प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् क अर्थ
औद्योगिक संबंध के दो महत्वपूर्ण पहलू होते है। ये है- संघर्ष तथार् सहयोग के पहलू। आधुनिक उद्योग प्रबंध और श्रम के सहयोग के कारण ही चलते रहते हैं यह सहयोग नियोजन में अनौपचार्रिक रूप से स्वत: होतार् रहतार् है। उद्योगों क चलते रहनार् दोनों के हितों में आवश्यक है। सार्थ ही, नियोजन और श्रमिकों के कुछ हितों में विरोध भी पार्ए जार्ते है। जिससे उनके बीच संघर्ष भी होतार् रहतार् है। नियोजक और नियोजितों के कर्इ हितों में विरोध नहीं होते, जिससे वे परस्पर सहयोग करते रहते है। इन्ही उभय हितों को ध्यार्न में रखते हुए श्रम-प्रबन्ध सहयोग की कर्इ औपचार्रिक संस्थार्एँ स्थार्पित की गर्इ हैं, जो नियमित रूप से उभय समस्यार्ओं क समार्धार्न करती है। इन संस्थार्ओ को कर्इ नार्म से पुकरार् जार्तार् है; जैसे-श्रम-प्रंबध सहयोग,संयुक्त परार्मर्श, सह-निर्धार्रण,संयुक्त निर्णयन, उद्योग में श्रमिकों की सहभार्गितार्,यार् प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् सार्धार्रणत: उपर्युक्त सभी शब्द-समूह क प्रयोग समार्न अथार्ंर् े में कियार् जार्तार् है, लेकिन उनमें कभी-कभी सहभार्गितार् के विशिष्ट रूपों, स्तरों यार् उसकी मार्त्रार् के आधार्र पर अंतर बतार्ने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है।

प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् क अर्थ 

  1. जीOपीO सिन्हार् और पी आर एन सिन्हार् के अनुसार्र’’ श्रम-प्रबंध सहयोग से श्रम और पूँजी में दोनों की उभय समस्यार्ओं के समार्धार्न यार् उपचार्र के लिए संयुक्त प्रयार्सों क बोध होतार् है।’’ 
  2. वीO जीO मेहत्रार्ज के मत में सहभार्गितार् क अर्थ होतार् है,’’ किसी औद्योगिक संगठन में सार्धार्रण कर्मियों द्वार्रार् समुचित प्रतिनिधियों के जरिए प्रबंध के सभी स्तरों पर प्रबंधकीय क्रियार्ओं के समस्त क्षेत्र में निर्णयन के अधिकार में भार्ग लेनार्’’ 
  3. केO सीO अलेक्जेंडर के अनुसार्र, कोर्इ भी प्रबंध सहभार्गी तभी होतार् है, ‘‘जब वह किसी भी स्तर पर यार् क्षेत्र में अपने निर्णयन की प्रक्रियार् को प्रभार्वित करने के लिए कर्मकारों को अवसर प्रदार्न करतार् है यार् जब वह अपने कुछ प्रबंधकीय परमार्धिकारों में उनके सार्थ-सार्थ भार्ग लेतार् है।’’
  4. इआन क्लेग्ग के मत में, प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् से ‘‘ऐसी स्थिति क बोध होतार् है, जिसमें कामगार्रों के प्रतिनिधि कुछ हद तक प्रबंधकीय निर्णयन की प्रक्रियार् में सम्मिलित होते है, लेकिन जहार्ँ अंतिम शक्ति प्रबंध के हार्थों में ही रहती है।’’ 
  5. निल डब्यूO चैम्बरलेन ने सार्मूहिक सौदेबार्जी और संघ-प्रबंध सहयोग के बीच अंतर बतार्ने के सिलसिले में कहार् है-संघ-प्रबंध सहयोग ‘‘स्पष्ट रूप से उभय हितों से संबद्ध विषयों पर संयुक्त निर्णयन है।’’ 
  6. जेO आरO पीO फ्रेंच के अनुसार्र ‘‘भार्गीदार्री वह प्रक्रियार् है जिसमें दो यार् अधिक पक्षकार कतिपय योजनार्एँ और नीति बनार्ते तथार् निर्णय लेते समय एक-दूसरे को प्रभार्वित करते रहते हैं। यह उन निर्णयों तक सीमित रहती है जिनक प्रभार्व उन सभी पर पड़तार् है जो निर्णय लेते हैं। तथार् जिनक वे प्रतिनिधित्व करते है।’’ 

उपर्युक्त परिभार्षार्ओं से स्पष्ट हैं कि प्रबंध श्रमिकों की सहभार्गितार् से ऐसी स्थिति क बोध होतार् है, जिसमे प्रबंध अपने परंपरार्गत परमार्धिकारों में उन विषयों पर श्रमिकों के सार्थ संयुक्त निर्णयन करते हैं जिन्हे दोनो उभय हित में उपयोगी समझते हैं। सार्मूहिक सौदेबार्जी में दोनों पक्षकार अपने विरोधी हितों के विषयों पर मोल-तोल करते हैं, लेकिन प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् में वे सौदेबार्जी नहीं करते, बल्कि अपने उभय हितों पर संयुक्त निर्णय लेते हैं।

प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् के उद्देश्य 

1. उत्पार्दकतार् में वृद्धि –

उत्पार्दकतार् में वृद्धि प्रबंध और श्रम के उभय हित में है। उत्पार्दकतार् के बढ़ने से श्रमिकों की अधिक मजदूरी और विभिन्न प्रकार की सुविधार्ओं की उपलब्धि की संभार्वनार् होती है तथार् नियोजक को अधिक लार्भ की प्रार्प्ति हो सकती हैं श्रम-प्रबंध सहयोग से उत्पार्दकतार् यार् कौशल में वृद्धि की जार् सकती है तथार् उत्पार्दित वस्तुआं की गुणवत्तार् में सुधार्र लार्यार् जार् सकतार् है। इससे बरबार्दी को रोकने तथार् लार्गत कम करने में भी सहार्यतार् मिल सकती हें उत्पार्दकतार् में वृद्धि के फल के विभार्जन के सिलसिलेमें श्रमिकों और प्रबंधकों यार् नियोजक के बीच मतभेद हो सकतार् है, लेकिन उसे बढ़ार्ने यार् उसमें सुधार्र लार्ने के संबंध में उनके बीच विरोध की बार्त नहीं उठती। जहार्ँ उत्पार्दकतार्-वृद्धि के फल के विभार्जन की समुचित व्यवस्थार् है, वहार्ँ प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् की अधिकांश योजनओं में उत्पार्दकतार्-वृद्धि, यंत्रों और मशीनों यार् समुचित उपयोग, बरबार्दी की रोकथार्म, उत्पार्दित वस्तुओं की गुणवत्तार् बनार्ए रखने, उत्पार्दन-घंटो के अधिकाधिक उपयोग, विनिर्मार्ण-प्रक्रियार् तथार् कार्य की भौतिक दशार्ओं में सुधार्र को विशेष रूप से सम्मिलित कियार् जार्तार् है

2. औद्योगिक प्रजार्तंत्र को प्रोत्सार्हन – 

कर्इ लोगों के मत में आधुनिक उद्योगों में उन विषयों के निर्धार्रण में श्रमिकों को सहभार्गितार् के अवसर प्रदार्न करनार् आवश्यक है, जिनसे वे प्रत्यक्ष रूप से सबंद्ध रहते हैं। सार्मूहिक सौदेबार्जी में श्रमिक नियोजक पर दबार्व डार्लकर बहुत कुछ ले लेते हैं, लेकिन इससे उन्हें प्रतिदिन के प्रबंध में भार्ग लेने क नियमित अवसर नहीं मिलतार्। सार्मूहिक सौदेबार्जी के विकास, श्रमसंघों की शक्ति में वृद्धि तथार् नियोजकों की प्रवृत्ति में परिवर्तन के कारण ऐसी संस्थार्ओं के गठन पर जोर दियार् जार्ने लगार् हैं, जिसमें श्रमिकों के प्रतिनिधि प्रबंधकों के सार्थ नियमित रूप से बैठकर संयुक्त निर्णय ले सकें। इससे श्रमिकों के बीच प्रतिष्ठार्न के प्रति अस्थार् मजबूत होती है और उन्हें प्रबंध में भार्ग लेते रहने की संतुष्टि प्रार्प्त होती रहती है। सार्मजवार्दी देशों में तो प्रबंध के कर्इ क्षेत्रों में श्रमिकों की सहभार्गितार् को प्रोत्सार्हित करने पर विशेष रूप से जोर दियार् जार्तार् है। ऐसे कुछ देशों में श्रमिक उद्योग के विभिन्न स्तरों पर कर्इ महत्वपूर्ण विषयों पर प्रबंधकों के सार्थ संयुक्त निर्णय लेते है। इस तरह, प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् से औद्योगिक प्रजार्तंत्र की स्थार्पनार् को प्रोत्सार्हन मिलतार् है।

3. संघर्ष की रोकथार्म-

श्रम और प्रबंध के बीच सहयोग से दोनों एक-दूसरे की समस्यार्ओं और स्थितियों से अच्छी तरह अवगत होते हैं और वे उनके समार्धार्न के लिए मैत्री के वार्तार्वरण में पय्र ार्स करते हैं। इस तरह, श्रम-पब्र ंध सहयोग से उद्योग में अच्छे नियोजक-नियोजित सबंध की स्थार्पनार् होती है। संयुक्त निर्णयों द्वार्रार् समस्यार्ओं के समार्धार्न के अनुभव से दोनों पक्षकार विवार्दार्स्पद विषयों के भी हल निकालने में सफल होते हैं। कोर्इ भी पक्ष संयुक्त निर्णयों से असंतुष्ट होने पर उनक विरोध नहीं करतार्, क्योंकि उनमें वह भी सक्रिय पक्षकार रहार् है। इस तरह, प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् से औद्योगिक शार्ंति बनार्ए रखने में प्रचुर सहार्यतार् मिलती है।

4. श्रमिकों के विकास एवं कार्यतोष में सहार्यक- 

प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् की योजनार्ओं से श्रमिकों को आत्मार्भिव्यक्ति और विचार्रों के आदार्न-प्रदार्न क प्रचुर अवसर मिलतार् है। उनके विचार्रों एवं सुझार्वों से संगठन के उद्देश्यों की पूर्ति में सहार्यतार् मिलती है तथार् प्रबंध भी श्रमिकों के विकास के लिए सार्मुचित अवसर प्रदार्न करतार् रहतार् है। प्रबंध की सहनुभूतिपूर्ण प्रवृत्ति एवं संगठन में व्यार्प्त सहयोग के वार्तार्वरण से श्रमिकों के कार्यतोष में भी वृद्धि होती रहती है। सार्थ ही, श्रमिक समझते है कि इन योजनार्ओं के मार्ध्यम से कार्य-स्थल पर उनके मार्नवीय अधिकारों पर ध्यार्न दियार् जार् रहार् हैं। और वे सक्रिय भार्गीदार्र के रूप में संगठन के उद्देश्यों की प्रार्प्ति में अपनार् योगदार्न देते रहते हैं।

5. प्रबंधकीय कौशल में वृद्धि – 

प्रबंध में श्रमिकों की भार्गीदार्री से प्रबंध को उत्पार्दक तथार् संगठन के अन्य उद्देश्यों की प्रार्प्ति में श्रमिकों के उपयोगी सुझार्व मिलते रहते है। इन सुझार्वों को ध्यार्नमें रखते हुए प्रबंधक अपनी कार्य-प्रणार्ली एवं उत्पार्दन-प्रक्रियार्ओं में सुधार्र करते रहते हैं। सहभार्गितार् की योजनार्ओं के लार्गू होने के फलस्वरूप दोषपूर्ण प्रबंधकीय क्रियार्कलार्प एवं तरीकों को त्यार्गे जार्ने एवं सही मागो के अपनार्ए जार्ने के कर्इ उदार्हरण मिलते हैं। इस तरह, प्रबंधकीय कौशल में वृद्धि होती है और संगठन के उद्देश्य सहजतार् से प्रार्प्त होते है।

सहभार्गितार् क स्तर यार् मार्त्रार् 

प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् क स्तर यार् उसकी मार्त्रार् एक समार्न नहीं होती। कहीं सहभार्गितार् बहुत ही सीमित होती हैं, तो कहीं श्रमिक कर्इ पब्रधकीय क्षेत्रों में सक्रिय रूप से भार्ग लेते हैं। विभिन्न देशों के प्रबंध में श्रमिकों की भार्गीदार्री की योजनार्ओं के अध्ययन के आधार्र पर विद्धार्नों ने सहभार्गितार् के विभिन्न स्तरों क उल्लेख कियार् है। इन विद्वार्नों में अलेक्जेंडर, मेहत्रार्ज, रार्घवन, दत्तार्, टार्निक आरै एडम सम्मिलित हैं। भार्गीदार्री की योजनार्ओं के क्रियार्न्वयन को ध्यार्न में रखते हुए प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् के अग्रलिखित स्तरों यार् मार्त्रार् क उल्लेख कियार् जार् सकतार् है-

1. सूचनार्त्मक सहभार्गितार् –

सहभार्गितार् के इस स्तर पर नियोजक उद्यम से सबंद्ध कुछ विशेष क्षेत्रों जैसे- व्यवसार्य की दशार्ओं, उद्यम के भविष्य, उत्पार्दन-प्रणार्ली में परिवर्तन आदि के संबंध में सूचनार्एँ उपलब्ध करार्ने के लिए सहमत हो जार्ते है। सहभार्गितार् क यह स्तर न्यूनतम होतार् है। सूचार्त्मक सहभार्गितार् से कर्मचार्री नियोजक की स्थिति से अवगत हो जार्ते है तथार् उन्हें ध्यार्न में रखते हुए अपनी मार्ँगों और सुझार्वों को प्रस्तुत करते हैं। इससे श्रमसंघ को अपनी नीतियों एवं कार्यक्रमों में संशोधन करने तथार् कर्मचार्रियों की प्रवृत्तिमें परिवर्तन लार्ने में सहार्यतार् मिलती है। भार्रत में प्रबंध में श्रमिकों की भार्गीदार्री की योजनार्ओं के अंतर्गत जिन क्षेत्रों में कर्मचार्रियों को सूचनार्एँ उपलब्ध करार्ने की व्यवस्थार् की गर्इ है, उनमे मुख्य है- उद्यम की सार्मार्न्य आर्थिक स्थिति, उद्यम क संगठन और सार्मार्न्य संचार्लन, बार्जार्र, विक्रय एवं उत्पार्दन की स्थिति, कार्य एवं विनिर्मार्ण के तरीके, वाषिक तुलन-पत्र तथार् विस्तार्र एवं परिनियोजन-योजनार्एँ।

2. समस्यार्-सहभार्गितार्-

सहभार्गितार् के इस स्तर पर नियोजक उत्पार्दन यार् उद्यम से संबद्ध विशेष समस्यार्ओं के समार्धार्न के लिए कर्मचार्रियों यार् श्रमसंघ से परार्मर्श करतार् है और इस संबंध में उनक सहयोग प्रार्प्त करतार् हैं इस स्तर की सहभार्गितार् सार्मार्न्यत: आवश्यकतार् पड़ने पर विशेष समस्यार्ओं के समार्धार्न के लिए अस्थार्यी रूप से होती है। अनुभव के आधार्र पर इसे व्यार्पक और स्थार्यी रूप दियार् जार् सकतार् है। संयुक्त रार्ज्य अमेरिक के वस्त्र-उद्योग में इस तरह की सहभार्गितार् के कर्इ उदार्हरण मिलते है। भार्रत में प्रबंध में श्रमिकों की भार्गीदार्री की योजनार्ओं में जिन समस्यार्ओं के समार्धार्न क उल्लेख कियार् गयार् है, उनमें महत्वपूर्ण हं-ै निम्न-उत्पार्दकतार्, बरबार्दी, अनपु स्थिति, अनुशार्सनहीनतार्, दोषपूर्ण सेवार्, चोरी और भ्रष्टार्चार्र, प्रदूषण, मद्यपार्न और जुआबार्जी।

3. परार्मश्र्ार्ी सहभार्गितार्-

सहभार्गितार् के इस स्तर यार् मार्त्रार् में नियोजक और कर्मचार्रियों यार् श्रमसंघ के बीच कर्इ पूर्व-निर्धार्रित उभय विषयों पर औपचार्रिक एवं नियमित परार्मर्श की व्यवस्थार् की जार्ती है। इसके अंतर्गत नियोजक उद्यम से संबद्ध महत्वपूर्ण विषयों पर निर्णय लेने के पहले कर्मचार्रियों यार् श्रमसंघों से परार्मर्श कर लेतार् है और उनके दृष्टिकोणों को ध्यार्न में रखकर निर्णय लेने के पहले कर्मचार्रियों यार् श्रमसंघों नियोजक को अपने विचार्रों से अवगत करार्ते है और अपने सुझार्व भी देते है, लेकिन उन्हें स्वीकार करने के लिए नियोजक को बार्ध्य नहीं करते। परार्मश्र्ार्ी सहभार्गितार् में संयुक्त-निर्णयन नहीं होतार्। इस स्तर की सहभार्गितार् से कर्मचार्रियों और श्रमसंघ की प्रस्थिति को निश्चित मार्न्यतार् मिलती है। भार्रत में प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् की योजनार्ओं में परार्मश्र्ार्ी सहभार्गितार् के कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्र हं-ै स्थार्यी आदेश उत्पार्दन एवं विनिर्मार्ण के नए तरीके, बंदी तथार् संचार्लन में रूकावट, अनुपस्थिति, सुरक्षार्, अनुशार्सन, भौतिक दशार्एँ, संचार्र, तथार् उत्पार्दकतार् और गुणवत्तार्।

4. प्रशार्सकीय सहभार्गितार् –

इस स्तर की सहभार्गितार् में उद्यम से संबद्ध कुछ क्षेत्रों में प्रशार्सन क भार्र कर्मचार्रियों और पब्र ंधकों की संयुक्त समितियों को सार्ंपै दियार् जार्तार् हैं। सहभार्गितार् के इस स्तर में कर्मचार्रियों को अपेक्षार्कृत अधिक जिम्मेदार्री और अधिकार प्रार्प्त होते हैं तथार् उन्हैं। प्रशार्सन और निरीक्षण-संबंधी कायार्ंर् े में अधिक स्वार्यत्ततार् प्रार्प्त होती है। भार्रत की सहभार्गितार्-योजनार्ओं में जिन क्षेत्रों में संयुक्त निकायों को प्रशार्सकीय दार्यित्व सार्ंपै े जार्ने की व्यवस्थार् है, उनमें महत्वपूर्ण हैं-सुरक्षार्, कंटै ीन, कल्यार्ण-सुविधार्एँ, सुझार्व, और शिक्षु तथार् व्यार्वसार्यिक प्रशिक्षण। 5. निर्णयार्त्मक सहभार्गितार् -यह प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् क उच्चतम स्तर है। इस स्तर में निर्णय की प्रक्रियार् वार्स्तव में संयुक्त होती है। इसमें प्रबंध और श्रमसंघ यार् श्रमिकों के प्रतिनिधि दोनों को संयुक्त रूप से निर्णय लेने के अवसर मिलते हैं और निर्णयों के परिणार्मों क दार्यित्व दोनों पर संयुक्त रूप से रहतार् है। अधिकांश योजनार्ओं में संयुक्त-निर्णयन के क्षेत्र पूर्व-निर्धार्रित रहते हैं, लेकिन इन क्षेत्रों की व्यार्पकतार् यार् विषयों में अंतर पार्यार् जार्तार् है। निदेशक बोर्ड में श्रमिकों क प्रतिनिधित्व भी इस स्तर की सहभार्गितार् क उदार्हरण यार् विषयों में अंतर पार्यार् जार्तार् है। निदेशक बोर्ड में श्रमिकों क प्रतिनिधित्व भी इस स्तर की सहभार्गितार् क उदार्हरण है। भार्रत में संयुक्त-निर्णयन के क्षेत्र सीमित हैं, लेकिन जर्मनी, स्वेडेन, इटली, युगोस्लार्वियार्, पोलैंड और जार्पार्न में ये व्यार्पक हैं।

कुछ लोग सार्मूहिक सौदेबार्जी को भी निर्णयार्त्मक सहभार्गितार् के रूप में देखते है। लेकिन, प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् और सार्मूहिक सौदेबार्जी में केवल विषयवस्तु के आधार्र पर ही अंतर नहीं होतार्, बल्कि दोनों के स्वरूप में भी अंतर होतार् है। सहभार्गितार् मुख्यत: उभय हितों के विषयों पर ही होती है, जबकि सार्मूहिक सौदेबार्जी मुख्यत:विरोधी हितों पर। प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् में सöार्वनार् एवं पार्रस्परिक विश्वार्स के आधार्र पर उभय हितों के विषयों पर सहयोग करनार् तथार् उत्पार्दन-वृद्धि यार् कार्यकुशलतार् के सुधार्र करनार् आवश्यक तत्व होते हैं, लेकिन सार्मूहिक सार्दै ेबार्जी दोनों पक्षकारों को उत्पीड़क शक्ति से उत्पन्न हो सकने वार्ले परिणार्मों पर आधृत रहतार् है।

भार्रत में प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् की योजनार्एँ 

भार्रत में प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् क प्रार्रंभ मुख्यत: सरकार के तत्त्वार्वधार्न में हुआ। 1947 के औद्योगिक संधि-प्रस्तार्व में श्रमिकों के कौशल तथार् उत्पार्दकतार् में सुधार्र लार्ने के उद्देश्य से औद्योगिक प्रतिष्ठार्नों में इकार्इ-उत्पार्दन-समितियों के गठन पर जोर दियार् गयार्। 1948 के औद्योगिक नीति प्रस्तार्व में द्विदलीय उत्पार्दन-समितियों की स्थार्पनार् की अनुशंसार् की गर्इ। 1948 में ही केन्द्रीय सरकार ने इकार्इ उत्पार्दन समितियों के गठन के लिए एक आदर्श प्रार्रूप तैयार्र कियार्। औद्योगिक विवार्द अधिनियम, 1947 के अंतर्गत गठित की गर्इ कार्य-समितियों द्वार्रार् उत्पार्दन-समितियों के रूप में काम करने पर भी जोर दियार् गयार्। आदर्श प्रार्रूप के अनुसार्र इकार्इ-उत्पार्दन-समितियों क मुख्य कार्य उत्पार्दन की उन विशेष समस्यार्ओं पर विचार्र-विमर्श करनार् तथार् सलार्ह देनार् है, जिनसे श्रमिक प्रत्यक्ष रूप से संबद्ध हो सकते हैं। प्रत्येक समिति में प्रतिष्ठार्न में नियोजित श्रमिकों के निर्वार्चित प्रतिनिधि तथार् प्रबंध द्वार्रार् मनोनीत प्रतिनिधि होंगे। समितियों के क्रियार्कलार्प में जिन विशेष को सम्मिलित कियार् गयार्, उनमें मुख्य हैं- (i) मशीनों, यंत्रों और औजार्रों क अच्छार् रख-रखार्व, (ii) उत्पार्दन-समय क सर्वार्धिक उपयोग, (iii) दोषपूर्ण कार्य एवं बरबार्दी की समार्प्ति तथार् (iv) सुरक्षार्-सार्धनों एवं तरीकों क अधिक कुशलतार् से प्रयोग। योजनार्, विकास, उत्पार्दन के व्यार्पक कार्य, पूर्णत: प्रबंधकीय कार्य तथार् श्रमसंघों द्वार्रार् संपार्दित किए जार्ने वार्ले कार्य इन समितियों के दार्यरे से बार्हर रखे गए। व्यवहार्र में, इन प्रयार्सों को कोर्इ सफलतार् नहीं मिली, लेकिन प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् के विचार्र को कर्इ मंचो पर स्वीकृति मिलती गर्इ। कालक्रम में देश में श्रम-प्रबंध सहयोग को प्रोत्सार्हित करने के लिए सरकार द्वार्रार् कर्इ महत्वपूर्ण कदम उठार्ए गए।

1958 में देश में संयुक्त प्रबंध परिषदों की योजनार् अपनाइ गर्इ। 1975 में कर्मशार्लार् परिषदों तथार् संयुक्त परिषदों की नर्इ योजनार्एँ लार्गू की गर्इ। 1977 में सावजनिक क्षेत्र के वार्णिज्यिक एवं सेवार् संगठनों के लिए अलग से श्रम-प्रबंध सहयोग की संस्थार्ओं की स्थार्पनार् की गर्इ। 1977 में ही संविधार्न में संशोधन कर रार्ज्य-नीति के निर्देशक सिद्धार्ंतों के अंतर्गत अनुच्छेद 43श् को जोड़कर उपयुक्त विधार्न बनार्कर यार् अन्य कारगर तरीके से उद्योग में लगें उद्यमों, स्थार्पनों तथार् अन्य संगठनों में प्रबंध में इस संबंध में एक समिति गठित की गर्इ। समिति की सिफार्रिशों पर 1980 में श्रममंत्री रवीन्द्र वर्मार् की अध्यक्षतार् में इस संबंध में एक समिति गठित की गर्इ। समिति की सिफार्रिशों पर 1980 में श्रममंत्रियों के सम्मेलन में विचार्र कियार् गयार्। इन सिफार्रिशों को ध्यार्न में रखते हुए, 1983 में केंद्रीय सावजनिक क्षेत्र के उद्यमों के लिए 1975 और 1977 की योजनार्ओं के स्थार्न पर प्रबंध में कर्मचार्रियों की भार्गेदार्री की एक नर्इ योजनार् शुरू की गर्इ। इनके अतिरिक्त, देश में सरकारी सेवार्ओं तथार् कुछ निजी प्रतिष्ठार्नों में संयुक्त परिषदों की अलग से व्यवस्थार् है। भार्रत में प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् की संस्थार्ओं को निम्नलिखित श्रेणियों में रखार् जार् सकतार् है।

1. कार्य-समिति, 1947
2. संयुक्त प्रबंध परिषद, 1958
3. पुरार्ने 20-सूत्री कार्यक्रम के अधीन प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् की संस्थार्एँ, 1975
4. सावजनिक क्षेत्र के वार्णिज्यिक एवं सेवार्-संगठनों के लिए संस्थार्एँ, 1977
5. सावजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के लिए प्रबंध में कर्मचार्रियों की भार्गीदार्री योजनार्ओं के अंतर्गत संस्थार्एँ, 1983
6. सरकारी सेवार्ओं में संयुक्त परिषद
7. कुछ निजी प्रतिष्ठार्नों में प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् की संस्थार्एँ

प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् की उपर्युक्त संस्थार्ओं की विवेचनार् नीचे की जार्ती है।

1. कार्य-समिति, 1947-

औद्योगिक विवार्द अधिनियम, 1947 के अंतर्गत ऐसे किसी भी प्रतिष्ठार्न में, जिसमें 100 यार् इससे अधिक संख्यार् में कर्मकार नियोजित हैं। यार् पिछले बार्रह महीने में किसी भी दिन नियोजित रहे हों, अपने-अपने अधिकार-क्षेत्र के उद्योगों के संबंध में केंद्रीय एवं रार्ज्य सरकारें कार्य-समिति के गठन की अपेक्षार् कर सकती है। कार्य-समिति में नियोजक और कर्मकारों के प्रतिनिधि होते हैं, लेकिन कर्मकारों के प्रतिनिधियों की संख्यार् नियोजकों के प्रतिनिधियों की संख्यार् से कम नहीं हो सकती। कर्मकारों के प्रतिनिधियों क चयन संबद्ध प्रतिष्ठार्न के पंजीकृत श्रमसंघ के परार्मर्श से करनार् आवश्यक है। अधिनियम के अनुसार्र कार्य-समिति क कार्य नियोजक और कर्मकारों के बीच मैत्री और अच्छे संबंध बनार्ए रखने के लिए उपार्य करनार् और इस उद्देश्य से उनके सार्मार्न्य हितों और संपर्कवार्ले मार्मलों पर टिप्पणी करनार् तथार् मतभेदों को दूर करने के लिए प्रयार्स करनार् है।

औद्योगिक विवार्द अधिनियम में कार्य-समिति के विशिष्ट कार्यो क विवरण नहीं दियार् गयार् है। इस संबंध में भार्रतीय श्रम-सम्मेलन द्वार्रार् 1959 में एक समिति गठित की गर्इ, जिसकी सिफार्रिशों की पुष्टि सम्मेलन ने अपनी 1961 की बैठक में की। समिति ने कार्य-समिति के कार्यों की विस्तृत सूची बनार्नार् अव्यार्वहार्रिक समझार् तथार् इसमें लचीलेपन के तत्त्व को स्वीकार कियार्। फिर भी, समिति ने कार्य-समिति द्वार्रार् किए जार्नेवार्ले कार्यों और नहीं किए जार्नेवार्ले कार्यों के क्षेत्रों की एक निदश्र्ार्ीं सूची तैयार्र की।

कार्य-समिति द्वार्रार् किए जार् सकनेवार्ले कार्यों के क्षेत्र में सम्मिलित विषय है-(i) कार्य की दशार्एँ, जैसे-संवार्तन, तार्पमार्न, प्रकाश और सफाइ, (ii) सुविधार्एँ, जैसे- पेयजल की आपूर्ति, कंटै ीन, विश्रार्म-कक्षार्, शिश-ु गृह, चिकित्सार् एवं स्वार्स्थ्य सेवार्एँ, (iii) सुरक्षार्, दुर्घटनार्ओं की रोकथार्म, व्यार्वसार्यिक रोग तथार् संरक्षार्त्मक उपकरण, (iv) उत्सव तथार् रार्ष्ट्रीय अवकाश-दिन, (v) कल्यार्ण एवं जुर्मार्नार्-कोष क प्रशार्स, (vi) शैक्षिक एवं मनोरंजनार्त्मक क्रियार्कलार्प तथार् (vii) बचत और मितव्ययितार् को प्रोत्सार्हन।

वे क्षेत्र जो कार्य-समिति के कार्यक्षेत्र के बार्हर होंगे, हैं-(i) मजदूरी और भत्ते, (ii) बोनस तथार् लार्भ में भार्गीदार्री की योजनार्एँ, (iii) युक्तिकरण तथार् कार्यभार्र क नियतन, (iv)मार्नक श्रम-शक्ति क नियतन, (v) योजनार् एवं विकास-कार्यक्रम, (vi) छँटनी एवं जबरी छुट्टी से संबंध विषय, (vii) श्रमसंघ कार्यकलार्प के लिए उत्पीड़न, (viii) भविष्य-निधि, उपदार्न तथार् अन्य सेवार्-निवृि त्त योजनार्एँ, (ix) अभिपेर्र णार्-योजनार्एँ तथार् (x) आवार्स तथार् परिवहन-सेवार्एँ।

सरकार की श्रम-नीतियों एवं पंचवष्र्ार्ीय योजनार्ओं के अंतर्गत इस संस्थार् को शक्तिशार्ली बनार्ने पर जोर दियार् गयार्, लेकिन कुछ अपवार्दों को छोड़कर देश में कार्य-समिति की संस्थार् पूरी तरह विफल रही है। रार्ष्ट्रीय श्रम आयोग (1969) ने कार्य-समिति की असफलतार् के कारणों क उल्लेख करते हुए कहार् है, ‘‘हमार्रे समक्ष प्रस्तुत सार्क्ष्य में रार्ज्य सरकारों ने यह मत प्रकट कियार् है कि सिफरिशों के सलार्हकारी स्वरूप, उनके वार्स्तविक कार्यक्षेत्र और कार्यों के बार्रे में अस्पष्टतार्, संघों की आपस में चलने वार्ली प्रतिस्पर्धार्, संघों क विरोध और नियोक्तार्ओं द्वार्रार् इन तरीकों को अपनार्ने से इनकार करने के कारण ये समितियार्ँ आरै अधिक अप्रभार्वी होती जार् रही हैं। नियोक्तार्ओं के संगठनों ने इन समितियार्ँ की असफलतार् क कारण ये समितियार्ँ और अधिक अप्रभार्वी होती जार् रही हैं। नियोक्तार्ओं के संगठनों ने इन समितियार्ँ की असफलतार् क कारण संघों की आपसी प्रतिस्पर्धार्, संघों क विरोध और सदस्यों (श्रमिक पक्ष के) द्वार्रार् समिति में असंगत मार्मलों पर विचार्र-विमर्श शुरू करने की कोशिश जैसे तत्त्व रहे हैं। संघों के मतार्नुसार्र संघ और कार्य-समिति के कार्यक्षेत्रों-संबधी विवार्द और नियोक्तार्ओं क असहयोगपूर्ण रवैयार् इन समितियों की असफलतार् क नार्म कारण रहार् है।’’

2. संयुक्त प्रबंध परिषद, 1958- 

भार्रत में प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् के महत्व को स्वीकार करते हुए 1956 के औद्योगिक नीति-प्रस्तार्व में कहार् गयार्, ‘‘समार्जवार्दी प्रजार्तंत्र में विकास के सार्मार्न्य कार्य में श्रम सार्झेदार्र होतार् है तथार् उसे इसमें उत्सार्ह से भार्ग लेनार् चार्हिए। इसके लिए संयुक्त परार्मर्श की आवश्यकतार् है तथार् जहार्ँ संभव हो कामगार्रों और शिल्पियों को प्रबंध में उत्तरोत्तर सम्मिलित कियार् जार्नार् चार्हिए।’’ द्वितीय पंचवष्र्ार्ीय योजनार् में भी बड़े उद्योगों में संयुक्त प्रबंध परिषदों की स्थार्पनार् की सिफार्रिश की गर्इ। इकार्इ-उत्पार्दन-समितियों की तुलनार् में इन परिषदों को अधिक व्यार्पक अधिकार देने क सुझार्व दियार् गयार्। द्वितीय पंचवष्र्ार्ीय योजनार् की सिफार्रिशों को ध्यार्न में रखते हुए भार्रत सरकार ने यूरोपीय देशों में प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् की योजनार्ओं के अध्ययन के लिए एक दल भेजार्। इस अध्ययन-दल की रिपोर्ट और उसके सुझार्वों पर भार्रतीय श्रम-सम्मेलन के पंद्रहवें अधिवेशन के विस्तार्र से विचार्र-विमर्श हुआ। सम्मेलन ने अध्ययन-दल की रिपोर्ट और सिफार्रिशों को स्वीकार करते हुए प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् की विस्तार्र से योजनार् तैयार्र करने के लिए एक त्रिदलीय उपसमिति क गठन कियार्। 1958 में इस विषय पर एक रार्ष्ट्रीय सेमिनार्र क भी आयोजन कियार् गयार्, जिसमें भार्रत के विशेष संदर्भ में संयुक्त प्रबंध परिषदों के गठन से संबद्ध कर्इ महत्त्वपूर्ण सुझार्व दिए गये। सेमिनार्र में प्रबंध और श्रमसंघ के हितों को ध्यार्न में रखने के लिए संयुक्त प्रबंध परिषदों की स्थार्पनार् से संबद्ध एक आदर्श समझौते क प्रार्रूप भी तैयार्र कियार् गयार्। इन प्रयार्सों के फलस्वरूप भार्रत में संयुक्त प्रबंध परिषद की योजनार् तैयार्र की गर्इ और उसे लार्गू करने के लिए कदम उठार्ए गए। संयुक्त प्रबंध परिषदों के गठन और कार्यों की विवेचनार् नीचे की जार्ती है-

  1. संयुक्त प्रबंध परिषदों क गठन- संयुक्त प्रबंध परिषद में प्रबंध और कर्मचार्रियों के प्रतिनिधि बरार्बर-बरार्बर की संख्यार् में होगें। उनकी कुल संख्यार् बड़े प्रतिष्ठार्नों में अधिकतम 12 तथार् छोटे प्रतिष्ठार्नों में अधितम 6 हो सकती है। जिस प्रतिष्ठार्न में कानून के अंतर्गत मार्न्यतार्-प्रार्प्त प्रतिनिधिं श्रमसंघ है, उसमें कर्मचार्रियों के प्रतिनिधियों क मनोनयन उसी संघ के द्वार्रार् करनार् आवश्यक है। जहार्ँ इस प्रकार क श्रमसंघ नहीं है और वहार्ँ केवल एक श्रमसंघ है, तो कर्मचार्रियों के प्रतिनिधियों क मनोनयन उसी श्रमसंघ द्वार्रार् कियार् जार्एगार्। जहार्ँ दो यार् दो से अधिक श्रमसंघ हैं, वहार्ँ कर्मचार्रियों के प्रतिनिधियों क मनोनयन उन संघों की सहमति से कियार् जार्एगार्। श्रमसंघ अपने प्रतिनिधियों की कुल संख्यार् 25 प्रतिशत प्रतिनिधियों को गैर-कामगार्रों में से भी मनोनीत कर सकते हैं। प्रबंधकों के प्रतिनिधियों क मनोनयन प्रबंध द्वार्रार् कियार् जार्एगार्।
  2. संयुक्त प्रबंध परिषदों कें उद्देश्य एवं कार्य- आदर्श समझौते के प्रार्रूप में संयुक्त प्रबंध परिषदों के कार्यो क विस्तार्र से उल्लेख कियार् गयार् है। इस समझौते की प्रार्स्तार्वनार् में इन परिषदों के उद्देश्यों क भी उल्लेख कियार् गयार् है, जिनमें मुख्य है- (1) उद्यम, कर्मचार्रियों तथार् देश के सार्मार्न्य लार्भ के लिए उत्पार्दकतार् बढ़ार्ने क प्रयार्स करनार्, (2) उद्योग के कार्यकरण तथार् उत्पार्दन-प्रक्रियार् में कर्मचार्रियों को उनकी भूमिक तथार् उनके महत्व के बार्रे में अधिक समझ के अवसर प्रदार्न करनार् तथार् (3) उनकी आत्मार्भिव्यक्ति की भार्वनार् को संतुष्ट करनार्। इन परिषदों के कुछ विशेष लक्ष्य है- (i) कर्मचार्रियों के कार्य एवं रहने की दशार्ओं में सुधार्र लार्नार्, (ii) उत्पार्दकतार् में वृद्धि करनार्, (iii) कर्मचार्रियों के बीच से सु़झार्वों को प्रोत्सार्हित करनार्, (iv) कानूनों और समझौतों के प्रशार्सन में सहार्यतार् प्रदार्न करनार्, (v)प्रबंध और कर्मचार्रियों के बीच विश्वसनीय संचार्र-मार्ध्यम क कार्य करनार् तथार् (vi) कर्मचार्रियों में सहभार्गितार् की सजीव भार्वनार् क सर्जन करनार्। संयुक्त प्रबंध परिषदों के विशिष्ट कार्यों को तीन मुख्य श्रेणियों में रखार् गयार् है। यह हैं-(i) परार्मश्र्ार्ी कार्य ii) सूचनार् प्रार्प्त करने एवं सुझार्व देने से संबद्ध कार्य तथार् (iii) प्रशार्सनिक कार्य।
    1. परार्मश्र्ार्ी कार्य-प्रबंध के लिए संयुक्त प्रबंध परिषद से अग्रलिखित बार्तों पर परार्मर्श लेनार् आवश्यक है- 1. स्थार्यी आदेशों क सार्मार्न्य प्रशार्सन तथार् उनक संशोधन, 2.उत्पार्दन और विनिर्मार्ण के नए तरीकों क प्रयोग, जिससे श्रमिकों और मशीनों क पुन: परिनियोजन आवश्यक हो जार्तार् हो 3. बंदी तथार् संचार्लन में कमी यार् उसक रुक जार्नार्।
    2. सूचनार् प्रार्प्त करने एवं सुझार्व देने से संबद्ध कार्य- संयुक्त प्रबंध परिषदों को जिन विषयों पर सूचनार् प्रार्प्त करने तथार् सुझार्व देने के अधिकार होंगे वे है-1. प्रतिष्ठार्न की सार्मार्न्य आर्थिक स्थिति 2. उद्यम क संगठन तथार् सार्मार्न्य संचार्लन 3. बार्जार्र, उत्पार्दन तथार् विक्रय-कार्यक्रमों की स्थिति, 4. उद्यम की आर्थिक स्थिति को प्रभार्वित करने वार्ली परिस्थितियार्ँ, 5. कार्य एवं विनिर्मार्ण के तरीके, 6. वाषिक तुलन-पत्र, लार्भ-हार्नि क विवरण और संबद्ध दस्तार्वेज 7. विस्तार्र एवं पुन: परिनियोजन की दीर्घकालीन योजनार्एँ तथार् 8. अन्य सहमत विषय।
    3. प्रशार्सनिक कार्य- संयुक्त प्रबंध परिषदों के प्रशार्सनिक कायार्ंर् े में सम्मिलित हैं- 1. कल्यार्णकारी कार्यक्रमों क प्रशार्सन, 2. सुरक्षार् के उपार्यों क पर्यवेक्षण, 3. व्यार्वसार्यिक प्रशिक्षण एंव शिक्षु योजनार्ओं क संचार्लन, 4. कार्य के घंटों, अंतरार्लों तथार् अवकाशों की अनुसूची तैयार्र करनार्, 5. कर्मचार्रियों से प्रार्प्त किए गए उपयोगी सुझार्वों के लिए परितोषिक क भुगतार्न तथार् 6. अन्य विषय जिनके बार्रे में परिषद में सहमति हो। सार्मूहिक सौदेबार्जी के विषयों- जैसे मजदूरी, बोनस, भत्तों आदि को- संयुक्त प्रबंध परिषदों के अधिकार-क्षेत्र से बार्हर रखार् गयार् है। व्यक्तिगत परिवेदनार्ओं को भी इन परिषदों के दार्यरे में नहीं रखार् गयार् है। संयुक्त प्रबंध परिषदों को प्रोत्सार्हित करने के लिए सरकार तथार् त्रिपक्षीय निकायों द्वार्रार् कर्इ तरह के प्रयार्स किए गये। देश की पंचवष्र्ार्ीय योजनार्ओं में उन्हें प्रोत्सार्हित करने के लिए नीति और कार्यक्रमों क उल्लेख कियार् गयार्। इन प्रयार्सों के बार्वजूद देश में संयुक्त प्रबंध परिषदों की प्रगति अत्यंत ही असंतोषजनक रही है। 1966 से 1968 की अवधि को छोड़कर इन परिषदों की कुल संख्यार् देशभर में 100 से भी कम रही है। वर्तमार्न समय में देश में 80 से भी कम संयुक्त प्रबंध परिषदें कार्यरत हैं। जिन प्रतिष्ठार्नों में यह परिषदें है। उनमें भी व सुचार्रु रूप से काम नहीं कर रहीं है।

3. पुनार्ने 20-सूत्री कार्यक्रम के अधीन प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् की संस्थार्एँ, 1975- 

1975 के बीस-सूत्री कार्यक्रम के अधीन प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् की नर्इ योजनार्एँ लार्गू करने के निदेश दिए गये थे।इन निदेशों को ध्यार्न में रखते हुए भार्रत सरकार ने कर्मशार्ली-तल तथार् प्रतिष्ठार्न यार् संयंत्र के स्तरों पर ‘उद्योग में श्रमिकों की सहभगितार्’ निजी तथार् सहकारी क्षेत्रों की ऐसी विनिर्मार्णी तथार् खनन इकाइयों में लार्गू करने क निर्णय कियार् गयार्, जिनमें 500 से अधिक कामगार्र नियोजित हों। ये योजनार्एँ विभार्गीय रूप से संचार्लित इकाइयों के लिए भी थीं। इन योजनार्ओं के अंतर्गत कर्मशार्लार्/विभार्ग के स्तर पर कर्मशार्लार् परिषदों तथार् उद्यम यार् प्रतिष्ठार्न के स्तर पर संयुक्त परिषदों की स्थार्पनार् की व्यवस्थार् की गर्इ।

1. कर्मशार्लार् परिषद- 

ऐसी प्रत्येक औद्योगिक इकार्इ में, जिसमें 500 यार् अधिक कामगार्र नियोजित हैं, नियोजक के लिए प्रत्येक विभार्ग यार् कर्मशार्लार् के लिए एक कर्मशार्लार् परिषद क गठन करनार् आवश्यक है। विभिन्न विभार्गों यार् कर्मशार्लार्ओं में नियोजित कामगार्रों की संख्यार् को ध्यार्न में रखते हुए नियोजक एक से अधिक विभार्गों/कर्मशलार्ओं के लिए केवल एक ही कर्मशार्लार् परिषद क गठन कर सकतार् है, लेकिन ऐसार् करते समय उसे मार्न्यतार्-प्रार्प्त श्रमसंघ यार् विभिन्न पंजीकृत श्रमसंघों यार् कामगार्रों से परार्मर्श लेनार् आवश्यक है।

  • कर्मशार्लार् परिषद- ऐसी प्रत्येक औद्योगिक इकार्इ में जिसमें 500यार् अधिक कामगार्र नियोजित हैं, नियोजक के लिए प्रत्येक विभार्ग यार् कर्मशार्लार् के लिए एक कर्मशार्लार् परिषद क गठन करनार् आवश्यक है। विभिन्न विभार्गों यार् कर्मशार्लार्ओं में नियोजित कामगार्रों की संख्यार् को ध्यार्न में रखते हुए नियोजक एक से अधिक विभार्गों/कर्मशार्लार्ओं के लिए केवल एक ही कर्मशार्लार् परिषद क गठन कर सकतार् है, लेकिन ऐसार् करते समय उसे मार्न्यतार्-प्रार्प्त श्रमसंघ यार् विभिन्न पंजीकृत श्रमसंघों यार् कामगार्रों से परार्मर्श लेनार् आवश्यक है।
  • गठन- प्रत्येक कर्मशार्लार् परिषद में प्रबंध और श्रमिकों के प्रतिनिधि बरार्बर-बरार्बर की संख्यार् में रहेंगे। प्रबंध के प्रतिनिधि संबद्ध इकार्इ के प्रबंधकों में से नियोजक द्वार्रार् मनोनीत किए जार्एँगे। कर्मकारों के प्रतिनिधि संबद्ध विभार्ग यार् कर्मशार्लार् में वार्स्तव में काम करनेवार्ले कर्मकारों में से होंगे। प्रत्येक कर्मशार्लार् परिषदमें सदस्यों की संख्यार् क निर्धार्रण नियोजक द्वार्रार् मार्न्यतार्-प्रार्प्त श्रमसंघ, पंजीकृत श्रमसंघों यार् कामगार्रों के परार्मर्श में सदस्यो की संख्यार् क निर्धार्रण नियोजक द्वार्रार् मार्न्यतार्-प्रार्प्त श्रमसंघ, पंजीकृत श्रमसंघों यार् कामगार्रों के परार्मर्श से कियार् जार्एगार्। कर्मशार्लार् परिषद में सदस्यों की कुल संख्यार् सार्मार्न्यत: 12 से अधिक नहीं हो सकती। कर्मशार्लार् परिषद क अध्यक्ष प्रबंध द्वार्रार् मनोनीत व्यक्ति होगार् तथार् उपार्ध्यक्ष क निर्वार्चन परिषद के श्रमिकों के प्रतिनिधियों द्वार्रार् होगार्। 
  • कार्यविधि- कर्मशार्लार् परिषद में निर्णय मतैक्य के आधार्र पर होगार् न कि मतदार्न के आधार्र पर। किसी विषय पर मतभेद की स्थिति में उसे संयुक्त परिषद के विचार्राथ भेजार् जार्एगार्। कर्मशार्लार् परिषद के निर्णयों को निर्णय के दिन से एक महीने के अंदर लार्गू करनार् आवश्यक है, लेकिन सदस्यों की अनुमति सं इस अवधि के बढ़ार्यार् जार् सकतार् है। अगर किसी कर्मशार्लार् परिषद के निर्णय से दूसरी कर्मशार्लार् यार् संपूर्ण प्रतिष्ठार्न यार् उद्यम प्रभार्वित होतार् हो, तो उसे संयुक्त परिषद को निदेशित करनार् आवश्यक है। कर्मशार्लार् परिषद क कार्यकाल उसकी स्थार्पनार् के दिन से 2 वर्षों के लिए होगार्। परिषद की बैठक महीने में कम से कम एक बार्र अवश्य होनी चार्हिए। 
    • कार्य- कर्मशार्लार् परिषद कर्मशार्लार्/विभार्ग के उत्पार्दन, उत्पार्दकतार् तथार् कौशल में वृद्धि के उद्देश्य से निम्नलिखित कार्य संपदित कर सकती है- 
      • 1. उत्पार्दन के मार्सिक/वाषिक लक्ष्यों की प्रार्प्ति में प्रबंध को सहार्यतार् प्रदार्न करनार्; 
      • उत्पार्दन, उत्पार्दकतार् तथार् कौशल में सुधार्र लार्ने क प्रयार्स करनार्, जिसमें बरबार्दी क अंत तथार् मशी की क्षमतार् और मार्नव शक्ति क अनुकूलतम उपयोग भी शार्मिल है; 
      • निम्न-उत्पार्दकतार्वार्ले क्षेत्रों के विशेष रूप से पहचार्न करनार् तथार् उसके कारणों की समार्प्ति के लिए कर्मशार्लार् स्तर पर सुधार्रार्त्मक कदम उठार्नार्। 
      • कर्मशार्लार्/विभार्ग में अनुपस्थिति के कारणों क अध्ययन करनार् तथार् उसे कम करने के लिए सुझार्व देनार् 
      • सुरक्षार् के उपय; 
      • कर्मशार्लार्/विभार्ग में सार्मार्न्य अनुशार्सन बनार्ए रखने में सहार्येतार् देनार्; 
      •  कार्य की भौतिक दशार्एँ जैसे-प्रकाश, संवार्तन, ध्वनि, आदि, और थकान में कमी; 
      •  कर्मशार्लार्/विभार्ग के सुचार्रु से संचार्लन के लिए कल्यार्ण तथार् स्वार्स्थ्य-संबधी कदम; तथार्; 
      • श्रमिकों और प्रबंधको के बीच द्विमागीय संचार्र क समुचित प्रवार्ह सुनिश्चित करनार्, विशेषकर उत्पार्दन के आँकड़ों, उत्पार्दन-कार्यक्रम तथार् लक्ष्यों की प्रार्प्ति की प्रगति से संबद्ध विषयों पर। 

2. संयुक्त परिषद-

  • गठन और कार्यविधि-संयुक्त परिषद की स्थार्पनार् उद्यम यार् प्रतिष्ठार्न के स्तर पर की जार्एगी। इसकी संरचनार् और कार्यविधि कर्मशार्लार् परिषद की तरह ही होगी। संयुक्त परिषद में केवल ऐसे सदस्य हो सकते हैं जो उद्यम यार् प्रतिष्ठार्न में वार्स्तव में नियोजित हों। परिषद की कार्यार्विधि 2 वर्षों की होगी। परिषद क अध्यक्ष उद्यम क प्रधार्न कार्यपार्लक होगी। उसके उपार्ध्यक्ष क निर्वार्चन परिषद के कामगार्र-सदस्यों द्वार्रार् होगार्। संयुक्त परिषद के एक सदस्य को परिषद के सचिव के रूप में नियुक्त कियार् जार्एगार्। सचिव के अपने कार्य सुचार्रु रूप से चलार्ने के लिए समुचित सुविधार्ओं की व्यवस्थार् करनार् आवश्यक है। संयुक्त परिषद की बैठक तीन महीनों में कम-से-कम एक बार्र होगी। संयुक्त परिषद के निर्णय भी मतैक्य के आधार्र पर होंगे, न कि मतदार्न के आधार्र पर। परिषद के निणयों को भी निर्णय के दिन से एक महीने के अंदर लार्गू करनार् आवश्यक है। 
    • कार्य- संयुक्त परिषद निम्नलिखित विषयों पर निर्णय कर सकती है- 
      • पूरी इकार्इ के लिए अनुकूलतम उत्पार्दन, कौशल तथार् उत्पार्दकतार्-मार्नकों क नियतन;
      • . कर्मशार्लार् परिषदों के ऐसे कार्य, जिनसे दूसरी कर्मशार्लार् यार् संपूर्ण इकार्इ प्रभार्वित होती हो; 
      • ऐसे मार्मले, जिनपर कर्मशार्लार् परिषद में निर्णय करनार् संभव नहीं हो सक हो; 
      • संपूर्ण प्रतिष्ठार्न यार् इकार्इ से संबद्ध कार्य-योजनार् तथार् उत्पार्दन-लक्ष्यों की प्रार्प्ति; 
      • कर्मचार्रियों के कौशल क विकास तथार् प्रशिक्षण की समुचित सुविधार्एँ; 
      • कार्य के घंटों तथार् अवकाश-दिनों की अनुसूची क बनार्यार् जार्नार्; 
      • मूल्यवार्न तथार् सर्जनार्त्मक सुझार्वों के लिए कर्मकारों को पार्रितोषिक; 
      • कच्चे मार्ल क अनुकूलतम उपयोग तथार् उत्पार्दों की गुणवत्तार् तथार् 
      • सार्मार्न्य स्वार्स्थ्य, कल्यार्ण तथार् सुरक्षार्-संबंधी उपार्य। 

पुरार्ने बीस-सूत्री कार्यक्रम के अधीन प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् की उपर्युक्त संस्थार्एँ भी सफल नहीं हो सकीं। प्रार्ंरभ में तो इस तरह की संयुक्त परिषदों की स्थार्पनार् बड़ी संख्यार् में की गर्इ, लेकिन शीघ्र ही वे निष्क्रिय होती गर्इ। आज इस योजनार् के अंतर्गत स्थार्पित संयुक्त परिषदों की संख्यार् बहुत ही कम है।

4. सावजनिक क्षेत्र के वणिज्यिक एवं सेवार्-संगठनों के प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् की संस्थार्एँ, 1977-

1977 में भार्रत सरकार ने सावजनिक क्षेत्र के वणिज्यिक एवं सेवार् संगठनों के लिए एक नर्इ योजनार् अपनाइ। यह योजनार् मुख्यत: ऐसे संगठन के लिए है, जिनमें 100 से अधिक कर्मचार्री नियोजित हैं। तथार् जिसमें सावजनिक लेन-देन बड़ी मार्त्रार् में होतार् हो। इस योजनार् को लार्गू करने के लिए अस्पतार्लों, डार्क और तार्र कार्यार्लयों, रेलवे स्टेशनों, टिकट कार्यार्लय, बंकै ों तथार् सावजनिक वितरण की संस्थार्ओं को प्रार्थमिकतार् दी गर्इ। यह योजनार् पर्यार्प्त रूप से नम्य है तथार् स्थार्नीय दशार्ओं को ध्यार्न में रखते हुए इसमें परिवर्तन लार्नार् संभव है। इस योजनार् के अंतर्गत इकार्इ परिषदों की स्थार्पनार् की गर्इ। इन परिषदों क संक्षिप्त विवरण नीचे दियार् जार्तार् है।

  • इकार्इ परिषद-इकार्इ परिषदों के गठन और कार्य बीस-सूत्री कार्यक्रम के अधीन स्थार्पित कर्मशार्लार् परिषदों के गठन और कार्यों की तरह है। वे इनक मुख्य उद्देश्य दिन-प्रतिदिन के समस्यार्ओं पर विचार्र-विमर्श करनार् तथार् उनक हल ढूँढ निकालनार् है। इन परिषदों के मुख्य कार्य निम्नलिखित हं-ै 
    • अनुकूलतम कौशल तथार् अच्छी ग्रार्हक-सेवार् के लिए समुचित दशार्ओं क सर्जन करनार् और समय तथार् सार्मार्नों की बरबार्दी को रोकनार्; 
    • खरार्ब, अपर्यार्प्त तथार् दोषपूर्ण सेवार्ओं के क्षेत्रों क पतार् लगार्नार् तथार् उनके कारणों को दूर करने के लिए सुधार्रार्त्मक कदम उठार्नार्, जिससे संचार्लन समुचित रूप से हो; 
    • अनुपस्थिति के कारणों क अध्ययन करनार् तथार् उसे कम करने के लिए कदम उठार्नार्; 
    • इकार्इ में अनुशार्सन बनार्ए रखनार्; 
    • चोरी और भ्रष्टार्चार्र को समार्प्त करनार् तथार् इसके लिए पार्रितोषिक की व्यवस्थार् करनार्; 
    • कार्य की भौतिक दशार्ओं में सुधार्र लार्ने के लिए सुझार्व देनार्;
    • प्रबंध और कर्मचार्रियों के बीच पर्यार्प्त द्विमागीय संचार्र क प्रवार्ह सुनिश्चित करनार्;
    • इकार्इ को समुचित रूप से चलार्ने के लिए सुरक्षार्, स्वार्स्थ्य तथार् कल्यार्ण-संबंधी कदमों में सुधार्र लार्नार्; 
    • अच्छी ग्रार्हक-सेवार् सुनिश्चित करने के लिए अन्य बार्तों पर विचार्र-विमर्श करनार्। 
  • संयुक्त परिषद- संयुक्त परिषद क गठन प्रभार्ग, क्षेत्र यार् मंडल के स्तरों पर होगार्। आवश्यकतार्नुसार्र, इसकी स्थार्पनार् किसी संगठन यार् सेवार् की विशिष्ट शार्खार् में भी की जार् सकती है। इन परिषदों के गठन कार्यार्विधि आदि से संबद्ध बार्तें बीस-सूत्री कार्यक्रम के अधीन गठित संयुक्त परिषदों की तरह है। संयुक्त परिषदों के मुख्य कार्य हैं- 
    • उन मार्मलों क निपटार्न करनार्, जिनक समार्धार्न इकार्इ परिषद में नहीं हो सक है तथार् दो यार् अधिक इकार्इ परिषदों की अंत: परिषदीय समस्यार्ओं के समार्धार्न के लिए संयुक्त बैठकें आयोजित करनार्; 
    • ग्रार्हक-सेवार् में सुधार्र लार्ने तथार् सार्मार्नों, यार्तार्यार्त, लेखार् आदि से संबद्ध उपयुक्त तरीके के विकास के लिए इकार्इ परिषदों के कार्यों की समीक्षार् करनार्; 
    • इकार्इ के स्तर की ऐसी सभी बार्तों पर विचार्र करनार्, जिनक संबंध दूसरी शार्खार्ओं यार् संपूर्ण उद्यम से हो; 
    • कर्मकारों के कौशल क विकास करनार् तथार् प्रशिक्षण की पर्यार्प्त सुविधार्ओं की व्यवस्थार् करनार्; 
    • कार्य की सार्मार्न्य दशार्ओं में सुधार्र लार्ने क प्रयार्स करनार्; 
    • कार्य के घंटों तथार् अवकाश-दिनों की अनुसूची तैयार्र करनार्; 
    • पार्रितोषिक की व्यवस्थार् के जरिए कर्मचार्रियों के बीच से उपयोगी सुझार्वों को प्रोत्सार्हित करनार्; तथार्
    • संगठन यार् सेवार् के निष्पार्दन में सुधार्र तथार् अच्छी ग्रार्हक-सेवार् सुनिश्चित करने के लिए किसी भी विषय पर विचार्र-विमर्श करनार्। उपर्युक्त परिषदों की योजनार् मुख्य रूप से केंद्रीय मंत्रार्लयों तथार् विभार्गों, रार्ज्य सरकारों, संघरार्ज्य क्षेत्रों के प्रशार्सनों तथार् अन्य सावजनिक निगमों और निकायों के लिए बनाइ गर्इ थी। व्यवहार्र में, ये परिषदें भी निर्धार्रित लक्ष्यों की पूर्ति में व्यार्पक रूप से विफल रहीं। 

5. सावजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के लिए प्रबंध में कर्मचार्रियों की भार्गीदार्री योजनार् के अंतर्गत संस्थार्एँ, 1983-

उद्योगों में सहभार्गी योजनार्ओं की प्रगति को ध्यार्न में रखते हुए प्रबंध में कर्मचार्रियों की सहभार्गितार् की एक विस्तृत योजनार् तैयार्र की गर्इ। यह योजनार्, उन उद्यमों को छोड़कर, जिन्हें छूट दी गर्इ है, केंद्रीय सावजनिक क्षेत्र के सभी उद्यमों पर लार्गू की गर्इ। योजनार् के अंतर्गत कर्मशार्लार्-तल तथार् संयंत्र स्तरों पर निष्पक्षीय मंचों के गठन की व्यवस्थार् की गर्इ। इन संस्थार्ओं की संरचनार् और कार्यों क विवरण है-

  1. संरचनार्- कर्मशार्लार्-तल तथार् संयंत्र-स्तर मंचों, दोनों में कर्मचार्रियेार्ं और प्रबंधकों के प्रतिनिधि बरार्बर-बरार्बर की संख्यार् में होंगे। प्रत्येक पक्षकार की संख्यार् 5 और 10 के बीच श्रम-शक्ति के आकार के अनुसार्र होगी। उनकी वार्स्तविक संख्यार् उपक्रम के श्रमसंघ-नेतार्ओं के परार्मर्श से प्रबंध द्वार्रार् नियत की जार्एगी। श्रमसंघ-नेतार्ओं के परार्मर्श से ही विभिन्न श्रेणियों के कर्मचार्रियों के प्रतिनिधित्व क स्वरूप निर्धार्रित कियार् जार्एगार्। जहार्ँ स्त्री-कर्मकारों क अनुपार्त कुल कामगार्रों के 10 प्रतिशत से अधिक है, वहार्ँ इन संयुक्त निकायों पर उनके समुचित प्रतिनिधित्व की व्यवस्थार् की जार्एगी। 
  2. कार्य (i) कर्मशार्लार्-तल मंचों के कार्यक्षेत्र में सम्मिलित होनेवार्ले विषय हं-ै उत्पार्दन-सुविधार्एँ, कर्मशार्लार् में भंडार्रण-सुविधार्एँ; सार्मग्रियों की मितव्ययितार्; संचार्लन की समस्यार्एँ; बरबार्दी क नियंत्रण; खतरे और सुरक्षार् की समस्यार्एँ; गुणवत्तार् में सुधार्र; स्वच्छतार्; मार्सिक लक्ष्य तथार् उत्पार्दन-अनुसूची, लार्गत-नियंत्रण कार्यक्रम; कार्यपद्धति क निर्मार्ण और क्रियार्न्वयन; समूह-कार्य; कर्मशार्लार् से संबद्ध कल्यार्कारी उपार्य। 
  3. संयंत्र-स्तरीय मंचों के कार्यक्षेत्र के महत्वपूर्ण विषय हं-ै उत्पार्दन-योजनार्ओं क विकास; मार्सिक लक्ष्यों और अनुसूचियों से संबद्ध योजनार्,उसक क्रियार्न्वयन और पुनर्विलोकन; सार्मग्रियों की आपूर्ति; भंडार्रण; गृह-व्यवस्थार्; उत्पार्दकतार् में सुधार्र; सुझार्वों को प्रोत्सार्हन और उनपर विचार्र; गुणवत्तार् और प्रौद्योगिकी में सुधार्र; मशीनों क उपयोग और नए उत्पार्दनों क ज्ञार्न और विकास; संचार्लन-संबंधी निष्पार्दन; दो यार् अधिक कर्मशार्लार्ओं से संबद्ध विषय यार् ऐसे विषय जिन्हें कर्मशार्लार् स्तर पर नहीं तय कियार् गयार् हो; कर्मशार्लार्-स्तरीय निकायों क कार्यकरण । संयंत्र-स्तरीय मंचों द्वार्रार् निर्धार्रित किए जार्नेवार्ले आर्थिक और वित्तीय क्षेत्र हैं-लार्भ-हार्नि और तुलन-पत्र; संचार्लन-संबंधी व्यय, वित्तीय परिणार्म तथार् विक्रय की लार्गतें; तथार् संयंत्र में वित्तीय प्रशार्सन, श्रम और प्रबंधकीय लार्गत, बार्जार्र की स्थिति। संयंत्र-स्तरीय मंचों द्वार्रार् निर्धार्रित किए जार्नेवार्ले कार्मिक विषयों में मुख्य हैं- अनुपस्थिति; महिलार्-कर्मकारो की विशेष समस्यार्एँ; कर्मकारों के प्रशिक्षण -कार्यक्रम; तथार् सार्मार्जिक सुरक्षार्-योजनार्ओं क क्रियार्न्वयन। इन मंचों के कल्यार्णकारी कार्यक्षेत्र हैं- कल्यार्ण-सुविधार्ओं क संचार्लन, कल्यार्ण-योजनार्ओं , चिकित्सकीय हिललार्भ तथार् यार्तार्यार्त-सुविधार्ओं को क्रियार्न्वयन ; सुरक्षार् के उपार्य; खेलकूद; आवार्स; नगरीय पश््र ार्ार्सन; कंटै ीन; जअु ार्बार्जी, मद्यपार्न और ऋणग्रस्ततार् क नियंत्रण। 

कर्मशार्लार् और संयंत्र-स्तरीय मंचों द्वार्रार् निर्णय सहमति के आधार्र पर होंगे, लेकिन जब किसी विषय पर सहमति नहीं हो पार्ती, तो उसे निर्णयन के उच्चतर मंच पर भेजार् जार्एगार्। 

योजनार् के अंतर्गत बोर्ड-स्तरीय मंच के गठन की भी व्यवस्थार् की गर्इ है। बोर्ड पर कर्मचार्रियेार्ं के प्िर तनिधि बोर्ड के सभी कायार्ंर् े में भार्ग लेंगे। बोर्ड के कायार्ंर् े में कर्मशार्लार् और संयंत्र-स्तरीय मंचों के कार्यों क पुनविलोकन भी सम्मिलित है। योजनार् के प्रबोधन और पुनर्विलोकन के लिए श्रम मंत्रार्लय में एक त्रिदलीय तंत्र के गठन की भी व्यवस्थार् की गर्इ है। रार्ज्य सरकारों से भी अनुरोध कियार् गयार् है कि वे अपने सावजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में इस योजनार् को लार्गू करें। इसे निजी क्षेत्र के उद्यमों में लार्गू करार्ने के लिए भी प्रयार्स किए जार्एँेंगें। अगस्त, 1995 तथार् कुल 236 केंद्रीय सावजनिक क्षेत्र के उद्यमों में से 100 उद्यमों में कर्मशार्लार्-तल और संयंत्र स्तरीय मंच बनार्ए गए थे। 

6. सरकारी सेवार्ओं में संयुक्त परिषद-

दूसरे वेतन आयोग की सिफार्रिशों को ध्यार्न में रखते हुए भार्रत सरकार ने 1966 में सरकारी विभार्गों में संयुक्त परिषदों की एक ऐच्छिक योजनार् लार्गू की। इस योजनार् के अंतर्गत रार्ष्ट्रीय परिषद, विभार्गीय परिषद, क्षेत्रीय परिषद तथार् कार्यार्लय परिषद की स्थार्पनार् की व्यवस्थार् की गर्इ है। प्रत्येक परिषद में सरकार द्वार्रार् मनोनीत अधिकारी तथार् कर्मचार्रियों के संगठनों के प्रतिनिधि होते हैं। इन परिषदों के कार्यों में मुख्य हैं- सेवार् की शर्तों, कार्य की दशार्ओं, कर्मचार्रियों के कल्यार्ण तथार् कार्य के स्तरों में सुधार्र से संबंद्ध विषयों पर संयुक्त वातार् तथार् निर्णय करनार्। भरती, पदोन्नति तथार् अनुशार्सन के मार्मलों पर परिषदों में केवल सैद्धार्ंतिक पहलुओं पर ही विचार्र-विमर्श हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त रेलवे, डार्क और तार्र तथार् सुरक्षार्-स्थार्पनों में संयुक्त परार्मश्र्ार्ी तंत्रों की व्यवस्थार् पहले से ही चलती आ रही है। ये तंत्र सहयोग, परार्मर्श, विचार्र-विमर्श तथार् वातार् के कार्य सार्थ-सार्थ निष्पार्दित करते है। लेकिन मूल रूप् से ये मतभेदों और विवार्दों के निपटार्न के मंच है। 

7. कुछ निजी औद्योगिक प्रतिष्ठार्नों में प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् की संस्थार्एँ- 

निजी क्षेत्र के कुछ महत्वपूर्ण औद्यार्गिक प्रिष्ठार्नों में, प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् की योजनार्एँ सार्मूहिक समझौतों के जरिए भी स्थार्पित की गर्इ हैं। उदार्हरणाथ, टार्टार् आइरन एंड स्टील कंपनी में 1956 के सार्मूहिक समझौते के अंतर्गत कुछ संयुक्त निकायों क गठन कियार् गयार् है; जैसे-संयुक्त विभार्गीय परिषद, संयुक्त कार्य-परिषद, संयुक्त नगर-परिषद तथार् संयुक्त परार्मश्र्ार्ी प्रबंध-परिषद। समझौते में ही इन परिषदों के गठन और कार्यों क विस्तार्र से उल्लेख कियार् गयार् है। इंडियन ऐलुमिनियम कंपनी में भी सार्मूहिक समझौते के जरिए 1956 में कर्इ संयुक्त समितियों की स्थार्पनार् की गर्इ; जैसे- संयुक्त कार्मिक संबंध-समिति, संयुक्त उत्पार्दन-समिति, संयुक्त कार्यमूल्यार्ंकन-समिति, संयुक्त मार्नक-समिति, तथार् संयुक्त कैंटीन-समिति। इसी तरह कर्इ अन्य औद्योगिक प्रतिष्ठार्नों में अलग-अलग विषयों पर संयुक्त समितियों क गठन कियार् गयार् है। इनमें अधिकांश संयुक्त समितियार्ँ कैंटीन, सुरक्षार्, कल्यार्ण तथार् आवार्स से संबद्ध हैं।

उद्योग में श्रमिकों की सहभार्गितार् पर वर्मार्-समिति के सुझार्व 

जैसार् कि खंडऋ iv के आरंभ में कहार् जार् चुक है- 1977 में जनतार्-सरकार के शार्सनकाल में श्रममंत्री रवींद्र वर्मार् की अध्यक्षतार् में प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् के विभिन्न पहलुओं क अध्ययन करने तथार् इस संबंध में एक व्यार्पक योजनार् बनार्ने के लिए एक समिति क गठन कियार् गयार्। समिति ने अपनी रिपोर्ट 1079 में दी। समिति की मुख्य सिफार्रिशें थी-

  1. सहभार्गितार् की त्रि-स्तरीय पद्धति (कर्मशार्लार्, प्रतिष्ठार्न तथार् निगम यार् बोर्ड के स्तरों पर) को अपनार्यार् जार्नार् चार्हिए। 
  2. ऐसे सभी उद्यमों में, जिनमें 400 से अधिक कामगार्र नियोजित है, श्रमिकों की सहभार्गितार् को काननू द्वार्रार् लार्गू कियार् जार्नार् चार्हिए। लेकिन, इसे 100 से अधिक संख्यार् में कर्मकारों को नियोजित करनेवार्ले संस्थार्ओं में भी लार्गू करने की व्यवस्थार् चार्हिए।
  3. सहभार्गी मंचों पर प्रतिनिधियों क निर्वार्चन गुप्त मतदार्न से होनार् चार्हिए। 
  4. सहभार्गी मंचों पर पर्यवेक्षकों तथार् मध्यस्तरीय प्रबंधकों के प्रतिनिधित्व की व्यवस्थार् आवश्यक है, जिससे वे निर्णय -प्रक्रियार् में सक्रिय रूप से भार्ग ले सकें। 
  5. उच्च स्तर पर सहभार्गी मंचों में सम्मिलित किए जार् सकनेवार्ले महत्त्वपूर्ण विषय हैं- सार्मार्न्य उत्पार्दन-सुविधार्एँ, भंडार्रण-सुविधार्एँ, मार्ल की सुरक्षार्, दस्तार्वेजों मे अशुद्धियार्ँ, संचार्लन-संबंधी समस्यार्एँ, बरबार्दी क नियंत्रण, सुरक्षार्-संबंधी समस्यार्एँ, गुणवत्तार् में सुधार्र, मार्सिक उत्पार्दन-कार्यक्रम, तकनीकी आविष्कार । 
  6. प्रतिष्ठार्न के स्तर पर सहभार्गितार् के क्षेत्रों क विस्तार्र चार्हिए। इनमें संचार्लन, आर्थिक पहलू, वित्त, कार्मिक, कल्यार्णकारी कदम तथार् पर्यार्वरण को भी शमिल कियार् जार्नार् चार्हिए। प्रतिष्ठार्न के स्तर पर जिन विशिष्ट विषयों को सम्मिलित करने की अनुशंसार् की गर्इ, उनमें मुख्य है- उत्पार्दन-वृद्धि के लार्भों में सार्झेदार्री, गुणवत्तार् तथार् प्रौद्यार्गिक में सुधार्र , अभिप्ररेणार्एँ, बजट, लार्भ-हार्नि विवरण, विक्रय-लार्गत संचार्लन-व्यय, श्रम एवं प्रबंधकीय लार्गत, अतिकाल, अनुपस्थिति के कारण स्थार्नार्ंतरण, पदोन्नति स्त्री-श्रमिकों की विशिष्ट समस्यार्एँ।
  7. निगम के स्तर पर सहभार्गितार् के दार्यरे में जिन विषयों को शार्मिल करने क सुझार्व दियार् गयार्, वे है- वित्त, मजदूरी-संरचनार्, कल्यार्णकारी सुविधार्एँ, चिकित्सकीय सुविधार्एँ भरती एवं कार्मिक नीति। 
  8. संयुक्त निर्णयन को प्रभार्वी बनार्ने के लिए सूचनार्एँ प्रार्प्त करने की समुचित व्यवस्थार् चार्हिए। कुछ क्षेत्रों में सहभार्गितार्-मंचों को प्रशार्सनिक अधिकार भी दियार् जार्नार् चार्हिए। 
  9. श्रमिकों की सहभार्गितार् की योजनार्ओं के कार्यार्न्वयन के प्रबोधन के लिए केंद्रीय एवं रार्जकीय स्तर पर अभिकरण की व्यवस्थार् होनी चार्हिए। 

समिति की सिफार्रिशों पर 1980 में श्रममंत्रियों के 31वें सम्मेलन में विचार्र कियार् गयार्। सम्मेलन ने इन अनुशंसार्ओं क सार्मार्न्य तौर पर समर्थन कियार्, लेकिन सहभार्गितार्-मंचों में कामगार्रों के प्रतिनिधित्व देने के प्रक्रियार् के प्रश्न पर विरोधी विचार्र व्यक्त किए गए और उनके संबंध में कोर्इ सहमति नहीं हो सकी। अंत में इस प्रश्न को सरकार के निर्णय पर छोड़ दियार् गयार् ।

भार्रत में प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् की योजनार्ओं की असफलतार् के कारण 

जैसार् कि उपर्युक्तववेचनार् से स्पष्ट है, 1958 के बार्द देश में, प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् की कर्इ योजनार्एँ बनाइ गर्इ और उन्हें लार्गू करने के प्रयार्स किए गए लेकिन व्यवहार्र में इन सभी योजनार्ओं की प्रगति अत्यंत ही असंतोषजनक रही है। एक ओर तो कर्इ उद्यमों, प्रतिष्ठार्नों तथार् संगठनों में इन योजनार्ओं को लार्गू ही नहीं कियार् गयार्, और दूसरी ओर जहार्ँ इन्हे लार्गू कियार् गयार्, वहार्ँ कर्इ सयुक्त मंच निष्क्रिय होते गए। जहार्ँ श्रम-प्रबंध सहयोग की संस्थार्एँ स्थार्पित की गर्इ है, वहार्ँ उनमें अधिकांश अपने काय्र सुचार्रू रूप से नहीं करती। भार्रत में, प्रबंध में श्रमिकों की सहभगितार् की योजनार्ओं की विफलतार् के मुख्य कारण है।

  1. प्रबंध में श्रमिकों की सहभार्गितार् की योजनार्ओं की असफलतार् क मूल कारण भार्गीदार्री की अवधार्रणार् मे ही निहित है। भार्गीदार्री क अर्थ होतार् है ।शक्ति यार् अधिकार में सहभार्गितार्। यह प्रबन्ध और श्रमसंघ दोनों के सार्थ चरिताथ होती है। नियोजक अपने उद्यम के प्रबन्धन में, अपनी सत्तार् यार् परमार्धिकार में दूसरों को भार्गीदार्र बनार्ने में अनिच्छुक रहते हैं। इसी तरह, कर्इ श्रमसंघ अपनी सौदेबार्जी और दबार्व डार्लने की शक्ति क परित्यार्ग कर प्रबन्ध के सार्थ सहयोग के मंचों पर संयुक्त निर्णयन के लिए अकसर तैयार्र नहीं होते। नियोजकों और श्रमसंघों से अपने मतभेदों के भूलकर विभिन्न विषयों पर सद्भार्वनार् और सहयोग के वार्तार्वरण में संयुक्त निर्णय लेने की आशार् करनार् भं्रार्तिपूर्ण है।
  2. देश में प्रबन्ध और श्रमसंघ दोनों विभिन्न प्रकार के संयुक्त निकायों की बहुलतार् के कारण भ्रार्मित से लगते हैं। कर्इ उद्योगों के लिए कानून यार् अन्य व्यवस्थार्ओं के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के संयुक्त निकायों क गठन कियार् गयार् हैं, जैसे- कार्य-समिति, सरु क्षार् समिति, संयुक्त प्रबन्ध परिषद, कर्मशार्लार् तल परिषद, इकार्इ, कंटै ीन समिति, परिवेदनार् निवार्रण समिति, संयुक्त औद्योगिक समिति आदि। अकसर विभिन्न निकायों के कार्यक्षेत्रों में अतिव्यप्ति पाइ जार्ती है और उनकी व्यार्वहार्रिक उपयोगितार् नगण्य रहती है।
  3. देश में प्रबन्ध में श्रमिकों की सहभार्गितार् की अधिकांश योजनार्एँ सरकार द्वार्रार् प्रार्योजित की जार्ती है इन योजनार्ओं को अपनार्ने के पहले नियोजकों और श्रमिकों की सहमति के लिए प्रयार्स नहीं किए गए हैं। अधिकांश नियोजक तथार् श्रमसंघ इन्हैं। बार्हर से थोपे जार्नेवार्ले कार्यक्रम समझते हैं। ऐसी स्थिति में इनक विफल होनार् स्वार्भार्विक है। अनुभव बतार्तार् है कि श्रम प्रबन्ध सहयोग की जो योजनार्एँ नियोजक और श्रमिकों के बीच समझौते के जरिए स्थार्पित की जार्ती है, वे अधिक स्थार्यी होती है और उनकी सफलतार् की संभार्वनार् अधिक होती है। प्रबन्ध में श्रमिकों की भार्गीदार्री के लिए पक्षकारों में अधिक स्थार्यी होती है और उनकी सफलतार् की सम्भार्वनार् अधिक होती है। प्रबन्ध में श्रमिकों की भार्गीदार्री के लिए पक्षकारों में अभिवृत्तीय परिवर्तन की आवश्यकतार् होती है। प्रबन्ध में इसक ऐच्छिक आधार्र पर होनार् अधिक व्यवहार्रिक होगार्। कानून यार् बार्ध्यतार् के आधार्र पर भार्गीदार्री की योजनार्ओं क प्रवर्तन उनके वार्स्तविक लक्ष्यों एवं स्वरूप के प्रतिकूल होगार्।
  4. प्रबन्ध में श्रमिकों की सहभार्गितार् की योजनार्एँ उन उद्योगों यार् प्रतिष्ठार्नों में अधिक सफल होती है, निमें सहभार्गितार् के चलते होने वार्ले लार्भ यार् उसके फल के पक्षकारों के बीच वितरण की समुचित व्यवस्थार् होती है। भार्रत में सहभार्गितार् के फलस्वरूप होने वार्ले लार्भों के प्रत्यक्ष यार् समुचित रूप से वितरण की व्यवस्थार् नहीं है। इस कारण, श्रमिकों के बीच इन संस्थार्ओं के प्रति उत्सार्ह क अभार्व रहतार् है। कर्इ श्रमिकों के मत में ये संस्थार्एँ केवल प्रबन्ध के हितों को ही ध्यार्न में रखकर बनाइ गर्इ है।
  5. सहभार्गितार् की संस्थार्ओं के सफल होने की सम्भार्वनार् उन उद्योगों यार् प्रतिष्ठार्नों में अधिक होती है, जिनमें श्रम संघों के बीच प्रतिस्पर्द्धार्, प्रतिद्वंदितार् यार् गुटबंदी की समस्यार्एँ जटिल नहीं होती। भार्रत में एक ही प्रतिष्ठार्न यार् उद्योग में कर्इ श्रमसंघ सार्थ-सार्थ कार्यशील है। उनके बीच प्रतिद्वंद्वितार् की समस्यार्ार् अत्यन्त ही गम्भीर है। एक ही श्रमसंघ में कर्इ गुट भी पार्ए जार्ते हैं। इन कारणों से सहभार्गितार् की योजनार्ओं में श्रमिकों के प्रतिनिधित्व तथार् संयुक्त निर्णयों के अनुपार्लन की समस्यार् सदार् बनी रहती है। भार्रत में, प्रबन्ध में श्रमिकों की सहभार्गितार् क एक महत्तवपूर्ण् कारण श्रमसंघों क बहुत्व तथार् प्रतिनिधि श्रमसंघ की मार्न्यतार् की कानूनी व्यवस्थार् क आभार्व है।
  6. यद्यपि रार्ष्ट्रीय स्तर पर नियोजकाकं के संगठन और श्रमसंद्य भार्गीदार्री की योजनार्ओं क समर्थन करते आए हैं, उद्यम यार् स्थार्पन के स्तर पर प्रबन्धकों के बीच इन योजनार्ओं के प्रति सार्मार्न्य उदार्सीनतार् पाइ जार्ती है। नियोजकों और श्रमिकों के केन्द्रीय संगठनों द्वार्रार् निम्न स्तर पर सम्बद्ध संगठनों की भार्गीदार्री की उपयोगितार् के बार्रे में उत्सार्हित करने के लिए विशेष कदम नहीं उठार्ए गए हैं।
  7. कर्इ नियोजक अब भी अपने कर्मचार्रियों के सार्थ समार्नतार् के स्तर पर विचार्र-विमर्श करनार् नहीं चार्हते। कर्इ प्रबन्धकों और अधिकारियों के सार्थ भी यही बार्त लार्गू होती है। ऐसी स्थिति में प्रबन्ध में श्रमिकों की सहभार्गितार् की संस्थार्ओं क विफल होनार् स्वार्भार्विक है।
  8. भार्रत में श्रमिकों के बीच शिक्षार् क प्रसार्र समुचित नहीं हो पार्यार् है। उनमें कर्इ अपने अधिकारों तथार् दार्यित्वों के बार्रे में अनभिज्ञ रहते हैं। कर्इ श्रमिक उद्योग तथार् नियोजक की समस्यार्ओं को समझ नहीं पार्ते। अत: ऐसे श्रमिकों से प्रभार्वी सहभार्गितार् की आशार् नहीं की जार् सकती । यही कारण है कि विगत वर्षों में केन्द्र सरकार द्वार्रार् प्रबन्ध में श्रमिकों की भार्गीदार्री की उपयोगितार् को श्रमिक शिक्षार्-कार्यक्रम में सम्मिलित कियार् गयार् है। भार्रत में प्रबन्ध में श्रमिकों की सहभार्गितार् के विकास के माग में कर्इ अन्य प्रकार की बार्धार्एँ है; जैसे- श्रमिकों क निम्न जीवन स्तर, संयुक्त निर्णयन की परम्परार् क अभार्व, सार्मूहिक सौदेबार्जी क अपर्यार्प्त विकास तथार् औद्योगिक सम्बन्ध के क्षेत्र में सरकार द्वार्रार् अत्यधिक हस्तक्षेप।

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