प्रमार्प लार्गत विधि क्यार् है ?

प्रमार्प लार्गत लेखार्-विधि क विधिवत् अध्ययन करने से पूर्व यह जार्न लेनार् आवश्यक है कि प्रमार्प लार्गत से क्यार् आशय होतार् है। सार्मार्न्यत: प्रमार्प लार्गत से तार्त्पर्य उन लार्गतों से होतार् है ,जो एक दी गयी परिस्थितियों में एक प्रदत्त उत्पार्दन की मार्त्रार् पर सार्मार्न्य रुप में की जार् सकती हों। ब्रउन एवं हार्वर्ड के अनुसार्र, ‘‘प्रमार्प लार्गत एक पूर्व निर्धार्रित लार्गत है, जो यह निर्धार्रित करती है कि दी हुर्इ परिस्थितियों में प्रत्येक उत्पार्द यार् सेवार् पर क्यार् लार्गत होनी चार्हिए।’’

  1. आर्इ.सी.एम.ए.आफ इंग्लैण्ड के अनुसार्र,’’प्रमार्प लार्गत एक पूर्व-निर्धार्रित लार्गत है जिसकी गणनार् प्रबन्ध के कुशल संचार्लक के प्रमार्पों एवं सम्बद्व आवश्यक व्यय से की जार्ती है।’’
  2. जे.आर. बार्टलीबॉय के अनुसार्र,’’प्रमार्प लार्गत क आशय ऐसी पूर्व-निर्धार्रित लार्गतों से है जो उस समय की जार्ती हैं जबकि यंत्र,उत्पार्दन तकनीकी ,सार्मग्री एवं श्रम आदि से सम्बन्धित क्रियार्एं अधिक कार्यक्षमतार् के सार्थ संगठित होती हैं और उन दी गर्इ परिस्थितियों में प्रयोग की जार्ती हैं। जो स्थिर व व्यवहार्रिक होती है और बहुत आदर्शवार्दी तथार् अप्रार्प्य नहीं होती हैं।

ऐतिहार्सिक लार्गत-विधि के अन्तरगत कोर्इ ऐसार् मार्पदण्ड नही है जिसके प्रयोग द्वार्रार् यह जार्नार् जार् सके कि वर्तमार्न आदर्श है यार् नही, यदि नहीं तो आदर्श व वार्स्तविक में अन्तर क्यार् और क्यों है? प्रमार्प लार्गत विधि के अन्तर्गत निर्मित प्रत्येक वस्तु की लार्गत के प्रत्येक तत्व-सार्मग्री, श्रम व अप्रत्यक्ष व्ययों के लक्ष्य, समय, उत्पार्दन की मार्त्रार् तथार् लार्गत-पूर्व निर्धार्रित कर दिये जार्ते हैं। जैसे-जैसे कार्य क निष्पार्दन होतार् है, वार्स्तविक लार्गतों की प्रमार्प लार्गतों की तुलनार् की जार्ती है; दोनों के अन्तर को लार्गत विचरणार्ंश कहते हैं, इन विचरणार्ंशों क ‘कारण सहित’ विश्लेषण कियार् जार्तार् है, तार्कि उत्तरदार्यी व्यक्तियों को अक्षमतार् के विषय में सूचित कियार् जार् सके और उचित कार्यवार्ही की जार् सके।एक पूर्ण प्रमार्प लार्गत विधि में निम्नलिखित विधियार्ं निहित होती हैं ;

  1. कुल लार्गत के प्रत्येक तत्व के लिए प्रमार्प निर्धार्रित करनार् (अर्थार्त् प्रमार्प लार्गत क निर्धार्रण)। 
  2. कुल लार्गत के विभिन्न तत्वों के लिए प्रमार्प लार्गत क अभिलेखन (अर्थार्त्प्रमार्प लार्गत क प्रयोग)।
  3. सार्थ-ही-सार्थ वार्स्तविक लार्गतों क अभिलेखन (ऐतिहार्सिक लार्गत विधि)। 
  4. वार्स्तविक लार्गत व प्रमार्प लार्गत की तुलनार्। 
  5. वार्स्तविक लार्गतों क प्रमार्प लार्गतों से विचरणार्ंश ज्ञार्त करनार् (विचरणार्ंशों क मार्पन)। 
  6. विचरणार्ंशों के लिये उत्तरदार्यी कारकों क पतार् लगार्नार् (विचरणार्ंशों क विश्लेंषण)। 
  7. प्रबन्ध को रिपोर्ट देनार् तार्कि उचित कार्यवार्ही की जार् सके। 

उक्त विवेचनार् से स्पष्ट हो रहार् है कि प्रमार्प लार्गत विधि नियन्त्रण की एक तकनीक है। इनके अन्तर्गत कार्यकुशलतार् और कार्यशीलतार् के सार्मार्न्य स्तरों के आधार्र पर प्रत्येक क्रियार् के लार्गत-समंक पहले से ही निर्धार्रित कर दिये जार्ते हैं और वार्स्तविक निष्पार्दन पर हुर्इ लार्गतों की पूर्व-निर्धार्रित प्रमार्पों से तुलनार् की जार्ती है और विचरणार्ंश ज्ञार्त किये जार्ते हैं, तत्पश्चार्त् विचार्रणार्ंश के कारणों क पतार् लगार्कर प्रबन्ध को सूचित कियार् जार्तार् है जिसके आधार्र पर प्रबन्ध आवश्यक सुधार्रार्त्मक कार्यवार्ही करके भविष्य में वार्स्तविक लार्गतों को प्रमार्प लार्गतों के अनुकूल रखने क प्रयत्न करतार् है। ब्रार्उन एवं हार्वर्ड के अनुसार्र ‘‘प्रमार्प लार्गत विधि लार्गत लेखार्ंकन की तकनीकी है जिसमें संचार्लक की कुशलतार् निर्धार्रित करने के लिए प्रत्येक उत्पार्द यार् सेवार् के प्रमार्प लार्गत की तुलनार् वार्स्तविक लार्गत से की जार्ती है, तार्कि तुरन्त ही कोर्इ सुधार्रार्त्मक कार्यवार्ही की जार् सके। ‘इन्स्टीटयूटूट आफ कास्ट एण्ड मैनेजमैण्ट एकाउण्टेण्ट ऑफ इंग्लैण्ड के अनुसार्र,’’प्रमार्प लार्गत विधि प्रमार्प लार्गतों की तैयार्री और प्रयोग,उनकी वार्स्तविक लार्गतों से तुलनार् और कारणों व प्रभार्वों के बिन्दुओं को दर्शार्ते हुए विचरणार्ंशों क विश्लेषण है।’’

प्रमार्प लार्गत क निर्धार्रण 

एक बार्र निर्णय कर लेने के बार्द कि किस प्रकार के प्रमार्प की गणनार् व प्रयोग कियार् जार्यगार् ,उत्पार्दन स्तर के विषय में विचार्र करनार् आवश्यक होतार् है कि जिस अवधि के लिए प्रमार्प निश्चित होने हैं, उस अवधि में उत्पार्दन-स्तर कितनार् प्रार्प्त कियार् जार् सकतार् है। उत्पार्दन स्तर अपने आप में बिक्री की मार्त्रार् व व्यवसार्य में रखने योग्य स्कन्ध की मार्त्रार् से निर्धार्रित होतार् है। उत्पार्दन -स्तर निर्धार्रित होने के बार्द व्यवसार्य में निर्मार्ण, वितरण व प्रबन्ध के लिए आवश्यक उत्पार्दनों के सार्धनों यथार् सार्मग्री,श्रम ,सेवार्, आदि की मार्त्रार् व गुण आकलित किये जार् सकते हैं। इन सूचनार्ओं के आधार्र पर प्रमार्प निर्धार्रित किये जार् सकते हैं। यह भी ध्यार्न देने योग्य है कि उत्पार्दन स्तर क प्रभार्व श्रम, सार्मग्री व सेवार् प्रति इकार्इ लार्गत पर भी पड़तार् है।

प्रमार्प लार्गत के निर्धार्रण में प्रति इकार्इ प्रमार्प लार्गत व प्रमार्प लार्गत इकार्इ क निर्धार्रण भी शार्मिल होतार् है। इसक तार्त्पर्य यह है कि लार्गत इकार्इ के लिए तथार् प्रत्येक प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष लार्गत के लिये प्रमार्प निर्धार्रित करनार् होतार् है। प्रत्यक्ष लार्गत में सार्मग्री,श्रम और अन्य प्रत्यक्ष व्यय शार्मिल होते हैं। अप्रत्यक्ष लार्गत में लार्गत इकार्इयों के निर्मार्ण के लिये उत्तरदार्यी लार्गत केन्द्रों की लार्गतों को शार्मिल करते हैं। लार्गत इकार्इयार्ं ठोस,तरल ,उप-अंग, एकीकृत वस्तु और विभिन्न प्रकार की सेवार्ओं जैसे, यार्तार्यार्त ,विद्युत, पेशेवर सेवार्यें आदि क रुप ले सकती हैं। संक्षेप में, किसी कार्य यार् उत्पार्दन-स्तर की प्रमार्प लार्गत निर्धार्रित करने के लिए यह आवश्यक होतार् है कि निष्पार्दन सार्मग्री-प्रयोग, उत्पार्दन मार्त्रार् एवं लार्गत के विभिन्न तत्वों क प्रमार्प निश्चित कियार् जार्य। सार्मार्न्यत: लार्गत लेखार्पार्लक ही प्रमार्प निश्चित करने के लिए उत्तरदार्यी होतार् है, जिसे काफी सर्तकतार् व बुद्विमतार् से कार्य करनार् पड़तार् है, परन्तु उसे तकनीकी विशेषज्ञों जैसे समय व थकान-अध्ययन अभियन्तार्, उत्पार्दन अभियन्तार्, क्रेतार् व अन्य सेविवर्गीय व्यक्तियों से पूर्ण सहयोग अपेक्षार् करनी चार्हिये क्योंकि उनके सहयोग से ही प्रमार्प क उचित निर्धार्रण सम्भव हो सकतार् है। निम्नलिखित प्रत्येक लार्गत तत्व के सम्बन्ध में प्रमार्प लार्गत क निर्धार्रण करनार् पड़तार् है:

    (1) प्रत्यक्ष सार्मग्री- 

    किसी वस्तु यार् कार्य पर प्रत्यक्ष सार्मग्री-व्यय की रकम सार्मग्री की मार्त्रार् व सार्मग्री मूल्य दर पर निर्भर करती है। अत: प्रत्यक्ष सार्मग्री की प्रमार्प लार्गत निर्धार्रित करते समय कदम उठार्ये जार्ते है :

    1. प्रत्यके उत्पार्दन में प्रयुक्त सार्मग्री के सबं न्ध में प्रमार्प ड्रार्इगं ,सूत्र ,गुण व विस्तार्र वर्णन निश्चित कर लियार् जार्तार् है, सार्थ ही आकार ,भार्र व अन्य मार्प के संदर्भ में प्रमार्प मार्त्रार् निर्धार्रित कर ली जार्ती है। इसके लिये भूतकाल क अभिलेख, पूर्व अनुभव व इंजीनियÇरग यार् रार्सार्यनिक वर्णन सहार्यक हो सकते हैं। यदि उत्पार्दन पहली बार्र कियार् जार् रहार् हो तो सार्मग्री की प्रमार्प मार्त्रार् क निर्धार्रण नमुनों की कुछ वस्तुओं क निर्मार्ण करके यार् विशेषज्ञों से परार्मर्श करके यार् समार्न वस्तुओं के वर्तमार्न उत्पार्दकों के अनुभव के आधार्र पर कियार् जार् सकतार् है।
    2. सार्मार्न्यत: प्रत्यके उत्पार्दन विधि में सार्मग्री क कुछ भार्ग नष्ट हो जार्तार् है,जिस पर प्रबन्ध व कर्मचार्रियों क नियन्त्रण नहीं होतार् है। इसे समार्न्य क्षय कहते है। यदि ऐसार् है तो गत अनुभव व वैज्ञार्निक विश्लेषण के आधार्र पर प्रमार्प के सार्मार्न्य क्षय क भी निर्धार्रण कर लेनार् चार्हिए। 
    3. प्रत्यके उत्पार्द में प्रयुक्त समस्त सार्मग्री क प्रमार्प मूल्य दर निश्चित कर लेनार् चार्हिए। मूल्य दर क प्रमार्प निश्चित करते समय बार्जार्र मूल्य, गत अवधि में मूल्य दर व भार्वी मूल्य परिवर्तनों की प्रवृति, आदि को ध्यार्न में रखनार् चार्हिए। लार्गत लेखार्पार्लक द्वार्रार् क्रेतार् अभिकर्तार् के सहयोग से मूल्य दर निर्धार्रित होनी चार्हिए और हार्थ में स्कन्ध, मूल्य, उच्चार्वचन की सम्भार्वनार् एवं सार्मग्री के लिए प्रेरित आर्डर, आदि के सम्बन्ध में उचित समार्योजन कर लेनार् चार्हिए। उपर्युक्त ढंग से सार्मग्री की प्रमार्प मार्त्रार् व प्रमार्प मूल्य दर निर्धार्रित कर लेने के बार्द सार्मार्ग्री की प्रमार्प लार्गत सरलतार्पूर्वक ज्ञार्त की जार् सकती है। सार्मग्री की प्रमार्प लार्गत सार्मग्री की प्रमार्प मार्त्रार् ग प्रमार्प मूल्य दर के बरार्बर होती है- 

    (2) प्रत्यक्ष श्रम-

    श्रम की प्रमार्प लार्गत मजदूरी की मार्त्रार् व मजदूरी दर पर निर्भर करती है। अत: इसक निर्धार्रण करते समय दो प्रकार के प्रमार्प निश्चित करने पड़ते हैं: (अ) मजदूरी की मार्त्रार् क प्रमार्प, (ब) मजदूरी दर क प्रमार्प।

    1. मजदूरी की मार्त्रार् से तार्त्पर्य उन श्रम घण्टों से होतार् है, जो प्रत्यके इकार्इ के निर्मार्ण पर व्यय कियार् जार्तार् है। सर्वप्रथम विभिन्न वस्तुओं के उत्पार्दन हेतु श्रम के विभिन्न वर्गों क निर्धार्रण कर लेनार् चार्हिए और प्रत्येक वर्ग के मजदूरों की संख्यार् निश्चित कर लेनी चार्हिए। तत्पश्चार्त् पूर्व अनुभव के आधार्र पर यार् आदर्श कार्यकुशलतार् के आधार्र पर यार् विशेष समय अध्ययन के आधार्र पर प्रत्येक मजदूर द्वार्रार् किए जार्ने वार्ले कार्य की मार्प तथार् प्रत्येक कार्य के लिए प्रमार्प घण्टे निर्धार्रित कर लेने चार्हिए। 
    2. मजदूरी दर क प्रमार्प निश्चित करते समय उस मजदूरी दर क प्रयोग करनार् चार्हिए जिस पर सार्मार्न्य प्रयत्न करने से श्रमिक उपलब्ध हो सकते हों। भूत काल क अनुभव, भार्वी परिवर्तन तथार् आशंसित श्रम सन्नियम निर्णय एवं परिनिर्णय, आदि को भी ध्यार्न में रखनार् चार्हिए। प्रत्येक वर्ष के मजदूर के लिए अलग-अलग प्रमार्प मजदूरी दर निश्चित कर लेनी चार्हिए। इकार्इ प्रमार्प मजदूरी मार्त्रार् व प्रमार्प मजदूरी दर निश्चित करने के बार्द प्रति इकार्इ प्रमार्प लार्गत निश्चित की जार् सकती है- 

    (3) अप्रत्यक्ष व्यय:-

     एक वस्तु के उत्पार्दन में किए जार्ने वार्ले अप्रत्यक्ष व्यय दो प्रकार के हो सकते हैं :

    1. परिवर्तनशील व्यय :- इस प्रकार के व्ययों की यह विशेषतार् होती है कि उत्पार्दन में वृद्धि के सार्थ-सार्थ ये खर्च योग में बढ़ते जार्ते हैं और प्रति इकार्इ समार्न रहते हैं, अत: परिवर्तनशील व्ययों को प्रति इकार्इ यार् प्रति घण्टों के अनुसार्र ज्ञार्त करनार् चार्हिए। 
    2. स्थिर व्यय :- स्थिर व्ययों पर उत्पार्दन मार्त्रार् के घटने- बढने क विशेष प्रभार्व नही पड़तार्। ये प्रार्य: अपरिवर्तित रहते है, परन्तु उत्पार्दन में वृद्वि होने पर प्रति इकार्इ कम होते जार्ते हैं और कमी होने पर बढ़ते जार्ते हैं। अत: इनके सम्बन्ध में पूर्वार्नुमार्न लगार् लेनार् चार्हिए कि ये व्यय पूरी अवधि के लिए कितने होगें और उस अवधि में उत्पार्दन मार्त्रार् कितनी होगी और दोनों के आधार्र पर प्रति इकार्इ प्रमार्प स्थिर व्यय निश्चित कर लियार् जार्तार् है। सार्धार्रणतयार् स्थिर व्यय के सम्बन्ध में प्रमार्प लार्गत क निर्धार्रण श्रम लार्गत के कुछ निश्चित प्रतिशत के आधार्र पर कियार् जार्तार् है। 

    प्रमार्प सार्मग्री लार्गत ,प्रमार्प श्रम लार्गत व प्रमार्प अप्रत्यक्ष व्यय(स्थिर एवं अस्थिर) क योग उत्पार्दन यार् कार्य क प्रमार्प लार्गत मार्नार् जार्तार् है। जब इसे प्रमार्प विक्रय मूल्य में से घटार् देते हैं, तो प्रति इकार्इ प्रमार्प लार्भ ज्ञार्त हो जार्तार् है।

    प्रमार्प लार्गत विधि के उद्देश्य 

    1. प्रमार्प लार्गत विधि नियन्त्रण क एक औजार्र है जिसकी सहार्यतार् से प्रभार्वपूर्ण नियन्त्रण सम्पार्दित कर कार्य क्षमतार् व उत्पार्दकतार् में वृद्वि की जार् सकती है। 
    2. इस लार्गत विधि क दूसरार् उद्देश्य ही वार्स्तविक और प्रमार्प लार्गतों में अन्तर क निर्धार्रण कर विचरणों के कारणों क पतार् लगार्यार् जार्तार् है। कारणों की जार्नकारी के आधार्र पर विचरणों के लिए उत्तरदार्यी व्यक्ति/ केन्द्र क पतार् लगार्यार् जार् सकतार् हैं। 
    3. कभी-कभी बजटरी नियंत्रण के सहार्यक के रुप में प्रमार्प लार्गत लेखार् विधि को अपनार्नार् भी उद्देश्य हो सकतार् है। इन दोनों के संगम से नियंत्रण व्यवस्थार् और अधिक प्रभार्वशार्ली बन जार्ती हैं। 
    4. प्रबन्ध को महत्व पूर्ण सूचनार् प्रदार्न करनार् भी लार्गत लेखार् विधि क उद्देश्य होतार् है। इस विधि के मार्ध्यम से प्रबन्धकों को वह सूचनार् दी जार् सकती है जिसके फलस्वरुप उत्पार्दन कार्य पूर्व -निर्धार्रित योजनार् व प्रमार्प के आधार्र पर संपार्दित नही हो सका। 
    5. प्रबन्ध में आगे देखने और भार्वी विचार्र करने की शक्ति क विकास करनार् भी प्रमार्प लार्गत लेखार्विधि क उद्देश्य होतार् हैं। 

    प्रमार्प लार्गत विधि के लार्भ 

    1. प्रमार्प लार्गत एक अमुक क्रियार् के मार्पदण्ड होते हैं, जिससे वार्स्तविक लार्गत की तुलनार् की जार् सकती है। वार्स्तविक लार्गत की गत वर्ष की वार्स्तविक लार्गत से भी तुलनार् की जार् सकती है, परन्तु इस प्रकार की तुलनार् वैज्ञार्निक और परिशुद्ध नहीें हो पार्ती है क्योंकि इस प्रक्रियार् में अनेक ऐसे प्रश्न उठ पड़ते हैं जिनक सन्तोषजनक उत्तर व्यवहार्र में नहीं मिल पार्तार् है। इसलिए प्रमार्प लार्गत तुलनार्त्मक अध्ययन में न केवल सहार्यक बल्कि उचित माग प्रदर्शक भी होते हैं। 
    2. सार्धार्रण लेखार्ंकन से नैत्यक रूप में विचरणार्ंश के विश्लेषण द्वार्रार् किये गये खचोर्ं पर सतत् नियन्त्रण रखार् जार् सकतार् है। निष्पार्दन से पूर्व निर्धार्रित प्रमार्प से थोड़ार् सार् विचलन होने पर उत्तरदार्यी व्यक्ति की खोज की जार् सकती है और उन तथ्यो पर ध्यार्न केन्द्रित कियार् जार् सकतार् है जो योजनार् के अनुसार्र नहीं किये जार् रहे हों। इस प्रकार प्रबन्ध व्यवसार्य की क्षमतार् सरलतार्पूर्वक बढ़ार् सकतार् है।
    3. प्रमार्प लार्गत विधि के अन्तर्गत विभिन्न सूचनार् हेतु जो विवरण तैयार्र किये जार्ते हैं वे अपेक्षार्कृत संक्षिप्त एवं महत्वपूर्ण होते हैं। प्रबन्ध को सर्वार्धिक महत्वपूर्ण सूचनार् प्रार्प्त हो जार्ती है। इस प्रकार प्रमार्प लार्गत-विधि के प्रयोग से समय और श्रम की बचत हो सकती है 
    4. प्रबन्धकीय रिपोर्ट क निर्वचन भी अपेक्षार्कृत सरल हो जार्तार् है और इस रिपोर्ट के अध्ययन में समय की बचत हो जार्ती है। चूंकि रिपोर्ट में केवल महत्वपूर्ण सूचनार्ओं एवं तथ्यों को ही प्रदर्शित कियार् जार्तार् है अत: प्रबन्ध तुरन्त ही महत्पूर्ण तथ्यों पर ध्यार्न दे सकतार् है। 
    5. यदि प्रमार्प क सतत् रूप से अध्ययन कियार् जार्य और उसमें सुधार्र लार्यार् जार्य तो नियंन्त्रण क कार्य सुगम हो जार्तार् है। यही नहीं यदि प्रमार्प लार्गत विधि के अध्ययन द्वार्रार् प्रार्प्त फल के अनुसार्र तुरन्त कार्य कियार् जार्य तो लार्गत में कमी भी लार्यी जार् सकती है। इस प्रकार लार्गत नियन्त्रण और लार्गत में कमी- ये दोनों उद्देश्य प्रमार्प लार्गत विधि द्वार्रार् पूरे किये जार् सकते हैं। 
    6. प्रमार्प निर्धार्रित करने के लिए निर्मार्ण, प्रशार्सन, विक्रय और वितरण आदि सभी क्रियार्ओं क विवरणार्त्मक अध्ययन करनार् पड़तार् है। इस प्रकार के अध्ययन में लार्गत केन्द्र क स्थार्पन, अधिकार रेखार् क स्पष्टीकरण और उत्तरदार्यित्व क निर्धार्रण शार्मिल होतार् है। अत: कुछ सीमार् तक अक्षम एवं अपूर्ण क्रियार्ओं को प्रार्रम्भ में ही दूर कियार् जार् सकतार् है। 
    7. उत्पार्दन कार्य प्रार्रम्भ होने से पूर्व ही निश्चिततार् के सार्थ उत्पार्दन एवं मूल्य सम्बन्धी नीति निर्धार्रित की जार् सकती है। 
    8. प्रमार्प लार्गत विधि के अन्तर्गत श्रमिकों की क्षमतार् क ज्ञार्न सरलार्तार्पूर्वक प्रार्प्त कियार् जार् सकतार् है। इसके आधार्र पर श्रमिकों को बोनस व प्रेरणार् भुगतार्न की योजनार् सरलतार् से बनार्यी जार् सकती है। 

      प्रमार्प लार्गत विधि की सीमार्एं 

       प्रमार्प लार्गत विधि हर समय और प्रत्येक स्थिति में लार्भदार्यक यन्त्र के रूप में नहीं कर सकती है। अन्य विधियों की भार्ंति इसकी भी कुछ सीमार्एं होती हैं जिन्हें ध्यार्न में रखनार् आवश्यक होतार् है। कुछ सीमार्एं हैं :-

      1. प्रमार्प लार्गत विधि को लार्गू करनार् बहुत ही खर्चीलार् होतार् हैं। प्रमार्प निर्धार्रित करनार् न केवल खर्चीलार् होतार् है बल्कि उच्च स्तर की योग्यतार् व बुद्धि की जरूरत पड़ती है जो प्रत्येक व्यार्वसार्यिक संस्थार् को सहज ही में उपलब्ध नहीं होती हैं। छोटे आकार की संस्थार्ओं में इस विधि को लार्गू करनार् अति कठिन होतार् है। 
      2. जिन परिस्थितियों में प्रमार्प निर्धार्रित किये गये हों यदि उनमें परिवर्तन हो जार्तार् है तो प्रमार्प क पुनर्निरीक्षण आवश्यक हो जार्तार् है। यदि ऐसार् नहीं कियार् जार्तार् है तो प्रमार्प जड़वत् मार्ने जार्ते हैं और विचरणार्ंश में प्रयुक्त होने लार्यक नहीं रह जार्ते है परन्तु पुनर्निरीक्षण क कार्य इतनार् पेचीदार् व कठिन होतार् है कि बहुत सी संस्थार्एं पुनर्निरीक्षण करती ही नहीं है। 
      3. प्रमार्प लार्गत विधि मनोवैज्ञार्निक विपरीत प्रभार्व डार्ल सकती है। कर्मचार्री वर्ग में हतोत्सार्ह की भार्वनार् पैदार् हो सकती है। ऐसार् तभी होतार् है जब प्रमार्प काफी उँचे रखे जार्ते हैं। 
      4. सभी प्रकार की औद्योगिक संस्थार्ओं के लिए यह विधि उचित नहीं मार्नी जार्ती है। 
      5. प्रमार्प लार्गत विधि द्वार्रार् ज्ञार्त कारकों को दूर करनार् ही उद्देश्य होनार् चार्हिए। उत्तरदार्यी व्यक्ति को दण्डित करनार् इसक उद्देश्य नहीं होनार् चार्हिए।

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