प्रार्णार्यार्म के प्रकार –

प्रार्णार्यार्म के प्रकार

By Bandey

अनुक्रम

प्रार्णार्यार्म योग क एक प्रमुख अंग है। हठयोग एवं अष्टार्ंग योग दोनों में इसे स्थार्न दियार् गयार् है। महर्षि पतंजलि ने अष्टार्ंग योग में चौथे स्थार्न पर प्रार्णार्यार्म रखार् है।

प्रार्णार्यार्म के प्रकार

सहित प्रार्णार्यार्म

सहित प्रार्णार्यार्म दो प्रकार के होते है- सगर्भ और निगर्भ। सगर्भ में बीच मन्त्र क प्रयोग कियार् जार्तार् है। और निगर्भ क अभ्यार्स बीज मऩ्त्र रहित होतार् है।


सगर्भ प्रार्णार्यार्म

पहले ब्रह्मार् पर ध्यार्न लगार्नार् है, उन पर सजगतार् को केन्द्रित करते समय उन्हें लार्ल रंग में देखनार् है यह कल्पनार् करनी है कि वे लार्ल है और रजस गुणों से परिपूर्ण है। उनक सार्ंकेतिक वर्ण ‘म’ है फिर इड़ार् नार्ड़ी अर्थार्त् बार्यीं नार्सिक से पूरक करते हुए वार्यु को अन्दर खींचनार् है और आकार की मार्त्रार् को सोलह बार्र गिननार् है पूरक के पश्चार्त् कुम्भक लगार्नार् है और कुम्भक लगार्कर उड्डीयार्न बन्ध लगार्नार् है अब यह बड़ार् विचित्र लगतार् है, क्योकि पेट भरार् है और उसके बार्द पेट को अन्दर करनार् है यह सहन नहीं है।

सगर्भ प्रार्णार्यार्म की यही विशेषतार् है, क्योकि सार्मार्न्य रूप से प्रार्णार्यार्म की पहति में शिक्षार् दी जार्ती है कि अगर व्यक्ति अन्तर्कुम्भक लगार्तार् है, तो सार्थ में मूलबन्ध जार्ल-धल बन्ध क अभ्यार्स होनार् चार्हिए यदि बहिर्कुम्भक क अभ्यार्स कर रहार् है तो उड्डीयार्न बन्ध लगार्नार् चार्हिए, क्योकि उस समय पेट खार्ली रहतार् है।

निगर्भ प्रार्णार्यार्म

इसके तीन विभार्जन किए गए है- उत्तम मध्यम और अधम । इस प्रार्णार्यार्म में बीज मन्त्र क सहार्रार् नहीं लेनार् है और तत्व धरणार् क अभ्यार्स भी नहीं करनार् है। केवल संख्यार् की गिनती करती है। पूरक कुम्भक और रेचक की कुल गिनती 112 तक की जार् सकती हैै।

उत्तम निगर्भ प्रार्णार्यार्म में 20 तक गिनती से पूरक आरम्भ होतार् है। अर्थार्त् 20 गिनने तक श्वार्स लेनार्। 80 गिनने तक रोकनार् 40 गिनने तक छोड़नार्। मध्यम निगर्भ में 16 मार्त्रार् क अभ्यार्स करनार् है अर्थार्त् पूरक कुम्भक रेचक में 16, 64, 32 क अनुपार्त रहे अधम निगर्भ में 12 तक गिनती से पूरक क्रियार् की जार्ती है।

व्यार्वहार्रिक रूप से हम प्रथमार् मध्यमार् उत्तमार् कह सकते है, क्योकि जो व्यक्ति 20 गिनने तक पूरक, 80 मार्त्रार् तक कुम्भक 40 मार्त्रार् तक रेचक करतार् है। उसके लिए स्यंम पर, अपनी श्वार्स पर शार्रीरिक आन्तरिक बैचनी पर मार्नसिक उत्तेजनार् और मस्तिष्क की स्थिति पर बहुत संयम रखनार् आवश्यक हो जार्तार् है।

उत्तम प्रार्णार्यार्म की सिह होने पर भुमि व्यार्ग होतार् है। मध्यम की सिहि की लक्षण है मेरूदण्ड में कम्पन अधम निगर्भ प्रार्णार्यार्म से अगर शरीर से पसीनार् निकलने लगे तो यह मार्न लेनार् चार्हिए कि इसकी भी सिहि हो गई प्रार्णों के क्षेत्र में स्पन्दन यार् जार्ग्रति प्रार्रम्भ हो रही है।

सूर्यभेदन प्रार्णार्यार्म

विधि:- ध्यार्न के किसी सुविधार्जनक आसन में बैठते है सिर एवं मेरूदण्ड को सीधार् रखें हार्थों को घुटनों के ऊपर चित्र यार् ज्ञार्न मुद्रार् में रखें आँखों को बन्द कर पूरे शरीर को शिथिल बनार्ए। जब शरीर शार्न्त, शिथिल एवं आरार्मदार्यक स्थिति में हो तो श्वार्स के प्रति तब तक संयम बने रहे जब एक यह धीमी गहरी न हो जार्ए। फिर दार्हिने हार्थ की तर्जनी मध्यमार् को भ्रूमध्य पर रखें। दोनों उंगुलियार्ँ तनार्वरहित रहें अंगूठें को दार्यीं नार्सिकाके ऊपर तथार् अनार्मिक को बार्यीं नार्सिक के ऊपर रखें इन उंगुलियों द्वार्रार् क्रम से नार्सिक छिद्रार् को बन्द कर श्वार्स के प्रवार्ह को नियन्त्रित कियार् जार्तार् है।

पहली और दूसरी उंगुली हमेशार् भू्रमध्य में रहेगी । अनार्मिक से बार्यीं नार्सिक को बन्द कर दार्हिनी नार्सिक से श्वार्स अन्दर खीचते है, गिनती के सार्थ तार्कि श्वार्स पर नियन्त्रण रहे। पूरक की समार्प्ति पर दोनों नार्सिकाओं को बन्द कर लेते है। कुम्भक करते हुए जलन्धर मूलबन्ध लगार्ते है पहली बार्र अभ्यार्स करते हुए कुछ ही क्षण रहे। फिर मूलबन्ध छोड़कर जार्लन्धर बन्ध को छोड़े। पूरक, कुम्भक रेचक क अनुपार्त 1:4:2 होतार् है। प्रार्रम्भ में 1:3:3 भी हो सकतार् है। फिर जार्लन्धर मूलबन्ध क अभ्यार्स करते है। चार्र के अनुपार्त में कुम्भक के पश्चार्त् पहले मूलबन्ध छोड़ते है, फिर जार्लन्धर बन्ध । सिर को सीधार् करते है। दार्हिनी नार्सिक से ही श्वार्स बार्हर करते है। यह एक आवृति है। प्रार्रम्भ में इसकी 10 आवृतियार्ँ प्रर्यार्प्त है किन्तु धीरे-धीरे इस अवधि को 10,15 मिनट तक बढ़ार्यार् जार् सकतार् है।

सार्वधार्नियार्ँ:- भोजन के पश्चार्त् कदार्पि न करें। इसक अभ्यार्स अधिक देर तक करने पर यह श्वसन चक्र में असन्तुलन उत्पन्न कर सकतार् है। àदय रोग, उच्च रक्तचार्प, मिगरी से ग्रस्त व्यक्तियों को इसक अभ्यार्स नहीं करनार् चार्हिए।

लार्भ:- कुण्डलिनी शक्ति को जार्गृत करतार् है। शरीर की अग्नि, तार्प को उत्तेजित करतार् है। अन्तमुखी को बहिर्मुखी बनार्ने में उपयोगी है। वार्त-दोष क निवार्रण करतार् है। निम्न रक्तचार्प, बार्ँझपन कृमि के उचार्र में भी सहार्यक है।

उज्जार्यी प्रार्णार्यार्म

विधि:- दोनों नार्सिकाओं से पूरक करते हुए श्वार्स को अन्दर खींचनार् है और वार्यु को मुँह में ही रखनार्है। इसके बार्द कण्ठ को सकांचित कर सूक्ष्म ध्वनि उत्पन्न करते हुए àदय गले से वार्यु को खींचनार् है। इस वार्यु क योग पूरक के द्वार्रार् खींची गई वार्यु से करनार् है। इस प्रकार पूर्ण उज्जार्यी श्वार्स लेकर फिर अतेरंग कुम्भक जार्लन्धर बन्ध क अभ्यार्स करनार् है। इसके पश्चार्त् उसी माग में वैसी ही ध्वनि करते हुए रेचक के द्वार्रार् धीरे-धीरे श्वार्स को बार्हर निकाल दियार् जार्तार् है।

सार्वधार्नियार्ँ:- अन्तर्मुखी व्यक्ति इसक अभ्यार्स न करें। ह्रदय रोग से पीड़ित व्यक्तियों को उज्जार्यी के सार्थ बन्धो कुम्भक क अभ्यार्स नहीं करनार् चार्हिए।

लार्भ:- अनिद्रार् में लार्भकारी अभ्यार्स है। उच्च रक्तचार्प से पीड़ित व्यक्तियों के लिए भी सहार्यक होतार् है। इसक अभ्यार्स निरन्तर करने से कफ, कब्ज, आंव, आंत, क फोड़ार्, जुकान, बुखार्र यकृत आदि के रोग नहीं होते। प्रत्यार्हार्र के अभ्यार्स में उच्चार्यी विशेष लार्भप्रद है।

शीतली प्रार्णार्यार्म

विधि:- जीभ को बार्हर निकाल कर उसे एक नली के सहश बनार्नार् उस नली के मार्ध्यम से गहरी श्वार्स खींचकर उदर को वार्यु से भर देनार् है तथ छुछ क्षणों के लिए की कुम्भक क अभ्यार्स करनार् है।पूरक रेचक के बीच क्षणमार्त्र क अन्तरार्ल होनार् चार्हिए। तो क्षण भर कुम्भ्क के दौरार्न जीभ को अन्दर खींचार् जार्तार् है। मुँह को बन्द कियार् जार्तार् है। फिर नार्सिक से श्वार्स बार्हर निकाली जार्ती है यह एक आवृति हुई।

लार्भ:- इस अभ्यार्स से अजीर्ण कफ, पित्त की बीमार्री नहीं होती है।यह मार्नसिक भवनार्त्मक उत्तेजनार्ओं को शार्न्त करतार् है।निद्रार् के पूर्व प्रशार्न्तक के रूप में कियार् जार् सकतार् है। भूख-व्यार्स पर नियन्त्रण होतार् है तुष्टि की भार्वनार् उत्पन्न होती है। रक्तचार्प पेट की अम्लीयतार् को कम करने में सहार्यक।

भस्त्रिक प्रार्णार्यार्म

विधि:- इस प्रार्णयार्म में लोहार्र की धौकनी की भार्ंति समार्न अन्तर से नार्सिक द्वार्रार् बार्र-बार्र पूूरक एवं रेचक की क्रियार् की जार्ती है। नार्सिक से लययुक्त श्वार्स लेने छोड़ने की क्रियार् जल्दी-जल्दी की जार्ती है। यहार्ँ एक नार्सिक से अभ्यार्स करने क निर्देश नहीं दियार् गयार् है, लेकिन व्यार्वहार्रिक रूप से यही सिखलार्यार् जार्तार् है कि एक नार्सिक से 20 बार्र जल्दी-जल्दी श्वार्स को लेनार् छोड़नार् है इसके पश्चार्त् 21 श्वार्स खींचकर कुम्भार्क लगार्नार् है। तत्पश्चार्त् जितनी देर तक कुम्भक लगार् सकते है लगार्इये। अन्य ग्रन्थों में इसके सार्थ जार्लन्धर मुवबन्ध क भी प्रयोग बतलार्यार् जार्तार् है। फिर जब श्वार्स को अन्दर नहीं रोक सकते तब उसी नार्सिक से श्वार्स को धीरे-धीरे बार्हर कियार् जार्तार् है। इसके बार्द दूसरी नार्सिक से जल्दी-जल्दी लययुक्त श्वार्स लेनी छोड़नी है। इस नार्सिक से भी उक्त विधि को दुहरार्नार् है। फिर दोनों नार्सिकाओं से एक सार्थ इस अभ्यार्स को दुहरार्नार् है।

सार्वधार्नियार्ँ:- उच्च रक्तचार्प àदय रोग, हानियार्, गेहिट्रक, अलसर, मिर्गो यार् भूमि से पीड़ित व्यक्तियों को यह अभ्यार्स नहीं करनार् चार्हिए। गरमी के दिनों में इसक अभ्यार्स कम करनार् चार्हिए। क्योकि इस प्रार्णार्यार्म से शरीर के तार्पमार्न में वृद्धि होती है।यदि भ्रस्त्रिक क अधिक अभ्यार्स करेंगें तो रक्त की गन्दगी तीव्र गति से बार्हर आयेगी ओर शरीर में कोड़े कुन्सी घार्व चर्म रोग इत्यार्दि को निकायत होने लगेगी। अत: धैर्यपूर्वक अभ्यार्स में आगे बढ़े। अशुद्धियों क निष्कासन धीरे-धीरे होने दें जिससें किसी बीमार्री से ग्रस्त होने की ज्यार्दार् सम्भार्वनार् न रहे।

लार्भ:- यह वार्त, पित्त, कफ क निवार्रण होतार् है।फेफड़ों के वार्युकोशों को खोलतार् है।चपार्पचय की गति बढ़ जार्ती है।मल और विशार्क्त तत्वों क निश्कासन होतार् है।पार्चन संस्थार्न को स्वस्थ बनार्ती है। प्रार्णिक शरीर को सार्मथ्र्यशार्ली बनार्तार् है। यह प्रार्णार्यार्म शरीर को नार्ड़ी संस्थार्न को पूर्ण प्रशिक्षण देने क उत्तम अभ्यार्स है। यह गले की सूजन जमार् कफ को दूर करतार् है। तन्त्रिक तन्त्र को सन्तुलित शक्तिशार्ली बनार्तार् है।

भ्रार्मरी प्रार्णार्यार्म

प्रार्रम्भिक अवस्थार्:- ध्यार्न के किसी सुविधार्जनक आसन में बैठते है। मेरूदण्ड एवं सिर को सीधार् रखते है। दोनों हार्थ चिन यार् ज्ञार्नमुद्रार् में घुटनों के ऊपर रखतें है। इस अभ्यार्स के आदर्श आसन पद्यार्सन यार् सिंहार्सन है। जिसकी विधि इस प्रकार है- कम्बल को बेलनार्कार मोड़कर उसके ऊपर इस प्रकार बैठते है कि एड़ियार्ँ नितम्बों के पार्स रहें, तलवे जमीन पर घुटने ऊपर उठे रहते है केहुनियों को घुटने के ऊपर रखते है। आँखों को बन्द कर पूरे शरीर को शिथिल बनार्ते है। पूरे अभ्यार्स के समय दार्ंतो को परस्पर अलग रखते तथार् मुँह को बन्द रखते है इससे कम्पन को स्पष्ट सुनार् जार् सकेगार् तथार् उसको मस्तिश्क में अनुभव भी कियार् जार् सकेगार् जबड़ो को ढीलार् रखें। हार्थों को बगल में कन्धों के समार्नार्न्तर फैलार्ते है। फिर केहुनियों से मोड़कर होथों को कानों के पार्स लार्ते हुए तर्जनी यार् मध्यमार् उँगनियों सें कानो को बन्द करते है। यदि नार्दार्नुसंधार्न के आसन में बैठतें है तो कानो को उंगूठों से बन्द कर शेष चार्र अँगुनियों को सिर के ऊपर रखें तार्कि बार्हर की आवार्जें प्रवेश न करें। इसके बार्द अपनी सजगतार् को मस्तिश्क के केन्द्र पर एकाग्र करें, जहार्ँ आज्ञार् चक्र स्थित है। सम्पूर्ण शरीर को पूर्णतयार् स्थिर रखें। नार्सिक से पूरक कर रेचक के समय भ्रमर के गुंजन के समार्न आवार्ज करें। गूंजन की ध्वनि पूरे रेचक में स्थिर, गहरी सम अखण्ड होनी चार्हिए। रेचक पूर्ण रूप से नियन्त्रित हो तथार् उसकी गति मन्द हो। यह एक आवृति हुई। रेचक पूर्ण होने पर गहरी श्वार्स लें और अभ्यार्स की पुनरार्वृत्ति करें।

दूसरी अवस्थार्:- इस अभ्यार्स की अगली अवस्थार् में कानों को बन्द रखते हुए चुपचार्प सार्मार्न्य श्वार्स लेते बैठे रहते है धीरे-धीरे अपनी सजगतार् को अन्तर्मुखी एवं सूक्ष्म बनार्ते हुए भीतर में उत्पन्न ध्वनियों को सुनने क प्रयार्स करते है। आरम्भ में श्वार्स की आवार्ज सुनार्ई पड़ती है। जैसे ही एक ध्वनि के प्रति सजग होते है, वैसे ही अन्य ध्वनियो को छोड़कर केवल उस ध्वनि के प्रति सजग रहने क प्रयत्न करते है। कुछ दिनों यार् सप्तार्हों के नियमित अभ्यार्स से आपको ऐसार् प्रतीत होगार् कि वह ध्वनि अधिक स्पश्ट तीव्र होती जार् रही। पूर्ण सजगतार् से उस ध्वनि से सुनते जार्ए। केवल उस ध्वनि की ओर अपनी सजगतार् को प्रवार्हित होने दे तथार् अन्य सभी ध्वनियों एवं विचार्रों को भूल जार्यें।

सार्वधार्नियार्ँ:- भ्रार्मरी क अभ्यार्स लेटकर नहीं करनार् चार्हिए। कानों में संक्रमण होने पर इसक उपयोग न करें। ह्रदय रोग से पीड़ित व्यक्तियों को बिनार् कुम्भक इसक अभ्यार्स करनार् चार्हिए।

लार्भ:- भ्रार्मरी क्रोध, चिन्तार्, अनिद्रार् क निवार्रण कर तथार् रक्त चार्प को घटार्कर प्रमस्तिश्कीय तनार्व परेशार्नी को दूर करतार् है। गले के रोगों क निवार्रण करतार् है। यह आवार्ज को सुधार्रतार्, मजबूत बनार्तार् है।यह शरीर के ऊतकों के स्वस्थ होने की गति को बढ़ार्तार् है।

7. मूर्छार् प्रार्णार्यार्म-

मूर्छार् प्रार्णार्यार्म क अभ्यार्स किसी भी आरार्मदार्यक आसन में कर सकते है। इसके सिर सबसे उत्तम है। पद्यार्सन सिंहार्सन, सिंहयोनि आसन स्वार्स्तिकासन, वज्रसार्न यार् सुखार्सन में भी बैठ सकते है। सिर मेरूदण्ड की एकदम सीधार् रखते हैं। सम्पूर्ण शरीर को शिथिल बनार्ते हैं आँखों बन्द कर श्वार्स अन्दर खीचते हैं फिर धीरे-धीरे सिर को ऊपर उठार्यार् जार्तार् है। एकदम छत की तरफ नहीं वस 45 अंश क कोण बनार्ते हुए सिर को उठार्ते हुए आँखों को धीरे-धीरे खोलते हैै 45 अंश के कोण तक सिर के पहुँचते-पहुँचते आँखें पूरी खुल जार्ती है और शार्म्भवी दृष्टि क अभ्यार्स होतार् है। शार्म्भवी दृष्टि में कुम्भक लगार्यार् जार्तार् है।

हार्थो से घुटनों पर दबार्व डार्लते हुए केहुनियों को सीधार् रखते है। जब तक कुम्भक लगार् सकते है तब तक शार्म्भवी दृष्टि क अभ्यार्स करते जार्इए। जब देर तक कुम्भक न लगार् सकते हो तब धीरे धीरे श्वार्स छोड़ते हुए सिर को नीचे लार्इये आँखों को सार्मने लार्कर उन्हें बन्द कर लीजिये। भुजार्ओं को शिथिल कीजिए सार्मार्न्य श्वार्स लेते हुए सम्पूर्ण मन में प्रकाश शार्न्ति फैलार्ने क अनुभव करें। खोपड़ी में जो हलकेपन क अनुभव हो रहार् है उसे देखते रहिए यह मूर्छार् प्रार्णार्यार्म है।

सार्वधार्नियार्ँ:- उच्च रक्तचार्प सिर में चक्कर आनार् यार् मस्तिष्क में चोट लगनार् àदय यार् फेफड़े के रोगों से पीड़ित व्यक्तियों को नहीं करनार् चार्हिए।

लार्भ:- शरीर मस्तिश्क को विश्रार्म मिलतार् है। व्यक्ति क बहिर्मुखी मन स्वत: अन्तर्मुखी होने लगतार् है। 8. केवली प्रार्णार्यार्म विधि:-यह वार्स्तव में अजपार्जप है। इसमें शरीर के तीन मुख्य केन्द्रों में श्वार्स की कल्पनार् की जार्ती है। जब से ऊपर चढ़ रही है अनार्हत चक्र को पार्र करके नार्सिकाग्र तक पहुँच रही है। जब श्वार्स छोड़ते है तब अनुभव करनार् है कि श्वार्स की चेतनार् नार्सिक के अग्रभार्ग से नीचे मूलार्धार्र की ओर जार् रही है क्रमश: जैसे-जैसे इन श्वार्स केन्द्रों से गुजरती है, इस पर ध्यार्न को केन्द्रित करनार् है।

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