प्रबंधन प्रशिक्षण: अर्थ और आवश्यकतार्

प्रबंधन प्रशिक्षण: अर्थ और आवश्यकतार्

By Bandey

अनुक्रम

प्रबंधन प्रशिक्षण किसी भी व्यवसार्य अथवार् क्षेत्र में कार्यरत लोगों को अत्यधिक कुशल बनार्ने तथार् नई व आधुनिक तकनीकों से अवगत करार्ने के लिए प्रशिक्षण की आवश्यकतार् होती है। यह प्रशिक्षण सेवार्रत होतार् है, अर्थार्त् नौकरी करते हुए प्रशिक्षण। प्रबंधन के क्षेत्र में भी प्रशिक्षण की आवश्यकतार् होती है। प्रबंधन प्रक्रियार् से संबंधित सभी क्षेत्रों तथार् कार्यो में विशेष प्रशिक्षण दियार् जार्तार् है जिससे प्रबंधक सही दिशार् में सुचार्रू रूप से कार्य कर सके तथार् किसी भी कठिनार्ईयार् दुरूह परिस्थिति में समस्यार् क समार्धार्न कर सके।

प्रबंधन प्रशिक्षण की आवश्यकतार्

आज के तकनीकी युग में हर समय किसी न किसी समस्यार् से प्रबंधार्कों को जूझनार् पड़तार् है इसलिए प्रबंधन प्रशिक्षण अत्यंत आवश्यक है। ये आवश्यकतार्ए हैं, जैसे-परिवर्तन, विकास इत्यार्दि।


परिवर्तन-जीवन तथार् विश्व के बदलते परिवेश में जहार्ँ, प्रतिदिन नित-नई तकनीके, समस्यार्एं तथार् उनके समार्धार्न, प्रक्रियार्ए आ रही हैं। प्रबंधन को इन सब बार्तों क ज्ञार्न होनार् आवश्यक है, प्रबंधन में, विशेष रूप से शिक्षार् प्रबंधन में इसक महत्व और भी बढ़ जार्तार् है, अत: बदलते शिक्षण परिवेश में प्रबंधक क प्रशिक्षित होनार् एक आवश्यक योग्यतार् है।

विकास-प्रबंधन क मुख्य लक्ष्य किसी भी संस्थार् क सही दिशार् में विकास करनार् है, प्रशिक्षित प्रबंधार्कों द्वार्रार् किसी भी संस्थार् को सफलतार् तथार् गुणवत्तार् के शिखर पर ले जार्यार् जार् सकतार् है, अत: प्रबंधन प्रशिक्षण की आवश्यकतार् है। स्टार्फ में सार्मंजस्य बनार्ने तथार् कर्मचार्रियों की व्यार्वसार्यिक तथार् मार्नसिक कुशलतार्ओं क पूर्ण उपयोग करने में भी प्रबंधन प्रशिक्षण आवश्यक है। समार्ज की आवश्यकतार् तथार् शैक्षिक लक्ष्यों के सन्दर्भ में बार्लकों तथार् अभिभार्वकों के लिए शैक्षिक कार्यक्रमों क नियोजन करने के लिए भी प्रबंधन प्रशिक्षण की आवश्यकतार् होती है।

प्रशिक्षण (Training) शब्द को निम्न प्रकार से परिभार्षित कियार् जार् सकतार् है- किसी दिये गये कार्य को उचित ढंग से संपार्दित करने के लिये किसी व्यक्ति विशेष के दृष्टिकोण (अभिवृत्ति), ज्ञार्न, कौशल एक्रम् व्यवहार्र के र्कमबद्ध विकास क नार्म प्रशिक्षण है।,

प्रशिक्षण और शिक्षार् में अन्तर

ग्लैसर ने अपनी पुस्तक ‘प्रशिक्षण अनुसंधार्न एवं शिक्षार् में मनोवैज्ञार्निक अनुदेशन तकनीकी’ में यह संकेत कियार् है कि निम्नलिखित दो कसौटियों के आधार्र पर शिक्षार् क्रम प्रशिक्षण में अन्तर कियार् जार् सकतार् है-

  1. उद्धेश्य की विशिष्टतार् की मार्त्रार्।
  2. व्यक्तिगत भेदों की अल्पतार् एवं अधिकतार्।

प्रशिक्षण के उद्धेश्य अति विशिष्ट होते हैं तथार् भेदों को कम करने क प्रयार्स करते हैं। दूसरी ओर शैक्षिक उद्धेश्य अति सार्मार्न्य होते हैं, और व्यक्तिगत विभेदों को बढ़ार्वार् देते हैं। जब लोगों को शिक्षित कियार् जार्तार् है तो उनके मध्य अन्तर बढ़तार् है, लेकिन जब प्रशिक्षित कियार् जार्तार् है तो उनके मध्य क अन्तर कम होतार् है। दोनों में अन्तर है-

1. प्रकृति क अन्तर-शिक्षार् जीवन के प्रत्येक कार्य के लिये आवश्यक ज्ञार्न तथार् नैतिक मूल्यों के विकास से सम्बन्धित र्कियार्ओं पर अधिक बल देती है। प्रशिक्षण किसी कार्य के उचित सम्पार्दन के लिये आवश्यक विशिष्ट ज्ञार्न, अभिवृनि, कौशल एक्रम् व्यवहार्र के विकास पर बल देतार् है। प्रशिक्षण से व्यवहार्र एक कार्य से दूसरे कार्य के लिये अलग-अलग होते हैं। यदि हम किसी व्यक्ति को अध्यार्पक के रूप में प्रशिक्षित करते हैं तो हम उस व्यक्ति के कौशलों क विकास करते हैं, जो अच्छार् अध्यार्पक होने के लिये आवश्यक है।

2. उद्धेश्य क अन्तर-शिक्षार् क उद्धेश्य बच्चों एक्रम् प्रौढ़ों को ऐसी आवश्यक परिस्थितियार् प्रदार्न करनार् है, जो उन्हें उन सार्मार्जिक परम्परार्ओं एवं विचार्रों क बोध् करार्ए, जो उस समार्ज को प्रभार्वित करते हैं, दूसरी संस्कृति तथार् प्रार्कृतिक नियमों क ज्ञार्न करार्ये तथार् उनमें भार्षार्यी ज्ञार्न एवं अन्य कौशलों को विकसित कर सके जोकि अधिगम तथार् व्यक्तिगत विकास और सृजनार्त्मकतार् क आधार्र है। प्रशिक्षण क उद्धेश्य किसी व्यवसार्य विशेष में निपुणतार् प्रार्प्त करनार् है, जिसके लिये व्यक्ति को प्रशिक्षित कियार् जार्तार् है। प्रशिक्षित क सम्बन्ध जन अधिगम से होतार् है तार्कि कार्य क सम्पार्दन उचित प्रकार से विशिष्टतार् के सार्थ कियार् जार् सके।

प्रशिक्षण की आवश्यकतार्

किसी विशेष कार्य एवं व्यवसार्य में प्रभार्वी रूप से कार्य करने के लिये प्रशिक्षण आवश्यक होतार् है। यदि किसी व्यक्ति को कुछ दिन के प्रशिक्षण के उपरार्न्त, किसी व्यवसार्य में नियुक्त कियार् जार्तार् है, तो वह व्यवसार्य के लिये योग्य सिद्ध होतार् है। यदि किसी व्यक्ति को नियुक्ति के पूर्व किसी कार्य में प्रशिक्षित कियार् जार्तार् है तो इसे पूर्व प्रशिक्षण की संज्ञार् दी जार्ती है, जो बड़ार् महत्वपूर्ण होतार् है। यदि किसी व्यक्ति को बिनार् किसी प्रशिक्षण के किसी कार्य पर नियुक्त कियार् जार्तार् है तो यह एक जोखिम भरार् कार्य होतार् है, क्योंकि उसे यन्त्रों के बार्रे में कोई ज्ञार्न नहीं होतार् है। जब एक व्यक्ति किसी कार्य में असफल हो जार्तार् है तो उस कार्य के प्रति उसमें नकारार्त्मक अभिवृनि क उदय होतार् है, और वह उस कार्य के लिये योग्य नहीं है। प्रशिक्षण के उपरार्न्त उसे अपने कार्य में सफलतार् मिलती है तथार् सन्तुष्टि प्रार्प्त होती है। सार्मार्न्यत: प्रशिक्षण की आवश्यकतार् है-

  1. कार्य को सफलतार्पूर्वक प्रभार्वी ढंग से सम्पार्दित करने के लिये।
  2. प्रशिक्षित व्यक्ति थोड़े समय में प्रभार्वी ढंग से सीख लेते हैं। अप्रशिक्षित व्यक्तियों की तुलनार् में एक व्यक्ति उन कार्यो को बिनार् प्रशिक्षण के सीख लेतार् है, जिनमें वह लगार् हो।
  3. अति जटिल कार्यो के लिये विशिष्ट ज्ञार्न, अभिवृनि, कौशल एक्रम् व्यवहार्र की आवश्यकतार् होती है। इसलिये अधिक विशिष्टतार् के लिये प्रशिक्षण क महत्व बढ़ जार्तार् है। यदि कोई व्यक्ति कार्य यार् व्यवसार्य में ही सब कुछ सीखतार् हो तो उसमें जोखिम क खतरार् बनार् रहतार् है, और उसके जीवन के लिये भी खतरार् उत्पन्न हो सकतार् है। प्रयार्स और त्रुटि क परिणार्म समय और शक्ति की बर्बार्दी के रूप में होतार् है। प्रशिक्षण के द्वार्रार् अध्यार्पक के प्रयत्नों को व्यर्थ जार्ने से बचार्यार् जार् सकतार् है।
  4. सुव्यवस्थित क्रम प्रणार्लीबद्ध प्रशिक्षण कार्यक्रम कम समय में अधिक प्रभार्वी ढंग से कार्य क ज्ञार्न करार्ते हैं। यदि किसी कार्य के लिये विशिष्ट ज्ञार्न (Knowledge), प्रयोग (Application), कौशल (Skill) तथार् व्यवहार्र (Behaviour) (KASB) की आवश्यकतार् नहीं है तो प्रशिक्षण की कोई आवश्यकतार् नहीं है। लेकिन प्रत्येक कार्य के लिए कुछ विशिष्ट ज्ञार्न, प्रयोग, कौशल और व्यवहार्र की आवश्यकतार् होती है। इसलिए प्रत्येक कार्य यार् व्यवसार्य के लिए प्रशिक्षण आवश्यक है।
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