भार्रतीय संविधार्न की प्रस्तार्वनार् एवं विशेषतार्एं

‘‘प्रस्तार्वनार् भार्रतीय संविधार्न क सबसे बहुमूल्य अंग है, यह संविधार्न की आत्मार् है, यह संविधार्न की कुंजी है यह वह उचित मार्पदण्ड है, जिसमें संविधार्न की सहजतार् नार्पी जार्ती है, यह स्वयं में पूर्ण है। हम चार्हेंगे कि संविधार्न के सभी उपबन्धों को इसी प्रस्तार्वनार् की कसौटी से जार्ंचनार् चार्हिए और तभी यह निर्णय करनार् चार्हिए कि संविधार्न अच्छार् है यार् बूरार्।’’

भार्रतीय संविधार्न की रचनार् एक संविधार्न सभार् द्वार्रार् हुर्इ है। यह सभार् एक अप्रत्यक्ष रूप से निर्वार्चित संस्थार् थी। इस सभार् ने भार्रतीय संविधार्न में शार्मिल किए जार्ने हेतु कुछ आदर्श सुनिश्चित किए। ये आदर्श थे- लोकतंत्र के प्रति कटिबद्धतार्, सभी भार्रतवार्सियों के लिए न्यार्य, समार्नतार् तथार् स्वतंत्रतार् की गार्रंटी। इस सभार् के द्वार्रार् यह भी घोषणार् की गर्इ कि भार्रत एक प्रभुसत्तार् संपन्न लोकतार्ंत्रिक गणरार्ज्य होगार्। भार्रतीय संविधार्न क प्रार्रंभ एक प्रस्तार्वनार् के सार्थ होतार् है। प्रस्तार्वनार् के अंतर्गत संविधार्न के आदर्श, उद्देश्य तथार् मुख्य सिद्धार्ंतों क उल्लेख है। प्रस्तार्वनार् में दिए गए उद्देश्यों से ही प्रत्यक्ष तथार् अप्रत्यक्ष रूप से संविधार्न की मुख्य विशेषतार्ओं क विकास हुआ है।

संविधार्न सभार् – 

भार्रत क संविधार्न एक संविधार्न सभार् द्वार्रार् निर्मित कियार् गयार् है। इस सभार् क गठन 1946 में हुआ। संविधार्न सभार् के सदस्य तत्कालीन प्रार्ंतीय विधार्न सभार्ओं के सदस्यों द्वार्रार् अप्रत्यक्ष रूप से निर्वार्चित हुए थे। इसके अतिरिक्त ऐसे सदस्य भी थे जो रियार्सतों के शार्सकों द्वार्रार् मनोनित किए गए थे। भार्रत की आजार्दी के सार्थ ही संविधार्न सभार् एक पूर्ण प्रभुसत्तार् संपन्न संस्थार् बन गर्इ। 1947 में देश के विभार्जन के पश्चार्त संविधार्न सभार् में 31 दिसंबर 1947 को 299 सदस्य थे। इनमें से 229 सदस्यों क चुनार्व प्रार्ंतीय विधार्न सभार्ओं ने कियार् थार् तथार् शेष देशी रियार्सतों के शार्सकों ने मनोनित किए थे। संविधार्न सभार् के अधिकांश सदस्य भार्रतीय रार्ष्ट्रीय कांग्रेस से थे। स्वतंत्रतार् आंदोलन सभी प्रमुख नेतार् के सदस्य सभार् के सदस्य थे।

देशी रियार्सतें – ब्रिटिश शार्सन के समय भार्रत के कुछ भार्ग सीधे ब्रिटिश नियंत्रण में नहीं थे। ऐसे लगभग 560 क्षेत्र थे। भार्तरीय रियार्सतें देशी शार्सकों के अधीन थीं। कश्मीर, हैद्ररार्बार्द, पटियार्लार्, ट्रार्वनकोर, मैसूर, बड़ौदार् आदि बड़ी देशी रियार्सतें थी।

संविधार्न सभार् की कार्य प्रणार्ली – 

संविधार्न सभार् की अध्यक्षतार् सभार् के अध्यक्ष द्वार्रार् की जार्ती थी। डार्. रार्जेन्द्र प्रसार्द इस संविधार्न सभ के अध्यक्ष के रूप में निर्वार्चित हुए। सभार् अनेकों समितियों तथार् उपसमितियों की मदद से कार्य करती थी। ये समितियार्ँ दो प्रकार की थीं – 1. कार्यविधि संबंधी 2. महत्वपूर्ण मुद्दों संबंधी।

इसके अतिरिक्त एक परामश समिति भी थी। इसमें सबसे महत्वपूण समिति प्रार्रूप समिति थी जिसके अध्यक्ष डार्. भीम रार्व अम्बेडकर थे। इस समिति क कार्य संविधार्न को लेखबद्ध करनार् थार्। संविधार्न सभार् की बैठकें 2 वर्ष 11 महिने तथार् 18 दिन के अंतरार्ल में 166 बार्र हुर्इ।

संविधार्न के उद्देश्य – 

संविधार्न सभार्, लगभग 200 वर्षों के औपनिवेशिक शार्सन, जन-आधार्रित स्वतंत्रतार् संघर्ष, रार्ष्ट्रीय आंदोलन, देश के विभार्जन, व रार्ष्ट्र-व्यार्पी सार्ंप्रदार्यिक हिंसार् की पृष्ठभूमि में स्वतंत्र भार्रत के संविधार्न क निर्मार्ण कर रही थी। इसलिए संविधार्न निर्मार्तार्, जन आकांक्षार्ओं की पूर्ति, देश की एकतार् व अखण्डतार् तथार् लोकतार्ंत्रिक समार्ज की स्थार्पनार् के प्रति सचेत थे। सभार् के अंदर भी विभिन्न विचार्रधार्रार्ओं को मार्नने वार्ले सदस्य थे। कुछ सदस्यों क झुकाव समार्जवार्दी सिद्धार्ंतों के प्रति थार् जबकि अन्य गार्ंधीवार्दी दर्शन से प्रभार्वित थे। परंतु अधिकांश सदस्यों क दृष्टिकोण उदार्र थार्। आम सहमति बनार्ने के प्रयार्स होते रहते थे। तार्कि संविधार्न बनने की प्रगति में बार्धार् न आए। उनक मुख्य लक्ष्य थार् भार्रत को एक ऐसार् संविधार्न देनार् जो देश के लोगों के आदर्शों एवं विचार्रों को पूरार् कर सकें।

विभिन्न मुद्दों तथार् सिद्धार्ंतों के प्रति आम सहमति बनार्ने तथार् असहमति से बचने के भरपूर प्रयार्स संविधार्न सभार् में किए गए। यह आम सहमति दिसम्बर 3, 1946 को ‘उद्देश्य प्रस्तार्व’ के रूप में पं नेहरू द्वार्रार् प्रस्तुत की गर्इ तथार् जनवरी 22, 1947 को लगभग सर्वसम्मति से अपनाइ गर्इ। इन उद्देश्यों के आधार्र पर पर सभार् ने 26 नवंबर 1949 को अपनार् कार्य पूरार् कियार् तथार् 26 जनवरी 1950 से संविधार्न लार्गू कियार् गयार्। कांग्रेस के लार्हौर अधिवेशन में 31 दिसंबर, 1929 को लिए गए निर्णय के आधार्र पर 26 जनवरी, 1930 को मनार्ए गए प्रथम स्वार्धीनतार् दिवस के ठीक 20 वर्ष बार्द, 26 जनवरी 1950 को भार्रत एक गणरार्ज्य बनार्।

अत: 26 जनवरी 1950 की तिथि को ही संविधार्न के लार्गू होने की तिथि के रूप में निश्चित कियार् गयार्। 

प्रस्तार्वनार् – 

जैसे कि आप जार्नते है भार्रतीय संविधार्न की शुरूआत एक प्रस्तार्वनार् के सार्थ हुर्इ है। आइए जार्नें कि प्रस्तार्वनार् किसे कहते हैं। प्रस्तार्वनार् किसी पुस्तक की भूमिक के समार्न ही है। भूमिक के रूप में प्रस्तार्वनार् संविधार्न के उपबंधों क भार्ग नहीं है, परंतु यह संविधार्न निर्मार्ण क उद्देश्यों व लक्ष्यों की व्यार्ख्तार् करती है। भार्रतीय संविधार्न की प्रस्तार्वनार् भी इसी रूप में है। इस प्रकार से प्रस्तार्वनार् संविधार्न की मागदर्शिक होती है। इस प्रस्तार्वनार् को श्री के.एम.मुशी ने संविधार्न की ‘‘रार्जनीतिक जन्म कुण्डली’’ कहार् है।

1976 में 42वार्ं संवैधार्निक संशोधन हुआ थार्। इस संशोधन के द्वार्रार् भरतीय संविधार्न के मूल प्रस्तार्वनार् में तीन नये शब्द जोड़ार् गयार्- समार्जवार्दी, धर्मनिरपेक्षतार् और अखण्डतार्।

42 वें संवैधार्निक संशोधन के पश्चार्त् प्रस्तार्वनार् – 

‘‘हम भार्रत के लोग, भार्रत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न, समार्जवार्दी, धर्मनिपेक्ष लोकतंत्रार्त्मक गणरार्ज्य बनार्ने के लिये तथार् उसके समस्त नार्गरिकों को सार्मार्जिक, आर्थिक और रार्जनीतिक न्यार्य, विचार्र-अभिव्यक्ति, विश्वार्स, धर्म और उपार्सनार् की स्वतंत्रतार्, प्रतिष्ठार् और अवसर की समतार् प्रार्प्त करार्ने के लिए तथार् उन सब में व्यक्ति की गरिमार् और रार्ष्ट्र की एकतार् तथार् अखण्डतार् सुनिश्चित करने वार्ली बन्धुतार् बढ़ार्ने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधार्न सभार् में आज दिनार्ंक 26 नवबंर, 1949 (मिती माग शीर्ष शुल्क सप्तमी, संवत् 2006 विक्रमी) को एतद् द्वार्रार् इस संविधार्न को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मापित करते है।’’

भार्रतीय संविधार्न की प्रस्तार्वनार् के प्रमुख तत्व – 

भार्रतीय संविधार्न क यह प्रस्तार्वनार् बहुत अधिक श्रेष्ठ रूप में संविधार्न निर्मार्तार्ओं के मनोभार्वों को व्यक्त करती है, उच्चतम न्यार्यलय ने प्रस्तार्वनार् को ‘संविधार्न-निर्मार्तार्ओं के उद्देश्य को प्रकट करने वार्ली कुंजी’ (Key to the Intention of the makers of the Act) कहार् है। भार्रतीय संविधार्न की प्रस्तार्वनार् के प्रमुख तत्व निम्नलिखित हैं –

  1. हम भार्रत के लोग – इस वार्क्य से तीन बार्तें स्पष्ट होती हैं प्रथम संविधार्न निर्मार्तार् भार्रतीय ही हैं कोर्इ विदेशी नहीं, द्वितीय भार्रतीय संविधार्न भार्रतीय जनतार् की इच्छार् क परिणार्म है और भार्रतीय जनतार् ने ही इसे रार्ष्ट्र को समर्पित कियार् है और तृतीय अन्तिम प्रभुसत्तार् जनतार् में ही निहित है।इसके अतिरिक्त ‘हम भार्रत के लोग’ वार्क्यार्ंश क अभिप्रार्य यह भी है कि भार्रतीय जनतार् ने संविधार्न को बनार्यार् है, इसलिए भार्रतीय संघ को कोर्इ भी रार्ज्य संविधार्न को न तो समार्प्त कर सकतार् है और न ही संविधार्न द्वार्रार् स्थार्पित संघ से अपनार् संबंध-विच्छेद कर सकतार् है। डॉ. अम्बेडकर के शब्दों में – ‘‘यह प्रस्तार्वनार् इस सदन के प्रत्येक सदस्य की इच्छार्नुसार्र यह स्पष्ट कर देती है कि इस संविधार्न क आधार्र जनतार् है और इसमें निहित सत्तार् व प्रभुतार् समस्त जनतार् के पार्स है’’
  2. संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न – 26 जनवरी 1950 से भार्रत की अधिरार्ज्य की स्थिति समार्प्त हो गयी और भार्रत एक ‘संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न लोकतार्ंत्रिक गणरार्ज्य’ हो गयार् है। ‘‘संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न’’ क अर्थ है कि आंतरिक यार् बार्ह्य दृष्टि से भार्रत पर किसी विदेशी सत्तार् क अधिकार नहीं है। भार्रत अंतर्रार्ष्ट्रीय क्षेत्र में अपनी इच्छार्नुसार्र आचरण कर सकतार् है और वह किसी भी देश से संधि यार् समझौतार् करने के लिए बार्ध्य नहीं है।
  3. समार्जवार्दी रार्ज्य – मूल संविधार्न की प्रस्तार्वनार् में ‘समार्जवार्दी’ शब्द नहीं जोड़ार् गयार् थार्, परंतु संविधार्न के 42वें संशोधन अधिनियम 1976 द्वार्रार् प्रस्तार्वनार् में ‘समार्जवार्दी’ शब्द जोड़कर भार्रत को एक ‘समार्जवार्दी रार्ज्य’ घोषित कियार् गयार्। यद्यपि समार्जवार्दी शब्द से जो तार्त्पर्य भार्रतीयों क है, वह है ‘प्रजार्तंत्रार्तत्मक समार्जवार्द’ से है। चीन यार् रूस के समार्जवार्द से नहीं। संविधार्न में समार्जवार्दी शब्द को लिखने क मुख्य उद्देश्य सरकार को गरीबी मिटार्ने एवं आर्थिक व सार्मार्जिक न्यार्य की स्थार्पनार् के लिए निर्देशित करनार् है।
  4. धर्मनिपेक्ष रार्ज्य – धर्मनिपेक्षतार् शब्द 42वें संशोधन (1976) द्वार्रार् प्रस्तार्वनार् में जोड़ार् गयार् है, क्योंकि इसक उद्देश्य भार्रत को एक ‘‘धर्मनिरपेक्ष रार्ज्य’’ के रूप में प्रतिष्ठित करनार् है, इसीलिए भार्रत क कोर्इ अपनार् ‘‘रार्जर्धम’’ घोषित नहीं कियार् गयार् है, ‘‘धर्मनिरपेक्ष रार्ज्य’’ क अर्थ यह है कि भार्रत धर्म के विषय में पूर्णत: तटस्थ है, वह सभी धर्मों के सार्थ समार्न व्यवहार्र करतार् है, उन्हें समार्न संरक्षण प्रदार्न करतार् है। देश के समस्त नार्गरिकों को अपनी आस्थार् के अनुसार्र किसी भी धर्म को मार्नने, उपार्सनार् करने, प्रचार्र-प्रसार्र करने की पूर्ण स्वतंत्रतार् प्रदार्न की गयी है। रार्ज्य न तो किसी धर्म को प्रोत्सार्हन देगार् और न धामिक नीतियों में हस्तक्षेप करेगार्।
  5. लोकतंत्रार्त्मक गणरार्ज्य – भार्रत एक ‘लोकतंत्रार्त्मक’ रार्ज्य है, जिसक अर्थ यह है कि शार्सन की सर्वोच्च शक्ति जनतार् में निहित है, परंतु जनतार् रार्जसत्तार् यार् शक्ति क प्रयोग प्रत्यक्ष रूप से स्वयं न करके, अप्रत्यक्ष रूप में अपने द्वार्रार् निर्वार्चित प्रतिनिधियों के मार्ध्यम से करती है।‘गणरार्ज्य’ शब्द क अर्थ है कि भार्रतीय संघ क प्रधार्न अर्थार्त् रार्ष्ट्रपति निर्वार्चित होगार्, वंशार्नुगत आधार्र पर नहीं होगार्। इस प्रकार भार्रत के रार्ष्ट्रपति के पद पर निर्धार्रित योग्यतार्धार्री देश क कोर्इ भी नार्गरिक निर्वार्चित हो सकतार् है, भार्रत अमेरिक की तरह गणरार्ज्य है, किन्तु ब्रिटेन गणरार्ज्य नहीं है, वरन् रार्जतंत्र है, क्योंकि वहार्ं रार्ज्य क पद वंशार्नुगत है।
  6. स्वत्रंतार् समार्नतार् और बंधुत्व – स्वत्रंतार् क अर्थ देश के सभी नार्गरिकों को नार्गरिक और रार्जनीतिक स्वत्रंतार् क अधिकार प्रदार्न करनार् है। समार्नतार् क अर्थ देश के सभी नार्गरिकों को उनकी उन्नति एवं विकास के लिए बिनार् किसी भेदभार्व के समार्न अवसर प्रदार्न करनार् है एवं बंधुत्व क अर्थ देश के समस्त नार्गरिकों में आपसी भाइचार्रे की भार्वनार् क विकास करनार् है।
  7. एकतार् और अखण्डतार् – भार्रतीय संविधार्न देश की एकतार् और अखण्डतार् को अक्षुण्य बनार्ये रखने के उद्देश्य से 42वें संविधार्न संशोधन के द्वार्रार् प्रस्तार्वनार् में एकतार् के सार्थ अखण्डतार् शब्द और जोड़ार् गयार् है।

हरिविष्णु कामथ के अनुसार्र –‘‘हमें इस बार्त पर गर्व है कि हमार्रार् संविधार्न विश्व क सबसे विशार्लकाय संविधार्न है’’

भार्रतीय संविधार्न की विशेषतार्एं – 

संविधार्न अपने आप में एक अनूठार् संविधार्न है। संविधार्न बनने में 2 वर्ष 11 मार्ह 18 दिन क समय लगार्कर संविधार्न क प्रार्रूप तैयार्र कियार् परंतु भार्रतीय संविधार्न 26 जनवरी 1950 को लार्गू कियार् गयार्। संविधार्न निर्मार्तार्ओं ने दूसरे देशों में संविधार्नों से भी कर्इ विचार्र ग्रहण किये तथार् इसे मौलिकतार् प्रदार्न की। भार्रतीय संविधार्न की प्रमुख विशेषतार्ंए निम्नलिखित है –

  1. निर्मित एवं लिखित संविधार्न – भार्रतीय संविधार्न क निर्मार्ण एक विशेष समय और निश्चित योजनार् के अनुसार्र संविधार्न सभार् द्वार्रार् कियार् गयार् थार् अत: यह निर्मित संविधार्न है इसमें सरकार के सगं ठन के लिए सिद्धार्तं , व्यवस्थार्पिक कार्यपार्लिका, न्यार्यपार्लिक आदि के गठन एवं कार्य नार्गरिकों के अधिकार एवं कत्र्तव्य आदि के विषय में स्पष्ट रूप से उल्लेख कियार् गयार् है। 
  2. विस्तृत एवं व्यार्पक संविधार्न –भार्रतीय संविधार्न विश्व के सभी संविधार्नों से व्यार्पक है इसमें 395 अनुच्छेद एवं 22 भार्गों में विभक्त है जबकि अमेरिक के संशोधित संविधार्न में केवल 21 अनुच्छेद, चीन में 106 अनुच्छेद है। 
  3. सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न लोकतंत्रार्त्मक गणरार्ज्य – इसक अभिप्रार्य यह है कि भार्रत अपने आंतरिक एवं बार्ह्य नीतियों के निर्धार्रण में पूर्णरूप से स्वतंत्र है एवं रार्ज्य की सर्वोच्च शक्ति जनतार् में निहित है। हमार्रे देश क प्रमुख रार्ष्ट्रपति वंशार्नुगत न होकर एक निश्चित अवधि के लिए निर्वार्चित होतार् है। 
  4. कठोर एवं लचीलेपन क सार्म्मिश्रण – हमार्रे संविधार्न में संशोधन की तीन विधियार्ं दी गर्इ है। इसके कुछ अनुच्छेद संसद के विशेष बहुमत द्वार्रार् परिवर्तित किये जार् सकते है, जो लचीलार्पन क उदार्हरण है एवं कुछ अनुच्छेद को आधे से अधिक रार्ज्यों के विशेष बहुमत के सार्थ ही संसद में उपस्थित दोनो सदनों के दो तिहाइ बहुमत के द्वार्रार् ही संशोधन परिवर्तन संभव ही जो संविधार्न की कठोरतार् क उदार्हरण है। 
  5. संघार्त्मक होते हुए भी एकात्मक –भार्रत क संविधार्न संघार्त्मक होते हुए एकात्मकतार् के गुण लिए हुए हैं यथार् लिखित संविधार्न, केन्द्र एंव रार्ज्यों के मध्य शक्ति विभार्जन, संविधार्न की सर्वोच्चतार् जहार्ं संघार्त्मक के लक्षण हैं वहीं दूसरी ओर इकहरी नार्गरिकतार् एक सी न्यार्य व्यवस्थार् एकात्मकतार् के लक्षण है। 
  6. इकहरी नार्गरिकतार् –संधार्त्मक शार्सन प्रणार्ली में नार्गरिकों को दोहरी नार्गरीकतार् प्रार्प्त होती है जैसार् कि अमेरिक में है, जबकि भार्रत में केवल इकहरी नार्गरिकतार् है इसक अभिप्रार्य यह है कि प्रत्येक व्यक्ति भार्रत क नार्गरिक है चार्हे वह किसी भी स्थार्न पर निवार्स करतार् हो यार् किसी भी स्थार्न पर उसक जन्म हुआ हो। 
  7. सावभौम वयस्क मतार्धिकार – भार्रतीय संविधार्न के द्वार्रार् 18 वर्ष से ऊपर प्रत्येक नार्गरिक को जार्ति, धर्म, लिंग, प्रजार्ति यार् संपत्ति के आधार्र पर बिन किसी भेदभार्व के निर्वार्चन में मत देने क अधिकार प्रदार्न कियार् है। 
  8. स्वतंत्र न्यार्यपार्लिक – भार्रतीय न्यार्यपार्लिक स्वतंत्र है। न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति उनकी योग्यतार् के आधार्र पर होती है एवं उन्हें आसार्नी से नहीं हटार्यार् जार् सकतार् है। 
  9. मौलिक अधिकारों की व्यवस्थार् – मौलिक अधिकार भार्रतीय संविधार्न की एक महत्वपूर्ण विशेषतार् है संविधार्न में छ: मौलिक अधिकार दिये गये है। 
  10. मौलिक कर्त्तव्यों की व्यवस्थार् – भार्रतीय संविधार्न के 42वें संशोधन के द्वार्रार् नार्गरिकों के 10 मौलिक कर्त्तव्य जोड़ दिये गये है। 
  11. रार्ज्य के नीति निर्देशक सिद्धार्ंत- नीति निर्देशक सिद्धार्ंत हमार्रे संविधार्न में आयरलैण्ड के संविधार्न से लिए गए हैं। लोगों को सार्मार्जिक और आर्थिक न्यार्य दिलार्ने के उद्देश्य से रार्ज्य के नीति निर्देशक सिद्धार्ंतों को संविधार्न में शार्मिल कियार् गयार् है। 
  12. एकीकृत न्यार्य व्यवस्थार् – भार्रतीय संविधार्न की एक महत्वपूर्ण विशेषतार् एकीकृत न्यार्य व्यवस्थार् है। जिस के अंतर्गत सर्वोच्च न्यार्यार्लय सर्वोपरि अदार्लत है इसके आधीन उच्च न्यार्यार्लय है। इस प्रकार भार्रतीय न्यार्यपार्लिक एक पिरार्मिड की तरह है। 
  13. आपार्त काल की व्यवस्थार् – संकट काल (आपार्तकाल) क सार्मनार् करने के लिए संविधार्न में कुछ आपार्तकालीन प्रार्वधार्नों की व्यवस्थार् की गर्इ है। आपार्तकालीन घोषणार् निम्नलिखित तीन परिस्थितियों में की जार् सकती है। युद्ध यार् बार्ह्य आक्रमण अथवार् आंतरिक अशार्ंति उत्पन्न होने पर (अनुच्छेद 352) रार्ज्यों में संवैधार्निक व्यवस्थार् असफल होने पर (अनुच्छेद 356) वित्तीय संकट उत्पन्न होने पर (अनुच्छेद 360) 
  14. लोक कल्यार्णकारी रार्ज्य की स्थार्पनार् – भार्रतीय संविधार्न में एक लोकल्यार्णकारी रार्ज्य की स्थार्पनार् क लक्ष्य निर्धार्रित कियार् गयार् है। जिसमें समस्त नार्गरिकों को सार्मार्जिक, आर्थिक और रार्जनीतिक न्यार्य मिलेगार् सभी को बिनार् भेदभार्व के समार्न अवसर प्रार्प्त होंगे। 
  15. अस्पृश्यतार् क अन्त – भार्रतीय संविधार्न के अनुच्छेद 17 के अनुसार्र अस्पृश्यतार् क अंत कियार् गयार् है और उसक किसी भी रूप आचरण निबंद्ध कियार् जार्तार् है। 

उरोक्त विशेषतार्ओं से यह स्पष्ट हो जार्तार् है कि भार्रतीय संविधार्न विश्व क सर्वश्रेष्ठ संविधार्न है। इस संबंध डॉ. अम्बेडकर क यह कथन उल्लेखनीय है – ‘‘हमने भार्रत को सर्वश्रेष्ठ संविधार्न दियार् है। मैं यह कहनार् चार्हूगार् कि यदि नये संविधार्न के अंतर्गत स्थिति बुरी होती है तो इसक कारण यह नहीं होगार् की हमार्रार् संविधार्न बुरार् है वरन् हमको यह कहनार् होगार् कि हम लोग ही बुरे है।’’

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