भार्रतीय दर्शन क वर्गीकरण एवं परिचय

भार्रतीय दर्शन क वर्गीकरण एवं परिचय

By Bandey

अनुक्रम

इसे दो वर्गो में विभार्जित कियार् गयार् है।(अ) आस्तिक दर्शन (ब) नार्स्तिक दर्शनवेदों पर विश्वार्स करने वार्लार् आस्तिक है। तथार् वेदों की निंदार् करने वार्लार् नार्स्तिक है। धर्म क ज्ञार्न जिसको प्रार्प्त है। वह वेद है। आस्तिक दर्शन के अंतर्गत सार्मार्न्यत: छ: दर्शन आते है- 1. न्यार्यदर्शन, 2. वैशेषिकदर्शन, 3. सार्ंख्यदर्शन, 4. योंगदर्शन, 5.मीमार्ंसार्दर्शन, 6. वेदार्ंतदर्शन। नार्स्तिक दर्शन के अंतर्गत तीन दर्शन आते है- 1. चावार्कदर्शन, 2. जैनदर्शन, 3. बौद्धदर्शन।

आस्तिक दर्शन

आस्तिक दर्शन क क्रमबद्ध वर्णन है-


1. न्यार्यदर्शन-

न्यार्य शब्द की उत्पित्त संस्कृत की नी धार्तु से हुई है जिसक अर्थ शब्दों और वार्क्यों क निश्चित अथोर्ं में बोध होतार् है।3 मनु के अनुसार्र जो तर्क क आश्रय लेतार् है, वही भार्रतीय धर्म क स्वरूप समझतार् है, 4 अन्य कोई नहीं। न्यार्य-दर्शन क इतिहार्स लगभग 200 वषोर्ं क है। न्यार्य-दर्शन पुन: दो भार्गों में विभार्जित है-(क1) प्रार्चीन न्यार्यदर्शन(ख1) नव्य-न्यार्यदर्शन। 1 नार्स्तिको वेद निदक:। मनुस्मृति – 2/11 2 विदन्त्यनेन धर्मं वेद:। अमरकोष टीक – 1/5/3 3 ‘नियमेन ईयते इति’। पार्णिनीसूत्र – 3/3/37 4 आर्षं धर्मोपदेशं च वेदशार्त्रार्•विरोधिनार्। यस्तर्केषार्नुसन्धत्त्ो स धर्मं वेद नेतर:।। मनुस्मृति – 12/6 15 प्रार्चीन न्यार्य जहार्ँ प्रमेय प्रधार्न है वहीं नव्य न्यार्य प्रमार्ण प्रधार्न है। प्रार्चीन न्यार्य की शैली जहॉं सरल है, आडम्बर विहिन है। नवीन-न्यार्य की शैली विवेचनार् प्रधार्न विस्तृत आडम्बर पूर्ण है। न्यार्य-दर्शन के विभिन्न आचाय व उनकी रचनार्एँप्रार्चीन न्यार्य सूत्र शैली (पद्धति में निबद्ध है इनके रचियतार् निम्न है- महर्षि गौतम- प्रार्चीन न्यार्य क आदिम ग्रंथ द्वितीय शतार्ब्दी में गौतम विरचित ‘न्यार्य-सूत्रम्’ है। डार्. यार्कोबी ने न्यार्य-सूत्रों की रचनार् क काल तीसरी शतार्बदी मार्नार् है पं. विद्यार्भूषण छठी शतार्ब्दी मार्नते है। ब्रह्मार्ण्डपुरार्ण के अध्यार्य 23 के अनुसार्र गौतम क जन्म स्थार्न मिथिलार् (बिहार्र) है। वार्त्स्यार्यन- महर्षि वार्त्स्यार्यन ने न्यार्य-सूत्रों के गूढ़ रहस्यों (अर्थों) को समझने के लिए भार्ष्य क प्रणयन कियार्, जिसे ‘न्यार्य-भार्ष्य’ कहते है। इनक समय विक्रम वर्ष 300 ई. में मार्नार् गयार् है। श्री वार्चस्पति मिश्र- बौद्ध विद्वार्नों की न्यार्यवातिकों पर प्रतिकूल आलोचनार्ओं से बचने के लिए वार्चस्पति मिश्र ने सन् 840 में ‘न्यार्यवातिक-तार्त्त्पर्य टीका’ लिखी। उद्योतकार- इन्होने 625 ई. में न्यार्य-सूत्रों के वार्त्स्यार्यन भार्ष्य पर ‘न्यार्य वातिकम् लिखार्। जयन्त भÍ- इनकी एकमार्त्र रचनार् ‘न्यार्य मंजरी’ हैं। यह न्यार्यसूत्रों पर एक प्रमेय बहुलार् कृति है इनक काल नवम शतक मार्नार् जार्तार् है। भार्सर्वज्ञ- इनकी रचनार् ‘न्यार्य-सार्र’ है। रत्नकीर्ति ने ऊपोह-सिद्धि में इनके ग्रंथ को उद्धृत कियार् है। इनक समय 9 वी शतार्ब्दी के अन्त में है। उदयनार्चाय- वार्चस्पति मिश्र की आलोचनार् बौद्ध दाशनिकों ने की। इन आलोचनार्ओं से न्यार्य-सिद्धार्ंतों की रक्षार् करने के लिए इन्होने ‘न्यार्य 16 वातिक तार्त्त्पर्य टीका-परिशुद्धि’ नार्मक ग्रंथ की रचनार् की। इनक समय 10 वी शतार्ब्दी मार्नार् जार्तार् है। प्रार्चीन सूत्र पद्धति से ग्रंथ न लिखकर स्वतंत्र रूप से गं्रथों क निर्मार्ण नव्य-न्यार्य परम्परार् में कियार् गयार्। इनके निम्नलिखित रचयितार् हैं- गंगेश उपार्ध्यार्य- इनकी रचनार् ‘तत्व चिंतार्मणि’ है। यह नव्य-न्यार्य क आधार्रभूत ग्रंथ है। वर्द्धमार्न- यह गंगेश के पुत्र थे। इन्होने उदयन के ग्रंथो पर ‘न्यार्य-कुसुमार्ंजली प्रकाश’ तथार् गंगेश के ग्रंथो पर ‘तत्त्व चिंतार्मणि’ तथार् वल्लभार्चाय के न्यार्य-लीलार्वती पर ‘प्रकाश’ नार्मक टीक लिखी। रघुनार्थ शिरोमणि- इनक प्रमुख ग्रंथ गंगेश के ‘तत्त्व-चिंतार्मणि’ पर दीधिति टीक है। इनक काल 16वीं शतार्ब्दी मार्नार् गयार् है। मथुरार्नार्थ- इनक समय भी 16वीं शतार्ब्दी मार्नार् जार्तार् है। इन्होने ‘तत्व चिंतार्मणि आलोक दीधिति’, ‘किरणार्वली प्रकाश’ एवं ‘न्यार्य-लीलार्वति प्रकाश’ पर रहस्य टीकाएँ लिखी। जगदीशभÍार्चाय- इनक समय 17वीं शतार्ब्दी मार्नार् गयार् है। इनकी प्रमुख रचनार् ‘दीधिति की एक वृहत्त्ार्र व्यार्ख्यार् है, जिसे ‘गार्दार्धार्री’ की नार्म से जार्नते है। विश्वनार्थ पंचार्नन- ‘न्यार्य सिद्धार्ंत मुक्तार्वली’ कारिकावली’ इनकी रचनार्एँ है। न्यार्यसूत्र पार्ँच अध्यार्यों में विभक्त है, प्रत्येक अध्यार्य दो आन्हिकों में विभक्त है। इनमें षोड्श पदाथों के लक्षणों को परिभार्षित कियार् गयार् है।प्रमार्ण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टार्न्त, सिद्धार्ंत, अवयव, तर्क, निर्णय, 17 वार्द, जल्प, वितण्डार्, हेत्वार्भार्स, छल, जार्ति, निग्रह स्थार्न इन तत्वों को जार्न लेने से मोक्षकी प्रार्प्ति सुलभ हो जार्ती है। 1 इन षोड्श पदाथो के लक्षण निम्न है। प्रमार्ण- प्रमार् किसी भी वस्तु यार् पदाथ के स्वरूप के ज्ञार्न को कहार् जार्तार् है प्रमार् अर्थार्त् जो वस्तु जिस रूप में है, उसे उसी रूप में समझनार् प्रमार् है। प्रमार् के करण अर्थार्त् सार्धन को प्रमार्ण कहते है।2 प्रमार्ण चार्र प्रकार के होते है, प्रत्यक्ष, अनुमार्न, उपमार्न और शब्द।  प्रत्यक्ष प्रमार्ण- इन्द्रियों और अर्थ के सम्बन्ध से उत्पन्न हुआ जो अशब्द (नार्ममार्त्र से न कहार् हुआ), अव्यभिचार्री (न बदलने वार्लार्) और निश्चयार्त्मक हो वह प्रत्यक्ष प्रमार्ण कहलार्तार् है।3  अनुमार्न प्रमार्ण- लक्षण को देखकर जिस किसी वस्तु क ज्ञार्न होतार् है उसे अनुमार्न प्रमार्ण कहते है। यह प्रमार्ण तीन प्रकार क होतार् है- पूर्ववत्, शेषवत्, सार्मार्न्यतोदृष्ट।4  उपमार्न प्रमार्ण- किसी पदाथ में प्रसिद्ध पदाथ के लक्षण हो और उसकी पहचार्न उस पदाथ क नार्म लेकर कह देने मार्त्र से हो जार्य उपमार्न प्रमार्ण कहार् जार्येगार्।5 1 प्रमार्ार्णप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टार्न्तसिद्धार्न्तार्व्यवतर्कनिर्णयवार्द्जल्पवितण्डार्हेत्वार्भार्सछलजार्ति निग्रहस्थार्नार्नार्ं तत्त्वज्ञार्नार्न्निश्रेयसार्धिगम:। न्यार्यदर्शन – 1/1/1 पं. श्री रार्म शर्मार् 2 प्रमार्तार् येनाथं प्रमिणोति तत्त्प्रमार्णमिति। न्यार्यभार्ष्य – 1/1/1 3 प्रत्यक्षार्नुमार्नोपमार्नशब्दार्: प्रमार्णार्नि। न्यार्यदर्शन – 1/1/3, पं. श्री रार्म शर्मार् 4 इंद्रियाथसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञार्नमव्यपदेश्यमव्यभिचार्रि व्यवसार्यार्त्त्मक प्रत्यक्षम्। न्यार्यसूत्र – 1/1/4 5 अथ तत्पूर्वकं त्रिविधमनुमार्नं पूर्वच्छेषसार्मार्न्यतो दृष्टद्य। न्यार्यदर्शन – 1/1/5 पं. श्री रार्म शर्मार् 18  आप्त प्रमार्ण- आप्त जनों के उपदेश को शब्द प्रमार्ण कहते है। 1 वह दो प्रकार क है- दृष्ट व अदृष्ट।2 प्रमेय-भार्र को मार्पने के सार्धन रूप तरार्जू को तुलार् कहते है अैर परिमार्ण ज्ञार्न के विषय अर्थार्त् भार्र रूप सोनार्, चार्ंॅदी आदि द्रव्य को प्रमेय कहते है।3 संशय- एक ही वस्तु में समार्न धर्म के प्रत्यक्ष होने और उसके विशेष धर्म अप्रत्यक्ष रहने से उसी वस्तु में दो परस्पर विरोधी भार्वों क उत्पन्न होनार् संशय यार् भ्रम हैं।4 प्रयोजन-ग्रहण और त्यार्ग रूप प्रवृित्त्ार् को उत्पन्न करने वार्ली इच्छार् ही अर्थ अधिकार है। क्योंकि उस अर्थ अधिकार के द्वार्रार् ही हार्नि यार् लार्भ की प्रार्प्ती करार्ने से संबन्धित विषय में प्रवृित्त्ार् उत्पन्न होती है इसे ही प्रयोजन कहते है।5 दृष्टार्न्त-सार्ंसार्रिक तथार् परीक्षक दोनों प्रकार के मनुष्य की बुद्धि जिस विषय में समार्न हो उसे दृष्टार्न्त समझनार् चार्हिए।6 सिद्धार्न्त-प्रमार्ण से सिद्ध हुआ निर्णय सिद्धार्ंत है। यह तीन प्रकार के है-तंत्र, अधिकरण, अभ्युपगम।7 1 प्रसिद्धसार्धम्र्यार्त्सार्ध्यसार्धनमुपमार्नम्। न्यार्यदर्शन – 1/1/6 पं. श्री रार्म शर्मार् 2 आप्तोपदेश: शब्द:। न्यार्यदर्शन – 1/1/7, पं. श्री रार्म शर्मार् 3 स द्विविधो दृष्टार्दृष्टाथत्वार्त्। न्यार्यदर्शन – 1/1/8, पं. श्री रार्म शर्मार् 4 समार्नार्नेकधर्मोपपत्त्तेर्विप्रतिपत्त्ोरूपलब्ध्यनुपलब्ध्य। व्यवस्थार्तश्चविशेषार्पेक्षो विर्मर्श: संशय: ।। न्यार्यदर्शन – 1/1/23, पं. श्री रार्म शर्मार् 5 यमर्थमधिकृत्य प्रवर्त्त्ार्ते तत्प्रयोजनम्। न्यार्यदर्शन – 1/1/24, पं. श्री रार्म शर्मार् 6 लौकिक परीक्षार्णार्ं यस्मिन्नर्थे बुद्धि सार्म्यं स दृष्टार्न्त:। न्यार्यदर्शन – 1/1/25, पं. श्री रार्म शर्मार् 7 तन्त्रार्धिकरणार्भ्युपगमसंस्थिति: सिद्धार्न्त:। न्यार्यदर्शन – 1/1/26, पं. श्री रार्म शर्मार् 19 अवयव-प्रतिज्ञार्, हेतु, उदार्हरण, उपनय, निगमन अवयव कहलार्तार् है। अनुमार्न वार्क्य क एक देश अवयव कहलार्तार् है।1 तर्क-किसी पदाथ क वार्स्तविक रूप अज्ञार्त है, परन्तु तत्त्व ज्ञार्न के लिये, उसकी सिद्धि में जिन कारणों की कल्पनार् की जार्य उस कल्पनार् को तर्क कहते है।2 निर्णय-संशय उठार् पक्ष-प्रतिपक्ष द्वार्रार् अर्थ क अवधार्रण निश्चय निर्णय कहलार्तार् है।3 वार्द-एक पदाथ के विरोधी धमोर्ं के उल्लेख द्वार्रार् प्रमार्ण, तर्क, सार्धन और उसकी कमियॉं बतलार्ने के तत्व के पक्ष विपक्ष में प्रतिज्ञार् आदि अनुमार्न के पार्ँचों अवयवों के आधार्र से प्रश्नोत्त्ार्र करने को वार्द कहते है।4 जल्प-प्रमार्ण, तर्क आदि सार्धनों से युक्त जार्ति और निग्रह स्थार्नों के आक्षेप द्वार्रार् अपनं-अपने पक्ष क समर्थन करनार् जल्प है।5 वितण्डार्-जिसमें किसी पक्ष वार्ले क अपनार् कोई भी सिद्धार्ंत न हो और प्रत्येक पक्ष अपने प्रतिपक्ष को ठहरार्ने के लिए छल आदि से उसके मत क खण्डन करें, उसे वितण्डार् कहते है।6 1 प्रतिज्ञार् हेतूदार्हरणोपनयनिगमनार्न्यवयवार्:। न्यार्यदर्शन – 1/1/32, पं. श्री रार्म शर्मार् 2 अविज्ञार्ततत्वेर्थे कारणोपपित्त्ार्स्तस्तत्व ज्ञार्नाथमूहस्तर्क। न्यार्यदर्शन – 1/1/40, पं. श्री रार्म शर्मार् 3 विमृष्य पक्षप्रतिपक्षार्भ्यार्मर्थार्वधार्रणं निर्णय:। न्यार्यदर्शन – 1/1/41, पं. श्री रार्म शर्मार् 4 प्रमार्णतर्कसार्धनोपार्लम्भ: सिद्धार्न्तार्विरूद्ध: पंचार्वयवोपपन्नपक्ष प्रतिपक्ष परिग्रहोवार्द:। न्यार्यदर्शन – 1/1/32 5 यथोक्तोपपन्नश्छलजार्ति निग्रह स्थार्न सार्धनोपार्लभ्भो जल्प:। न्यार्यदर्शन – 1/2/2 पं. श्री रार्म शर्मार् 6 स प्रतिपक्षस्थार्पनार्हीनों वितण्डार्। न्यार्यदर्शन – 1/2/3 पं. श्री रार्म शर्मार् 20 हेत्वार्भार्स-जिसमें हेतु न हो ओर जो वार्स्तविक ज्ञार्न प्रत्यक्ष अथवार् परम्परार् से समर्थित अनुमिति क बार्धक हो ये सव्यभिचार्री, विरूद्ध, प्रकरणसम, सार्ध्यसम, कालार्तीत हेत्वार्भार्स है।1 छल-वार्क्य कहने वार्ले क प्रयोजन कुछ हो और अर्थ विपरीत कर दियार् जार्ए छल कहलार्तार् है।2 जार्ति- समार्न धर्म व विरूद्ध धर्म के द्वार्रार् जो खण्डन कियार् जार्य उसे जार्ति कहते हैं।3 निग्रहस्थार्न-किसी से कहे हुए उपदेश को न समझनार् यार् उसक उलटार् अर्थ समझनार् यह निग्रह स्थार्न कहार् गयार् है।4 वैशेषिक दर्शन : इसे कणार्द दर्शन भी कहते है क्योंकि कणार्द उलूक नार्मक ऋषि के कुल में उत्पन्न हुए थे। स्वयं भगवार्न् ने उलूक रूप में अवतीर्ण हो इन्हे पदाथ क ज्ञार्न करार्यार् थार्।5 विशेष नार्मक पदाथ की विशिष्ट कल्पनार् के कारण इसेवैशेषिक संज्ञार् प्रार्प्त हुई है।6 इस दर्शन के आचाय निम्नलिखित है- • रार्वण-भार्ष्य-यह भार्ष्य ‘अद्यार्वधि’ अप्रार्प्य है। 1 सव्यभिचार्र विरूद्ध प्रकरण समसार्ध्य समार्तीत कालार्हेत्वार्भार्स:। न्यार्यदर्शन – 1/2/4 पं. श्री रार्म शर्मार् 2 वचन व्यार्घार्तो•र्थ विकल्पोत्त्यार्छलम्। न्यार्यदर्शन – 1/2/10 पं. श्री रार्म शर्मार् 3 सार्धम्र्य-वैधम्र्यार्यार्ं प्रत्यवस्थार्नं जार्ति:। न्यार्यदर्शन – 1/2/18 पं. श्री रार्म शर्मार् 4 विप्रतिपित्त्ार्रप्रतिपन्तिश्च निग्रह-स्थार्नम्। न्यार्यदर्शन – 1/2/19 पं. श्री रार्म शमार् 5 तपस्विने कणार्दमुनये स्वयमीश्वर उलूकरूपधार्री, प्रत्यक्षीभूय पदाथष्ट्कमुपदि- देशेत्यैविह्य: श्रूयते। सर्वदर्शन संग्रह टीका, 12 शतार्ब्दी मार्धवार्चाय 6 श्री दुर्गार्धर झार्, भूमिका, प्र. भार् पृ. 1-2 21 प्रशस्तपार्द-इनक ‘पदाथधर्म-संग्रह’ वैशेषिक तत्वों के निरूपण के लिए अत्यन्त मौलिक रचनार् है इसे प्रशस्तपार्द भार्ष्य कहते हैं। इस पर आधार्रित कई टीकाएॅं व टीकाकार निम्न हैं- • व्योमशिवार्चाय- प्रशस्तपार्द भार्ष्य पर इनकी टीक ‘व्योमवती’ है। • उदयनार्चाय- इनकी टीक किरणार्वली है। • श्री धरार्चाय- ‘न्यार्य कन्दली’ नार्मक टीक 911 ई. में लिखी। • श्री वत्स- ‘न्यार्य लीलार्वती’ इनकी टीक है। • वल्लभार्चाय- इनकी टीक ‘न्यार्य-लीलार्वती’ ‘किरणार्वली’ के समार्न प्रसिद्ध है इनक काल 12 वी शतार्ब्दी क थार्। • पद्मनार्भ मिश्र – इनकी टीक क नार्म ‘सेतु’ है। • शंकर मिश्र- इनके ग्रंथ क नार्म ‘कणार्द-रहस्य’ है। • जगदीश भÍार्चाय- इनकी टीक ‘सूक्ति’ है। • मल्लिनार्थ सूरी- इनकी टीक – ‘प्रशस्तभार्ष्य निकष’ है। • शिवार्दित्य मिश्र- इनकी रचनार् ‘सप्तपदार्थ्र्ार्ी’ है। इसकी रचनार् 12वीं शतार्ब्दी से पूर्व हुई है। • विश्वनार्थ न्यार्य पंचार्नन- इनक समय 17वीं शतार्ब्दी क थार्। इनक सुप्रसिद्ध गं्रथ ‘तर्क-संग्रह’ है। वैशेषिक-दर्शन दस अध्यार्यों में विभक्त है। इन सभी अध्यार्यों को मिलार्कर 370 सूत्र है। पदाथों के भेदों को बोधकवैशेषिक होतार् है। हेय, हेतु, हार्न तथार् हार्नोपार्थ इन चार्रों प्रतिपार्द्य विषयों को समझने के लिये छ: पदाथ वैशेषिक दर्शन में मार्ने गये है। धर्म विशेष से उत्पन्न हुआ जो द्रव्य, गुण, कर्म, सार्मार्न्य, विशेष, समवार्य पदाथों क सार्धम्र्य और वैधम्र्य से तत्त्वज्ञार्न उससे मोक्ष होतार् है। द्रव्य, गुण, कर्म मुख्य पदाथ है। इनसे प्रयोजन सिद्ध होतार् है शेष पदाथ केवल शब्द व्यवहार्र के ही उपयोगी है। द्रव्य नौ प्रकार के हैं- द्रव्य-पृथ्वी, जल, अग्नि, वार्यु, आकाश, काल, दिशार्, आत्मार्, मन। क्रियार् के गुणवत् समवार्यकारण ही ही द्रव्य क लक्षण है।3 गुण- द्रव्य क आश्रय गुण है जो संयोग विभार्ग के कारण से होतार् है। गुणों की संख्यार् चौबीस है- रूप, रस, गंध, स्पर्श, संख्यार्, परिमार्ण, पृथक्त्व, संयोग, विभार्ग, परत्व, अपरत्व, गुरूत्व, द्रवत्व, स्नेह, शब्द, बुद्धि, सुख, दु:ख, इच्छार्, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, संस्कार।5 कर्म- चलनार् रूप कर्म है, यह उत्क्षेपण-अवक्षेपण, आकुंचन, प्रसार्रण, गमन आदि है। सार्मार्न्य- किसी अर्थ की जो जार्ति किस्म है वह सार्मार्न्य है सार्मार्न्य के दो भेद हैं पर व अपर। एक व्यार्पक जार्ति जिसकी अवार्न्तर जार्तियार्ँ और भी हो, जैसे वृक्षत्व पर सार्मार्न्य तथार् अवार्न्तर जैसे आम्रत्व अपर सार्मार्न्य कहलार्ती है।7 1 धर्मार्विशेषप्रसूतार्द् द्रव्यगुणकर्मसार्मार्न्यविशेषसमवार्यार्नार्ं पदाथार्नार्ं सार्धम्र्य वैधम्र्यार्भ्यार्ं तत्वज्ञार्नार्न्नि: श्रेयसम। वैशेषिक सूत्र – 1/1/4 2 पृथिव्यार्पस्तेजोवार्युरार्काशं कालो दिगार्त्मार् मन इति द्रव्यार्णि। वैशेषिक सूत्र – 1/1/5 3 क्रियार्गुणवत् समवार्यिकारणमिति द्रव्य लक्षणम्। वैशेषिक सूत्र – 1/1/15 4 द्रव्यार्श्रयगुणवार्न् संयोगविभार्गेष्वकारणमनपेक्ष इति गुण लक्षणम्। वैशेषिक सूत्र – 1/1/16 5 रूप्रसगन्धस्पर्शार्: संख्यार्: परिमार्णार्नि पृथक्त्वं संयोगविभार्गौ परत्वार्परत्वे बुद्धय: सुख दु:खे इच्छार्द्वेषौ प्रयत्नार्श्च गुणार्:। वैशेषिक दर्शन -1/1/6 6 उत्क्षेपणमवक्षेपणमार्कुंचनं प्रसार्रणं गमनमिति कर्मार्णि। वैशेषिक दर्शन – 1/1/7 7 एकद्रव्यमगुणं संयोगविभार्गेष्वनप्रक्षकारणमिति कर्मलक्षणार्म् द्रव्यगुणकर्मणार्ं द्रव्यं कारणं सार्मार्न्यम्। वैशेषिक दर्शन – 1/1/8 23 विशेष- ऐसार् पदाथ जो पहचार्न क निमित्त्ार् है, वही विशेष पदाथ है। विशेष पदाथ है। विशेष, अविशेष, लिंगमार्त्र और अलिंग-ये गुणों के पर्व है।1 समवार्य- जहॉं गुण-गुणी क सम्बन्ध, वहार्ंॅ सम्बन्ध को समवार्य कहते है। ऐसे सम्बन्धो को संयोग भी कहते है। वैशेषिक प्रयत्न और अनुमार्न दो प्रमार्णों को स्वतंत्र मार्नतार् है, उपमार्न व शब्द को अनुमार्न के अंतर्गत स्वीकार है। सार्ंख्यदर्शन : सार्ंख्यदर्शन में छ: अध्यार्य मार्ने जार्ते है। तथार् 527 सूत्र है। यह दर्शन आत्मार् क ज्ञार्न करार्तार् है तथार् प्रकृति और चौबीस तत्त्वों क विवेचन करतार् है। इसलिये इसे सार्ंख्य कहार् गयार् है। 2 यहार्ँ संख्यार् की प्रधार्नतार् रहती है इसलिये इसे सार्ंख्य दर्शन कहते है। सार्ंख्य-दर्शन के मुख्य आचाय निम्न है-मार्न्यतार्नुसार्र महार्मुनि कपिल सार्ंख्य के प्रथम आचाय मार्ने जार्ते है। • आसुरि- ‘अज्ञार्तनार्मार् वार्ड्मय’ इनक ही है जो लुप्त है। • पंचशिख- ‘भिक्षुसूत्र‘ सार्ंख्यार्नुयार्यी भिक्षुओं के आचार्र के निदर्शन के लिए सार्ंख्यार्चाय पंचशिख द्वार्रार् प्रणीत गं्रथ है जो अब लुप्त हो चुक है। • जैगीषव्य- अश्वघोष में बुद्धचरित (12/66) में प्रार्चीन आचाय के रूप में इन्हें निर्देशित कियार् है। इनकी कोई भी रचनार् उपलब्ध नहीं है। 1 विशेषार्विशेषलिंगार्नि गुणपर्वार्णि। व्यार्सभार्ष्य – 19 2 संख्यार् प्रकुर्वते चैव प्रकृतिं च प्रचक्षते। तत्त्वार्नि च चतुर्विशत् तेन सार्ंख्यार्: प्रकीर्तितार्:।। महार्भार्रत-शार्ंतिपर्व – 306/43.43 24 • वाषगण्य- इनकी कोई भी रचनार् प्रार्प्त नहीं है इनके निर्देश विभिन्न ग्रंथो में प्रार्प्त होते है। • ईश्वरकृष्ण- इनकी रचनार् ‘सार्ंख्यकारिका’ है। • विन्ध्यवार्सी- इनक समय ईसार् की चतुर्थ शतार्ब्दी के अंतिम भार्ग से लेकर • पंचम शतार्ब्दी के मध्य तक मार्नार् जार्तार् है। विभिन्न ग्रंथो में इनके निर्देश मिलते है। • विज्ञार्नभिक्षु- इन्होंने ‘सार्ंख्य-प्रवचन सूत्रों पर सार्ंख्य प्रवचन भार्ष्य लिखार् है तथार् सार्ंख्यसार्र नार्मक प्रकरण गं्रथ भी लिखे है। • भार्वगणेश-इन्होनें ‘तत्वसंग्रह’ पर ‘तत्वयार्थार्थ्र्यदपिन’ नार्मक व्यार्ख्यार् ग्रंथ लिखे है। सत्व, रज और तमो गुण की सार्म्यार्वस्थार् प्रकृति है। प्रकृति से महत्, महत् से अहंकार, अहंकार से पंचतन्मार्त्रार्यें और दोनों प्रकार की इन्द्रियॉ उत्पन्न होती है। तन्मार्त्रार्ओं स्थूल-भूत उत्पन्न होते हैं इनके अतिरिक्त पुरूष पदाथ को मिलार्कर पच्चीस तत्वों क गण होतार् है। 1 महत् नार्मक पहलार् कार्य मनन व्यार्पार्रवार्लार् ‘मन’ है। 2 महत् आदि के क्रम से पार्ँच भूतों की सृष्टि होती है।3 पृथ्वी, जल, तेज, आकाश व वार्यु पार्ँच तत्त्व है। अध्यवसार्य (निश्चयार्त्मक वृित्त्ार्) बुद्धि है। 4 अभिमार्न वृित्त्ार् वार्लार् अहंकार है। कर्मेन्द्रिय और ज्ञार्नेदिं्रयों के सार्थ ग्यार्रहवार् आंतरिक 1 सत्त्वरजस्र्तमसार्ं सार्म्यार्वस्थार् प्रकृति: प्रकृतेर्महार्न् महतो अहंकारो•हंकारार्त् पंचतन्मार्त्रार्ण्युभुयमिन्द्रियं तन्मार्त्रेभ्य: स्थूलभूतार्नि पुरूष इति पंचविंशतिर्गण:। सार्ंख्यदर्शन -1/61 2 महदार्ख्यमार्ंद्य कार्यं तन्मन:। सार्ंख्यदर्शन – 1/71 3 महार्दार्दिक्रमेण पंचभूतार्नार्म्। सार्ंख्यदर्शन -2/10 4 अध्यवसार्यो बुद्धि:। सार्ंख्यदर्शन – 2/13 25 इन्द्रिय ‘मन’ है। 1 कर्मेन्द्रियार्ँ- हार्थ, पार्ँव, मुँह, गुदार्, उपस्थ तथार् ज्ञार्नेन्द्रियार्ँ जैसे- श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसनार्, घ्रार्ण। यहार्ँ तीन प्रमार्ण मार्ने गये है- दोनों (बुद्धि और आत्मार्) से एक (पुरुष) क अज्ञार्त अर्थ क निश्चय ‘प्रमार्’ कहलार्तार् है, उस (प्रमार्) क जो अतिशय सार्धक है वह त्रिविध प्रमार्ण कहलार्तार् है।2 जिस (विषय) के सार्थ सम्बद्ध होतार् हुआ उसी के आकार को ग्रहण करने वार्नार् जो ‘विज्ञार्न’ है वही प्रत्यक्ष-प्रमार्ण है। 3 व्यार्प्ति के ज्ञार्न से व्यार्पक क ज्ञार्न अनुमार्न व्यार्प्ति के ज्ञार्न से व्यार्पक क ज्ञार्न अनुमार्न प्रमार्ण है। आप्त क उपदेश शब्द प्रमार्ण है। योगदर्शन : ‘योगदर्शन’ पतंजलि क दर्शन है, जिसे रार्जयोग की संज्ञार् मिली है पतंजलि ने इसे ही सजार्कर अपने मौलिक विचार्रों के रूप में व्यवस्थित कियार् है।योग क अर्थ है जोड़नार् अर्थार्त् से परमार्त्मार् को जोड़नार्।इससे सम्बद्ध सार्हित्य व रचनार्कार निम्न है- • हिरण्यगर्भ-’योगदर्शन’ के प्रार्चीन रचनार्कार हिरण्यगर्भ को मार्नार् है। • पतंजलि-’योगदर्शन’ पतंजलि क ही मौलिक ग्रंथ स्वीकारार् गयार् है ये योग के प्रवर्त्त्ार्क, प्रचार्रक व संशोधक भी है। ‘योगसूत्र‘ के रचयितार् पतंजलि ही है इस सूत्र की रचनार् विक्रमपूर्व द्वितीय शतार्ब्दी में मार्नी गई है। • वार्चस्पति मिश्र- इनकी ‘तत्ववैशार्रदी’ रचनार् प्रसिद्ध है। 1 कर्मेन्द्रियबुद्धीन्द्रियैरार्न्तरमेकादशकम्। सार्ंख्यदर्शन – 2/19 2 द्वयोरेकतरस्य वार्•प्यसन्निकृष्टाथपरिच्छिति: प्रमार् तत्सधकतमं यत् त्रिविधं प्रमार्णम्। सार्ंख्यदर्शन- 1/87 3 यत् सम्बंद्ध सत् तदार्कारोल्लेखि विज्ञार्नं प्रत्यक्षम्। सार्ंख्यदर्शन – 1/89 26 • विज्ञार्नभिक्षु- इनकी ‘योगवातिक’ रचनार् प्रसिद्ध है। • भोजकृत – इनकी ‘रार्जमातण्ड’ रचनार् प्रसिद्ध है। • भार्वार्गणेश- इनकी ‘वृित्त्ार्’ रचनार् प्रसिद्ध है। • रार्मार्नंदयति- इनकी ‘मणिप्रभार्’ रचनार् प्रसिद्ध है। • अनंत पंडित- इनकी ‘योगचंन्द्रिका’ रचनार् प्रसिद्ध है। • सदार्शिवेन्द्र सरस्वती- इनकी ‘योगसुधार्रक’ रचनार् प्रसिद्ध है। योगदर्शन में चार्र पार्द व 195 सूत्र है। प्रत्यक्ष, अनुमार्ण व आप्त ये तीन प्रमार्ण सार्ंख्यदर्शन की भार्ँति ही है।1 योग क अर्थ जोड़नार् है अर्थार्त् आत्मार् से परमार्त्मार् को जोड़नार्। मीमार्ंसार् : इसक अर्थ है विवेचन करनार् यह पूजाथक मार्न धार्तु से जिज्ञार्सार् अर्थ में मीमार्ंसार् शब्द निष्पन्न हुआ है। 2 इसे पूर्व यार् कर्ममीमार्ंसार् भी कहते है। इसमें मंत्रो क विनियोग व आहुतियों को कर्म क विधार्न बतलार्यार् है। यह एक प्रकार क नीतिशार्स्त्र भी है। इसकी रचनार् व रचनार्कार निम्न है- • महर्षि जैमिनी- इनकी रचनार् ‘मीमार्ंसार् सूत्र‘ है। ‘मीमार्ंसार्सूत्र‘ के व्यार्ख्यार्कार, भार्ष्यकार निम्न है। • उपवर्ष- शबरस्वार्मी ने मींमार्सार्भार्ष्य (1/1/5) में तथार् शंकरार्चाय ने ‘शार्रीरिकभार्ष्य (3/3/53)’ में इनके मतों क उल्लेख कियार् है। • भवदार्स- भवदार्स ने पूर्वमींमार्सार् के 16 अध्यार्यों में ‘वृित्त्ार्गं्रथ’ लिखार् है। • वृित्त्ार्कार- वृित्त्ार्कार क उल्लेख शबरभार्ष्य (1/1/5) में हुआ है। 1 प्रत्यक्षार्नुमार्नार्गमार्: प्रमार्णनि। पार्तंजल योगसूत्र – 1/7 2 द्रष्टव्य:- ‘मार्नेर्जिज्ञार्सार्यार्म्’, व्यार्करण वातिक – 1 27 • बौधार्यन- इन्होने पूर्व व उत्तरमींमार्सार् सूत्रों पर टीक लिखी। • कुमार्रिल भÍ- यह मींमार्सार् के पुनरूद्धार्रक मार्ने जार्ते है ब्रह्मटीका, मध्यटीक व अन्य कई ग्रंथ है। मीमार्ंसार् क अन्य भार्ग उत्त्ार्र मीमार्ंसार् अर्थार्त् वेदार्न्त दर्शन कहलार्तार् है। पूर्वमीमार्ंसार् में छ: प्रमार्णों क उल्लेख है। प्रत्यक्ष, अनुमार्न, शब्द, उपमार्न अर्थार्पित्त्ार् एवं अनुपलब्धि। जिस अर्थ के बिनार् दृष्टार् यार् श्रुत विषय की उपपित्त्ार् न हो अथार्पित्त्ार् किसी वस्तु के अभार्व के सार्क्षार्त् ज्ञार्न को अनुपलब्धि प्रमार्ण कहते है। प्रत्यक्ष, अनुमार्न, शब्द व उपमार्न प्रमार्ण न्यार्य दर्शन जैसे है। उत्त्ार्रमीमार्ंसार् यार् वेदार्न्तदर्शन : भार्रतीय अध्यार्त्मशार्स्त्र की सभी दाशनिक प्रवृित्त्ार्यों और विचार्रधार्रार्ओं में वेदार्ंतदर्शन सर्वश्रेष्ठ है। वेदार्न्त अर्थार्त् वेदों क अंत-उत्त्ार्र भार्ग जहार्ँ वेदों क सम्पूर्ण सार्र आ जार्तार् है। ब्रह्मज्ञार्न ही सत्य और अनन्त है। मनुष्य मार्त्र के लिए वेदों क सार्र अर्थार्त् जीव में ब्रह्मैक्य क सम्पार्दन है। वेदार्न्त क भव्य-प्रसार्द जिन भिित्त्ार्यों पर खड़ार् है, वे तीन है- उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र तथार् गीतार्। वेदों क सार्र ही उपनिषद् में वर्णित है। सम्पूर्ण वेदार्न्त दर्शन में अविद्यार् की निवृित्त्ार् ही मोक्ष है वही ब्रह्म प्रार्प्ति हैं। इस दर्शन में तीन प्रमार्ण है। प्रत्यक्ष, अनुमार्न व आगम।1 वस्तु से सम्बद्ध होतार् हुआ जो विज्ञार्न सम्बद्ध वस्तु क आकार धार्रण कर लेतार् है वह विज्ञार्न अर्थार्त् बुद्धिवृित्त्ार् ही प्रत्यक्ष प्रमार्ण है- प्रतिबन्ध यार् व्यार्प्ति को देखकर प्रतिबद्ध यार् व्यार्प्य क ज्ञार्न करनार् अनुमार्न है। आप्त यार् आगम 1 तत्र प्रत्यक्षार्नुमार्नार्गमार्: प्रमार्णार्नि। योगसूत्र-1/7, पृ. 28 28 प्रमार्ण आप्त पुरूष क उपदेश जो सभी अस्तिक दर्शनों में एक समार्न है। इस दर्शन के आचाय व उनकी रचनार्एँ निम्न है- • श्री व्यार्सजी- इन्होने सर्वप्रथम उत्त्ार्रमीमार्ंसार् वेदार्ंतदर्शन की रचनार् की है। • बदरार्यण-’ब्रàसूत्र‘ की रचनार् की है जो वेदार्ंतदाशन क मूल ग्रंथ है। • शंकरार्चाय- इनक समय (788-820 ई.) क है इनक ‘शार्रीरिक भार्ष्य’ नार्मक रचनार् है व अद्वैतवार्द की स्थार्पनार् की है। • भार्स्करार्चाय- इनक भार्ष्य ‘भार्स्कर-भार्ष्य’ है इनक समय 1000 ई. क है। • रार्मार्नुज- इनक समय 1140 ई. है ‘विशिष्टद्वैवार्वार्द’ इनकी रचनार् है। • मार्धवार्चाय- इनक समय 1238 ई. क है इन्होने द्वैतवार्द मत की स्थार्पनार् की ‘पूर्णप्रज्ञार् भार्ष्य’ इनक है। नार्स्तिक दर्शन : उपनिष्द् काल के तुरंत पश्चार्त् ही नार्स्तिक दर्शन क जन्म हुआ। ये निम्न है- चावार्क दर्शन : चावार्क शब्द चर्व, धार्तु से बनार् है जिसक अर्थ है-’चबार्नार्’ इसमें भोजन, पार्न, भोग प्रभृति क उपदेश दियार् गयार् है। चावी बुद्धि को कहते हैं और बुद्धि से सम्बद्ध होने के कारण इस आचाय को चावी यार् चावार्क कहते है।1 चावार्क के अनुसार्र जब आत्मार् है ही नही ंतो फिर परलोक, पुनर्जन्म धर्म-अधर्म और पार्प-पुण्य की मार्न्यतार् 1 पिव खार्द च जार्त शोभते। प्रबोधचन्द्रोदय -2/5 29 कैसी? इसलिए जब तक जीवन है, मनुष्य को सुखपूर्वक जीनार् चार्हिए। मृत्यु के पश्चार्त मनुष्य जीवन धार्रण नही करतार्।1 चावार्क एकमार्त्र प्रत्यक्ष को ही प्रमार्ण मार्नतार् है।2 चावार्क दर्शन के सार्हित्य- ब्रर्हस्पत्य सूत्र ही चावार्क दर्शन के सर्वस्व है। हरिभद्र सूरिरचित षड़्दर्शनसमुच्चय में भी चावार्क की चर्चार् आई है। इसमें चावार्क दर्शन की कल्पनार् है तथार् आठ श्लोकों में इस सार्हित्य क विवरण प्रस्तुत कियार् गयार् है। मार्धवार्चाय क सर्वदर्शन संग्रह जिसमें चावार्क दर्शन के प्रार्य: सभी तथ्यों को संकलित करने की चेष्टार् की गई है। जैनदर्शन : जिन लोगो द्वार्रार् प्रविर्त्त्ार्त धर्म और दर्शन क नार्म जैन है। ‘जि’ जये धार्तु से नक् (उणार्दि) प्रत्यय लगकर ‘जिन’ शब्द क निर्मार्ण हुआ है इसी जिन शब्द क विशेषण ‘जैन’ हुआ। यह दर्शन वस्तुवार्दी तथार् बहुसत्त्ार्ार्वार्दी है। इनके अनुसार्र जिन द्रव्यों को हम देखते है वे जीव और अजीव दोनों है। जैनदर्शन स्यार्द्वार्द को अत्यधिक महत्व देतार् है। मोक्षतत्व के लिए दुद्गल से वियोग ही मोक्ष मार्नार् गयार् है। अन्य आस्तिक दर्शनों की तरह जैन दर्शन में भी प्रत्यक्षार्नुमार्न व शब्द प्रमार्ण स्वीकृत हुए हैं।जैन दर्शन में काल के आधार्र पर सार्हित्य तथार् प्रर्वत्त्ार्क- • आगमकाल- इस काल में श्वेतार्ंबर एवं दिगंबरो के आगम सार्हित्य आते है। श्वेतार्म्बर मतार्नुसार्र प्रमुख ग्रंथ समवायार्ंग, स्थार्नार्ंग, नदी आदि। दिगम्बर मतार्नुसार्र प्रमुख गं्रथ कषार्यपार्हुड़ महार्बंध, नियमसार्र आदि। 1 नयते चावी लोकायते चावी बुद्धि: तत्सम्बन्धार्दार्चायो•पि चावी, स च लोकायते शार्स्त्रे पदाथन्नयते। कशिकावृित्त्ार् – 1/3/36 2 यार्वज्जीवं सुखं जीवेन्नार्स्ति मृत्योरगोचर: भरमीभूतस्य देहस्य पुनरार्गमनं कुत:।। सर्वदर्शन संग्रह -1 30 • अनेकांतस्थार्पनकार- इसमें सिद्धसेन व समंतभद्र दो मुख्य दाशनिक हुए। सिद्धसेन की प्रमुख कृतियार्ँ है, सन्मति तर्क, न्यार्यार्वतार्र एवं बत्त्ार्ीसियार्ं आदि। समंतभद्र की रचनार् आप्त-मीमार्ंसार्, युक्त्यनुशार्सन आदि। • प्रमार्णशार्स्त्र व्यवस्थार्काल- हरिभद्र नार्मक दर्शनिक के गं्रथ-षड्दर्शनसम्मूचय, अनेकांतजयपतार्क है व अकलंक के ग्रंथ- लघीस्त्रय, न्यार्यविनिश्चय, तत्वाथवातिक आदि है। • नवीनन्यार्यकाल- यार्शोविजय के ग्रंथ भार्षार्रहस्य जैनतर्कभार्षार्, नयोपदेश, इनेकांतव्यवस्थार् आदि है। बौद्ध-दर्शन : समार्ज में व्यार्प्त अंधविश्वार्स व रूढियों के विरूद्ध बौद्ध-दर्शन क उद्भव हुआ। यह ‘विज्ञार्न-प्रवार्ह’ को मार्नतार् है। वर्तमार्न मार्नसिक अवस्थार् क कारण पूर्ववती मार्नसिक अवस्थार् बतार्यार् गयार् है। बौद्ध-दर्शन के दो संप्रदार्य मार्ने गये है- हीनयार्न व महार्यार्न। यहार्ँ निर्वार्ण (मोक्ष) के लिये विवार्दों के प्रति उदार्सीनतार्, निरार्शार्वद, यथाथवार्द, व्यवहार्रवार्द पर अधिक बल दियार्। इसमें प्रमार्ण व्यवस्थार्वार्दी है। दिंगनार्ग ने ‘‘अज्ञार्ताथज्ञार्पकतार्’’ के कारण ही दो प्रमेयों क प्रतिपार्दन कियार् है स्वलक्षण व सार्मार्न्यलक्षण। अत: इन दार्नों के लिए प्रमार्ण भी दो प्रकार के मार्ने गये है- प्रत्यक्ष एवं अनुमार्न। प्रत्यक्ष क विषय स्वलक्षण है तथार् अनुमार्न क विषय सार्मार्न्य लक्षण है।1 बौद्धदर्शन के सम्प्रदार्य एवं शार्खार्ओं के आधार्र पर ग्रंथ तथार् गं्रथार्कार विभार्जित है- 1 प्रत्यक्षमनुमार्नंच प्रमार्णं द्विलक्षणम। प्रमेयं तत्प्रयोगाथं न प्रमार्णार्न्तरं भवेत् ।। अत्र प्रमार्णं द्विविधमेव। कुतश्चेत् द्विलक्षणं प्रमेयं। स्वसार्मार्न्यलक्षणार्भ्यार्ं भिन्नलक्षणं प्रमेयार्न्तरं नार्स्ति।। प्रमार्णसमुच्चयवृित्त्ार्: – 2, पृ. 4 31 • गौतमबुद्ध- बौद्ध-दर्शन के प्रर्ततक गौतक बुद्ध ही थे। इन्होंने अपने उपदेश पार्लि भार्षार् में लिखे है। • आनंद- इन्होंने ‘सुत्त्ार्पिटक’ क संकलन कियार्। • उपार्लि- इन्होंने ‘विनयपिटक’ क संकलन कियार्। • नार्गाजुन-’मूल मार्ध्यमिक कारिका’ क संकलन कियार्।

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