प्लेटो क जीवन परिचय एवं शिक्षार् दर्शन

प्लेटो क जन्म 427 र्इसार् पूर्व में एथेन्स के एक अत्यन्त ही समृद्ध तथार् कुलीन परिवार्र में हुआ थार्। उसक पार्लन-पोषण अमीरों की भार्ँति हुआ। पर वैभव और ऐश्वर्य क यह वार्तार्वरण प्लेटो के व्यक्तित्व के विकास को अवरोधित नहीं कर सका। वह बहुआयार्मी व्यक्तित्व क स्वार्मी थार्। उसने तत्कालीन उच्च शिक्षार् प्रार्प्त की थी। वह सुन्दर, आकर्षक और स्वस्थ देह-यष्टि क स्वार्मी थार्। व्यार्यार्म में उसकी गहरी रूचि थी और कुश्ती में भी वह प्रवीण थार्। उसने एथेन्स की सेनार् में भी काम कियार्। वह एक महार्न भार्व-प्रवण कवि थार् और सबसे बढ़कर एक महार्न दाशनिक थार्।

प्रभार्वशार्ली रार्जनीतिक परिवार्र के होने के बार्वजूद प्लेटो को रार्जनीति से अरूचि थी। एथेन्स की तत्कालीन रार्जनीतिक पतन ने प्लेटो को रार्जनीति से पूर्णत: विमुख कर दियार्। एथेन्स जहार्ँ अपनार् प्रभार्व खोतार् जार् रहार् थार् वहीं सैनिक शक्ति में विश्वार्स रखने वार्ले स्पाटार् क प्रभुत्व बढ़तार् जार् रहार् थार्। मैसेडोनियार् भी प्रगति कर रहार् थार्। पेलेपोनेसियन युद्ध के कारण एथेन्स और कमजोर हो गयार्। प्रजार्तंत्र के स्थार्न पर एथेन्स में कुलीन तंत्र क शार्सन हो गयार्। यद्यपि प्रजार्तार्ंत्रिक व्यवस्थार् फिर वार्पस आर्इ- पर इसी शार्सन में प्लेटो के गुरू सुकरार्त को मृत्यु-दंड दियार् गयार्। इस घटनार् ने प्लेटो को रार्जनीति से पूर्णत: विरत कर दियार्।

बीस वर्ष की अवस्थार् में प्लेटो सुकरार्त के सम्पर्क में आयार् तथार् सुकरार्त की मृत्यु तक, यार्नि 399 र्इ0पू0 तक प्लेटो सुकरार्त क प्रिय शिष्य बनार् रहार्। सुकरार्त के व्यक्तित्व एवं ज्ञार्न क प्लेटो पर अत्यधिक प्रभार्व पड़ार्। सुकरार्त के सार्न्निध्य में प्लेटो की दर्शन में गहरी रूचि हो गर्इ। 399 र्इ0 पू0 में जब सुकरार्त को मृत्युदंड दियार् गयार्, प्लेटो की आयु 28 वर्ष की थी। गुरू की हत्यार् के कारण उसक एथेन्स से मोह भंग हो गयार् और उसने अगलार् दस वर्ष एथेन्स से बार्हर मेगार्रार्, मिश्र तथार् इटली में बितार्यार्। यह प्लेटो के जीवन क दूसरार् भार्ग मार्नार् जार् सकतार् है। मेगार्रार् में प्रसिद्ध गणितज्ञ युक्लिड के सार्न्निध्य में पामेनार्इडिस के सिद्धार्न्त क गहन अध्ययन कियार्। मिश्र की सभ्यतार् के विकास ने प्लेटो को बहुत अधिक प्रभार्वित कियार्। इटली में पार्इथार्गोरस के सिद्धार्न्तों क अध्ययन कियार् तथार् इटली में शार्सन व्यवस्थार् की बार्रीकियों को जार्नार्। इस प्रकार दस वर्षो के लम्बे देशार्टन और विद्वार्नों की संगति ने प्लेटो को बौद्धिक तौर पर और परिपक्व बनार्यार्। एथेन्स वार्पस आकर प्लेटो ने अपनी विश्व-प्रसिद्ध शिक्षण संस्थार् ‘एकेडमी’ की स्थार्पनार् की। प्लेटो के जीवन क यह तीसरार् और सबसे अधिक रचनार्त्मक भार्ग थार्। अपने जीवन के अगले चार्लीस वर्षों तक वे इसी संस्थार् के मार्ध्यम से शिक्षार् देते रहे। प्लेटो की मृत्यु 347 र्इ0पू0 हुर्इ, पर एकेडमी इसके उपरार्ंत भी चलती रही। बार्द में रोम के शार्सक की आज्ञार् पर इस एकेडमी को बन्द कर देनार् पड़ार्।

प्लेटो क जीवन-दर्शन 

प्लेटो अपने गुरू सुकरार्त की ही तरह यह मार्नते है कि समय की आवश्यकतार् जीवन में एक नये नैतिक बन्धन (मोरल बॉन्ड) की है। प्लेटो ने जीवन के लिए एक नए नैतिक आधार्र को तैयार्र करने की कोशिश की जिसमें व्यक्ति को पर्यार्प्त अवसर हो तथार् संस्थार्गत जीवन को भी उचित मार्न्यतार् मिले। प्लेटो इस नए नैतिक बन्धन क आधार्र विचार्रों तथार् सावभौमिक एवं शार्श्वत सत्य को मार्नते है। उनके अनुसार्र अच्छाइ ज्ञार्न यार् पूर्ण विचार्रों में समार्हित होतार् है जो कि ‘मत’ से भिन्न होतार् है।

प्लेटो एक आदर्शवार्दी चिन्तक थे जिन्होंने यथाथ तथार् अस्थार्यी की उपेक्षार् की है तथार् सावभौम और स्थार्यी पर बल दियार् है। प्लेटो के लिए दृष्टिगोचर होने वार्ली वस्तुएँ कालसत्तार्त्मक (ऐहिक) है तथार् अदृश्य वस्तुएँ ही नित्य हैं। उसके प्रत्यय दिव्य उपपत्तियार्ं है, तथार् इनक अनुभव ही विज्ञार्न अथवार् ज्ञार्न है। इसके विपरीत वे लोग जो सिद्धार्न्तों क उनके मूर्त प्रतिमूर्तियों से अलग बोध नहीं रखते, ऐसे संसार्र में रहते हैं, जिसे प्लेटो स्वार्पनिक स्थिति कहते हैं। उनक वस्तुओं से परिचय मार्त्र ‘मत’ के समार्न होतार् है, वे यर्थार्थ क बोध तो रखते है, किन्तु सत् के ज्ञार्न से रहित होते है।

आदर्शवार्दी दर्शन भौतिक पदाथ की तुलनार् में विचार्र को स्थार्यी और श्रेष्ठ मार्नतार् है। प्लेटो महार्नतम आदर्शवार्दी शिक्षार्शार्स्त्री थे। उनके अनुसार्र पदाथ जगत, जिसको हम इन्द्रियों से अनुभव करते हैं, वह विचार्र जगत क ही परिणार्म है। विचार्र जगत वार्स्तविक और अपरिवर्तनशील है। इसी से भौतिक संसार्र क जन्म होतार् है। भौतिक पदाथों क अन्त अवश्यम्भार्वी है।

विचार्र जगत क आधार्र प्रत्यय है। प्लेटो के अनुसार्र प्रत्यय पूर्ण होतार् है और इन्द्रियों के सम्पर्क में आने वार्ले भौतिक वस्तु अपूर्ण। प्लेटो ने फेइडरस में सुकरार्त से कहलवार्यार् है कि सत्य यार् वार्स्तविकतार् क निवार्स मार्नव के मस्तिष्क में होतार् है न कि बार्ह्य प्रकृति में। (रॉस: 61) ज्ञार्नी मार्नव वह है जो दृष्टि जगत पर ध्यार्न न देकर प्रत्ययों के ज्ञार्न की जिज्ञार्सार् रखतार् है- क्योंकि प्रत्ययों क ज्ञार्न ही वार्स्तविक ज्ञार्न है। ज्ञार्न तीन तरह के होते है- (i) इन्द्रिय-जन्य ज्ञार्न (ii) सम्मति जन्य ज्ञार्न तथार् (iii) चिन्तन यार् विवेक जन्य ज्ञार्न। इनमें से प्रथम दो अधूरार्, अवार्स्तविक एवं मिथ्यार् ज्ञार्न है जबकि चिन्तन यार् विवेकजन्य (प्रत्ययों का) ज्ञार्न इन्द्रियार्तीत होने के कारण वार्स्तविक, श्रेष्ठ एवं अपरिवर्तनशील है। व्यक्ति किसी भी पदाथ को अपनी दृष्टि से देखकर उसकी व्यार्ख्यार् करतार् है।- दूसरार् व्यक्ति उसी पदाथ की उससे भिन्न अर्थ ग्रहण कर सकतार् है। इस तरह से सम्मति भिन्न हो सकती है। अत: इसे ज्ञार्न कहनार् उचित नहीं है। प्लेटो ने रेखार्गणित के सिद्धार्न्तों को बेहतर ज्ञार्न कहार्। जैसे त्रिभुज की दो भुजार् मिलकर तीसरी भुजार् से बड़ी होती है- यह सभी त्रिभुजों के लिए सही है। इससे भी अधिक श्रेष्ठ ज्ञार्न प्लेटो ने तत्व ज्ञार्न को मार्नार्।

प्लेटो ने संसार्र को सत् और असत् दोनों क संयोग मार्नार् है। प्रत्ययों पर आधार्रित होने के कारण संसार्रिक पदाथ सत् है पर समरूपतार् क आभार्व एवं क्षणभंगुरतार् उसे असत् बनार् देतार् है। प्लेटो ने दृष्टि जगत को द्रष्टार् की क्रियार् क फल मार्नार् है। प्लेटो आत्मार् की अमरतार् को स्वीकार करते हुए इसे परम विवेक क अंश मार्नतार् है।

नैतिक मूल्यों के सिद्धार्न्त को प्लेटो के संवार्द में उच्च स्थार्न मिलार् है। सोफिस्टों ने यह धार्रणार् फैलार्यी थी कि गलत और सही परिस्थिति विशेष पर निर्भर करतार् है। जो एक समय और स्थार्न पर सही है वह दूसरे समय और स्थार्न पर गलत हो सकतार् है। प्लेटो सुकरार्त के मार्ध्यम से इस अवसरवार्दी विचार्रधार्रार् क विरोध करते हुए कहते हैं कि नैतिक मूल्य शार्श्वत हैं। फेडो में प्लेटो ने सम्पूर्ण सुन्दरतार्, सम्पूर्ण अच्छाइ तथार् सम्पूर्ण महार्नतार् की बार्त की है। इस संसार्र में जो भी सुंदर यार् अच्छार् है वह इसी सम्पूर्ण सुन्दरतार् यार् अच्छाइ क अंश है। सर्वोच्च सत्य से ही अन्य जीव एवं पदाथ अपनार् अस्तित्व प्रार्प्त करते हैं।

यद्यपि प्लेटो ने सर्वोच्च सत्य यार् सत्तार् को र्इश्वर यार् गॉड के नार्म से नहीं पुकारार् (रॉस,71) पर इसी परम सत्य क अंश मार्नव की आत्मार् को मार्नार्। प्लेटो के अनुसार्र इस संसार्र और जीवन से परे भी एक संसार्र और जीवन है जो अधिक सत्य, अधिक सुंदर तथार् अधिक वार्स्तविक है। आदर्श जीवन क उद्देश्य शिवत्व (अच्छाइ) एवं सुन्दरतार् प्रार्प्त करनार् बतार्तार् है ।

प्लेटो की रचनार्यें 

शिक्षार् की दृष्टि से प्लेटो की सर्वार्धिक महत्वपूर्ण कृति ‘दि रिपब्लिक’ है। रूसो ने ‘दि रिपब्लिक’ क निरपेक्ष मूल्यार्ंकन करते हुए कहार् ‘‘अगर आप जार्ननार् चार्हते हैं कि पब्लिक (सावजनिक) शिक्षार् क क्यार् अर्थ है तो प्लेटो क रिपब्लिक पढ़िये। जो पुस्तकों के संदर्भ में केवल नार्म यार् शीर्षक से निर्णय लेते हैं वे इसे रार्जनीति से सम्बन्धित मार्नते हैं, जबकि शिक्षार् पर कभी भी लिखी गर्इ यह सर्वोत्तम कृति है।’’ इस तरह से दि रिपब्लिक को शिक्षार् शार्स्त्रियों ने अपने विषय क उत्कृष्टम ग्रंथ मार्नार् है। इसके प्रार्रम्भिक पृष्ठों में सुकरार्त को अपने मित्रों एवं शिष्यों के सार्थ न्यार्य पर आधार्रित रार्ज्य की कल्पनार् करते दिखार्यार् गयार् है। इसके लिए न्यार्य प्रिय नार्गरिक होनार् चार्हिए। इस तरह से न्यार्य की प्रकृति पर विमर्श वस्तृत: शिक्षार् पर विमर्श बन जार्तार् है।

प्लेटो ने अनेक पुस्तक (संवार्द) लिखे। इन संवार्दों को भार्षार् और शैली के आधार्र पर सर डेविड रॉस ने रचनार्काल को तय कर क्रमबद्ध करने क प्रयार्स कियार् है।

  1. प्रथम काल (389 र्इ0पू0 से पहले)- कैरेमिडेस, लैचेज, यूथार्इफ्रो, हिपियस मेजर तथार् मेनो। 
  2. द्वितीय काल (389 र्इ0पू0 से 367 र्इ0पू0)- क्रेटार्इलस, सिम्पोजिसम, फैडो, दि रिपब्लिक, फेयड्रस, परमेन्डिस तथार् थियेटिटस। 
  3. तृतीय काल (366 र्इ0पू0 से 361 र्इ0पू0)- सोफिस्टस तथार् पोलिटिक्स 
  4. चतुर्थ काल (361 र्इ0पू0 के उपरार्न्त)- दि लॉज। 

इस सूची में पूर्व में लिखे संवार्दों जैसे दि एपोलॉजी, क्रीटो, लोइसिस, प्रेटार्गोरस, यूथिडेमस को नहीं रखार् है क्योंकि ये संवार्द प्लेटो के विचार्रों पर बहुत ही कम प्रकाश डार्लते हैं। सभी रचनार्यें संवार्द यार् वात्तार्लार्प पद्धति में हैं। संवार्दों में सुकरार्त को सभी ज्ञार्न क स्रोत दिखार्कर प्लेटो अपने गुरू को अद्वितीय श्रद्धार्ंजलि देतार् है।

प्लेटो क शिक्षार्-दर्शन 

सुकरार्त एवं प्लेटो के पूर्व सोफिस्टों क प्रभार्व थार् पर उनकी शिक्षार् अव्यवस्थित थी तथार् इससे कम ही व्यक्ति लार्भार्न्वित हो सकते थे क्योंकि सोफिस्टों द्वार्रार् दी जार्ने वार्ली शिक्षार् नि:शुल्क नहीं थी और इस शुल्क को चुकाने में कुछ ही लोग सक्षम थे। सोफिस्टों ने शिक्षार् के उद्देश्य को सीधी उपयोगितार् से जोड़ दियार् इससे भी वे लोगों की घृणार् के पार्त्र बने। क्योंकि ग्रीस की प्रबुद्ध जनतार् शिक्षार् को अवकाश हेतु प्रशिक्षण मार्नती थी न कि जीवन के भरण-पोषण क मार्ध्यम। पेलोपोनेसियन युद्ध में एथेन्स की हार्र को लोगों ने सोफिस्टों की शिक्षार् क परिणार्म मार्नार्। फलत: उनक प्रभार्व क्षीण हुआ और सुकरार्त तथार् उसके योग्तम शिष्य प्लेटो को एक बेहतर शिक्षार् व्यवस्थार् के विकास के लिए उचित पृष्ठभूमि मिली।

मार्नव इतिहार्स में शिक्षार् के सम्बन्ध में प्रथम पुस्तक प्लेटो द्वार्रार् रचित ‘रिपब्लिक’ है। जिसे रूसो ने शिक्षार् की दृष्टि से अनुपम कृति मार्नार्। इसके अतिरिक्त ‘लार्ज’ में भी शिक्षार् के सम्बन्ध में प्लेटो के विचार्र मिलते हैं। तत्कालीन प्रजार्तंत्र हो यार् कुलीनतंत्र, रार्जनीति स्वाथ पूर्ति क सार्धन बन गर्इ थार्। “ार्ड़यंत्रों, संघर्षो एवं युद्धों की जगह समदश्र्ार्ी शार्सन जो नार्गरिकों के बीच सद्भार्वनार् को बढ़ार् सके के महार्न उद्देश्य की प्रार्प्ति के लिए प्लेटो ने एक नये समार्ज की रचनार् आवश्यक मार्नार्। इस तरह के समार्ज की रचनार् क सर्वप्रमुख सार्धन प्लेटो ने शिक्षार् को मार्नार्। समार्ज संघर्ष विहीन तभी होगार् जब अपने-अपने गुणों के अनुसार्र सभी लोग शिक्षित होंगे।

प्लेटो ने शिक्षार् को अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय मार्नार् है। दि रिपब्लिक में प्लेटो इसे युद्ध, युद्ध क संचार्लन एवं रार्ज्य के शार्सन जैसे महत्वपूर्ण विषयों में से एक मार्नतार् है। दि लॉज में शिक्षार् को प्रथम तथार् सर्वोत्तम वस्तु मार्नार् है जो मार्नव को प्रार्प्त करनी चार्हिए। दि क्रिटो में अपनी बार्त पर बल देते हुए प्लेटो कहते हैं ‘‘वैसे मार्नव को बच्चों को जन्म नही देनार् चार्हिए जो उनकी उचित देखभार्ल और शिक्षार् के लिए दृढ़ नहीं रह सकते।’’

जैसार् कि हमलोग देख चुके हैं आदर्शवार्दी विचार्रक भौतिक जगत की अपेक्षार् आध्यार्त्मिक यार् वैचार्रिक जगत को अधिक वार्स्तविक और महत्वपूर्ण मार्नते है। अंतिम यार् सर्वोच्च सत्य भौतिक जगत की अपेक्षार् आध्यार्त्मिक यार् वैचार्रिक जगत के अधिक समीप है क्योंकि ‘सत्य’ यार् ‘वार्स्तविक’ की प्रकृति भौतिक प्रकृति न होकर आध्यार्त्मिक है। अत: आदर्शवार्दियों के लिए भौतिक विज्ञार्नों की जगह मार्नविकी- यार्नि जो विषय स्वयं मार्नव क अध्ययन करतार् है अधिक महत्वपूर्ण है। वस्तुनिष्ठ तथ्यों के अध्ययन की जगह संस्कृति कलार्, नैतिकतार्, धर्म आदि क अध्ययन हमें सही ज्ञार्न प्रदार्न करतार् है।

शिक्षार् क उद्देश्य 

प्लेटो शिक्षार् को सार्री बुरार्इयों को जड़ से समार्प्त करने क प्रभार्वशार्ली सार्धन मार्नतार् है। शिक्षार् आत्मार् के उन्नयन के लिए आवश्यक है। शिक्षार् व्यक्ति में सार्मार्जिकतार् की भार्वनार् क विकास कर उसे समार्ज की आवश्यकतार्ओं को पूरार् करने में सक्षम बनार्ती है। यह नैतिकतार् पर आधार्रित जीवन को जीने की कलार् सिखार्ती है। यह शिक्षार् ही है जो मार्नव को सम्पूर्ण जीव जगत में सर्वश्रेष्ठ प्रार्णी होने क गौरव प्रदार्न करतार् है। प्लेटो ने शिक्षार् के निम्नलिखित महत्वपूर्ण उद्देश्य बतार्ये:-

  1. बुरार्इयों की समार्प्ति एवं सद्गुणों क विकास:- अपने सर्वप्रसिद्ध ग्रन्थ रिपब्लिक में प्लेटो स्पष्ट घोषणार् करतार् है कि ‘अज्ञार्नतार् ही सार्री बुरार्इयों की जड़ है। सुकरार्त की ही तरह प्लेटो सद्गुणों के विकास के लिए शिक्षार् को आवश्यक मार्नतार् है। प्लेटो बुद्धिमत्तार् को सद्गुण मार्नतार् है। हर शिशु में विवेक निष्क्रिय रूप में विद्यमार्न रहतार् है- शिक्षार् क कार्य इस विवेक को सक्रिय बनार्नार् है। विवेक से ही मार्नव अपने एवं रार्ष्ट्र के लिए उपयोगी हो सकतार् है।
  2. सत्य, शिव (अच्छाइ एवं सुन्दर) की प्रार्प्ति:- प्लेटो एवं अन्य प्रार्च्य एवं पार्श्चार्त्य आदर्शवार्दी चिन्तक यह मार्नते हैं कि जो सत्य है वह अच्छार् (शिव) है और जो अच्छार् है वही सुन्दर है। सत्य, शिव एवं सुन्दर ऐसे शार्श्वत मूल्य हैं जिसे प्रार्प्त करने क प्रयार्स आदर्शवार्दी शिक्षार्शार्स्त्री लगार्तार्र करते रहे हैं। प्लेटो ने भी इसे शिक्षार् क एक महत्वपूर्ण उद्देश्य मार्नार्।
  3. रार्ज्य को सुदृढ़ करनार्:- सुकरार्त एवं प्लेटो के काल में ग्रीस में सोफिस्टों ने व्यक्तिवार्दी सोच पर जोर दियार् थार्। लेकिन आदर्शवार्दी शिक्षार्शार्स्त्रियों की दृष्टि में रार्ज्य अधिक महत्वपूर्ण है। रार्ज्य पूर्ण इकार्इ है और व्यक्ति वस्तुत: रार्ज्य के लिए है। अत: शिक्षार् के द्वार्रार् रार्ज्य की एकतार् सुरक्षित रहनी चार्हिए। शिक्षार् के द्वार्रार् विद्याथियों में सहयोग, सद्भार्व और भार्तश्त्व की भार्वनार् क विकास होनार् चार्हिए। 
  4. नार्गरिकतार् की शिक्षार्:- न्यार्य पर आधार्रित रार्ज्य की स्थार्पनार् के लिए अच्छे नार्गरिकों क निर्मार्ण आवश्यक है जो अपने कर्तव्यों को समझें और उसके अनुरूप आचरण करें। प्लेटो शिक्षार् के द्वार्रार् नर्इ पीढ़ी में दार्यित्व बोध, संयम, सार्हस, युद्ध-कौशल जैसे श्रेष्ठ गुणों क विकास करनार् चार्हते थे। तार्कि वे नार्गरिक के दार्यित्वों क निर्वहन करते हुए रार्ज्य को शक्तिशार्ली बनार् सकें। 
  5. सन्तुलित व्यक्तित्व क विकास:- प्लेटो के अनुसार्र मार्नव-जीवन में अनेक विरोधी तत्व विद्यमार्न रहते हैं। उनमें सन्तुलन स्थार्पित करनार् शिक्षार् क एक महत्वपूर्ण कार्य है। सन्तुलित व्यक्तित्व के विकास एवं उचित आचार्र-विचार्र हेतु ‘स्व’ को नियन्त्रण में रखनार् आवश्यक है। शिक्षार् ही इस महत्वपूर्ण कार्य क सम्पार्दन कर सकती है। 
  6. विभिन्न सार्मार्जिक वर्गों को सक्षम बनार्नार्:- जैसार् कि हमलोग देख चुके हैं प्लेटो ने व्यक्ति के अन्तर्निहित गुणों के आधार्र पर समार्ज क तीन वर्गों में विभार्जन कियार् है। ये हैं: संरक्षक, सैनिक तथार् व्यवसार्यी यार् उत्पार्दक वर्ग। दार्सों की स्थिति के बार्रे में प्लेटो ने विचार्र करनार् भी उचित नहीं समझार्। पर ऊपर वर्णित तीनों ही वर्णों को उनकी योग्यतार् एवं उत्तरदार्यित्व के अनुरूप अधिकतम विकास की जिम्मेदार्री शिक्षार् की ही मार्नी गर्इ। 

इस प्रकार प्लेटो शिक्षार् को अत्यन्त महत्वपूर्ण मार्नतार् है। व्यक्ति और रार्ज्य दोनों के उच्चतम विकास को प्रार्प्त करनार् प्लेटो की शिक्षार् क लक्ष्य है। वस्तुत: शिक्षार् ही है जो जैविक शिशु में मार्नवीय गुणों क विकास कर उसे आत्मिक बनार्ती है। इस प्रकार प्लेटो की दृष्टि में शिक्षार् क उद्देश्य अत्यन्त ही व्यार्पक है।

पार्ठ्यक्रम 

हमलोग पहले ही देख चुके हैं कि आदर्शवार्दी शिक्षार्शार्स्त्री मार्नविकी यार् मार्नव-जीवन से सम्बन्धित ज्ञार्न को भौतिक ज्ञार्न से सम्बन्धित विषयों से अधिक महत्वपूर्ण मार्नते हैं। उसके अनुसार्र जीवन के प्रथम दस वर्षों में विद्याथियों को अंकगणित, ज्यार्मिति, संगीत तथार् नक्षत्र विद्यार् क ज्ञार्न प्रार्प्त करनार् चार्हिए। गणित आदि की शिक्षार् व्यार्पार्र की दृष्टि से न होकर उनमें निहित शार्श्वत सम्बन्धों को जार्नने के लिए होनार् चार्हिए। संगीत के गणित शार्स्त्रीय आधार्रों की सिफार्रिश करते हुए प्लेटो कहतार् है यह शिवम् एवं सुन्दरम् के अन्वेषण में एक उपयोगी सत्य है। यदि इसक अन्य उद्देश्य को ध्यार्न में रखकर अनुसरण कियार् जार्ए तो यह अनुपयोगी है।

इसके उपरार्ंत विद्याथियों को कवितार्, गणित, खेल-कूद, कसरत, सैनिक-प्रशिक्षण, शिष्टार्चार्र तथार् धर्मशार्स्त्र की शिक्षार् देने की बार्त कही गर्इ। प्लेटो ने खेल-कूद को महत्वपूर्ण मार्नार् लेकिन उसक उद्देश्य प्रतियोगितार् जीतनार् न होकर स्वस्थ शरीर तथार् स्वस्थ मनोरंजन प्रार्प्त करनार् होनार् चार्हिए। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क तथार् आत्मार् क निवार्स संभव है। प्लेटो की शिक्षार् व्यवस्थार् में जिम्नार्स्टिक (कसरत) एवं नृत्य को महत्वपूर्ण स्थार्न प्रार्प्त है। प्लेटो ने इन दोनों के समन्वय क आग्रह कियार् है। वे मार्नते थे कि ‘कसरत विहीन संगीतज्ञ कायर होगार्, जबकि संगीत विहीन कसरती पहलवार्न आक्रार्मक पशु हो जार्येगार्।’ प्लेटो ने नृत्य को कसरत क ही अंग मार्नते हुए उसे युद्धकाल और शार्ंतिकाल- दोनों में ही उपयोगी मार्नते हैं।

प्लेटो ने सार्हित्य, विशेषकर काव्य की शिक्षार् को महत्वपूर्ण मार्नार् है। काव्य बौद्धिक संवेदनशील जीवन के लिए आवश्यक है। गणित को प्लेटो ने ऊँचार् स्थार्न प्रदार्न कियार् है। रेखार्गणित को प्लेटो इतनार् अधिक महत्वपूर्ण मार्नते थे कि उन्होंने अपनी शैक्षिक संस्थार् ‘एकेडमी’ के द्वार्र पर लिखवार् रखार् थार् कि ‘जिसे रेखार्गणित न आतार् हो वे एकेडमी में प्रवेश न करें।’ इन विषयों में तर्क क प्रयोग महत्वपूर्ण है- और सर्वोच्च प्रत्यय- र्इश्वर की प्रार्प्ति में तर्क सहार्यक है।

प्लेटो की शिक्षार्-व्यवस्थार् में ‘डार्इलेक्टिक’ यार् दर्शन क महत्वपूर्ण स्थार्न है। प्लेटो के ‘डार्इलेक्टिक’ में नीतिशार्स्त्र, दर्शन, मनोविज्ञार्न, अध्यार्त्मशार्स्त्र, प्रशार्सन, कानून, जैसे विषय समार्हित हैं। इनक अध्ययन उच्चस्तरीय विद्याथियों को करार्नार् चार्हिए। यह प्लेटो की शिक्षार्-व्यवस्थार् क सर्वोच्च हिस्सार् है। डार्इलेक्टिक क अध्ययन वस्तुत: दाशनिकों के लिए है जो रार्ज्य क संचार्लन करेंगे। दाशनिक के पार्ठ्यविषय में प्लेटो संगीत तथार् व्यार्यार्म जैसे विषयों को अपर्यार्प्त कह कर अस्वीकृत कर देतार् है, क्योंकि ये विषय परिवर्तनीय हैं, इसके विपरीत जिन विज्ञार्नों क वह अन्वेषक है उन्हें सत् की विवेचनार् करनी चार्हिए: उनमें सर्वगत अनुप्रयोग तथार् सार्थ ही चितनोन्मुख बनार्ने की क्षमतार् होनी चार्हिए। जिस पार्ठ्यक्रम की संस्तुति प्लेटो ने की उसमें गणित, ज्यार्मिति, ज्योतिष विद्यार् (खगोल विज्ञार्न) सम्मिलित थे। हस्तकलार्ओं को अपमार्नजनक कहकर बहिष्कश्त करने में वह अपनी कुलीन वर्गीय तथार् सीमित रूझार्न क परिचय देतार् है।

शिक्षार् के स्तर 

प्लेटो ने आधुनिक मनोवैज्ञार्निकों की तरह बच्चे के शार्रीरिक एवं मार्नसिक विकास की अवस्थार् के आधार्र पर शिक्षार् को विभिन्न स्तरों में विभार्जित कियार् है। ये विभिन्न स्तर हैं- ;

  1. शैशवार्वस्थार्:- जन्म से लेकर तीन वर्ष शैशव-काल है। इस काल में शिशु को पौष्टिक भोजन मिलनार् चार्हिए और उसक पार्लण-पोषण उचित ढ़ंग से होनार् चार्हिए। चूँकि प्लेटो के आदर्श रार्ज्य में बच्चे रार्ज्य की सम्पत्ति है अत: रार्ज्य क यह कर्तव्य है कि वह बच्चे की देखभार्ल में कोर्इ ढ़ील नहीं होने दे। 
  2. नर्सरी शिक्षार्:- इसके अन्र्तगत तीन से छह वर्ष की आयु के बच्चे आते हैं। इस काल में शिक्षार् प्रार्रम्भ कर देनी चार्हिए। इसमें कहार्नियों द्वार्रार् शिक्षार् दी जार्नी चार्हिए तथार् खेल-कूद और सार्मार्न्य मनोरंजन पर बल देनार् चार्हिए।
  3. प्रार्रम्भिक विद्यार्लय की शिक्षार्:- इसमें छह से तेरह वर्ष के आयु वर्ग के विद्यार्थ्र्ार्ी रहते हैं। वार्स्तविक विद्यार्लयी शिक्षार् इसी स्तर में प्रार्रम्भ होती है। बच्चों को रार्ज्य द्वार्रार् संचार्लित शिविरों में रखार् जार्नार् चार्हिए। इस काल में लड़के-लड़कियों की अनियन्त्रित क्रियार्ओं को नियन्त्रित कर उनमें सार्मन्जस्य स्थार्पित करने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है। इस काल में संगीत तथार् नृत्य की शिक्षार् देनी चार्हिए। नृत्य एवं संगीत विद्यार्थ्र्ार्ी में सम्मार्न एवं स्वतंत्रतार् क भार्व तो भरतार् ही है सार्थ ही स्वार्स्थ्य सौन्दर्य एवं शक्ति की भी वृद्धि करतार् है। इस काल में गणित एवं धर्म की शिक्षार् भी प्रार्रम्भ कर देनी चार्हिए। रिपब्लिक इसी अवधि में अक्षर-ज्ञार्न देने की संस्तुति करतार् है पर दि लॉज के अनुसार्र यह कार्य तेरहवें वर्ष में प्रार्रम्भ करनार् चार्हिए। 
  4. मार्ध्यमिक शिक्षार्:- यह काल तेरह से सोलह वर्ष की उम्र की है। अक्षर ज्ञार्न की शिक्षार् पूरी कर काव्य-पार्ठ, धामिक सार्मग्री क अध्ययन एवं गणित के सिद्धार्न्तों की शिक्षार् इस स्तर पर दी जार्नी चार्हिए।
  5. व्यार्यार्म (जिमनैस्टिक) काल:- यह सोलह से बीस वर्ष की आयु की अवधि है। सोलह से अठार्रह वर्ष की आयु में युवक-युवती व्यार्यार्म, जिमनैस्टिक, खेल-कूद द्वार्रार् शरीर को मजबूत बनार्ते हैं। स्वस्थ एवं शक्तिशार्ली शरीर भार्वी सैनिक शिक्षार् क आधार्र है। अठार्रह से बीस वर्ष की अवस्थार् में अस्त्र-शस्त्र क प्रयोग, घुड़सवार्री, सैन्य-संचार्लन, व्यूह-रचनार् आदि की शिक्षार् एवं प्रशिक्षण दियार् जार्तार् है। 
  6. उच्च शिक्षार्:- इस स्तर की शिक्षार् बीस से तीस वर्ष की आयु के मध्य दी जार्ती है। इस शिक्षार् को प्रार्प्त करने हेतु भार्वी विद्याथियों को अपनी योग्यतार् की परीक्षार् देनी होगी और केवल चुने हुए योग्य विद्यार्थ्र्ार्ी ही उच्च शिक्षार् ग्रहण करेंगे। इस काल में विद्याथियों को अंकगणित, रेखार्गणित, संगीत, नक्षत्र विद्यार् आदि विषयों क अध्ययन करनार् थार्।
  7. उच्चतम शिक्षार्:- तीस वर्ष की आयु तक उच्च शिक्षार् प्रार्प्त किए विद्याथियों को आगे की शिक्षार् हेतु पुन: परीक्षार् देनी पड़ती थी। अनुत्तीर्ण विद्यार्थ्र्ार्ी विभिन्न प्रशार्सनिक पदों पर कनिष्ठ अधिकारी के रूप में कार्य करेंगे। सफल विद्याथियों को आगे पार्ँच वर्षों की शिक्षार् दी जार्ती है। इसमें ‘डार्इलेक्टिक’ यार् दर्शन क गहन अध्ययन करने की व्यवस्थार् थी। इस शिक्षार् को पूरी करने के बार्द वे फिलॉस्फर यार् ‘दाशनिक’ घोषित हो जार्ते थे। ये समार्ज में लौटकर अगले पन्द्रह वर्ष तक संरक्षक के रूप में प्रशिक्षित होंगे और व्यार्वहार्रिक अनुभव प्रार्प्त करेंगे। रार्ज्य क संचार्लन इन्हीं के द्वार्रार् होगार्। 

शिक्षण-विधि 

प्लेटो के गुरू, सुकरार्त, संवार्द (डार्यलॉग) द्वार्रार् शिक्षार् देते थे- प्लेटो भी इसी पद्धति को पसन्द करते थे। प्लेटो ने संवार्द के द्वार्रार् मार्नव जीवन के हर आयार्म पर प्रकाश डार्लार् है। एपार्लोजी एक अत्यधिक चर्चित संवार्द है जिसमें सुकरार्त अपने ऊपर लगार्ए गए समस्त आरोपों को निरार्धार्र सिद्ध करते है। ‘क्रार्इटो’ एक ऐसार् संवार्द है जिसमें वे कीड़ो के सार्थ आत्मार् के स्वरूप क विवेचन करते हैं। प्लेटो अपने गुरू सुकरार्त के संवार्द को स्वीकार कर उसक विस्तार्र करतार् है। उसने संवार्द को ‘अपने सार्थ निरन्तर चलने वार्लार् संवार्द’ कहार् (मुनरो, 1947: 64)। सुकरार्त ने इसकी क्षमतार् सभी लोगों में पाइ पर प्लेटो के अनुसार्र सर्वोच्च सत्य यार् ज्ञार्न प्रार्प्त करने की यह शक्ति सीमित लोगों में ही पार्यी जार्ती है। शार्श्वत सत्य क ज्ञार्न छठी इन्द्रिय यार्नि विचार्रों क इन्द्रिय क कार्य होतार् है। इस प्रकार सुकरार्त अपने समय की प्रजार्तार्ंत्रिक धार्रार् के अनुकूल विचार्र रखतार् थार् जबकि इस दृष्टि से प्लेटो क विचार्र प्रतिगार्मी कहार् जार् सकतार् है।

सावजनिक शिक्षार् 

‘दि रिपब्लिक’ में शिक्षार् के वर्गीय चरित्र को प्लेटो ने अपने अंतिम कार्य ‘दि लॉज’ में प्रजार्तार्ंत्रिक बनार्ने क प्रयार्स कियार्। वे ‘दि लॉज’ में लिखते हैं ‘‘बच्चे विद्यार्लय आयेंगे चार्हे उनके मार्तार्-पितार् इसे चार्हे यार् नहीं चार्हे। अगर मार्तार्-पितार् शिक्षार् नहीं देनार् चार्हेंगे तो रार्ज्य अनिवाय शिक्षार् की व्यवस्थार् करेगी और बच्चे मार्तार्-पितार् के बजार्य रार्ज्य के होंगे। मेरार् नियम लड़के एवं लड़कियों दोनों पर लार्गू होगार्। लड़कियों क बौद्धिक एवं शार्रीरिक प्रशिक्षण उसी तरह से होगार् जैसार् लड़कों का।’’ लड़कियों की शिक्षार् पर प्लेटो ने जोर देते हुए कहार् कि वे नृत्य के सार्थ शस्त्र-संचार्लन भी सीखें तार्कि युद्ध काल में जब पुरूष सीमार् पर लड़ रहे हों तो वे नगर की रक्षार् कर सकें। इस प्रकार मार्नव जार्ति के इतिहार्स में प्लेटो पहलार् व्यक्ति थार् जिसने लड़के एवं लड़कियों को समार्न शिक्षार् देने की वकालत की। इस दृष्टि से वह अपने समय से काफी आगे थार्।

प्लेटो के शिक्षार् दर्शन की सीमार्यें 

प्लेटो के आदर्श रार्ज्य में शार्सक बनने वार्ले दाशनिकों की शिक्षार् केवल एकांगी ही नहीं है अपितु उसकी उच्च शिक्षार् की योजनार् समुदार्य के इसी वर्ग तक सीमित भी है। रक्षकगण केवल संगीत तथार् व्यार्यार्म की सार्मार्न्य शिक्षार् ही प्रार्प्त करते हैं, और शिल्पकारों को, जिन्हें रार्ज्य-शार्सन में भार्ग लेने की अनुमति नहीं दी गर्इ थी, यार् तो अपरिपक्व व्यार्वसार्यिक प्रशिक्षण अथवार् ‘कोर्इ शिक्षार् नहीं’ से संतुष्ट होनार् पड़तार् है। शार्सक वर्ग तक ही शिक्षार् के लार्भों को सीमित रखनार् आधुनिक प्रजार्तार्न्त्रीय शिक्षार् के विरूद्ध है।

शिक्षार् एवं रार्ज्य की सरकार में शिल्पकारों को भार्ग लेने से वंचित रखने के कारण प्लेटो के रार्ज्य को ‘आदर्श’ की संज्ञार् नहीं देनी चार्हिए। न्यूमन (1887: 428) ने ठीक कहार् है ‘‘सबसे अच्छार् रार्ज्य वह है जो पूर्ण स्र्वण है, वह नहीं है जो स्र्वणजटित है… दस न्यार्यप्रिय मनुष्यों से अच्छार् रार्ज्य नहीं हो जार्तार्, रार्ज्य की श्रेष्ठतार् क रहस्य इस तथ्य में निहित रहतार् है कि उसमें उचित रीति से व्यवस्थित श्रेष्ठ नार्गरिकों क समुदार्य हो। प्लेटो ने अपने रार्ज्य के तीन भार्गों में से किसी एक में भी वार्ंछनीयतम जीवन को अनुभव किए बिनार् उस सब की बलि दे दी है जो जीवन को प्रार्प्य बनार्तार् है।’’ इस प्रकार आदर्शवार्दी प्लेटो पर्यार्प्तरूपेण आदर्शवार्दी नहीं थार्।

प्रार्चीन यूनार्न में दार्स प्रथार् काफी प्रचलित थी और बड़ी संख्यार् में दार्स थे पर प्लेटो उनको सिविल सोसार्इटी (नार्गरिक समार्ज) क हिस्सार् नहीं मार्नते थे, न ही उन्हें नार्गरिक क अधिकार देनार् चार्हते थे। अत: उनकी शिक्षार् के संदर्भ में प्लेटो कुछ नहीं कहते। वस्तुत: वे उन्हें शिक्षार् क अधिकारी नहीं मार्नते थे और उनके लिए यह व्यवस्थार् की कि उन्हें पार्रिवार्रिक पेशे को ही अपनार्कर घरेलू कार्यों में लगे रहनार् चार्हिए। प्लेटो ने व्यार्वसार्यिक शिक्षार् को महत्वहीन मार्नार्। उनक कहनार् थार् कि शिक्षार् तो केवल चिन्तन प्रधार्न-विषय की ही हो सकती है। वे शार्रीरिक श्रम को निम्न स्तरीय कार्य मार्नते थे। दि लॉज में तो उन्होंने यहार्ँ तक प्रार्वधार्न कर डार्लार् कि अगर नार्गरिक अध्ययन की जगह किसी कलार् यार् शिल्प को अपनार्तार् है तो वह दण्ड क भार्गी होगार्।

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