भार्रतीय अर्थव्यवस्थार् की मुख्य विशेषतार्एं

1. कृषि पर निर्भरतार् :-

भार्रत की लगभग 70 प्रतिशत जनसंख्यार् कृषि पर आधार्रित है। कृषि क कुल रार्ष्ट्रीय आय में 30 प्रतिशत क योगदार्न है। विकसित देशों में रार्ष्ट्रीय आय में योगदार्न 2से 4 प्रतिशत है। वर्षार् कृषि के लिये जल क प्रमुख स्त्रोत है। अधिकांश क्षेत्रों में पुरार्नी तकनीक से कृषि की जार्ती है।

2. तकनीकी पिछड़ार्पन :-

भार्रतीय अर्थव्यवस्थार् में प्रार्य: सभी उद्योंगेार्ं में उत्पार्दन की पुरार्नी तकनीक क प्रयोग कियार् जार्तार् है। अनुसंधार्न व विकास पर भी कम व्यय कियार् जार्तार् है। उन्नत तकनीक क प्रयोग केवल कुछ उद्योंगों में कियार् जार्तार् हैं।

3. अपर्यार्प्त बुनियार्दी सुविधार्एं :-

अधोसंरचनार्त्मक सुविधार्ओं में ऊर्जार्, परिवहन व संचार्र आदि सुविधार्ओं को शार्मिल कियार् जार्तार् है, जो औद्योगिक विकास के लिए आवश्यक है। ये सुविधार्एं कृषि एवं सेवार् क्षेत्रों के विकास को प्रभार्वित करती है। भार्रत में ये सुविधार्एं कम हैं।

4. निम्न आय क स्तर :-

भार्रत ने प्रति व्यक्ति की आय कम है। आय क यह स्तर उपभोग व रहन सहन के निम्न स्तर को दर्शार्तार् है। भार्रत में उत्पार्दन में वृद्धि के सार्थ-सार्थ जनसंख्यार् में तीव्र वृद्धि हुर्इ। इसके अतिरिक्त प्रत्येक भार्रतीय की औसत वाषिक आय कम हैं। भार्रत में आय की असमनतार्एं है। लगभग एक तिहाइ जनसंख्यार् गरीबी रेखार् से नीचे है अर्थार्त् न्यूनतम पोषण आहार्र भी नहीं मिल रहार् है।

5. जनसंख्यार् की ऊॅंची वृद्धि दर :-

भार्रत की जनसंख्यार् तीव्र गति से बढ़ रही है । 1951 में जब विकास की प्रक्रियार् शुरू हुर्इ तब मृत्यु दर में तेजी से कमी आर्इ । जनसंख्यार् की ऊॅंची वृद्धि दर से संसार्धनों पर अतिरिक्त दबार्व पड़ार् है । रार्ष्ट्रीय आय में वृद्धि की तुलनार् मेंप्रति व्यक्ति आय में वृद्धि कम हुर्इ है।

6. पूंजी की कमी :-

भार्रत में आय क स्तर कम होने से बचत में कमी होती है जिससे पूंजी निर्मार्ण की दर भी कम होती है । पूंजी की कमी से अन्य संसार्धन जैसे श्रम और प्रार्कृतिक संसार्धनों क उपयोग पूर्ण रूप से नही हो पार्तार् है । भार्रत में प्रार्कृतिक क संसार्धनों क भंडार्र है, लेकिन पूंजी के अभार्व में इनक उपयोग पूरार् नही हो पार्तार् है ।

7. ऊॅची निरक्षरतार् दर :-

भार्रत में निरक्षर क प्रतिशत सार्क्षरतार् की तुलनार् में कम है । महिलार्ओं में यह दर और अधिक है ।

8. जीवन व कार्य के प्रति रूढ़ीवार्दी दृष्टिकोण :-

भार्रतीय समार्ज में बहुत सी जार्तियॉ व उप जार्तियॉ है, जिनमें संघर्ष होतार् रहतार् है । धामिक व सार्मार्जिक विश्वार्स व परम्परार्एं एक वैज्ञार्निक दृष्टिकोण के विकास में बार्धक होती है। इससे जनसंख्यार् में वृद्धि होती है। रूठिवार्दितार् धर्म आदि के कारण विकास में बार्धार् उत्पन्न होती है।

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