भार्रतीय संविधार्न की प्रस्तार्वनार् की मुख्य विशेषतार्एँ

भार्रतीय संविधार्न की प्रस्तार्वनार् की मुख्य विशेषतार्एँ

By Bandey

अनुक्रम

भार्रतीय संविधार्न की प्रस्तार्वनार् को संविधार्न की आत्मार् कहार् जार्तार् है। 42वें संविधार्न संशोधन के पश्चार्त् अब संविधार्न की प्रस्तार्वनार् है: हम भार्रत के लोग भार्रत को एक प्रभुसत्तार् सम्पन्न, समार्जवार्दी, धर्म-निरपेक्ष, लोकतन्त्रीय गणरार्ज्य के रूप में स्थार्पित करने क निश्चय कर और इसके सभी नार्गरिकों के लिए यह प्रार्प्त करने क निश्चय करते हैं: न्यार्य, सार्मार्जिक, आर्थिक, रार्जनीतिक सोचने, बोलने, अपने विचार्र को प्रकट करने और पार्ठ-पूजार् करने की स्वतन्त्रतार् समार्न अवसर और स्तर की और सभी में भ्रार्तृत्व को बढ़ार्वार् देने, जिससे व्यक्ति के सम्मार्न और रार्ष्ट्र की एकतार् अखण्डतार् की प्रार्प्ति हो

भार्रतीय संविधार्न की प्रस्तार्वनार्

संविधार्न की प्रस्तार्वनार् इसकी भार्वनार् और अर्थ को खोलने की एक कुंजी होती है। यह बार्त भार्रत के संविधार्न की प्रस्तार्वनार् के बार्रे में भी सत्य है। के. एम. मुंशी ने इसको संविधार्न की रार्जनीतिक जन्मपत्री करार्र दियार्, जिसने संविधार्न की मौलिक विशेषतार्ओं, दर्शन और भार्रतीय रार्ज्य की प्रवृति को प्रकट कियार् गयार् है। प्रस्तार्वनार् भार्रत के संविधार्न के मौलिक दर्शन को दर्शार्ती है और संविधार्न की धार्रार्ओं की व्यार्ख्यार् करने में महत्त्वपूर्ण भूमिक निभार्ती है। पंडित ठार्कुर भागव ने कहार् है, प्रस्तार्वनार् संविधार्न क बहुत ही बहुमूल्य भार्ग है, यह संविधार्न की आत्मार् है, यह संविधार्न की कुंजी है। यह संविधार्न निर्मार्तार्ओं क मन खोलने वार्ली एक वुंफजी है। यह संविधार्न में जड़ार् हुआ एक हीरार् है। यह एक सुंदर गद्यार्ंश वार्ली कवितार् है, बल्कि यह अपने आप में सम्पूर्ण है। यह एक उचित मार्पदण्ड है जिससे संविधार्न क मूल्य परखार् जार् सकतार् है।


हम अपनी संविधार्न निर्मार्ण सभार् में 26 नवम्बर, 1949 के दिन अपने इस संविधार्न क निर्मार्ण करते हैं, इसको पार्स करते हैं और इसे अपने आप को सौंपते हैं। शब्द ‘समार्जवार्द’, धर्म-निरपेक्षतार्’ ‘अखण्डतार्’ पहले प्रस्तार्वनार् में शार्मिल नहीं थे और ये संविधार्न के 42वें संशोधन (1976) के द्वार्रार् संविधार्न में शार्मिल किए गए।

भार्रतीय संविधार्न की प्रस्तार्वनार् की मुख्य विशेषतार्एँ

प्रस्तार्वनार् से भार्रतीय रार्ज्य की प्रवृति और उन उद्देश्यों क ज्ञार्न मिलतार् है जोकि भार्वी सरकारों द्वार्रार् प्रार्प्त किए जार्ने हैं। यह जनतार् की प्रभुसत्तार् को प्रकट करती है और उस तिथि को दर्ज करती है जिस दिन संविधार्न को संविधार्न निर्मार्ण सभार् के द्वार्रार् अंतिम रूप में अपनार्यार् गयार् थार्। प्रस्तार्वनार् की विशेषतार्ओं क विश्लेषण चार्र शीर्षकों के अन्तर्गत कियार् जार् सकतार् है:

सत्तार् क स्त्रोत-लोकप्रिय प्रभुसत्तार्

सबसे पहले प्रस्तार्वनार् स्पष्ट रूप में जनतार् की प्रभुसत्तार् के सिद्वार्न्त को स्वीकार करती है। यह इन शब्दों से आरम्भ होती है: हम भार्रत के लोग… इससे इस तथ्य की पुष्टि हो जार्ती है कि समस्त सत्तार् क अंतिम स्त्रोत जनतार् ही है। सरकार अपनी शक्ति जनतार् से प्रार्प्त करती है। संविधार्न क आधार्र और प्रभुसत्तार् लोगों में है और ये अपनी प्रभुसत्तार् लोगों से प्रार्प्त करती है। प्रस्तार्वनार् यह भी स्पष्ट करती है कि सदन के सभी सदस्यों की इच्छार् है कि, इस संविधार्न की जड़ें, इसकी सत्तार्, इसकी प्रभुसत्तार् लोगों से प्रार्प्त की जार्ए। डॉ. अंबेडकर के अनुसार्र इस स्वरूप में भार्रत के संविधार्न की प्रस्तार्वनार् अमरीकी संविधार्न की प्रस्तार्वनार् और संयुक्त रार्ष्ट्र के चाटर की प्रस्तार्वनार् से मिलती है।

संविधार्न निर्मार्ण सभार् में दो सदस्यों ने फ्हम भार्रत के लोग शब्दों के प्रयोग क विरोध कियार् थार्। एच. वी. कामथ चार्हते थे कि प्रस्तार्वनार् इन शब्दों से आरम्भ होनी चार्हिए कि, परमार्त्मार् के नार्म परय् और इस विचार्र क कुछ अन्य सदस्यों ने भी उनक समर्थन कियार् थार्। परन्तु जब विचार्र-विमर्श के पश्चार्त् इस प्रस्तार्व पर मत डार्ले गए तो यह प्रस्तार्व 41 पक्ष में और 68 विरुद्व मत होने के कारण रद्द हो गयार्। एक अन्य सदस्य मौलार्नार् हषरत मोहार्नी ने इन शब्दों क इस आधार्र पर विरोध कियार् कि संविधार्न निर्मार्ण सभार् केवल थोड़े-से मतदार्तार्ओं के द्वार्रार् निर्वार्चित की गर्इ थी और वह भी सार्म्प्रदार्यिक आधार्र पर डार्ले गए मतों द्वार्रार्, इसलिए यह पूर्णतयार् प्रतिनिधि सभार् नहीं है। इसलिए यह सभार् इन शब्दों क प्रयोग करने के योग्य नहीं है। परन्तु संविधार्न निर्मार्ण सभार् ने इस विचार्र को भी रद्द कर दियार् और इस प्रकार इसके द्वार्रार् स्वीकृत की गर्इ प्रस्तार्वनार् क आरम्भ इन शब्दों से होतार् है कि फ्हम भार्रत के लोगय् और इन से भार्रत के लोगों की प्रभुसत्तार् के गुण क पतार् लगतार् है। 15 अगस्त, 1947 को ब्रिटिश प्रभुसत्तार् की समार्प्ति और भार्रत के एक प्रभुसत्तार् सम्पन्न लोकतन्त्रीय गणरार्ज्य के रूप में उभरने के पश्चार्त् ऐसी घोषणार् आवश्यक हो गर्इ थी।

रार्ज्य की प्रवृति

प्रस्तार्वनार् एक रार्ज्य (देश) के रूप में भार्रत की पार्ंच प्रमुख विशेषतार्ओं क वर्णन करती है। यह भार्रत को एक प्रभुसत्तार् सम्पन्न, समार्जवार्दी, धर्म-निरपेक्ष, लोकतन्त्रीय, गणरार्ज्य घोषित करती है। आरम्भ में प्रस्तार्वनार् में समार्जवार्दी और धर्म-निरपेक्ष शब्द शार्मिल नहीं थे। ये इसमें 42वें संशोधन के द्वार्रार् शार्मिल किए गए। इन पार्ंच विशेषतार्ओं में से प्रत्येक को स्पष्ट करनार् आवश्यक है:

(1) भार्रत एक प्रभुसत्तार्-सम्पन्न रार्ज्य है- प्रस्तार्वनार् घोषित करती है कि भार्रत एक प्रभुसत्तार् सम्पन्न देश है। ऐसी घोषणार् भार्रत पर ब्रिटिश रार्ज्य की समार्प्ति पर मोहर लगार्ने के लिए बहुत आवश्यक थी। यह इस तथ्य की पुष्टि भी करती है कि भार्रत अब ब्रिटिश क्रार्उन पर निर्भर प्रदेश यार् उसकी बस्ती नहीं रहार् थार्। इससे 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश शार्सन समार्प्त होने के पश्चार्त् भार्रत को तकनीकी रूप में दिए गए औपनिवेशिक स्तर को समार्प्त करने की भी पुष्टि की गर्इ। संविधार्न निर्मार्ण सभार् के द्वार्रार् इसको स्वीकार किए जार्ने के पश्चार्त् औपनिवेशक स्तर समार्प्त हो गयार् और भार्रत पूर्णतयार् एक प्रभुसत्तार् देश के रूप में उभरार्। इसने स्वतन्त्रतार् के संघर्ष के परिणार्म की घोषणार् की और बल देकर कहार् कि भार्रत स्वयं निर्णय करने के लिए और इनको अपने लोगों और क्षेत्रों पर लार्गू करने के लिए आंतरिक और बार्हरी रूप में स्वतन्त्र है।

परन्तु कुछ आलोचक यह प्रश्न उठार्ते हैं कि ‘रार्ष्ट्रमण्डल’ की सदस्यतार् स्वीकार करने से भार्रत क प्रभुसत्तार् सम्पन्न देश के रूप में स्तर सीमित हुआ है क्योंकि इस सदस्यतार् से ब्रिटिश महार्रार्जार्/महार्रार्नी को रार्ष्ट्रमण्डल क मुखियार् स्वीकार कियार् गयार् है। परन्तु यह विचार्र ठीक नहीं है। रार्ष्ट्रमण्डल अब ब्रिटिश रार्ष्ट्रमण्डल नहीं रहार्। यह 1949 के पश्चार्त् अब एक ही जैसे प्रभुसत्तार् सम्पन्न मित्र देशों की संस्थार् बन गयार् है क्योंकि जिनके बीच ऐतिहार्सिक सम्बन्ध उनके रार्ष्ट्रीय हितों को सार्झे प्रयत्नों के द्वार्रार् प्रोत्सार्हित करने के लिए रार्ष्ट्रमण्डल में इकट्ठार् होने को प्रार्थमिकतार् देते हैं। भार्रत क रार्ष्ट्रमण्डल में शार्मिल होनार् उसकी स्वेच्छार् पर निर्भर है और एक सद्भार्वनार् वार्ली कार्यवार्ही है। ब्रिटिश महार्रार्जार्/महार्रार्नी क रार्ष्ट्रमण्डल क मुखियार् होने क भार्रतीय संविधार्न में कोर्इ स्थार्न नहीं है। भार्रत क उससे कोर्इ लेनार्-देनार् नहीं है। फ्रार्ष्ट्रमण्डल स्वतन्त्र देशों की संस्थार् है और ब्रिटिश रार्जार् रार्ष्ट्रमण्डल क सार्ंकेतिक (नार्ममार्त्र का) मुखियार् है (नेहरू)। प्रोफेसर रार्मार्स्वार्मी उचित कहते हैं कि भार्रत क रार्ष्ट्रमण्डल क सदस्य होनार् एक सद्भार्वनार् वार्ली व्यवस्थार् है जिसक कि कोर्इ संवैधार्निक महत्त्व नहीं है।

इस प्रकार संविधार्न की प्रस्तार्वनार् भार्रत के प्रभुसत्तार् सम्पन्न स्वतन्त्र देश होने की घोषणार् करती है। शब्द प्रभुसत्तार् क अर्थ आंतरिक और बार्हरी प्रभुसत्तार् दोनों को प्रकट करतार् है। इसक अर्थ यह भी है कि भार्रत की सरकार आंतरिक और विदेशी मार्मलों में स्वतन्त्र है और यह अब किसी भी विदेशी शक्ति के नियन्त्रण अधीन नहीं है।

(2) भार्रत एक समार्जवार्दी रार्ज्य है – यद्यपि भार्रतीय संविधार्न में आरम्भ से ही समार्जवार्द की भार्वनार् पाइ जार्ती थी, पर प्रस्तार्वनार् में ‘समार्जवार्द’ क शब्द शार्मिल करने के लिए 1976 में संशोधन कियार् गयार्। समार्जवार्द अब भार्रतीय रार्ज्य की एक प्रमुख विशेषतार् है। इससे इस तथ्य की झलक मिलती है कि भार्रत सभी प्रकार क शोषण समार्प्त करने के लिए आय, स्त्रोतों और सम्पत्ति के न्यार्यपूर्ण विभार्जन की प्रार्प्ति अपने समस्त लोगों के लिए सार्मार्जिक, आर्थिक और रार्जनीतिक न्यार्य प्रार्प्त करने के लिए वचनबद्व है। परन्तु समार्जवार्द माक्सवार्दी/क्रार्न्तिकारी ढंगों से प्रार्प्त नहीं कियार् जार्नार् है अपितु शार्न्तिपूर्वक, संवैधार्निक और लोकतन्त्रीय ढंगों से द्वार्रार् प्रार्प्त कियार् जार्नार् है। ‘भार्रत एक समार्जवार्दी रार्ज्य है’ के शब्द क वार्स्तविक अर्थ यह है कि भार्रत एक लोकतन्त्रीय समार्जवार्दी रार्ज्य है। इससे इसवफी सार्मार्जिक-आर्थिक न्यार्य के प्रति वचनबद्व तार् क पतार् लगतार् है जिसको देश ने लोकतन्त्रीय ढंग के द्वार्रार् प्रार्प्त कियार् जार्नार् है। भार्रत सार्मार्जिक, आर्थिक और रार्जनीतिक समार्नतार्, सार्मार्जिक न्यार्य, आर्थिक समार्नतार्, सावजनिक भलाइ और विकास के समार्जवार्दी लक्ष्यों को प्रार्प्त करने के लिए दृढ़ संकल्प है। परन्तु इस उद्देश्य के लिए वह तार्नार्शार्ही ढंगों को अपनार्ने के लिए तैयार्र नहीं है। भार्रत समार्जवार्दी लक्ष्यों को प्रार्प्त करने के लिए रार्जनीतिक और आर्थिक दोनों क्षेत्रों में लोकतन्त्रीय उदार्रीकरण के पक्ष में है। किन्तु 1991 के पश्चार्त् उदार्रीकरण के आर्थिक सिद्धार्न्त को अपनार्ये जार्ने ने समार्जवार्द के भविष्य पर प्रश्न चिÉ लगार् दियार् है।

(3) भार्रत एक धर्म-निरपेक्ष रार्ज्य है – 42वें संशोधन के द्वार्रार् ‘धर्म-निरपेक्षतार्’ को भार्रतीय रार्ज्य की एक प्रमुख विशेषतार् के रूप में प्रस्तार्वनार् में स्थार्न दियार् गयार्। इसको शार्मिल करने से भार्रतीय संविधार्न की धर्म-निरपेक्ष प्रवृति को और स्पष्ट कियार् गयार्। एक रार्ज्य के रूप में भार्रत किसी भी धर्म को विशेष स्तर नहीं देतार्। भार्रत में सरकारी धर्म जैसी कोर्इ बार्त नहीं है। यह पार्किस्तार्न के इस्लार्मी गणरार्ज्य और अन्य मुस्लिम देशों जैसी धामिक सिद्वार्न्त की रार्जनीति से अपने आप को अलग करतार् है। अधिक श्रेष्ठ बार्त यह है कि भार्रत ने सभी धर्मों को एक समार्न अधिकार देकर धर्म-निरपेक्षतार् को अपनार्यार् है। अनुच्छेदों 25 से 28 तक संविधार्न सभी नार्गरिकों को धामिक स्वतन्त्रतार् क अधिकार देतार् है। यह सभी नार्गरिकों को बिनार् पक्षपार्त बरार्बर के अधिकार भी देतार् है और अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षार् की व्यवस्थार् करतार् है। रार्ज्य नार्गरिकों की धामिक स्वतन्त्रतार् में कोर्इ हस्तक्षेप नहीं करतार् और संविधार्न धामिक उद्देश्यों के लिए कर लगार्ने की मनार्ही करतार् है। अलैग्जेन्ड्रोविक्स (Alexandrowicks) लिखते हैं, भार्रत एक धर्म-निरपेक्ष देश है जो सभी व्यक्तियों के लिए संवैधार्निक रूप में धर्म की स्वतन्त्रतार् की व्यवस्थार् करतार् है और किसी भी धर्म को कोर्इ विशेष दर्जार् नहीं देतार्। धर्म-निरपेक्षतार् भार्रतीय संविधार्न की मौलिक संरचनार् क एक भार्ग है और प्रस्तार्वनार् इस तथ्य क स्पष्ट रूप में वर्णन करती है।

(4) भार्रत एक लोकतार्न्त्रिक रार्ज्य है – प्रस्तार्वनार् भार्रत को एक लोकतन्त्रीय देश घोषित करती है, भार्रत के संविधार्न में एक लोकतन्त्रीय प्रणार्ली की व्यवस्थार् करतार् है। सरकार की सत्तार् लोगों की प्रभुसत्तार् पर निर्भर है। लोगों को समार्न रार्जनीतिक अधिकार प्रार्प्त हैं। सावजनिक वयस्क मतार्धिकार, चुनार्व लड़ने क अधिकार, सरकारी पद प्रार्प्त करने क अधिकार, संगठन स्थार्पित करने क अधिकार और सरकार की नीतियों की आलोचनार् और विरोध करने क अधिकार, अपने विचार्र प्रकट करने और बोलने की स्वतन्त्रतार्, प्रेस की स्वतन्त्रतार् और शार्न्तिपूर्वक सभार्एँ करने की स्वतन्त्रतार् प्रत्येक नार्गरिक को दी गर्इ है। इन रार्जनीतिक अधिकारों के आधार्र पर लोग रार्जनीति में भार्ग लेते हैं। वे अपनी सरकार निर्वार्चित करते हैं। अपनी सभी कार्यवार्हियों के लिए सरकार लोगों के सार्मने उत्तरदार्यी होती है। लोग चुनार्वों के द्वार्रार् सरकार को परिवर्तित कर सकते हैं। सरकार को सीमित शक्तियार्ँ प्रार्प्त हैं। यह संविधार्न के दार्यरे में रह कर ही कार्य कर सकती है, लोगों के पार्स ही प्रभुसत्तार् है और उनको मौलिक अधिकार प्रार्प्त हैं। भार्रत क सर्वोच्च न्यार्यार्लय संविधार्न द्वार्रार् दिए गए मौलिक अधिकारों क संरक्षक है। चुनार्व निर्धार्रित अन्तरार्ल के पश्चार्त् होते हैं और यह स्वतंत्र, नियमित और निष्पक्ष होते हैं। मार्नव अधिकारों की अधिकतर अच्छे ढंग से रक्षार् करने के लिए संसद ने मार्नव अधिकार एक्ट, 1993 पार्स कियार् और इस उद्देश्य के लिए रार्ष्ट्रीय आयोग स्थार्पित कियार् गयार्।

संविधार्न ने संसदीय लोकतन्त्र की व्यवस्थार् की है। यह ब्रिटिश मॉडल पर आधार्रित है। इसमें अधीन विधन पार्लिक (संसद) और कार्यपार्लिक (मन्त्रिमण्डल) के बीच गहरार् सम्बन्ध होतार् है और कार्यपार्लिक अपने सभी कार्यों के लिए संसद के प्रति उत्तरदार्यी होती है। विधार्नपार्लिक अविश्वार्स प्रस्तार्व पार्स करके कार्यपार्लिक को हटार् सकती है। प्रधार्नमन्त्री एच. डी. देवगौड़ार् की सरकार को अप्रैल, 1997 में तब त्यार्ग-पत्र देनार् पड़ार् थार् जब वह लोकसभार् में विश्वार्स क मत प्रार्प्त करने में असफल रही थी। इसके पश्चार्त् प्रधार्नमन्त्री श्री आर्इ. के. गुजरार्ल के नेतृत्व वार्ली सार्झे मोर्चे की सरकार लोकसभार् में विश्वार्स क मत प्रार्प्त करने में सफल रही और यह लोकसभार् के माच, 1998 में हुए चुनार्व तक बनी रही। बार्रहवीं लोकसभार् के चुनार्वों के पश्चार्त् केन्द्र में बी. जे. पी. के नेतृत्व में एक सार्झी सरकार बनी जो अप्रैल, 1999 में बहुमत खो बैठी पर 2004 में चुनार्व के बार्द यू. पी. ए. की सरकार बनी। 2009 के चुनार्वों में सफल होने के बार्द यह दूसरी बार्र सत्तार् में आर्इ और अभी तक चल रही है। और 13वीं लोकसभार् की चुनार्वों तक अन्तरिम सरकार की तरह कार्य करती रही।

इससे स्पष्ट है कि हमार्रार् देश भार्रत एक ऐसार् गतिशील लोकतंत्र है जहार्ँ सरकार परिवर्तन की प्रक्रियार् शार्न्ति और व्यवस्थित ढंग से पूर्ण की जार्ती है।

(5) भार्रत एक गणरार्ज्य है – प्रस्तार्वनार् भार्रत को एक गणरार्ज्य घोषित करती है। भार्रत क शार्सन किसी रार्जार् यार् मनोनीत मुखियार् के द्वार्रार् नहीं चलार्यार् जार्तार्। रार्ज्य क अध्यक्ष एक निर्वार्चित मुखियार् होतार् है जोकि एक निर्धार्रित कार्यकाल के लिए अपनी शक्तियों क प्रयोग करतार् है। गणरार्ज्य की परिभार्षार् देते समय मैडीसन कहते हैं, फ्यह एक ऐसी सरकार होती है जो अपने अधिकार प्रत्यक्ष यार् अप्रत्यक्ष ढंग से लोगों की महार्न् संस्थार् से प्रार्प्त करती है और ऐसे लोगों के द्वार्रार् चलाइ जार्ती है, जो लोगों की इच्छार् के अनुसार्र ही अपने पदों पर सीमित समय के लिए यार् अच्छे व्यवहार्र तक बने रह सकते हैं। भार्रत उन शर्तों को पूर्ण करतार् है और इसलिए यह एक गणरार्ज्य है। प्रस्तार्वनार् में दिये शब्द गणरार्ज्य क अर्थ, जिसको स्पष्ट करते हुए, डी. डी. बार्सु कहते हैं कि फ्न केवल हमार्रे पार्स देश क पैतृक रार्जार् होने के स्थार्न पर एक निर्वार्चित रार्ष्ट्रपति होगार् बल्कि देश में ऐसी कोर्इ विशेष शार्सक श्रेणी भी नहीं होगी और सभी पद छोटे-से लेकर (रार्ष्ट्रपति के पद सहित) बड़े से बड़े पद सभी नार्गरिकों के लिए बिनार् किसी जार्ति-पार्ति, नस्ल, धर्म य लिंग के पक्षपार्त के खुले होंगे।

भार्रत के गणरार्ज्य की स्थिति इसकी रार्ष्ट्र-मण्डल की सदस्यतार् से टकरार्व नहीं करती। आस्टे्रलियार् के एक भूतपूर्व प्रधार्नमन्त्री सर रॉबर्ट मेंषिष के द्वार्रार् उठार्ए इस प्रश्न में अधिक दम नहीं है कि, फ्एक ऐसार् गणरार्ज्य केसार् हो सकतार् है जोकि रार्ष्ट्रमण्डल क सदस्य हो और ब्रिटिश रार्जार्/महार्रार्नी को अपनार् मुखियार् स्वीकार करतार् हो। भार्रत वार्स्तव में एक प्रभुसत्तार् सम्पन्न गणरार्ज्य है। रार्ष्ट्रमण्डल की सदस्यतार् इसकी स्वेच्छक कार्यवार्ही है। रार्ष्ट्रमण्डल संयुक्त रार्ष्ट्र के समार्न एक मैत्रीपूर्ण संस्थार् है और ब्रिटिश रार्जार्/महार्रार्नी की प्रधनतार् की एक चिÉार्त्मक महत्तार् ही है।

रार्ज्य के उद्देश्य

संविधार्न की प्रस्तार्वनार् चार्र प्रमुख उद्देश्यों क वर्णन करती है जोकि इसके सभी नार्गरिकों के लिए प्रार्प्त किए जार्ने हैं।

(1) न्यार्य – भार्रत क संविधार्न सभी नार्गरिकों के लिए सार्मार्जिक, आर्थिक और रार्जनीतिक न्यार्य के उद्देश्य को स्वीकार करतार् है। स्वतन्त्रतार् की रार्ष्ट्रीय लहर क एक प्रमुख आदर्श सार्मार्जिक-आर्थिक-रार्जनीतिक न्यार्य पर आधार्रित सार्मार्जिक व्यवस्थार् प्रार्प्त करनार् थार्। सार्मार्जिक पहलू से न्यार्य क अर्थ यह है कि समार्ज में कोर्इ भी विशेष अधिकारों वार्ली श्रेणी न हो और किसी भी नार्गरिक से जार्ति-पार्ति, नस्ल, रंग, धर्म, लिंग और जन्म स्थार्न के आधार्र पर कोर्इ भी भेदभार्व न कियार् जार्ए। भार्रत ने सार्मार्जिक न्यार्य को एक लक्ष्य के रूप में स्वीकार कियार् है। इस उद्देश्य के लिए संविधार्न सभी नार्गरिको को समार्न क अधिकार देतार् है, छुआ-छूत को एक दण्डनीय अपरार्ध करार्र देतार् है, समार्ज के कमजोर वर्गों के लोगों को शेष नार्गरिकों के लिए विशेष सुरक्षार्एँ प्रदार्न करतार् है।

आर्थिक न्यार्य क अर्थ यह है कि आय, धन और आर्थिक स्तर के आधार्र पर मनुष्यों के सार्च कोर्इ भेदभार्व नहीं होगार्। इसमें धन के न्यार्योचित्त विभार्जन यार् आर्थिक समार्नतार्, उत्पार्दन के सार्धनों पर एकाधिकारपूर्ण नियन्त्रण की समार्प्ति करके, आर्थिक स्त्रोतों क विकेन्द्रीकरण और सभी को जीवन निर्वार्ह के लिए उचित अवसर प्रदार्न करने और एक कल्यार्णकारी रार्ज्य स्थार्पित करने क संकल्प शार्मिल हैं। रार्ज्य नीति के निर्देशक सिद्वार्न्तों क उद्देश्य भार्रत में सार्मार्जिक-आर्थिक न्यार्य और कल्यार्णकारी रार्ज्य स्थार्पित करनार् है। समार्जवार्द के प्रति वचनबद्व तार् क उद्देश्य भी सार्मार्जिक-आर्थिक न्यार्य प्रार्प्त करने हैं।

रार्जनीतिक न्यार्य क अर्थ लोगों को रार्जनीतिक प्रक्रियार् में एक समार्न, अवसर देनार् है। जार्ति-पार्ति, रंग, नस्ल, धर्म, लिंग यार् जन्म स्थार्न के भेदभार्व के बिनार् सभी लोगों को एक ही जैसे रार्जनीतिक अवसर प्रदार्न करने की व्यवस्थार् करनार् है। भार्रत क संविधार्न सभी लोगों को अपने प्रतिनिधियों क निर्वार्चन करने और सरकारी पद प्रार्प्त करने क अधिकार देतार् है परन्तु सार्थ ही सरकारी पद प्रार्प्त करने क अधिकार है। रार्जनीतिक अधिकार प्रदार्न करनार्। इस प्रकार सार्मार्जिक, आर्थिक और रार्जनीतिक न्यार्य संविधार्न क एक मुख्य उद्देश्य है। जबकि रार्जनीतिक न्यार्य उदार्रवार्दी लोकतन्त्रीय प्रणार्ली अपनार् कर स्थार्पित कर लियार् गयार् है। सार्मार्जिक और आर्थिक न्यार्य अभी पूर्ण रूप से प्रार्प्त कियार् जार्नार् बार्की है।

(2) स्वतन्त्रतार् – प्रस्तार्वनार् स्वतन्त्रतार् को दूसरार् मुख्य उद्देश्य घोषित करती है रार्ज्य क कर्त्तव्य है कि यह लोगों की स्वतन्त्रतार् को सुरक्षित करे, विचार्रों को प्रकट करने की स्वतन्त्रतार् प्रदार्न करें, धामिक विश्वार्स और पूजार् पार्ठ की स्वतन्त्रतार् को विश्वसनीय बनार्ए। मौलिक अधिकार प्रदार्न करने क उद्देश्य इसी उद्देश्य भी यही है व्यक्ति के व्यक्तित्व के पूर्ण रूप से विकसित होने के लिए स्वतन्त्रतार् एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकतार् होती है। यह अच्छार् जीवन जीने के लिए भी आवश्यक शर्त होती है।

(3) समार्नतार् – समार्नतार् को प्रस्तार्वनार् तीसरार् मुख्य उद्देश्य घोषित करती है। इसे दो भार्गों में प्रस्तुत कियार् गयार् है: (i) स्तर की समार्नतार् कानून की दृष्टि में सभी भार्रतीय एक समार्न हैं। (ii) अवसर की समार्नतार् धर्म, नस्ल, लिंग, रंग, जार्ति-पार्ति यार् निवार्स आदि के भेदभार्व के बिनार् समार्न अवसरों की उपलब्धि भार्रतीय संविधार्न के अनुच्छेद 14 और 15 समार्नतार् क अधिकार प्रदार्न करते हैं। अनुच्छेद 16 के अधीन सभी को एक ही जैसे अवसर प्रदार्न करने की व्यवस्थार् की गर्इ है। परन्तु इसके सार्थ ही संविधार्न समार्ज के कमषोर वर्ग होने के नार्ते औरतों और बच्चों को विशेष सुरक्षार् भी प्रदार्न करतार् है।

(4) भ्रार्तृभार्व – प्रस्तार्वनार् स्पष्ट रूप में घोषित करती है कि लोगों के परस्पर भाइचार्रे और प्रेम को बढ़ार्वार् देनार् रार्ज्य क लक्ष्य है-तार्कि लोगों में भार्वनार्त्मक और मनोवैज्ञार्निक एकतार् की भार्वनार् पैदार् हो। इसमें मनुष्य क सम्मार्न बनार्ए रखने और रार्ष्ट्र की एकतार् और अखण्डतार् स्थार्पित करने और बनार्ए रखने क लक्ष्य भी शार्मिल कियार् गयार् है। मार्नवीय सम्मार्न को हमार्री स्वतन्त्रतार् की लहर में बहुत ही उच्च स्थार्न दियार् गयार् थार्। स्वतन्त्रतार् संघर्ष इस बार्त से प्रेरित थार् कि ब्रिटिश शार्सकों के द्वार्रार् भार्रतीय लोगों से किए जार् रहे दूसरे दर्जे के व्यवहार्र को समार्प्त कियार् जार्ए। इसीलिए प्रस्तार्वनार् में यह विशेष रूप में कहार् गयार् है मार्नवीय आदर और रार्ष्ट्र की एकतार् और अखण्डतार् को विश्वसनीय बनार्ते हुए आपसी भाइचार्रे को बढ़ार्वार् दियार् जार्ए। यह लक्ष्य मार्नव अधिकारों की घोषण से भी मेल खार्तार् है। इस प्रकार भ्रार्तृभार्व भार्रतीय संविधार्न के एक प्रमुख उद्देश्य हैं-

संविधार्न को अपनार्ने और पार्रित करने की तिथि

प्रस्तार्वनार् के अन्तिम भार्ग में यह ऐतिहार्सिक तथ्य दर्ज कियार् गयार् है कि संविधार्न 26 नवम्बर, 1949 को स्वीकार कियार् गयार्। इसी दिन ही संविधार्न पर संविधार्न निर्मार्ण सभार् के प्रधार्न ने हस्तार्क्षर किए और इसको लार्गू कियार् जार्नार् घोषित कियार्।

स्व-निर्मित संविधार्न

भार्रत क संविधार्न स्व-निर्मित संविधार्न है। इसे भार्रत के लोगों के द्वार्रार् निर्वार्चित प्रतिनिधि संस्थार् के रूप में संविधार्न निर्मार्ण सभार् ने तैयार्र, स्वीकार और पार्स कियार् है। कुछ आलोचक यह तक्र देते हैं कि यह एक स्वीकृत संविधार्न नहीं है क्योंकि इस पर कभी भी जनमत-संग्रह नहीं करवार्यार् गयार्। परन्तु आलोचकों क यह तक्र अधिकतर संवैधार्निक विशेषज्ञ इस आधार्र पर रद्द कर देते हैं कि संविधार्न निर्मार्ण सभार् भार्रत की जनतार् और जनमत क पूर्ण रूप से प्रतिनिधित्व करती थी और इसके द्वार्रार् संविधार्न को तैयार्र, स्वीकार और पार्स करने क अर्थ इसे सभी लोगों के द्वार्रार् स्वीकार और पार्स कियार् जार्नार् थार्। अमरीक के संविधार्न को भी जनमत-संग्रह के लिए लोगों के सार्मने प्रस्तुत नहीं कियार् गयार् थार्। इस प्रकार भार्रत क संविधार्न भार्रत के लोगों के द्वार्रार् स्व-निर्मित, स्वीकृत और पार्रित कियार् गयार् और अपनार्यार् गयार् संविधार्न है।

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