बीमार् क अर्थ, परिभार्षार्, प्रकार एवं महत्व
बीमार् एक व्यवसार्य है संविदार् पर आधार्रित है। इस संविदार् के अनुसार्र एक पक्षकार दूसरे पक्षकार को आकस्मिक घटनार्ओं के दुष्परिणार्मों से सुरक्षार् प्रदार्न करने क वचन देतार् है बीमार् संविदार् में जोखिम ग्रहण करने वार्लार् पक्षकार बीमार्दार्तार् (Insurance) दूसरो पक्षकार बीमार्दार्र (Insurance) कहार् जार्तार् है बीमार्दार्र जो प्रतिफल देतार् है, उसे प्रीमियम (प्रत्याजन) कहते है, जिस दस्तार्वेज में संविदार् की शर्ते लिखी जार्ती है उसे बीमार्पत्र यार् पार्लिसी (Policy ) कहते है।

बीमार् क अर्थ 

बीमार् दो पक्षों के बीच एक ऐसार् प्रसंविदार् है जिससे एक पक्ष जो बीमार् करतार् है उसे बीमार्कर्तार् (Insurance) कहते हैं, दूसरे पक्ष जो बीमार् करवार्तार् है वह बीमार्दार्र यार् बीमित व्यक्ति कहते है। लार्भकारी (Benificiary) को जो एक निश्चय प्रतिफल देतार् है उसे प्रीमियम (Premium) कहते है के बदले में उल्लिखित आकस्मिक घटनार् जिसके प्रति बीमार् है के घटित होने पर एक निश्चिम रकम (Insurance) के भुगतार्न क वचन देतार् है। पैटरसन, र्इ डब्ल्यू के अनुसार्र – “बीमार् दो पक्षकारो के बीच एक संविदार् है जिसके अन्तर्गत एक पक्षकार एक निश्चित प्रतिफल के बदले दूसरे पक्षकारो की विशिष्ट जोखिमों को ग्रहण करतार् है और उसे भविष्य में किसी उल्लिखित घटनार् के होने पर एक रकम देने क यार् क्षतिपूर्ति क वचन देतार् है।” मैगी डी0 एच के अनुसार्र – “बीमार् के अन्तर्गत बीमार्कर्तार् द्वार्रार् एक निश्चित घटनार् के घटित होने पर होने वार्ले हार्नि को प्रीमियम के प्रतिफल में भुगतार्न करने क वार्दार् करतार् है।”

    बीमार् के प्रकार

    बीमार् की विषय वस्तु अथवार् प्रकृति के आधार्र पर बीमार् को निम्न प्रकार से वर्गीकृत कियार् जार् सकतार् है 1. जीवन बीमार्  2. अग्नि बीमार् 3. सार्मुद्रिक बीमार् 4.अन्य प्रकार के बीमार् ।

    1. जीवन बीमार्

    मार्नव जीवन अनिश्चिततार्ओं से भरार् होतार् है। जीवन यार्पन के लिए मनुष्य को अनेक क्रियार्एं करनी होती है, जिनमें कदम-कदम पर जोखिम होते हैं। किसी दुर्घटनार् यार् बीमार्री से असमय मृत्यु हो सकती है। ऐसी स्थिति में मृतक के परिवार्र को वित्तीय कठिनाइयों क सार्मनार् करनार् पडतार् है। इसी प्रकार बुढाऱ्पे मे व्यक्ति के पार्स आरार्म से जीवन-यार्पन करने, चिकित्सार् करार्ने के लिए पर्यार्प्त धन नहीं होतार् है। अपने बच्चों के विवार्ह यार् उसे उच्च शिक्षार् दिलवार्ने के लिए बड़ी मार्त्रार् में धन की आवश्यकतार् होती है। जीवन बीमार् के द्वार्रार् हमें भविष्य की इन परिस्थितियों से सुरक्षार् प्रार्प्त हो सकती है। इसमें बीमार्कार एक निश्चित रार्शि बीमित व्यक्ति की मृत्यु अथवार् एक निश्चित अवधि की समार्प्ति पर देने क वचन देतार् है। इसके बदले मे बीमार्कार (बीमार् कंपनी) किश्तों में एक निश्चित प्रीमियम रार्शि लेतार् है. अब क्योकिं बीमित जोखिम क घटित होनार् सुनिश्चित है। अत: बीमित व्यक्ति को बीमार् रार्शि देर-सबेर प्रार्प्त होनार् भी सुनिश्चित है. बीमित व्यक्ति अपने को सुरक्षित महसूस करतार् है अत: जीवन बीमार् को जीवन आश्वार्सन भी कहार् जार्तार् है।

    जीवन बीमार् जीवन की अनिश्चिततार् से सुरक्षार् प्रदार्न करने के लिए प्रार्रंभ कियार् गयार् थार्। लेकिन धीरे-धीरे इसके क्षेत्र को स्वार्स्थ्य बीमार्, विकलार्ंगतार् बीमार्, पैंशन योजनार् आदि तक बढ़ार् दियार् गयार् है। मूल रूप से जीवन बीमार् पार्लिसियार्ं दो प्रकार की होती हैं। क. आजीवन बीमार् पार्लिसी एवं ख. बंदोबस्ती बीमार् पार्लिसी. आजीवन बीमार्-पार्लिसी में प्रीमियम की रार्शि क भुगतार्न बीमित को आजीवन अथवार् एक निश्चित अवधि के लिए नियमित रूप से करनार् होतार् है. बीमार् रार्शि बीमित के उतरार्धिकारियों को उसकी मृत्यु के पश्चार्त देय होती है। यह पार्लिसी ऐसे व्यक्ति द्वार्रार् ली जार्ती है जो अपनी मृत्यु के पश्चार्त अपने पर आश्रित व्यक्तियों को वित्तीय सहार्यतार् पहुंचार्नार् चार्हतार् है। दूसरी ओर बंदोबस्ती बीमार् पार्लिसी एक निश्चित अवधि के लिए होती है अर्थार्त् बीमित व्यक्ति द्वार्रार् एक निश्चित आयु को प्रार्प्त करने अथवार् उस आयु को प्रार्प्ति करने से पूर्व उसकी मृत्यु की स्थिति में, बीमार् कंपनी द्वार्रार् बीमार् रार्शि क भुगतार्न कियार् जार्तार् हैं। आजीवन और बंदोबस्ती पार्लिसियों के अतिरिक्त कर्इ अन्य पार्लिसियार्ँ भी शुरू की गर्इ। जिनक उद्देश्य ग्रार्हकों को रार्शि निवेश हेतु प्रोत्सार्हन देनार् है। जोखिमों से सुरक्षार् और बचत क लार्भ सार्थ-सार्थ मिलने से इनक महत्व और भी बढ़ जार्तार् है। कुछ पार्लिसियों क संक्षिप्त विवरण-

    1. संयुक्त जीवन बीमार् पार्लिसी- 

    यह पार्लिसी दो यार् दो से अधिक व्यक्तियों के जीवन को संयुक्त रूप से बीमित करती है। उनमें से किसी एक की मृत्यु होने पर जीवित व्यक्ति/व्यक्तियों को बीमार् रार्शि देय होती है। सार्मार्न्यत: यह पार्लिसी पति पत्नी के जीवन पर अथवार् दो सार्झेदार्रों के जीवन पर संयुक्त रूप से की जार्ती है।

    2. धनवार्पसी (Money Back) पार्लिसी- 

    इस योजनार् में पार्लिसीधार्रक को कुछ समय के अंतरार्ल पर भुगतार्न कियार् जतार्ार् है। यह सार्मार्न्य स्थार्यी निधि बीमार् पार्लिसी से हटकर हैं जिसमें जीवित रहने पर कुल भुगतार्न क लार्भ केवल एक निश्चित आयु की प्रार्प्ति के बार्द ही मिलतार् है। उदार्हरण के लिए, यदि धनवार्पसी पार्लिसी 20 वर्ष के लिए ली गर्इ है तो बीमित रार्शि क 20 प्रतिशत प्रति पार्ँचं वर्ष, 10 वर्ष, 15 वर्ष एवं शेष 40 प्रतिशत बोनस सहित 20 वें वर्ष के पश्चार्त देय हो जार्तार् है।

    3. पेंशन योजनार्- 

    इस योजनार् के अंतर्गत पार्लिसी की अवधि के पश्चार्त ही जीवित रहने पर पार्लिसी धार्रक को पार्लिसी की रार्शि क भुगतार्न कियार् जार्तार् है। बीमित रार्शि अथवार् पार्लिसी की रार्शि क भुगतार्न जैसे-मार्सिक, छमाइ अथवार् वाषिक किस्तों पर कियार् जार्तार् है। उन लोगों के लिए उपयोगी है जो एक निश्चित आयु के पश्चार्त नियमित आय चार्हते हैं।

    4. यूनिट योजनार्एं- 

    यह योजनार्एं दोहरे लार्भ अर्थार्त निवेश एवं बीमार् दोनों क लार्भ प्रदार्न करती हैं। पार्लिसी धार्रक द्वार्रार् जिस प्रीमियम की रार्शि क भुगतार्न कियार् जार्तार् है उसे विभिन्न कंपनियों के अंशों एवं ऋण पत्रों के क्रय पर खर्च कियार् जार्तार् है। परिपक्वतार् रार्शि मुख्य रूप से निवेश के बार्जार्र मूल्य पर निर्भर करती है।

    5. सार्मूहिक बीमार्- 

    सार्मूहिक बीमार् योजनार्एं कुछ व्यक्तियों कुछ व्यक्तियों के समूह को कम लार्गत पर जीवन बीमार् सुरक्षार् प्रदार्न करने के लिए होती है। यह योजनार् किसी भी व्यार्वसार्यिक इकार्इ अथवार् कार्यार्लय के कर्मचार्रियों के समूह के लिए उपयोगी है। हमार्रे देश में जीवन बीमार् क भार्रतीय जीवन बीमार् निगम करती है। जिसक 19 जनवरी 1956 को रार्ष्ट्रीयकरण कियार् गयार् थार्। अब बहुत सार्री निजी कंपनियार्ं भी जीवन बीमार् व्यवसार्य से आ गर्इ है।

      2. अग्नि बीमार्

      आग से होने वार्ली हार्नियों से सुरक्षार् प्रार्प्त करने अग्नि बीमार् करार्यार् जार्तार् है। अग्नि बीमार् एक ऐसार् अनुबंध है जिसमें बीमार्कार प्रीमियम के बदले में अग्नि से होने वार्ली हार्नि की रार्शि यार् क्षतिपूर्ति करने क वचन देतार् है। अग्नि बीमार् सार्मार्न्यत: एक वर्ष के लिए कियार् जार्तार् है। इसक हर वर्ष नवीनीकरण भी करार्यार् जार् सकतार् है।
      अग्नि से होने वार्ली हार्नि क भुगतार्न दो शर्तों के पूरार् होने पर ही कियार् जार्तार् है।

      1. आग वार्स्तव में लगी हो, एवं
      2. आग जार्नबूझ नहीं लगाइ गर्इ हो बल्कि दुर्घटनार्वश लगी हो. यहार्ँ आग लगने क कारण महत्व नहीं रखतार्।

      अग्नि बीमार् अनुबंध क्षतिपूर्ति क अनुबंध है अर्थार्त बीमित सम्पत्ति की कीमत, अग्नि से क्षति अथवार् पार्लिसी की रार्शि तीनों में से जो भी कम हो, से अधिक रार्शि क दार्वार् नहीं कर सकतार्। अग्नि से हार्नि अथवार् क्षति में हार्नि को कम करने के लिए की गर्इ कोशिशों से होने वार्ली हार्नि अथवार् क्षति भी सम्मिलित होती है।

      3. सार्मुद्रिक बीमार्

      आज सार्मुद्रिक व्यार्पार्र काफी बढ़ गयार् है, सार्थ ही सार्थ इसके खतरे भी बढ़ गये है। सार्मुद्रिक बीमार् एक ऐसार् अनुबंध है जिसमें बीमार् कंपनी जहार्ज अथवार् जहार्जी मार्ल को समुदी्र यार्त्रार् के दरम्यार्न होने वार्ले जोखिम से क्षति की पूि र्त क आवश्वार्सन देती है।

      समुद्री यार्त्रार् के मध्य जहार्ज को विभिन्न प्रकार क जोखिम होतार् है, तुफार्न, चट्टार्न यार् किसी अन्य जहार्ज से टकरार् जार्नार् आदि। सार्मुद्रिक हार्नियार्ं तीन प्रकार की हो सकती हैं 1. जहार्ज को हार्नि 2. जहार्जी मार्ल की हार्नि एवं 3. मार्ल भार्ड़े की हार्नि. इन हार्नियों क पृथक-पृथक बीमार् कियार् जार्तार् है। जहार्ज के बीमार् को हल बीमार्, मार्ल के बीमार् को मार्ल बीमार् (कार्गो) और भार्डे़ के बीमे को भार्डार् बीमार् कहते हैं।

      अग्नि बीमार् और समुद्री बीमार्, सार्मार्न्य बीमे के अंतर्गत आते है. सार्मार्न्य बीमार् क रार्ष्ट्रीयकरण 13 मर्इ 1971 को कियार् गयार्।

      4. अन्य प्रकार के बीमार्

      सार्धार्रण बीमार् कंपनियार्ं कर्इ अन्य जोखिमों क बीमार् क बीमार् करती हैं जिनमें से कुछ बीमार् पार्लिसियों क संक्षिप्त विवरण है :

      1. मोर वार्हन बीमार्- 

    यार्त्री कार, वैन, मोटर सार्इकिल, स्कूटर आदि क बीमार् दुर्घटनार् से वार्हन को होने वार्ली क्षति, चोरी से होने वार्ली हार्नि तथार् दुर्घटनार् के कारण तीसरे पक्ष को चोट पहुँचने अथवार् मृत्यु हो जार्ने से उत्पन्न देनदार्री के विरूद्ध बीमार् है। वार्स्तव में वार्हन क तीसरे पक्ष के संबंध में बीमार् अनिवाय है।

    2. स्वार्स्थ्य बीमार्- 

    यह पार्लिसी धार्रक को बीमार्री अथवार् चोट लगने आदि से होने वार्ले इलार्ज पर व्यय से सुरक्षार् प्रदार्न करती है। इससे चिकित्सार् दार्वार् बीमार् अथवार् मैडीक्लेम बीमार् कहते हैं। आजकल यह सर्वार्धिक लोकप्रिय बीमार् है।

    3. फसल क बीमार्- 

    यह सूखार् अथवार् बार्ढ़ के कारण फसल हो होने वार्ली हार्नि से किसार्नों को संरक्षण प्रदार्न करतार् है।

    4. रोकड़ क बीमार्- 

    यह बैंक एक अन्य व्यार्वसार्यिक सस्ं थार्नों को नकदी एक स्थार्न से दसू रे स्थार्न पर ले जार्ते समय रार्स्ते में चोरी यार् किसी अन्य कारण से होने वार्ली हार्नि के विरूद्ध संरक्षण प्रदार्न करतार् है।

    5. पशुओ क बीमार् –

    यह गार्यें भैसें, बैल आदि के दुर्घटनार्वश, बीमार्री आदि से मृत्यु के कारण होने वार्ली हार्नि के जोखिम क बीमार् है।

    6. रार्जेश्वरी महिलार् कल्यार्ण बीमार् योजनार्- 

    यह योजनार् बीमित महिलार् की मृत्यु अथवार् उसके विकलार्ंग हो जार्ने पर परिवार्र के सदस्यों को रार्हत पहुंचार्ती है।

    7. अमत्र्य शिक्षार् योजनार् बीमार् पार्लिसी-

    यह आश्रित बच्चों की शिक्षार् के लिए ली जार्ने वार्ली पार्लिसी है। यदि बीमित व्यक्ति को कोर्इ शार्रीरिक चोट पहुंचती है जिसके क कारण उसकी मृत्यु हो जार्ती है अथवार् वह स्थाइ रूप से विकलार्ंग हो जार्तार् है तो बीमार् कम्पनी बीमित अविभार्वकों को आश्रित बच्चों की पढ़ार्इर् क खर्च वहन करेगी।

    8. चोरी से क्षति क बीमार्- 

    इस प्रकार के बीमे में बीमार् कम्पनी बीमित को चोरी से होने वार्ली हार्नि की क्षतिपूर्ति क वचन देती है। चोरी यार् डकैती से हार्नि क अर्थ है चल-संपत्ति की लूटपार्त, चोरी आदि से हार्नि।

    9. विश्वसनीयतार् क बीमार्- 

    कर्मचार्रियों के द्वार्रार् रोकड़ (नकदी) क घोटार्लार् यार् फिर वस्तुओं के दुरूपयोग से हार्नि के जोखिम से संरक्षण के लिए व्यवसार्यी उन कर्मचार्रियों की, जो रोकड़ को संभार्लते हैं यार् फिर स्टोर के प्रभार्री हैं, बेइमार्नी अथवार् धोखे से होने वार्ली हार्नि के जोखिम के विरूद्ध बीमार् करार्तार् है। इसे विश्वसनीयतार् क बीमार् कहते हैं।

      बीमार् क महत्व

      1. जोखिम से सुरक्षार्- बीमार् व्यवसार्य को विभिन्न जोखिमों से सुरक्षार् प्रदार्न करतार् है। यह सुरक्षार् बीमित को हार्नि की पूर्ति के लिए प्रार्वधार्न के रूप में होती है।
      2. जोखिम क अनेक लोगों में विभार्जन-बीमार् जोखिम को आपस में बार्ंटने में सहार्यतार् प्रदार्न करतार् है. व्यवहार्र में बड़ी संख्यार् में लोग प्रीमियम देकर बीमार् करवार्ते हैं। इससे बीमार्कोष तैयार्र हो जार्तार् है। इस कोष क उपयोग उन लोगों की क्षतिपूि र्त के लिए कियार् जार्तार् है जिनको वार्स्तव में यह हार्नि होती है। इस प्रकार से हार्नि को बड़ी संख्यार् में लोगों में बार्ँट दियार् जार्तार् हैं।
      3. ऋण लेने मे सहार्यक- बैंक एवं वित्तीय संस्थार्एं सार्मार्न्य: ऋण देने से पहले उन वस्तुओं एवं सम्पत्तियों क बीमार् करार्ने पर जोर देते हैं जिनकी जमार्नत पर वह ऋण दे रहे हैं। इस प्रकार से बीमार् वित्तीय संस्थार्नों से ऋण एवं अग्रिम प्रार्प्त करने को सुगम बनार्तार् हैं।
      4. विभिन्न श्रम कानूनो के अंतर्गत देनदार्री से सुरक्षार्- बीमार् व्यवसार्यी को कर्मचार्रियों के सार्थ दुर्घटनार् होने पर जिसके कारण गंभीर चोट, विकलार्ंगतार् अथवार् बीमार्री हो जार्ने पर तथार् प्रसूति आदि की स्थिति में क्षतिपूर्ति संबंधी भुगतार्न के समय सुरक्षार् प्रदार्न करतार् है।
      5. आर्थिक विकास में योगदार्न- बीमार् कपं नियों के पार्स जमार् धन को विभिन्न प्रकार की प्रतिभूितयों एवं परियोजनार्ओं में निवेश कियार् जार्तार् है जो दश्े ार् के आर्थिक विकास में योगदार्न देतार् है।
      6. रोजगार्र के अवसरों की उपलब्धतार्- बीमार् कंपनियार्ं बड़ी संख्यार् में लोगों को नियमित रोजगार्र देती हैं। कर्इ लोग बीमार् एजेन्ट के रूप में कार्य कर अपनी जीविक अर्जित करते हैं।
      7. सार्मार्जिक सुरक्षार्- जीवन बीमार् बुढ़ार्पे एवं समय से पूर्व मृत्यु के जोखिम से सुरक्षार् प्रदार्न करतार् है. इसके सार्थ सार्थ कर्मचार्रियों को कर्मचार्री रार्ज्य बीमार् योजनार् के मार्ध्यम से जिसमें दुर्घटनार् बीमार् भी सम्मिलित है, सार्मार्जिक सुरक्षार् प्रदार्न करतार् हैं।

        बीमार् क कार्य

        बीमार् के कार्यो के दो भार्गो में विभक्त कियार् जार् सकतार् है – (1) प्रार्थमिक कार्य  (2) द्वितीयक कार्य ।

        1. प्रार्थमिक कार्य –

        1. निश्चिततार् प्रदार्न करनार्:- बीमार् हार्नि की अनिश्चततार् के हार्नि के पूर्ति की निश्चिततार् प्रदार्न करतार् है। व्यक्ति हार्नि के प्रति कुशल नियोजन करके निश्चिंत हो सकतार् है परन्तु इस कृत्य में बहुत से बार्धार्यें उत्पन्न हो सकती है। बीमार् हार्नि की कठिनार्इयों को दूर करके हार्नि के प्रति निश्चिततार् प्रदार्न करतार् है। जोखिम हार्नि की अनिश्चितार् है जिसमें हार्नि क कब होगी, कैसे होगी कितनी होगी इस सबक पतार् नही रहतार् यदि जोखिम हो गयी तो व्यक्ति को और उससे पूर्व वह व्यक्ति हार्नि के प्रति चिन्तित रहतार् हैं, लेकिन बीमार् से इस प्रकार की चिंतार् समार्प्त हो जार्ती है। व्यक्ति निश्चिय हो जार्तार् है इसके लिये व्यक्ति को बहुत थोडी प्रीमियम देनी होती है जो हार्नि क बहुत छोटार् भार्ग होतार् है।
        2. सुरक्षार् प्रदार्न करनार्:-बीमार् क मुख्य कार्य संभार्व्य हार्नि से सुरक्षार् प्रदार्न करनार् है क्योकि मार्नव जीवन जोखिम पूर्ण है। विभिन्न जोखिमो के कारण यार् अनिश्चित रहतार् है कि भविष्य की आपदार्ओ से कब तथार् कितनार् हार्नि भुगतनी पड़ेगी। इस प्रकार मनुष्य को असुरक्षार् क अनुभव होतार् है वह सुरक्षार् चार्हतार् है। सुरक्षार् तभी मिल सकती है जब जोखिमों के अनिश्तितार् से मुक्ति मिले । बीमार् इस अनिश्चिततार् से मुक्ति देकर सुरक्षार् प्रदार्न करतार् है ।
        3. जोखिम (हार्नि) क वितरण:-बीमार् क मुख्य कार्य जोखिमों से होने वार्ले हार्नि क विभार्जन है। आपदार् यार् जोखिम को बार्ँटार् नहीं जार् सकतार् है परन्तु उन से होने वार्ली हार्नियों को उन व्यक्तियों में बार्ँटार् जार् सकतार् है जो हार्नियों से सुरक्षित होनार् चार्हते है। प्रार्चीनकाल में हार्नियों क विभार्जन जोखिमों के समय कियार् जार्तार् थार्। परन्तु बीमार् संविदार् मेंं उन हार्नियों क भुगतार्न बार्द में कियार् जार्तार् थार्। जिसके लिये सीमित व्यक्तियों से उनसे हार्नि क अंश प्रीमियम के रूप में पहले से लियार् जार्तार् थार्। प्रीमियम की गणनार् हार्नि की संभार्वनार् के अनुसार्र होगी।

        2. द्वितीयक कार्य –

        सुरक्षार् की व्यवस्थार् द्वार्रार् बीमार् व्यवसार्यिक कार्यकलार्प में ऐसे अनेक सुविधार्यें अवसर एवं लार्भ प्रदार्न करतार् है जो इस प्रकार महत्वपूर्ण है ।

        1. हार्नि के रोकनार्- बीमार् हार्नि को स्वयं नही रोकतार् है, बल्कि ऐसे व्यक्तियों एवं संस्थार्ओ को सार्थ देतार् है जो हार्नि को रोकने के लिये कार्य कर रहे है। यदि हार्नि में कमी हो जार्येगी तो हार्नि रूक जार्येगी। बीमार्कर्तार् कम भुगतार्न करेगार्। इस प्रकार उसे हार्नि नही सहनी पड़ेगी। हार्नि की कमी से प्रीमियम दर में कमी की जार् सकती है इस प्रकार बीमार् के विकाश से सहार्यतार् मिल सकतार् है। 
        2. पूँजी की पूर्ति-बीमार् समार्ज को पूंजी की आपुर्ति करतार् है बीमार् के पर्यार्प्त रकम प्रीमियम के रूप में आती है जिससे विनियोजित करके उत्पार्दन में वृद्धि की जार्ती है और समार्ज को पूँजी की कमी को पूरार् कियार् जार्तार् है। भार्रत जैसे रार्ष्ट्र में जहार्ँ पूँजीे की अपर्यार्प्ततार् है बीमार् के इस कार्य क विशेष महत्व है बीमार् द्वार्रार् पूजी क संचय दो प्रकार से कियार् जार् सकतार् है- (1)बीमार् के अभार्व में प्रत्येक व्यक्ति, व्यवसार्यी यार् संस्थार् हार्नियों को पूरार् करने के लिये कुछ संचय रखते है जिसक उपभोग नही करते। (2) बीमार् पूंजी क संचय करतार् है। 
        3. वित्तीय स्थिरतार् प्रदार्न- करनार् बीमार् क महत्वपूर्ण योगदार्न यह है कि इसके कारण शुद्ध जोखिमों द्वार्रार् अस्थिरतार् नही आने पार्ती। यदि बीमार् की सुविधार् उपलब्ध न हो तब अग्निकांड, दुर्घटनार् चोरी, दंगार्, और इसी प्रकार अन्य उपद्रवो के कारण बड़ें पैमार्ने पर चलने वार्ले कारबार्र यार् उद्योग क अपूरणीय हार्नि पहुँच सकती है। यदि बीमार् है तो ऐसी हार्नि की पूर्ति की व्यवस्थार् हो जार्ती है, और व्यवसार्य एवं उद्योग में तथार् समार्ज मे स्थिरतार् सुनिश्चिततार् की जार् सकती है। 

        बीमार् की उपयोगितार् 

        बीमार् की उपयोगितार् क सार्मार्न्यत: अध्ययन-व्यक्तिगत उपयोंगितार् व्यवसार्यिक, और सार्मार्जिक लार्भों के अन्तगर्त कियार् जार् सकतार् है जो इस प्रकार है 

        (क) बीमार् सुरक्षार् दार्प्रन करतार् है- 

        बीमार् निर्धार्रित जोखिम से होनें वार्ली हार्नि के प्रति सुरक्षार् प्रदार्न करतार् है। जीवन बीमार् में मृत्यु यार् जीवन से घटित घटनार् पर बीमित रकम क भुगतार्न कर दियार् जार्तार् है। जीवन के अनेक आवश्यकतार्ओ के लिये अलग अलग प्रकार के बीमार्पार्त्र खरीदे जार्ते है जो बीमित व्यक्ति से सम्बन्धित होते है। इसी प्रकार सम्पत्ति बीमार् की सम्पत्ति की सुरक्षार् एवं जोखिम से सम्बन्धित है। बीमित जोखिम घटित होने पर भुगतार्न क दियार् जार्तार् है, सम्पत्ति के नष्ट होने पर यार् हार्नि होने पर हार्नि क भुगतार्न समार्न्य बीमार् द्वार्रार् कियार् जार्तार् है। 

        (ख) बीमार् व्यक्ति को चिन्तार् से मुक्त करतार् है- 

        सुरक्षार् मनुष्य क मुख्य प्ररेक है। यदि व्यक्ति क भविष्य जोखिम से असुरक्षित है तो उसे हमेशार् चिन्तार् लगी रहती है और कार्य करने में मन नही लगतार् परन्तु हार्नि के प्रति सुरक्षार् रहने पर व्यक्ति उस से चिन्तार् मुक्त हो जार्तार् है। क्योकि वह समझार्तार् है कि जोखिम उसके परिवार्र को कोर्इ हार्नि नहीं देगार् क्योकि हार्नि क भुगतार्न बीमार् द्वार्रार् कर दियार् जार्तार् है। यह हार्नि सम्पत्ति, जीवन और दार्यित्व के सम्बन्ध में हो सकती है। जिसके लिये बीमार् विभिन्न स्वरूपों में मौजूद है। जोखिम से सुरक्षार् न रहने पर मनुष्य को चिनतार्, हतोत्सार्ह, मार्नसिक कमजोरी आदि रहती है। 

        (ग) बीमार् बन्धक सम्पत्ति में सुरक्षित करतार् है – 

        बीमार् बन्धक सम्पत्ति को सुरक्षित रखतार् है व्यक्ति की मृत्यु से बंधक पर रखी गयी सम्पत्ति ऋणदार्तार् की हो जार्ती है, और परिवार्र को कष्ट होतार् है। दूसरी ओर ऋणदार्तार् ऋण देने के पहले सम्पत्ति को बीमित करने के लिये बल देतार् है क्योकि सम्पत्ति के नष्ट होने पर क्षति पहुँचने, चोरी होने आदि के कारण बन्धक ऋण क भुगतार्न प्रार्प्त करनार् संभव नही रहतार् है। और ग्रहणदार्तार् को हार्नि होती है। यदि सम्पत्तियों क बीमार् होतार्, तो क्षतिग्रस्त सम्पत्ति के होने से चोरी आदि हो जार्ने पर ऋण क भुगतार्न ऋणदार्तार् को बीमार् होने के कारण बंधक सम्पत्ति क दियार् जार्तार् है। 

        (घ) बीमार् सहार्यक के रूप में कार्य करतार् है- 

        बीमार् यदि हुआ है तो चार्हे परिवार्र के मुखियार् की मृत्यु हो यार् सम्पत्ति को हार्नि हो दोनो के प्रति चिन्तार् करने की आवश्यकतार् नही होती, क्यो कि क्षति पहुँचने की स्थिति में बीमार् कार्य करती है। बीमार् उन सभी कठिनाइ से मुक्त प्रदार्न करतार् है जो ऐसी समार्स्यार्ओं को दूर करती है, जो व्यक्ति के लिये मुसीबत हो सकती है, क्योकि जोखिम होने की स्थित में आर्थिक कठिनार्इयों से रार्हत प्रदार्न करती है। 

        (ड़) बीमार् बचत को प्रोत्सार्हित करतार् है एवं लार्भकारी विनियोग में सहार्यक है- 

        जीवन बीमार् बचत एवं सुरक्षार् दोनो प्रदार्न करतार् है जबकि अन्य बीमार् में केवल सुरक्षार् सन्निहित रहती है। जीवन बीमार् में बचत एवं विनियोग क लार्भ मिलतार् है। बचत करके व्यक्ति वृद्धार्वस्थार् की कठिनाइयों सें सुरक्षित हो जार्तार् है यदि मृत्यु आकस्मिक हो भी जार्ती है तो इसमें सहार्यतार् मिलतार् है। क्योकि उस दशार् में एक निश्चित रकम क भुगतार्न कर दियार् जार्तार् है और इसके सार्थ ही सार्थ अन्य लार्भ भी प्रार्प्त होते हैै क्योकि बीमित रकम क भुगतार्न केवल एक निश्चत समय एवं घटनार् के घटित होने पर ही कियार् जार्तार् है। जीवन बीमार् के बीमित रकम के सार्थ ही सार्थ बोनस क भी भुगतार्न होतार् है क्योकि बीमार्कारी अपने एकत्रितकोष को विनियोजित करतार् रहतार् है और प्रार्प्त हुयी आय से खर्चे और संचय निकालकर शेष रकम बीमार्पत्र धार्री दे देतार् है। बीमार् सुरक्षार् के सार्थ सार्थ लार्भकारी विनियोग क भी कार्य करती है।

        1. व्यवसार्यिक उपयोगितार्

        (क) व्यक्तिगत हार्नियों की अनिश्चिततार् कम हो जार्ती है –

        बीमार् अनेक जोखिमों से होने वार्ली हार्नि को पूरार् करतार् है जिनके लिये बीमार् की सुविधार्ये प्रदार्न की जार्ती है। व्यवसार्यिक जगत में अत्यधिक मार्नवीय और भौतिक सम्पत्ति क उपयोग कियार् जार्तार् है और थोड़ी सी चूक के कारण अरबो की सम्पत्ति क्षणभर में नष्ट हो जार्ती है। इन जोखिमों से निजार्त पार्ने के लिये व्यसार्यिक जगत में बीमार् भी अवश्यकतार् एवं भूमिक महत्वपूर्ण होती है। क्येार्कि बीमार् से इस हार्नियों को पूरार् कियार् जार्तार् है और ऐसी अनिश्चितार् को दूर कियार् जार्त है और भुगतार्न कियार् जार्तार् है जिससे व्यार्पार्र वृद्धि में सहार्यतार् मिलती है।

        (ख) बीमार् से व्यवसार्यिक दक्षतार् में वृद्धि और सार्ख में वृद्धि होती है  –

        बीमार् होने से व्यवसार्यी हार्नियों के प्रति स्वतन्त्र हो जार्ते है और मन लगार्कर कार्य करते है। व्यवार्सार्य में संलग्न व्यक्ति सम्पत्ति आदि के बार्रे बीमार् रहने पर चिंतार् नही करते क्येार्कि बीमार् द्वार्रार् पूर्णक्षति की पूर्ति कर दी जार्ती है। जिससे व्यसार्सय की निरन्तरतार् बनी रहती है। बीमार् रखने पर सार्ख में वृद्धि हो जार्ती है, क्योकि ऋणदार्तार् यह समझते है कि यदि ऋणी की मृत्यु यार् बन्धक पर रखी गयी सम्पत्ति नष्ट हो जार्ने पर खो जार्ने, पर भी उन्हे भुगतार्न बीमार् के मार्ध्यम से कियार् जार्येगार् इसलिये बीमार् होने से सार्ख में और अधिक वृद्धि हो सकती है।

        (ग) महत्वपूर्ण कर्मचार्री की बीमार् एवं कर्मचार्री कल्यार्ण की सुविधार्:- 

        अधिक महत्वपूर्ण कर्मचार्री वह है जिसके जीवित रहने पर व्यार्पार्र को लार्भ-हार्नि को तुरन्त पूरार् न कियार् जार् सके। महत्वपूर्ण कर्मचार्री क बीमार् करार् लेने पर उसकी मृत्यु पर व्यवसार्य बन्द होने यार् हार्नि होने की संभार्वनार् समार्प्त हो जार्ती है। कर्मचार्री के मृत्यु पर उनके परिवार्र को कुछ रकम देनी पड़ती है, जिसके लिये बीमार् खरीदार्र उन्हे भुगतार्न कियार् जार् सकतार् है। कर्मचार्रियों के निवार्स स्थार्न आदि के प्रबन्ध के लिये बीमार् से ऋण भी मिल जार्तार् है।

        2. सार्मार्जिक उपयोगितार्

        (क) समार्ज की मार्नवीय एवं भौतिक सम्पित्त की सुरक्षार्-

        समार्ज की मार्नवीय एवं भौतिक सम्पित्त की सुरक्षार् जीवन बीमार् एवं सम्पित्त्ार् बीमार् से ही सकती है। जीवन बीमार् में यह संभार्वनार् रहती है कि समार्ज के प्रत्येक व्यक्ति अपने भविष्य को जोखिम के प्रति स्वतन्त्र रखते हैं, क्योंकि उसके भौतिक सम्पित्त क बीमार् रहने पर सम्पित्त्ार् की सुरक्षार् आदि रहती है। यदि वह नष्ट होती है तो हार्नि क पूर्ण भुगतार्न बीमार् द्वार्रार् कियार् जार्येगार्। बीमार् होने से कृषि, उद्योग, व्यार्पार्र, यार्तार्यार्त आदि में प्रगति होती है, और मार्नवीय एवं भौतिक सम्पित्त्ार् को सुरक्षार् प्रार्प्त होती है।

        (ख) रार्ष्ट्र प्रगति मे सहार्यक एवं मुद्रार् प्रसार्र में कमी- 

        रार्ष्ट्र प्रगति में बीमार् क महत्वपूर्ण योगदार्न रहतार् है क्योकि बीमार् के मार्ध्यम से देश की सम्पत्ति सुरक्षित रहती है, और विनियोग के लिये पर्यार्प्त रकम मिल जार्ती है। बीमार् मुद्रार् प्रसार्र में कमी दो प्रकार की होती है-

        1. प्रीमियम की रकम एकत्रित करके मुद्रार्पूर्ति में कमी पूरार् करतार् है। रार्ष्ट्र में मुद्रार् की मार्त्रार् कम हों जार्ने से मुद्रार् प्रसार्र में कमी आ जार्ती हैै उसको भी पूरार् करतार् है। 
        2. एकत्रित प्रीमियम को विनियोजित करके उत्पार्दन में वृद्धि की जार् सकती हैं बीमार् के समार्जिक लार्भ के तरीके महत्वपूर्ण है। क्योकि बीमार् समार्ज के व्यवस्थित अस्थिरतार् से मुक्ति दिलार्तार् है, और सार्थ ही सार्थ जीवन स्तर भी स्थिरतार् को बढ़ार्तार् है और पूॅजी निर्मार्ण में भी महत्वपूर्ण भूमिक निभार्तार् है ।

        बीमार् के सिद्धार्ंत

        सभी बीमों के बीमार् अनुबन्ध कुछ स्थार्पित सिद्धार्ंतों पर निर्भर करते है। इनक संक्षिप्त विवरण नीचे दियार् गयार् है-

        (1) पूर्ण सद्विश्वार्स क सिद्धार्ंत-

        बीमार् अनुबंध पार्रस्परिक विश्वार्स क अनुबंध है। बीमार्कर एवं बीमित दोनों पक्षों को बीमार् की विषय वस्तु से सम्बन्धित सभी आवश्यक सूचनार्ओं को उजार्गर कर देनार् चार्हिए। उदार्हरण के लिए, जीवन बीमार् में प्रस्तार्वक को (बीमार् करवार्ने में इच्छुक व्यक्ति) अपने स्वार्स्थ्य, आदतों, व्यक्तिगत इतिहार्स, पार्रिवार्रिक इतिहार्स आदि की सूचनार् को र्इमार्नदार्री से उजार्गर कर देनार् चार्हिए। यदि महत्वपूर्ण तथ्यों को छुपार्यार् गयार् है तो अनुबंध वैध नहीं होगार्, क्योंकि बीमार् की विषय वस्तु से सम्बन्धित तथ्यों के आधार्र पर ही जोखिम क मूल्यार्ंकन कियार् जार् सकतार् है।

        (2) बीमोचित स्वाथ क सिद्धार्ंत-

        इस सिद्धार्ंत के अनुसार्र बीमित व्यक्ति क बीमार् की विषय वस्तु में बीमोचित हित होनार् चार्हिए। बीमार् योग्य हित क अर्थ होतार् है बीमार् की विषय वस्तु में वित्तीय अथवार् लार्भ प्रार्प्ति क स्वाथ। किसी व्यक्ति क किसी सम्पत्ति अथवार् जीवन में बीमार् योग्य हित तब मार्नार् जार्तार् है, यदि उसके बने रहने से उसे लार्भ प्रार्प्त हो रहार् है। उदार्हरण के लिए, एक व्यक्ति क अपने स्वयं के जीवन में व अपनी पत्नि के जीवन में बीमोचित स्वाथ ह ै इसी प्रकार उसकी पत्नी क अपने पति के जीवन में बीमार्योग्य हित होतार् है। जहार्ं तक सम्पत्ति क प्रश्न है तो उसमें उसके स्वार्मी क बीमार् योग्य हित होतार् है। जीवन बीमार् में पार्लिसी लेते समय, समुद्री बीमार् में क्षति होते समय और अग्नि बीमार् में दोनों समय बीमार् योग्य हित मौजूद रहनार् आवश्यक है।

        (3) क्षतिपूर्ति क सिद्धार्ंत-

        क्षतिपूर्ति क अर्थ है किसी व्यक्ति को उसकी वार्स्तविक हार्नि की पूर्ति करनार् अथवार् उसे बीमार् करार्ने से पूर्व की स्थिति में ले आनार्। यह सिद्धार्ंत सार्मुद्रिक बीमार्, अग्नि बीमार् एवं सार्धार्रण बीमार् में लार्गू होतार् है। यह जीवन बीमार् में लार्गू नहीं होतार् क्योंकि जीवन की हार्नि अर्थार्त् मृत्यु होने पर क्षतिपूर्ति सम्भव नहीं है।

        क्षतिपूर्ति के सिद्धार्ंत से अभिप्रार्य है कि बीमित को बीमे की घटनार् के घटित होने पर बीमार् अनुबंध से कोर्इ लार्भ कमार्ने की छूट नहीं है। क्षति की पूर्ति क भुगतार्न वार्स्तविक हार्नि अथवार् बीमार् की रार्शि, जो भी कम हो, क कियार् जार्तार् है। आइए, इसे एक उदार्हरण से समझें। मार्नार् कि एक व्यक्ति ने अपने मकान क 20 लार्ख रूपये क बीमार् करार्यार् है। आग से क्षति पर उसे मरम्मत के लिए मकान पर 5 लार्ख रूपयार् खर्च करनार् पड़ार् तो वह बीमार्कर से केवल 5 लार्ख रूपये क दार्वार् ही कर सकतार् है, न कि बीमार् की कुल रार्शि का।

        (4) योदार्न क सिद्धार्ंत-

        किसी विषय वस्तु क बीमार् एक से अधिक बीमार्कारों से भी करार्यार् जार् सकतार् है। ऐसी स्थिति में बीमित को बीमार् के दार्वे की देय रार्शि में सभी बीमार्कार अपनी भार्गीदार्री के अनुपार्त में योगदार्न देंगे। यदि एक बीमार्कार ने बीमित को उसकी पूरी क्षति की पूर्ति कर दी है तो वह बीमार्कार अन्य बीमार्कारों से इस हार्नि में अनुपार्तिक भार्गीदार्री के लिए मार्ंग कर सकतार् है। ध्यार्न रहे कि कर्इ पार्लिसियार्ं ले लेने पर बीमित किसी भी बीमार्कार से हार्नि की पूर्ति क दार्वार् कर सकतार् है लेकिन शर्त है कि बीमित सभी बीमार्कारों से मिलार्कर वार्स्तविक हार्नि की रार्शि से अधिक की वसूली नहीं कर सकतार्।

        (5) प्रतिस्थार्पन क सिद्धार्ंत-

        इस सिद्धार्ंत के अनुसार्र यदि बीमित के दार्वे क निपटार्रार् हो जार्तार् है तो बीमार् की विषय वस्तु पर स्वार्मित्व बीमार्कार को प्रार्प्त हो जार्तार् है। दूसरे शब्दों में, यदि क्षतिग्रस्त सम्पत्ति क कोर्इ मूल्य है तो यह सम्पत्ति बीमार्कार की हो जार्ती है अन्यथार् बीमित वार्स्तविक हार्नि से अधिक की वसूली कर लेगार् जो कि क्षतिपूर्ति के सिद्धार्तं के विरूद्ध होगार्। इसीलिए, यदि 1,00,000 रूपय े की कीमत के मार्ल की दुर्घटनार् से क्षति होती है तथार् बीमार् कम्पनी बीमित को पूरी क्षति की पूर्ति करती है तो बीमार् कम्पनी उस क्षतिग्रस्त मार्ल को अपने अधिकार में ले लेगी तथार् उसे उस क्षतिग्रस्त मार्ल को बेचने क अधिकार होगार्।

        (6) क्षति को कम करने क सिद्धार्त-

        दुर्घटनार् होने पर बीमित को बीमार् की विषय वस्तु की हार्नि अथवार् क्षति को कम करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठार्ने चार्हिए। यह सिद्धार्ंत सुनिश्चित करतार् है कि बीमित बीमार् पार्लिसी लेने के पश्चार्त बीमार् की गर्इ वस्तु की सुरक्षार् के प्रति असार्वधार्न न हो जार्ये। बीमित से आशार् की जार्ती है कि उसे इस प्रकार से व्यवहार्र करनार् चार्हिए जैसे कि विषय वस्तु क बीमार् करार्यार् ही नहीं है। यदि सम्पत्ति को बचार्ने के लिए उचित कदम नहीं उठार्ए गए तो बीमित को बीमार् कंपनी से पूरार् हर्जार्नार् नहीं मिलेगार्। उदार्हरण के लिए, मार्नार् एक मकान क अग्नि बीमार् है और उसमें आग लग जार्ती है तो स्वार्मी को हार्नि को कम करने के लिए आग बुझार्ने के सभी प्रयत्न करने चार्हिए। इसी प्रकार से जब चोरी के विरूद्ध बीमार् करार्यार् गयार् है तो भी मकान मार्लिक को मकान की सुरक्षार् की ओर असार्वधार्न न होकर चोरी को रोकने के सभी कदम उठार्ने चार्हिए।

        (7) हार्नि के निकटतम कारण क सिद्धार्ंत-

        इस सिद्धार्ंत के अनुसार्र बीमित क केवल उसी दशार् में क्षतिपूर्ति प्रार्प्त करने क अधिकार है जब कि हार्नि उसी कारण से हुर्इ हो जिससे सुरक्षार् के लिए बीमार् करवार्यार् गयार् थार्। दसू रे शब्दों म,ें यदि हार्नि क निकटतम कारण वह नहीं है जिसके लिए बीमार् करवार्यार् गयार् थार् तो बीमित बीमार् कंपनी से क्षतिपूर्ति क दार्वार् नहीं कर सकतार्। उदार्हरण के लिए, संतरार् से लदे एक जहार्ज क बीमार् दुघर्टनार् के कारण होने वार्ली हार्नि के लिए करार्यार् गयार् थार्। जहार्ज तो बन्दरगार्ह पर सुरक्षित पहुॅंच गयार् पर जहार्ज से संतरों को उतार्रने में देरी कर दी। इस स्थिति में बीमार् कम्पनी द्वार्रार् कोर्इ क्षतिपूर्ति नहीं की जार्एगी क्योंकि संतरे खरार्ब होने क कारण उनको उतार्रने में हुर्इ देरी थी न कि दुर्घटनार्।

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