भक्ति आंदोलन क्यार् है ?

सल्तनत काल से ही हिन्दू मुस्लिम संघर्ष क काल थार् । दिल्ली सुल्तार्नों ने हिन्दू धर्म के प्रति अत्यार्चार्र करनार् आरंभ कर दिये थे । उन्होंने अनेक मंदिरेार्ं और मुर्तियों को तोड़ने लगे थे । जिससे हिन्दुओ ने अपने धर्म की रक्षार् के लिए एकेश्वरवार्द को महत्व दियार् और धर्म सुधार्रको ने एक आन्दोलन चार्लार्यार् यही आन्दोलन भक्ति आन्दोलन के नार्म से विख्यार्त हुआ। मध्यकाल में सुल्तार्नों के अत्यार्चार्र एवं दमन की नीति से भार्रतीय समार्ज आंतकित और निरार्श हो चुक थार् । ऐसी स्थिति में कुछ विचार्रकों एवं संतों ने हिन्दू धर्म की कुरितियों को दूर करने के लिए एक अभियार्न प्रार्रंभ कियार् । इसी अभियार्न को भक्ति आन्दोलन के नार्म से जार्नार् जार्तार् थार्। भक्ति आन्दोलन को अपनार्ने के निम्नलिखित कारण थे । जो इस प्रकार है –

  1. मुस्लिम आक्रमणकारी के अत्यार्चार्र – भार्रत में मुस्लिम अत्यार्चार्रियों ने बबर्र तार् से अत्यार्चार्र कियार् हिन्दुओं क कत्लेआम, मूर्तियों मंदिरों क विध्वंस आदि । इससे निजार्त पार्ने के लिए भक्ति आंदोलन को अपनार्यार् गयार् ।
  2. धर्म एवं जार्ति क भय – मुस्लिम आक्रमणकारियों से हिन्दू सम्पद्रार्य के लार्गे भयभीत थे उन्हें यह डर थार् कि उनके धर्म एवं जार्ति क विनार्श हो जार्येगार् । इसलिए इनकी रक्षार् हेतु भक्ति आन्दोलन क आश्रय लियार् गयार् ।
  3. इस्लार्म क प्रभार्व – हिन्दुओं ने अनुभव कियार् कि इस्लार्म धर्म में सार्दगी व सरलार्तार् है । उनमें जार्तीय भेदभार्व नहीं है इसलिए हिन्दुओं ने इन्हें दूर करने के लिए जो माग अपनार्यार्। उसने भक्ति आंदोलन क रूप धार्रण कर लियार् ।
  4. रार्जनैतिक सगंठन – मुस्लिम सुल्तार्नों ने भार्रतीयों पर भयकंर अत्यार्चार्र कियार् । भार्रतीय रार्जार्ओं को परार्स्त कर अपनी सत्तार् की स्थार्पनार् की । इस संघर्ष से मुक्ति पार्ने के लिए भार्रतीयों ने अपने रार्ज्य की पुर्नस्थार्पनार् की । जिससे हिन्दू धर्म संगठित हो गयार् और भक्ति माग को बल मिलार् ।
  5. रूढ़िवार्दितार् – मध्यकाल के आते आते हिन्दू धर्म रूढिव़ार्दी हो गयार् थार् । यज्ञो, अनुष्ठार्नों की संकीर्णतार् से लोग ऊब गये थे । वे सरल धर्म चार्हते थे । जिससे भक्ति माग क उदय हुआ।
  6. पार्रस्परिक मतभेद – हिन्दू धर्म में भेदभार्व बहुत थार् । निम्न वर्गो की दशार् बहुत दयनीय थी । भेदभार्व को समार्प्त करने के लिए भक्ति माग को अपनार्यार् गयार् । 
  7. हिन्दुओं की निरार्शार् – मुसलमार्नों के अत्यार्चार्ार्र से हिन्दुओं की निरार्शार् बढ़ चुकी थी। वे बहुत हतार्श हो गये थे र्इश्वर के अतिरिक्त उन्हें कोर्इ नहीं दिखाइ दे रहार् थार् जिसके कारण वे भक्ति माग को अपनार्यार् ।

भक्ति आन्दोलन क उदय – 

  1. हिन्दू धर्म एवं समार्ज में सुधार्र करनार् – भक्ति माग अपनार्ने से समार्ज में धर्म के प्रति एकतार् की भार्वनार् जार्गृत हो गयी ।
  2. इस्लार्म एवं हिन्दू धर्म में समन्वय करनार् – भक्ति आन्दोलन के द्वार्रार् इस्लार्म व हिन्दू धर्म के प्रति समन्वय की भार्वनार् क विकास हुआ ।

भक्ति आन्दोलन की विशेषतार्यें – 

  1. एक र्इश्वरमेंं आस्थार्- र्इश्वर एक है वह सर्व शक्तिमार्न है । 
  2. बार्ह्य आडम्बरों क विरोध- भक्ति आन्दोलन के सतार्ंे ने कर्मकाण्ड क खण्डन कियार् । सच्ची भक्ति से मोक्ष एवं र्इश्वर की प्रार्प्ति होती है ।
  3. सन्यार्स क विरोध- भक्ति आन्दोलन के अनुसार्र यदि सच्ची भक्ति है र्इश्वर में श्रद्धार् है तो गृहस्थ में ही मोक्ष मिल सकतार् है ।
  4. वर्ण व्यवस्थार् क विरोध- भक्ति आन्दार्लेन के आन्दोलन के प्रवतकों ने वर्ण व्यवस्थार् क विरोध कियार् है । र्इश्वर के अनुसार्र सभी एक है ।
  5. मार्नव सेवार् पर बल- भक्ति आन्दार्ले न के समर्थकों ने यह मार्नार् कि मार्नव सेवार् सर्वोपरि है । इससे मोक्ष मिल सकतार् है ।
  6. हिन्दू मुस्लिम एकतार् क प्रयार्स- भक्ति आन्दोलन के द्वार्रार् सतार्ंे ने लोगों को यह समझार्यार् कि रार्म, रहीम में कोर्इ अंतर नहीं ।
  7. स्थार्नीय भार्षार्ओं में उपदेश- संतों ने अपनार् उपदेश स्थार्नीय भार्षार्ओं में दियार् । भक्तों ने इसे सरलतार् से ग्रहण कियार् ।
  8. समन्वयवार्दी प्र्रवृत्ति- संतो, चिन्तकों, विचार्रकों ने र्इष्र्यार् की भार्वनार् को समार्प्त करके लोगों में सार्मजंस्य, समन्वय की भार्वनार्ओं को प्रोत्सार्हन दियार् ।
  9. गुरू के महत्व मेंं वृद्धि- भक्ति आन्दोलन के संतो ने गुरू एवं शिक्षक के महत्व पर बल दियार् । गुरू ही र्इश्वर के रहस्य को सुलझार्ने एवं मोक्ष प्रार्प्ति में सहार्यक होतार् है । समर्पण की भार्वनार्- समर्पण की भार्वनार् से सत्य क सार्क्षार्त्कार एवं मोक्ष की प्रार्प्ति हो सकती है ।
  10. समार्नतार् की भार्वनार्- र्इश्वर के समक्ष सभी लार्गे समार्न है । र्इश्वर सत्य है । सभी जगह विद्यमार्न है । उनमें भेदभार्व नहीं है । यही भक्ति माग क सही रार्स्तार् है ।

भक्ति आन्दोलन के प्रमुख संंत- 

  1. आचाय रार्मार्नुुज- इनक जन्म आधुनिक आन्ध्रपद्रेश के त्रिपुती नगर में 1066 र्इ. में हुआ थार् । वे विष्णु के भक्त थे । उन्होंने सभी के लिए मोक्ष प्रार्प्ति क माग खोलार् ।
  2. रार्मार्नंद- इनक जन्म प्रयार्ग में एक ब्रार्म्हण परिवार्र में हुआ थार् । वे एक महार्न धर्म सुधार्रक थे । वे अल्पार्यु में ही सन्यार्स ग्रहण कर लिये थे, ये रार्म के भक्त थे इन्होंने वैष्णव धर्म क द्वार्र सभी के लिए खोल दियार् थार् । वे प्रेम व भक्ति पर जोर दिये ।
  3. कबीर- कबीर एक महार्न सतं थे । इनक जन्म 1398 में काशी में हुआ थार् । इन्होंने भी प्रेम व भक्ति पर बल दियार् । इन्होंने अंधविश्वार्स, कर्मकांड, दकियार्नूसी विचार्र, तीर्थ आदि पर खूब व्यंग्य कियार् है । उन्होंने पहली बार्र धर्म को अकर्मण्यतार् की भूमि से कटार्कर कर्मयोगी की भूमि में लार्कर खड़ार् कर दियार् । कबीर हिन्दू, मुसलमार्न, सम्प्रदार्यों की एकतार् क महार्न अग्रदूत थार् । कबीर ने हिन्दूओं की मूर्तिपूजार् की आलोचनार् करते हुए लिखार् है-

    ‘‘पार्हन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ प्रहार्र

    तार्ते यह चार्की भली, पीस खार्ए संसार्र ।।’’

    इस प्रकार कबीर उच्चकोटि के निर्गुण भक्त ही नही बल्कि वे समार्ज सुधार्रक, उपदेशक, प्रगतिशील विचार्रक भी थे ।

    1. चैतन्य- चैतन्य महार्प्रभु सन्यार्सी होने के बार्द कृष्ण भक्ति में लीन हो गये । उनक विश्वार्स थार् कि प्रेम, भक्ति, संगीत, नृत्य आदि से र्इश्वर को प्रार्प्त कियार् जार् सकतार् है । 
    2. नार्मदेव- वे भी बार्ह्य आडम्बर जार्ति पार्ति क विरोध कियार् । र्इश्वर की भक्ति को सच्चार् माग बतलार्यार् ।
    3. गुरूुनार्नक- गुरूनार्नक ने मूिर्तपूजार् क विरोध कियार् । इनके गुरू अर्जनु देव थे एकेश्वरवार्द व निर्गुण ब्रम्हार् के उपार्सक थे । वे हिन्दू मुसलमार्नों में एकतार् चार्हते थे । 
    4.  वल्लार्भार्चाय- ये तेलगू बार््रम्हण परिवार्र के थे ये महार्न विद्वार्न थे । वे कृष्ण भक्ति क प्रचार्र किये । कृष्ण भक्ति के महत्व को उच्चकोटि क कहार् । उन्होंने कृष्ण के प्रति सच्ची श्रद्धार् व्यक्त की है ।
    5. ज्ञार्नेश्वर- ये ब्रार्म्हणों क विरोध करते थे । इन्होनें निम्न जार्ति के लोगों के लिए धामिक ग्रंथों पर प्रतिबंध लगार्यार् थार् ।
    6. मार्धवार्चाय- 13वी सदी के महार्न सुधार्रक एवं संत थे । ये विष्णु के भक्त थे । इनक मार्ननार् थार् कि र्इश्वर भक्ति से इंसार्न जन्म मरण के चक्र से मोक्ष प्रार्प्त कर लेतार् है । (10) निम्बाक- ये कृष्ण रार्धार् पर आधार्रित भक्ति की व्यार्ख्यार् की है । ये धर्म सुधार्रक थे । ये पूर्ण आत्मसमर्पण पर जोर देते थे ।

    भक्ति आन्दोलन क प्रभार्व-

    1. धार्मिर्क प्रभार्व- धामिक कट्टरतार् समार्प्त हो गर्इ सहिष्णतु ार् की भार्वनार् जार्गृत हो गयी।
    2. अंध विश्वार्सों में कमी- अंधविश्वार्स एवं बार्ह्य आडम्बर, पार्खण्ड आदि दूर हो गये ।
    3. र्इष्यार् द्वेष में कमी- भक्ति माग से लोगो के मन में जो र्इष्यार् द्वेष की भार्वनार् समार्प्त होकर एकतार् जार्गृत हो गर्इ ।
    4. समन्वय की भार्वनार् में वृद्धि हुर्इ- हिन्दु, मस्लिम में कटुतार् कम हो गर्इ ।
    5. धर्म निरपेक्ष भार्वनार् में वृद्धि- सभी धर्मो में एकतार् जार्गृत हुर्इ । यही कारण थार् कि अकबर जैसे सम्रार्ट आये ।
    6. इस्लार्म प्रसार्र की समार्प्ति- लोगों में समार्नतार् की भार्वनार् उत्पन्न हो गर्इ । निम्नवर्ग इस्लार्म के प्रभार्व से मुक्त हो गयार् ।
    7. सिक्ख धर्म की स्थार्पनार्- भक्ति माग के कारण गुरूनार्नक ने सिक्ख धर्म की स्थार्पनार् की ।
    8. बौद्ध धर्म क पतन- हिन्दू धर्म में जार्गृति आयी बौद्ध धर्म क पतन हो गयार् ।
    9. समार्ज सेवार् में वृद्धि- समार्ज सेवार् से लोगों के मन में मार्नव सेवार् की भार्वनार् जार्गृत हुर्इ। 
    10. कलार् क विकास- भक्ति आन्दोलन से अनेक भवनो क निर्मार्ण होने से कलार् क विकास आरंभ हो गयार् ।

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