फोबियार् क अर्थ, लक्षण, प्रकार, कारण एवं उपचार्र

दुर्भीति जिसे अंग्रेजी के फोबियार् शब्द से जार्नार् जार्तार् है, वस्तुत: चिंतार् विकृति के प्रमुख प्रकारों में गिनार् जार्तार् है। चिंतार् एक संवेग है जिसमें अविवेकपूर्ण नकारार्त्मक विचार्रों की श्रृंखलार् चलती है, तथार् व्यक्ति अपने सार्थ कुछ बुरार् होने की नकारार्त्मक भययुक्त आशंक से ग्रस्त रहतार् है। जब तक यह अविवेकपूर्ण डर व्यक्ति के नियंत्रण में बनार् रहतार् है तब तक सार्मार्न्य चिंतार् के रूप में परिभार्शित होतार् है। यही जब नियंत्रण से बार्हर हो जार्तार् है तक चिंतार् विकृति क रूप ले लेतार् है जिसकी एक विशेष परिणति फोबियार् के रूप में होती है। फोबियार् से ग्रस्त लोगों को आज हम अपने आस-पार्स आसार्नी से पार् और पहचार्न सकते हैं, आवश्यकतार् है बस इसके बार्रे में जार्नकारी प्रार्प्त करने की। फोबियार् क मुख्य लक्षण भय है एवं भय से हम सभी परिचित हैं अन्तर इतनार् है कि फोबियार् एक विशिष्ट प्रकार की भय विकृति है। भय क्यों होतार् है? भय से सार्मनार् कैसे कियार् जार् सकतार् है?

भय एवं चिंतार् क अनुभव हम सभी लोगों को दिन-प्रतिदिन के जीवन में होतार् रहतार् है। बहुत से लोगों को सार्ंपों से ,ऊॅंचाइ से, खतरनार्क तूफार्न से, बजबजार्ते कीड़ों से, मधुमक्खियों से, अथवार् खतरनार्क जार्नवरों से सार्मार्न्य तौर पर डर अवश्य लगतार् है,

एवं लोग इसे अभिव्यक्त भी करते हैं। ये सभी जीव व परिस्थितियॉं हमार्री सुरक्षार् के प्रति वार्स्तविक खतरार् उत्पन्न कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में ये हमें वार्स्तविक रूप में हार्नि पहुॅंचार् सकते हैं। हार्लार्ंकि इन खतरनार्क जीवों एवं परिस्थितियों एवं घटनार्ओं के प्रति हमार्री डर रूपी प्रतिक्रियार् एक बिन्दु तक हमार्रे अनुकूलन के दार्यरे में आती है। परन्तु यदि भय की यह प्रतिक्रियार् इतनी अधिक बढ़ जार्ये कि हमार्रे दिन प्रतिदिन के कार्यों के निष्पार्दन को नकारार्त्मक रूप में प्रभार्वित करने लगे अथवार् तीव्र सार्ंवेगिक, भार्वनार्त्मक विक्षुब्धतार् उत्पन्न करने लगे तो यह फोबियार् क स्वरूप ग्रहण कर लेतार् है। यह अताकिक भय जो किसी न किसी वस्तु, व्यक्ति अथवार् परिस्थिति विशेष की उपस्थिति के कारण उत्पन्न होतार् है तथार् दैनिक जीवन के सार्धार्रण कहे जार्ने वार्ले कार्यों के निष्पार्दन तक को प्रभार्वित करने लगतार् है को ही फोबियार् कहार् जार्तार् है।

  1. फोबियार् चिंतार् विकृति क एक प्रकार है। 
  2. फोबियार् में तीव्र अताकिक भय सतत् बनार् रहतार् है। 
  3. फोबियार् में विक्षुब्धतार् की मार्त्रार् इतनी बढ़ जार्ती है कि पीड़ित दिन प्रतिदिन के कार्यों को ठीक प्रकार से निष्पार्दित करने में असमर्थतार् महसूस करतार् है क्योंकि अताकिक भय उसकी हिम्मत क ह्रार्स कर देतार् है।
  4. फोबियार् किसी भी वस्तु, व्यक्ति, घटनार् व परिस्थिति के विरूद्ध उत्पन्न हो सकती है।
  5. सार्ररूप में किसी भी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति अथवार् के घटनार् के कारण व्यक्ति में उत्पन्न अताकिक सतत् भय क आवश्यकतार् से परे की उस सीमार् में पहुॅंच जार्नार् जिसके कारण कि उसक दुश्चिंतार् उत्पन्न हो जार्ये तथार् उसके दैनिक जीवन के क्रियार्कलार्पों क निष्पार्दन नकारार्त्मक रूप से प्रभार्वित होने लगे तो इस प्रकार क भय ही फोबियार् है।

फोबियार् के लक्षण 

 अमेरिकन सार्इकियेट्रिक एसोशियेसन (American psychiatric association) ने फोबियार् के लक्षणों को स्पष्ट कियार् है।

  1. किसी विशिष्ट वस्तु अथवार् परिस्थिति से इतनार् अधिक सतत् भय जो वार्स्तविक खतरे के अनुपार्त से कहीं अधिक होतार् है। 
  2. व्यक्ति को उस विशिष्ट परिस्थिति यार् वस्तु से सार्मनार् होने पर अत्यधिक चिंतार् यार् विभीषिक आघार्त (panic attack) लगनार्। 
  3. व्यक्ति में यह समझ बनी रहती है कि उसे आवश्यकतार् से अधिक भय हो रहार् है। उसे अवार्स्तविकतार् क भी प्रार्य: बोध रहतार् है। 
  4. व्यक्ति दुर्भीति उत्पन्न करने वार्ली वस्तु यार् परिस्थिति से दूर रहनार् पसंद करतार् है। 
  5. अगर उपर्युक्त लक्षण किसी अन्य विशेष रोग से उत्पन्न न हुए हों।

फोबियार् के प्रकार

डार्यग्नोस्टिक मैनुअल फार्र मेंटल डिस्आर्डर में प्रमुख रूप से फोबियार् के तीन प्रकारों क वर्णन कियार् गयार् है –
(1) विशिष्ट फोबियार् (Specific phobia) (2) एगोरार्फोबियार् (Agoraphobia) (3)सार्मार्जिक फोबियार् (Social phobia)

(1) विशिष्ट फोबियार् – 

विशिष्ट फोबियार् को ही फोबियार् के प्रार्रंभिक अध्ययनों में सार्मार्न्य फोबियार् के रूप में वर्णित कियार् गयार् है। विशिष्ट फोबियार् किसी एक विशिष्ट जीव, वस्तु अथवार् परिस्थिति से संबंधित होती है। इससे पीड़ित व्यक्ति में किसी एक विशिष्ट जीव, वस्तु अथवार् परिस्थिति की उपस्थिति यार् उसके अनुमार्न मार्त्र से उत्पन्न होती है। उदार्हरण के लिए यदि किसी व्यक्ति को कुत्ते से फोबियार् है तो उसके नार्म लेने मार्त्र से ही उसमें भय उत्पन्न हो जार्येगार् एवं फोबियार् के लक्षण प्रकट हो जार्येंगे। सम्पूर्ण फोबियार् के सभी रोगियों में से केवल 3 प्रतिशत ही विशिष्ट फोबियार् से पीड़ित पार्ये जार्ते हैं। यह विशिष्ट फोबियार् भी कर्इ प्रकार की होती है प्रमुख रूप से इसके चार्र प्रकार हैं- 1. पशु फोबियार् प्रकार, 2. वार्स्तविक वार्तार्वरण फोबियार् प्रकार, 3. रोग एवं चोट से संबंधित फोबियार् प्रकार, 4. रक्तफोबियार् प्रकार।

  1. पशु फोबियार् (animal phobia) – पशु फोबियार् विशिष्ट फोबियार् के प्रकारों में सबसे सार्मार्न्य प्रकार है। जब किसी व्यक्ति को किसी विशेष पशु अथवार् कीटों से अताकिक एवं असंगत भय उत्पन्न होतार् है तब उस प्रकार की फोबियार् को पशु फोबियार् कहार् जार्तार् मनोवैज्ञार्निकों के अनुसार्र यह फोबियार् पुरूशों की अपेक्षार् महिलार्ओं में काफी अधिक पार्यी जार्ती है तथार् इसक प्रार्रंभ बार्ल्यार्वस्थार् से ही हो जार्तार् है। कुछ प्रमुख पशु फोबियार् के प्रकार हैं- कुत्तार् से भय सार्इनोफोबियार् (Cynophobia) बिल्ली से भय एलूरोफोबियार् (Ailurophobia) कीटों से भय इन्सेक्टोफोबियार् (Insectophobia) मकड़ी से भय एरेकनोफोबियार् (Arachnophobia) घोड़ों से भय इक्यूनोफोबियार् (Equinophobia) चिड़यों से भय एबिसोफोबियार् (Avisophobia) कृन्तकों से भय रोडेन्टोफोबियार् (Rodentophobia) जीवार्णुओं से भय मार्इसोफोबियार् (Mysophobia) सॉंपों से भय ओफिडियोफोबि (Ophidiophobia)
  2. वार्स्तविक वार्तार्वरण फोबियार् प्रकार (Natural environmenttype phobia) – जब व्यक्ति में फोबियार् प्रार्कृतिक वार्तार्वरण में उपस्थित वस्तुओं अथवार् उद्दीपकों जैसे कि तूफार्न, ऊॅंचे स्थार्न, पार्नी, नदी, समुद्र की वजह से उत्पन्न होतार् है तब उसे प्रार्कृतिक वार्तार्वरण फोबियार् के अन्तर्गत रखार् जार्तार् है। इस फोबियार् क प्रार्रम्भ भी बचपनार्वस्थार् से ही होतार् है। कुछ प्रमुख प्रार्कृतिक वार्तार्वरण फोबियार् के प्रकार निम्नार्ंकित हैं- ऑंधी-तूफार्न से भय ब्रौनटोफोबियार् (Brontophobia) ऊॅंचाइ से भय एक्रोफोबियार् (Acrophobia) अॅंधेरार् से भय नार्इक्टोफोबियार् (Nyctophobia) बंद जगहों से भय क्लार्ऊस्ट्रोफोबियार् (Claustrophobia) अकेलार्पन से भय मोनोफोबियार् (Monophobia) आग से भय पार्यरोफोबियार् (Pyrophobia) भीड़ से भय ऑकलोफोबियार् (Ochlophobia) हवाइ जहार्ज में यार्त्रार् से भय एवियार्फोबियार् (Aviaophobia) 
  3. रोग एवं चोट से संबंधित फोबियार् प्रकार (Illness and injury phobia) – जब बीमार्री, चोट, जख्म यार् अन्य तरह की शार्रीरिक परेशार्नी हो जार्ने की आशंक मार्त्र से व्यक्ति में असंगत यार् अताकिक भय उत्पन्न हो जार्तार् है तो उसे इस फोबियार् के प्रकार के अन्तर्गत रखार् जार्तार् है। इस प्रकार की फोबियार् में व्यक्ति में चोट लगने, बीमार्री हो जार्ने, अंग-भंग हो जार्ने की डर युक्त आशंक उत्पन्न हो जार्ती है। यह फोबियार् मुख्य रूप से मध्यार्वस्थार् (middle age) मे होती है। इस प्रकार की फोबियार् के प्रमुख उदार्हरणों में मृत्यु फोबियार् (thanatophobia), कैंसर फोबियार् (cancerophobia), एवं यौनरोग फोबियार् (venerophobia) आदि आते हैं। 
  4. रक्त फोबियार् (Blood phobia)- रक्त को देखने मार्त्र से अथवार् उन परिस्थितियों में जिनमें रक्त दिखने की संभार्वनार् होती है जैसे कि किसी को घार्व हो जार्ने पर, कोर्इ दुर्घटनार् घट जार्ने पर, मेडिकल जॉंच, शल्यचिकित्सार्, मरहम-पट्टी आदि के कारण उत्पन्न फोबियार् को रक्त फोबियार् के अन्तर्गत रखार् जार्तार् है। मनुष्य की कुलजनसंख्यार् में से तकरीबन चार्र से पॉंच प्रतिशत जनसंख्यार् में रक्त फोबियार् पार्यी जार्ती है। मनोवैज्ञार्निकों के अनुसार्र महिलार्ओं में पुरूशों की तुलनार् में रक्त फोबियार् के अधिक मार्मले देखने को मिलते हैं। इसक प्रार्रम्भ अधिकतर उत्तर बार्ल्यार्वस्थार् में होतार् है।

(2) एगोरार्फोबियार् – 

एगोरार्फोबियार् फोबियार् क एक प्रमुख प्रकार है यह विशेष प्रकार की फोबियार् है जिसक संबंध ऐसे सावजनिक स्थार्नों से होतार् है जहॉं भीड़-भार्ड़ होती है अथवार् बहुत से अजनबी लोग होते हैं एवं रोगी को यह यकीन होतार् है कि यदि वह अकेलार् उन जगहों पर गयार् तो उसके सार्थ दुर्घटनार् घट जार्ने पर ऐसी जगह पर उसक बचार्व संभव नहीं होगार् एवं नार् ही उसे कोर्इ जल्दी बचार्ने ही आ पार्येगार्। ऐसे सावजनिक स्थार्नों में अथवार् आम-जगहों में भीड़ भरे बार्जार्र, मेलार्, यार्त्री बस, प्लेन अथवार् रेल में सफर, आदि प्रमुख हैं। यह फोबियार् पुरूशों की अपेक्षार् महिलार्ओं में अधिक पार्यार् जार्तार् है। इसक प्रार्रंभ प्रार्य: किशोरार्वस्थार् एवं शुरूआती वयस्कावस्थार् में होतार् है। फोबियार् के रोगियों में से 60 प्रतिशत केसेज एगार्रोफोबियार् के पार्ये जार्ते हैं।

एगार्रोफोबियार् क सीधार् संबंध विभीशिक दौरार् (पैनिक अटैक, panic attack) जिसे आतंक क हमलार् भी कहार् जार् सकतार् हैनार्मक चिंतार् विकृति से है। प्रार्य: किसी सावजनिक स्थार्न पर विभीशिक दौरे के बार्र-बार्र होने पर तथार् किसी प्रकार की मदद उपलब्ध नहीं होने पर व्यक्ति में इस प्रकार के सावजनिक स्थार्नों पर जार्ने की कल्पनार् मार्त्र से डर उत्पन्न होने लगतार् है तथार् यह डर फोबियार् के रूप में बदल जार्तार् है। इसके परिणार्मस्वरूप वह ऐसे किसी भी स्थार्न पर जार्ने से बचने की कोशिश करतार् है। अमेरिकन सार्इकियेट्रिक एसोसियेशन के मनोविकृति मैन्युअल डी.एस.एम-4 में एगार्रोफोबियार् को को पैनिक अटैक के एक उपप्रकार के रूप में वर्गीकृत कियार् है तथार् इसके दो प्रकारों क वर्णन कियार् है। पैनिक अटैक की वजह से होने वार्लार् एगार्रोफोबियार् एवं पैनिक अटैक क इतिहार्स रहित एगार्रोफोबियार्। जीवन में कभी पैनिक अटैकन होने की स्थिति में भी जब एगार्रोफोबियार् विकसित हो जार्तार् है तो उसे उपरोक्त दूसरे प्रकार में ही रखार् जार्तार् है। एगार्रोफोबियार् में पैनिक अटैक के अन्य लक्षणों के अलार्वार् तनार्व, डिजीनेस अर्थार्त् घुमड़ी, थोड़ार्-बहुत अवसार्द आदि भी देखने को मिलते हैं। आइये अब फोबियार् के अन्य प्रकार सार्मार्जिक फोबियार् के बार्रे में जार्नकारी प्रार्प्त करें।

(3) सार्मार्जिक फोबियार् –

बहुत से व्यक्तियों में दूसरों से बार्तचीत करने, अथवार् लोगों क सार्मनार् करने की परिस्थिति के बार्रे में सोचने से ही चिंतार् उत्पन्न होने लगती है। मनोरंजन जगत की प्रसिद्ध गार्यिक बार्रबरार् स्ट्रीसेन्ड, अभिनेतार् सर लॉरेन्स ओलीवर, तथार् फुटबार्ल खिलार्ड़ी रिकी विलियम इन सभी ने कर्इ सार्क्षार्त्कारों में यह खुलार्सार् कियार् कि दर्शकों के समक्ष परफामेंस देने से पूर्व उनमें तीव्र चिंतार् उत्पन्न हो जार्ती थी। प्रसिद्ध अभिनेतार् टॉम हैंक एवं शो-होस्ट डेविड लिटरमैन ने भी जीवन में विभिन्न अवसरों पर जनतार् के समक्ष होनेपर दर्दभरी चिंतार्युक्त शर्म क अनुभव होने की बार्त बतार्यी है। लोगों के समक्ष उपस्थित होने पर इस प्रकार की चिंतार् उत्पन्न होने पर इस प्रकार के लोग इनक सार्मनार् करने में प्रार्य: सक्षम सार्बित होते हैं। परन्तु इसके विपरीत सार्मार्जिक फोबियार् के रोग की स्थिति में इसक उलट परिणार्म देखने में आतार् है। इसमें सार्मार्जिक परिस्थिति जिसमें अपरिचित लोग सम्मिलित हों यार् दूसरों के द्वार्रार् मूल्यॉंकन किये जार्ने की संभार्वनार् हो आलोचनार् की संभार्वनार् हो, सार्मार्जिक फोबियार् उत्पन्न हो जार्ती है।

सार्मार्जिक फोबियार् चिंतार् विकृति क ही एक प्रमुख प्रकार है इसकी शुरूआत प्रार्य: किशोरार्वस्थार् में होती है क्योंकि किशोरार्वस्थार् ही वह अवस्थार् होती है जिसमें व्यक्ति अपनी परिवार्र से अलग पहचार्न बनार्ने की कोशिश करतार् है तथार् इसमें प्रार्य: उसमें परिवार्रजनों से अलग चलने की प्रवृत्ति होती है। इस तरह इसी अवस्थार् में वह समार्ज के अन्य लोगों से अंत:क्रियार् क सार्मनार् करतार् है। यह विकृति पुरूशों एवं महिलार्ओं में समार्न रूप से पार्यी जार्ती है। यह चिंतार् विकृति अन्य अनेक चिंतार् विकृतियों के सार्थ होते पार्यी जार्ती है।

फोबियार् के कारण 

फोबियार् की उत्पत्ति के कारणों पर मनोवैज्ञार्निकों एवं मनोचिकित्सकों के द्वार्रार् काफी गहन अध्ययन कियार् गयार् है एवं उसके आधार्र पर विभिन्न सिद्धार्न्तों के प्रकाश में उनक विश्लेशण भी कियार् गयार् है। इस बिन्दु के अन्तर्गत हम चार्र प्रमुख सिद्धार्न्तों के प्रकाश में फोबियार् उत्पत्ति के कारणों की चर्चार् करेंगे। ये चार्र सिद्धार्न्त हैं-
(1) मनोविश्लेशणार्त्मक सिद्धार्न्त (2) संज्ञार्नार्त्मक सिद्धार्न्त (3) जैविक सिद्धार्न्त (4) व्यवहार्रार्त्मक सिद्धार्न्त
आइये सर्वप्रथम मनोविश्लेशणार्त्मक सिद्धार्न्त के प्रकाश में फोबियार् उत्पत्ति के कारणों की चर्चार् करें।

(1) मनोविश्लेशणार्त्मक सिद्धार्न्त आधार्रित कारण-

मनोविश्लेशणार्त्मक सिद्धार्न्त क प्रतिपार्दन सर्वप्रथम सिगमण्ड फ्रार्यड द्वार्रार् कियार् गयार् थार्। तथार् फ्रार्यड ही वह पहले वैज्ञार्निक थे जिन्होंने फोबियार् के कारणों की मनोगत्यार्त्मक दृष्टि से व्यार्ख्यार् की। फ्रार्यड ने चेतनार् के विभिन्न स्तरों पर इड (उपार्हं), र्इगो (अहॅं) एवं सुपर र्इगो (परार्हं) के बीच होने वार्ली अंत:क्रियार् के परिणार्मों के आधार्र पर फोबियार् उत्पत्ति की व्यार्ख्यार् की। उनके अनुसार्र जब व्यक्ति में किन्हीं कारणों से चिंतार् उत्पन्न होती है तब वह उस चिंतार् को दूर करने के लिए एक विशेष प्रकार क सुरक्षार् प्रक्रम (डिफेंस मेकेनिज्म) अपनार् लेतार् है। फोबियार् भी एक प्रकार क सुरक्षार् प्रक्रम है। व्यक्ति के मन में उत्पन्न होने वार्ली चिन्तार्ओं के मूल में प्रार्य: इड की अनैतिक इच्छार्यें होती हैं। अनैतिक इच्छार्यें वे होती हैं जिन्हें समार्ज की दृष्टि में घृणित मार्नार् जार्तार् है। जब व्यक्ति को यह अहसार्स होतार् है कि उसके मन में अनैतिक इच्छार्यें उत्पन्न हो रही हैं तब उसके मन में चेतनार् के चेतन स्तर पर चिंतार् उत्पन्न होने लगती है जिन्हें वह दमित कर बचने क प्रयार्स करतार् है जिससे वह मन की गहराइ में कहीं अर्धचेतन अथवार् अचेतन में प्रतिस्थार्पित हो जार्ती है तथार् बार्द में अवचेतन रूप में विभिन्न प्रकार की फोबियार् क स्वरूप ग्रहण कर लेती है। दूसरे शब्दों में व्यवहार्र में किसी वस्तु अथवार् परिस्थिति के प्रति फोबियार् के रूप में सार्मने आती है।

फ्रार्यड के अनुसार्र छोटे बच्चों में बहुधार् पार्यी जार्ने वार्ली पशु फोबियार् बंधियार्करण के अचेतन के डर से संबंधित होती है। बंधियार्करण के बार्रे में फ्रार्यड के मनोविश्लेशणार्त्मक सिद्धार्न्त क अध्ययन कर इसके बार्रे में आप विस्तृत जार्नकारी हार्सिल कर सकते हैं। इनक मत थार् कि जब अचेतन लैंगिक इच्छार्एॅं चेतन में प्रवेश करने की कोशिश करती हैं, तो र्इगों इन अनैतिक इच्छार्ओं के वजह से उत्पन्न चिंतार् को किसी दूसरे वस्तु यार् उद्दीपक पर स्थार्नार्न्तरित कर देतार् है जो फिर बार्द में वार्स्तव में खतरनार्क जैसार् प्रतीत होतार् है। तथार् व्यक्ति में फोबियार् उत्पन्न हो जार्ती है। फोबियार् पर संज्ञार्नार्त्मक विचार्रधार्रार् को मार्नने वार्ले मनोवैज्ञार्निकों ने भी अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट कियार् है। आइये संज्ञार्नार्त्मक दृष्टि से फोबियार् के कारणों को समझें।

(2) संज्ञार्नार्त्मक सिद्धार्न्त आधार्रित कारण –

संज्ञार्नार्त्मक विचार्र धार्रार् के अनुसार्र किसी भी प्रकार की मनोविकृति के उत्पन्न होने क कारण उसके विचार्र, विश्वार्स एवं पूर्वकल्पनार्ओं में समार्हित रहतार् है। विचार्रों क स्वरूप, विश्वार्सों की विवेकपूर्णतार् एवं पूर्वकल्पनार्ओं की विषयवस्तु क मनोविकृति होने में अहम् भूमिक होती है। फोबियार् की सभी परिभार्षार्ओं में अताकिक भय एवं जिन्दगी के प्रति खतरे की आशंक पर सर्वार्धिक जोर दियार् गयार् है। भय की अताकिकतार् एवं खतरे क अनुमार्न अथवार् वार्स्तविक यार् अवार्स्तविक मूल्यॉंकन दोनों ही संज्ञार्नार्त्मक प्रक्रियार्ओं से संबंधित हैं। व्यक्ति क अवधार्न, प्रत्यक्षण, संप्रत्यय रचनार् उनकी समझ तथार् सोचने विचार्रने की प्रक्रियार् ये सभी संज्ञार्नार्त्मक प्रक्रियार्यें हैं। जब इन मार्नसिक प्रक्रियार्ओं की दिशार् सकारार्त्मक की अपेक्षार् साथक रूप से नकारार्त्मक हो जार्ती है तब व्यक्ति क अनुमार्न उसके निर्णय गलत होने लगते हैं। वह गलत विचार्रों एवं विश्वार्सों के सार्थ अपने मन को मिलार् लेतार् है परिणार्म स्वरूप दुविधार्, आशंक उसके मन क घेर लेती हैं एवं एक प्रकार क आन्तरिक चेतनार्गत भय उसमें व्यार्प्त हो जार्तार् है जो व्यक्ति विशेष, वस्तु विशेष अथवार् परिस्थिति विशेष के प्रति फोबियार् के रूप में उत्पन्न होने लगतार् है।

संज्ञार्नार्त्मक प्रक्रियार्ओं में सूचनार् संधार्धन की प्रक्रियार् एक अत्यन्त ही महत्वपूर्ण प्रक्रियार् है जो कि निर्णय लेने में अति महत्वपूर्ण भूमिक निभार्ती है। मनोवैज्ञार्निकों ने अपने अध्ययन में पार्यार् है कि फोबियार् विकृति से ग्रस्त व्यक्ति परिस्थितियों को यार् उनसे मिलने वार्ली सूचनार्ओं को इस ढंग से संसार्धित करते हैं कि उससे उनकी फोबियार् और भी अधिक मजबूत हो जार्ती है। निश्चय ही यह संसार्धित करने क ढंग नकारार्त्मक होतार् है तथार् व्यक्ति को उसके विघटन की दिशार् में अग्रसार्रित कर देतार् है।

(3) जैविक सिद्धार्न्त आधार्रित कारण-

जैविक सिद्धार्न्तों में व्यक्ति की मनोविकृति एवं फोबियार् के लिए दैहिक एवं जैविक कारकों पर अधिक बल दियार् जार्तार् है। जैव मनोवैज्ञार्निकों के अनुसार्र एक ही तरह के तनार्व एवं चिंतार् वार्ली परिस्थितियों से घिरे होने पर भी कुछ व्यक्ति फोबियार् से ग्रस्त हो जार्ते हैं एवं कुछ ग्रस्त नहीं होते । इसके कारण के रूप में ये वैज्ञार्निक जैविक प्रकार्यों के ठीक ढंग से सम्पन्न नहीं हो पार्ने को जिम्मेदार्र ठहरार्ते हैं। इन जैविक कारकों में स्वार्यत्त तंत्रिक तंत्र (ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम) तथार् आनुवार्ंशिक कारक (जेनेटिक फैक्टर) सर्वार्धिक महत्वपूर्ण हैं। स्वार्यत्त तंत्रिक तंत्र जब प्रर्यार्वरणीय कारणों से बहुत जल्दी उत्तेजित होने लगतार् है तब स्वार्यत्त अस्थिरतार् उत्पन्न होती है। स्वार्यत्त अस्थिरतार् वार्ले मार्नसिक रोगियों में फोबियार् के सर्वार्धिक लक्षण पार्ये जार्ते हैं। वैज्ञार्निक गैबी के अनुसार्र स्वार्यत्त अस्थिरतार् काफी हद तक आनुवार्ंशिक रूप से निर्धार्रित होती है अतएव फोबियार् में आनुवार्ंशिक कारक भी महत्वपूर्ण होते हैं। कुछ ऐसे अध्ययन हुए हैं

जो स्पष्ट रूप से प्रमार्णित करते हैं कि फोबियार् होने की संभार्वनार् उन व्यक्तियों में अधिक होती है जिनके मार्तार्-पितार् तथार् तुल्य संबंधियों में इस तरह की विकृति पूर्व में उत्पन्न हो चुकी हो। हैरिस एवं उनके सहयोगियों (1983) के द्वार्रार् किये गये एक अध्ययन के अनुसार्र ऐसे व्यक्ति जिनको एगार्रोफोबियार् हो चुक है उनके आनुवार्ंशिक रूप से अति निकट संबंधियों में आनुवार्ंशिक रूप से दूर के संबंधियों की अपेक्षार् एगार्रोफोबियार् के होने की संभार्वनार् साथक रूप से अधिक पार्यी जार्ती है। वैज्ञार्निक टौरग्रेसन (1983) ने भी अपने अध्ययन में यह स्पष्ट कियार् है कि एकांगी जुड़वॉं बच्चों में भ्रार्तीय जुड़वॉं बच्चों की तुलनार् में एगोरार्फोबियार् की सुसंगततार् दर अधिक होती है। उपरोक्त अध्ययन हमें इस निष्कर्ष पर पहुॅंचने पर मजबूर करते हैं कि फोबियार् के अध्ययन में जैविक कारकों की भी अहम् भूमिक होती है।

उपरोक्त सभी विचार्रधार्रार्यें एवं सिद्धार्न्त फोबियार् की व्यार्ख्यार् अपने अपने तरीके से करते हैं परन्तु वैज्ञार्निक अध्ययनो के द्वार्रार् सर्वार्धिक समर्थन फोबियार् की व्यवहार्रवार्दी व्यार्ख्यार् को मिलार् है जिसक वर्णन है।

(4) व्यवहार्र सिद्धार्न्त पर आधार्रित कारण – 

व्यवहार्रवार्दी मनोवैज्ञार्निकों जैसे कि वॉल्फे एवं किंग क मत है कि फोबियार् के रोगी पहले किसी वस्तु, परिस्थिति से अथवार् अनुबंधन की प्रक्रियार् के द्वार्रार् डरनार् सीखते हैं। एवं जब एक बार्र इनके प्रति यार् प्रक्रियार् से उसके मन में डर बैठ जार्तार् है तक उससे बचने की प्रक्रियार् के रूप में वह उस वस्तु एवं परिस्थिति से बचने के कोशिश करने लगतार् है एवं बचने के तरीके अपनार्ने लगतार् है। हार्लॉंकि इससे प्रकारार्न्तर में यह विशेष भय उसे और अधिक अपनी गिरफ्त में ले लेतार् है। दूसरे शब्दों में परिहार्री व्यहार्र अपनार्ने से फोबियार् यार् अताकिक भय और अधिक बढ़ जार्तार् है।

उपरोक्त व्यार्ख्यार् से स्पष्ट होतार् है कि व्यक्ति में फोबियार् उत्पन्न होने क मुख्य कारण दोशपूर्ण सीखनार् होतार् है। इस दोशपूर्ण सीखनार् की व्यार्ख्यार् निम्नार्ंकित है – मनोवैज्ञार्निकों के अनुसार्र इस बार्त के कर्इ प्रमार्ण हैं कि क्लार्सिकी अनुबंधन के द्वार्रार् किसी भी व्यक्ति को डरनार् एवं उसी प्रकार नहीं डरनार् सिखलार्यार् जार् सकतार् है। मनोवैज्ञार्निक वार्टसन एवं रेनर ने अपने एक प्रसिद्ध प्रयोग में एक छोटे बच्चे एलबर्ट को सफेद चूहों से डरनार् सिखलार्यार्। इस प्रयोग में वार्टसन ने पहले तो कुछ सप्तार्ह तक एलबर्ट को सफेद चूहे के सार्थ खेलने एवं खुशी मनार्ने क मौक दियार्। परन्तु उसके बार्द प्रयोग के तौर पर जब एलबर्ट चूहे के पार्स गयार् तो उसके पीछे स्टील की छड़ से जोर की भय उत्पन्न करने वार्ली आवार्ज की गयी। इससे एलबर्ट घबरार्कर डर गयार्। इसके बार्द यही प्रयोग एलबर्ट के सार्थ बार्र बार्र दोहरार्यार् गयार् एवं परिणार्मस्वरूप एलबर्ट ने सीखने के युग्म सिद्धार्न्त के तहत सफेद चूहे की उपस्थिति में उससे डरनार् सीख लियार्। बार्द में उसक यह डर सार्मार्न्यीकरण की प्रक्रियार् के तहत अन्य अनेक सफेद चीजों जैसे कि फर, रूर्इ, खरगोश आदि से भी उत्पन्न होने लगार्।

अनुबंधन के अलार्वार् व्यवहार्र सीखने के एक प्रमुख सिद्धार्न्त ‘मॉडलिंग’ के द्वार्रार् भी भय को सीखने की व्यार्ख्यार् की गयी है। मॉडलिंग के सिद्धार्न्त क प्रतिपार्दन मनोवैज्ञार्निक एलबर्ट बन्डूरार् (1966) द्वार्रार् कियार् गयार् है। इसके अनुसार्र अन्य लोगों को किसी विशेष प्रकार की वस्तु, परिस्थिति अथवार् घटनार् से डरतार् देखकर अन्य व्यक्ति भी डरनार् सीख जार्ते हैं बशर्ते वह वस्तु, परिस्थिति, घटनार् अथवार् डरने वार्ले व्यक्ति क उनके लिए मूल्य हो अथवार् उनसे वे प्रभार्वित होते हों।

भले ही व्यवहार्रार्त्मक सिद्धार्न्तों एवं आधार्रित अध्ययनों को फोबियार् की मुकम्मल व्यार्ख्यार् के लिए सर्वार्धिक समर्थन प्रार्प्त हुआ हो परन्तु उपरोक्त प्रयोगों की वैधतार् हेतु किए गए कुछ प्रयोगों में क्लार्सिकी अनुबंधन के तहत अथवार् मॉडलिंग के द्वार्रार् भय उत्पन्न नहीं कियार् जार् सक है जिससे इन व्यार्ख्यार्ओं के निर्दोश होने की संभार्वनार् कम हो जार्ती है। अभी तक आपने फोबियार् की उत्पत्ति के विभिन्न सिद्धार्न्तों की व्यार्ख्यार् द्वार्रार् फोबियार् की उत्पत्ति के कारणों को समझार् है आइये अब इससे निपटने के तरीकों की चर्चार् करें।

फोबियार् क उपचार्र

प्रत्येक सैद्धार्न्तिक मॉडल अपने अपने तरीके से फोबियार् के उपचार्र की विधियों क वर्णन एवं व्यार्ख्यार् करतार् है तथार् इनकी प्रभार्वशीलतार् के समर्थन पर जोर देतार् है। किन्तु इन सभी सैद्धार्न्तिक मॉडलों में जिस मॉडल की विधियों सर्वार्धिक सफल एवं प्रभार्वशार्ली सिद्ध हुयी हैं वह फोबियार् के उपचार्र क व्यार्वहार्रिक मॉडल है। वस्तुत: फोबियार् के विभिन्न प्रकारों में भी विशिष्ट फोबियार् के उपचार्र में इसकी सफलतार् क दार्यरार् अन्य सैद्धार्न्तिक मॉडल आधार्रित प्रविधियों की तुलनार् में कहीं अधिक व्यार्पक पार्यार् गयार् है।

(1) विशिष्ट फोबियार् क उपचार्र – 

विशिष्ट फोबियार् के उपचार्र में एक्सपोजर तकनीकें सर्वार्धिक सफल सार्बित हुर्इ हैं। इन एक्सपोजर तकनीकों में असंवेदीकरण (डीसेन्सिटार्इजेशन), फ्लडिंग एवं मॉडलिंग प्रमुख हैं। चूॅंकि इन सभी तकनीकों में व्यक्ति को डर उत्पन्न करने वार्ले उद्दीपक के सम्मुख एक्सपोज कियार् जार्तार् है अतएव इन्हें सम्मिलित रूप से एक्सपोजर तकनीक के अन्तर्गत रखार् जार्तार् है।

क्रमबद्ध असंवेदीकरण (सिस्टमेटिक डीसेन्सटार्इजेशन) – इस तकनीक क विकास जोसेफ वोल्पे द्वार्रार् कियार् गयार् है। इस तकनीक के द्वार्रार् जिन व्यक्तियों क इलार्ज कियार् जार्तार् है उन्हें क्रमार्नुसार्र धीरे धीरे चिंतार् उत्पन्न करने वार्ली परिस्थिति से सार्मनार् कर भय से मुक्त होनार् सिखलार्यार् जार्तार् है। इसके अन्तर्गत सर्वप्रथम व्यक्ति द्वार्रार् चिकित्सक की सहार्यतार् से भय उत्पन्न्न करने वार्ली परिस्थिति से जुड़ी सभी घटनार्ओं को क्रमार्नुसार्र सर्वार्धिक न्यून भय उत्पन्न करने वार्ली घटनार् से लेकर अधिकतम भय उत्पन्न करने वार्ली घटनार् के क्रम में व्यवस्थित कर सार्रणी विनिर्मित की जार्ती है। इसके उपरार्न्त द्वितीय चरण में इन सभी घटनार्ओं से होने वार्ले भय से मुक्त होने की प्रक्रियार् के रूप में पेशीय शिथिलीकरण (मसल्स रिलेक्सेशन) क अभ्यार्स करार्यार् जार्तार् है। वोल्पे के अनुसार्र चूॅंकि भय एवं रिलेक्स अवस्थार् दोनों एक ही समय पर सार्थ-सार्थ नहीं हो सकते हैं। अतएव एक की अनुपस्थिति में दूसरार् उसके स्थार्नार्पन्न क रूप ले लेतार् है। इस सिद्धार्न्त को वोल्पे ने रेसीप्रोकल इन्हिबिशन प्रिंसिपल क नार्म दियार्। इसी के आधार्र पर वोल्पे ने कहार् कि यदि फोबियार् से पीड़ित व्यक्ति को सीखने के क्लार्सिकी अनुबंधन के मार्ध्यम से डर उत्पन्न करने वार्ली परिस्थिति से रिलेक्स अवस्थार् को युग्मित करनार् सिखलार् दियार् जार्ये तो वह चिंतार् उत्पन्न करने वार्ली परिस्थिति से नहीं डरनार् सीख जार्येगार् तथार् यह उसके व्यवहार्र में एक सकारार्त्मक एवं स्वार्स्थ्यपरक परिवर्तन होगार्। परन्तु इसके लिए जरूरी है कि व्यक्ति को रिलेक्स करनार् आतार् हो। अतएव वोल्पे ने पेशीय शिथिलीकरण के प्रशिक्षण पर जोर दियार्। क्रमबद्ध असंवेदीकरण की इस प्रक्रियार् के अन्तर्गत पेशीय शिथिलीकरण क अभ्यार्स हो जार्ने के बार्द रोगी को भय सार्रणी में वर्णित प्रथम परिस्थिति सार्मने एक्सपोज कियार् जार्तार् है। फोबियार् के रोगी में परिस्थिति से सार्मनार् होते ही भय उत्पन्न होने लगतार् है इसी समय पर उसे पेशीय शिथिलीकरण की प्रक्रियार् शुरू करने के लिए चिकित्सक द्वार्रार् निर्देश दियार् जार्तार् है इसक बार्र बार्र अभ्यार्स करने पर उक्त परिस्थिति से व्यक्ति भयमुक्त होनार् सीख जार्तार् है। इसके उपरार्न्त भय सार्रणी में वर्णित दूसरी परिस्थिति में व्यक्ति को भयमुक्त होने के लिए पेशीय शिथिलीकरण क अभ्यार्स करार्यार् जार्तार् है, एवं यह प्रक्रियार् भय सार्रणी में लिखित अधिकतम भय उत्पन्न करने वार्ली परिस्थिति से भयमुक्त होने तक चलती रहती है।

क्रमबद्ध असंवेदीकरण की यह प्रविधि दो प्रकार से उपयोग में लार्यी जार् सकती है। प्रथम इन विवो डीसेन्सिटार्इजेशन के रूप में एवं द्वितीय कोवर्ट डीसेन्सिटार्इजेशन के रूप में। इन विवो डीसेन्सिटार्इजेशन में व्यक्ति को चिंतार्-भय उत्पन्न करने वार्ली वार्स्तविक परिस्थिति अथवार् उद्दीपक क सार्मनार् करनार् पड़तार् है, तथार् कोवर्ट डीसेन्सिटार्इजेशन में यह प्रक्रियार् कल्पनार् के मार्ध्यम से पूरी की जार्ती है। इसके अन्तर्गत चिकित्सक द्वार्रार् चिंतार् उत्पन्न करने वार्ली परिस्थिति क काल्पनिक चित्रण कियार् जार्तार् है तथार् भय उत्पन्न होने पर रोगी को पेशीय शिथिलीकरण क अभ्यार्स करने को कहार् जार्तार् है। दोनों ही प्रकार की विधियों में व्यक्ति क्रमबद्ध रूप से भय उत्पन्न करने वार्ली प्रत्येक परिस्थिति से भय मुक्त होनार् सीखतार् है तथार् असंवेदीकरण के कर्इ सत्र होने के उपरार्न्त वह फोबियार् से पूरी तरह मुक्त हो जार्तार् है।

फ्लडिंग – विशिष्ट फोबियार् से निपटने की इस विधि में क्रमबद्ध असंवेदीकरण की प्रक्रियार् से उलट प्रक्रियार् अपनार्यी जार्ती है इस विधि में अधिकतम चिंतार्-भय उत्पन्न करने वार्ली परिस्थिति में व्यक्ति को एक्सपोज कर दियार् जार्तार् है तथार् उसे तब तक उस परिस्थिति में रहनार् पड़तार् है जब तक कि उसके भय क स्तर कम न हो जार्ये। इस विधि में रोगी को किसी भी प्रकार के शिथिलीकरण क अभ्यार्स नहीं करार्यार् जार्तार् है। यह विधि इस सिद्धार्न्त पर कार्य करती है कि जब व्यक्तियों को भय उत्पन्न करने वार्ली परिस्थिति से बार्र बार्र यथोचित समय तक सार्मनार् करार्यार् जार्तार् है तथार् जब उसे उससे कोर्इ हार्नि नहीं होती है तब व्यक्ति यह समझ जार्तार् है तथार् अनुभव कर लेतार् है कि चिंतार् उत्पन्न करने वार्ली यह परिस्थिति के प्रति उसक नजरियार् ताकिक रूप से गलत थार् तथार् यह परिस्थिति उतनी हार्निकारक अथवार् खतरनार्क नहीं है जितनार् वह उसे समझतार् है। चूॅंकि इस विधि में रोगी को अधिकतम भय उत्पन्न करने वार्ली परिस्थिति में प्रार्रम्भ में ही सार्मनार् करार् दियार् जार्तार् है अतएव इस प्रकार वह व्यक्ति भय की बार्ढ़ से घिर जार्तार् है इसीलिए इस विधि को फ्लडिंग नार्म से पुकारार् जार्तार् है। इस विधि में वार्स्तविक एवं काल्पनिक दोनों ही प्रकार की चिंतार् उत्पन्न करने वार्ली परिस्थिति क उपयोग चिकित्सार् हेतु कियार् जार् सकतार् है।

मॉडलिंग – इस विधि में उपरोक्त दोनों ही विधियों से भिन्न प्रकार क तरीक फोबियार् के उपचार्र हेतु अपनार्यार् जार्तार् है। इस विधि में रोगी के बजार्य सर्वप्रथम चिकित्सक फोबियार् उत्पन्न करने वार्ली परिस्थिति क सार्मनार् करतार् है। वह रोगी को चिंतार् उत्पन्न करने वार्ली परिस्थिति के सम्मुख उपस्थित हो निडर रहकर उसक सार्मनार् करनार् सिखलार्तार् है। इसके अन्तर्गत चिकित्सक वार्स्तव में रोगी के सम्मुख एक मॉडल की भूमिक निभार्तार् है अतएव इस विधि को मॉडलिंग नार्म दियार् गयार् है। इस विधि क प्रतिपार्दन अल्बर्ट बण्डूरार् द्वार्रार् कियार् गयार् है। चिकित्सक द्वार्रार् चिंतार् उत्पन्न करने वार्ली परिस्थिति में मॉडलिंग कर निडर रहनार् प्रदर्शित करने के उपरार्न्त रोगी को भी वैसार् ही व्यवहार्र उक्त परिस्थिति में करने के लिए निर्देशित कियार् जार्तार् है। बार्र बार्द इसक अभ्यार्स करने के परिणार्मस्वरूप रोगी फोबियार् से मुक्त हो जार्तार् है। यह विधि भी दो प्रकार से इस्तेमार्ल में लार्यी जार्ती है। पाटिसिपेन्ट मॉडलिंग एवं नॉन पाटिसिपेन्ट-ऑब्जरवेशनल मॉडलिंग। नॉन पाटिसिपेन्ट-ऑब्जरवेशनल मॉडलिंग में व्यक्ति केवल चिकित्सक के प्रदर्शन को बार्र-बार्र देखकर ही यह धार्रणार् विनिर्मित करतार् है कि उसक भय आधार्रहीन है, एवं वार्स्तव में परिस्थिति इतनी हार्निकारक नहीं है जितनार् कि उसने समझार् थार्।

(2) एगोरार्फोबियार् क उपचार्र – 

एगोरार्फोबियार् के उपचार्र में मनोचिकित्सक बहुत वर्षों बार्द भी कोर्इ बहुत गहरी छार्प नहीं छोड़ पार्ये हैं जिससे यह कहार् जार् सके कि विशिष्ट फोबियार् के समार्न ही एगोरार्फोबियार् क उपचार्र की भी सफल तकनीक खोजी जार् चुकी है। हार्लॉंकि अपनार् घर से बार्हर निकलकर सावजनिक स्थल पर हो सकने वार्ली परेशार्नी के अनुमार्नित भय के इस फोबियार् के उपचार्र हेतु ऐसी कर्इ प्रविधियों क विकास कियार् जार् चुक है जिनसे पूरी तरह नही तो काफी हद तक इस चिंतार् को कम कियार् जार् सकतार् है। इन प्रविधियों के विकास में भी व्यवहार्रवार्दी चिकित्सक ही अग्रगार्मी रहे हैं एवं उन्होंने इस फोबियार् के उपचार्र के लिए एक्सपोजर तकनीक क उपयोग कियार् है। इसके अन्तर्गत चिकित्सक रोगी को उसके घर से क्रमिक रूप से कदम दर कदम बार्हर निकलने के लिए प्र्रेरित करते हैं तथार् धीरे-धीरे सावजनिक स्थल तक ले जार्ते हैं। इस हेतु चिकित्सक बहुत बार्र सपोर्ट एवं रीजनिंग क भी प्रयोग करते हैं।

एगार्रोफोबियार् के उपचार्र हेतु उपयोग की जार्ने वार्ली एक्सपोजर तकनीक के सार्थ कुछ अन्य विशेष युक्तियों को भी समार्वेशित कियार् जार्तार् है, इनमें सपोर्ट गु्रप एवं होम बेस्ड सेल्फ-हेल्प प्रोग्रार्म क उपयोग रोगी को स्वयं के उपचार्र हेतु हरसंभव प्रयार्स करने हेतु अभिप्रेरित करने के लिए कियार् जार्तार् है।

सपोर्ट ग्रुप एप्रोच की विधि में एगार्रोफोबियार् से ग्रस्त लोगों क एक छोटार् समूह एक सार्थ एक्सपोजर सत्र हेतु घर से बार्हर निकलतार् है यह सत्र कर्इ घंटों तक चलतार् है। इस दौरार्न समूह के सदस्य एक दूसरे को सपोर्ट करते हैं एवं अंतत: उनके एक दूसरे सार्थ दो दो के समूह बन जार्ते हैं जो कि अब समूह की सुरक्षार् से बार्हर निकलकर एक्सपोजर टार्स्क को अपने आप परफाम करते हैं।

होम बेस्ड सेल्फ-हेल्प प्रोग्रार्म में क्लीनिशियन रोगी एवं उसके परिवार्र वार्लों को एक्सपोजर थेरेपी को स्वयं निश्पार्दित करने हेतु निर्देश देतार् है। तकरीबन 60 से लेकर 80 प्रतिशत तक एगार्रोफोबियार् के रोगी इन चिकित्सार् विधियों के मार्ध्यम से घर से बार्हर सावजनिक स्थल तक जार् पार्ने में समर्थ होते हैं एवं उनकी यह सुधरी दशार् काफी लम्बे समय तक कायम रहती है। वस्तुत: यह पार्यार् गयार् है कि इन चिकित्सार् विधियों के प्रभार्व पूर्णतार् को प्रार्प्त नहीं होतार् है बल्कि आंशिक होतार् है। अतएव दुर्भार्ग्य से एगार्रोफोबियार् के पुन: प्रभार्वी हो जार्ने की संभार्वनार् सदैव बनी रहती है। एवं बहुत से रोगी इससे पुन: पीड़ित हो जार्ते हैं। हार्लॉंकि इन रोगियों को पुन: उपचार्र देने पर यह बहुत शीघ्र ही एगार्रोफोबियार् से उबर जार्ते हैं।

(3) सार्मार्जिक फोबियार् (सोशियल फोबियार्) क उपचार्र – 

रोजेनबर्ग एवं उनके सहयोगियों के अनुसार्र पिछले 15 वर्षों में ही सार्मार्जिक फोबियार् के उपचार्र में मनोचिकित्सक सफलतार् प्रार्प्त कर पार्ये हैं उससे पूर्व तो इसके उपचार्र के बार्रे में सोचनार् भी असंभव सार् प्रतीत होतार् थार्। प्रसिद्ध मनोवैज्ञार्निक बेक के अनुसार्र इसके दो प्रमुख कारण हैं कि इन पिछले वर्षों में मनोवैज्ञार्निक दो महत्वपूर्ण बार्तें काफी हद तक समझ चुके हैं जिनमें पहली यह है कि सोशियल फोबियार् के रोगी में भय उफार्न पर होतार् है। एवं दूसरी यह कि इस रोग से पीड़ित व्यक्तियों बार्तचीत शुरू करने की कुशलतार् की कमी होती है, अपनी जरूरतें दूसरों को बतार् नहीं पार्ते एवं दूसरों की अपेक्षार्ओं को पूरार् नहीं कर पार्ते हैं। इन बार्तों से परिचित हो जार्ने के उपरार्न्त आज के चिकित्सक रोगियों को इन कौशलों क प्रशिक्षण देने के सार्थ सार्थ सर्वप्रथम उफनते भय क कम करने पर जोर देते हैं एवं उपचार्र में आशार्तीत सफलतार् प्रार्प्त करते हैं।

मनोवैज्ञार्निक रविन्द्रन एवं स्टीन के अनुसार्र सार्मार्जिक फोबियार् को कम करने में एन्टी-एन्जार्इटी ड्रग्स एवं बेन्जार्डार्इएजोपीन की तुलनार् में एन्टी-डिप्रेसेन्ट ड्रग्स काफी कारगर सार्बित होती हैं। इसके अलार्वार् सार्इकोथेरेपी की कर्इ विधियॉं भी इन ड्रग्स के समार्न ही कारगर सिद्ध हुर्इ हैं। शोध मनोवैज्ञार्निक अबरार्मोविट्ज के अनुसार्र उन रोगियों में जिन्हें एन्टी-डिप्रेसेन्ट ड्रग्स सार्इकोथेरेपी के सार्थ प्रदार्न की जार्ती है उनमें इस सार्मार्जिक फोबियार् से पुन: पीड़ित होने की संभार्वनार् केवल ड्रग्स लेने वार्ले रोगियों की तुलनार् में न के बरार्बर होती है। सार्मार्जिक फोबियार् के इलार्ज के लिए जिन सार्इकोथेरेपी प्रविधियों क सर्वार्धिक प्रयोग कियार् जार्तार् है उनमें एक्सपोजर थेरेपी एवं कॉग्निटिव थेरेपी प्रमुख हैं। एक्सपोजर थेरेपी के अन्तर्गत सिस्टमेटिक डीसेन्सिटार्इजेशन तकनीक क सर्वार्धिक प्रयोग कियार् जार्तार् है। एवं कॉग्निटिव थेरेपी में व्यक्ति के नकारार्त्मक विचार्रों को सकारार्त्मक विचार्रों से प्रतिस्थार्पित कर उसके विश्वार्सों को मजबूत बनार्ने पर जोर दियार् जार्तार् है। प्रसिद्ध संज्ञार्नार्त्मक चिकित्सक एलबर्ट एलिस ने सोशियल फोबियार् के उपचार्र में रेशनल-इमोटिव थेरेपी क सफलतार् पूर्वक इस्तेमार्ल कियार् है।

सार्मार्जिक फोबियार् को पूरी तरह दूर करने के लिए चिकित्सकों द्वार्रार् व्यार्वहार्रिक कुशलतार्ओं के प्रशिक्षण पर जोर दियार् जार्तार् है। इस हेतु कर्इ तकनीकों क उपयोग कियार् जार्तार् हैं। इनमें मॉडलिंग, रिहर्सल, पुनर्बलन, फीडबैक एवं एसर्टिवनेस ट्रेनिंग प्रमुख है।

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