प्रधार्नमंत्री की नियुक्ति, कार्य एवं शक्तियार्ं
प्रधार्नमंत्री की नियुक्ति प्रधार्नमंत्री की नियुक्ति रार्ष्ट्रपति द्वार्रार् की जार्ती है। व्यवहार्र में रार्ष्ट्रपति लोक सभार् के बहुमत दल के नेतार् को प्रधार्नमंत्री पद पर नियुक्ति करते है। प्रधार्नमंत्री की सलार्ह से अन्य मंत्रियों की नियुक्ति रार्ष्ट्रपति द्वार्रार् की जार्ती है, जब लोकसभार् में किसी एक दल यार् घटक को स्पष्ट बहुमत प्रार्प्त न हुआ हो तो रार्ष्ट्रपति स्वविवेक से ऐसे व्यक्ति को प्रधार्नमंत्री नियुक्ति करतार् है जो लोकसभार् में अपनार् बहुमत सिद्ध कर सके। इसके अतिरिक्त रार्ष्ट्रपति द्वार्रार्, संसद के बार्हर से भी किसी व्यक्ति की नियुक्ति प्रधार्नमंत्री पद पर की जार् सकती है, परन्तु बार्हरी व्यक्ति को पद ग्रहण करने की तिथि से 6 मार्ह के अंदर संसद के किसी भी सदन क सदस्य निर्वार्चित हो जार्नार् अनिवाय होतार् है अन्यथार् उसे अपने पद से हटार्नार् पडतार् है।

प्रधार्नमंत्री के कार्य एवं शक्तियार्ं 

1. संसदीय शार्सन – 

संसदीय प्रणार्ली में शार्सन की वार्स्तविक शक्ति मंत्रीपरिषंद् में निहित होती है, जिसक नेतृत्व प्रधार्नमंत्री करतार् है। प्रधार्नमंत्री वार्स्तविक कार्यपार्लिक क वार्स्तविक अध्यक्ष होतार् है। प्रधार्नमंत्री को ‘‘मंत्रिमण्डल रूपी नार्व क मल्लार्ह कहार् जार्तार् है।’ ‘ प्रधार्नमंत्री की शक्तियों एवं कार्यो क वर्णन निम्नलिखित शीषर्कों के आधार्र पर कियार् जार् सकतार् है –

  1. लोकसभार् क नेतार् – प्रधार्नमंत्री लार्के सभार् के बहुमत प्रार्प्त दल क नेतार् होतार् है और वही सरकार की महत्वपूर्ण नीतियों की सदन में घोषणार् करतार् है। वाषिक बजट एवं अन्य समस्त सरकारी विधेयक उसी के निर्देशार्नुंसार्र तैयार्र किये जार्ते है आरै सदन में प्रस्तुत किये जार्ते है। इसके अतिरिक्त वह सरकारी वह रार्ष्ट्रपति को लोक सभार् भंग करने क परार्मर्श दे सकतार् है। 
  2. मंत्रिपरिषद् व प्रधार्नमंत्री – प्रधार्नमंत्री मंत्रीपरिषद क निर्मार्ण करतार् है, मंत्रियों में विभार्गों क बंटवार्रार् करतार् है, विभार्गों मे परिवर्तन करनार् व मंत्रियों को पद से हटार्नार्, मंत्रिपरिषद् की बैठकों की अध्यक्षतार् करनार् प्रधार्नमंत्री क प्रमुख कार्य है। 
  3. मंत्रिपरिषद् और रार्ष्ट्रपति के मध्य की कडी – प्रधार्नमंत्री मंत्रिपरिषद् की समस्त कार्यवार्हियों से रार्ष्ट्रपति को अवगत करार्तार् है। रार्ष्ट्रपति भी मंत्रिपरिषद् को यदि कोर्इ परार्मर्श यार् निर्देश देनार् चार्हे तो वह प्रधार्नमंत्री के मार्ध्यम से ही देतार् है । 
  4. नियुंक्ति सम्बन्धी परार्मर्श- रार्ष्ट्रपति को जो नियुक्तियॉ करने क अधिकार पार््र प्त है व्यवहार्र में वे सभी नियुक्तियॉ प्रधार्नमंत्री के परार्मर्श से ही रार्ष्ट्रपति द्वार्रार् कियार् जार्तार् है। 
  5. उपार्धि वितरण में रार्ष्ट्रपति को परार्मर्श- रार्ष्ट्रपति ‘भार्रत रत्न’ पद्म-भूषण पद्मश्री तथार् अन्य रार्ष्ट्रीय परु स्कारों क वितरण प्रधार्नमंत्री के परार्मर्श से ही करतार् है । 
  6. सरकार क प्रधार्न प्रवक्तार् – संसद में, देश और विदेशों में प्रधार्नमंत्री ही सरकार की नीतियार्ं क अधिकृत प्रवक्तार् होतार् है । 
  7. आपार्तकालीन शक्तियॉ – रार्ष्ट्रपति को प्रार्प्त आपार्तकालीन शक्तियों क वार्स्तविक प्रयोग, प्रधार्नमंत्री ही करतार् हैं। यद्धु पार््ररम्भ करने के सम्बन्ध में निर्णय लेनार्, रार्ष्ट्रीय सुरक्षार्, विजय, परार्जय क पूर्णरूपेण उत्तरदार्यित्व प्रधार्नमंत्री क होतार् है। 
  8. अन्तर्रार्ष्ट्रीय जगत में भार्रत क प्रतिनिधित्व – प्रधार्नमंत्री अन्तर्रार्ष्ट्रीय जगत में भार्रत क प्रतिनिधित्व करतार् है। विदेश नीति सम्बन्धी निर्णय अंतिम रूप से प्रधार्नमंत्री द्वार्रार् ही लिये जार्ते है। अन्तर्रार्ष्ट्रीय सम्मेलनों में भार्ग लेनार्, अन्तर्रार्ष्ट्रीय समस्यार्ओं एवं विवार्दों को सुलझार्ने विदेशों से सन्धियॉं – समझौते करने में भी प्रधार्नमत्री की भूि मक महत्वपूर्ण होती है । 

2. मंत्रिपरिषद् तथार् मंत्रीमण्डल – 

मंत्रिपरिषद् तथार् मंत्रीमण्डल जैसे शब्दों क प्रयोग, पार््रय: एक दूसरें के लिए कर लियार् जार्तार् है।। वार्स्तविकतार् में ऐसार् नहीें है। संविधार्न के 44 वें संशोधन से पूर्व मंत्रिमण्डल शब्द क प्रयोग संविधार्न में नहीे कियार् गयार् थार्। हम मंत्रिपरिषद् तथार् मंत्रीमण्डल में अंतर जार्ने जो इस प्रकार है : मंत्रिपरिषद् में सभी प्रकार के मंत्री होते है जैसे कैबिनेट मंत्री तथार् रार्ज्य मंत्री जबकि मंत्रिमण्डल में कवे ल वरिष्ठ मंत्री होते हैं। इसमें मंत्रियों की संख्यार् 15 से 20 के बीच होती है जबकि मंत्रीपरिषद में 70 से भी अधिक मंत्री हो सकते है। सम्पूर्ण मंत्रिपरिषद की बैठक कभी-कभी ही होती है। दसू री आरे मंत्रीमण्डल की बठै क आवश्यकतार्नुसार्र बार्र-बार्र होती रहती है। सरकार की नीतियों तथार् कार्यक्रमों क निर्धार्रण मंत्रिमण्डल ही करतार् है न कि मंत्रिपरिषद्। इस प्रकार मंत्रिमण्डल मंत्रिपरिषद् के नार्म से ही कार्य करतार् है तथार् उसी की ओर कार्य करतार् है।

 3. मंत्रिमण्डल के कार्य एवं शक्तियार्ं –

मंत्रिमण्डल की शक्तियार्ं विशार्ल तथार् जिम्मेदार्रियार्ं अनेक है। रार्ष्ट्रपति की सभी कार्यपार्लिक संबंधी शक्तियों क प्रयोग प्रधार्नमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिमण्डल करतार् है। मंत्रिमण्डल देश की आंतरिक एवं विदेशी नीति के निर्धार्रण संबंधी सभी प्रमुख निर्णय लेतार् है। लोगों को बेहतर जीवन की परििस्थ्ंतियार्ं उपलब्ध करार्ने के लिए भी मंत्रिमण्डल नीतियार्ं निर्धार्रित करतार् है। यह रार्ष्ट्रीय वित्त पर नियंत्रण रखतार् है। सरकार द्वार्रार् किए जार्ने वार्लार् सार्रार् खर्च तथार् आवश्यक रार्जस्व जुटार्नार् इसकी जिम्मेदार्री है। रार्ष्ट्रपति द्वार्रार् ससं द में दिए जार्ने वार्ले अभिभार्षण की विषय वस्तु भी मंत्रिमण्डल तैयार्र करतार् है। जब संसद क अधिवेशन से न हो रहार् हो, तो रार्ष्ट्रपति द्वार्रार् अध्यार्देश जार्री करवार्ने क दार्यित्च भी इसी पर है। प्रधार्नमंत्री के मार्ध्यम से मंत्रिमण्डल की सलार्ह पर रार्ष्ट्रपति संसद के अधिवेशन बुलार्तार् है। संसद के कार्यक्रम की रूप रेखार् भी मंत्रिमण्डल द्वार्रार् तैयार्र की जार्ती है।

4. मंत्रियों क उत्तरदार्यित्व 

हम पहले पढ चुके हैं कि रार्ष्ट्रपति को परार्मर्श तथार् सहयोग देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होती है। जिसक नेतृत्व प्रधार्नमंत्री करतार् है। संविधार्न के अनुसार्र मंत्री रार्ष्ट्रपति के प्रसार्द काल तक अपने पद पर बने रहते हैं। परन्तु वार्स्तव में वे लोक सभार् के प्रति उत्तदार्यी है और लोक सभार् ही उन्हें हटार् सकती है। वस्तुत: यह संविधार्न में कहार् गयार् है कि मंत्रिपरिषद् केवल लोक सभार् के प्रति उत्तदार्यी है, दोनो सदनों के प्रति नहीं। मंत्रिपरिषद् उत्तरदार्यित्व संसदार्त्मक सरकार क एक आवश्यक लक्षण है। मंत्रिपरिषद्ीय दार्यित्व के सिद्धार्ंत के दो आयार्म है: सार्मूहिक उत्तरदार्यित्च तथार् व्यक्तिगत उत्तरदार्यित्च ।

5. सार्मूहिक उत्तरदार्यित्व 

हमार्रे संविधार्न में यह स्पष्ट कहार् गयार् है कि मंत्रिपरिषद् सार्मूहिक रूप में लोक सभार् के प्रति उत्तरदार्यी होगी। इस क वार्स्तव अर्थ यह है कि मंत्री लोक सभार् के प्रति व्यक्तिगत रूप से ही उत्तरदार्यित्व नही अपितु सार्मूहिक रूप से भी हैं। सार्मूिहक उत्तरदार्यित्व के दो निहित अर्थ हैं। पहलार् यह कि मंत्रिपरिषद् क प्रत्येक सदस्य मंत्रीमण्डल के प्रत्येक निर्णय की जिम्मेदार्री स्वीकार करतार् है। प्रधार्नमंत्री को मंत्रिपरिषद रूपी मेहरार्ब की आधार्रशीलार् कहार् जार्तार् है यदि वह एक शीलार् न रहे तो समूचार् मंत्रिपरिषद ध्वस्त हो जार्तार् है। प्रधार्नमंत्री की स्थिति उस नार्विक के समार्न होती है जिसके सहार्रे मंत्रिपरिषद् के सभी सदस्य इकट्ठे तैरते हैं तथार् इकठ्ठे डूबते हैं। जब मंत्रीमण्डल द्वार्रार् कोर्इ निर्णय से मंत्री को बिनार् किसी झिझक के उसक समर्थन करनार् होगार्। यदि कोर्इ मंत्री, मंत्रिमण्डल के निर्णय से सहमत नहीं है तो उसके लिए कवे ल एक विकल्प बचतार् है कि वह मंत्रीपरिषद् से त्यार्गपत्र दे। सार्मूहिक उत्तरदार्यित्व क स्तर यह है कि मंत्री सरकार के सार्थ मतदार्न करें, यदि प्रधार्नमंत्री आग्रहपूर्वक कहे तो उसक समर्थन करें और बार्द में ससंद में यार् अपने निर्वार्चन क्षेत्रों में अपने निर्णय की आलोचनार् को इस आधार्र पर रद्द न करें कि वह इस निर्णय से सहमत नहीं थार्। दूसरार् यह कि प्रधार्नमंत्री के विरूद्ध अविश्वार्स क पार्रित होनार् समूचे मंत्रिपरिषद् के विरूद्ध अविश्वार्स है। इसी प्रकार, लोक सभार् में किसी सरकारी विधेयक यार् बजट के विरूद्ध बहुमत होनार्, सार्रे मंत्रिमण्डल के विरूद्ध अविश्वार्स है न कि केवल विधेयक प्रस्तार्वित करने वार्ले के विरूद्ध़।

व्यक्तिगत उत्तरदार्यित्च 

यघपि मंत्री लार्के सभार् के प्रति सार्मूहिक रूप से उत्तरदार्यी होते हैं तथार्पि वे लोक सभार् के प्रति व्यक्तिगत रूप से भी उत्तरदार्यी है। प्रधार्नमंत्री अथवार् मंत्रिमण्डल की सहमति के बिनार्, यदि किसी मंत्री द्वार्रार् किए गए किसी कार्य की आलोचनार् होती है और उसे संसद द्वार्रार् स्वीकार नहीं कियार् जार्तार्, तो व्यक्तिगत उत्तरदार्यित्व लार्गू होतार् है। इसी प्रकार यदि किसी मंत्री क व्यक्तिगत व्यवहार्र अभ्रद्र तथार् प्रश्नार्त्मक हो तो सरकार पर कोर्इ प्रभार्व पड़े बिनार्, उसे त्यार्ग पत्र देनार् होगार्। यदि कोर्इ मंत्री सरकार पर बोझ बन जार्तार् है अथवार् प्रधार्नमंत्री के लिए सिरदर्द बन जार्तार् है तो उसे पद छोड़ने के लिए कहार् हार् सकतार् है।

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