फ्रेडरिक फ्रोबेल क जीवन परिचय

फ्रेडरिक फ्रोबेल क जन्म 21, अप्रैल, 1782 को दक्षिणी जर्मनी के एक गार्ँव में हुआ थार्। जब वह नौ महीने क ही थार् उसकी मार्तार् क देहार्न्त हो गयार्। पितार् से बार्लक फ्रोबेल को उपेक्षार् मिली। विमार्तार् उससे घृणार् करती थी। इससे फ्रोबेल प्रार्रम्भ से ही नितार्न्त एकाकी हो गयार्। फ्रोबेल पर इस एकाकीपन क प्रभार्व पड़ार् और वह आत्मनिष्ठ हो गयार्। वह प्रकृति के सार्न्निध्य में अपनार् समय व्यतीत करने लगार्। इसके दो परिणार्म हुए : पहलार्, उसमें अन्तदर्शन की क्षमतार् विकसित हो गर्इ। दूसरार्, जड़ और प्रकृति में भी उसे अपनार् स्वरूप दिखने लगार्। इसी के आधार्र पर उसने ‘अनेकतार् में एकतार्’ के सिद्धार्न्त क प्रतिपार्दन कियार्।

कुछ समय फ्रोबेल ने अपने मार्मार् के सार्थ बितार्ये। इस दौरार्न उसे विद्यार्लय जार्ने क अवसर मिलार् पर शिक्षार् में उसकी प्रगति असन्तोषजनक रही। पन्द्रह वर्ष की अवस्थार् में एक फोरेस्टर के अधीन कार्य सीखने क अवसर मिलार् पर प्रकृति-प्रेम के अतिरिक्त वह कोर्इ प्रशिक्षण नहीं ले सका। सत्रह वर्ष की अवस्थार् में फ्रोबेल ने जेनार् विश्वविद्यार्लय में प्रवेश लियार् पर अपनी निर्धनतार् के कारण वह शिक्षार् पूरी नहीं कर पार्यार्। घर वार्पस आकर कृषि-कार्य में हार्थ बटार्ँने लगार्। 1802 में पितार् की मृत्यु के बार्द फ्रोबेल ने इधर-उधर भटकते हुए विभिन्न तरह की नौकरियार्ँ की पर वह सफल नहीं हुआ। अंतत: फ्रेंकफर्ट में हेर ग्रूनर के निमन्त्रण पर एक नामल स्कूल में ड्रार्इंग क अध्यार्पक बन गयार्। सन् 1808 में फ्रोबेल पेस्टोलॉजी की शिक्षार् व्यवस्थार् के अवलोकन हेतु वरडेन पहुँचार्। उसने वहार्ँ बच्चों के संदर्भ में दो बार्तों को गहराइ से महसूस कियार्। पहलार्, बच्चों के आत्मभार्व प्रकाशन हेतु संगीत आवश्यक है, तथार्, दूसरार्, बच्चों की ड्रार्इंग में विशेष रूचि होती है।

फ्रोबेल की रूचि वैज्ञार्निक सिद्धार्न्तों में बढ़ती जार् रही थी। उसने गणित और खनिज विज्ञार्न में उच्च शिक्षार् प्रार्प्त करने हेतु पहले गोरिन्जन विश्वविद्यार्लय और बार्द में बर्लिन विश्वविद्यार्लय में प्रवेश लियार्। बर्लिन में उन्होंने प्रख्यार्त विद्वार्न प्रोफेसर वीज के संरक्षण में गहन अध्ययन कियार्। नेपोलियन ने जब जर्मनी पर आक्रमण कियार् तो फ्रोबेल उसके विरूद्ध जर्मनी की सेनार् में भर्ती हुआ। 1814 र्इ0 में फ्रोबेल बर्लिन म्यूजियम क सहार्यक क्यूरेटर नियुक्त हुआ। वह खनिज-विज्ञार्न क अध्यार्पक नियुक्त हुआ।

फ्रोबेल के जीवन क सर्वार्धिक रचनार्त्मक काल की शुरूआत 1817 र्इ0 में होती है जब उसने अपने दो भतीजों एवं कुछ अन्य लड़को को लेकर कीलहार्ऊ में एक विद्यार्लय की स्थार्पनार् की। यहीं पर 1826 र्इ0 में फ्रोबेल ने विल्हेमिन होफमिस्टर नार्मक सम्पन्न महिलार् से विवार्ह कियार्। इससे फ्रोबेल के सार्रे आर्थिक संकट समार्प्त हो गए। कीलहार्ऊ में ही उसने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘एडुकेशन ऑफ मैन’ की रचनार् की। इसके उपरार्न्त स्विटजरलैंड में फ्रोबेल ने कर्इ संस्थार्ओं क संचार्लन कियार्। अब फ्रोबेल पूर्व विद्यार्लय शिक्षार् में सुधार्र हेतु व्यार्वहार्रिक कार्य करनार् चार्हतार् थार्। इस उद्देश्य से 1837 र्इ0 में जर्मनी के पहार्ड़ी क्षेत्र के ब्लैकनवर्ग नार्मक गार्ँव में प्रथम ‘किण्डरगाटेन’ की स्थार्पनार् की। इसके उपरार्न्त फ्रोबेल जीवन पर्यन्त ‘किण्डरगाटेन’ के आन्दोलन को आगे बढ़ार्ने में लगार् रहार्। अन्तत: 1852 में इस महार्न शिक्षार्शार्स्त्री की मृत्यु हो गर्इ।

फ्रोबेल के दाशनिक विचार्र 

फ्रोबेल के दाशनिक विचार्रों पर पश्चिम के कर्इ आदर्शवार्दी दाशनिकों यथार् काण्ट, फिक्टे, शैलिंग, हीगल आदि के विचार्रों क व्यार्पक प्रभार्व है। काण्ट के अनुसार्र दो जगत है, एक जो हमें विभिन्न इन्द्रियों के मार्ध्यम से दिखतार् है तथार् दूसरार् सार्रभूत यार् वार्स्तविक जगत जिसक ज्ञार्न आत्मबोध से होतार् है। फिक्टे ने प्रार्कृतिक जगत को मिथ्यार् घोषित करते हुए सार्रभूत जगत को ही एकमार्त्र सत्य जगत मार्नार्। शैलिंग ने प्रकृति एवं आत्मार् दोनो में ही ‘पूर्ण’ को समार्न रूप से देखार्। हीगल भी आत्म एवं अनार्त्म यार्नि प्रकृति में एक ही सार्र तत्व पार्तार् है।

दाशनिक विचार्रधार्रार् के विकास के इस बिन्दु पर फ्रोबेल के विचार्रों क प्रार्दुर्भार्व हुआ। शैलिंग एवं हीगल के दर्शन के आधार्र पर फ्रोबेल ने अपनार् ‘एकतार् क सिद्धार्न्त’ क विकास कियार्। वह ‘एडुकेशन ऑफ मेन’ में लिखतार् है ‘‘यह एकतार् क सिद्धार्न्त बार्ह्य-प्रकृति एवं आत्म-प्रकृति में एक-सार् ही व्यक्त है। जीवन भौतिक एवं आत्मन् के समन्वय क परिणार्म है। बिनार् पदाथ के आत्मन् आकारहीन है और बिनार् मनस् के पदाथ प्रार्णहीन है।’’

फ्रोबेल पर हीगल के द्वन्द्वार्त्मक विचार्रों क भी प्रभार्व दिखतार् है। फ्रोबेल कहते हैं ‘‘प्रत्येक सत्तार् तभी प्रत्यक्ष होती है जब वह अपने से भिन्न सत्तार् के सार्थ उपस्थित होती है और जब उस तत्व से उसकी समार्नतार्-असमार्नतार् स्पष्ट हो चुकी होती है।’’ फ्रोबेल पर जर्मन दाशनिक के0सी0एफ0 क्रार्उस क भी महत्वपूर्ण प्रभार्व पड़ार्। जिसने ज्ञार्न की विभिन्न विधियों एवं क्षेत्रों में समन्वय स्थार्पित कियार्। क्रार्उस प्रकृति एवं तर्क (विचार्र) दोनों में ही र्इश्वर क दर्शन करतार् है।

फ्रोबेल पर आधुनिक विज्ञार्न के अध्ययन क भी प्रभार्व पड़ार्। सार्थ ही उन्होंने प्रगतिशील शिक्षार्शार्स्त्रियों जैसे कमेनियस, रूसो आदि के कार्यों क अध्ययन कियार् तथार् पेस्टोलॉजी के प्रयोगों क स्वयं निरीक्षण कियार्। इन सबने फ्रोबेल के दर्शन को प्रभार्वित कियार्। इतने व्यार्पक अध्ययन, निरीक्षण एवं अनुभवों ने फ्रोबेल के विचार्रों में जटिलतार् भरी है पर इन सबमें उसकी निरीक्षण शक्ति सर्वार्धिक प्रभार्वशार्ली सिद्ध हुर्इ। फ्रोबेल प्रार्रम्भ से ही शिशुओं एवं बच्चों की स्वप्रेरित क्रियार्ओं क निरीक्षण करतार् थार्। बार्द में उसने इसे अधिक व्यवस्थित रूप दियार्। बच्चों के स्वभार्विक रूप से कार्य करने एवं सीखने की विधियों क फ्रोबेल ने सूक्ष्म निरीक्षण कियार् और इसी क परिणार्म फ्रोबेल के दाशनिक सिद्धार्न्त हैं।

एकतार् क सिद्धार्न्त 

फ्रोबेल के अनुसार्र र्इश्वर एक है। जिस प्रकार पत्ते, फूल, फल, शार्खार्यें पेड़ के तने से जुड़ी रहती हैं उसी तरह से हम सभी र्इश्वर से जुड़े हैं।

फ्रोबेल शिक्षार् को सृष्टि की विकास-प्रक्रियार् क एक महत्वपूर्ण अंग एवं मार्ध्यम मार्नतार् है। शिक्षार् ही व्यक्ति में आत्म-चेतनार् को जार्गृत करती है। आत्म-जार्गृत व्यक्ति प्रार्कृतिक पशुजीवन से ऊपर उठ जार्तार् है। फ्रोबेल के अनुसार्र सृष्टि प्रक्रियार् क एक संचार्लक है जो स्वयं में पूर्ण है। भौतिक जगत में वह ‘भौतिक शक्ति’ के रूप में तथार् चेतनार्युक्त मनुष्य में ‘चिन्तन शक्ति’ के रूप में उपस्थित है। दोनों में वही कर्त्तार् है। फ्रोबेल ने इसे ‘अनेक में व्यार्प्त एकतार्’ के नार्म से पुकारार्। उदार्हरण स्वरूप वह कहतार् है अँगुली अपने में पूर्ण होते हुए भी हार्थ क अंश है, हार्थ शरीर का, शरीर प्रार्णी जगत क और प्रार्णी जगत ब्रह्मार्ण्ड क अंश है। ब्रह्मार्ण्ड र्इश्वर क अंश है। र्इश्वर अनेक रूप होते हुए सभी चीजों में एकतार् कायम रखतार् है।

इसी तरह की एकतार् फ्रोबेल मन और शरीर में देखतार् है। मन शरीर से भिन्न नहीं है। जो भी उत्पार्दक काम होतार् है मन और शरीर की एकतार् से होतार् है। किसी भी वस्तु के निर्मार्ण में व्यक्ति की स्मृति, कल्पनार्, प्रत्यक्षीकरण, तर्क के सार्थ-सार्थ स्नार्यु, मार्ंसपेशियार्ं, इन्द्रियार्ं एवं सार्रार् शरीर कार्यरत होतार् है।

फ्रोबेल के अनुसार्र संस्कृति मार्नव की एकतार् क द्योतक है क्योंकि यह सार्मार्जिक जीवन क फल है। स्वंय में पूर्ण होते हुए भी मार्नव समार्ज क अविभार्ज्य हिस्सार् है। वह सार्मार्जिक एकतार् हेतु विशिष्ट मूल्यों की सृष्टि करतार् है तथार् भौतिक प्रगति के द्वार्रार् जीवन को आसार्न बनार्तार् है। इस प्रकार मार्नव के व्यक्तिगत एवं सार्मार्जिक जीवन में एक अन्तर्निहित एकतार् है।

आत्मार्भिव्यक्ति क सिद्धार्न्त 

फ्रोबेल के अनुसार्र बच्चे को आत्मार्भिव्यक्ति क अवसर मिलनार् चार्हिए। मार्नव किसी न किसी रूप में अपने को निरन्तर अभिव्यक्त करनार् चार्हतार् है। उसकी अभिव्यक्ति सार्मार्न्यत: आत्मप्रेरित एवं स्वचार्लित क्रियार् के मार्ध्यम से होती है। इसी क व्यार्वहार्रिक रूप आत्मक्रियार् विधि है। बच्चे स्वयं कार्य करके बेहतर ढंग से सीखते हैं। इस प्रकार उन्होंने बच्चों के आत्मार्भिव्यक्ति के नियम को सीखने की अच्छी विधि मार्नार् है।

विकास क सिद्धार्न्त 

फ्रोबेल ने शिक्षार् क उद्देश्य बच्चे क विकास मार्नार्। उनके अनुसार्र बच्चों के विकास में वार्तार्वरण क बहुत प्रभार्व पड़तार् है। जिस प्रकार पौधार् बीज के छोटे आकार में सम्पूर्ण वृक्ष को समार्हित किये रहतार् है और उचित धरार्तल एवं जलवार्यु पार्ते ही भीतर से बार्हर की ओर प्रस्फुटित होने लगतार् है, इसी तरह से मनुष्य भीतर से ही स्वसंचार्लन के मार्ध्यम से उपयुक्त वार्तार्वरण पार्कर विकास की ओर अगसर होतार् है। विकास क यही नियम बौद्धिक, नैतिक, कौशल एवं अन्य क्षेत्रों में काम करतार् है। विकास क यह सिद्धार्न्त गत्यार्त्मक है जो कि हीगल के द्वन्द्वार्त्मक सिद्धार्न्त क्रियार्, प्रतिक्रियार् और समन्वय (थीसिस, ऐण्टीथीसिस तथार् सिन्थिसिस) पर आधार्रित है।  फ्रोबेल के अनुसार्र प्रत्येक व्यक्ति विकास की पार्ँच भिन्न-भिन्न अवस्थार्ओं से गुजरतार् है। ये हैं-

  1. शैशव काल (जन्म से तीन वर्ष की अवधि)- इस काल में बच्चे के इन्द्रिय यार् संवेदी विकास पर जोर दियार् जार्नार् चार्हिए। 
  2. बार्ल्यकाल (तीन से पार्ँच वर्ष तक की अवधि)- इस काल में भार्षार् क विकास होतार् है। शरीर की जगह मस्तिष्क पर ध्यार्न दियार् जार्ने लगतार् है। सभी वस्तुओं क सही नार्म बच्चों को इस काल में बतार्यार् जार्नार् चार्हिए। सार्थ ही सही उच्चार्रण क प्रशिक्षण दियार् जार्नार् चार्हिए। 
  3. कैशोर्य (छह से चौदह वर्ष तक की अवधि), 
  4. तरूण (चौदह से अठार्रह वर्ष तक की कालखंड), तथार् 
  5. प्रौढ़ (अठार्रह वर्ष के बार्द की अवधि)। प्रत्येक भार्वी स्तर क विकास बहुत हद तक पिछले स्तर के विकास पर निर्भर करतार् है।

स्वत: क्रियार् क सिद्धार्न्त 

फ्रोबेल के अनुसार्र बच्चे को अगर स्वप्रेरित सृजनार्त्मक क्रियार्ओं क अवसर मिले तो उनमें भार्वनार्ओं एवं क्षमतार्ओं क विकास होतार् है। फ्रोबेल के अनुसार्र मार्नव निर्मार्ण कार्य इसलिए करतार् है क्योंकि परमेश्वर ने अपनी ही तरह उसे भी सृष्टार् एवं कर्तार् बनार्यार् है। वह क्रियार्शील केवल भौतिक आवश्यकतार्ओं को पूरार् करने हेतु नहीं रहतार् वरन् वह क्रियार्शील इसलिए रहतार् है कि उसक दिव्य-स्वभार्व प्रकट हो सके और दैवी कार्य को पूरार् कर सके।

फ्रोबेल को मार्नव की जन्मजार्त उच्चतार् में विश्वार्स थार्। वह मार्नव को शुद्ध और विकार रहित मार्नतार् है। अत: वह मार्नवीय शक्तियों के स्वभार्विक विकास में हस्तक्षेप क विरोधी है।

फ्रोबेल क शिक्षार्-दर्शन 

जैसार् कि हमलोग देख चुके हैं फ्रोबेल इस सिद्धार्न्त पर विश्वार्स करते हैं कि सार्री संभार्वनार्यें, क्षमतार्यें एवं शक्तियार्ँ बार्लक के अन्दर निहित है। शिक्षार् व्यवस्थार् क कार्य विद्याथियों को उपयुक्त वार्तार्वरण एवं अवसर प्रदार्न करतार् है तार्कि विद्यार्थ्र्ार्ी अन्तर्निहित संभार्वनार्ओं एवं क्षमतार्ओं के अनुरूप अधिक से अधिक विकास कर सके। विकास वस्तुत: अन्दर से आरम्भ होतार् है। बार्हर से इसे थोपार् नहीं जार् सकतार् है। शिक्षण-अधिगम प्रक्रियार् में बार्लक को बार्हर से उतनार् नहीं देनार् पड़तार् है जितनार् अन्तर्निहित शक्तियों क प्रकाशन करनार्। बिनार् आवश्यकतार् अनुभव किए बार्लक शार्यद ही कुछ सीख सके। इन्हीं सिद्धार्न्तों पर फ्रोबेल ने शिक्षार् के उद्देश्यों क निर्धार्रण कियार् है।

शिक्षार् क उद्देश्य 

फ्रोबेल ने शिक्षार् के द्वार्रार् लक्ष्यों की प्रार्प्ति क उद्देश्य निर्धार्रित कियार्:

  1. एकतार् यार् सार्मन्जस्य क बोध- सर्वेश्वरवार्दी होने के नार्ते फ्रोबेल क यह मार्ननार् है कि र्इश्वर सबमें व्यार्प्त है। जीवन-प्रकृति के सभी अंगों में व्यार्प्त एकतार् एवं सार्मन्जस्य क बोध करवार्नार् ही शिक्षार् क उद्देश्य है। इससे जीवन एवं संस्कृति की पूर्णतार् क बोध होतार् है एवं बहुमुखी विकास की प्रक्रियार् तीव्र होती है। 
  2. व्यक्ति में आध्यार्त्मिक प्रकृति को जार्गृत करनार्- शिक्षार् क उद्देश्य मार्नव में उसकी आध्यार्त्मिक प्रवृति को जार्गृत करनार् है। रूसो की ही तरह फ्रोबेल मार्नव को जन्मजार्त अच्छार् मार्नतार् है। वह मनुष्य की जन्मजार्त उच्चतार् यार्नि देवत्व में आस्थार् रखतार् है। उसके अनुसार्र मनुष्य के विकार यार् पतन के नीचे एक दमित भलाइ छिपी है। विकार को दूर करने क उपार्य है मनुष्य की मौलिक उच्चतार् की खोज कर पुन: स्थार्पित कियार् जार्य। शिक्षार् क यह एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है। 
  3. स्वतंत्रतार् एवं आन्तरिक संकल्प शक्ति क विकास- फ्रोबेल सही शिक्षार् एवं प्रशिक्षण हेतु बच्चे की स्वतंत्रतार् को आवश्यक मार्नतार् है। शिक्षार् हेतु बच्चे क सहयोग प्रार्प्त करनार् आवश्यक है। सार्थ ही शिक्षार् क एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है बार्लक में आन्तरिक संकल्प शक्ति क विकास करनार्। संकल्प चरित्र और व्यक्तित्व के गठन क आधार्र है। अत: शिक्षार् क उद्देश्य संकल्प विकास है। 
  4. सार्मार्जिक भार्वनार् क विकास- फ्रोबेल बच्चों में सार्मार्जिकतार् क विकास शिक्षार् क एक महत्वपूर्ण उद्देश्य मार्नते हैं। बच्चार् परिवार्र, समुदार्य, समार्ज एवं विद्यार्लय से सीख लेकर सार्मार्जिक भार्वनार् क विकास करते हैं। 

फ्रोबेल ने सार्मार्जिक शिक्षार् पर बल दियार् जो कि उसकी ‘एकतार्’ के सिद्धार्न्त के अनुरूप है। फ्रोबेल ने अपने किण्डरगाटनों में सार्मूहिक क्रियार्ओं पर विशेष बल दियार्। किण्डरगाटेन के केन्द्रीय कक्ष में फर्श पर वृत्त यार् गोलार् बनार् होतार् है। इस गोले में बैठकर बार्लक समूह क अंश बन कर शिक्षार् पार्तार् है। इस वृत्त को फ्रोबेल ने समूह-भार्वनार्ओं क प्रतीक मार्नार् है। परिवार्र, समार्ज एवं विद्यार्लय से बच्चे को भार्षार्, सहयोग, प्रेम, सहार्नुभूति आदि सार्मार्जिक गुण प्रार्प्त होते है।

चरित्र निर्मार्ण- फ्रोबेल शिक्षार् के द्वार्रार् बच्चे की मौलिक अच्छाइ को बनार्ये रखने के पक्ष में थार् पर जहार्ँ विकार आ गयार् हो वहार्ँ उचित शिक्षार् और प्रशिक्षण द्वार्रार् चरित्र की मौलिक अच्छाइ को पुन: प्रार्प्त करनार् शिक्षार् क एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है। 

इस प्रकार फ्रोबेल ने शिक्षार् के अत्यन्त व्यार्पक उद्देश्य निर्धार्रित किए।

शिक्षार् की योजनार् 

फ्रोबेल ने बच्चों की शिक्षार् के लिए व्यार्पक योजनार् बनाइ। अपनी शैक्षिक योजनार् में फ्रोबेल ने बच्चे की आत्म-क्रियार् एवं खेल को अत्यधिक महत्वपूर्ण मार्नार्।

फ्रोबेल के अनुसार्र शिक्षार् वस्तुत: विकास की प्रक्रियार् है। बार्लक निरन्तर विकासशील रहतार् है। उसक विकास ज्ञार्न पक्ष में, संवेदनार् से सुव्यवस्थित चेतनार् की ओर कार्य-क्षेत्र में प्रवृति मूलक क्रियार्ओं से संकल्प-युक्त आचरण की ओर होतार् है। आत्मप्रेरित क्रियार्यें ही उपयोगी होती हैं। विकास के परिणार्म स्वरूप बच्चे नवीन क्रियार्ओं में संलग्न होते हैं पर इन सबमें एक कार्यमूलक एकतार् बनी रहती है। क्रियार्ओं के परिणार्मस्वरूप अभिरूचियों क विकास होतार् है। अभिरूचि शिक्षार् के लिए आवश्यक है। इस प्रकार फ्रोबेल के अनुसार्र सीखने क आधार्र क्रियार् ही है।

शैक्षिक प्रक्रियार् में क्रियार् क स्थार्न 

फ्रोबेल ने शिक्षार् में तीन प्रकार की क्रियार्ओं क उल्लेख कियार् है :-

  1. आवश्त्यार्त्मक यार् लयार्त्मक क्रियार्यें 
  2. वस्तुओं पर आधार्रित क्रियार्यें 
  3. कार्य एवं व्यवसार्य 

आवश्त्यार्त्मक यार् लयार्त्मक क्रियार्ओं से अवयवों क विकास होतार् है। ध्वन्यार्त्मक क्रियार्ओं द्वार्रार् आत्मार् क विकास होतार् है तथार् अन्य आवश्त्यार्त्मक क्रियार्ओं द्वार्रार् इन्द्रियों को विकसित कियार् जार्तार् है।

वस्तुओं पर आधार्रित क्रियार्ओं से विभिन्न अंगों (अवयवों) की शक्ति बढ़ती है। अगर बच्चों को वस्तु न मिले तो उनके काल्पनिक एवं अन्र्तमुखी होने क खतरार् रहतार् है। अत: शिशुओं एवं बच्चों को विभिन्न तरह के वस्तु दिये जार्ने चार्हिए। किस समय किस तरह के पदाथ दिये जार्यें, इस पर फ्रोबेल ने गम्भीर विचार्र करते हुए तीन आकार के वस्तुओं को देने क सुझार्व दियार्। जिन्हें वह गिफ्ट यार् उपहार्र कहतार् है। ये तीन आकार के होते हैं- गोलार्, घन एवं बेलनार्कार। फ्रोबेल के अनुसार्र सम्पूर्ण सृष्टि क निर्मार्ण इन तीन आकारों पर आधार्रित है।

बच्चे को सबसे पहले गेंद देनार् चार्हिए। फ्रोबेल के अनुसार्र गेंद सभी चीजों क केन्द्र यार् धुरी है। फ्रोबेल गेंद को अपने में पूर्ण मार्नतार् है जो स्थिरतार्, गति, समग्रतार्, एकरूपतार्, बहुपार्श्र्व, एकपार्श्र्व, दृश्य-अदृश्य आदि गुणों को अपने में संजार्ये रहतार् है। इस प्रकार गेंद फ्रोबेल के प्रिय सिद्धार्न्त ‘अनेकतार् में एकतार्’ क प्रतिनिधित्व करतार् है। बच्चे गेंद क उपयोग कर्इ तरह से कर सकते हैं- उछार्ल कर, रस्सी से लटकाकर, रबर में बार्ँधकर आदि। इन गतिविधियों से विज्ञार्न के कर्इ मूलभूत सिद्धार्न्तों को आसार्नी से समझार् जार् सकतार् है। भिन्न-भिन्न रंग के गेंदों को उपहार्र के रूप में देकर बच्चों को रंग क व्यार्वहार्रिक ज्ञार्न दियार् जार्नार् चार्हिए। ये रंग हैं : नीलार्, लार्ल पीलार्, बैंगनी, हरार् एवं नार्रंगी। विभिन्न वस्तुओं की जैसे ऊन, मखमल आदि की गेंद देनी चार्हिए। इनसे बच्चार् स्पर्श, गति, दिशार् आदि को समझतार् है।

उपहार्रों की दूसरी श्रृंखलार् में ठोस, गोलों, बेलनों एवं घनों को दियार् जार्नार् चार्हिए। अधिक भार्री एवं अपेक्षार्कृत स्थिर रहने के कारण इससे खेलने में अधिक शक्ति एवं कौशल की आवश्यकतार् पड़ती है। इससे बार्लक को समार्नतार्-असमार्नतार्, हल्का-भार्री, गति आदि क बोध होतार् है। अन्य सभी उपहार्र घनों से सम्बन्धित है। इन्हें विभिन्न संख्यार्ओं में विभार्जित कर यार् एकत्रित कर बच्चे विभिन्न आकारों क निर्मार्ण करते हैं। घन बड़े एवं छोटे दोनों ही आकार के होते हैं। इनसे बच्चों में क्रियार्ओं द्वार्रार् सृजनार्त्मकतार् क विकास कियार् जार्तार् है। इनसे गणित विशेषत: रेखार्गणित क प्रार्रम्भिक ज्ञार्न प्रार्प्त होतार् है।

फ्रोबेल ने तीसरे तरह की क्रियार् कार्य एवं व्यवसार्य को मार्नार् है। व्यवसार्य को परिभार्षित करते हुए फ्रोबेल ने कहार् ‘‘व्यवसार्य से तार्त्पर्य बार्लक की उस क्रियार् से है जो उत्पार्दक और सार्मार्जिक जीवन के किसी उपयोगी कार्य के समार्न हो।’’ कार्य मार्ंसपेशियों एवं बुद्धि दोनों को क्रियार् क अवसर देतार् है। शार्रीरिक एवं बौद्धिक क्षमतार्ओं क विकास उत्पार्दन कार्य के लिए आवश्यक है। लेकिन फ्रोबेल के कार्य एवं व्यवसार्य क उद्देश्य धन उपाजन नहीं है। इनकी उपयोगितार् क्रियार् क अवसर देने में है। फ्रोबेल ने कार्यों एवं व्यवसार्यों में बार्लू से खेलनार्, कागज काटनार्, मिÍी के मॉडल बनार्नार्, ड्रार्इंग बनार्नार्, सिलाइ, कताइ, बुनाइ आदि को स्थार्न दियार् है। इन कायोर्ं से बच्चार् जीवन के समीप आतार् है।

इस प्रकार हम पार्ते हैं कि फ्रोबेल क शिशु क्रियार् सम्बन्धी सिद्धार्न्त बार्लक के मनोविज्ञार्न के गहन और व्यवस्थित निरीक्षण क परिणार्म है। फ्रोबेल सर्वप्रथम शिशुओं को शिशु-गीतों एवं आवश्त्यार्त्मक क्रियार्ओं में व्यस्त रखतार् है। इसके उपरार्ंत बच्चों को क्रियार् एवं व्यवसार्य के द्वार्रार् व्यार्वहार्रिक प्रशिक्षण मिलतार् है। इस तरह से आत्मप्रेरित क्रियार्यें क्रमश: आत्म-नियन्त्रित क्रियार्ओं क रूप ले लेती है। बच्चे अपनी स्वतंत्रतार् एवं दार्यित्व की सीमार्यें महसूस करने लगतार् है।

खेल 

फ्रोबेल खेल को बार्लक की शिक्षार् क एक अत्यन्त ही महत्वपूर्ण हिस्सार् मार्नतार् है। फ्रोबेल ने खेल के महत्व पर प्रकाश डार्लते हुए कहार् ‘‘खेल मनुष्य के लिए, विशेषत: बार्लक के लिए उसके अन्त:जगत एवं बार्ह्य-जगत क दर्पण है और इस दर्पण की भीतर से आवश्यकतार् है। अत: यह जीवन एवं लगन-शक्ति को व्यक्त करने वार्ली प्रवृति है।’’ इस प्रकार मार्नव-शिक्षार् के इतिहार्स में फ्रोबेल पहलार् व्यक्ति है जिसने खेल के शैक्षिक महत्व को समझार् और इसे शिक्षार् क मार्ध्यम बनार् दियार्। फ्रोबेल ने खेल को आत्मप्रेरित, आत्मनियन्त्रित एवं स्वचार्लित क्रियार् मार्नार्। ‘उपहार्र’ भी खेल सार्म्रगी है। फ्रोबेल के अनुसार्र प्रार्रम्भिक जीवन में मनोरंजनार्त्मक खेल उपयोगी है। दूसरे स्तर पर रचनार्त्मक एवं उत्पार्दक खेलों को बौद्धिक एवं कलार्त्मक विकास हेतु आवश्यक मार्नार् गयार्। सार्थ ही समार्जिकतार् के विकास हेतु समूह नृत्य, समूह गार्यन जैसे सार्मूहिक खेलों क भी आयोजन कियार् जार्तार् है। शार्रीरिक, बौद्धिक एवं मार्नसिक विकास हेतु ‘उपहार्रों’ से सम्बन्धित खेल महत्वपूर्ण हैं।

फ्रोबेल ने खेल को अध्यार्पिकाओं यार् अध्यार्पकों के निर्देशन में आयोजित करने क सुझार्व दियार्। बच्चों के मनमार्ने ढंग से खेलने से शैक्षिक उद्देश्य पूरे नहीं होते हैं। बच्चों को किण्डरगाटन में इस तरह से खेलने के लिए प्रेरित करनार् चार्हिए कि प्रकृति द्वार्रार् निर्धार्रित लक्ष्य यार्नि बच्चे के विकास के उद्देश्य को प्रार्प्त कियार् जार् सके।

बचपन में खेल बच्चे की सर्वार्धिक महत्वपूर्ण क्रियार् है तो किशोरार्वस्थार् में कार्य। अब प्रक्रियार् की जगह किशोर की रूचि उत्पार्दन में होती है। अब उसके सार्मने एक निश्चित उद्देश्य रहतार् है। ये कार्य उसके वार्तार्वरण पर आधार्रित होते हैं। फ्रोबेल कार्य को र्इश्वरीय रूप क बार्ह्य स्वरूप मार्नतार् है। वह कहतार् है ‘‘आदमी अपने दैवीय अस्तित्व को बार्ह्य स्वरूप प्रदार्न करने के लिए कार्य करतार् है जिससे वह अपनी अध्यार्त्मिक एवं दिव्य प्रकृति को पहचार्न सके। यह वस्तुत: आत्म-सार्क्षार्त्कार की प्रक्रियार् है।’’

फ्रोबेल खेल, उपहार्र एवं अन्य वस्तुओं के व्यार्वहार्रिक उपयोग के अतिरिक्त उन्हें प्रतीक के तौर पर भी महत्वपूर्ण मार्नते हैं। उपहार्र विकास के नियमों क प्रतिनिधित्व करतार् है तो किण्डरगाटन के फर्श पर क वृत्त सार्मूहिक जीवन का। फ्रोबेल क यह मार्ननार् थार् कि बच्चों में प्रतीकों के मार्ध्यम से असीम कल्पनार्शक्ति है। जैसे खेल में बच्चे डंडे को जार्ंघों के मध् य रखकर घोड़े पर बैठने की कल्पनार् करतार् है। फ्रोबेल के अनुसार्र इस कल्पनार्शक्ति क प्रयोग शिक्षार् में कर बच्चे की सृजनशीलतार् बढ़ार्यी जार्नी चार्हिए। प्रतीकों को महत्वपूर्ण मार्नने के कारण फ्रोबेल को रहस्यवार्दी मार्नार् जार्तार् है।

विद्यार्लयी पार्ठ्यक्रम 

फ्रोबेल विभिन्न विषयों के अध्ययन-अध्यार्पन को सार्ध्य न मार्नकर बच्चे के व्यक्तित्व के पूर्ण विकास क सार्धन मार्नार् है। इनसे बच्चार् अपनी क्षमतार्ओं को जार्न पार्तार् है। फ्रोबेल क कहनार् है कि जीवन में चार्हे जो स्थार्न हो प्रत्येक बच्चे लड़के और जवार्न को कम से कम एक-दो घंटे किसी अर्थपूर्ण उत्पार्दन कार्य में लगार्नार् चार्हिए। वर्तमार्न में विद्यार्थ्र्ार्ी और अभिभार्वक काम को भार्वी जीवन हेतु हार्निप्रद मार्नते हैं। शैक्षिक संस्थार्ओं क यह कर्तव्य है कि उनके इन पूर्वार्ग्रहों को समार्प्त करे। वर्तमार्न बौद्धिक शिक्षार् बच्चों आलसी बनार्ती है और मार्नव शक्ति के बड़े हिस्से क उपयोग नहीं हो पार्तार् है और वह बेकार जार्तार् है। अत: उत्पार्दक कार्य को प्रार्थमिकतार् दी जार्नी चार्हिए।

अन्य विषय जिनक अध्यार्पन कियार् जार्नार् चार्हिए वे हैं कलार्, प्रकृति अध्ययन तथार् विद्यार्लय बगवार्नी। फ्रोबेल पार्ठ्यक्रम क विभार्जन चार्र प्रमुख भार्गों में करते हैं: (अ) धर्म एवं धामिक शिक्षार् (ब) प्रार्कृतिक विज्ञार्न एवं गणित (स) भार्षार् एवं (द) कलार् एवं कलार्त्मक वस्तु। इन विषयों के अध्ययन से छार्त्रों के व्यक्तित्व क सर्वार्ंगीण विकास संभव हो सकतार् है। शिक्षार् के इतिहार्स में फ्रोबेल पहलार् व्यक्ति थार् जिसने ‘क्रियार्’ को पार्ठ्यक्रम में महत्वपूर्ण स्थार्न दियार्।

किण्डरगाटन 

अपने जीवन के बार्द के वर्षों को फ्रोबेल ने किण्डरगाटन की स्थार्पनार् की और विकास में लगार्यार्। यही उसकी प्रसिद्धि क कारण भी है। किण्डरगाटन शब्द जर्मन भार्षार् क शब्द है जिसक शार्ब्दिक अर्थ ‘किण्डर’ अर्थार्त् बार्लक तथार् ‘गाटन’ अर्थार्त बार्ग होतार् है। फ्रोबेल के सिद्धार्न्त के अनुसार्र इस उद्यार्न में बार्लक पौधे, पार्ठशार्लार् बगीचार् तथार् शिक्षक मार्ली होतार् है।

‘किण्डरगाटन’ नार्म फ्रोबेल के मस्तिष्क में 1840 र्इ0 में आयार् जब वह बसन्त ऋतु में एक दिन अपने मित्रों के सार्थ किलहार्उ से बेन्कनड्रग जार् रहार् थार्। उसने एक पहार्ड़ी से रीने नदी की घार्टी को देखार् जो उसे एक अतिसुन्दर बगीचे की तरह मनमोहक लगी। वह चिल्लार् उठार् ‘‘मुझे मिल गयार्। मेरी संस्थार् क नार्म किण्डरगाटन होगार्।’’ यद्यपि वार्स्तविक रूप में 1843 र्इ0 के पहले किण्डरगाटन की स्थार्पनार् नहीं की गर्इ पर उपर्युक्त घटनार् के आधार्र पर किण्डरगाटन की स्थार्पनार् क वर्ष 1840 बतार्यार् जार्तार् है।

शिक्षण-विधि 

फ्रोबेल ने शिक्षण विधियों के प्रयोग पर जोर दियार्-

  1. खेल विधि : फ्रोबेल प्रथम शिक्षार्शार्स्त्री हैं जिन्होंने शिक्षार् में खेल को महत्व को समझते हुए उसक उपयोग कियार्। उनके अनुसार्र खेल बार्लक की स्वभार्विक क्रियार् है और इसमें उन्हें आत्मार्भिव्यक्ति क अवसर मिलतार् है। फ्रोबेल के अनुसार्र खेल के द्वार्रार् ही शिशु सर्वप्रथम संसार्र में अपने मौलिक रूप को प्रस्तुत करतार् है। 
  2. आत्मक्रियार् विधि : फ्रोबेल आत्मक्रियार् विधि यार् स्वयं कर के सीखने की विधि को शिक्षार् में महत्वपूर्ण मार्नतार् है। इसमें बार्लक स्वयं क्रियार् करतार् है और सीखतार् है। इसके लिए उन्होंने अपनी किण्डरगाटन पद्धति में अनेक प्रकार के उपहार्रों क विकास कियार् जिनमें गोलार्कार, आयतार्कार, बेलनार्कार, घनार्कार, वर्गार्कार तथार् त्रिभुजार्कार आकृति के लकड़ी, लोहे एवं ऊन से बनी वस्तुएं मुख्य हैं। 
  3. स्वतंत्र एवं निरन्तर सीखने की विधि : फ्रोबेल सीखने के लिए स्वतंत्रतार् एवं निरन्तरतार् को आवश्यक मार्नतार् है। उसके अनुसार्र बच्चों को स्वयं सीखने के लिए प्रेरित करनार् चार्हिए तथार् इनकी स्वतंत्रतार् में बार्धार् उत्पन्न नहीं करनार् चार्हिए। 
  4. वस्तुओं से सीखने की विधि : फ्रोबेल की यह विधि मनोवैज्ञार्निक सिद्धार्न्तों पर आधार्रित है। उसके अनुसार्र बच्चे अमूर्त संप्रत्ययों की तुलनार् में मूर्त एवं ठोस वस्तुओं से कम ही समय में प्रभार्वशार्ली ढंग से सीखते हैं। वर्तमार्न समय में श्रव्य-दृश्य सार्मग्रियों क शिक्षण-अधिगम प्रक्रियार् में उपयोग कियार् जार्तार् है। फ्रोबेल ने इसके स्थार्न पर उपहार्रों क उपयोग कियार्। 

अध्यार्पक क कार्य 

किण्डरगाटन यार् बार्लोद्यार्न के प्रवर्तक फ्रोबेल के अनुसार्र अध्यार्पक क कार्य है- गीतों, खेलों और चित्रों आदि क सही चयन करनार्। गीत गार्ते हुए, खेल खेलते हुए, चित्रों को देखते तथार् बनार्ते समय, बार्लक-बार्लिकाएं भी भार्षार् क प्रयोग करते हैं। फ्रोबेल क यह मार्ननार् थार् कि विद्याथियों को शिक्षण-अधिगम में गीत, गति और रचनार् तीन स्वतंत्र इकाइयार्ँ नहीं है। ये एक-दूसरे से अलग महत्वहीन हैं।

फ्रोबेल के अनुसार्र बार्लक की खेल प्रवृतियों क ठीक दिशार् में संचार्लन कियार् जार्नार् चार्हिए। समुचित निर्देशन के आभार्व में खेल एक उद्देश्यहीन क्रियार् बनकर रह जार्ती है। खेल क उचित दिशार् में संचार्लन में अध्यार्पकों की भूमिक महत्वपूर्ण हो जार्ती है। शिक्षक को यह सुनिश्चित करनार् चार्हिए कि किण्डरगाटन (बार्लोद्यार्न) पद्धति में बार्लक-बार्लिकाएं इस प्रकार खेलें कि उनक स्वभार्विक विकास हो सके।

फ्रोबेल के शिक्षार्-दर्शन की सीमार्एं 

फ्रोबेल ने शिक्षार् के दाशनिक पक्ष पर अत्यधिक जोर देकर शिक्षार् की दाशनिक संकल्पनार् को अध्यार्पकों एवं छार्त्रों के लिए अत्यधिक जटिल बनार् दियार् है। डीवी के अनुसार्र ‘‘एक निष्पक्ष निरीक्षक को उसके (फ्रोबेल के) अधिकांश कथन बड़े विचित्र एवं असम्बद्ध लगेंगे इनमें उसने व्यर्थ में ही सार्धार्रण सरल तथ्यों को आत्मगत दाशनिक तर्कों के आधार्र पर समझार्यार् है।

फ्रोबेल ने आन्तरिक विकास पर बहुत अधिक जोर दियार् है। इससे बार्ह्य विकास की उपेक्षार् हुर्इ। वस्तुत: आन्तरिक एवं बार्ह्य दोनों पक्षों क ही समन्वित विकास होनार् चार्हिए।

फ्रोबेल के द्वार्रार् प्रस्तार्वित चित्र और गीत बहुत पूरार्ने हो गये हैं। सभी स्थार्नों और संदर्भों में उनक उपयोग नहीं कियार् जार् सकतार् है। उपहार्रों और कार्यों को उपस्थित करने में जड़तार् एवं नियन्त्रण है। ‘उपहार्र’ आधुनिक युग की आवश्यकतार् के अनुरूप नहीं है। डीवी ने इस तथ्य क उल्लेख करते हुए कहार् ‘‘वस्तुओं को यथार्संभव वार्स्तविक जीवन से सम्बन्धित होनार् चार्हिए।’’

सार्थ ही किण्डरगाटन के गीत, खेल उपहार्रों के प्रयोग में अनुकरण एवं निर्देश पर काफी जोर है। वस्तुत: बच्चों को स्वत: क्रियार् करने क अवसर मिलनार् चार्हिए।

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