम लोगों के मार्नव-अधिकारों और हितों की प्रार्प्ति और सुरक्षार् के लिए सावजनिक हित मुकदमार् व्यवस्थार् (Public Interest Litigation-PIL) भी महत्त्वपूर्ण सार्धन बनी हुई है।

नार्गरिकों के मौलिक कर्त्तव्य

संविधार्न अपने भार्ग IV-ए अनुच्छेद 51-ए (1976 में 42वें संवैधार्निक संशोधन के द्वार्रार् शार्मिल किए गए) के अधीन नार्गरिकों के निम्नलिखित 10 मौलिक कर्त्तव्य निर्धार्रित करतार् है: (1) संविधार्न, रार्ष्ट्रीय झंडे और रार्ष्ट्र गार्न क आदर करनार् (2) स्वतन्त्रतार् के संग्रार्म के उच्च आदर्शों पर चलनार्, (3) भार्रत की प्रभुसत्तार्, एकतार् और अखण्डतार् को बनार्ए रखनार् (4) देश की सुरक्षार् करनार् और जब भी आवश्यकतार् पड़े रार्ष्ट्र के लिए अपनी सेवार् अर्पित करनार् (5) भार्रत के सभी लार्गों को सार्झे भ्रार्तृत्व को बढ़ार्वार् देने और औरतों के मार्न सम्मार्न को चोट पहुँचार्ने वार्ली प्रत्येक कार्यवार्ही की निंदार् करनार्, (6) रार्ष्ट्र की सार्झी सार्ंस्कृतिक विरार्सत की सुरक्षार् करनार्, (7) प्रार्कृतिक वार्तार्वरण की सुरक्षार् करनार् और जीव जन्तुओं के प्रति दयार् रखनार्, (8) वैज्ञार्निक सोच मार्नववार्द और ज्ञार्न और शोध की भार्वनार् को विकसित करनार्, (9) सावजनिक सम्पत्ति की रक्षार् करनार् और हिंसार् से दूर रहनार्, और (10) सभी व्यक्तिगत और सार्मूहिक गतिविधियों में शार्नदार्र प्रार्प्तियों के लिए उत्सुक रहने क प्रयार्स करनार्।

संविधार्न की 86वें संशोधन के द्वार्रार् मार्तार्-पितार् क यह कर्त्तव्य बनार्यार् गयार् है कि वे अपने बच्चों को आवश्यक रूप में शिक्षार् प्रदार्न करवार्एँ।

परन्तु यह मौलिक कर्त्तव्य न्यार्यार्लयों के द्वार्रार् लार्गू नहीं किए जार् सकते। निर्देशक सिद्वार्न्त के समार्न ये मौलिक कर्त्तव्य भी संवैधार्निक नैतिकतार् क एक भार्ग हैं।

रार्ज्य-नीति के निर्देशक सिद्वार्न्त

संविधार्न क भार्ग I (अनुच्छेद 36-51) रार्ज्य नीति के निर्देशक सिद्वार्न्तों क वर्णन करतार् है। यह भार्रतीय संविधार्न की सबसे आदर्शार्त्मक विशेषतार्ओं में से एक है। संविधार्न में यह भार्ग शार्मिल करते समय संविधार्न निर्मार्तार् आयरलैंड के संविधार्न और गार्ंधीवार्द और पेफबियन समार्जवार्द की विचार्रधार्रार्ओं से प्रभार्वित हुए।

निर्देशक सिद्वार्न्त रार्ज्य प्रशार्सन के लिए यह निर्देश जार्री करते हैं कि वह अपनी नीतियों के द्वार्रार् सार्मार्जिक-आर्थिक विकास क उद्देश्य प्रार्प्त करे। निर्देशक सिद्वार्न्त रार्ज्य को यह आदेश देते हैं कि यह लोगों के जीवन निर्वार्ह के लिए उचित सार्धन प्रदार्न करे, सम्पत्ति की न्यार्यपूर्ण बार्ंट सुनिश्चित करे, समार्न कार्य के लिए समार्न वेतन, बच्चों, औरतों, श्रमिकों और युवकों के हितों की सुरक्षार् करे, बुढ़ार्पार् पैंशन, सार्मार्जिक समार्नतार्, स्वशार्सी संस्थार्ओं की स्थार्पनार् करे, समार्ज के कमजोर वर्गों के हितों की सुरक्षार् करे और घरेलू उद्योग, ग्रार्मीण विकास, अन्तर्रार्ष्ट्रीय शार्न्ति, दूसरे देशों से मित्रतार् और सहयोग को प्रोत्सार्हित करे। जे. एन. जोशी (J. N. Joshi) के शब्दों में, निर्देशक सिद्वार्न्तों में आधुनिक लोकतन्त्रीय रार्ज्य के लिए एक बहुत ही व्यार्पक, रार्जनीतिक, सार्मार्जिक और आर्थिक कार्यक्रम शार्मिल कियार् गयार् है।

यदि संविधार्न के भार्ग III में शार्मिल मौलिक अधिकार भार्रत में रार्जनीतिक लोकतन्त्र की नींव रखते हैं तो, निर्देशक सिद्वार्न्त (भार्ग IV) भार्रत में सार्मार्जिक और आर्थिक लोकतन्त्र की स्थार्पनार् क आह्वार्न करते हैं। निर्देशक सिद्वार्न्त किसी भी न्यार्यार्लय के द्वार्रार् कानूनी रूप में लार्गू नहीं किए जार् सकते। तो भी, संविधार्न यह घोषणार् करतार् है कि वे देश के प्रशार्सन के लिए मौलिक सिद्वार्न्त हैं और यह रार्ज्य क कर्त्तव्य है कि वह कानून निर्मार्ण करते समय इन को लार्गू करे।

द्वि-सदनीय संघीय संसद

संविधार्न संघीय स्तर पर द्वि-सदनीय संसद की व्यवस्थार् करतार् है और इसको संघीय संसद क नार्म देतार् है। इसके दो सदन हैं: लोकसभार् और रार्ज्यसभार्। लोकसभार् संसद क निम्न और लोगों के द्वार्रार् प्रत्यक्ष रूप में निर्वार्चित सदन है। यह भार्रत के लोगों क प्रतिनिधित्व करतार् है। इसके सदस्यों की अधिक-से-अधिक संख्यार् 545 निर्धार्रित की गई है। प्रत्येक रार्ज्य के लोग अपनी जनसंख्यार् के अनुपार्त में अपने प्रतिनिधि निर्वार्चित करते हैं। यू. पी. की लोकसभार् में 80 और पंजार्ब की 13 सीटें हैं। लोकसभार् के लिए चुनार्व इन सिद्वार्न्तों के अनुसार्र करवार्ए जार्ते हैं: (1) प्रत्यक्ष चुनार्व (2) गुप्त मतदार्न (3) एक मतदार्तार् एक मत (4) सार्धार्रण बहुमत जीत प्रणार्ली (5) सावजनिक वयस्क-मतार्धिकार (पुरुषों और स्त्रियों की मतदार्तार् बनने की कम-से-कम आयु 18 वर्ष की है-पहले यह 21 वर्ष की होती थी)। 25 वर्ष यार् इससे अध्कि आयु के सभी मतदार्तार्, लोकसभार् क चुनार्व लड़ने के योग्य हैं इसक कार्यकाल 5 वर्ष है परन्तु रार्ष्ट्रपति प्रधार्नमन्त्री की सिफार्रिश पर इसको कार्य काल पूर्ण होने से पूर्व भी भंग कर सकतार् है।

रार्ज्य सभार् संसद क उपरि तथार् अप्रत्यक्ष रूप में निर्वार्चित सदन है। यह सदस्य संघ के रार्ज्यों क प्रतिनििध्त्व करतार् है। इसकी कुल सदस्यतार् संख्यार् 250 है। इसमें से 238 सदस्य रार्ज्य विधार्न सभार्ओं के द्वार्रार् आनुपार्तिक प्रतिनिधित्व की प्रणार्ली के द्वार्रार् चुने जार्ते हैं और 12 सदस्य रार्ष्ट्रपति के द्वार्रार् कलार्, विज्ञार्न और सार्हित्य के क्षेत्रों के प्रतिष्ठित व्यक्तियों में से मनोनीत किए जार्ते हैं। वर्तमार्न रार्ज्यसभार् के 240 सदस्य हैं। रार्ज्यसभार् संसद क एक स्थार्यी सदन है। किन्तु इसके एक-तिहार्ई सदस्य प्रत्येक दो वर्ष पश्चार्त् सेवार् निवृत्त हो जार्ते हैं। प्रत्येक सदस्य के पद क कार्यकाल 6 वर्ष है।

दोनों सदनों में से लोकसभार् अधिक शक्तिशार्ली है। इसके पार्स ही वार्स्तविक वित्तीय शक्तियार्ँ हैं और केवल यही मन्त्रिमण्डल को हटार् सकतार् है। मन्त्रिमण्डल सार्मूहिक रूप में लोकसभार् के प्रति उत्तरदार्यी होतार् है। परन्तु, रार्ज्यसभार् उतनी शक्तिहीन भी नहीं जितनार् कि ब्रिटिश लाड सदन है और न ही लोकसभार् उतनी शक्तिशार्ली है जितनार् कि ब्रिटिश कॉमन सदन। संघीय संसद एक प्रभुसत्तार् सम्पन्न संसद नहीं है। यह संविधार्न के अधीन गठित की जार्ती है और यह केवल उन्हीं श्क्तियों क प्रयोग कर सकती है जोकि इसको संविधार्न ने दी हैं।

संसदीय प्रणार्ली

भार्रत क संविधार्न केन्द्र और रार्ज्यों में संसदीय प्रणार्ली की व्यवस्थार् करतार् है। यह ब्रिटिश संसदीय प्रणार्ली पर आधार्रित है। भार्रत क रार्ष्ट्रपति देश क संवैधार्निक मुखियार् है जिसके पार्स नार्ममार्त्र की शक्तियार्ँ हैं। प्रधार्नमन्त्री के नेतृत्व में मन्त्रिमण्डल वार्स्तविक कार्यपार्लिक है। मन्त्रियों क संसद के सदस्य होनार् आवश्यक है। मन्त्रिमण्डल के सदस्य अपने सभी कार्यों के लिए लोकसभार् के समक्ष सार्मूहिक रूप में उत्तरदार्यी होते हैं। लोकसभार् के द्वार्रार् अविश्वार्स प्रस्तार्व पार्स किए जार्ने पर मन्त्रिपरिषद् प्रणार्ली मन्त्रिपषिद् को यह अधिकार है कि यह रार्ष्ट्रपति को लोकसभार् भंग करने की सिफार्रिश कर सकती है। त्यार्गपत्र देनार् पड़तार् है इसी प्रकार प्रत्येक रार्ज्य में इन्हीं नियमों के अनुसार्र सरकार कार्य करती है। इस प्रकार संसदीय प्रणार्ली की सभी विशेषतार्एँ भार्रतीय संविधार्न में शार्मिल हैं। परन्तु आजकल इस विषय पर चर्चार् भी चल रही है कि संसदीय प्रणार्ली के स्थार्न पर भार्रत में अध्यक्षार्त्मक स्वरूप की प्रणार्ली लार्यी जार्नी चार्हिए कि नहीं। त्रिशंकु संसदों के अस्तित्व में आने के युग और भार्रतीय दल प्रणार्ली की तरलतार् ने कुछ विद्वार्नों पर यह प्रभार्व डार्लार् है कि वे अध्यक्षार्त्मक सरकार की वकालत करने लगे हैं जिससे कुछ निश्चित समय के लिए एक स्थिर सरकार अस्तित्व में आ सके। मई-जून, 1996_ अप्रैल, 1997 माच, 1998_ अप्रैल, 1999 तथार् मई 2004 में रार्ष्ट्र सरकार बनार्ने में प्रस्तुत आई कठिनार्इयों ने एक बार्र पिफर वर्तमार्न संसदीय प्रणार्ली में अध्यक्षतार् प्रणार्ली के कम से कम कुछ तत्त्व अपनार्ने की मार्ंग को दृढ़ कियार् है। परन्तु इस विचार्र को रार्ष्ट्रीय स्वीकृति मिलनी अभी शेष है।

वयस्क मतार्धिकार

भार्रत क संविधार्न सभी वयस्कों को वोट क अधिकार प्रदार्न करनार् है। प्रो. श्रीनिवार्सन लिखते हैं, किसी भी योग्यतार् की शर्त रखे बिनार् सभी वयस्कों को मत क अधिकार देनार् संविधार्न निर्मार्ण सभार् के द्वार्रार् उठार्ए गए सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण कदमों में से एक है और यह एक विश्वार्स की कार्यवार्ही है। भार्रत सरकार के अधिनियम 1935 के अधीन कुल जनसंख्यार् के केवल 14 प्रतिशत लोगों को ही मत देने क अधिकार थार् और स्त्रियों क कुल मतों में भार्ग नार्ममार्त्र क ही थार्। अब भार्रतीय संविधार्न के अधीन स्त्रियों और पुरुष दोनों को मत क एक समार्न अधिकार है। अब मत के अधिकार के लिए आयु सीमार् 21 वर्ष से घटार् कर 18 वर्ष की जार् चुकी है। 18 वर्ष से उफपर की आयु के सभी भार्रतीयों को चुनार्वों में मतदार्न करने क अधिकार प्रार्प्त हैं।

एक अखण्डतार् रार्ज्य के सार्थ एकल नार्गरिकतार् के सार्थ एकीकृत रार्ज्य

भार्रतीय संविधार्न सभी रार्ज्यों को समार्न रूप में भार्रतीय संघ क भार्ग बनार्तार् है। हमार्रार् गणतंत्र सल्तनतों क गठबन्धन नहीं है बल्कि यह एक वार्स्तविक संघ है जिसको भार्रत के लोगों ने भार्रत के सभी नार्गरिकों को समार्न रख कर प्रभुसत्तार् के मौलिक संकल्प के आधार्र पर स्थार्पित कियार् है। सभी नार्गरिकों को एक समार्न नार्गरिकतार् प्रदार्न की गई है जोकि उनको एक समार्न अधिकार और स्वतन्त्रतार्एँ और रार्ज्य प्रशार्सन की एक जैसी सुरक्षार् प्रदार्न करती है। अब भार्रतीय मूल के विदेशी नार्गरिकों, जोकि 26 जनवरी, 1950 के पश्चार्त् विदेशों में जार्कर बस गए हैं तथार् जिन्होंने दूसरे देशों की नार्गरिकतार्एँ प्रार्प्त कर ली हैं, को भी भार्रत की नार्गरिकतार् देने क निर्णय लियार् गयार् है। अब वे दोहरी नार्गरिकतार् प्रार्प्त कर सकते हैं। उन्हें अपनी वर्तमार्न नार्गरिकतार्ओं के सार्थ-सार्थ भार्रतीय नार्गरिकतार् भी प्रार्प्त हो जार्एगी। वे दोहरी नार्गरिकतार् की प्रार्प्ति के अधिकारी हो जार्एँगे। उन्हें भार्रत में नार्गरिक और आर्थिक अधिकार प्रार्प्त हो जार्एँगे, परन्तु उन्हें रार्जनीतिक अधिकार प्रार्प्त नहीं होंगे।

एकल एकीकृत न्यार्यपार्लिका

जहार्ँ अमरीकी संविधार्न, केवल संघीय न्यार्यपार्लिक स्थार्पित करतार् है और रार्ज्य न्यार्यपार्लिक प्रणार्ली को प्रत्येक रार्ज्य के संविधार्न पर छोड़ देतार् है, वहीं विपरीत भार्रत क संविधार्न एक इकहरी न्यार्यपार्लिक की व्यवस्थार् करतार् है जिसमें सर्वोच्च न्यार्यार्लय शीर्ष स्तर क न्यार्यार्लय है, उच्च न्यार्यार्लय रार्ज्य स्तरों पर है और शेष न्यार्यार्लय उच्च न्यार्यार्लय के अधीन कार्य करते हैं। सर्वोच्च न्यार्यार्लय देश में न्यार्य क अन्तिम न्यार्यार्लय है। यह भार्रत में न्यार्यिक प्रशार्सन चलार्तार् है और इस पर नियंत्रण रखतार् है।

न्यार्यपार्लिक की स्वतन्त्रतार्

भार्रतीय संविधार्न न्यार्यपार्लिक को पूर्णतयार् स्वतन्त्र बनार्तार् है। यह इन तथ्यों से स्पष्ट हो जार्तार् है: (क) न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति रार्ष्ट्रपति के द्वार्रार् की जार्ती है। (ख) उच्च कानूनी योग्यतार्ओं और अनुभव वार्ले व्यक्तियों को ही न्यार्यार्धीश नियुक्त कियार् जार्तार् है। (ग) सर्वोच्च न्यार्यार्लय के न्यार्यार्धीशों को बहुत ही कठिन प्रक्रियार् के द्वार्रार् ही उनके पद से हटार्यार् जार् सकतार् है। (घ) न्यार्यार्धीशों और न्यार्यिक कर्मचार्रियों क वेतन भार्रत की संचित निधि में से दियार् जार्तार् हैं और इनके लिए विधार्नपार्लिक की वोट आवश्यक नहीं होती। (घ) सर्वोच्च न्यार्यार्लय को यह अधिकार है कि वह अपनी स्वतन्त्रतार् बनार्ए रखने के लिए अपनार् न्यार्यिक प्रशार्सन स्वयं संचार्लित करे। (च) सर्वोच्च न्यार्यार्लय के सभी अधिकारियों और कर्मचार्रियों की नियुक्ति मुख्य न्यार्यार्धीश अधिकारण यार् किसी अन्य न्यार्यार्धीश यार् अधिकार द्वार्रार्, जिसको कि इसे उद्देश्य बनार्यार् गयार् है, के द्वार्रार् की जार्ती है। भार्रतीय न्यार्यपार्लिक ने सदैव ही एक स्वतन्त्र न्यार्यपार्लिक की तरह कार्य कियार् है।

न्यार्यिक पुनर्निरीक्षण

संविधार्न देश क सर्वोच्च कानून है। सर्वोच्च न्यार्यार्लय, इसकी सुरक्षार् और व्यार्ख्यार् करतार् है। यह लोगों के मौलिक अधिकारों के प्रहरी के रूप में भी कार्य करतार् है। इस उद्देश्य के लिए वह न्यार्यिक पुनर्निरीक्षण की शक्ति क प्रयोग करतार् है। इसके द्वार्रार् सर्वोच्च न्यार्यार्लय विधार्नपार्लिक और कार्यपार्लिक के सभी कार्यों के संवैधार्निक रूप में उचित होने के बार्रे में निर्णय करतार् है। यदि संसद के कानून यार् कार्यपार्लिक के कार्यों को सर्वोच्च न्यार्यार्लय में चुनौती दी जार्ए और इसको यह ग़्ौर-संवैधार्निक पार्ये तो वह उनको रद्द कर सकतार् है। पिछले समय से सर्वेच्च न्यार्यार्लय इस अधिकार क सक्रिय कुशलतार् से प्रयोग करतार् आ रहार् है और इसने अलग-अलग संवैधनिक मार्मलों-गोलक नार्थ केस, केशवार्नंद भार्रती केस, मिनर्वार् मिलष केस, गोपार्लन केस और कई अन्य केसों में ऐतिहार्सिक निर्णय दिए हैं। रार्ज्यों के उच्च न्यार्यार्लयों रार्ज्य कानूनों से सम्बन्धित ऐसी शक्तियों क प्रयोग करते हैं।

संविधार्न अपने किसी भी अनुच्छेद के अधीन न्यार्यिक पुनर्निरीक्षण क अधिकार प्रत्यक्ष रूप में नहीं देतार्। पिफर भी, यह संविधार्न के कई अनुच्छेदों विशेष रूप में अनुच्छेदों 13, 32, और 226 पर आधार्रित है। संविधार्न की यह विशेषतार् अमरीकी संविधार्न में विशेषतार् जैसी है।

न्यार्यिक सक्रियतार्

इस समय भार्रतीय न्यार्यपार्लिक अपने सार्मार्जिक उत्तरदार्यित्वों के प्रति अधिक-से-अधिक सक्रिय हो रही है। सावजनिक हित मुकद्दमार् प्रणार्ली (PIL) के द्वार्रार् और इसके सार्थ ही अपनी शक्तियों और उत्तरदार्यित्वों के अधिक-से-अधिक प्रयोग के द्वार्रार् अब सावजनिक हितों की प्रार्प्ति के लिए अधिक सक्रिय हो रही है। सावजनिक हित मुकद्दमार् (PIL) के अन्तर्गत न्यार्यार्धीश सावजनिक हितों की प्रार्प्ति के लिए अपने आप (Suo moto) कार्यवार्ही कर सकते हैं। मई, 1995 में और पिफर जुलार्ई 2003 में भार्रतीय सर्वोच्च न्यार्यार्लय ने रार्ज्य को कहार् कि वह समूचे भार्रत के लिए और सभी भार्रतीयों के लिए एक समार्न नार्गरिक संहितार् लार्गू करने क प्रयार्स करे जैसार् कि संविधार्न के अनुच्छेद 44 में करने के लिए कहार् गयार् है। न्यार्यिक सक्रियतार् भार्रतीय न्यार्य प्रणार्ली की एक उत्तम विशेषतार् है।

संकटकाल स्थिति से सम्बन्धित व्यवस्थार्एँ

वेमर गणरार्ज्य (जर्मनी) के संविधार्न के समार्न ही भार्रतीय संविधार्न में भी संकटकाल स्थिति से निपटने के लिए व्यवस्थार्एँ की गई हैं। यह तीन प्रकार की संकटकाल स्थितियों को पहचार्नतार् है और भार्रत के रार्ष्ट्रपति को इनक सार्मनार् करने की शक्ति सौंपतार् है। इसीलिए इनको रार्ष्ट्रपति की संकटकालीन शक्तियों के रूप में जार्नार् जार्तार् है। संविधार्न तीन प्रकार की संकटकालीन स्थितियों क वर्णन करतार् है:

  1. रार्ष्ट्रीय संकटकालीन स्थिति अनुच्छेद 352 अर्थार्त् युद्व यार् विदेशी आक्रमण यार् भार्रत के विरुद्व विदेशी आक्रमण के खतरे यार् भार्रत में यार् इसके किसी भार्ग में सशस्त्र विद्रोह के परिणार्म के रूप में पैदार् हुई संकटकालीन स्थिति।
  2. किसी रार्ज्य में संकटकाल की स्थिति अनुच्छेद 356 अर्थार्त् किसी भी रार्ज्य में संवैधार्निक मशीनरी पेफल हो जार्ने के परिणार्मस्वरूप उत्पन्न संकटकाल की स्थिति, और
  3. वित्तीय संकटकाल स्थिति (अनुच्छेद 360) अर्थार्त् भार्रत की वित्तीय स्थिरतार् में खतरे की स्थिति स्वरूप उत्पन्न हुई संकटकालीन स्थिति।

भार्रत के रार्ष्ट्रपति को इन संकटकाल की स्थितियों से निपटने के लिए उचित कदम उठार्ने के अधिकार हैं। किन्तु वार्स्तव में रार्ष्ट्रपति के ये अधिकार प्रधार्नमन्त्री और मन्त्रिमण्डल के अधिकार है।

रार्ष्ट्रीय संकटकाल की स्थिति में वार्स्तविक रूप में समस्त शार्सन प्रणार्ली एकात्मक बन जार्ती है और रार्ष्ट्रपति अनुच्छेद 19 में शार्मिल मौलिक अधिकारों और संविधार्नों के अनुच्छेदों 32 और 226 के अधीन उनको लार्गू करने की व्यवस्थार् को स्थगित कर सकतार् है। परन्तु संकटकालीन स्थिति में शक्ति प्रयोग करने के सम्बन्ध में कुछ विशेष निर्धार्रित नियम और कई सीमार्एँ लगार्ई गई हैं। रार्ष्ट्रपति, केवल प्रधार्नमन्त्री और मन्त्रिमण्डल की लिखित सिफार्रिश पर ही संकटकालीन स्थिति की घोषणार् कर सकतार् है। रार्ष्ट्रीय संकटकाल की स्थिति में, (यह व्यवस्थार् 44वें संशोधन के द्वार्रार् की गई है।) प्रत्येक संकटकालीन स्थिति के लार्गू करने की घोषणार् को एक निर्धार्रित समय में संसद से स्वीकृति लेनी आवश्यक होती है। 1952 से लेकर रार्ष्ट्रपति द्वार्रार् रार्ष्ट्रीय संकटकालीन शक्तियों (रार्ष्ट्रीय संकटकाल स्थिति और संवैधार्निक संकटकाल स्थिति) क प्रयोग कई बार्र कियार् जार् चुक है।

संकटकालीन शक्तियों क उद्देश्य लोगों और रार्ज्य के हितों की रक्षार् करनार् है और इसलिए इनक विरोध नहीं कियार् जार् सकतार्। परन्तु यह संभार्वनार् बनी रहती है कि केन्द्रीय कार्यपार्लिक (सरकार) रार्जनीतिक उद्देश्यों के लिए इनक दुरुपयोग कर सकती है, विशेष रूप में अनुच्छेद 356 क केन्द्र दुरुपयोग कियार् जार् सकतार् है। 1975 में आंतरिक कारणों से संकटकाल स्थिति लार्गू करनार् श्रीमती इन्दिरार् गार्ंधी के द्वार्रार् की गई एक सत्तार्वार्दी कार्यवार्ही ही थी और इस कार्यवार्ही के लिए लोगों ने उनको और उनकी कांग्रेस पाटी को 1977 की चुनार्वों में बुरी तरह हरार् कर दण्ड दियार्। इसी प्रकार केन्द्र सरकार के द्वार्रार् संवैधार्निक संकटकालीन स्थिति की व्यवस्थार् क प्रयोग कुछ परिस्थितियों में निश्चय ही स्वेच्छार्चार्री रूप में कियार् जार्तार् रहार् है। अत: संवैधार्निक प्रतिबन्धों के बार्वजूद संकटकालीन शक्तियों की व्यवस्थार्ओं क दुरुपयोग कियार् जार् सकतार् है। परन्तु, संकटकाल से सम्बन्धित व्यवस्थार् को संविधार्न में शार्मिल करने को किसी भी तरह संविधार्न निर्मार्ण सभार् की अनार्वश्यक और लोकतन्त्र विरोधी कार्यवार्ही नहीं कहार् जार् सकतार्। यह रार्ष्ट्रीय सुरक्षार्, शार्न्ति और स्थिरतार् के हित में संविधार्न में शार्मिल की गर्इं है। आवश्यकतार् इनको समार्प्त करने की नहीं बल्कि इसक ठीक-ठीक करने की है। उपयुक्त अमर नंदी ठीक ही कहते हैं फ्रार्ष्ट्रीय संकटकालीन स्थिति से निपटने के लिए केन्द्रीय कार्यपार्लिक को दिए गए अधिकार, एक ढंग से सौंपे गई कारतूसों की भरी हुई वह बंदूक है जिसक प्रयोग नार्गरिकों की स्वतन्त्रतार् की सुरक्षार् और इनकी समार्प्ति दोनों के लिए कियार् जार् सकतार् है। इसलिए, इस बंदूक क प्रयोग बड़ी ही सार्वधार्नी से करनार् चार्हिए। इसके सार्थ हम यह जोड़नार् चार्हेंगे कि विशेष रूप में केन्द्र के द्वार्रार् अनुच्छेद 356 क प्रयोग उचित और कभी-कभार्र और सोच समझ कर ही कियार् जार्नार् चार्हिए। किसी भी स्थिति में इसक रार्जनीतिक दुरुपयोग नहीं कियार् जार्नार् चार्हिए।

अनुसूचित जार्तियों और अनुसूचित जनजार्तियों के लिए विशेष व्यवस्थार्एँ

अनुसूचित जार्तियों और अनुसूचित कबीलों से सम्बन्धित लार्गों के हितों की सुरक्षार् के उद्देश्य से, संविधार्न अपने भार्ग XVI में कुछ विशेष व्यवस्थार्एँ करतार् है। अनुच्छेद 330 उनके लिए उनकी जनसंख्यार् के अनुपार्त (जहार्ँ तक संभव हो सके) में लोकसभार् की कुछ स्थार्न आरक्षित रखने की व्यवस्थार् करतार् है। सार्थ ही यदि रार्ष्ट्रपति यह अनुभव करे कि एंग्लो-इंडियन समुदार्य को सदन में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलार् तो वह इस समुदार्य के दो सदस्य लोकसभार् में मनोनीत कर सकतार् है। (अनुच्छेद 331)

रार्ज्य विधार्न सभार्ओं में अनुसूचित जार्तियों, अनुसूचित जनजार्तियों और एंग्लो-इंडियन समुदार्य के लिए सीटें आरक्षित रखने की व्यवस्थार् क्रमवार्र धार्रार् 331 और 332 के अधीन की गई है। 84वें संवैधार्निक संशोधन के द्वार्रार् आरक्षण क कार्यकाल अब 2010 तक बढ़ार् दियार् गयार् है। अब आरक्षण क लार्भ अन्य पिछड़ी श्रेणियों (OBCs) को भी दे दियार् गयार् है परन्तु सर्वोच्च न्यार्यार्लय ने निर्णय दियार् है कि नौकरियों में कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होनार् चार्हिए।

संसद तथार् विधार्नपार्लिकाओं में आरक्षण की व्यवस्थार् के सार्थ-सार्थ सरकारी नौकरियों और अलग-अलग विश्वविद्यार्लयों और व्यार्वसार्यिक संस्थार्ओं में भी अनुसूचित जार्तियों और अनुसूचित कबीलों के लिए नौकरियार्ँ आरक्षित रखी जार्ती हैं। संविधार्न अनुसूचित जार्तियों, अनुसूचित कबीलों और पिछड़ी श्रेिण्यों की स्थिति क लगार्तार्र आकलन करने के लिए एक आयोग स्थार्पित करने की भी व्यवस्थार् क प्रार्वधार्न करतार् है। मई, 1990 में एक संवैधनिक संशोधन के द्वार्रार् इस उद्देश्य के लिए एक आयोग स्थार्पित कियार् गयार्। अब मार्नव अधिकारों के बार्रे रार्ष्ट्रीय आयोग भी अनुसूचित जार्तियों और जनजार्तियों से सम्बन्धित लोगों के अधिकारों के उल्लंघन से सम्बन्धित शिकायतों की जार्ंच कर सकतार् है।

भार्षार् से सम्बन्धित व्यवस्थार्एँ

संविधार्न केन्द्र (संघ), भार्षार्यी क्षेत्रों, सर्वोच्च न्यार्यार्लयों और उच्च न्यार्यार्लयों की भार्षार् परिभार्षित करतार् है। अनुच्छेद 343 में लिखार् गयार् है कि देश की सरकारी भार्षार् देवनार्गरी लिपि में हिन्दी होगी। परन्तु इसके सार्थ ही यह अंग्रेजी भार्षार् जार्री रखने की भी व्यवस्थार् करतार् है। हर एक रार्ज्य की विधार्नसभार् अपने रार्ज्य की भार्षार् को सरकारी भार्षार् के रूप में स्वीकार कर सकती है। सर्वोच्च न्यार्यार्लय और उच्च न्यार्यार्लय की भार्षार् अभी भी अंग्रेजी बनी हुई है। अनुच्छेद 351 के अधीन संविधार्न केन्द्र (संघ) को यह आदेश देतार् है कि वह हिन्दी को विकसित करे और इसक प्रयोग लोकप्रिय बनार्ए। संविधार्न की सार्तवीं अनुसूची में संविधार्न अब 22 प्रमुख भार्रतीय भार्षार्ओं को मार्न्यतार् देतार् है-आसार्मी, बंगार्ली, गुजरार्ती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, मलयार्लम, मरार्ठी, उड़ियार्, पंजार्बी, नेपार्ली, मणिपुरी, कोंकनी, संस्कृत, सिंधी, तमिल, तेलुगू और उर्दू, डोगरी, सन्थार्ली, मैथिली आदि।

अनेक स्त्रोतों से तैयार्र कियार् गयार् संविधार्न

भार्रत क संविधार्न तैयार्र करते समय इसके निर्मार्तार्ओं ने अनेक स्त्रोतों क प्रयोग कियार्। स्वतन्त्रतार् आन्दोलन ने उन पर धर्म-निरपेक्षतार्, स्वतन्त्रतार् तथार् समार्नतार् को अपनार्ने के लिए प्रभार्व डार्लार्। उन्होंने भार्रत सरकार अधिनियम 1935 की कुछ व्यवस्थार्ओं क प्रयोग कियार् और विदेशी संविधार्न की कई विशेषतार्एँ को भी उन्होंने अपनार्यार्। संसदीय प्रणार्ली और द्वि-सदनीय प्रणार्ली अपनार्ने के लिए उनको ब्रिटिश संविधार्न ने प्रभार्वित कियार्। अमरीकी संविधार्न ने उनको गणरार्ज्यवार्द, न्यार्यपार्लिक की स्वतन्त्रतार्, न्यार्यिक पुनर्निरीक्षण और अधिकार-पत्र अपनार्ने के पक्ष में प्रभार्वित कियार्। 1917 की समार्जवार्दी क्रार्न्ति के पश्चार्त् (भूतपूर्व) सोवियत संघ की प्रगति ने उनको अपनार् लक्ष्य समार्जवार्द निश्चित करने के लिए प्रभार्वित कियार्। इसी प्रकार उनको केनेडार्, आस्ट्रेलियार्, वेमर गणरार्ज्य (जर्मनी) और आयरलैंड के संविधार्नों ने भी प्रभार्वित कियार्।

26 जनवरी, 1950 में लार्गू होने के पश्चार्त्, भार्रत क संविधार्न कई स्त्रोतों से विकसित होतार् रहार् है- संसदीय कानून, न्यार्यिक निर्णय, परम्परार्एँ, वैज्ञार्निक व्यार्ख्यार्एँ और संविधार्न निर्मार्ण सभार् के रिकार्ड भी इसके स्रोत बने हैं। भार्रतीय संविधार्न न तो उधार्रों क थैलार् है, न कोई आयार्त कियार् गयार् संविधार्न और न ही यह भार्रत सरकार अधिनियम 1935 क श्रंगार्रित और विस्तृत स्वरूप है। संविधार्न निर्मार्तार्ओं ने विदेशी संविधार्नों यार् भार्रत सरकार अधिनियम 1935 के प्रभार्व अधीन संवैधार्निक विशेषतार्एँ और व्यवस्थार्एँ अपनार्ते समय सदैव ही इनको भार्रतीय आवश्यकतार्ओं और इच्छार्ओं अनुकूल ढार्लार्। इन विशेषतार्ओं के कारण ही भार्रत क संविधार्न भार्रतीय वार्तार्वरण के लिए सबसे उपयुक्त तथार् व्यवहार्र-कुशल संविधार्न बनार् गयार् है। यहार्ँ तक कि इसके विशार्ल आकार ने भार्रत क अपनी सरकार और प्रशार्सन को गठित करने और चलार्ने में शार्न्ति और युद्व यार् संकटकालीन स्थिति में प्रभार्वशार्ली ढंग से नेतृत्व कियार् है। इसकी प्रमुख विशेषतार्ओं को इस प्रकार परिभार्षित कियार् जार् सकतार् है: प्रस्तार्वनार्, मौलिक अधिकार, निर्देशक सिद्वार्न्त, धर्म-निरपेक्षतार्, संघवार्द, गणरार्ज्यवार्द, न्यार्यपार्लिक की स्वतन्त्रतार् और नि:सन्देह उदार्र संसदीय लोकतन्त्र।

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