भार्रतीय समार्ज क उद्भव एवं विकास

भार्रत विविध सार्मार्जिक और सार्ंस्कृतिक तत्वों क संश्लेषण कहार् जार्तार् है। यह आर्य और द्रविड़ संस्कृतियों क सम्मिश्रण है। इस संश्लेषण के फलस्वरूप गार्ंव, परिवार्र, जार्ति और विधि व्यवस्थार् में एकतार् पार्ई जार्ती है।

प्रार्चीनकाल से आज तक भार्रतीय समार्ज की निरन्तरतार् इस संश्लेषण द्वार्रार् बनी हुई है। मोहनजोदड़ो (2500 ईसार् पूर्व) से लेकर बौद्ध, जैन, इस्लार्म और ब्रिटिश शार्सन व स्वार्तंत्रयोनर भार्रत तक कलार्, चित्रकारी, संगीत और धर्म आदि के क्षेत्रों में सार्न्मीकरण तथार् संश्लेषण की प्रक्रियार् द्वार्रार् निरन्तरतार् पार्ई जार्ती है। के. एम. पणिकर जो एक निष्ठार्वार्न् रार्ष्टंवार्दी थे, संश्लेषण और सार्न्मीकरण की ऐतिहार्सिकतार् को ध्यार्न में रखते हुए लिखते हैं: मै संस्कृति को विचार्रों, धार्रणार्ओं, विकसित गुणों और संगठित संबंधों तथार् शिष्टतार्ओं की एक ग्रन्थि मार्नतार् हूं जो प्रार्य: एक समार्ज में पार्ई जार्ती है।, पणिकर इस संदर्भ में कहते हैं कि विचार्रों की समार्नतार्, आचरण व व्यवहार्र में एकरूपतार् और आधार्रभूत समस्यार्ओं को समझने क सर्वमार्न्य उपार्गम सार्झार् परम्परार्ओं और आदर्शो पर आधार्रित होते हैं। भार्रतीय संस्कृति की एक जीवन-पद्धति रही है, बार्हरी सम्पर्क होने से इसमें निरन्तर संशोधन होते हैं, परन्तु देशी सिद्धार्न्तों और विचार्रों पर आधार्रित होने के कारण यह पद्धति मूलत: भार्रतीय,बनी रही। भार्रतीय संस्कृति के ये रूप और उपार्गम सार्हिन्य, कलार् और वार्स्तुकलार् में दिखार्ई देते हैं। भार्रत में धामिक और सार्मार्जिक सहिष्णुतार् की परम्परार् रही है। इस परम्परार् ने भार्रत में सार्मार्जिक और सार्ंस्कृतिक जीवन में समृद्धि और अनेकरूपतार् लार्ने में योगदार्न कियार् है।

प्रार्चीनकाल के मुख्य सार्हित्यिक स्रोत हैं: (1) संस्कृत भार्षार् और संस्कृतिपरक भार्षार्ओं में, और (2) द्रविड़ भार्षार्एं। वेद, पुरार्ण और महार्भार्रत और प्रार्कृत एवं पार्ली भार्षार्ओं क उल्लेख इनमें कियार् जार्तार् है। श्रीलंक के इतिवृत, बुद्धिचरित और जैन सार्हिन्य मुख्य ऐतिहार्सिक लेखन हैं। कल्यार्ण के चार्लुक्य चत्रमार्नस और बंगार्ल के पार्ल के बार्रे में अनेक ऐतिहार्सिक कृतियार्ं मध्ययुग क संस्क्ृतिक भार्षार्ओं में शमिल की गई हैं। इन तीन रार्जवंशों के बार्रे में प्रसिद्ध कृतियों में क्रमश: विक्रमार्देव चरित, पृथ्वीरार्ज विजय और रार्मचरित हैं। कश्मीर की रार्जतरंगिनी और गुजरार्त के इतिवृत अन्य मुख्य कृतियार्ं हैं। 1206 से 1761 ईस्वी के अन्र्तगत तमिल, कन्नड़, तेलुगू और मलयार्लम भार्षार्ओं में महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे गए। पार्रसी और अरबी भार्षार्ओं को बहुत प्रोत्सार्हन मिलार्। प्रार्गैतिहार्सिक और आद्य-ऐतिहार्सिक कालों को प्रस्तर युग, तार्म्र युग और लौह युग में विभक्त कियार् गयार् है। इस प्रकार के वर्गीकरण से मनुष्य की भार्तिक और प्रौद्योगिक प्रगति क बोध होतार् है। मनुष्य की आर्थिक और सार्मार्जिक प्रस्थिति तथार् उसके पर्यार्वरण के बार्रे में ज्ञार्न प्रार्प्त करने की अधिक आवश्यकतार् है। इस युग-वर्गीकरण से पर्यार्प्त समझ प्रार्प्त नहीं की जार् सकती। मनुष्य की प्रगति की अवस्थार्ओं को समझने के लिए उद्भवीय प्रक्रियार् अधिक सूचनार्कारी है:

  1. आदिम भोजन संग्रहण अवस्थार् यार् आदि और मध्य प्रस्तर युग।
  2. उन्नत भोजन-संग्रहण अवस्थार् यार् उत्तर प्रस्तर युग/पार्षार्णकाल।
  3. आरम्भिक भोजन उन्पार्दन संक्रमण यार् नवप्रस्तर युग।
  4. स्थार्यी ग्रार्मीण समुदार्य यार् उन्नत नवप्रस्तर युग/तार्म्रपार्षार्ण।
  5. नगरीकरण यार् कांस्य युग।

सिंधु सभ्यतार् नगरीय है, और इसक क्षेत्र नील नदी यार् टिगरीज- यूप्रैफटेज घार्टियों यार् पीत नदी घार्टी की सभ्यतार्ओं के क्षेत्र से अधिक थार्। पश्चिम से पूर्व तक सिंधु घार्टी की सभ्यतार् 1,550 किलोमीटर में, और उत्तर से दक्षिण में 1,100 से अधिक किलोमीटर के क्षेत्र में फैली हुई थी। इस सभ्यतार् की आश्चर्यजनक विशेषतार् सुव्यवस्थित नगर-आयोजन है। रार्स्ते, गार्लियों और उपगलियों व घरों में सममिति थी, और ये सब भमकों में पकी हुई ईटों के बने हुए थे। भार्रत के गजेटियर भार्ग दो में लिखार् है: एक घर में एक केन्द्रीय आंगन, तीन से चार्र तक रहने के लिए कमरे, एक पनार्गार्र और एक रसोईघर होते थे। बड़े घरों मे तीस तक कमरे और प्रार्य: दो मंजिलें होती थीं। कई मकानों में कुएं भी होते थे, और शार्नदार्र भूमिगत जलनिकास व्यवस्थार् थी। सम्भवत: शहर निम्न और उपरी, भार्गों में बंटे हुए थे। एक परिषद्ए क बहु-खम्भिव सीार्ार्गार्र, एक सावजनकि पनार्गार्र, एक वृहद धार्न्य-भंडार्र ओर पकपी ईटों से निर्मित दुर्ग तथार् एक काष्ठ अधिरचनार् पार्ए गए हैं।

मटर, तरबूज और केले के अतिरिक्त गेहूं – जौ की भरपूर खेती होती थी। कपार्स भी उगार्यार् जार्तार् थार्। लोग मछली, मुर्गार्, बकरार्, गार्य और सूअर क मार्ंस खार्ते थे। बिल्लियार्ं, कुत्ते और हार्थी अधिक पार्ए जार्ते थे। धोती यार् शॅल क प्रयोग कियार् जार्तार् थार्। स्त्रियार्ं बड़े शौक से केश संवार्रती थीं, और हार्र, भुजबन्द, अंगूठी बार्ली, करधनी और पार्यल आदि जेवरों से अपनार् श्रगार्र करती थीं। सिंधु घार्टी के लोग पूर्ण कांस्य युग में थे, क्योंकि यह तथ्य आरी, हंसियार्, छेनी, मछली-कांटार्, पिन और शीशे आदि घेरलू वस्तुओं के उपयोग होतार् थार्, परन्तु स्थार्नीय स्तर पर उन्पार्दन नहीं होतार् थार्। पूजार् की वस्तुओं से मार्लूम होतार् है कि सिंधु घार्टी में भूमध्यसार्गरीय,ऐल्पीय, प्रोटो-आस्टेंलॉय और मंगोलॉय जन भी रहते थे। वार्स्तव में सिन्धु सभयतार् सर्वदेशीय थी।

तदन्तर अनुसन्धार्नों से भी एक व्यवस्थित नार्गरिक जीवन के अस्तिन्व के बार्रे में ज्ञार्त होतार् है। इसके अन्र्तगत जिसमें सम्पूर्ण शहर क आयोजन, एक नियमित जलनिकास व्यवस्थार्, वजन और मार्प क मार्नकीकरण तथार् लेखन पद्धति शमिल थे, कलार् और हस्तकलार् भी विकसित होने लगी थी। इन सबके होते हुए भी लोग आदिम, युग में ही थे। अर्थववेद के समय तक आर्य पूरी तरह से धार्तु के बार्रे में जार्ने लग गए थे और लोहे, कांसे और तार्ंबे में भेद समझते थे।

भार्रतीय समार्ज में अन्य सभ्यतार्ओं की तुलनार् में परिवर्तन धीरे हुए हैं। सार्ंस्कृतिक विकास की प्रत्येक अवस्थार् अग्रिम अवस्थार् में परस्पर व्यार्प्त रहती थी, इसलिए किंचित् निरन्तरतार् और स्थार्यिन्व बनार् रहतार् थार्। क्षेत्रीय भिन्नतार्ओं और विदेशियों के सार्थ निरन्तर सम्पर्क रहने के उपरार्न्त भी सिंधु सभ्यतार् अपने स्वरूप में मुख्यत: भार्रतीय है। इस मत के बार्रे में वैदिक सार्हिन्य, पुरार्णों, जैन व बौद्ध धर्मपुस्तकों में वर्णन मिलते हैं।

मौर्य सार्म्रार्ज्य और अनेक क्षेत्रीय और स्थार्नीय संस्कृतियों के बार्रे में समुचित पुरार्तन्वीय प्रलेखन उपलब्ध हैं। सम्पूर्ण भार्रत में लोहे के बार्रे में जार्नकारी थी। संस्कृतियों के वर्गीकरण में संस्छत भार्षार् के प्रसार्र से भी बहुत योगदार्न मिलार् है। पुरार्तन्वीय और भार्षार्यी अध्ययन से सर्व-भार्रतीय संस्कृति के उद्भव क प्रमार्ण मिलतार् है। भौगोलिक अलगार्व से भी संकेत मिलते हैं कि यह उपमहार्द्वीप वार्स्तव में फ्भार्रतीय, है। विभिन्न समूहों के लोग जो इस देश में बार्हर से आए, उनके हजार्रों वर्ष के संघर्ष और अन्त:क्रियार् क परिणार्म संश्लेषण है।, विदेशियों के सार्थ सम्पर्क क सबसे अधिक परिणार्म भार्षार्यी एकीकरण थार्। पुरार्णों में वर्णित कथार्ओं और दंतकथार्ओं में प्रजार्तीय और सार्ंस्कृतिक संश्लेषण प्रतिबिम्बित होतार् है। आर्यकरण, बिहार्र और बंगार्ल के कुछ भार्गों में बहु फैल गयार् थार्। सार्थ-सार्थ विदेशी संस्कृतियों क भी भार्रतीयकरण, हुआ। आर्यकरण, क अभिप्रार्य आर्यो (विदेशियों) क देशी लोगों पर प्रभार्व पड़ने से है, और भार्रतीयकरण,क अर्थ आर्यो द्वार्रार् मूलवार्सियों के जीवन शैलियों क अनुकरण करने की प्रक्रियार् से है। परिवर्तन की इन दोनों प्रक्रियार् द्वार्रार् व्यवस्थार्पन उभरकर आयार् और अंत में आर्य और देशी संस्कृतियों क सार्न्मीकरण हुआ।

वैदिक सभ्यतार्

सिंधु घार्टी संस्कृति क भार्रतीय-आर्य सभ्यतार् के सार्थ क्यार् सम्बन्ध है? आर. सी. मजूमदार्र, एच. सी. रार्यचौधरी और कालीकिंकर दनार् ने अपनी पुस्तक एन एडवार्ंस्ड हिस्टीं ऑफ इंडियार् में लिखार् है: उपरी तौर पर दोनों में बहुत अंतर है। वैदिक आर्य ग्रार्मीण थे, जबकि सिंधु घार्टी सभ्यतार् के लक्षणों के अनुसार्रवहार्ं विकसित शहरी जीवन की सुविधार्एं थीं। वैदिक आर्य सम्भवत: लोहे और रक्षार् शस्त्रों के बार्रे में जार्नते थे। वैदिक सभ्यतार् में घोड़े की भूमिक बहुत थी परंतु सिंधु घार्टी में इसके अस्तिन्व के आरे में शंक है। दोनों सभ्यतार्ओं में धामिक विश्वार्सों और अभ्यार्सों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण अंतर थे।

भार्रत में आर्यो के बार्रे में ज्ञार्न क वेद ही एकमार्त्र सार्हित्यिक स्रोत हैं आर्यो के बार्रे में ऋग्वेद-संहितार् सबसे पुरार्नार् ग्रंथ हैं वैदिक समार्ज ग्रार्मीण ओर कृषकीय थार्। विभिन्न सार्मार्जिक-सार्ंस्कृतिक और शैक्षणिक क्रियार्कलार्पों की मुख्य संस्थार्एं मंदिर और विद्यार्लय थे। गार्ंव एक स्वार्यन इकाई थी। मैगस्थनीज के अनुसार्र ईसार्पूर्व चौथी सदी में सार्त जार्तियार्ं थीं। अन्तरजार्तीय विवार्ह आम रिवार्ज् थार्। शरार्ब पीने, जुआ खेलने और वेश्यार्वृत्ति की बुरार्इयों को रार्ज्य द्वार्रार् नियंत्रित कियार् जार्तार् थार्।

वैदिक युग में स्त्रियों को हर क्षेत्र में ज्ञार्न प्रार्प्त करने की छूट थी। उन्होंने वैदिक भजनों की रचनार् भी की। उपनिषद् काल में गागी और मैत्रीय प्रसिद्ध दाशनिक थीं। उच्च जार्ति की स्त्रियार्ं अपने पतियों के सार्थ यज्ञ में भार्ग लेती थीं। उनको सम्पत्ति के स्वार्मिन्व क अधिकार थार् और विधवार्एं पुनर्विवार्ह कर सकती थीं। एक पुरुष एक से अधिक स्त्रियों के सार्थ विवार्ह कर सकतार् थार्, जबकि एक स्त्री को एक ही पुरुष के सार्थ विवार्ह करने क अधिकार थार्। किन्तु बौद्ध काल में वेदों क अध्ययन करने क अधिकार स्त्रियों से छीन लियार् गयार् थार्। गुप्त काल में स्थिति में बहु परिवर्तन हुआ। स्वयंवर (शक्ति परीक्षण के बार्द कन्यार् वर क चुनार्व करती थी) और गार्ंधर्व (स्वतंत्र पार्रस्परिक पसन्द) विवार्ह प्रथार्एं कमजोर पड़ गई। स्त्री से सम्पत्ति के स्वार्मित्व क अधिकार ले लियार् गयार्, और विधवार्ओं को पुनर्विवार्ह की स्वीकृति नही दी गई। पर्दार् और सती प्रथार्एं उभरीं।

उत्तर-वैदिक समार्ज और संस्कृति

ईसार् युग की आरम्भिक सदियों में विदेशी आक्रमणकारी भार्रतीय शार्सक परिवार्रों के सार्थ घुल-मिलकर उनके प्रभार्व में आ गए। विदेशी रार्जवंशों की रार्जधार्नियार्ं सार्ंस्कृतिक संश्लेषण की केन्द्र बन गई जिससे भार्रतीय सभ्यतार् को एक विशिष्ट सर्वदेशीय स्वरूप प्रार्प्त हुआ। गुप्त काल में पुरार्णों में वर्णित हिन्दू धर्म क उठार्व हुआ। महार्त्मार् बुद्ध को भगवार्न् विष्णु क अवतार्र मार्नते थे। ब्रार्ह्मणवार्द और बौद्धवार्द एक-दूसरे के समीप आए। हिन्दू धर्म, आदिम आस्थार्एं, अभ्यार्स और विदेशी धामिक प्रतीक भी समीप आए। हिन्दू समार्ज सार्ंस्कृतिक और सार्मार्जिक समूहों क एक संघ बन गयार् जिसमें विचार्रों और प्रथार्ओं क स्वतंत्र आदार्न-प्रदार्न और अच्छे पड़ोसी सम्बन्ध पार्ए जार्ते थे।

फार्हियार्न के अनुसार्र पार्ंचवी सदी में गुप्त सार्म्रार्ज्य के अंतर्गत उत्तर भार्रत में सर्वत्र सम्पन्नतार् थी। व्यार्पार्रियों के पार्स अतुल सम्पत्ति थी। व्यार्पार्र और बैकिंग प्रगति पर थे। धनी लोग स्कूल, बौद्ध मठ, मन्दिर, अस्पतार्ल और भिक्षार्लय चलार्ने के लिए उदार्रतार् से धन खर्च करते थे। पार्टलिपुत्र में बौद्ध मठ एक प्रसिद्ध शिक्षार् केन्द्र बनार् हुआ थार्। लोग शकुनों में विश्वार्स रखते थे। उनक विश्वार्स ज्योतिष में भी थार्। सार्मार्जिक न्यौहार्रों और उन्सवों के अवसरों पर नृन्य, संगीत और दार्वत क आम रिवार्ज् थार्। वसन्त उन्सव खुशी से मनार्यार् जार्तार् थार्।

समार्ज के विभिन्न अंगों के शंतिमय और सुव्यवस्थित कार्य के लिए धर्म एक वार्स्तविक आचार्र संहितार् थी, न कि कानून। धर्मशार्स्त्र यार् स्मृतियों में प्रत्येक जार्ति और व्यवसार्य, समार्ज में प्रत्येक सम्बन्ध-रार्जार् और प्रजार्, पति और पन्नी, गुरु और शिष्य के बार्रे में नियम दिए गए थे। नियम कठोर नहीं थे, और नई परिस्थितियों के अनुरूप संशोधित किए जार्ते थे। कभी-कभी कानून-निर्मार्तार् और पुरोहित वर्ग अपने स्वयं के विचार्र प्रविष्ट करके, नई संरचनार्एं और निषेध सुझार्ते थे।, एक चीनी यार्त्री हेनसार्ंग सार्तवीं सदी में भार्रत आयार्। उसके अनुसार्र लोग ईमार्नदार्र थे और वार्दे के पक्के थे। लोगों क विश्वार्स थार् कि बुरार् काम करने पर दंड अवश्य मिलतार् है।

शार्स्त्रों में उल्लेखित नियमों द्वार्रार् सार्मार्जिक जीवन शार्सित होतार् थार्। हिन्दू समार्ज जार्तियों और उपजार्तियों में विभक्त थार्। सार्मार्जिक अन्त:क्रियार् और विवार्ह (सहभोजिन्व और वैवार्हित) के नियमों क सख्ती से पार्लन कियार् जार्तार् थार्। खेल-कूद, न्यौहार्रों और उन्सवों क मार्ननार् और उपनयन (जनेउ) धार्रण करनार् सार्मार्न्य बार्त थी। पार्शविक जार्ति नियमों के परिणार्मरूवरूप भार्रतीय समार्ज पतन की ओर अग्रसर हुआ। निम्न और अछूत जार्तियों को अपमार्नित कियार् गयार्। स्त्रियों को दबार्कर रखार् गयार्। गण (कुलीनतंत्रीय रार्ज्य) श्रेणी (शिल्पसंघ) और संघ (बौद्धमठ श्रेणियार्ं) आदि सार्मूहिम संगठन विघटित होने लगे। जार्ति प्रथार् के प्रार्दुर्भार्व के कारण आर्थिक श्रेणियों के स्थार्न पर सार्मार्जिक श्रेणियार्ं अधिक महत्वपूर्ण बन गई। अल-बरूनी ने लिखार् है कि 11वीं सदी में भार्रतीय विदेशियों से घृणार् करने लगे थे।

श्रम की महिमार् आन्म-सम्मार्न की सूचक नहीं रही। समार्ज अन्यधिक विभेदित हो गयार्। कर्ज के भुगतार्न न कर पार्ने पर गुलार्म बनार्नार् एक आम रिवार्ज हो गयार् थार्। ऐसे लोगों को चार्ण्डार्ल, फलकरार्ज और निशार्द के नार्मों से जार्नार् जार्तार् थार्। अछूतों को उच्च जार्तियों से लग रखार् जार्तार् थार्। जार्ति प्रथार् और दार्सतार् में दक्षिण और उत्तर भार्रत में कोई अंतर नहीं थार्। उत्तर की तुलनार् में दक्षिण में ग्रार्मीण जीवन और शिल्पसंघों को अधिक स्वार्यनतार् प्रार्प्त थी।

वर्ण व्यवस्थार्

यह कहनार् मिथक होगार् कि प्रार्गैतिहार्सिक समार्ज जार्तिविहीन, समतार्, समृद्धि और धर्मपरार्यणतार् पूर्ण सहस्त्रार्विद थार्। ऋग्वेद में वर्णन के अनुसार्र आर्यो और अनायो में समार्ज क विभार्जन स्तरीकृत समार्ज क प्रथम सूचक है। आर्य यार् जनजार्ति विभिन्न अर्थपूर्ण कार्यो जैसे कृषि, पशुपार्लन और व्यार्पार्र आदि के आधार्र पर चार्र समूहों में विभक्त थे। आर्थिक कार्य करने वार्लों को वैश्य कहार् जार्तार् थार्। बेशीधन को ब्रार्ह्मण और क्षत्रिय वर्णो के रखरखार्व पर खर्च कियार् जार्तार् थार्। ये तीन वर्ण (ब्रार्ह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) अपने व्यवसार्यों से न कि अपने शरीर के रंग से, पहचार्ने जार्ते थे।

समार्ज कल्यार्ण के लिए ब्रार्ह्मण धामिक और आनुष्ठार्निक कार्य, वेदों क अध्ययन और समार्ज के सब वर्गो के लिए मार्न (धर्म) बनार्ने के कर्नव्य को पूरार् करते थे। देश की रक्षार्, कानून और व्यवस्थार् बनार्ए रखनार् क्षत्रिय क कार्य थार्। समय बीतने के सार्थ इन तीनों वर्णो ने अपने कार्यो में दक्षतार् प्रार्प्त कर ली और एक सार्मार्जिक सोपार्न में ढल गए जिससे ब्रार्ह्मण, क्षत्रिय और वैश्य क क्रमश: प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थार्न रहार्। चौथार् स्थार्न शूद्र यार् दार्स क रहार् जो तीन वर्गो के लोगों की सेवार् करते थे। ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में एक पौरार्णिक कहार्नी के अनुसार्र भगवार्न ब्रार्ंहार् के मुख से ब्रार्ह्मण, भुजार्ओं से क्षत्रिय, जार्ंघों से वैश्य और पैरों से शूद्र की उत्पनि हुई।

वर्ण जार्ति समूहों से भिन्न हैं क्योंकि वर्ण हिन्दू समार्ज के वृहद भार्ग हैं, जबकि जार्तियार्ं विशिष्ट अन्त:वैवार्हिक समूह हैं जिनकी संख्यार् हजार्रों में है। वर्ण अखिल-भार्रतीय सार्मार्न्य घटक हैं जबकि जार्तियार्ं स्थार्निक समूह हैं। विभिन्न जार्तियार्ं जो केरल यार् तमिलनार्डु में पार्ई जार्ती हैं, वे गुजरार्त और रार्जस्थार्न में नही पार्ई जार्तीं। एक ही भौगोलिक क्षेत्र में रहने वार्ले एक ही जार्ति के सदस्यों में विवार्ह करते थे क्योंकि लोग दूसरे क्षेत्रों में रहने वार्ले लोगों के पूर्ववृतों के बार्रे में जार्नकर नहीं होते हैं।

प्रार्रम्भ में वर्णो के व्यवसार्य वंशार्नुगत नहीं थे। न केवल व्यवसार्यों के परिवर्तन की छूट थी, बल्कि यदि किसी व्यक्ति में आवश्यक बुद्धि और गुण थे तो वह अपनी प्रस्थिति को भी उपर उठार् सकतार् थार्। उच्च से निम्न जार्ति की पदार्वनति भी होती थी। स्मृतियों के बार्द में जार्ति और व्यवसार्य स्थिर और बंशार्नुगत बनते गए। सार्मार्जिक और आर्थिक क्रियार्ओं क विभार्जन सार्मार्जिक विधार् क एक मार्नक और भार्ग बन गयार्। व्यक्ति उद्यम के उभय से वैयक्तिक सम्पत्ति क रार्स्तार् खुल गयार्। इस प्रकार जार्ति और सम्पत्ति रूपी संस्थार्ओं ने रार्ज्य क प्रार्दुर्भार्व आवश्यक बनार् दियार्। आर्थिक और रार्जनैतिक कार्यो को पूरार् करने के लिए देश, कुलपति, और भूस्वार्मी प्रमुख सन्दर्भ स्तर बन गए। रार्जार् रार्ज्य क कुलपति बनार् और उसने अनेक अधिकारियों और सलार्हकारों को नियुक्त कियार्। रार्ज्य ने रार्जस्व तथार् अन्य कर भी वसूल करने शुरू कर दिये। वर्ण व्यवस्थार् को समार्ज की आवश्यकतार्ओं को पूरार् करने के लिए एक लार्भकारी व्यवस्थार् के रूप में प्रस्तुत कियार् गयार्।

अनेक ऋषियों ने अपनी संहितार्ओं में विभिन्न समूहों के बीच सार्मार्जिक संबंधों और विवार्ह पर प्रतिबंध लगार्ने के महत्व पर बल देकर वर्ण व्यवस्थार् को कठोर बनार्ने में मदद की। रार्मार्यण, महार्भार्रत और जार्तक कथार्ओं में लिखार् है कि ब्रार्ह्मण न केवल वर्ण व्यवस्थार् के अन्तर्गत सर्वश्रेष्ठ थे, बल्कि उनके पार्स सम्पत्ति और सत्तार् भी थी। रार्जार् ने अपने विशेषार्धिकार से ब्रार्ंणों को गार्ंवों में रार्जस्व वसूल करने की छूट यार् कर-मुक्त जमीनें (ब्रंदेव) दी थीं। जब ब्रार्ह्मण अनुदार्नग्रार्ही वेदों के अध्ययन में व्यस्त नहीं थे। उनमें से अनेक वैश्यों क कार्य करते थे। अन्य व्यवसार्यों की तरह ब्रहार्ंणों ने भी अपने संघ बनार्ए। वे अपने हिस्सों के लिए झगड़ते भी रहते थे। ब्रार्ह्मण धर्मनिरपेक्ष नहीं थे क्योंकि उन्हें रार्जार्ओ और जनसार्धार्रण दोनों से बहुत सार् दार्न मिलतार् थार्। मनु और नार्रद के अनुसार्र वे भ्रष्ट बन गए थे।

क्षत्रियों और वैश्यों पर वर्ण क वंशार्नुगत आधार्र लार्गू नहीं होतार् थार्। फ्शार्सन कलार् और सैन्य व्यवसार्य एक समूह तक सीमित नहीं थे। भार्रत के इतिहार्स में ब्रार्ह्मण, वैश्य और शूद्र शार्ही रार्जवंशों के उल्लेखों की कमी नहीं है। सार्तवार्हन ब्रार्ह्मण थे, गुप्त वैश्य थे और नंद रार्जार् शूद्र थे। इसके अलार्वार् यवन, शक और कुशार्न रार्जवंश किसी जार्ति के नहीं थे।

वैश्य एक बहुत अधिक विभेदित जार्ति समूह थार् क्योंकि उसमें कुछ परिवार्र धनी थे और अन्य छोटे किसार्न, कारीगर, फेरीवार्ले और निम्न कर्मी थे। शूद्र लोगों क प्रन्यक्ष रूप में एक वर्ग स्वरूप थार्। वे तीनों वर्णो की सेवार् करते थे, और उनकी आर्थिक स्थिति निम्नतम थी। असलियत में वे उच्च जार्तियों के नौकर थे। फिर भी वे ब्रार्ह्मण जार्तियार्ं वर्ण व्यवस्थार् के बार्हर समझी जार्ती थीं। विभेदीकरण के बढ़ने और विभिन्न जार्तियों में विवार्ह द्वार्रार् मिश्रण होने के कारण उपजार्तियार्ं बनीं। क्यार् जार्ति और वर्ग प्रार्चीन भार्रत में परस्पर व्यार्प्त थे? मनुष्य की आर्थिक स्थिति में परिवर्तन होने से उसकी जार्ति प्रस्थिति प्रभार्वित नहीं होती थी। जार्ति और वर्ग, ये दो सोपार्न, मेल नहीं खार्ते थे। वर्ग सोपार्न में उपर से नीचे तक वर्ग थे: (1) उच्च अधिकारी, व्यार्पार्री, सार्हूकार और भूस्वार्मी, (2) लघु उन्मुक्त भूमिधर, कारीगर और सार्धार्रण अधिकारी, (3) अधिकार और सम्पत्तिविहीन श्रमिक और (4) उपेक्षित और पृथकृत श्रमिक। अंतिम दो कोटियों में शूद्र और मलेच्छ लोग थे। परन्तु प्रथम दो श्रेणियार्ं ब्रार्ंणों और क्षत्रियों के समार्नार्न्तर नहीं थीं, क्योंकि जिन लोगों ने अपने व्यार्वयार्सिक कार्य लग्नतार् से किए, वे आर्थिक रूपसे कभी भी सम्पन्न नहीं हो सके। ब्रार्ंमहणों और क्षत्रियों को बहुत सम्मार्न और प्रभुन्व प्रार्प्त थार् क्योंकि उनके व्यवसार्यों की उच्च सार्मार्जिक और सार्ंस्कृतिक महत्तार् थी। फिर भी समार्ज के विभिन्न वर्गो के हितों क संतुलन और अपनार् आंगिक स्वरूप जार्ति व्यवस्थार् ने बनार्ए रखार्। बौद्धधर्म के उन्थार्न से जार्ति प्रथार् को गहरार् आघार्त पहुंचार्।

वर्णार्श्रम व्यवस्थार्

हिन्दू समार्ज क मुख्य स्तम्भ वर्णार्श्रम धर्म थार्। वर्णार्श्रम में चार्र वर्णो (जिनक उल्लेख उफपर कियार् जार् चुक है) और मनुष्य के जीवन में चार्र अवस्थार्ओं (आश्रमों) क समार्वेश कियार् गयार् है। चार्र आश्रम (अवस्थार्एं) ब्रंचर्य, गृहस्थ, वार्नप्रस्थ और संन्यार्स थे। ब्रंचर्य में शिक्षार्, चरित्र और व्यक्तित्व के निर्मार्ण क कार्य कियार् जार्तार् है। गृहस्थार्श्रम में मनुष्य विवार्ह करके अपने परिवार्र क पार्लन एक धामिक कर्तव्य समझकर करतार् है। तीसरे और चौथे आश्रमों में इस संसार्र क परित्यार्ग करतार् है और आध्यार्त्मिक ज्ञार्न तथार् मोक्ष प्रार्प्त करने के लिए अपनार् जीवन समर्पित करतार् है। आश्रम समार्नतार् और एकतार् के सिद्धार्न्त थे। इनक उद्धेश्य एक भरपूर जीवन की प्रार्प्ति थार्। इन योजनार्ओं से पुरुषाथ की योजनार् गहरार्ई से जुड़ी थी। पुरुषाथ जीवन के मूल सिद्धार्न्त थे। पुरुषाथो द्वार्रार् मनुष्य को स्वयं, अपने परिवार्र और वृहद् समुदार्य के प्रति कर्तव्यों क बोध होतार् थार्। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चार्र पुरुषाथ हैं। इन सिद्धार्न्तों को एक सोपार्नीय क्रम में व्यवस्थित मूल्य-भार्व यार् जीवन के उद्धेश्य कहार् जार् सकतार् है। धर्म यार् नैतिक कर्तव्य सब मार्नव क्रियार्ओं में मूलभूत है।

समार्जशार्स्त्री योगेन्द्र सिंह ने चार्र सोपार्नों क उल्लेख कियार् है, अर्थार्त् (1) भूमिका-संस्थार्न (वर्ण), (2) करिश्मार्ई प्रतिभार् (गुण), (3) उद्धेश्य-अभिविन्यार्स (पुरुषाथ) और (4) जीवन-अवस्थार्एं व मूल्य-बंधन (आश्रम)। ये चार्र सोपार्न सार्ंस्कृतिक व्यवस्थार् और उसकी संरचनार् की हिन्दू अवधार्रणार् के भार्ग हैं। योगेन्द्र सिंह ने व्यवस्थार् और परिवर्तन दोनों को भार्रतीय परम्परार् की मुख्य विशेषतार्एं बतलार्यार् है। सोपार्न, सार्कल्यवार्द और निरन्तरतार् (व्यवस्थार्) को संकेतित करते हैं, और परिवर्तन, की व्यार्ख्यार् अनुभवार्तीततार्, यार् रूपार्न्तरण के संदर्भ में की जार्ती है। भार्रतीय परम्परार् में प्रत्येक वस्तु सोपार्नीकृत होती है।

ब्रिटिश काल में समार्ज

ब्रिटिश घुसपैठ के समय भार्रतीय समार्ज लगभग निश्चल थार्। ब्रिटिश शार्सकों को सलार्ह दी गई थी कि उन्हें हिन्दुओं के सार्मार्जिक रिवार्जों और धामिक आस्थार्ओं में हस्तक्षेप नही करनार् चार्हिए। एल अब्बे डूबोई क मत थार् कि जिस दिन ब्रिटिश शार्सन ने हस्तक्षेप कियार्, वही एक रार्जनैतिक शक्ति के रूप में इसके अस्तित्व क अंतिम दिन होगार्। मुगल शार्सक भी प्रार्य: धर्म परिवर्तन को सार्मार्जिक परिवर्तन क एक सार्धन मार्नने के पक्ष में नहीं थे। इस अध्यार्य के पहले अनुभार्ग में हमने कहार् है कि मध्यकालीन युग में एक प्रकार के संश्लेषण क प्रार्दुर्भार्व हुआ। ग्रार्मीण भार्रत में जार्ति और वर्ग संरचनार्एं ब्रिटिश शार्सन के प्रार्रम्भ में कठोर व निश्चल थीं। व्यक्ति को जार्ति, परिवार्र और गार्ंव के अधीनस्थ समझार् जार्तार् थार्। अर्थव्यवस्थार् पुरार्तन थी। लोगों में रार्ष्टींय चेतनार् की कमी थी। ऐसे समय पर ब्रिटिश शार्सन के आगमन से नई स्थिति उत्पन्न हुई।

ब्रिटिश सरकार, ईसार्ई मिशनरी और अंग्रेजी शिक्षार् के मार्मयम से भार्रतीय समार्ज पर प्रभार्व पड़ार् है। ब्रिटिश सरकार ने देशी प्रशार्सन एवं अभिशार्सन क स्थार्न ग्रहण कर लियार्। मिशनों ने भार्रतीयों को ईसार्ई धर्म में परिवर्तन करने क प्रयन्न कियार्। शिक्षार्विदों ने देशी जनतार् के दृष्टिकोण में इच्छार् परिवर्तन लार्ने हेतु शिक्षार् प्रसार्र के लिए प्रयन्न किए। भार्रत में अंग्रेज समुदार्य ने भी देश के विभिन्न भार्गों में लोगों को अलग-अलग तरह से प्रभार्वित कियार्। ब्रिटिश शार्सन के कुछ ठोस परिणार्मों में रार्ष्टींय चेतनार् क प्रार्दुर्भार्व, संगठन के महत्व को समझनार्, और इसके पश्चार्त् आन्दोलन के महत्व को समझकर 1885 में भार्रतीय रार्ष्टींय कांग्रेस की स्थार्पनार् हुई। के. एम. पणिकर के अनुसार्र, फ्ब्रिटिश शार्सन की सबसे अधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि भार्रत क एकीकरण थार्। भार्रतीय लोगों के हित को ध्यार्न में रखकर ब्रिटिश शार्सन ने ऐसार् जार्नबूझकर नहीं कियार्। वार्स्तव में उनकी रुचि पूरे भार्रत में अपने शार्सन के प्रसार्र और उसको दृढ़ करने में थी। पश्चिमी शिक्षार्, यार्तार्यार्त और संचार्र के सार्धन, प्रौद्योगिकी और न्यार्यपार्लिक के प्रार्रम्भ करने में भी ब्रिटिश शार्सन क स्वयं क हित प्रमुख थार्।

योगेन्द्र सिंह के मतार्नुसार्र, पश्चिम के सार्थ भार्रतीय (हिन्दू) परम्परार् क सम्पर्क भिन्न और मौलिक समार्जशार्स्त्रीय महत्व क थार्। ऐतिहार्सिक दृष्टि से यह सम्पर्क एक पूर्व-आधुनिक और आधुनिकीकृत सार्ंस्कृति व्यवस्थार् के बीच क थार्। पश्चिमी परम्परार् में तर्कणार्वार्द, समार्नतार् और स्वतंत्रतार् पर आधार्रित वैज्ञार्निक और प्रौद्योगिक विश्व-दृष्टि पार्ई जार्ती थी। परिणार्मस्वरूप भार्रतीय परम्परार्, जिसमें पहले ही एक प्रकार क बिगार्ड़ आ गयार् थार्, खुली उदार्र, समार्नतार्वार्दी और मार्नवतार्वार्दी बनी। इस प्रकार पश्चिमी (ब्रिटिश) परम्परार् भार्रतीय परम्परार् के सार्मने एक चुनौती बनकर आई। सोपार्न, जो एक जार्ति समूह में जन्म पर आधार्रित सार्मार्जिक सोपार्न क सिद्धार्ंत थार्, और सार्कल्यवार्द जो विभिन्न समूहों को प्रदन प्रकार्यो और कर्नव्यों के सम्पन्न करने के मार्नकों पर आधार्रित भिन्न-भिन्न जार्ति समूहों के बीच सार्वयवी अन्तर्निर्भरतार् थार्, पश्चिमी परम्परार् द्वार्रार् बहुत प्रभार्वित हुए।

पश्चिमीकरण

एम. एन. श्रीनिवार्स के अनुसार्र पश्चिमीकरण वह परिवर्तन है जो भार्रत में ब्रिटिश शार्सन के प्रभार्व के कारण आयार् है। यह परिवर्तन तकनीक, वेशभूषार्, खार्न-पार्न और लोगों की आदतों और जीवन शैलियों आदि में दिखार्ई देतार् है। तीन स्तरों पर पश्चिमीकरण की प्रक्रियार् काम करती है: (1) प्रार्थ्मिक, (2) द्वितीयक और (3) तृतीयक। प्रार्थमिक स्तर पर कुछ लोग थे जो पश्चिमी संस्कृति के सार्थ सम्पर्क में आए, और इससे लार्भार्न्वित होने वार्लों में भी प्रथम थे। द्वितीयक स्तर के पश्चिमीकरण क अभिप्रार्य भार्रतीय समार्ज के उन वर्गो से है जो प्रथम लार्भ भोगियों के सार्थ प्रन्यक्ष सम्पर्क में आए। तृतीयक स्तर पर वे लोग हैं जो ब्रिटिश द्वार्रार् शुरू की गई तरकीबों के बार्रे में अप्रन्यक्ष रूप से जार्नकारी प्रार्प्त कर पार्ए। इस प्रकार पश्चिमीकरण की प्रक्रियार् के तीन स्तर हैं। भार्रतीय समार्ज के विभिन्न अनुभार्गों में इस प्रक्रियार् क प्रसार्र असमार्न और असमार्नतार्वार्दी भी रहार् है। यद्यपि श्रीनिवार्स ने इस प्रक्रियार् की अच्छार्इयों में मार्नवतार्वार्द और समतार्वार्द क उल्लेख कियार् है परन्तु अन्य विद्वार्नों के अनुसार्र पश्चिमीकरण सार्ंस्कृतिक और ज्ञार्नार्त्मक उपनिवेशवार्द की प्रक्रियार् है, और वैयक्तिक असार्ंस्कृतिक और असावभौम रार्ज्य क एक नमूनार् है।

पश्चिमीकरण ने नए आधार्रों पर एक अखिल-भार्रतीय संस्कृति के पुन:प्रार्दुर्भार्व में योगदार्न दियार् है। पश्चिमीकरण क प्रभार्व शिक्षार्, कानून, विज्ञार्न और तकनीकी रार्जनीतिकरण के नए प्रकारों, नगरीकरण औद्योगीकरण, प्रेस और यार्तार्यार्त और संचार्र के सार्धनों के क्षेत्रों में हुआ है। इन संस्थार्पक केन्द्रों के प्रार्दुर्भार्व को योगेन्द्र सिंह ने सार्ंस्कृतिक आधुनिकीकरण की प्रक्रियार् की संज्ञार् दी है। पश्चिमी प्रभार्व द्वार्रार्, आधुनिकीकरण की एक महार्न् परम्परार् उत्पन्न हुई है। निश्चय ही, इसके कारण देशष परम्परार् और पश्चिमी परम्परार् के बीच संघर्ष की समस्यार् बन गई है। भार्रतीय समार्ज के अभिजार्त अनुभार्गों के सन्दर्भ में इन दोनों परम्परार्ओं में संश्लेषण पार्यार् जार्तार् है।

आरम्भिक अवस्थार् में पश्चिमी प्रभार्व परिधीय और स्थार्नीकृत थार् क्योंकि यह कोलकातार्, बम्बई और मद्रार्स शहरों में मध्यम वर्गीय लोगों तक सीमित रहार्। शैक्षिक संस्थार्एं भी इन तीन शहरों में केन्द्रित थीं। अंग्रेजी शिक्षार् क दोहरार् प्रभार्व पड़ार्: (1) शिक्षित लोगों में पश्चिमी मूल्यों और विचार्रधार्रार्ओं क अंतर्निवेशन, (2) सार्मार्जिक और सार्ंस्कृतिक सुधार्र आन्दोलनों क आरोह। सुधार्र आन्दोलनों के बार्रे में हम एक अन्य अमयार्य में चर्चार् करेंगे। शिक्षार् भी उच्च और मध्यम वर्गीय शहरी लोगों तक सीमित थी। ब्रिटिश शार्सन ने एक नई चेतनार् और मूल्यों की संरचनार् की रचनार् की। योगेन्द्र सिंह के अनुसार्र पश्चिमीकरण के प्रभार्व हैं:

  1. एक सर्वव्यार्पी विधि अधि-संरचनार् क विकास
  2. शिक्षार् प्रसार्र
  3. नगरीकरण और औद्योगीकरण
  4. संचार्र क वृहद् जार्ल
  5. रार्ष्टींयवार्द क विकास और समार्ज क रार्जनीतिकरण।

सम्पूर्ण देश में इन तन्वों से आधुनिकीकरण में योगदार्न प्रार्प्त हुआ। न्यार्यपार्लिका, न्यार्यार्लय, कानून (बार्ल विवार्ह, बार्ल हन्यार् और सती इन्यार्दि को रोकने के लिए), विधि आयोग बनार्ए गए और विवार्ह, परिवार्र, तलार्क, दनकग्रहण, सम्पत्ति हस्तार्न्तरण, अल्पसंख्यक, भूमि अधिकार, लेन-देन, व्यार्पार्र, उद्योग और श्रम आदि के बार्रे में नए कानून लार्गू किए।

शिक्षार् पर प्रभार्व

अंग्रेजी शिक्षार् और भार्षार् को बढ़ार्वार् देने के लिए 1835 की मैकाले की नीति, शिक्षार् के प्रसार्र में मिशनों की भूमिक और 1882 क प्रथम शिक्षार् आयोग ब्रिटिश काल की मुख्य विशेषतार्एं हैं। ब्रिटिश नीति के अन्र्तगत उच्च शिक्षार् पर अधिक बल दियार् गयार् थार्। प्रार्थमिक और द्वितीयक स्तरों पर शिक्षार् की अवहेलनार् की गई थी। पार्ठयक्रम सार्मग्री और शिक्षण संस्थार्ओं के प्रबंध के स्नदर्भ में आज भी भार्रत ब्रिटिश नमूने क अनुकरण कर रहार् है। 1948 और 1964 के शिक्षार् आयोगों ने जो क्रमश: डार्. रार्स. रार्धार्कृष्णन और डार्. डी. एस. कोठार्री की अध्यक्षतार् में बने थे, इच्छित फलपूर्ति नहीं की है। लेकिन पिछले कुछ वर्षो के दौरार्न कुछ विश्वविद्यार्लयों में समार्ज विज्ञार्नों और मार्नविकी में पार्ठयक्रम क देशीकरण कियार् गयार् है।

भार्रत में नगरीकरण और औद्योगीकरण प्रार्य: सहवर्ती हैं। अनेक अध्ययनों से ज्ञार्त हुआ है कि ये दोनों प्रक्रियार्एं को सबल करती हैं। विकसित देशों की तुलनार् में भार्रत में नगरीकरण एक धीमी प्रक्रियार् है। पिफर भी नगरीय जनसंख्यार् में वृण् िहै। शहरों में सभी प्रमुख संसार्धनार्न्मक सुविधार्ओं और उच्च प्रशिक्षित व्यवसार्यियों क केन्द्रीकरण पार्यार् जार्तार् हैं यह प्रक्रियार् विभिन्न शहरों और क्षेत्रों में असमार्न रही है, और यही बार्त औद्योगीकरण के बार्रे में लार्गू होती है। भूतकाल में औद्योगीकरण के तीव्र विकास में अनेक संस्थार्न्मक कारक बार्धक रहे हैं। रिचाड लैम्बर्ट, मिल्टन सिंगर और एन. आर. सेठ के अध्ययनों से पतार् चलतार् है कि जार्ति, संयुक्त परिवार्र और अन्य परम्परार्त्मक मूल्य कारखार्नों और औद्योगिक संगठनों में सार्मार्जिक संबंधों के स्वस्थ प्रतिमार्न में बार्धित नहीं हुए हैं।

यार्तार्यार्त संचार्र के सार्धनों से वार्स्तव में नए सार्मार्जिक और सार्ंस्कृतिक सम्पर्को के युग क सूत्रपार्त हुआ है। नए समार्चार्र पत्र और विशेषकर क्षेत्रीय भार्षार्ओं में, डार्क सेवार्एं, चलचित्र और रेडियो आदि सभी ब्रिटिश द्वार्रार् प्रार्रम्भ किए थे। यही बार्त रेलवे, और हवार्ई यार्तार्यार्त के बार्रे में सही है। इन नई युक्तियों ने जार्ति, पवित्र-अपवित्र की अक्रमार्रणार्ओं और प्रवसन में आने वार्ली कठिनार्इयों को कमजोर बनार्यार्। नि:संकोच स्थार्निक गतिशीलतार् इन सार्मार्नों की उपलब्धि के कारण अवश्य बढ़ी, परन्तु फ्मार्नसिक गतिशीलतार्, की जीवन क एक भार्ग बन गई। अंत में कह सकते हैं कि ब्रिटिश शार्सन के परिणार्मत: रार्ष्टींय और सार्मार्जिक चेतनार् आई। रार्जार् रार्ममोहन रार्य और महार्न्मार् गार्ंधी ने ब्रिटिश परम्परार् के अनेक मार्नवतार्वार्दी तन्वों को अपनार्यार् और उनको रार्ष्टींय भार्वनार्ओं तथार् रार्जनैतिक चेतनार् को उभार्रने के लिए उपयोग में लियार्। पश्चिमी दाशनिकों के सार्म्प्रदार्यिकतार्, धर्मनिरपेक्षवार्द और रार्ष्टंवार्द के विचार्र बहुत लार्भदार्यक सिद्ध हुए।

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