बैंक के कार्य –

बैंक के कार्य


By Bandey

किसी बैंक संस्थार् के दो मुख्य कार्य हैं :-

  1. जमार् के रुप में धनरार्शि स्वीकार करनार् तथार्
  2. ऋण अथवार् उधार्र देनार्।

इनक विस्तृत विवरण इस प्रकार हैं :-

जमार्एँ स्वीकार करनार्

बैंक में कोई भी व्यक्ति निर्धार्रित नियम एवं व्यवस्थार् के अंतर्गत खार्तार् खुलवार्कर अपनी धनरार्शि जमार् करवार् सकतार् है। व्यार्पार्रिक बैंकों द्वार्रार् जमार् रार्शि क उपयोग रार्ष्ट्र के आर्थिक विकास के लिए कियार् जार्तार् है। इस कार्य के द्वार्रार् छोटी-छोटी बचतों को एकत्र कर पूँजी निर्मार्ण क कार्य कियार् जार्तार् है तथार् इन जमार्ओं के आधार्र पर ही बैंक सार्ख सृजन क कार्य करते हैं। बैंक कई प्रकार के खार्तों में जमार्एँ प्रार्प्त करते है, जिनमें से प्रमुख खार्ते इस प्रकार है :-

सार्वधि जमार् खार्तार्

सार्वधि जमार् क तार्त्पर्य खार्ते में ऐसी जमार् से है, जो किसी निश्चित अवधि की समार्प्ति पर ही वार्पस प्रार्प्त की जार् सके। जमार् अवधि क चयन ग्रार्हक द्वार्रार् अपनी सुविधार् एवं आवश्यकतार् को ध्यार्न में रखते हुए कियार् जार्तार् है। सुरक्षार् एवं ब्यार्ज की दृष्टि से यह खार्तार् सर्वश्रेष्ठ है। इसक उपयोग केवल वे ही लोग कर सकते है, जो अपनी धनरार्शि एक मुश्त निर्धार्रित अवधि के लिए बैंक के पार्स रखने की क्षमतार् एवं इच्छार् रखते हो। स्थार्यी जमार् खार्ते पर ब्यार्ज की दर जमार् की अवधि के अनुसार्र कम यार् ज्यार्दार् हो सकती है। जमार्कर्तार् को बैंक एक रसीद देतार् है। परिपक्वतार् की तिथि से पूर्व धन की आवश्यकतार् पड़ने पर जमार् रसीद की जमार्नत पर बैंक से ऋण लियार् जार् सकतार् है।

बचत बैंक खार्तार्

बचत बैंक खार्ते क प्रमुख उद्देश्य जनतार् में बचत की भार्वनार् को प्रोत्सार्हन देनार् है। अल्प एवं मध्यम आय वर्ग के लिए यह खार्तार् बहुत महत्वपूर्ण है। इसके मार्ध्यम से कोई भी व्यक्ति अपनी छोटी-छोटी बचतों को बैंक में जमार् करवार् सकतार् है तथार् आवश्यकतार् पड़ने पर वार्पस निकाल सकतार् है। इस खार्ते में जमार् धनरार्शि पर ब्यार्ज भी मिलतार् है। इस खार्ते पर चैक बुक की सुविधार् भी मिलती है।

चार्लु खार्तार्

चार्लु खार्तार् एक ऐसार् खार्तार् है जिसमें किसी भी कार्य दिवस में अनेक बार्र लेन-देन किये जार् सकते है। चार्लु खार्ते में जमार् मार्ँग पर देय होती है, इसलिये बैंक इस पर कोई ब्यार्ज नहीं देतार्। यह खार्तार् व्यार्पार्रियों, संयुक्त पूँजी कम्पनियों, संस्थार्ओं आदि के लिए उपयुक्त होतार् है। चार्लु खार्ते पर बैंक ग्रार्हकों को अधिविकर्ष की सुविधार् भी देतार् है।

आवर्ती यार् संचयी जमार् खार्तार्

आवर्ती जमार् खार्तार् मुख्य रुप से उन जमार्कर्तार्ओं के लिए है जो अपनी छोटी-छोटी बचतों के मार्ध्यम से एक निश्चित उद्देश्य के लिए निश्चित रकम जमार् करार्नार् चार्हते हैं। यह खार्तार् खोलने वार्ले व्यक्ति को एक निश्चित रकम जो 5 यार् 10 रुपये के गुणक में होती है, एक निश्चित अवधि तक प्रति मार्स अपने खार्ते में जमार् करवार्नी होती है। इस खार्ते पर दिये जार्ने वार्ले ब्यार्ज की दर बचत खार्ते से कुछ अधिक होती है।

अन्य जमार् खार्ते/योजनार्यें

व्यार्पार्रिक बैंक अत्यंत ही अल्प आय वार्ले व्यक्तियों की बचतों को एकत्रित करने तथार् उन्हें प्रोत्सार्हित करने के ध्येय से गृह बचत खार्तार् खोलने की भी सुविधार् देते हैं। व्यार्पार्रिक बैंकों ने बचतों के विभिन्न उद्देश्यों के अनुरुप अनेक प्रकार की जमार् योजनार्यें भी चार्लू की है, जिनमें प्रतिदिन बचत जमार् योजनार्, मार्सिक ब्यार्ज आय जमार् योजनार्, अवयस्क बचत योजनार्, कृषक जमार् योजनार्, गृह जमार् योजनार् आदि प्रमुख है।

ऋण अथवार् उधार्र देनार्

बैंक क द्वितीय प्रमुख कार्य ऋण अथवार् उधार्र देनार् है। बैंक अपने ऋणों पर उसके द्वार्रार् जमार्ओं पर दिये जार्ने वार्ले ब्यार्ज से अधिक दर से ब्यार्ज लेतार् है। बैंक प्रार्थ्र्ार्ी को ऋण सुविधार् चार्र प्रकार से दे सकतार् है :-

नकद सार्ख

नकद सार्ख पद्धति के अधीन बैंक प्रार्थ्र्ार्ी के लिए ऋण लेने की एक सीमार् निर्धार्रित कर देतार् है। व्यार्पार्री अपनी आवश्यकतार्नुसार्र जब चार्हे उस सीमार् तक रकम निकाल सकतार् है। ब्यार्ज केवल उसी रार्शि पर वसूल कियार् जार्तार् है, जितनी रार्शि निकाली गई है। नकद सार्ख सदैव पर्यार्प्त जमार्नत के आधार्र पर ही स्वीकृत की जार्ती है।

अधिविकर्ष

बैंक अधिविकर्ष के रुप में ऋण की सुविधार् केवल अपने खार्तेदार्रों को ही दे सकतार् है। कभी-कभी ग्रार्हक को अस्थार्यी रुप से खार्ते में जमार् से अधिक रार्शि की आवश्यकतार् पड़ सकती है। ऐसी स्थिति में ग्रार्हक अपने बैंक से प्राथनार् करतार् है कि उसे खार्ते में जमार् रार्शि से भी अधिक रार्शि निकालने की अनुमति दी जार्ये। बैंक अपने ग्रार्हक की सार्ख क्षमतार् पर विचार्र कर उसको निश्चित रार्शि तक अधिविकर्ष की अनुमति दे देतार् है। ग्रार्हक उस सीमार् तक कभी भी रार्शि निकाल सकतार् है।

सार्मार्न्य ऋण

बैंकों द्वार्रार् ऋण देने क यह सबसे सार्धार्रण रुप है। जब कोई व्यक्ति ऋण के लिए प्राथनार् करतार् है तो बैंक प्रार्थ्र्ार्ी की सार्ख एवं अन्य बार्तों के विषय में विचार्र कर उसे ऋण स्वीकृत कर वह रार्शि उसके एक पृथक ऋण खार्ते में जमार् कर देतार् है। ऋण स्वीकृत करते समय बैंक और प्रार्थ्र्ार्ी के बीच ब्यार्ज की दर एवं भुगतार्न की शर्ते तय हो जार्ती हैं।

संस्थार् क महत्वपूर्ण बैंकिंग कार्य ऋण वितरण करनार् हैं। सदस्यों को आसार्नी से वित्तीय सार्धन प्रार्प्त हो इस हेतु संस्थार् द्वार्रार् विभिन्न ऋण योजनार्एँ संचार्लित की जार् रही हैं। सुरक्षार् के दृष्टिकोण से संस्थार् के उपनियमों में कर्ज प्रार्प्ति के कुछ नियम बनार्ए गए हैं। जिनकी पूर्ति के पश्चार्त् ही सदस्य ऋण प्रार्प्त कर सकतार् हैं।

  1. संस्थार् से ऋण प्रार्प्ति के नियम निम्नार्नुसार्र हैं :-
    बैंक से ऋण प्रार्प्ति की पार्त्रतार् केवल सदस्य को ही है।
  2. असुरक्षित कर्ज पर पार्ँच प्रतिशत तथार् सुरक्षित कर्ज पर ढार्ई प्रतिशत के हिसार्ब से अतिरिक्त अंश क्रय करनार् आवश्यक हैं।
  3.  ऋण आवेदक को निर्धार्रित प्रार्रूप में जार्नकारी देनार् एवं अपनी सम्पत्ति व आमदनी क प्रमार्णिकरण देनार् आवश्यक है।
  4. बैंक की उपविधियों और संचार्लक मण्डल द्वार्रार् निर्धार्रित नियमों के अनुसार्र जमार्नत पर तथार् चल एवं अचल सम्पत्ति पर बंधक लेकर ऋण प्रार्िप्त की योजनार् रहेगी।
  5. ऋण देनार्, न देनार् यार् आवेदित रार्शि से कम देनार् तथार् दिये हुए जमार्नतदार्र यार् बंधक सम्पत्ति योग्य है यार् नही, यह निश्चित करनार् संचार्लक मण्डल यार् उसके द्वार्रार् अधिकृत ऋण सीमित के अधिकार में हैं।
  6. दी गई जार्नकारी सही नहीं हैं, ऐसार् ज्ञार्त होने पर दियार् गयार् ऋण तत्काल ब्यार्ज सहित वसूल करने क अधिकार संचार्लक मण्डल को है।
  7. प्रस्तुत जमार्नतदार्र यार् बंधक सम्पत्ति किसी कारण योग्य यार् पर्यार्प्त नहीं हैं, ऐसार् ज्ञार्त होने पर ऋणी सदस्य को संचार्लक मण्डल द्वार्रार् निर्धार्रित समयार्वधि में इसके योग्य जमार्नतदार्र यार् बंधक सम्पत्ति देनार् आवश्यक है अन्यथार् दियार् हुआ ऋण तत्काल ब्यार्ज सहित वसूल करने क अधिकार संचार्लक मण्डल को हैं।
  8. यदि बंधक सम्पत्ति को विक्रय पर ऋण वसूल करनार् आवश्यक हुआ तथार् उस विक्रय रार्शि से पूर्ण अदार्यगी न हो सकी तो शेष रार्शि के अदार्यगी की जिम्मेदार्री ऋणी सदस्य की ही हैं। इसके लिये सदस्य को योग्य बंधक यार् योग्य जमार्नतदार्र देनार् आवश्यक हैं।
  9. दिये गये ऋण पर संचार्लक मण्डल द्वार्रार् निर्धार्रित समयार्वधि एवं ब्यार्ज दर से ब्यार्ज लियार् जार्तार् हैं। जमार् रार्शि में से पहले ब्यार्ज वसूल कियार् जार्तार् हैं।
  10. रिजर्व बैंक के निर्देशार्नुसार्र समय-समय पर ब्यार्ज दर लार्गू की जार्ती हैं एवं उसके अनुसार्र ब्यार्ज लियार् जार्तार् हैं।
  11. ऋण के लिये अचल सम्पत्ति बंधक रखी हो तो वह बैंक के अधिकार में रखने के लिये संचार्लक मण्डल द्वार्रार् निर्धार्रित प्रार्रूप में अनुबंध लिखनार् एवं उसक पंजीयन करवार्नार् अनिवाय है।
  12. ऋण किस कार्य के लिये चार्हिए उसकी स्पष्ट जार्नकारी एवं प्रार्प्त ऋण उसी कार्य में लगार्कर उसकी सूचनार् आवेदक को देनार् अनिवाय है। यदि यह रार्शि अन्य कार्य में खर्च की दिखार्ई दी तो सम्पूर्ण रार्शि ब्यार्ज सहित तत्काल वसूल करने क अधिकार संचार्लक मण्डल को हैं।
  13. ऋण की अदार्यगी, अनुबंध के अनुसार्र न होने पर ब्यार्ज की दर बढ़ार्ने व तत्काल ऋण वसूल करने क अधिकार संचार्लक मण्डल को हैं।
  14. ऋण वसूली के लिए यदि दार्वार् लगार्नार् आवश्यक हुआ तो उसके लिए होने वार्लार् कोर्ट खर्च, स्टार्म्प व वकील की फीस आदि खर्च ऋणी सदस्य के नार्म लिखे जार्ते हैं और ऋण वसूल कियार् जार्तार् है।
  15. यदि दी गई जार्नकारी में कोई परिवर्तन हुआ तो उसकी जार्नकारी ऋणी सदस्य को बैंक में लिखित में देनार् अनिवाय हैं।
  16. नौकरीपेशार् सदस्य से ऋण की अंशिकाएँ नियोक्तार् के मार्ध्यम से जमार् की जार्ती हैं।
  17. इन नियमों में परिवर्तन करने, उन्हें रद्द करने व नये नियम बनार्ने क पूर्ण अधिकार संचार्लक मण्डल को हैं।
  18. सदस्य क ऋण व्यवहार्र नियमित होनार् चार्हिए। इसी प्रकार जमार्नतदार्रो के ऋण खार्ते भी नियमित होनार् अनिवाय हैं।
  19. एक व्यक्ति सिर्फ तीन सदस्यों की जमार्नतें दे सकतार् है।
  20. भुगतार्न क्षमतार् के आधार्र पर ही ऋण रार्शि स्वीकृत की जार् सकती हैं।

उपरोक्त बिन्दुओं से स्पष्ट है कि, संस्थार् में चरण स्वीकृति के पूर्व सुरक्षार् के बिन्दु पर विशेष ध्यार्न दियार् जार्तार् हैं।

लार्भार्ंश प्रदार्न करनार्

अधिकांश बैंक यार् संस्थार् प्रार्रंभ के 5-10 वर्षो में अपने सदस्यों को लार्भार्ंश, वित्तीय कठिनार्ईयों व मुनार्फार् कम होने की वजह से प्रदार्न नहीं कर पार्ती हैं किंतु संस्थार् द्वार्रार् अपने प्रथम वर्ष से ही यही प्रयार्स रहार् है कि, सदस्यों को शेयर में जमार् रकम पर भी कुछ लार्भ प्रार्प्त हो व उन्हें लार्भार्ंश मिले। अत: संस्थार् द्वार्रार् प्रार्रंभ से ही शेयर क 10 प्रतिशत लार्भार्ंश के रूप में दियार् जार्तार् हैं।

संस्थार् के कोषों क विनियोजन

संस्थार् अपने कोषो क विनियोग कर आय क सृजन करती हैं। संस्थार् के कोषों क विनियोग मुख्यत: केन्द्र व रार्ज्य सरकार के सुरक्षार् पत्रों व इसके अलार्वार् संस्थार् की अमार्नतों क एक बड़ार् भार्ग रिजर्व बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इण्डियार्, स्टेट बैंक ऑफ इन्दौर, इन्दौर प्रीमियर को-ऑपरेटिव्ह बैंक लि. में कियार् गयार् हैं।

सहकारी प्रशिक्षण की व्यवस्थार् करनार्

सहकारी संस्थार्एँ मार्त्र रकम जमार् करने व ऋण प्रदार्न करने वार्ली एजेन्सी नहीं हैं अपितु जनसेवार् के लक्ष्य को ध्यार्न में रखकर संस्थार् द्वार्रार् संचार्लक मण्डल के सदस्यों के सार्थ-सार्थ संस्थार् में कार्यरत कर्मचार्रियों व अन्य सदस्यों को सहकारितार् क सैद्धार्ंतिक व व्यार्वहार्रिक अध्ययन करने के दृष्टिकोण से सहकारितार् शिविरों की भी व्यवस्थार् की गई हैं। सहकारी प्रशिक्षण हेतु मुख्य प्रशिक्षण केन्द्र सहकारी प्रबंध संस्थार्न के नार्म से भोपार्ल में हैं। प्रशिक्षण देने के बदले पार्रिश्रमिक के तौर पर प्रशिक्षण केन्द्र द्वार्रार् शुल्क भी वसूल कियार् जार्तार् हैं।

प्रन्यार्सी एवं निष्पार्दक के रुप में कार्य

ग्रार्हक के आदेश पर बैंक उनकी सम्पत्ति की व्यवस्थार्, विभार्जन एवं प्रबंध करने हेतु प्रबंधक, प्रन्यार्सी एवं निष्पार्दक क कार्य भी करते हैं।

सार्मार्न्य उपयोगी कार्य

प्रार्थमिक व अभिकर्तार् संबंधी कार्यों के अतिरिक्त बैंक अन्य उपयोगी कार्य भी करतार् है, जिनमें कुछ निम्न प्रकार है :-

  1. लॉकर्स उपलब्ध करार्नार् :- ग्रार्हकों की बहुमूल्य वस्तुओं तथार् जेवर, स्वर्ण, हीरे-जवार्हरार्त, बहुमूल्य प्रपत्रों, प्रतिभूतियों आदि को सुरक्षित रखने के लिए बैंक ग्रार्हकों को लॉकर्स यार् सेफ डिपॉजिट की सुविधार् उपलब्ध करवार्ते हैं।
  2. संदर्भ यार् आर्थिक स्थिति की जार्नकारी :- बैंक अपने ग्रार्हकों की आर्थिक स्थिति की जार्नकारी देतार् है तथार् ग्रार्हकों के लिए जार्नकारी प्रार्प्त करतार् है। इन सूचनार्ओं के आधार्र पर ही ग्रार्हक उचित निर्णय लेने की स्थिति में होते हैं।
  3. अभिगोपन करनार् :- बैंक बडे़-बड़े प्रतिष्ठार्नों के अंशों एवं ऋण पत्रों क अभिगोपन करते हैं। इस कार्य के लिए बैंक अभिगोपन कमीशन लेतार् है।
  4. वित्तीय सलार्हकार :- बैंक अपने ग्रार्हकों को समय-समय पर वित्तीय तथार् आर्थिक विषयों पर परार्मर्श देने क कार्य भी करते हैं, जिससे ग्रार्हकों को अपने व्यवसार्य में निर्णय लेने में सुविधार् मिलती हैं।
  5. आर्थिक सूचनार्यें एकत्र करनार् एवं प्रकाशित करनार् :- बैंक अपने देश की आर्थिक एवं व्यार्पार्रिक गतिविधियों के संबंध में सूचनार्यें एकत्र करते है एवं उनको प्रकाशित करवार्ते हैं।
  6. सावजनिक ऋण की व्यवस्थार् :- व्यार्पार्रिक बैंक सरकार द्वार्रार् जार्री किये गये ऋणों की बिक्री की व्यवस्थार् करते हैं। यह कार्य केन्द्रीय बैंक के प्रतिनिधि के रुप में कियार् जार्तार् है।
  7. बचतों को बढ़ार्वार् – बैंकिंग व्यवस्थार् ने आम जनतार् से छोटी-छोटी बचतों को संग्रहीत करके विशार्ल कोषों की व्यवस्थार् की है। समार्ज में बहुत से लोग ऐसे हैं जो अपने धन को मुद्रार् के रुप में बैंकों में रखनार् पसंद करने लगे हैं। बैंकिंग व्यवस्थार् में जनतार् द्वार्रार् संग्रहीत जमार्यें निरंतर बढ़ रही हैं। बैंक जनतार् को व्यवसार्य करने के लिए उधार्र धन उपलब्ध करवार्ते हैं, जिससे व्यार्पार्र एवं व्यवसार्य में वृद्धि हुई है।
  8. धन व बहुमूल्य वस्तुओं की सुरक्षार् – बैंक अपने ग्रार्हकों के लिए धन स्थार्नार्ंतरण एवं लॉकर्स की सुविधार् भी उपलब्ध करवार्ते हैं। व्यक्ति अपने धन को चोरी एवं अन्य अव्यवस्थार्ओं से बचार्ने के लिए बैंकों में जमार् करार्तार् है। व्यक्ति अपने बहुमूल्य गहनों एवं वस्तुओं को भी सुरक्षित रखने के लिए लॉकर्स क उपयोग करतार् है। बैंक जमार् रार्शि पर ब्यार्ज भी देतार् है।
  9. व्यार्पार्र एवं उद्योगों को बढ़ार्वार् – बैंक देशी एवं विदेशी व्यार्पार्र को बढ़ार्वार् देने में महत्वपूर्ण भूमिक अदार् कर रहे है। आजकल अधिकांश व्यार्पार्रिक भुगतार्न बैंकों के मार्ध्यम से ही सम्पन्न किये जार्ते है। उद्योगों के भुगतार्न एवं आय-व्यय को बैंकों के मार्ध्यम से ही सम्पन्न कियार् जार्तार् है। बैंक विभिन्न देशों के मध्य मुद्रार् परिवर्तन क कार्य भी सम्पन्न करते हैं। सार्थ ही विपणन में प्रार्प्त विभिन्न मुद्रार्ओं क भुगतार्न भी बैंक द्वार्रार् ही सम्पन्न कियार् जार्तार् है।
  10. मुद्रार् व्यवस्थार् को लचीलार् बनार्नार् – बैंकों के द्वार्रार् समय-समय पर मुद्रार् परिवर्तन क कार्य सम्पन्न कियार् जार्तार् है। व्यार्पार्र एवं व्यवसार्य में मुद्रार् परिवर्तन यार् मौद्रिक उच्चार्वचनों के कारण उतार्र -चढ़ार्व आते है। इन उच्चार्वचनों को बैंक ही नियमित करते हैं। विदेशी व्यार्पार्र में कई बार्र भुगतार्न कठिन हो जार्तार् है परन्तु बैंक इस कठिन दौर को अपनी मौद्रिक नीति के मार्ध्यम से नियोजित करते हैं।
  11. भुगतार्न में सुविधार् – बैंक क लेन-देन चैक, यार्त्री चैक, ड्रार्फ्ट, सार्ख पत्र आदि के द्वार्रार् होतार् है। इन विलेखों से भुगतार्न सुरक्षित एवं सुगम हो जार्तार् है। व्यार्पार्रिक लेन-देन एवं विदेशी व्यार्पार्र में पग-पग पर इन मार्ध्यमों की जरुरत पड़ती है। सार्थ ही भुगतार्न के प्रमार्ण के रुप में बैंक में आवश्यक प्रविष्टि भी हो जार्ती है।
  12. सरकारी कार्यों में सहयोग – बैंक सरकारी कार्यों में महत्वपूर्ण योगदार्न देते है। सरकार क कार्य बिनार् धन के नहीं चलतार् है। धन क संग्रह भी विभिन्न प्रकार के करो, फीसों, ड्यूटियों तथार् वसूलियों द्वार्रार् कियार् जार्तार् है। इन वित्तीय स्त्रोतों को करोड़ों लोगों में प्रवार्हित कियार् जार्तार् है। यह सब कार्य बैंक बहुत कम खर्च पर सुविधार् से कर देते हैं।
  13. पिछड़े वर्गों एवं क्षेत्रों को सहयोग – आधुनिक युग में घर-घर जार्कर तथार् गार्ँव-गार्ँव में शार्खार् खोलकर अल्प बचत के सार्थ-सार्थ पिछड़े वर्गों को सरकारी सहार्यतार् एवं ऋण उपलब्ध करवार्ने क कार्य भी बैंक करते हैं। पिछड़े क्षेत्रों में बैंक अपनी विशेष योजनार्ओं के अंतर्गत विशेष सार्ख सुविधार् उपलब्ध करवार्ते हैं। सहकारी बैंक, क्षेत्रीय ग्रार्मीण बैंक तथार् लीड बैंक नीचे के स्तर तक अपनार् विस्तार्र करके जनसार्मार्न्य को बैंकिंग सुविधार्एँ उपलब्ध करवार् रहे हैं।
  14. विभिन्न ग्रार्हक सेवार्यें – बैंक अपने ग्रार्हकों के लिए अनेक सेवार्यें उपलब्ध करवार्ने लगे हैं। ग्रार्हकों के लिए भुगतार्न प्रार्प्त करनार्, ग्रार्हकों की ओर से भुगतार्न देनार्, शेयरों के क्रय-विक्रय करनार्, ट्रस्टी के रुप में कार्य करनार् एवं बिलों के भुगतार्न करनार् आदि महत्वपूर्ण कार्य बैंक सम्पन्न करने लगे हैं।
  15. विकास कार्यों में सहयोग – रार्ष्ट्रीय लक्ष्यों को प्रार्प्त करने के लिए ऋण नीति बनार्कर, बैंक दर एवं अन्य अनुपार्त तय करके कृषि, उद्योग, विदेशी व्यार्पार्र, समार्ज आदि के लिए बैंक विकास कोष भी उपलब्ध करवार्ते हैं। मुद्रार् मूल्य एवं सार्मार्न्य कीमत स्तर को संतुलित बनार्कर विकास क माग सुगम बनार्ने क कार्य भी बैंक करते हैं। विकास योजनार्ओं के लिए बैंकों में विशेष विभार्ग एवं शार्खार् खोली जार्ती हैं। जैसे भार्रत में कृषि वित्त उपलब्ध करवार्ने के लिए सहकारी बैंक, नार्बाड, क्षेत्रीय ग्रार्मीण बैंक तथार् सभी रार्ष्ट्रीयकृत बैंकों की कृषि शार्खार्एँ आदि।

इस प्रकार बैंक भार्रतीय अर्थव्यवस्थार् एवं देश के आर्थिक ढ़ार्ँचे को संचार्लित करने में महत्वपूर्ण भूमिक निभार्ते हैं। बैंकों से आम जनतार् एवं सरकार दोनों को लार्भ मिल रहार् है।

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