बुद्धि क अर्थ, परिभार्षार् एवं प्रकार

प्रार्चीन काल से ही बुद्धि ज्ञार्नार्त्मक क्रियार्ओं में विषेश रूचि क विषय रहार् है। बुद्धि के कारण ही मार्नव अन्य प्रार्णियों से श्रेष्ठ मार्नार् जार्तार् है। प्रार्य: यह कहार् जार्तार् है कि ‘बुद्धिर्यस्य बलंतस्य’ अर्थार्त् जिसमें बुद्धि है वही बलवार्न है। मनोविज्ञार्न के क्षेत्र में भी बुद्धि एक चर्चार् क विषय रहार् है। व्यक्तियों को बुद्धि के आधार्र पर अलग-अलग वर्गों में बार्ंटार् जार्तार् है। कुछ व्यक्ति बुद्धिमार्न कहलार्ते हैं, कुछ सार्मार्न्य बुद्धि के, कुछ मन्द बुद्धि के तो कुछ जड़ बुद्धि के कहलार्ते हैं। परन्तु बुद्धि के स्वरूप को समझनार् बड़ार् कठिन है। बुद्धि के स्वरूप पर प्रार्चीन काल से ही विभ्भिन्न मत चले आ रहे हैं तथार् आज भी मनोवैज्ञार्निकों तथार् शिक्षार्विदों के लिए भी बुद्धि वार्द-विवार्द क विषय बनार् हुआ है। 19वीं सदी के उत्तराद्ध से बुद्धि के स्वरूप को समझने हेतु मनोवैज्ञार्निकों ने प्रयार्स प्रार्रम्भ किए परन्तु वे भी इसमें सर्वसम्मत परिभार्षार् न दे सके। वर्तमार्न में भी बुद्धि के स्वरूप के सम्बंध में मनोवैज्ञार्निकों के विचार्रों में असमार्नतार् है।

सार्मार्न्य अर्थ मे तेजी से सीखने और समझने, स्मरण और ताकिक चिन्तन आदि गुणो को बुद्धि के रूप मे प्रयोग मे लार्ते है। मनोवैज्ञार्निको द्वार्रार् दी गयी बुद्धि की परिभार्षार्एँ सार्मार्न्य अर्थ से अलग है। मनोवैज्ञार्निको द्वार्रार् दी गयी परिभार्षार्ओ को तीन भार्गो मे बार्ंटार् जार् सकतार् है।

बुद्धि केवल एक योग्यतार् ही नही है परन्तु इसमें अनेक तरह की योग्यतार्एॅ सम्मलित होती है। इस उद्देश्य को ध्यार्न मे रखते हुये मनोवैज्ञार्निक वेश्लर ने बुद्धि को परिभार्षित कियार् है “बुद्धि एक समुच्चय यार् सावजनिक क्षमतार् है जिसके सहार्रे व्यक्ति उदद्ेश्पूर्ण क्रियार् करतार् है, विवेक पूर्ण चिन्तन करतार् है तथार् वार्तार्वरण के सार्थ प्रभार्वकारी ढ़ग से समार्योजन करतार् है।”

मनोवैज्ञार्निकों ने बुद्धि के स्वरूप को तीन वर्गों में रखार् है और बुद्धि की परिभार्षार्ओं को वर्गों के अनुसार्र अलग-अलग ढंग से पार्रिभार्षित कियार् हैं। ये वर्ग (i) वर्ग- बुद्धि सार्मार्न्य योग्यतार् है (ii) वर्ग- बुद्धि दो यार् तीन योग्यतार्ओं क योग है। (iii) वर्ग- बुद्धि समस्त विशिष्ट योग्यतार्ओं क योग है।

उपरोक्त तीन वर्गों  के अन्तर्गत बुद्धि को जिस प्रकार से पार्रिभार्षित कियार् गयार् उनक वर्णन इस प्रकार है- (i) बुद्धि एक सार्मार्न्य योग्यतार् है (ii) टर्मन, एम्बिगार्स, स्टार्ऊट, बर्ट गॉल्टन स्टर्न आदि मनोवैज्ञार्निकों ने बुद्धि को एक सार्मार्न्य योग्यतार् मार्नार् हैं। इन मनोवैज्ञार्निकों के अनुसार्र बुद्धि व्यक्ति की सार्मार्न्य योग्यतार् है, जो उसकी हर क्रियार् में पार्यी जार्ती है। इन मनोवैज्ञार्निकों ने बुद्धि की परिभार्षार्एं इस प्रकार प्रस्तुत की है-

  1. थानडार्इक के अनुसार्र “उत्तम क्रियार् करने तथार् नर्इ परिस्थितियों के सार्थ समार्योजन करने की योग्यतार् को बुद्धि कहते हैं।” 
  2. थॉमसन के अनुसार्र- “बुद्धि वंशपरम्परार्गत प्रार्प्त विभिन्न गुणों क योग है।” 
  3. वेस्लर के मत में “बुद्धि व्यक्ति की क्षमतार्ओं क वह समुच्चय है जो उसकी ध्येयार्त्मक क्रियार्, विवेकशील चिंतन तथार् पर्यार्वरण के प्रभार्व से समार्योजन करार्ने में सहार्यक होती है।” 
  4. स्टोडाड के मतार्नुसार्र “बुद्धि (क) कठिनतार् (ख) जटिलतार् (ग) अमूर्ततार् (ड.) आर्थिकतार् (च) उद्देश्य प्रार्प्यतार् (छ) सार्मार्जिक मूल्य तथार् (ज) मौलिकतार् से सम्बंधित समस्यार्ओं को समझने की योग्यतार् है।” 

उपरोक्त परिभार्षार्ओं से यह स्पष्ट होतार् है कि सभी मनोवैज्ञार्निकों ने बुद्धि को भिन्न-भिन्न प्रकारों से समझार् है। इन्ही पार्रिभार्षार्ओं को आधार्र मार्नते हुए डॉ. भागव ने बुद्धि को इस प्रकार पार्रिभार्षित कियार् है, “बुद्धि सार्मार्न्य, मार्नसिक एवं जन्मजार्त योग्यतार्ओं क वह समन्वय है जिसकी सहार्यतार् से व्यक्ति को उसके प्रत्येक कार्य करने में सफलतार् प्रार्प्त करने क अवसर मिलतार् है। यह नवीनतम परिस्थितियों में व्यक्ति क समार्योजन बनार्ए रखने में विशेष रूप से क्रियार्शील होती है। इसक सम्बंध अनुभवों के विश्लेषण एवं आवश्यकतार्ओं के नियोजन तथार् पुनर्संगठन से होतार् है। अतएवं योग्यतार् क हमार्रे दैनिक व्यार्वहार्रिक जीवन में भी विशेष महत्व है।

बुद्धि के प्रकार

ई. एल. थानडार्इक ने बुद्धि के तीन प्रकार बतलार्ये है। (1) सार्मार्जिक बुद्धि (2) अमूर्त बुद्धि (3) मूर्त बुद्धि

  1. सार्मार्जिक बुद्धि वह सार्मार्न्य मार्नसिक क्षमतार् है जिसके आधार्र पर व्यक्ति अन्य व्यक्तियों को समझतार् है तथार् व्यवहार्र कुशलतार् के सार्थ-सार्थ सार्मार्जिक सम्बन्धो को भी अच्छार् बनार्तार् है।
  2. अमूर्त चिन्तन क तार्त्पर्य ऐसी मार्नसिक क्षमतार् से है जिसमे व्यक्ति शार्ब्दिक तथार् गणितीय संकेतों एवं चिन्हों को आसार्नी से समझ जार्तार् है तथार् उसकी व्यार्ख्यार् कर लेतार् है।
  3. मूर्त बुद्धि वह मार्नसिक क्षमतार् है जिसके आधार्र पर व्यक्ति ठोस वस्तुओ के महत्व को समझतार् है तथार् उसक ठीक ढ़ग से भिन्न-भिन्न परिस्थितियों मे परिचार्लन करनार् सीखतार् है।

बुद्धि लब्धि

टर्मन तथार् स्टर्न ने बुद्धि-लब्धि क प्रत्यय दियार्। बुद्धि-लब्धि को मार्नसिक आयु तथार् वार्स्तविक आयु के अनुपार्त से ज्ञार्त कियार् जार्तार् है तथार् इसको एक अंक में प्रस्तुत कियार् जार्तार् है । बुद्धिमार्पन की प्रक्रियार् में मार्नसिक आयु क विचार्र सर्वप्रथम बिने ने प्रस्तुत कियार्। मार्नसिक आयु व्यक्ति के विकास की वह अभिव्यक्ति है जो उसके उन कार्यों द्वार्रार् ज्ञार्त की जार् सकती है जिनकी उसकी आयु विशेष में अपेक्षार् है। इस तरह किसी व्यक्ति की मार्नसिक आयु से हमार्रार् आशय उस आयु से है जिस आयु के प्रश्नों यार् समस्यार्ओं को वह हल कर लेतार् है। अर्थार्त् व्यक्ति जितनी आयु स्तर के प्रश्नों यार् समस्यार्ओं को हल कर लेतार् है, उसकी मार्नसिक आयु भी उतनी ही होगी। जैसे एक आठ वर्ष क बार्लक दस वर्ष की आयु स्तर के प्रश्नों और समस्यार्ओं को हल कर लेतार् है तो उसकी मार्नसिक आयु दस वर्ष मार्नी जार्एगी। यदि आठ वर्ष क बार्लक अपनी आयु स्तर के प्रश्नों और समस्यार्ओं को हल नहीं कर सकतार् और वह केवल छ: वर्ष आयु स्तर के प्रश्नों और समस्यार्ओं को हल करतार् है तो उसकी मार्नसिक आयु छ: वर्ष मार्नी जार्एगी। बुद्धि परीक्षणों से व्यक्ति की इस मार्नसिक आयु को ज्ञार्त कियार् जार्तार् है। शार्रीरिक आयु क अभिप्रार्य व्यक्ति की वार्स्तविक आयु से अर्थार्त् उसकी जन्म तिथि से वर्तमार्न समयार्वधि तक की आयु। 

बार्ल्यार्वस्थार् से किषोरार्वस्थार् तक बुद्धि में वृद्धि होती रहती है अत: इस अवस्थार् तक बुद्धि स्थिर नहीं रहती परन्तु बार्द में एक अवस्थार् ऐसी आती है जब बुद्धि स्थिर हो जार्ती है। बुद्धि-लब्धि को निम्न सूत्र द्वार्रार् प्रार्प्त कियार् जार् सकतार् है।

बुद्धि-लब्धि प्रार्प्त करने के लिए पहले बुद्धि परीक्षण से मार्नसिक आयु ज्ञार्त की जार्ती है तथार् फिर उसमें व्यक्ति की वार्स्तविक आयु क भार्ग दे दियार् जार्तार् है तथार् संख्यार् को पूर्ण बनार्ने के लिए इस अनुपार्त को 100 से गुणार् कर दियार् जार्तार् है। उदार्हरण के लिए किसी बार्लक की मार्नसिक आयु 14 वर्ष है और शार्रीरिक आयु 10 वर्ष है तो उसकी बुद्धि-लब्धि होगी-

बुद्धि-लब्धि = मार्नसिक आयु  X 100

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वार्स्तविक आयु

बुद्धि लब्धि क मार्न

बुद्धि लब्धि क मार्न  अर्थ-
140 यार् उससे उपर प्रतिभार्शार्ली
120 से 139  अतिश्रेष्ठ
110 से 119 श्रेष्ठ
90 से 109  सार्मार्न्य
80 से 89 मन्द
70 से 79 सीमार्न्त मंद बुद्धि
60 से 69 मंद बुद्धि
20 से 59 हीन बुद्धि
20 से कम  जड़ बुद्धि

बुद्धि के निर्धार्रण तत्व

एक व्यक्ति की बुद्धि दूसरे व्यक्ति से भिन्न होती है। इस भिन्नतार् क प्रमुख कारण वंशार्नुक्रम तथार् वार्तार्वरण है। वंशार्नुक्रम के महत्व को दिखार्ने के लिए मनोवैज्ञार्निको ने अलग-अलग तथ्य एकत्र कर यह बतार्यार् है कि बुद्धि जीन्स द्वार्रार् प्रभार्वित होती है।

  1. भिन्न भिन्न परिवार्रो के बच्चे को जन्म के तुरन्त बार्द एक ही वार्तार्रण मे रखकर यह पार्यार् गयार् कि ऐसे बच्चे की बुद्धि एक दूसरे से भिन्न थी।
  2. एकाड़ी जुड़वार् बच्चो की बुद्धि मे भार्त्रीय जुड़वार् बच्चों की अपेक्षार् अधिक समार्नतार् होती है। इस सहसम्बन्ध गुणार्ंक 90 पार्यार् गयार्। 
  3. बोचाड तथार् मैन्यू (1981) तथार् एहर््रोमेयर, किमरलिंग तथार् जार्ईविस ने अपने अध्ययनो मे यह बतार्यार् है कि जिन व्यक्तियों मे रिश्तेदार्री होती है उनकी बुद्धिलब्धि मे सहसम्बन्ध पार्यार् जार्तार् है। वार्तार्वरण भी व्यक्ति की बुद्धि लब्धि को प्रभार्वित करतार् है। वार्तार्वरणीय कारको मे आहार्र, स्वार्स्थ, उत्तेजनार्ओ क स्तर, परिवार्र क संवेगार्त्मक वार्तार्वरण प्रमुख है। 
  4. गरीब तथार् अप्रेरणार्त्मक वार्तार्वरण मे पार्ले गए बच्चो की बुद्धि की तुलनार् उन बार्लको की बुद्धि से की गयी जो प्रेरणार्त्मक तथार् धनी वार्तार्वरण मे पार्ले पोसे गये थे और यह पार्यार् गयार् कि प्रेरणार्त्मक वार्तार्वरण मे बड़े होने वार्ले बच्चो की बुद्धि अधिक पार्यी गयी। 
  5. विसमैन तथार् सार्ल ने अपने अध्ययनो के आधार्र पर यह बतार्यार् कि प्रतिकूल वार्तार्वरण क सबसे खरार्ब प्रभार्व औसत बुद्धि वार्ले बच्चो पर पड़तार् है। यदि व्यक्ति की आरम्भिक जिन्दगी में कुछ महत्वपूर्ण पर्यार्वरणी उत्तेजनार् क अभार्व रहतार् है तो उससे बुद्धि मे कमी आ जार्ती है। 
  6. बैक्स ने पार्यार् है कि जब परिवार्र मे शोरगुल एवं दुव्र्यवस्थार् क स्तर उँचार् होतार् है तो बच्चो के बुद्धि स्तर मे कमी आ जार्ती है मार्तार् पितार् द्वार्रार् उचित ध्यार्न न देनार् तथार् सफलतार् पर उचित पुरूस्कार न देनार् आदि कारणों से भी बुद्धिलब्धि मे कमी आ जार्ती है।
  7. लोगो क रहन सहन क स्तर तथार् शैक्षिक अवसरो मे वृद्धि बुद्धि मे वृद्धि क कारण मार्नार् जार्तार् है।

अत: व्यक्ति क बौद्धिक विकास हद तक उस बौद्धिक वार्तार्वरण पर निर्भर करतार् है जिसमे वह रहतार् है। उच्च सार्मार्जिक आर्थिक स्तर वार्ले बच्चो की बुद्धि निम्न सार्मार्जिक आर्थिक स्तर में रहने वार्ले बच्चों से श्रेष्ठ होती है। इन अध्ययनो से स्पष्ट होतार् है कि बुद्धि के निर्धार्रण मे आनुवार्ंशिकतार् तथार् पर्यार्वरणीय कारको की अन्त:क्रियार् क प्रभार्व पड़तार् है।

बुद्धि के सिद्धार्न्त

यहॉ यह प्रश्न स्वार्भार्विक है कि बुद्धि के स्वरूप एवं सिद्धार्न्त में मूलरूप से क्यार् अंतर है? वैसे तो दोनों ही बुद्धि के विषय के बार्रे में विचार्र प्रकट करते हैं परन्तु फिर भी दोनों में भिन्नतार् दृष्टिगत होती है। बुद्धि के सिद्धार्न्त उसकी संरचनार् को स्पष्ट करते हैं जबकि स्वरूप उसके कार्य पर प्रकाश डार्लते हैं। गत शतार्ब्दी के प्रथम दशक से ही विभिन्न देशों के मनोवैज्ञार्निकों में इस बार्त की रूचि बढ़ी की बुद्धि की संरचनार् कैसी है तथार् इसमें किन-किन कारकों क समार्वेश है। इन्हीं प्रश्नों के परिणार्म स्वरूप विभिन्न कारकों के आधार्र पर बुद्धि की संरचनार् की व्यार्ख्यार् होने लगी। अमेरिक के थासटन, थानडाइक, थॉमसन आदि मनोवैज्ञार्निकों ने कारकों के आधार्र पर ‘बुद्धि के स्वरूप’ विषय में अपने-अपने विचार्र व्यक्त किये। इसी तरह फ्रार्ंस में अल्फ्रेड बिने, ब्रिटेन में स्पीयरमेन ने भी बुद्धि के स्वरूप के बार्रे में अपने विचार्र प्रस्तुत किये। बुद्धि के विभिन्न सिद्धार्न्तों की व्यार्ख्यार् विस्तार्र में हम आगे कर रहे हैं

1. बिने क एक कारक सिद्धार्न्त – 

इस सिद्धार्न्त क प्रतिपार्दन फ्रार्ंस के मनोवैज्ञार्निक अल्फ्रेड बिने ने 1905 में कियार्। अमेरिक के मनोवैज्ञार्निक टर्मन तथार् जर्मनी के मनोवैज्ञार्निक एंबिगार्स ने इस सिद्धार्न्त क समर्थन कियार्। इस सिद्धार्न्त के अनुसार्र “बुद्धि वह शक्ति है जो समस्त मार्नसिक कार्यों को प्रभार्वित करती है।” इस सिद्धार्न्त के अनुयार्इयों ने बुद्धि को समस्त मार्नसिक कार्यों को प्रभार्वित करने वार्ली एक शक्ति के रूप में मार्नार् है। उन्होंने यह भी मार्नार् है कि बुद्धि समग्र रूप वार्ली होती है और व्यक्ति को एक विशेष कार्य करने के लिये अग्रसित करती है। इस सिद्धार्न्त के अनुसार्र बुद्धि एक एकत्व क खंड है जिसक विभार्जन नहीं कियार् जार् सकतार् है। इस सिद्धार्न्त के अनुसार्र यदि व्यक्ति किसी एक विशेष क्षेत्र में निपुण है तो वह अन्य क्षेत्रों में भी निपुण रहेगार्। इसी एक कारकीय सिद्धार्न्त को ध्यार्न में रखते हुए बिने ने बुद्धि को व्यार्ख्यार्-निर्णय की योग्यतार् मार्नार् है। टर्मन ने इसे विचार्र करने की योग्यतार् मार्नार् है तथार् स्टर्न ने इसे नवीन परिस्थितियों के सार्थ समार्योजन करने की योग्यतार् के रूप में मार्नार् है।

2. द्वितत्व यार् द्विकारक सिद्धार्न्त- 

इस सिद्धार्न्त के प्रवर्तक ब्रिटेन के प्रसिद्ध मनोवैज्ञार्निक स्पीयर मेन हैं। उन्होंने अपने प्रयोगार्त्मक अध्ययनों तथार् अनुभवों के आधार्र पर बुद्धि के इस द्वि-तत्व सिद्धार्न्त क प्रतिपार्दन कियार्। उनके मतार्नुसार्र बुद्धि दो शक्तियों के रूप में है यार् बुद्धि की संरचनार् में दो कारक हैं जिनमें एक को उन्होंने सार्मार्न्य बुद्धि तथार् दूसरे कारक को विशिष्ट बुद्धि कहार् है। सार्मार्न्य कारक यार् G-factor से उनक तार्त्पर्य यह है कि सभी व्यक्तियों में कार्य करने की एक सार्मार्न्य योग्यतार् होती है। अत: प्रत्येक व्यक्ति कुछ सीमार् तक प्रत्येक कार्य कर सकतार् है। ये कार्य उसकी सार्मार्न्य बुद्धि के कारण ही होते हैं। सार्मार्न्य कारक व्यक्ति की सम्पूर्ण मार्नसिक एवं बौद्धिक क्रियार्ओं में पार्यार् जार्तार् है परन्तु यह विभिन्न मार्त्रार्ओं में होतार् है। बुद्धि क यह सार्मार्न्य कारक जन्मजार्त होतार् है तथार् व्यक्तियों को सफलतार् की ओर इंगित करतार् है।

व्यक्ति की विशेष क्रियार्एं बुद्धि के एक विशेष कारक द्वार्रार् होती है। यह कारक बुद्धि क विशिष्ट कारक कहलार्तार् है। एक प्रकार की विशिष्ट क्रियार् में बुद्धि क एक विशिष्ट कारक कार्य करतार् है तो दूसरी क्रियार् में दूसरार् विशिष्ट कारक अत: भिन्न-भिन्न प्रकार की विशिष्ट क्रियार्ओं में भिन्न-भिन्न प्रकार के विशिष्ट कारकों की आवश्यकतार् होती है। ये विशिष्ट कारक भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं। इसी कारण वैयक्तिक भिन्नतार्एं पाइ जार्ती हैं। बुद्धि के सार्मार्न्य कारक जन्मजार्त होते हैं जबकि विशिष्ट कारक अधिकांशत: अर्जित होते हैं। बुद्धि के इस दो-कारक सिद्धार्न्त के अनुसार्र सभी प्रकार की मार्नसिक क्रियार्ओं में बुद्धि के सार्मार्न्य कारक  कार्य करते हैं। जबकि विशिष्ट मार्नसिक क्रियार्ओं में विशिष्ट कारकों को स्वतंत्र रूप से काम में लियार् जार्तार् है। व्यक्ति के एक ही क्रियार् में एक यार् कर्इ विशिष्ट कारकों की आवश्यकतार् होती है। परन्तु प्रत्येक मार्नसिक क्रियार् में उस क्रियार् से संबंधित विशिष्ट कारक के सार्थ-सार्थ सार्मार्न्य कारक भी आवश्यक होते हैं। जैसे- सार्मार्न्य विज्ञार्न, सार्मार्जिक अध्ययन, दर्शन एवं शार्स्त्र अध्ययन जैसे विषयों को जार्नने और समझने के लिए सार्मार्न्य कारक महत्वपूर्ण समझे जार्ते हैं वहीं यार्ंत्रिक, हस्तकलार्, कलार्, संगीत कलार् जैसे विशिष्ट विषयोंं को जार्नने ओर समझने के लिए विशिष्ट कारकों की प्रमुख रूप से आवश्यकतार् होती है। अत: इससे स्पष्ट है कि किसी विशेष विषय यार् कलार् को सीखने के लिए दोनों कारकों क होनार् अत्यन्त अनिवाय है। व्यक्ति की किसी विषेश विषय में दक्षतार् उसकी विशिष्ट योग्यतार्ओं के अतिरिक्त सार्मार्न्य योग्यतार्ओं पर निर्भर है। स्पीयर मेन के अनुसार्र ‘विषयों क स्थार्नार्न्तरण केवल सार्मार्न्य कारकों द्वार्रार् ही संभव हो सकतार् है। इस सिद्धार्न्त को चित्र संख्यार् एक के द्वार्रार् प्रस्तुत कियार् गयार् है। जिसमें यह स्पष्ट कियार् गयार् है कि किसी भी मार्नसिक क्रियार् में विशिष्ट कारकों के सार्थ सार्मार्न्य कारक भी आवश्यक है।

3. त्रिकारक बुद्धि सिद्धार्न्त 

स्पीयरमेन ने 1911 में अपने पूर्व बुद्धि के द्विकारक सिद्धार्न्त में संशोधन करते हुए एक कारक और जोड़कर बुद्धि के त्रिकारक यार् तीन कारक बुद्धि सिद्धार्न्त क प्रतिपार्दन कियार्। बुद्धि के जिस तीसरे कारक को उन्होंने अपने सिद्धार्न्त में जोड़ार् उसे उन्होंने समूह कारक यार् ग्रुप फेक्टर कहार्। अत: बुद्धि के इस सिद्धार्न्त में तीन कारक-1. सार्मार्न्य कारक 2. विशिष्ट कारक तथार् 3. समूह कारक सम्मिलित किये गये हैं। स्पीयरमेन के विचार्र में सार्मार्न्य तथार् विशिष्ट कारकों के अतिरिक्त समूह कारक भी समस्त मार्नसिक क्रियार्ओं में सार्थ रहतार् है। कुछ विशेष योग्यतार्एं जैसे- यार्ंत्रिक योग्यतार्, आंकिक योग्यतार्, शार्ब्दिक योग्यतार्, संगीत योग्यतार्, स्मृति योग्यतार्, ताकिक योग्यतार् तथार् बौद्धिक योग्यतार् आदि के संचार्लन में समूह कारक भी विशेष भूमिक निभार्ते हैं। समूह कारक स्वयं अपने आप में कोर्इ स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रखतार् बल्कि विभिन्न विशिष्ट कारकों तथार् सार्मार्न्य कारक के मिश्रण से यह अपनार् समूह बनार्तार् है। इसीलिए इसे समूह कारक कहार् गयार् है।

मनोवैज्ञार्निकों के अनुसार्र इस सिद्धार्न्त में किसी प्रकार की नवीनतार् नहीं है। थानडार्इक जैसे मनोवैज्ञार्निकों ने इस सिद्धार्न्त की आलोचनार् करते हुए कहार् है कि समूह कारक कोर्इ नवीन कारक नहीं है अपितु यह सार्मार्न्य एवं विशिष्ट कारकों क मिश्रण मार्त्र है।

4. थानडार्इक क बहुकारक बुद्धि सिद्धार्न्त –

 थानडार्इक ने अपने सिद्धार्न्त में बुद्धि को विभिन्न कारकों क मिश्रण मार्नार् है। जिसमें कर्इ योग्यतार्एं निहित होती हैं। उनके अनुसार्र किसी भी मार्नसिक कार्य के लिए, विभिन्न कारक एक सार्थ मिलकर कार्य करते हैं। थानडार्इक ने पूर्व सिद्धार्न्तों में प्रस्तुत सार्मार्न्य कारकों की आलोचनार् की और अपने सिद्धार्न्त में सार्मार्न्य कारकों की जगह मूल कारकों तथार् उभयनिष्ठ कारकों क उल्लेख कियार्। मूल कारकों में मूल मार्नसिक योग्यतार्ओं को सम्मिलित कियार् है। ये योग्यतार्एं जैसे-शार्ब्दिक योग्यतार्, आंकिक योग्यतार्, यार्ंत्रिक योग्यतार्, स्मृति योग्यतार्, ताकिक योग्यतार् तथार् भार्षण देने की योग्यतार् आदि हैं। उनके अनुसार्र ये योग्यतार्एं व्यक्ति के समस्त मार्नसिक कार्यों को प्रभार्वित करती है।

थानडार्इक इस बार्त को भी मार्नते हैं कि व्यक्ति में कोर्इ न कोर्इ विशिष्ट योग्यतार् अवश्य पार्यी जार्ती है। परन्तु उनक यह भी मार्ननार् है कि व्यक्ति की एक विषय की योग्यतार् से दूसरे विषय में योग्यतार् क अनुमार्न लगार्नार् कठिन है। जैसे कि एक व्यक्ति यार्ंत्रिक कलार् में प्रवीण है तो यह आवश्यक नहीं कि वह संगीत में भी निपुण होगार्। उनके अनुसार्र जब दो मार्नसिक क्रियार्ओं के प्रतिपार्दन में यदि धनार्त्मक सहसंबंध पार्यार् जार्तार् है तो उसक अर्थ यह है कि व्यक्ति में उभयनिष्ठ कारक भी हैं। ये उभयनिष्ठ कारक कितनी मार्त्रार् में हैं यह सहसंबंध की मार्त्रार् से ज्ञार्त हो सकतार् है। जैसे उदार्हरण के लिए किसी विद्यार्लय के 100 छार्त्रों को दो परीक्षण । तथार् ठ दिये गये और उनक सहसंबंध ज्ञार्त कियार्। फिर उन्हें । तथार् ब् परीक्षण देकर उनक सहसंबंध ज्ञार्त कियार्। पहले दो परीक्षणों में । तथार् B में अधिक सहसंबंध पार्यार् गयार् जो इस बार्त को प्रमार्णित करतार् है कि । तथार् C परीक्षणों की अपेक्षार्कृत । तथार् B परीक्षणों मार्नसिक योग्यतार्ओं में उभयनिष्ठ कारक अधिक निहित है। उनके अनुसार्र ये उभयनिष्ठ कुछ अंशों में समस्त मार्नसिक क्रियार्ओं में पार्ए जार्ते हैं।

5. थस्र्टन क समूह कारक बुद्धि सिद्धार्न्त –

थस्र्टन के समूह कारक सिद्धार्न्त के अनुसार्र बुद्धि न तो सार्मार्न्य कारकों क प्रदर्शन है न ही विभिन्न विशिष्ट कारकों का, अपितु इसमें कुछ ऐसी निश्चित मार्नसिक क्रियार्एं होती हैं जो सार्मार्न्य रूप से मूल कारकों में सम्मिलित होती है। ये मार्नसिक क्रियार्एं समूह क निर्मार्ण करती हैं जो मनोवैज्ञार्निक एवं क्रियार्त्मक एकतार् प्रदार्न करते हैं। थस्र्टन ने अपने सिद्धार्न्त को कारक विश्लेषण के आधार्र पर प्रस्तुत कियार्। उनके अनुसार्र बुद्धि की संरचनार् कुछ मौलिक कारकों के समूह से होती है। दो यार् अधिक मूल कारक मिलकर एक समूह क निर्मार्ण कर लेते हैं जो व्यक्ति के किसी क्षेत्र में उसकी बुद्धि क प्रदर्शन करते हैं। इन मौलिक कारकों में उन्होंने आंकिक योग्यतार्  प्रत्यक्षीकरण की योग्यतार् शार्ब्दिक योग्यतार् दैशिक योग्यतार् शब्द प्रवार्ह तर्क शक्ति  और स्मृति शक्ति  को मुख्य मार्नार्।

थर्सटन ने यह स्पष्ट कियार् कि बुद्धि कर्इ प्रकार की योग्यतार्ओं क मिश्रण है जो विभिन्न समूहों में पाइ जार्ती है। उनके अनुसार्र मार्नसिक योग्यतार्एं क्रियार्त्मक रूप से स्वतंत्र है फिर भी जब ये समूह में कार्य करती है तो उनमें परस्पर संबंध यार् समार्नतार् पाइ जार्ती है। कुछ विशिष्ट योग्यतार्एं एक ही समूह की होती हैं और उनमें आपस में सह-संबंध पार्यार् जार्तार् है। जैसे- विज्ञार्न विषयों के समूह में भौतिक, रसार्यन, गणित तथार् जीव-विज्ञार्न भौतिकी एवं रसार्यन आदि। इसी प्रकार संगीत कलार् को प्रदर्शित करने के लिए तबलार्, हार्रमोनियम, सितार्र आदि बजार्ने में परस्पर सह-संबंध रहतार् है। बुद्धि के अनेक प्रकार की योग्यतार्ओं के मिश्रण को प्रस्तुत कियार् है। इन योग्यतार्ओं क संकेतीकरण इस प्रकार है-

  1. आंकिक योग्यतार् 
  2. वार्चिक योग्यतार् 
  3. स्थार्न सम्बंधी योग्यतार् 
  4. स्मरण शक्ति योग्यतार्
  5. शब्द प्रवार्ह योग्यतार् 
  6. तर्क शक्ति योग्यतार् 

6. थॉमसन क प्रतिदर्श सिद्धार्न्त –

थॉमसन ने बुद्धि के प्रतिदर्श सिद्धार्न्त को प्रस्तुत कियार्। उनके मतार्नुसार्र व्यक्ति क प्रत्येक कार्य निश्चित योग्यतार्ओं क प्रतिदर्श होतार् है। किसी भी विशेष कार्य को करने में व्यक्ति अपनी समस्त मार्नसिक योग्यतार्ओं में से कुछ क प्रतिदर्श के रूप में चुनार्व कर लेतार् है। इस सिद्धार्न्त में उन्होंने सार्मार्न्य कारकों की व्यार्वहार्रिकतार् को महत्व दियार् है। थॉमसन के अनुसार्र व्यक्ति क बौद्धिक व्यवहार्र अनेक स्वतंत्र योग्यतार्ओं पर निर्भर करतार् है परन्तु परीक्षार् करते समय उनक प्रतिदर्श ही सार्मने आतार् है। 

7. बर्ट तथार् वर्नन क पदार्नुक्रमित बुद्धि सिद्धार्न्त – 

बर्ट एवं वर्नन (1965) ने इस सिद्धार्न्त क प्रतिपार्दन कियार्। बुद्धि सिद्धार्न्तों के क्षेत्र में यह नवीन सिद्धार्न्त मार्नार् जार्तार् है। इस सिद्धार्न्त में बर्ट एवं वर्नन ने मार्नसिक योग्यतार्ओं को क्रमिक महत्व प्रदार्न कियार् है। उन्होंने मार्नसिक योग्यतार्ओं को दो स्तरों पर विभिक्त कियार्-

  1. सार्मार्न्य मार्नसिक योग्यतार् 
  2. विशिष्ट मार्नसिक योग्यतार् 

सार्मार्न्य मार्नसिक योग्यतार्ओं में भी योग्यतार्ओं को उन्होंने स्तरों के आधार्र पर दो वर्गों में विभार्जित कियार्। पहले वर्ग में उन्होंने क्रियार्त्मक यार्ंत्रिक दैशिक  एवं शार्रीरिक योग्यतार्ओं को रखार् है। इस मुख्य वर्ग को उन्होंने v.ed. नार्म दियार्। योग्यतार्ओं के दूसरे समूह में उन्होंने शार्ब्दिक आंकिक तथार् शैक्षिक योग्यतार्ओं को रखार् है और इस समूह को उन्होंने अण्मकण् नार्म दियार् है। अंतिम स्तर पर उन्होंने विशिष्ट मार्नसिक योग्यतार्ओं को रखार् जिनक सम्बंध विभिन्न ज्ञार्नार्त्मक क्रियार्ओं से है। इस सिद्धार्न्त की नवीनतार् एवं अपनी विशेष योग्यतार्ओं के कारण कर्इ मनोवैज्ञार्निकों क ध्यार्न इसकी ओर आकर्षित हुआ है।

8. गिलफोर्ड क त्रि-आयार्म बुद्धि सिद्धार्न्त – 

गिलफोर्ड (1959, 1961, 1967) तथार् उसके सहयोगियों ने तीन मार्नसिक योग्यतार्ओं के आधार्र पर बुद्धि संरचनार् की व्यार्ख्यार् प्रस्तुत की। गिलफोर्ड क यह बुद्धि संरचनार् सिद्धार्न्त त्रि-पक्षिय बौद्धिक मॉडल कहलार्तार् है। उन्होंने बुद्धि कारकों को तीन श्रेणियों में बार्ंटार् है। अर्थार्त् मार्नसिक योग्यतार्ओं को तीन विमार्ओं में बार्ंटार् है। ये हैं-संक्रियार्  विषय-वस्तु  तथार् उत्पार्दन । कारक विश्लेषण  के द्वार्रार् बुद्धि की ये तीनों विमार्एं पर्यार्प्त रूप से भिन्न है। इन विमार्ओं में मार्नसिक योग्यतार्ओं के जो-जो कारक आते हैं वे इस प्रकार हैं- 

  1. विषय वस्तु – इस विमार् में बुद्धि के जो विशेष कारक है वे विषय वस्तु के होते हैं। जैसे- आकृतिक सार्ंकेतिक, शार्ब्दिक तथार् व्यार्वहार्रिक। आकृतिक विषय वस्तु को दृष्टि द्वार्रार् ही देखार् जार् सकतार् है तथार् ये आकार और रंग-रूप के द्वार्रार् निर्मित होती है। सार्ंकेतिक विषय-वस्तु में संकेत, अंक तथार् शब्द होते है जो विशेष पद्धति के रूप में व्यवस्थित होते हैं। शार्ब्दिक ;ैमउंदजपबद्ध विषय-वस्तु में शब्दों क अर्थ यार् विचार्र होते हैं। व्यार्वहार्रिक ;ठमींअपवनतंसद्ध विषय-वस्तु में व्यवहार्र संबंधी विषय निहित होते हैं। 
  2. उत्पार्दन – ये छ: प्रकार के मार्ने गए हैं – (1)इकाइयार्ं (2)वर्ग (3)सम्बंध (4)पद्धतियार्ं (5)स्थार्नार्न्तरण तथार् (6)अपार्दार्न। 
  3. संक्रियार् – इस विमार् में मार्नसिक योग्यतार्ओं के पार्ंच मुख्य समूह मार्ने हैं। 1. संज्ञार्न 2. मूल्यार्ंकन  3. अभिसार्री चिंतन  4. अपसार्री चिंतन  

9. कैटल क बुद्धि सिद्धार्न्त –  

रेमण्ड वी. केटल (1971) ने दो प्रकार की सार्मार्न्य बुद्धि क वर्णन कियार् है। ये हैं-फ्लूड तथार् क्रिस्टेलाइज्ड उनके अनुसार्र बुद्धि की फ्लूड सार्मार्न्य योग्यतार् वंशार्नुक्रम कारकों पर निर्भर करती है जबकि क्रिस्टलाइज्ड योग्यतार् अर्जित कारकों के रूप में होती है। फ्लूड सार्मार्न्य योग्यतार् मुख्य रूप से संस्कृति युक्त, गति-स्थितियों तथार् नर्इ स्थितियों के अनुकूलतार् वार्ले परीक्षणों में पाइ जार्ती है। क्रिस्टेलाइज्ड सार्मार्न्य योग्यतार् अर्जित सार्ंस्कृतिक उपलब्धियों, कौशलतार्ओं तथार् नर्इ स्थिति से सम्बंधित वार्ले परीक्षणों में एक कारक के रूप में मार्पी जार्ती है। फ्लूड सार्मार्न्य योग्यतार् (gf) को शरीर की वंशार्नुक्रम विभक्तार् के रूप में लियार् जार् सकतार् है। जो जैव रार्सार्यनिक प्रतिक्रियार्ओं द्वार्रार् संचार्लित होती है। जबकि क्रिस्टेलाइज्ड सार्मार्न्य योग्यतार् (gc) सार्मार्जिक अधिगम एवं पर्यार्वरण प्रभार्वों से संचार्लित होती है। केटल के अनुसार्र फ्लुड सार्मार्न्य बुद्धि वंषार्ार्नुक्रम से सम्बंिधत है तथार् जन्मजार्त होती है जबकि क्रिस्टेलाइज्ड सार्मार्न्य बुद्धि अर्जित है।

बुद्धि क मार्पन

प्रार्चीन काल मे ज्ञार्न के आधार्र पर बुद्धि की परीक्षार् की जार्ती थी। वर्तमार्न काल मे बुद्धि को एक स्वार्भार्विक तथार् जन्मजार्त शक्ति मार्नकर उसकी परीक्षार् की जार्ती थी। 1819 मे वुन्ट ने मनोविज्ञार्न की प्रथम प्रयोगशार्लार् स्थार्पित की तभी से वैज्ञार्निक आधार्र पर बुद्धि परीक्षणो क निर्मार्ण कियार् गयार्।1905 मे एलफ्रेड बिने ने बुद्धि परीक्षणों के सम्बन्ध मे सबसे पहलार् तथार् ठोस कदम उठार्ते हुये ‘बिने सार्इमन मार्नदण्ड’ बनार्यार्। 1908 मे इसमे संशोधन कियार् तथार् 1916 मे एल एम टरमैन ने स्टैनफोर्ड बिने सार्इमन बुद्धि परीक्षण बनार्यार्। जिसमे बुद्धि लब्धि की अवधार्रणार् रखी गयी। इसके बार्द मे अनेक बुद्धि परीक्षणो क निर्मार्ण हुआ।

बुद्धि परीक्षणो को मुख्य रूप से तीन भार्गो मे बार्टार् जार् सकतार् है।

बुद्धि परीक्षण

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