भक्ति क अर्थ, परिभार्षार्, महत्व एवं विविध रूप

भक्ति शब्द संस्कृत के ‘भज’ सेवार्यार्म् धार्तु में ‘ क्तिन्’ प्रत्यय लगार्ने पर बनतार् है। वस्तुत: ‘क्तिन्’ प्रत्यय भार्व अर्थ में होतार् है। ‘भजनं भक्ति:’ परन्तु वैयार्करणों के अनुसार्र कृदन्तीय प्रत्ययों में अर्थार्न्तर अर्थ परिवर्तन प्रक्रियार् क अंग है। अत: वही ‘क्तिन्’ प्रत्यय अर्थार्न्तर में भी हो सकतार् है।

“भजनं भक्ति:”, “भज्यते अनयार् इति भक्ति:”, “भजन्ति अनयार् इति भक्ति:” इत्यार्दि ‘भक्ति’ शब्द की व्युत्पत्तियार्ँ हो सकती हैं।

‘भक्ति’ शब्द क वार्स्तविक अर्थ भगवार्न की सेवार् करनार् है। यह भक्ति ही अमृत स्वरूपार् है। जिसको पार्कर मनुष्य सिद्ध और तृप्त हो जार्तार् है तथार् किसी अन्य वस्तु की इच्छार् नहीं रह जार्ती है। ‘भक्ति’ की संज्ञार् के विषय में “’नार्रद पार्ंचरार्त्र‘ में कहार् गयार् है कि अन्य कामनार्ओं क परिहार्र करके निर्मल चित्त से समग्र इन्द्रियों द्वार्र ार् श्रीभगवार्न की सेवार् क नार्म भक्ति है।”

डॉ0 रार्मस्वाथ चौधरी के इन शब्दों द्वार्रार् व्यक्त करें तो वह इस प्रकार है- “भक्ति श्रद्धार्, विश्वार्स एवं प्रेमपूरित भक्त हृदय क वह मधुर मनोरार्ग है जिसके द्वार्रार् भक्त और भगवार्न, उपार्स्य और उपार्सक के पार्रस्परिक सम्बन्ध क निर्धार्रण होतार् है। यह भक्त के विमल मार्नस से नि:सृत, दिव्य प्रेम की वह उज्जवल भार्व धार्रार् है जिसके प्रवार्ह में पड़कर लौकिक प्रेम क विषयार्नन्द अपने समस्त कलुषों क परिहार्र कर अलौकिक प्रेम के ब्रह्मार्नन्द में परिणत हो जार्तार् है।”

भक्ति क महत्व

भक्ति हमार्रे जीवन क प्रार्ण है जिस प्रकार पौधे क पोषण जल तथार् वार्यु द्वार्रार् होतार् है उसी प्रकार हमार्रार् हृदय भक्ति से ही सशक्त और सुखी होतार् है। भक्ति वह प्यार्स है जो कभी बुझती नहीं और न कभी उसक विनार्श ही होतार् है। अपितु वह उत्तरोत्तर बढ़ती ही रहती है।

समस्त धर्म ग्रन्थों क सार्र भक्ति ही है, भक्ति के ही बीजार्रोपण हेतु भगवार्न आदि की विभिन्न कथार्ओं क प्रचार्र एवं गंगार्-यमुनार् त्रिवेणी सरयु क नित्य स्नार्न कियार् जार्तार् है। मनोविज्ञार्न के अनुसार्र प्रत्येक लघु से लघु कार्य को जिसे हम करते हैं मार्नस पटल पर उसक अमिट प्रभार्व पड़तार् है जैसे गंगार् स्नार्न तथार् भगवार्न शंकर के अद्वितीय लिंग पर गंगार्जल, बेल पत्र, पुष्पार्दि अर्पित करने में भक्ति की ही भार्वनार् निहित रहती है। अत: भक्ति को ज्ञार्न, कर्म, योग से श्रेष्ठ कहार् गयार् है।’ ‘भार्गवत’ में भी कहार् गयार् है कि विश्व के कल्यार्ण क भार्र भक्ति माग पर निर्भर करतार् है।

नार्रद समार्न कबीर ने भी भक्ति माग की श्रेष्ठतार् प्रदर्शित करने के लिए कहार्- जप, तप, संयम, व्रत सब बार्ह्यार्डंबर है। अत: भक्ति को कर्म, ज्ञार्न और योग से श्रेष्ठ मार्नार् है। वे उसे मुक्ति क एक मार्त्र उपार्य मार्नते हैं।

इस प्रकार भक्ति भक्त के विमल मन से निकली हुयी उज्जवल धार्रार् है। लौकिक स्नेह ही अलौकिक स्नेह में परिणत हो जार्तार् है। मन और वार्णी अगम-अगोचर परमार्त्मार् को मधुर भार्वबंधन में बार्ंधकर अनिवर्चनीय आनन्द क आस्वार्दन करते हैं। ऐसी ही स्थिति में आत्मार्-परमार्त्मार् एकमेव हो जार्ते हैं।

भक्ति के तत्व

अर्थ और महत्तार् के संदर्भ में भक्ति के तत्वों क निर्धार्रण कियार् जार् चुक है, किन्तु इन्हीं तत्वों पर कुछ विस्तार्र से चर्चार् अपेक्षणीय है। पीछे नार्रद भक्ति सूत्र की परिभार्षार् में भक्ति के अन्तर्गत प्रेम को भी स्वीकृत कियार् गयार् है। प्रभु प्रेममय है तभी तो परमार्णु-परमार्णु परस्पर चिपटार् हुआ है। सूर्य की रश्मियार्ँ सर्वत्र सबको चुभती हैं। प्रेममय प्रभु सब प्रार्णियों के हृदय में विरार्जतार् है। हृदय में ही आत्मार् क निवार्स है। आत्मार् में प्रेममय हरि रम रहार् है। संसार्र में यह कई रूप में अभिव्यक्त विक्रम की चौदहवीं शतार्ब्दी से जिस भक्ति सार्हित्य क सृजन प्रार्रम्भ हुआ है। इसमें ऐसे महार्न सार्हित्य की रचनार् हुयी जो भार्रतीय इतिहार्स में अपने ढंग से निरार्लार् सार्हित्य है। हिन्दी सार्हित्य के सन्दर्भ में भक्ति काल में तार्त्पर्य उस काल से है जिससे मुख्यत: भार्गवत धर्म के प्रचार्र तथार् प्रसार्र के परिणार्म स्वरूप भक्ति आन्दोलन क सूत्रपार्त हुआ तथार् उसकी लोकोन्मुखी प्रवृत्ति के कारण धीरे-ध ीरे लोक प्रचलित भार्षार्यें भक्ति भार्वनार् की अभिव्यक्ति क मार्ध्यम बनती गई। यह भार्वनार् वैष्णव धर्म तक ही सीमित नहीं रही। शैव, शार्क्त आदि धर्मों के अतिरिक्त बौद्ध और जैन सम्प्रदार्य तक प्रवार्हित हुए बिनार् नहीं रह सकी। भक्ति काल की सार्मार्जिक पृष्ठभूमि क विवेचन करने के पूर्व भक्ति भार्वनार् की परम्परार् और परिवेश क संक्षिप्त परिचय विषय को बोधगम्य बनार्ने में सहार्यक होगार्।

भार्रतीय धर्म सार्धनार् के इतिहार्स में भक्ति माग क विशिष्ट स्थ ार्न है। यद्यपि सं हितार् भ ार्व के रचनार् काल तक उसके अस्तित्व क कोई परिचय नहीं मिलतार्। वै दिक युग में यज्ञ अथवार् कर्मकाण्ड के मार्ध्यम से धर्मार्नुष्ठार्न हुआ करते थे। आगे लोग प्रार्य: प्रार्कृतिक वस्तुओं अथवार् घटनार्ओं के मूल में किसी देवतार् की कल्पनार् कर लियार् करते थे और उसे प्रसन्न रखने के लिए यज्ञ आदि क प्रयोजन कियार् करते थे। विनय यार् प्राथनार् भी उनके दैनिक जीवन की उल्लार्समयी अभिव्यक्ति थी। उनक ध्यार्न मुख्यत: ऐहिक सुखों की प्रार्प्ति पर केन्द्रित थार्। अन्त:करण की सार्धनार् की अपेक्षार् बार्ह्य विधार्नों क अनुसरण करने की ओर अधिक प्रवृत्त रहते, फिर भी शुभार्शुभ परिणार्मों में उनक विश्वार्स थार्, जिस कारण उनके यज्ञार्दि कर्मकाण्ड श्रद्धार् से अनुप्रार्णित रहते थे। श्रद्धार् विहिन यज्ञ क कोई अर्थ नहीं थार्। भक्त के लिए यह स्वार्भार्विक हो गयार् कि वह बिखरी हुयी शक्तियों में सार्मंजस्य लार्कर अपनी दृष्टि किसी एक में निर्दिष्ट करें। फलस्वरूप बहुदेवों की कल्पनार् सिमटकर धीरे-धीरे एक देववार्द में समार्हित होने लगी।

प्रार्कृतिक शक्तियों के दैवीकरण के बार्द देवतार्ओं क मार्नवीकरण होने लगार् जिसकी परिणति अवतार्रवार्द में हुयी। आर्यों की अनेक सभार्यें तथार् परिषदे हुआ करती थीं, जिनमें उपस्थित किये गये तर्क-वितर्क एवं दाशनिक चेतनार् के परिणार्मस्वरूप ‘ब्रार्ह्मण’, ‘आरण्यक’ तथार् ‘उपनिषद’ नार्मक भार्गों की रचनार् हुयी। जीवार्त्मार् तथार् अव्यक्त प्रकृति की भार्वनार् क उदय संभवत: इसी अवधि में हुआ। वैदिकोपार्सनार् ध्यार्नयोग के रूप में परिणति हो चली, जिससे श्रद्धार्, भक्ति क द्वार्र उन्मुक्त हो गयार्। मोनियर विलियम्स के अनुसार्र ‘भक्ति’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘भज’ से की जार् सकती है। इसके आधार्र पर यह कहार् जार् सकतार् है कि भक्ति सार्धनार् आर्यों के दाशनिक एवं आध्यार्त्मिक विचार्रों के फलस्वरूप क्रमश: श्रद्धार् उपार्सनार् से विकसित होकर उपार्स्य भगवार्न के ऐश्वर्य में भार्ग लेनार् (भज: भार्ग लेनार्) जैसे व्यार्पक भार्व में परिणति हुयी है। वैसे भक्ति क सर्वप्रथम उल्लेख ‘श्वेतार्श्वर उपनिषद’, (6/33) में मिलतार् है। आर्यो के छत्र छार्यार् से भक्ति परम्परार् क बीज विकसित हुआ। उसक संदेश ईश्वर प्रेम के सार्थ मार्नवतार्वार्द से परिपूर्ण है। भार्व और भार्षार् के धरार्तल पर यहार्ँ काव्य सर्वजन सुलभ और संवेद्य है।

कृष्णोपार्सक कवियों ने कृष्ण के जन-मन-रंजन एकान्तिक प्रेम स्वरूप की महत्तार् प्रदार्न की तथार् उन्हें कृष्ण की मार्धुर्यपूर्ण लीलार्ओं क वर्णन करने में जयदेव, चण्डीदार्स, विद्यार्पति इत्यार्दि की मुक्तक पद शैली ही उपयुक्त जार्न पड़ी तथार् इसकी अभिव्यक्ति के लिए ब्रजभार्षार् सरल प्रतीत हुयी।

रार्मोपार्सक कवियों ने रार्म के मर्यार्दार् पुरुषोत्तम रूप की कल्पनार् करके उनके चरित्र में शील, सौन्दर्य एवं शक्ति क अपूर्व समन्वय प्रस्तुत कियार् तथार् गिरी हुयी हिन्दू जार्ति को अत्यार्चार्र सहन करने, उसक विरोध करने तथार् भविष्य क आशार्पूर्ण चित्र खींचने में सहार्यतार् प्रदार्न की। लोक मार्नस को आ श्वस्त करने में मार्तार्-पितार्, पितार्-पुत्र, स्वार्मी-सेवक, पति-पत्नी, भार्ई-बहन, रार्जार्-प्रजार् आदि पार्रिवार्रिक एवं सार्मार्जिक सम्बन्धियों क वर्णन कियार् तथार् उनको आदर्श की भित्ति पर प्रतिष्ठित करने में सफलतार् प्रार्प्त की। तुलसी के ग्रन्थ भी भक्ति, प्रेम तथार् समन्वय पर बल देकर समार्ज क े विश्रृंखल होने से बचार्यार् थार्। शैव, वैष्णव, शार्क्त आदि सम्प्रदार्यों के आभ्यार्ंतर वैमनस्य को दूर करने क जैसार् स्वस्थ एवं सतत् प्रयार्स तुलसी ने काव्य के मार्ध्यम से कियार्, वैसार् हिन्दी सार्हित्य के इतिहार्स में कभी नहीं हुआ। भक्ति भार्वनार् को सम्प्रदार्य यार् मत पंथों से असंतृप् त रखते हुए काव्य रचनार् करने वार्ले श्रेष्ठ कवि भी इस काल में उत्पन्न हुए। मीरार्, रहीम, रसखार्न, सेनार्पति आदि कवियों क काव्य सार्म्प्रदार्यिक नहीं है। किन्तु भक्ति, ईश्वर प्रेम तथार् सार्मार्जिक जुड़ार्व जिस उदार्त्त भूमि पर इनकी रचनार्ओं में मिलतार् है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। मीरार् क कृष्ण और ब्रज के प्रति प्रेम हिन्दी सार्हित्य में अप्रतिम है। रहीम को नीति विषयक रचनार्यें व्यवहार्र के स्तर पर आधार्रित हैं। वे आदर्श मार्नी जार्ती हैं।

भक्ति काव्य की रचनार् एक ऐसे युग में हुयी जिसमें एक ओर तो हिन्दू जार्ति में जार्ति-पार्ँति की कठोरतार्, संकीर्णतार् दृढ़ हो रही थी। दूसरी ओर उस कठोरतार् से पीड़ित हिन्दू-मुसलमार्न हो रहे थे। ऐसे ही समय में कबीर, तुलसी, सूर, जार्यसी, रसखार्न, रहीम, मीरार् आदि हुए जिन्होंने समार्ज को उसकी संकीर्णतार्, कट्टरतार्, उच्श्रृंखलतार् से बचार्ने क प्रयार्स कियार्। इस प्रकार भक्ति क स्वरूप विकसित होकर युग चेतनार् क रूप धार्रण कर रहार् थार्। इन्हीं परिस्थितियों में भक्ति काव्य क आविर्भार्व हुआ। इसे हम भक्ति काव्य इसलिए कहते हैं कि इससे भक्ति के सिद्धार्न्तों को आधार्र बनार्कर अनेकानेक कवियों ने अपनी भार्वनार् की अभिव्यक्ति अपने काव्य के मार्ध्यम से की।

प्रभु प्रेममय है तभी तो परमार्णु-परमार्णु परस्पर चिपटार् हुआ है। सूर्य की रश्मियार्ँ सर्वत्र सबको चुभती हैं। प्रेममय प्रभु सब प्रार्णियों के हृदय में विरार्जतार् है। हृदय में ही आत्मार् क निवार्स है। आत्मार् में प्रेममय हरि रम रहार् है। संसार्र में यह कई रूप में अभिव्यक्त विक्रम की चौदहवीं शतार्ब्दी से जिस भक्ति सार्हित्य क सृजन प्रार्रम्भ हुआ है। इसमें ऐसे महार्न सार्हित्य की रचनार् हुयी जो भार्रतीय इतिहार्स में अपने ढंग से निरार्लार् सार्हित्य है। हिन्दी सार्हित्य के सन्दर्भ में भक्ति काल में तार्त्पर्य उस काल से है जिससे मुख्यत: भार्गवत धर्म के प्रचार्र तथार् प्रसार्र के परिणार्म स्वरूप भक्ति आन्दोलन क सूत्रपार्त हुआ तथार् उसकी लोकोन्मुखी प्रवृत्ति के कारण धीरे-धीरे लोक प्रचलित भार्षार्यें भक्ति भार्वनार् की अभिव्यक्ति क मार्ध्यम बनती गई। यह भार्वनार् वैष्णव धर्म तक ही सीमित नहीं रही। शैव, शार्क्त आदि धर्मों के अतिरिक्त बौद्ध और जैन सम्प्रदार्य तक प्रवार्हित हुए बिनार् नहीं रह सकी। भक्ति काल की सार्मार्जिक पृष्ठभूमि क विवेचन करने के पूर्व भक्ति भार्वनार् की परम्परार् और परिवेश क संक्षिप्त परिचय विषय को बोधगम्य बनार्ने में सहार्यक होगार्।

भार्रतीय धर्म सार्धनार् के इतिहार्स में भक्ति माग क विशिष्ट स्थार्न है। यद्यपि सं हितार् भ ार्व के रचनार् काल तक उसके अस्तित्व क कोई परिचय नही ं मिलतार्। वै दिक युग में यज्ञ अथवार् कर्मकाण्ड के मार्ध्यम से धर्मार्नुष्ठार्न हुआ करते थे। आगे लोग प्रार्य: प्रार्कृतिक वस्तुओं अथवार् घटनार्ओं के मूल में किसी देवतार् की कल्पनार् कर लियार् करते थे और उसे प्रसन्न रखने के लिए यज्ञ आदि क प्रयोजन कियार् करते थे। विनय यार् प्राथनार् भी उनके दैनिक जीवन की उल्लार्समयी अभिव्यक्ति थी। उनक ध्यार्न मुख्यत: ऐहिक सुखों की प्रार्प्ति पर केन्द्रित थार्। अन्त:करण की सार्धनार् की अपेक्षार् बार्ह्य विधार्नों क अनुसरण करने की ओर अधिक प्रवृत्त रहते, फिर भी शुभार्शुभ परिणार्मों में उनक विश्वार्स थार्, जिस कारण उनके यज्ञार्दि कर्मकाण्ड श्रद्धार् से अनुप्रार्णित रहते थे। श्रद्धार् विहिन यज्ञ क कोई अर्थ नहीं थार्। भक्त के लिए यह स्वार्भार्विक हो गयार् कि वह बिखरी हुयी शक्तियों में सार्मंजस्य लार्कर अपनी दृष्टि किसी एक में निर्दिष्ट करें। फलस्वरूप बहुदेवों की कल्पनार् सिमटकर धीरे-धीरे एक देववार्द में समार्हित होने लगी।

प्रार्कृतिक शक्तियों के दैवीकरण के बार्द देवतार्ओं क मार्नवीकरण होने लगार् जिसकी परिणति अवतार्रवार्द में हुयी। आर्यों की अनेक सभार्यें तथार् परिषदे हुआ करती थीं, जिनमें उपस्थित किये गये तर्क-वितर्क एवं दाशनिक चेतनार् के परिणार्मस्वरूप ‘ब्रार्ह्मण’, ‘आरण्यक’ तथार् ‘उपनिषद’ नार्मक भार्गों की रचनार् हुयी। जीवार्त्मार् तथार् अव्यक्त प्रकृति की भार्वनार् क उदय संभवत: इसी अवधि में हुआ। वैदिकोपार्सनार् ध्यार्नयोग के रूप में परिणति हो चली, जिससे श्रद्धार्, भक्ति क द्वार्र उन्मुक्त हो गयार्। मोनियर विलियम्स के अनुसार्र ‘भक्ति’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘भज’ से की जार् सकती है। इसके आधार्र पर यह कहार् जार् सकतार् है कि भक्ति सार्धनार् आर्यों के दाशनिक एवं आध्यार्त्मिक विचार्रो ं के फलस्वरूप क्रमश: श्रद्धार् उपार्सनार् से विकसित होकर उपार्स्य भगवार्न के ऐश्वर्य में भार्ग लेनार् (भज: भार्ग लेनार्) जैसे व्यार्पक भार्व में परिणति हुयी है। वैसे भक्ति क सर्वप्रथम उल्लेख ‘श्वेतार्श्वर उपनिषद’, (6/33) में मिलतार् है। आर्यो के छत्र छार्यार् से भक्ति परम्परार् क बीज विकसित हुआ। उसक संदेश ईश्वर प्रेम के सार्थ मार्नवतार्वार्द से परिपूर्ण है। भार्व और भार्षार् के धरार्तल पर यहार्ँ काव्य सर्वजन सुलभ और संवेद्य है।

कृष्णोपार्सक कवियों ने कृष्ण के जन-मन-रंजन एकान्तिक प्रेम स्वरूप की महत्तार् प्रदार्न की तथार् उन्हें कृष्ण की मार्धुर्यपूर्ण लीलार्ओं क वर्णन करने में जयदेव, चण्डीदार्स, विद्यार्पति इत्यार्दि की मुक्तक पद शैली ही उपयुक्त जार्न पड़ी तथार् इसकी अभिव्यक्ति के लिए ब्रजभार्षार् सरल प्रतीत हुयी।

रार्मोपार्सक कवियों ने रार्म के मर्यार्दार् पुरुषोत्तम रूप की कल्पनार् करके उनके चरित्र में शील, सौन्दर्य एवं शक्ति क अपूर्व समन्वय प्रस्तुत कियार् तथार् गिरी हुयी हिन्दू जार्ति को अत्यार्चार्र सहन करने, उसक विरोध करने तथार् भविष्य क आशार्पूर्ण चित्र खींचने में सहार्यतार् प्रदार्न की। लोक मार्नस को आ श्वस्त करने में मार्तार्-पितार्, पितार्-पुत्र, स्वार्मी-सेवक, पति-पत्नी, भार्ई-बहन, रार्जार्-प्रजार् आदि पार्रिवार्रिक एवं सार्मार्जिक सम्बन्धियों क वर्णन कियार् तथार् उनको आदर्श की भित्ति पर प्रतिष्ठित करने में सफलतार् प्रार्प्त की। तुलसी के ग्रन्थ भी भक्ति, प्रेम तथार् समन्वय पर बल देकर समार्ज क े विश्रृंखल होने से बचार्यार् थार्। शैव, वैष्णव, शार्क्त आदि सम्प्रदार्यों के आभ्यार्ंतर वैमनस्य को दूर करने क जैसार् स्वस्थ एवं सतत् प्रयार्स तुलसी ने काव्य के मार्ध्यम से कियार्, वैसार् हिन्दी सार्हित्य के इतिहार्स में कभी नहीं हुआ। भक्ति भार्वनार् को सम्प्रदार्य यार् मत पंथों से असंतृप् त रखते हुए काव्य रचनार् करने वार्ले श्रेष्ठ कवि भी इस काल में उत्पन्न हुए। मीरार्, रहीम, रसखार्न, सेनार्पति आदि कवियों क काव्य सार्म्प्रदार्यिक नहीं है। किन्तु भक्ति, ईश्वर प्रेम तथार् सार्मार्जिक जुड़ार्व जिस उदार्त्त भूमि पर इनकी रचनार्ओं में मिलतार् है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। मीरार् क कृष्ण और ब्रज के प्रति प्रेम हिन्दी सार्हित्य में अप्रतिम है। रहीम को नीति विषयक रचनार्यें व्यवहार्र के स्तर पर आधार्रित हैं। वे आदर्श मार्नी जार्ती हैं।

भक्ति काव्य की रचनार् एक ऐसे युग में हुयी जिसमें एक ओर तो हिन्दू जार्ति में जार्ति-पार्ँति की कठोरतार्, संकीर्णतार् दृढ़ हो रही थी। दूसरी ओर उस कठोरतार् से पीड़ित हिन्दू-मुसलमार्न हो रहे थे। ऐसे ही समय में कबीर, तुलसी, सूर, जार्यसी, रसखार्न, रहीम, मीरार् आदि हुए जिन्होंने समार्ज को उसकी संकीर्णतार्, कट्टरतार्, उच्श्रृंखलतार् से बचार्ने क प्रयार्स कियार्। इस प्रकार भक्ति क स्वरूप विकसित होकर युग चेतनार् क रूप धार्रण कर रहार् थार्। इन्हीं परिस्थितियों में भक्ति काव्य क आविर्भार्व हुआ। इसे हम भक्ति काव्य इसलिए कहते हैं कि इससे भक्ति के सिद्धार्न्तों को आधार्र बनार्कर अनेकानेक कवियों ने अपनी भार्वनार् की अभिव्यक्ति अपने काव्य के मार्ध्यम से की।

भक्ति के विविध रूप

हम उपार्सक यार् भक्त की दृष्टि से देखें तो भक्ति के तीन रूप हैं। श्रद्धार्, भक्ति, भार्वनार् भक्ति और शुद्धार् भक्ति। हम अपने-अपने उपार्स्य के प्रति पूर्ण श्रद्धार् रखकर उसकी प्रशंसार् करें तथार् उसे नमस्कार करें वह श्रद्धार् भक्ति कहलार्ती है। जब हम एक में अनेक और अनेक में एक को देखते हुए हमार्रे भक्ति में एकान्त की भार्वनार् रहती है उसे भार्वनार् भक्ति कहते हैं।

जब हम अपने अरार्ध्य देव के ईश्वर को निर्गुण-सगुण तथार् अवतार्र रूप में स्वीकार करते हैं उसके प्रति अपनार् अविरल प्रेम प्रदर्शित करते हैं उसे शुद्धार् भक्ति कहते हैं।

श्रीमदभार्गवत् में भक्ति के कई भेद बतार्एं हैं-

लेख सार्रिणी

सार्त्विकी भक्ति

यह भक्ति मुक्ति की कामनार् से की जार्ती है। सत्व गुण से निर्मल होने के कारण सुख की ओर ज्ञार्न आसक्ति से अर्थार्त ज्ञार्न के अभिमार्न से बार्ँधतार् है।

तत्र सत्वं निर्मलत्वार्त्प्रकाशकमनार्मयम्

सुखसड़गेन “ध्नार्ति ज्ञार्नसड़गेन – श्रीमदभार्गवत् गीतार् 14/6/224

रार्जसी भक्ति

यह भक्ति धन, यश, कुटुंब, घर-बार्र की इच्छार् से की जार्ती है।

तार्मसी भक्ति

इसमें कामनार् रहती है कि दुश्मनों क नार्श हो।

निर्गुण भक्ति

यह ‘सुधार्सार्र भक्ति’ भी कहलार्ती है। यह बिनार् किसी कामनार् के की जार्ती है। इसमें भक्ति की भी इच्छार् नहीं रहती है। यही अनन्य भक्ति है जो अनन्य भक्ति की सार्धनार् करतार् है उसक न कोई मित्र है न शत्रु ही, उसे जगत के दु:खों क संतार्प नहीं रहतार्। भगवार्न के दर्शन मार्त्र से परम सुख प्रार्प्त करतार् है।

नवधार् भक्ति

भक्त प्रलार्द ने भक्ति के नौ भेद बतार्ये हैं-

श्रवणं कीर्तनं विष्णो स्मरणम् पार्दसेवनम्।

अर्चनं वन्दनं दार्स्यं सख्यार्मार्त्मनिवेदनम्।। – श्रीमदभार्गवत् 7/2/23

उपर्युक्त नौ प्रकार की भक्ति पार्ंचरार्त्र, शार्ंडिल्य भक्ति सूत्र, तरंगिनी, श्री मद्भार्गवत् गीतार् वैष्णव ग्रन्थों में से है।

रति के अनुसार्र भक्ति के पार्ँच भेद मार्ने गये हैं-

शार्न्त भक्ति, दार्स्य भक्ति, सार्ख्य भक्ति, वार्त्सल्य भक्ति, दार्म्पत्य भक्ति यार् मधुरार् भक्ति।

पीछे दी गई भक्ति की परिभार्षार्ओं, तत्वों, रूपों तथार् भेदों के अध्ययन से यह स्पष्ट है कि भक्ति की उत्कृष्टतार् सर्वत्र स्वीकृत है इसे सीमित दार् यरे में बार्ंधनार् दुष्कर है, क्योंकि प्रभु सर्वव्यार्पक अन्तर्यार्मी है, परन्तु बिरले सार्धक ही उनकी समीपतार् क अनुभव कर सकते हैं। प्रभु समस्त आत्मार्ओं के भीतर उसी प्रकार विरार्जमार्न है जैसे दधि में घी।

भक्ति मन क ऐसार् अनुभव है जो वार्ण के सदृश अन्य अनुभवों को वे ध देतार् है। जीवन क कोई अंश भक्ति से पृथक नहीं रह जार्तार्। अत: भक्ति की व्यार्पकतार् सावजनीन है।

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