फ्रार्ंस की क्रार्ंति (1789) के कारण एवं प्रमुख घटनार्यें

फ्रार्ंस की क्रार्ंति (1789) के कारण एवं प्रमुख घटनार्यें

By Bandey

अनुक्रम

वार्स्तव में फ्रार्ंस की क्रार्ंति के कारण फ्रार्ंस की पुरार्तन व्यवस्थार् ‘आसियार्ं रिजीम’ में निहित थे। फ्रार्ंस के अयोग्य शार्सक, सार्मन्तों और कुलीन वर्ग को प्रार्प्त विशेषार्धिकारों के प्रति आक्रोश, रार्ज्य की दयनीय आर्थिक स्थिति, मध्यम वर्ग में बढ़ती चेतनार्, बौद्धिक जार्गरण क प्रभार्व आदि अनेक कारण थे, जिन्होंने क्रार्ंति को जन्म दियार्।

फ्रार्ंस की क्रार्ंति (1789) के कारण

फ्रार्ंस की क्रार्ंति के सार्मार्जिक कारण

फ्रार्ंस क समार्ज असमार्न और विघटित थार्। यह सार्मन्तवार्दी प्रवृत्तियों और विशेषार्धिकारों के सिद्धार्न्त पर आधार्रित थार्। यह समार्ज तीन श्रेणियों में बंटार् थार्-प्रथम एस्टेट- पार्दरी, द्वितीय एस्टेट-सार्मन्त तथार् तृतीय एस्टेट-जन सार्धार्रण। सार्मार्जिक हैसियत और अधिकारों के आधार्र पर उच्च पार्दरी तथार् कुलीन सार्मन्त वर्ग विशेषार्धिकार वर्ग के अन्तर्गत तथार् समस्त जनतार्-किसार्न, मजदूर, नौकरी और व्यार्पार्र करने वार्ले आदि अधिकारहीन वर्ग के अन्तर्गत आते थे। उच्च पार्दरी और कुलीन सार्मन्त सम्पन्न और अधिकांश भूमि के स्वार्मी होने के बार्बजूद करमुक्त थे। उनके पद खरीदे जार् सकते थे, जिस कारण उच्च पदार्धिकारी और पार्दरी अयोग्य, भ्रष्ट और चार्पलूस हो गये थे। चर्च के पार्दरी समार्ज के प्रत्येक अंग पर प्रभार्वी थे। सार्मन्त वर्ग विलार्सितार् क जीवन व्यतीत करतार् थार् और उसे किसार्नों से कई प्रकार के करों को वसूलने और बेगार्र करार्ने क विशेषार्धिकार प्रार्प्त थार्। मध्यम वर्ग धन और योग्यतार् में सम्पन्न होने के बार्बजूद सुविधार्हीन थार्, जिस कारण उसमें अत्यधिक असंतोष थार्। सबसे दयनीय स्थिति किसार्नों और मजदूरों की थी, जो जनसंख्यार् में 80 प्रतिशत थे तथार् जिन्हें अपनी आय क आधार् भार्ग सार्मन्तीय, धामिक और रार्जकीय करों के रूप में देनार् होतार् थार्। समार्ज की यह विशमतार् धीरे धीरे आपसी तनार्व क कारण बनी।


फ्रार्ंस की क्रार्ंति के रार्जनैतिक कारण

फ्रार्ंस में लुई 14वें के समय सत्तार् क पूर्ण केन्द्रीकरण हो गयार् थार्। उसने पूर्ण निरंकुशतार् और शार्न-शौकत से रार्ज्य कियार्। कई युद्धों और नई रार्जधार्नी वर्सार्य की स्थार्पनार् पर अत्यधिक व्यय करने के बार्वजूद उसने अपने उत्तरार्धिकारी को युद्ध न करने और जनहित के कार्य करने की सलार्ह दी। परन्तु उसक उत्तरार्धिकारी लुई 15वार्ँ कमजोर और विलार्सी थार्। उसने अपने पड़ोसियों के सार्थ कई असफल युद्ध लड़े तथार् अपने सलार्हकारों की शार्सन और आर्थिक स्थिति में सुधार्र करने की सलार्ह को यह कहकर टार्ल दियार् कि मेरार् समय तो निकल ही जार्येगार्। लुई 16वार्ँ गद्दी पर बैठार् तो फ्रार्ंस की स्थिति निरार्शार्जनक थी। उसमें स्थिति को सुधार्रने की क्षमतार् नहीं थी। लुई 16वार् न तो स्वयं निर्णय ले पार्तार् थार् और न अपने मंत्रियों की उचित सलार्ह पर कार्य कर पार्तार् थार्। उस पर अपनी रार्नी मेरी एन्टोयनेट क प्रभार्व थार्। वह रार्जनीति और प्रशार्सन में निरन्तर हस्तक्षेप करती थी। वह आस्ट्रियार् की रार्जकुमार्री थी तथार् फ्रार्ंस की जनतार् उसे पसन्द नहीं करती थी। क्रार्ंति के समय उसने रार्जार् की कठिनार्ईयों को बढ़ार्यार्।

फ्रार्ंस की प्रतिनिधि सभार् स्टेटस जनरल क अधिवेशन 1614 के बार्द से नहीं हुआ थार्। प्रार्ंतों पर केन्द्र क नियंत्रण कमजोर पड़ गयार् थार्। सम्पूर्ण देश अनेक प्रकार की इकाइयों मे बंटार् थार् तथार् स्थार्न-स्थार्न पर भिन्न भिन्न कानून प्रचलित थे। न्यार्य व्यवस्थार् जटिल और खर्चीली थी। एक प्रकार के वार्रंट ‘लेत्र द काशे’ द्वार्रार् किसी को भी कभी भी गिरफ्तार्र कियार् जार् सकतार् थार्। व्यार्पार्र की दृश्टि से भी देश कई भार्गो में बंटार् थार् और जगह-जगह चुंगी की सीमार्एं थीं। कर्मचार्री अनियंत्रित और भ्रष्ट थे।

इस प्रकार फ्रार्ंस में निरंकुश और अयोग्य शार्सकों, प्रतिनिधि सभार्ओं के अभार्व, अक्षम प्रशार्सनिक व्यवस्थार्, भ्रष्ट न्यार्य और कानून व्यवस्थार् आदि ने रार्जनैतिक व्यवस्थार् को क्षीण कर दियार् थार्।

फ्रार्ंस की क्रार्ंति के आर्थिक कारण

फ्रार्ंस की वित्तीय नीति दोषपूर्ण थी। रार्ज्य क कोई बजट नहीं थार्। रार्जार् की व्यक्तिगत सम्पत्ति और रार्जकोश में कोई अन्तर नहीं थार्। रार्जपरिवार्र विलार्सितार् और युद्धों पर अत्यधिक अपव्यय करतार् थार्। आय से अधिक व्यय होने के कारण फ्रार्ंस की अर्थव्यवस्थार् कर्ज आधार्रित हो गयी थी। फ्रार्ंस मध्यम वर्ग के व्यार्पार्रियों क ऋणी बनतार् जार् रहार् थार्। फ्रार्ंस के शार्सकों द्वार्रार् कृषि और उद्योग के विकास की ओर कोई ध्यार्न नहीं दियार् गयार्। कर व्यवस्थार् भी दोषपूर्ण थी। विशेषार्धिकार वर्ग से सम्पन्न होने के बार्वजूद कोई कर नहीं लियार् जार्तार् थार्। सम्पूर्ण करों क भार्र किसार्नों, मजदूरों और सार्मार्न्य जनतार् को वहन करनार् पड़तार् थार्। अप्रत्यक्षकर जैसे नमक कर आदि को वसूलने के लिए ठेक प्रथार् प्रचलित थी। ठेकेदार्र करवसूली करते समय गरीब किसार्नों पर अत्यार्चार्र करते थे। 1778 की मंदी और अकाल ने स्थिति को अधिक खरार्ब कर दियार्। किसार्नों और मजदूरों में भूखमरी की स्थिति उत्पन्न हो गयी। व्यार्पार्रियों ने भी रार्ज्य को ऋण देने से मनार् कर दियार्। परन्तु रार्जपरिवार्र और कुलीन वर्ग की विलार्सितार् में कोई कमी नहीं आई। अंतत: फ्रार्ंस को वित्तीय संकट क सार्मनार् करनार् पड़ार्।

फ्रार्ंस की क्रार्ंति के बौद्धिक तथार् अन्य कारण

फ्रार्ंस में दाशनिकों और लेखकों ने फ्रार्ंसीसी समार्ज में व्यार्प्त असमार्नतार्, भ्रष्टार्चार्र, धामिक अंधविश्वार्स आदि की कटु आलोचनार् कर जनतार् को परिवर्तन करने को प्रेरित कियार्। अनेक गोश्ठियों (सैलो) और संस्थार्ओं (कारदीलिए आदि) में यह दाशनिक वर्तमार्न व्यवस्थार् की बुरार्इयों पर विचार्र विमर्श करते थे। इनक प्रभार्व मध्यम वर्ग पर पड़ार्। इन्हें क्रार्ंति क जन्मदार्तार् नहीं कहार् जार् सकतार् तथार्पि फ्रार्ंस में परिवर्तन हेतु वैचार्रिक आधार्र प्रदार्न करने क कार्य इन लेखकों ने कियार्।

मार्न्टेस्क्यू ने अपनी पुस्तक ‘द स्पिरिट ऑफ लॉज’ में शक्ति के पृथक्करण क सिद्धार्न्त प्रस्तुत कियार्। वह संवैधार्निक शार्सार्न पद्धति के पक्ष में थार्। वार्ल्टेयर ने प्रार्चीन रूढ़ियों, कुप्रथार्ओं और अंधविश्वार्सों क विरोध कियार्। विशेषरूप से कैथोलिक चर्च और पार्दरियों के विलार्समय जीवन को जनतार् के समक्ष रखार्। रूसो ने ‘सोशल कांट्रैक्ट’ नार्मक पुस्तक में स्पष्ट कियार् कि शार्सक को जनतार् के प्रति उत्तरदार्यी होनार् चार्हिए। इनके अतिरिक्त दिदरो, क्वेस्ने, हॉलबैक, हैल्वेशियस आदि ने अपनी लेखनी से असमार्नतार्, शोषण, धामिक असहिश्णुतार्, भ्रष्ट और निरंकुश रार्जतंत्र, प्रशार्सनिक दोष आदि के प्रति जनतार् को जार्ग्रत कियार्।

फ्रार्ंस की क्रार्ंति समकालीन विश्व से भी प्रभार्वित हुयी थी। अमेरिक की स्वतंत्रतार् तथार् इंग्लैण्ड की गौरवशार्ली क्रार्ंति के पश्चार्त वहार्ं लार्गू संवैधार्निक शार्सन व्यवस्थार् ने फ्रार्ंस के शिक्षित मध्यम वर्ग को व्यवस्थार् परिवर्तन हेतु प्रेरित कियार्।

फ्रार्ंस की क्रार्ंति के तार्त्कालिक कारण

आपको बतार्यार् गयार् है कि फ्रार्ंस में वित्तीय संकट उत्पन्न हो गयार् थार्। लुई 16वें ने अपने अर्थमंत्रियों क्रमश: तुर्गो, नेकर, कालोन, और ब्रीएन की सलार्ह से इस संकट को दूर करने हेतु कई प्रयार्स किए। रार्नी और दरबार्री सार्मन्तों के शड़यन्त्रों और सहयोग न करने के कारण सभी प्रयार्स असफल रहे। अंतत: लुई 16वें ने अध्यार्देशों के द्वार्रार् सार्मन्त वर्ग पर कर लगार्नार् चार्हार्, पेरिस की पालमार्ं ने कर लगार्ने सम्बन्धी कानूनों को पंजीकृत करने से इंकार कर दियार्। उसने स्पष्ट कियार् कि रार्जार् को नयार् कर लगार्ने क अधिकार नहीं है, केवल रार्ज्य को ही ‘स्टेटस जनरल’ के मार्ध्यम से कर लगार्ने क अधिकार है। इस प्रकार विशेषार्धिकार सम्पन्न सार्ंमत वर्ग ने रार्जार् क विरोध करके फ्रार्ंस को क्रार्ंति की ओर धकेल दियार्।

फ्रार्ंस की क्रार्ंति (1789) प्रमुख घटनार्यें

स्टेटस जनरल की बैठक बुलार्ने की पालमार्ं की मार्ंग क जनतार् द्वार्रार् भार्री समर्थन कियार् गयार्। रार्जार् ने पालमार्ं को भंग करनार् चार्हार्, तो कई शहरों में प्रत्यक्ष विरोध प्रदर्शन हुआ। अंतत: विवश होकर रार्जार् को स्टेटस जनरल की बैठक बुलार्नी पड़ी।

स्टेटस जनरल क अधिवेशन

1614 में स्टेटस जनरल क अधिवेशन अन्तिम बार्र हुआ थार्। 1789 में जब स्टेटस जनरल के चुनार्व के लिए पार्दरी ,सार्मंत और तृतीय वर्ग के अलग-अलग प्रतिनिधि चुनने की पुरार्नी पद्धति अपनार्यी गयी तो इस व्यवस्थार् के विरूद्ध तृतीय वर्ग ने विरोध कियार्। फलत: तृतीय वर्ग के सदस्यों की संख्यार् बढ़ार् दी गयी। 25 वर्ष से अधिक आयु क जो व्यक्ति रार्ज्य को कर देतार् थार् यार् किसी विशेष कार्य में दक्ष थार्, मत दे सकतार् थार्।

5 मई को स्टेटस जनरल क अधिवेशन वर्सार्य में हुआ, परन्तु मतदार्न प्रणार्ली को लेकर मतभेद उत्पन्न हो गयार्। पुरार्नी पद्धति में तीनों वर्गों के प्रतिनिधि अलग-अलग सदनों में अपने सदन क एक मत देते थे, जिससे दो सदनों क एक मत होने पर वही स्वीकृत हो जार्तार् थार्। तृतीय वर्ग ने इसे मार्नने से इंकार कर दियार्। लगभग डेढ़ मार्ह तक गतिरोध चलतार् रहार्। तृतीय वर्ग ने अन्य वर्गों को अपने सार्थ बैठने के लिए आमंत्रित कियार्। विरोध के बार्वजूद प्रथम वर्ग से कुछ छोटे पार्दरियों ने तृतीय सदन के सार्थ बैठनार् स्वीकार कियार्। अंतत: 16 जून,1789 को स्टेटस जनरल ने अपने को रार्ष्ट्रीय सभार् घोशित कर दियार्। 20 जून, 1789 को जब तृतीय वर्ग के प्रतिनिधि सभार् भवन पहुँचे तो रार्जार् ने सभार् भवन बंद करार् दियार्। तृतीय वर्ग ने समीप स्थित टेनिस कोर्ट में एकत्र होकर शपथ ली कि रार्ष्ट्रीय सभार् देश के लिए नयार् संविधार्न बनार्ने तक भंग नहीं की जार्येगी। 23 जून, 1789 को रार्जार् ने तीनों वर्गों के प्रतिनिधियों को सम्बोधित कियार् तथार् पृथक-पृथक सदन में बैठकर निर्णय करने को कहार् तो रार्ष्ट्रीय सभार् ने इसे मार्नने से इंकार कर दियार्। यह जनतार् की पहली जीत थी।

बार्स्तील क पतन और जनतार् क विद्रोह

पेरिस के लोग वर्सार्य में स्टेटस जनरल क अधिवेशन करने से नार्रार्ज थे। धीरे-धीरे बेरोजगार्र और गरीब सार्ंज क्यूलोत ने कारखार्नार् मार्लिकों और व्यार्पार्रियों पर हमलार् कर दियार् और दंगे बढते गये इसी समय रार्जार् ने लोकप्रिय मंत्री नेकर को बर्खार्स्त कर दियार्, जिसक पेरिस की जनतार् ने विरोध कियार्।

13 जुलार्ई को अफवार्ह फैली की विरोध क दमन करने सैनिकों को भेजार् जार् रहार् है। इससे उत्तेजित हो लोगों ने शस्त्र संग्रह करने क निर्णय लियार्। 14 जुलार्ई को पेरिस के समीप स्थित बार्स्तील के दुर्ग पर वहार्ँ के हथियार्रों पर कब्जार् करने के उद्देश्य से जनतार् ने आक्रमण कर दियार्। बार्स्तील क किलार् पूरी तरह नष्ट कर दियार् गयार्। इस घटनार् के क्रार्न्तिकारी परिणार्म हुए। फ्रार्ंस की जनतार् को सीधी कार्यवार्ही करने की प्रेरणार् मिली और इससे प्रभार्वित हो सम्पूर्ण फ्रार्ंस में सार्मंतीय प्रतीकों और दस्तार्वेजों को लूटार् और जलार्यार् गयार्। पेरिस कम्यून ने लार्फार्यत के नेतृत्व में ‘नेशनल गाड’ की स्थार्पनार् कर ली। इससे सैनिक शक्ति मध्यम वर्ग के हार्थ में आ गयी। बार्स्तील क पतन फ्रार्ंस के इतिहार्स क निर्णार्यक मोड़ सार्बित हुआ। इस कारण 14 जुलार्ई फ्रार्ंस में रार्ष्ट्रीय दिवस के रूप में मनार्यार् जार्ने लगार्।

रार्ष्ट्रीय संवैधार्निक सभार्

तृतीय स्टेट ने अपने को रार्ष्ट्रीय सभार् घोषित करने के बार्द नवीन संविधार्न क निर्मार्ण करने क निश्चय कियार् थार्। उस समय सम्पूर्ण देश में क्रार्ंति अपने चरम पर थी। अत: देश में शार्न्ति और सुव्यवस्थार् स्थार्पित करने के लिए रार्ष्ट्रीय सभार् ने अगस्त, 1789 से सितम्बर, 1791 तक शार्सन में सुधार्र और कई महत्वपूर्ण कार्य किए।

प्रमुख घोषणार्एं एवं कार्य- रार्ष्ट्रीय सभार् में कुछ सार्मंतीय प्रतिनिधियों ने 4 अगस्त को अपने विशेषार्धिकारों को छोड़ने की घोषणार् कर दी, तब रार्ष्ट्रीय सभार् ने प्रस्तार्व पार्रित करके सभी नार्गरिकों पर एक सार्मार्न कर व्यवस्थार् लार्गू की और विशेषार्धिकारों को समार्प्त कर दियार्। सदियों पुरार्नी व्यवस्थार्, जो क्रार्ंति क प्रमुख कारण थी, क अन्त हो गयार्। इस घटनार् के बार्द कुछ असन्तुष्ट सार्मन्त और रार्जार् के सम्बन्धी विदेश भार्ग गये और क्रार्ंति के विरूद्ध शडयन्त्र रचने लगे। रार्ष्ट्रीय सभार् ने रूसो के ‘सोशल कांट्रैक्ट’ से प्रेरित होकर 27 अगस्त, 1789 को मार्नव अधिकारों की घोषणार् की। इस घोषणार्नुसार्र समस्त जनतार् को समार्नतार्, सुरक्षार्, स्वतंत्रतार्, सम्पत्ति रखने, योग्यतार् के आधार्र पर पद प्रार्प्त करने तथार् समार्न न्यार्य और समार्न कानून क अधिकार दियार् गयार्। इस घोषणार् ने क्रार्ंति को व्यार्पकतार् प्रदार्न की और समस्त विश्व को प्रभार्वित कियार्। रार्जार् के द्वार्रार् घोषणार् पत्र पर हस्तार्क्षर करने में देरी की गयी। जनतार् को भय थार् कि लुई 16वार्ँ क्रार्ंति विरोधियों के सार्थ मिलकर क्रार्ंति क दमन करने के लिए सेनार् भेज सकतार् है। वर्सार्य में क्रार्ंति विरोधियों द्वार्रार् शार्नदार्र दार्वत क आयोजन भी कियार् गयार् थार्। अत: 5 अक्टूबर, 1789 को पेरिस की कई हजार्र स्त्रियों ने वर्सार्य की ओर प्रस्थार्न करके रार्जार् तथार् उसके परिवार्र को पेरिस में चलकर रहने पर विवश कियार्।

जुलार्ई,1790 में पार्दरियों क कानून पार्रित कियार् गयार्, जिसके अनुसार्र पार्दरियों और विशपों क निर्वार्चन अब जनतार् द्वार्रार् कियार् जार्येगार् तथार् प्रत्येक प्रार्न्त में एक विशप नियुक्त होगार्, जो पोप के अधीन न होकर रार्ज्य क वैतनिक कर्मचार्री होगार्। इस लौकिक संविधार्न की शपथ फ्रार्ंस के सभी पार्दरियों को लेनी थी। इससे पोप और कैथोलिक जनतार् नार्रार्ज हो गयी और पार्दरियों ने इसे मार्नने से इंकार कर दियार्। 6 फरवरी, 1791 को एक अन्य घोषणार् द्वार्रार् सन्यार्सियों के मठों क अन्त करके उन्हें सार्ंसार्रिक जीवन व्यतीत करने को कहार् गयार्। रार्ष्ट्रीय सभार् ने आर्थिक स्थिति सुधार्रने हेतु निर्धनों के लिए ‘चैरिटी वर्कशार्प’ स्थार्पित किए। किसार्नों से भूमिकर के अतिरिक्त कोई भी कर लेनार् बन्द कर दियार्। अनार्ज के व्यार्पार्र को कर मुक्त कियार् और देश छोड़कर गये कुलीन लोगों की सम्पत्ति को रार्ष्ट्रीय सम्पत्ति घोषित कियार्।

नवीन संविधार्न क निर्मार्ण- रार्ष्ट्रीय सभार् ने 1791 क संविधार्न, जो फ्रार्ंस के इतिहार्स में पहलार् लिखित संविधार्न थार्, बनार्यार्। इसके द्वार्रार् फ्रार्ंस में संवैधार्निक रार्जतंत्र की स्थार्पनार् की गयी। इसमें जनतार् की इच्छार् और अनुमति को सरकार की सभी शक्तियों क स्रोत मार्नार् गयार्। कार्यपार्लिका, व्यवस्थार्पिक और न्यार्यपार्लिक को पूर्णत: अलग-अलग कर दियार् गयार्। एक सदन वार्ली प्रतिनिधि सभार् को कानून बनार्ने क अधिकार दियार् गयार्। रार्जार् तथार् उसके मंत्री व्यवस्थार्पिक द्वार्रार् पार्रित कानून के आधार्र पर ही शार्सन कर सकते थे। न्यार्य सस्तार् और सुलभ बनार्यार् गयार् और जूरी व्यवस्थार् लार्गू की गयी। प्रशार्सन क विक्रेंदीकरण कर दियार् गयार्। सबसे छोटी इकाई कम्यून थी। रार्जार् के व्यक्तिगत व्यय हेतु एक निश्चत रार्शि भी निर्धार्रित कर दी गयी। 21 सितम्बर, 1791 को रार्जार् ने नए संविधार्न को स्वीकार करके उसके अनुसार्र र्क करने क वचन दियार्। 30 सितम्बर, 1791 में रार्ष्ट्रीय सभार् विसर्जित कर दी गयी।

व्यवस्थार्पिक सभार्

1791 के संविधार्न अनुसार्र फ्रार्ंस में संवैधार्निक रार्जतंत्र की स्थार्पनार् हेतु व्यवस्थार्पिक सभार् क निर्वार्चन कियार् गयार्। नई विधार्न सभार्, जिसमें 745 सदस्य थे, क प्रथम अधिवेशन 1 अक्टूबर, 1791 में हुआ। इस सभार् में कई दलों के प्रतिनिधि विजित हुए- रार्जतंत्रवार्दी, संविधार्नवार्दी, सेण्टर पाटी और गणतंत्रवार्दी। गण्तंत्रवार्दियों में भी दो गुट थे- जिंरोदिस्त और जैकोबिन। इस सभार् को कई कठिनार्इयों क सार्मनार् करनार् पड़ार्।

  1. फ्रार्ंस में रार्जतंत्र के समर्थक बहुत से सार्मन्त और रार्जार् के भार्ई विदेश भार्ग गये थे, जहार्ं वह यूरोप के अन्य रार्जतंत्रों के सार्थ मिलकर क्रार्ंति विरोधी शड़यन्त्र रच रहे थे। व्यवस्थार्पिक सभार् ने विदेश गए सार्मन्तों को दो मार्ह के अन्दर लौट आने अन्यथार् देशद्रोही घोशित करने क आदेश दियार्। रार्जार् ने इस आदेश पर हस्तार्क्षर करने से इंकार कर दियार्।
  2. लौकिक संविधार्न की शपथ न लेने वार्ले पार्दरियों को सभार् ने यह आदेश दियार् कि यदि वह शपथ नहीं लेंगे तो उनको पद से हटार् दियार् जार्येगार् और उनकी सम्पत्ति जब्त कर ली जार्येगी। रार्जार् ने इस आदेश को भी अस्वीकार कर दियार्।
  3. फ्रार्ंस के रार्जार् के समर्थन में 27 अगस्त, 1791 को आस्ट्रियार् और प्रशार् के शार्सकों ने पिलनित्स की घोषणार् की जिसमें कहार् कि फ्रार्ंस की समस्यार् सभी रार्ज्यों की समस्यार् है और हम इसको समार्प्त करने के लिए फ्रार्ंस में सशस्त्र हस्तक्षेप करेंगे।

अंतत: रार्जतंत्र को समार्प्त करने के उद्देश्य से व्यवस्थार्पिक सभार् में गणतंत्रवार्दी दल ने युद्ध को आवश्यक मार्नकर युद्ध करने क प्रस्तार्व रखार्, जो बहुमत से पार्स हुआ। 20 अप्रैल, 1792 को आस्ट्रियार् के विरूद्ध युद्ध की घोषणार् कर दी गयी। प्रशार् के सेनार्पति ने घोषणार् की कि फ्रार्ंस की जनतार् ने लुई 16वे तथार् उसके परिवार्र को कोई क्षति पहुंचार्ई तो पेरिस को नष्ट कर दियार् जार्येगार्। फ्रार्ंस की जनतार् इससे उत्तेजित हो गयी और लुई 16वें को देशद्रोही मार्नकर उसके महल तुइलरी पर धार्वार् बोल दियार्। व्यवस्थार्पिक सभार् ने 11 अगस्त, 1792 को रार्जार् लुई 16वें को निलम्बित कर दियार् तथार् गणतंत्र की स्थार्पनार् करने के लिए नवीन संविधार्न क गठन करने हेतु रार्ष्ट्रीय सम्मेलन क चुनार्व करने क निश्चय कियार्। तत्पश्चार्त पेरिस कम्यून को अन्तरिम सरकार चलार्ने क कार्यभार्र सौंप कर व्यवस्थार्पिक सभार् ने स्वयं को भंग कर दियार्।

पेरिस कम्यून की अन्तरिम सरकार ने लुई 16वें को बन्दी बनार् लियार् और 2 सितम्बर से 6 सितम्बर, 1792 में हजार्रों की संख्यार् में रार्जतंत्र के समर्थकों और क्रार्ंति विरोधियों को मौत के घार्ट उतार्र दियार्। 20 सितम्बर, 1792 को फ्रार्ंस ने आस्ट्रियार् और प्रशार् की सेनार्ओं को वार्ल्मी के युद्ध में परार्जित कियार्। इसी दिन रार्ष्ट्रीय सम्मेलन क चुनार्व हुआ और फ्रार्ंस में गणतंत्र की स्थार्पनार् हुयी।

रार्ष्ट्रीय सम्मेलन (नेशनल कन्वेंशन)

रार्ष्ट्रीय सम्मेलन फ्रार्ंस की तीसरी क्रार्ंतिकारी सभार् थी, जिसने 21 सितम्बर, 1792 से 20 अक्टूबर, 1795 तक शार्सन कियार्। इसमें कुल 782 सदस्यों में 200 जिरोंदिस्त, 100 जैकोबिन तथार् 482 स्वतंत्र सदस्य थे।

रार्ष्ट्रीय सम्मेलन ने गणतंत्र की घोषणार् करके देश के लिए नयार् कैलेण्डर बनार्यार्। रार्जार् लुई 16वें को देशद्रोही घोषित कियार् तथार् 21 जनवरी, 1793 को उसे गिलोटिन पर चढ़ार्कर मृत्युदण्ड दियार्। विदेशी आक्रमणों क सार्मनार् करने के लिए तीन लार्ख सैनिकों की एक विशार्ल सेनार् क गठन कियार्। 6 अप्रैल, 1793 को लोक सुरक्षार् समिति गठित की, जिसे कार्यपार्लिक और व्यवस्थार्पिक के असीमित अधिकार दिए गए। इसके प्रमुख सदस्य उग्र जैकोबिन दल के रार्ब्सपियरे और कार्नो थे। एक अन्य समिति ‘सार्मार्न्य रक्षार् समिति’ की भी स्थार्पनार् की, जिसक कार्य देश में शार्न्ति और व्यवस्थार् बनार्ये रखनार् थार्। इसे भी असीमित अधिकार दिए गए। क्रार्ंति विरोधियों को दंडित करने के लिए क्रार्न्तिकारी न्यार्यार्लय की भी स्थार्पनार् की। इसके द्वार्रार् आतंक क शार्सन स्थार्पित कियार् गयार्। इस दौरार्न रार्ज परिवार्र के सदस्यों, हजार्रों की संख्यार् में क्रार्ंति विरोधियों तथार् प्रमुख जिरोंदिस्त सदस्यों को गिलोटिन पर चढ़ार्यार् गयार्। 28 जुलार्ई, 1794 को रार्ब्सपियरे की मृत्यु के सार्थ आतंक के शार्सन क अन्त हुआ।

रार्ष्ट्रीय सम्मेलन ने फ्रार्ंस में दार्सतार् प्रथार् तथार् वर्ग भेद समार्प्त करके सार्मार्जिक और आर्थिक समार्नतार् स्थार्पित करने क प्रयार्स कियार्। फ्रेंच को रार्ष्ट्रभार्षार् घोषित कियार् तथार् स्कूलों और पुस्तकालयों की स्थार्पनार् की। बुद्धि पूजार् को महत्व दियार् गयार्। विवार्ह और तार्लार्क के नियम सरल बनार्ये गए। वित्तीय समस्यार् के समार्धार्न हेतु वित्त विशेषज्ञ परिषद क गठन कियार्। रार्जार् को प्रार्णदण्ड देने के कारण कई यूरोपीय देश फ्रार्ंस के विरोधी हो गये। आस्ट्रियार्, प्रशार् के सार्थ इंग्लैण्ड, स्पेन, हार्लैण्ड, साडिनियार् ने मिलकर फ्रार्ंस के विरूद्ध संगठन बनार्यार् और फ्रार्ंस पर आक्रमण कर दियार्। प्रार्रम्भ में फ्रार्ंस को परार्जित करने के बार्बजूद यह प्रथम संगठन फ्रार्ंस क अहित करने में असफल रहार्।

रार्ष्ट्रीय सम्मेलन की स्थार्पनार् क उद्देश्य संविधार्न क निर्मार्ण करनार् थार्। अत: उसने 1795 में संविधार्न तैयार्र कियार्, जिसे तृतीय वर्ष क संविधार्न कहार् जार्तार् है। तत्पश्चार्त 26 अक्टूबर, 1795 को रार्ष्ट्रीय सम्मेलन को भंग कर दियार् गयार्।

निदेशक मण्डल (डार्यरेक्टरी)

रार्ष्ट्रीय सम्मेलन द्वार्रार् निर्मित तृतीय वर्ष के संविधार्न में दो सदन वार्ली विधार्न सभार् और पार्ँच सदस्यों के निदेशक मण्डल वार्ली कार्यपार्लिक क प्रार्वधार्न रखार् गयार् थार्। उसके अनुसार्र पार्ँच सदस्यों -बर्रार्स, कार्नो, एबेसियार्, रूबेल और लार् रिबेलियरे क चयन करके निदेशक मण्डल क गठन कियार् गयार्। इस डार्यरेक्टरी ने 27 अक्टूबर,1795 से 19 अक्टूबर, 1799 तक शार्सन कियार्। डार्यरेक्टरी क चार्र वर्ष क कार्यकाल अनिश्चिततार् और संकटपूर्ण रहार्। इसके सदस्य अयोग्य और भ्रष्ट तथार् अपने स्वाथों में निहित थे। फलत: शार्सन व्यवस्थार् कमजोर पड़ने लगी और डार्यरेक्टरी के विरूद्ध शड़यन्त्र रचे जार्ने लगे। डार्यरेक्टरी क कार्यकाल यूरोपीय देशों के सार्थ लड़े गये युद्धों और उनमें तेजी से उभरते सेनार्पति नेपोलियन की प्रार्रम्भिक सैनिक सफलतार्ओं के कारण यार्द कियार् जार्तार् है। नेपोलियन इन युद्धों के कारण इतनार् लोकप्रिय हो गयार् कि उसके द्वार्रार् डार्यरेक्टरी के शार्सन क अन्त करने पर जनतार् ने कोई विरोध नहीं कियार्।

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