भार्रतीय संविधार्न के द्वार्रार् भार्रत के नार्गरिकों के मौलिक अधिकार

भार्रतीय संविधार्न के द्वार्रार् भार्रत के नार्गरिकों के मौलिक अधिकार

भार्रतीय संविधार्न के द्वार्रार् भार्रत के नार्गरिकों को 6 प्रकार के मौलिक अधिकार दिए गए है: वे है:

समार्नतार् क अधिकार (Right to Equality-Article 14 to 18)

समार्नतार् क अधिकार प्रजार्तन्त्र क आधार्र स्तम्भ है, अत: भार्रतीय संविधार्न द्वार्रार् सभी व्यक्तियों को कानून के समक्ष समार्नतार्, रार्ज्य के अधीन नौकरियों क समार्न अवसर और सार्मार्जिक समार्नतार् प्रदार्न की गयी है एवं समार्नतार् की स्थार्पनार् के लिए उपार्िध्यों क निषेध कियार् गयार् है।


  1. कानून के समक्ष समार्नतार् (अनुच्छेद 14) – अनुच्छेद 14 के अनुसार्र भार्रत के रार्ज्य क्षेत्र में रार्ज्य किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समार्नतार् यार् कानून के समार्न संरक्षण से वंचित नहीं रहेगार्। अनुच्छेद के प्रथम भार्ग के शब्द ‘कानून के समक्ष समार्नतार्’ ब्रिटिश सार्मार्न्य विधि की देन है और इसके द्वार्रार् रार्ज्य पर यह बन्धन लगार्यार् गयार् है कि वह सभी व्यक्तियों के लिए एक-सार् कानून बनार्येगार् तथार् उन्हें एक समार्न लार्गू करेगार्। सर आइवर जैनिंम्ज के अनुसार्र इसक अर्थ यह है कि फ्समार्न परिस्थितियों में सभी व्यक्तियों के सार्थ कानून क व्यवहार्र एक-सार् होनार् चार्हिए। कानून क समार्न संरक्षण’, यह वार्क्य अमरीकी संविधार्न से लियार् गयार् है और इसक तार्त्पर्य यह है कि अपने अधिकारों की रक्षार् के लिए प्रत्येक व्यक्ति समार्न रूप से न्यार्यार्लय की शरण ले सकतार् है। कानून के समक्ष समार्नतार् क तार्त्पर्य यह नहीं है कि औचित्यपूर्ण आधार्र पर और कानून द्वार्रार् मार्न्य किसी भेदभार्व की भी व्यवस्थार् नहीं की जार् सकती है। यदि कानून कर लगार्ने के सम्बन्ध में धनी और गरीब में और सुविधएँ प्रदार्न करने में स्त्रियों और पुरुषों में भेद करतार् है तो इसे कानून के समक्ष समार्नतार् क उल्लंघन नहीं कहार् जार् सकतार्।
  2. धर्म, नस्ल, जार्ति, लिंग, यार् जन्म स्थार्न के आधार्र पर भेदभार्व क निषेध (अनुच्छेद 15) – कानून के समक्ष समार्नतार् के सार्थ-सार्थ अनुच्छेद 15 में कहार् गयार् है कि फ्रार्ज्य के द्वार्रार् धर्म, मूलवंश, जार्ति, लिंग, जन्म स्थार्न आदि के आधार्र पर नार्गरिकों के प्रति जीवन के किसी क्षेत्र में भेद-भार्व नहीं कियार् जार्येगार्। कानून के द्वार्रार् निश्चित कियार् गयार् है कि सब नार्गरिकों के सार्थ दुकानों, होटलों तथार् सावजनिक स्थार्नों-जैसे कुओं, तार्लार्बों स्नार्नगृहों, सड़कों आदि पर किसी भी प्रकार क भेद-भार्व नहीं कियार् जार्येगार्।
  3. रार्ज्य के अधीन नौकरियों क समार्न अवसर (अनुच्छेद 16) – अनुच्छेद 16 के अनुसार्र, फ्सब नार्गरिकों को सरकारी पदों पर नियुक्ति के समार्न अवसर प्रार्प्त होंगे और इस सम्बन्ध में केवल धर्म, मूलवंश, जार्ति लिंग यार् जन्म स्थार्न यार् इनमें से किसी के आधार्र पर सरकारी नौकरी यार् पद प्रदार्न करने में भेद-भार्व नहीं कियार् जार्येगार्। इसके अन्तर्गत रार्ज्य को यह अधिकार है कि वह रार्जकीय सेवार्ओं के लिए आवश्यक योग्यतार्एँ निर्धार्रित कर दे। संसद कानून द्वार्रार् संघ में सम्मिलित रार्ज्यों को अधिकार दे सकती है कि वे उस पद के उम्मीदवार्र के लिए उस रार्ज्य क निवार्सी होनार् आवश्यक ठहरार् दें। इसी प्रकार सेवार्ओं में पिछड़े हुए वर्गों के लिए भी स्थार्न सुरक्षित रखे जार् सकते हैं।
  4. अस्पृश्यतार् क निषेध (अनुच्छेद 17) – सार्मार्जिक समार्नतार् को और अधिक पूर्णतार् देने के लिए अस्पृश्यतार् क निषेध कियार् गयार् है। अनुच्छेद 17 में कहार् गयार् है कि फ्अस्पृश्यतार् से उत्पन्न किसी अयोग्यतार् को लार्गू करनार् एक दण्डनीय अपरार्ध होगार्। हिन्दू समार्ज से अस्पृश्यतार् के विष को समार्प्त करने के लिए संसद के द्वार्रार् 1955 ई. में ‘अस्पृश्यतार् अपरार्ध अधिनियम’ (Untouchability offences Act) पार्रित कियार् गयार् है जो पूरे भार्रत पर लार्गू होतार् है। इस कानून के अनुसार्र अस्पृश्यतार् एक दण्डनीय अपरार्ध घोषित कियार् गयार् है।
  5. उपार्धियों क निषेध (अनुच्छेद 18) – ब्रिटिश शार्सन काल में सम्पत्ति आदि के आधार्र पर उपार्धियार्ँ प्रदार्न की जार्ती थीं, जो सार्मार्जिक जीवन में भेद उत्पन्न करती थीं, अत: नवीन संविधार्न में इनक निषेध कर दियार् गयार् है। अनुच्छेद 18 में व्यवस्थार् की गयी है कि फ्सेनार् अथवार् विद्यार् सम्बन्ध्ी उपार्धियों के अलार्वार् रार्ज्य अन्य कोई उपार्धियार्ँ प्रदार्न नहीं कर सकतार्। इसके सार्थ ही भार्रतवर्ष क कोई नार्गरिक बिनार् रार्ष्ट्रपति की आज्ञार् के विदेशी रार्ज्य से भी कोई उपार्धि स्वीकार नहीं कर सकतार्।

स्वतन्त्रतार् क अधिकार

भार्रतीय संविधार्न क उद्देश्य विचार्र, अभिव्यक्ति, विश्वार्स, धर्म और उपार्सनार् की स्वतंत्रतार् सुनिश्चित करनार् है, अत: संविधार्न के द्वार्रार् नार्गरिकों को विविध स्वतन्त्रतार्एँ प्रदार्न की गयी हैं। इस सम्बन्ध में अनुच्छेद 19 सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। यह अधिकार नार्गरिकों को 6 स्वतन्त्रतार्एँ प्रदार्न करतार् हैं:

(i) धार्रार् 19 के द्वार्रार् भार्रतीय नार्गरिकों को 7 स्वतन्त्रतार्एँ प्रदार्न की गई थीं, जिसमें छठी स्ततन्त्रतार्, सम्पत्ति प्रार्प्त करने तथार् उसे बेचने की स्वतन्त्रतार् थी। परन्तु 44वें संशोधन द्वार्रार् सम्पत्ति के अधिकार के सार्थ-सार्थ ‘सम्पत्ति की स्वतन्त्रतार्’ भी समार्प्त कर दी गई है और इस प्रकार अब धार्रार् 19 के अन्तर्गत नार्गरिकों को छ: स्वतन्त्रतार्एँ ही प्रार्प्त हैं, जो इस प्रकार हैं-

  1. भार्षण देने तथार् विचार्र प्रकट करने की स्वतन्त्रतार् (Right to Freedom of Speech and Expression)।
  2. शार्न्तिपूर्वक तथार् बिनार् शस्त्रों के इकट्ठार् होने की स्वतन्त्रतार् (Freedom to assemble peacefully and without arms)।
  3. संघ बनार्ने क अधिकार (Freedom to form Associations)।
  4. भार्रत रार्ज्य के क्षेत्र में भ्रमण करने क अधिकार (Freedom to move freely throughout the territory of India)।
  5. भार्रत के किसी भार्ग में रहने यार् निवार्स करने की स्वतन्त्रतार् (Freedom to reside and settle in any part of the territory of India)।
  6. कोई भी व्यवसार्य करने, पेशार् अपनार्ने यार् व्यार्पार्र करने क अधिकार (Freedom to practise any profession or to carry on any occupation, trade or business)। धार्रार् 20 से 22 तक ने नार्गरिकों को व्यक्तिगत स्वतन्त्रतार् प्रदार्न की गई है। ब्रिटेन में व्यक्तिगत स्वतन्त्रतार् क आधार्र कानून क शार्सन है। यही सिद्वार्न्त भार्रत में भी अपनार्यार् गयार् है।

(ii) (a) धार्रार् 20 के अनुसार्र किसी भी व्यक्ति को सजार् उस समय में प्रचलित कानून के अनुसार्र ही दी जार् सकती है। (b) धार्रार् 20 के अनुसार्र किसी भी व्यक्ति को एक अपरार्ध के लिए दो बार्र सजार् नहीं दी जार् सकती है। (c) धार्रार् 20 के अनुसार्र किसी भी व्यक्ति को अपने विरुद्व गवार्ही देने के लिए विवश नहीं कियार् जार् सकतार्।

(iii) धार्रार् 21 के अनुसार्र कानून द्वार्रार् स्थार्पित पद्धति (Procedure Established by Law) के बिनार् किसी व्यक्ति को उसके जीवन और उसकी व्यक्तिगत स्वतन्त्रतार् से वंचित नहीं कियार् जार्एगार्। (a) किसी भी व्यक्ति को उसक अपरार्ध बतार्ए बिनार् गिरफ्रतार्र नहीं कियार् जार् सकतार्। (b) गिरफ्रतार्र किये गए व्यक्ति को 24 घंटे के अन्दर मजिस्ट्रेट के सार्मने पेश करनार् आवश्यक है। (c) बिनार् मजिस्टे्रट की आज्ञार् के बन्दी को जेल में नहीं रखार् जार् सकतार्। (d) बन्दी को कानूनी सलार्ह प्रार्प्त करने क पूरार् अधिकार है।

शोषण के विरुद्ध अधिकार

संविधार्न के 23 तथार् 24वें अनुच्छेदों में नार्गरिकों के लिए शोषण के विरुद्व अधिकारों क उल्लेख कियार् गयार् है। इस अधिकार क यह लक्ष्य है कि समार्ज क कोई भी शक्तिशार्ली व्यक्ति किसी कमजोर व्यक्ति के सार्थ अन्यार्य न कर सके।

  1. धार्रार् 23 के अनुसार्र मनुष्यों क व्यार्पार्र, उनसे बेगार्र तथार् इच्छार् के विरुद्व काम करवार्ने की मनार्ही कर दी गई है और जो इस व्यवस्थार् क किसी प्रकार से उल्लंघन करेगार्, उसे कानून के अनुसार्र दण्डनीय अपरार्ध समझार् जार्एगार्।
  2. धार्रार् 24 के अनुसार्र 14 वर्ष से कम आयु वार्ले बार्लक को किसी भी कारखार्ने अथवार् खार्न में नौकर नहीं रखार् जार्एगार्। न ही किसी अन्य संकटमयी नौकरी में लगार्यार् जार्एगार्। इसक अभिप्रार्य यह है कि बच्चों को काम में लगार्ने की बजार्ए उनको शिक्षार् दी जार्ए। इसीलिए भार्रतीय संविधार्न के अध्यार्य 4 में निर्देशक सिद्वार्ंतों के द्वार्रार् रार्ज्यों को यह निर्देश दियार् गयार् है कि वह 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए अनिवाय और नि:शुल्क शिक्षार् क प्रबन्ध करें शिक्षार् के अधिकार (Right to Education) अधिनियम को भी इसी लिए बनार्यार् गयार् है।

धामिक स्वतन्त्रतार् क अधिकार

संविधार्न के अगले 4 अनुच्छेदों (25 से 28) में भार्रत को एक धर्म-निरपेक्ष रार्ज्य बनार्ने की व्यवस्थार् की गई है। संविधार्न-निर्मार्तार्ओं ने अनुच्छेद 15 तथार् 16 में दिए इस अब अधिकार के सार्थ 42वें संशोधन के द्वार्रार् धर्म-निरपेक्ष शब्द को संविधार्न की प्रस्तार्वनार् में जोड़ दियार् गयार् है।

  1. किसी भी धर्म को मार्नने की स्वतन्त्रतार् – अनुच्छेद 25 में यह व्यवस्थार् की गई है कि भार्रत में सभी नार्गरिकों को किसी भी धर्म की मार्नने, उसक अनुयार्यी बनने तथार् उसक प्रचार्र करने क अधिकार है।
  2. धामिक कार्य क प्रबंधन करने की स्वतन्त्रतार् – अनुच्छेद 26 द्वार्रार् सभी धामिक सम्प्रदार्यों को धामिक एवं परोपकारी उद्देश्यों के लिए संस्थार्एँ स्थार्पित करने उनसे सम्बन्धित विषयों क संचार्लन करने, चल तथार् अचल सम्पत्ति खरीदने तथार् कानून के अनुसार्र उनक प्रबंधन चलार्ने क अधिकार दियार् गयार् है।
  3. धर्म के प्रचार्र के लिए कर न देने की स्वतन्त्रतार् – अनुच्छेद 27 में यह निर्धार्रित कियार् गयार् है। कि किसी भी धर्म के प्रचार्र के लिए किसी व्यक्ति को कोई कर देने पर विवश नहीं कियार् जार्येगार्।
  4. शिक्षार् संस्थार्ओं में धामिक शिक्षार् न दिए जार्ने की रोक – अनुच्छेद 28 द्वार्रार् यह व्यवस्थार् की गई है कि रार्ज्य द्वार्रार् वित्तीय सहार्यतार् प्रार्प्त किसी भी संस्थार् में धामिक शिक्षार् नहीं दी जार् सकती। परन्तु इसके अधीन वे संस्थार्एँ नहीं आतीं जिनकी स्थार्पनार् किसी ट्रस्ट द्वार्रार् धर्म के प्रचार्र के लिए की गई हो, चार्हे उसक प्रशार्सन रार्ज्य ही चलार्तार् हो। इसी अनुच्छेद में यह भी स्पष्ट कियार् गयार् है कि रार्ज्य द्वार्रार् जिन संस्थार्ओं को अनुदार्न (Grants) दियार् जार्तार् है, उनमें किसी व्यक्ति को धामिक समार्रोह में शार्मिल होने अथवार् धामिक शिक्षार् ग्रहण करने पर विवश नहीं कियार् जार् सकतार्।

सार्ंस्कृतिक तथार् शिक्षार् संम्बधी अधिकार

सार्ंस्कृतिक तथार् शिक्षार् सम्बन्धी अधिकारों क उल्लेख संविधार्न की 29 व 30 अनुच्छेदों में कियार् गयार् है। इनके अनुसार्र भार्रत में निवार्स करने वार्ले अल्पमतों के हितों की सुरक्षार् की उचित व्यवस्थार् की गई है तार्कि वे अपनी संस्कृति तथार् भार्षार् के आधार्र पर अपनार् विकास कर सवेंफ।

  1. अनुच्छेद 29 के अनुसार्र, भार्रत के किसी भी क्षेत्र में रहने वार्ले नार्गरिकों के हर वर्ग यार् उसके भार्ग को, जिनकी अपनी भार्षार्, लिपि अथवार् संस्कृति हो, उसे यह अधिकार है कि वह उनकी उनकी रक्षार् करे।
  2. अनुच्छेद 29 के अनुसार्र, किसी भी नार्गरिक को रार्ज्य द्वार्रार् यार् उसकी सहार्यतार् से चलार्यी जार्ने वार्ली शिक्षार् संस्थार् में प्रवेश देने से धर्म, जार्ति, वंश, भार्षार् यार् इनमें किसी के आधार्र पर इनकार नहीं कियार् जार् सकतार्।
  3. अनुच्छेद 30 के अनुसार्र, सभी अल्पसंख्यकों को चार्हे वे धर्म पर आधार्रित हों यार् भार्षार् पर यह अधिकार प्रार्प्त है कि वे अपनी इच्छार्नुसार्र शिक्षार् संस्थार्ओं की स्थार्पनार् करें तथार् उनक प्रबन्ध करें।
  4. अनुच्छेद 30 के अनुसार्र, रार्ज्य द्वार्रार् सहार्यतार् देते समय शिक्षार् संस्थार्ओं के प्रति इस आधार्र पर कोई भेदभार्व नहीं होगार् कि वह अल्पसंख्यकों के प्रबन्ध के अधीन है, चार्हे वह अल्पसंख्यक भार्षार् के आधार्र पर यार् धर्म के आधार्र पर क्यों न हो। 44 वें संशोधन द्वार्रार् यह व्यवस्थार् की गई है कि रार्ज्य अल्पसंख्यकों द्वार्रार् स्थार्पित व चलार्ई जार् रही शिक्षार् संस्थार्ओं की सम्पत्ति को अनिवाय रूप से लेने के लिए कानून क निर्मार्ण करते समय इस बार्त क ध्यार्न रखेगार् कि कानून के द्वार्रार् निर्धार्रित की गई रकमों से अल्पसंख्यकों के अधिकार पर कोई प्रभार्व नहीं पड़ेगार्। यह परिवर्तन इसलिए करनार् पड़ार्, क्योंकि 44वें संशोधन के द्वार्रार् अनुच्छेद 31 को हटार्कर सम्पत्ति क अधिकार समार्प्त कर दियार् गयार् है। अब सम्पत्ति क अधिकार केवल कानूनी अधिकार है।

संवैधार्निक उपचार्रों क अधिकार

संविधार्न में मौलिक अधिकारों के उल्लेख से अधिक महत्त्वपूर्ण बार्त उन्हें क्रियार्न्वित करने की व्यवस्थार् है, जिसके बिनार् मौलिक अधिकार अर्थहीन सिद्व हो जार्ते। संविधार्न निर्मार्तार्ओं ने इस उद्देश्य से संवैधार्निक उपचार्रों के अधिकार को भी संविधार्न में स्थार्न दियार् है, जिसक तार्त्पर्य यह है कि नार्गरिक अधिकारों को लार्गू करने के लिए सर्वोच्च न्यार्यार्लय तथार् उच्च न्यार्यार्लयों की शरण ले सकते हैं। इन न्यार्यार्लयों के द्वार्रार् व्यवस्थार्पिक द्वार्रार् निर्मित उन सभी कानूनों और कार्यपार्लिक के उन कार्यों को अवैधार्निक घोषित कर दियार् जार्येगार् जो अधिकारों के विरुद्व हों। संवैधार्निक उपचार्रों के अधिकारों की व्यवस्थार् के महत्त्व को दृष्टि में रखते हुए डार्. अम्बेडकर ने कहार् थार्, फ्यदि कोई मुझसे यह पूछे कि संविधार्न क वह कौन-सार् अनुच्छेद है जिसके बिनार् संविधार्न शून्यप्रार्य हो जार्येगार्, तो इस अनुच्छेद (अनुच्छेद 32) को छोड़कर मैं और किसी अनुच्छेद की ओर संकेत नहीं कर सकतार्। यह तो संविधार्न क हृदय तथार् आत्मार् है। भूतपूर्व मुख्य न्यार्यार्धीश रार्जेन्द्र गडकर ने इसे ‘भार्रतीय संविधार्न क सबसे प्रमुख लक्षण’ और संविधार्न द्वार्रार् स्थार्पित ‘प्रजार्तार्न्त्रिक भवन की आधार्रशिलार्’ कहार् है।

सर्वोच्च न्यार्यार्लय और उच्च न्यार्यार्लयों के द्वार्रार् नार्गरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षार् के लिए पार्ँच प्रकार के लेख जार्री किये जार् सकते हैं-

  1. बन्दी प्रत्यक्षीकरण – व्यक्तिगत स्वतन्त्रतार् के लिए यह लेख सर्वार्धिक महत्त्वपूर्ण है। यह उस व्यक्ति की प्राथनार् पर जार्री कियार् जार्तार् है जो यह समझतार् है कि उसे अवैध रूप से बन्दी बनार्यार् गयार् है। इसके द्वार्रार् न्यार्यार्लय, बन्दीकरण करने वार्ले अधिकारी को आदेश देतार् है कि वह बन्दी बनार्ये गये व्यक्ति को निश्चित समय और स्थार्न पर उपस्थित करे, जिससे न्यार्यार्लय बन्दी बनार्ये जार्ने के कारणों पर विचार्र कर सके। दोनों पक्षों की बार्त सुनकर न्यार्यार्लय इस बार्त क निर्णय करतार् है कि नजरबन्दी वैध है यार् अवैध, और यदि अवैध होती है तो न्यार्यार्लय बन्दी को पफौरन मुक्त करने की आज्ञार् देतार् है। इस प्रकार अनुचित एवं गैरकानूनी रूप से बन्दी बनार्ये गये व्यक्ति बन्दी प्रत्यक्षीकरण के लेख के आधार्र पर स्वतन्त्रतार् प्रार्प्त कर सकते हैं।
  2. परमार्देश – परमार्देश क लेख उस समय जार्री कियार् जार्तार् है जब कोई पदार्धिकारी अपने सावजनिक कर्त्तव्य क निर्वार्ह नहीं करतार्। इस प्रकार के आज्ञार् पत्र के आधार्र पर पदार्धिकारी को उसके कर्त्तव्य पार्लन क आदेश जार्री कियार् जार्तार् है।
  3. उत्प्रेषण – यह आज्ञार्पत्र अधिकांशत: किसी विवार्द को निम्न न्यार्यार्लय से उच्च न्यार्यार्लय में भेजने के लिए जार्री कियार् जार्तार् है, जिससे वह अपनी शक्ति से अधिक अधिकारों क उपभोग न करे यार् अपनी शक्ति क दुरुपयोग करते हुए न्यार्य के प्रार्कृतिक सिद्वार्न्तों को भंग न करे। इस आज्ञार्पत्र के आधार्र पर उच्च न्यार्यार्लय निम्न न्यार्यार्लयों से किन्हीं विवार्दों के सम्बन्ध में सूचनार् भी प्रार्प्त कर सकते हैं।
  4. प्रतिषेध – इस आज्ञार्पत्र के द्वार्रार् सर्वोच्च न्यार्यार्लय तथार् उच्च न्यार्यार्लयों द्वार्रार् निम्न न्यार्यार्लयों तथार् अर्ध-न्यार्यिक न्यार्यार्धिकरणों को जार्री करते हुए यह आदेश दियार् जार्तार् है कि वे मार्मले में अपने यहार्ँ कार्यवार्ही स्थगित कर दें, क्योंकि यह मार्मलार् उसके अधिकार क्षेत्र के बार्हर है।
  5. अधिकार पृच्छार् – जब कोई व्यक्ति ऐसे पदार्धिकारी के रूप में कार्य करने लगतार् है, जिसके रूप में कार्य करने क उसे वैधार्निक रूप से अधिकार नहीं है तो न्यार्यार्लय अधिकार पृच्छार् के आदेश द्वार्रार् उस व्यक्ति से पूछतार् है कि वह किस आधार्र पर इस पद पर कार्य कर रहार् है और जब तक वह इस प्रश्न क सन्तोषजनक उत्तर नहीं देतार्, वह कार्य नहीं कर सकतार्।

व्यक्तियों के द्वार्रार् सार्मार्न्य परिस्थितियों में ही न्यार्यार्लयों की शरण लेकर अपने मौलिक अधिकारों की रक्षार् की जार् सकती है, लेकिन युद्व , बार्हरी आक्रमण यार् आन्तरिक अशार्न्ति जैसी परिस्थितियों में, जबकि रार्ष्ट्रपति के द्वार्रार् संकटकाल की घोषणार् कर दी गयी हो, मौलिक अधिकारों की रक्षार् के लिए कोई व्यक्ति किसी न्यार्यार्लय से प्राथनार् नहीं कर सकेगार्। इस प्रकार संविधार्न के द्वार्रार् संकट काल में नार्गरिकों के मौलिक अधिकारों को निलम्बिक करने की व्यवस्थार् की गयी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *