प्रतिरोधक क्षमतार् बढ़ार्ने के उपार्य

प्रतिरोधक क्षमतार् क अर्थ –

शरीर में ऐसी संचार्लित प्रणार्ली है जो बिनार् किसी चिकित्सक की सहार्यतार् के रोगो से लड़ने के लिए हमेशार् तत्पर रहे उसको शरीर की प्रतिरोधक क्षमतार् के रूप में जार्नार् जार्तार् है। इसे प्रतिरक्षार् प्रणार्ली भी कहार् जार्तार् है । इसी को शरीर की स्वंयम् की हीलिंग तथार् मुरम्मत करने वार्ली शक्ति के नार्म से पुकारते है। क्योकि शरीर को हार्नि पहुंचार्ने वार्ले मुख्य तत्वों से रक्षार् एवम् बचार्व हेतु सक्रीय रहती है। क्षीण कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमतार् व्यक्ति को दीन-हीन एवम् आरोग्य विहीन कर देती है। इस लिए मनुष्य के आरोग्य एवम् दीर्घ आयु में प्रतिरोधक क्षमतार् पर्यार्वरण तथार् विरार्सत में मिलने वार्ले जीशं पर अत्यधिक निर्भर करतार् है क्योकि परमार्त्मार् ने प्रकृति से सृजित इस शरीर को इस प्रकार बनार्यार् है कि प्रतिदिन व्यार्यार्म भ्रमण अच्छी नींद व सन्तुलित भोजन जीविक उपाजन तथार् ध्यार्न व रार्म नार्म करनार् आवश्यक है। कोशिकाओं के सूक्ष्म आश्विक जैनेटिक धरार्तल पर होने वार्ले परिवर्तन के सम्बन्ध में बहुत कुछ जार्नने के पश्चार्त भी अभी बहुत कुछ जार्ननार् बार्की है। बुढ़ार्पार् तथार् पैतृक रोगो में प्रतिरोधक क्षमतार् क सुदृढ़ अथवार् कमजोर होनार् एक महत्वपूर्ण भूमिक अदार् करतार् है। प्रतिरोधक क्षमतार् को विभिन्न प्रकार के कीटार्णु प्रभार्वित करते है। हमार्रे शरीर में लगभग 1000 खरब बैक्टीरियार् पार्ये जार्ते है। जिनमें से कुछ बीमार्री पैदार् करने वार्ले तथार् अन्य हमार्रे शरीर को विभिन्न प्रकार की सहार्यतार् के सार्थ विटार्मिन आदि के निर्मार्ण में सहार्यतार् करते है। एक शोध के अनुसार्र कोर्इ भी व्यक्ति कितनार् ही सार्फ सुधरार् व स्नार्न करतार् रहें फिर भी बैक्टीरियार् उसके शरीर में पार्ये जार्ते है। जुकाम, खार्सी, दस्त, एलर्जी आदि शरीर की रक्षार् प्रणार्ली एवम् प्रबल प्रतिरोधक क्षमतार् को प्रदर्शित करती है। विश्व में विभिन्न सौध अध्ययनों के विश्लेषण से यह सिद्ध हो चुक है कि तीव्र रोग एवम् एलर्जी आदि शरीर द्वार्रार् स्वत: स्वस्थ होने क एक प्रार्कृतिक प्रयार्स होतार् है। परन्तु इनको रोक देने शरीर में विजार्तीय द्रव्य एकत्र हो जार्ते है जिनसें विभिन्न प्रकार के रोग जीर्ण रोग में परिवर्तित होकर हमार्रे शरीर को रोगी बनार् देते है। प्रतिरोधक क्षमतार् जितनी शक्तिशार्ली होगी उतनी ही रोगों से अधिक बचार्व करेगी। शरीर में एकत्र हुये विजार्तीय द्रव्यों एवम् बार्हरी हार्निकारक तत्वों से निपटने के लिए कुछ प्रक्रियार्यें शरीर में होती है। जिनक संचार्लन क कार्य जो शक्ति करती है। उसे प्रतिरोधक क्षमतार् कहते है। जो गलत जीवनशैली के कारण कमजोर हो जार्ती है तथार् सन्तुलित आहार्र नियमित योग, व्यार्यार्म, अच्छी नींद सकारार्त्मक सोच शुद्ध पर्यार्वरण आदि से यह प्रबल हो जार्ती है। प्रार्कृतिक चिकित्सार् की उपचार्र करने की मुख्य प्रणार्ली क आधार्र रोग प्रतिरोधक क्षमतार् को बढ़ार् देनार् होतार् है। जिससे रोगो के मूल घटक विजार्तीय द्रव्य को शरीर से बार्हर निकालकर शरीर को रोग मुक्त करके आरोग्य प्रार्प्त होतार् है। इसक अन्त्र इस बार्त से समझार् जार् सकतार् है कि कुछ लोग 14-15 घण्टे काम करके भी चुस्त व तरोतार्जार् नजर आत है।

वहीं पर कुछ लोग 4-5 घण्टे काम करते ही थके एवम् मुरझार्यें दिखाइ पड़ते है। यह अन्त्र दिखाइ पढ़ने के पीछे प्रतिरोधक क्षमतार् क सुदृढ़ एवम् कमजोर होनार् कहलार्तार् है। प्रचलित मतों के अनुसार्र शरीर की कुछ चयार् पचार्यार् से सम्बन्धित क्रियार्ओं के परिणार्म स्वरूप शरीर में जो ऊष्णतार् पैदार् होती है वहीं मार्नव शरीर को प्रतिरोधक क्षमतार् प्रदार्न करती है। आइयें इसी प्रतिरोधक क्षमतार् को बढ़ार्ने हेतु कुछ सूत्र एवम् उपार्यों की चर्चार् आगे करते है।

प्रतिरोधक क्षमतार् बढ़ार्ने के उपार्य –

प्रतिरोधक क्षमतार् बढ़ार्ने के लिए हमें दैनिक जीवन शैली को सुदृढ़ बनार्न होगार् जिसके लिए निम्न कुछ बिन्दुओं पर ध्यार्न देकर अपने को उसके अनुरूप ढार्लने की आवश्यकतार् है।

1. जीवन शैली द्वार्रार्

  1. प्रार्त: काल सूर्योदय से पहले उठनार् ।
  2. नियमित आहार्र व्यार्यार्म व योगार्सन से दिमार्गे में वीटार् ‘‘एर्डोफिन’’ तथार् खून में पार्यरोजिन क रिसार्व बढ़ जार्तार् है इसलिए श्वेत रक्त कोशिकाओं की संख्यार् भी बढ़ जार्ती है। इससे शरीर में आक्सीजन की मार्त्रार् अधिक हो जार्ती है। जिससे कैलोरी घटार्ने में सहार्यतार् मिलती है। 
  3. आहार्र :- प्रतिरोधक क्षमतार् बढ़ार्ने में हमे आहार्र के द्वार्रार् आवलार्, नीबू, सन्तरार्, टमार्टर, तार्जे फल व सब्जियार्ं अन्कुरित अनार्ज शुद्ध व तार्जार् भोजन ही ग्रहण करनार् चार्हिए इनसे हमें विटार्मिन सी, बी, बी-1, बी-6 एवम् बी-12 इत्यार्दि प्रार्प्त होते है जिनसे शरीर में ‘एन्टीवॉडीज’ के निर्मार्ण की प्रक्रियार् बढ़ जार्ती है। जिससे खून क निर्मार्ण होतार् रहतार् है। विटार्मिन बी-2 जो सौसन, दिमार्ग, गुर्दे, दिल व लीवर को प्रभार्वित करतार् है। खार्न-पार्न से ही प्रभार्वित होतार् है। इसके लिए छिलके वार्ली दार्ल, चनार्, गेहूॅ, मूंगफली, दूध, दही, छार्छ, तिल, आलू, प्यार्ज, चुकन्दर, लैहसुन तथार् पत्ते वार्ली हरी सब्जियों क सेवन अधिक करनार् चार्हिए। विटार्मिन बी-6 के लिए भी उपरोक्त क सेवन करनार् आवश्यक है। विटार्मिन बी-12 हेतु उपरोक्त खार्न-पार्न के अतिरिक्त प्रदूषण रहित झरनों कुओं से भी इसमें लार्भ मिलतार् है।
  4. अच्छी गहरी नींद :- प्रार्कृतिक जीवन शैली हेतु गहरी नींद द्वार्रार् नर्इ ऊर्जार् आरोग्य एवम् शक्ति प्रार्प्त होती है। सोते समय दिमार्ग की संचार्र प्रणार्ली को ठीक रखने हेतु सभी श्रार्व व न्यूरॉग इत्यार्दि सन्तुलित होकर हमें अच्छी नींद लेने में सहार्यक होते है। नींद के लिए सेरोटोनिन क स्रार्व बढ़नार् आवश्यक होतार् है। नींद के द्वार्रार् ही शरीर की थकान मिटकर शरीर में नर्इ ऊर्जार् क संचार्र होतार् है। हमार्रे शरीर की थकी हुर्इ मार्ंसपेशियार्ं शरीर के विभिन्न अंग तथार् स्नार्यु कोशिकायें ऊर्जार्वार्न होती है, नींद हमार्रे शरीर के लिए संजीवनी क काम करती है। 
  5. भरपूर जल सेवन :- प्रतिदिन 10 से 15 गिलार्स पार्नी जिसमें सवेरे खार्ली पेट शौच से पहले एक यार् दो गिलार्स पार्नी-पीनार् शरीर के लिए लार्भदार्यक है। इससे अमार्शय की धुलाइ हो जार्ती है। पार्चन क्रियार् सुधरती है। आंतो की गति नियमित व नियंत्रित हो जार्ने से पेट में कब्ज इत्यार्दि नहीं होती। इससे खून में पार्नी की मार्त्रार् ठीक रहने से खून पतलार् रहतार् है। पसीनार् आतार् है, पेशार्ब बढ़तार् है तथार् इन सबके बढ़ने से शरीर में एकत्र विजार्तीय पदाथ बार्हर निकलते रहते है और विजार्तीय पदाथ यदि शरीर में नहीं होंगे तो अवश्य ही शरीर में प्रतिरोधक क्षमतार् अच्छी होगी। 
  6. वार्तार्वरण एवम् पर्यार्वरण :- हम जहार्ं पर रहते है, काम करते है अथवार् प्रार्त: कालीन भ्रमण, व्यार्यार्म इत्यार्दि जहार्ं करते है वहार्ं क वार्तार्वरण प्रदूषण, धूल, धुन्ध इत्यार्दि से मुक्त होनार् आवश्यक है क्योकि प्रदूषित वार्तार्वरण अथवार् कार्बन डाइ आक्सार्इड एवम् हार्इड्रो कार्बन, ठार्र इत्यार्दि से जहरीले रसार्यन निकलकर हमार्रे रक्त में न धुल सकें इसलिए स्वच्छ वार्तार्वरण आवश्यक हो जार्तार् है। 
  7. ध्यार्न एवम प्राथनार् :- आज की तनार्व भरी जीवन शैली में प्रार्णार्यार्म एवम् ध्यार्न की आवश्यकतार् बहुत अधिक है। हम दिन भर के तनार्व से अथवार् किसी कारण व क्रोध इत्यार्दि से नकारार्त्मक सोच से तथार् अनार्वश्यक चिन्तार् से शरीर में कैल्शियम, मैगनीशियम, फौलिक एसिड, विटार्मिन्स इत्यार्दि को कम कर देते है तथार् कोलोस्ट्रोल इत्यार्दि बढ़ जार्तार् है। ध्यार्न के प्रभार्व से शरीर में त्वचार्, मस्तिश्क तन तथार् मन में उथल पुथल क सन्तुलन तथार् सार्म-जस स्थार्पित होतार् है। इसके द्वार्रार् अनिन्द्रार् उच्च रक्त चार्प एल0डी0एल, वी0एल0डी0एल0 तथार् खरार्ब कोलोस्ट्रॉल की मार्त्रार् कम हो जार्ती है। ध्यार्न अथवार् चिन्तन में गार्यत्री मन्त्र क जार्प ऊँ क जार्प अथवार् प्रार्णार्यार्म के द्वार्रार् विचार्र मन और चित्त में शार्न्ति पैदार् होती है।
  8. नशीले पदाथो से दूरी :- किसी भी प्रकार के मार्दक एवम् नशीले पदाथो क सेवन हमें बिल्कुल नहीं करनार् चार्हिए। शरार्ब, तम्बार्कू व अन्य नशीले पदाथ शरीर में जार्कर हमार्रे विभिन्न अंगो पर बुरार् प्रभार्व डार्लते है। इसलिए प्रतिरोधक क्षमतार् पर भी प्रभार्व पड़तार् है। 
  9. प्रसन्नतार् एवम् मुस्कुरार्हट :- मुस्कुरार्हट के द्वार्रार् रक्त रार्सार्यन अमृत में बन जार्तार् है। सार्थ ही शरीर के अंग प्रतिअंग भी प्रफुल्लित होते जार्ते है। इसलिए प्रार्य: उठते ही मुस्कुरार्हट के सार्थ दिन की शुरूआत करें, इसी मुस्कुरार्हट से तनार्व घट जार्तार् है। दुर्भार्वनार्यें मिट जार्ती है तथार् घृणार्, कुन्ठार्, क्रोध, र्इश्र्यार् के स्थार्न पर प्रेम, करूणार्, त्यार्ग व सेवार् क भार्व जार्गृत होतार् है। जिससे चित्त में प्रसन्नतार् के सार्थ-सार्थ सकारार्त्मक विचार्र धार्रार् पनपती है। मुस्कुरार्हट एक ऐसार् धन है जो जीवन भर बार्टने के बार्द भी कभी घटतार् नहीं है। अपितु मार्नसिक हतार्शार् एवम् निरार्शार् को आशार् एवम् उत्सार्ह में बदल देतार् है। 
  10. अहिंसार् एवम् निर्भयतार् क पार्लन :- भय एवम् हिंसार् की प्रवृत्ति से हमार्रे विचार्र प्रभार्वित होते है। जो हमार्री सोच को नकारार्त्मक एवम् करूणार् रहित बनार् देते है। जिससे उनमार्द पैदार् होने क खतरार् रहतार् है। अत: इस तरह के रोग से बचार्व हेतु तथार् प्रतिरक्षार् प्रणार्ली को सुदृढ़ बनार्ने हेतु इसक पार्लन करनार् आवश्यक है।

2. योग एवम् चक्रों द्वार्रार्-

प्रतिरोधक क्षमतार् बढ़ार्ने में योग के आठो अंगो क पार्लन करनार् अर्थार्त् यम नियम, आसन, प्रार्णार्यार्म, प्रतिहार्र, धार्रणार्, ध्यार्न, समार्धि सभी क ज्ञार्न एवम् व्यवहार्रिक जीवन में क्रियार्नवयन आवश्यक है। सार्थ ही हमार्रे शरीर में स्थित सार्तो चक्रो पर विशेष ध्यार्न देने की आवश्यकतार् है। ये चक्र निम्न प्रकार है।

  1. मूलार्धार्र चक्र :- रक्त वर्ण के चार्र पंखुडी वार्ले इस चक्र के सन्तुलन से हमें बुरी वृत्ति एवम् वार्यु रोगों में लार्भ के सार्थ-सार्थ आरोग्य एवम् आनन्द की अनुभूति होती है तथार् इसी चक्र द्वार्रार् कुण्डलनी एवम् सुशुम्मनार् नार्ड़ी जार्गृति होकर उर्दगार्मी चक्रो तक ली जार्ती है। 
  2. स्वार्धिष्ठार्न चक्र :- यह चक्र मूलार्धार्र चक्र से दो अंगुल ऊपर सिन्दूरी रंग के सार्थ छ: पंखुण्डी वार्ले कमल पर स्थित होतार् है। जो व्यार्न वार्यु को सन्तुलित करतार् है। 
  3. मणिपुर चक्र :- यह चक्र नार्भि मूल के दस पंखुण्डी वार्ले कमल पर स्थिति है इसे जार्गृत करने से पार्चन संस्थार्न की उदर सम्बन्धित एवम् गर्भस्त शिशु को ऊर्जार् प्रदार्न करतार् है। इससे पेट सम्बन्धित सभी रोग एवम् अर्जीणतार् दूर होकर प्रतिरोधक क्षमतार् को बढ़ार्ने में सहार्यक सिद्ध होतार् है। 
  4. अनार्हत चक्र :- यह चक्र हृदय के पार्स 12 पंखुडी के सार्थ कमल पर स्थिति इसके जार्गृत एवम् सन्तुलित होने से फेफड़े, हृदय की रक्षार् हेतु रक्त संचार्र प्रक्रियार् को नियंत्रित व नियमित करतार् है।
  5. पिच्युट्री चक्र :- यह चक्र गले के कन्ठ प्रदेश के समीप 16 पंखुडी वार्लार् कमल पर स्थिति है। इसके सन्तुलित एवम् जार्गृत होने से थार्इरार्इड स्वर यंत्र पेरार्थार्इरार्इड सुनने की शक्ति एवम् भूख प्यार्स को नियंत्रित एवम् नियोजित करतार् है। यह मन को शार्न्त बनार्कर भय क्रोध से मुक्त करतार् हैै। 
  6. आज्ञार् चक्र :- यह चक्र भ्रकुटी के मध्य स्थित है। इसके द्वार्रार् मन की चंचलतार् एवम् चिति वृत्तियों को प्रभार्वित करतार् है। यह सूर्य द्वार्रार् संचार्लित है। जिसके द्वार्रार् सेरोटोनिन क स्रार्व बढ़तार् है। यह शरीर के समस्त अंगो के सजगतार् एवम् क्रियार् शीलतार् को बढ़ार् देतार् है। 
  7. सहस्त्र चक्र :- सहस्त्र चक्र को सिर के ऊपरी भार्ग में धड़कने वार्ली जगह पर स्थित मार्नार् गयार् है इसके जार्गृत होने से आत्मार्नुशार्सन धैर्य सार्हस ज्ञार्न तथार् समार्धि की उपलब्धि प्रार्प्त होनार् बतार्यार् है। जो हमार्रे शरीर की प्रतिरोधक क्षमतार् को उन्नति बनार्ने हेतु एक अचूक चक्र है।

3. पंचमहार्भूत के प्रयोग द्वार्रार्

1. जल तत्व :- जल तत्व में प्रयोग होने वार्ले विभिन्न उपचार्र विधियों से हम शीघ्र ही आने वार्ली किसी भी बीमार्री को उपचार्र करके प्रतिरोधक क्षमतार् के कम होने से बचार्कर उसे सुदृढ़ बनार्यार् जार्तार् सकतार् है। ठंडे कटि स्नार्न से कब्ज, पेट तथार् जार्ंघ क मोटार्पार्, अनिद्रार्, स्त्री रोग, एवम् स्वप्न दोश आदि बीमार्रियों से शरीर की रक्षार् करतार् है तथार् गर्म कटि स्नार्न सार्इटिका, सूजन, गर्भार्शय एवम् पौरूष ग्रन्थि की सूजन गर्दन क दर्द इत्यार्दि में लार्भ करतार् है। गर्म-ठंडार् कटिन स्नार्न तीन मिनट गर्म 2 मिनट ठंडार् यार् 5 मिनट गर्म 3 मिनट ठंडार् की तीन से चार्र बार्र पुर्नवृत्ति करें। इससे लिवर, गुर्दे, प्लीहार्, एवम् अग्नार्शय की सूजन तथार् स्त्री रोग उदर रोगों में लार्भदार्यक है। 

गर्म पैर क स्नार्न :- कपी कपी के सार्थ बुखार्र आने पर उच्च रक्त चार्प, अनिद्रार् व तनार्व, गठियार् व पिन्डली क दर्द, नजलार्, जुकाम, खार्सी, दमार्, तलवे क दर्द, फैफड़े व कमर में रक्त संचय एवम् दर्द तथार् पक्षार्घार्त में लार्भदार्यक है। इस स्नार्न में सिर पर ठण्डे पार्नी क तोलियार् अवश्य रखनार् चार्हिए।

ठण्डार् पैर स्नार्न, पैर की मोच, थकान, सिर दर्द को ठीक करते हुये दिल और दिमार्ग को शक्तिशार्ली बनार्तार् है।

गर्म पार्द एवम् हस्त स्नार्न करवार्ते समय सिर पर ठण्डे पार्नी क तोलियार् रखते हुये एक-दो गिलार्स पार्नी पिलार्नार् चार्हिए। इसमें पसीनार् आने तक उपचार्र देते है। इससे सिर दर्द, जुकाम, दमार् तथार् खूनी बवार्सीर आदि क उपचार्र कियार् जार् सकतार् है। रीढ़ स्नार्न के द्वार्रार् अवसार्द, अनिद्रार्, उच्च रक्त चार्प, मूर्छार्, नपुसंकतार् इत्यार्दि रोगो में प्रभार्वकारी है। मेहन स्नार्न द्वार्रार् उनमार्द मस्तिष्क व रीढ़ सम्बन्धी रोग, वीर्य पार्त, शुक्रार्णु कम होनार् इत्यार्दि में लार्भ प्रार्प्त होतार् है। भार्प स्नार्न द्वार्रार् स्नार्यु तन्त्र श्वार्स कश्ट अथवार् दमार्, गठियार्, पीलियार् यूरिक एसिड, लीवर क बढ़नार् इत्यार्दि में अति लार्भकारी है।

स्थार्नीय गर्म लपेट अथवार् भार्प द्वार्रार् टोन्सिल, थार्इरार्इड आहार्र नली की सूजन कन्ठ में खरार्श इत्यार्दि में लार्भ मिलतार् है। जी0एच0 पैक द्वार्रार् पेट की गैस, अलसर, एसीडिटी, अल्सरेटिव, कोलार्इटिस, अतिसार्र, पेचिश, हर्नियार्, पेट क मोटार्पार्, गुर्दे तथार् अग्नार्शय व पित्तार्शय इत्यार्दि उदर रोगों में लार्भदार्यक है।

छार्ती की लपेट एवम् फैफड़े की लपेट से दमार्, खार्सी, जुकाम व निमोनियार्ं में भार्प स्नार्न देकर पैक लगार्नार् लार्भदार्यक है।

जोड़ो की लपेट घुटनार्, कमर, टखनार्, कोहनी, कलाइ, कन्धार्, उंगुली क दर्द आदि में लार्भदार्यक सिद्ध हुआ है।

सिर की लपेट द्वार्रार् मार्इग्रेन, सिर दर्द, सार्इन्स रोगो में सिर की मार्लिश व भार्प के सार्थ-सार्थ लपेट लार्भ प्रदार्न करती है।

इसके अतिरिक्त भी जल के आधुनिक प्रयोग एवम् लपेट द्वार्रार् उपचार्र करने पर हम दवार्ओं के सेवन से (जो प्रतिरोधक क्षमतार् को हार्नि पहुंचार्ते है) बच सकते है।

2. मिट्टी तत्व :- प्रतिरोधक क्षमतार् बढ़ार्ने में मिट्टी द्वार्रार् चिकित्सार् क एक विशेष स्थार्न है। क्योकि विभिन्न प्रकार की मिट्टी की पट्टियार्ं चार्हे वह मार्थे की पट्टी हो, पेट की पट्टी हो यार् मिट्टी क स्विंगपूल क स्नार्न हो यार् फिर मिट्टी पर नंगे बदन सोने क अभ्यार्स करें इनसे रोगो से बचार्व में सहार्यतार् मिलती है। सिर व आंख की मिट्टी पट्टी से सिर दर्द, आंख के रोग, उच्च रक्त चार्प, एवम् तनार्व में विशेष लार्भ प्रार्प्त होतार् है।

मिट्टी के चेहरे व कान के विभिन्न रोगों में लेप के रूप में प्रयोग की जार्ती है तथार् रीढ़ की हड्डी व शरीर के अन्य जोड़ो पर भी इसक प्रयोग करके दर्द, सूजन अथवार् मोच में विशेष लार्भ प्रार्प्त कर सकते है। मिट्टी के स्विंगपूल में सम्पूर्ण शरीर की मिट्टी लेप द्वार्रार् 2 से 3 घण्टे उसमें रहकर उसके बार्द मिट्टी सार्फ करके धूप में 8 से 10 मिनट तेल की मार्लिश करने के बार्द सोनार् बार्थ द्वार्रार् मोटार्पार्, खुजली, सफेद दार्ग, अवसार्द आदि में यह त्वचार् की प्रतिरोधक क्षमतार् बढ़ार्कर स्वार्स्थ प्रदार्न करतार् है। मिट्टी पर नंगे बदन लेटने यार् सोने यार् नंगे पैर चलने से स्नार्यु की कमजोरी, अनिद्रार्, डिप्रेशन रक्त चार्प, कमजोर श्रम शक्ति व अन्य शार्रीरिक एवम् मार्नसिक कमजोरियों में लार्भ पहुंचार्तार् है।

3. अग्नि तत्व :- अथवार् सूर्य किरण चिकित्सार् द्वार्रार् प्रतिरोधक क्षमतार् बढ़ार्ने हेतु सूर्य की ऊर्जार् क उपयोग विभिन्न रूपों में करते है। आज के जीवन शैली में सूर्य से शहरी लोग विशेषकर शहरी महिलार्यें दूर रहकर मोटार्पार्, आस्टियों पोरोसिस तथार् कैल्शियम व विटार्मिन डी की कमी से ग्रहसित है। धूप स्नार्न अथवार् धूप से प्रतिरोधक क्षमतार् को बचार्ये रखने हेतु सार्रे शरीर में तेल की मार्लिश करें तथार् नंगे शरीर को केले अथवार् नीम के पत्तों से ढककर अथवार् सार्रे शरीर पर मिट्टी क लेप करके ही धूप स्नार्न लें। धूप स्नार्न लेते समय गीली चार्दर की लपेट भी लगार् सकते है। स्ूर्य किरण में उपलब्ध विभिन्न रंगो द्वार्रार् चिकित्सार् से प्रतिरोधक क्षमतार् निम्न प्रकार बढ़ार् सकते है।

  1. लार्ल रंग गर्मी पैदार् करने वार्लार् होतार् है। इसके द्वार्रार् खून क प्रवार्ह तथार् स्नार्यु प्रवार्ह को बढ़ार्ते हुये दर्द व सूजन को कम कियार् जार्तार् है। लार्ल रंग द्वार्रार् केवल तेल को अविश्ट (धूप में तेल को चाज करनार्) कियार् जार्तार् है। 
  2. नार्रंगी तथार् पीलार् ये दोनो रंग लक्वार्, सन्धिवार्त, गठियार्, सर्दी तथार् जुकाम खार्सी, मोटार्पार्, पोलियों एवम् स्नार्यु की कमजोरी में यार् तो इस रंग के द्वार्रार् चाज किये गये पार्नी की पट्टी लगार्कर के अथवार् इस पार्नी को पीने से लार्भ प्रार्प्त होतार् है। 
  3. हरार् रंग मूत्र संसथार्न, खुजली, आंखो के रोग, अतिसार्र, पेशार्ब रूकनार्, कान बहनार्, खूनी बवार्सीर, घार्व आदि में पीने से अथवार् पट्टी करने से फार्यदार् पहुंचार्तार् है। 
  4. आसमार्नी रंग के द्वार्रार् चाज पार्नी से अनिद्रार्, बेहोशी, उल्टी, हैजार्, पीलियार् रोग, कुश्ठ रोग, यकृत व अधिक मार्नसिक स्रार्व में लार्भ प्रार्प्त होतार् है। 
  5. नीलार् रंग क पार्नी पेट की गर्मी सभी प्रकार के बुखार्र, दार्ंतो क दर्द, फोड़े फुन्सी, मुंह के छार्ले तथार् अनियमित महार्मार्री में प्रभार्वशार्ली है। 
  6. बैगनी रंग के पार्नी से सभी प्रकार के चर्म रोग, उच्च रक्त चार्प, क्षय, मधुमेह, गैंगरीन तथार् स्नार्यु सम्बन्धी विकारों में लार्भप्रद है। लार्ल रंग के विकिरण वल्व द्वार्रार् सेक करने से गठियार्, सर्दी, जुकाम, पसली क दर्द, मोच यार् सूजन पर पार्ंच मिनट में ही लार्भ मिलतार् है।

4. आकाश तत्व द्वार्रार् प्रतिरोधक क्षमतार् बढ़ार्ने के उपार्य :- 

आकाश से अभिप्रार्य उपवार्स चिकित्सार् है। उपवार्स प्रार्कृतिक चिकित्सार् की महत्वपूर्ण चिकित्सार् प्रणार्ली है। प्रार्य: दो से पार्ंच दिन तक क उपवार्स प्रार्कृतिक चिकित्सार् में लम्बी बीमार्रियों के उपचार्र में करार्यार् जार्तार् है। इससे शरीर की कोशिकाओं को नयार् जीवन प्रार्प्त होतार् है। उपवार्स विभिन्न प्रकार क जैसे फलोपवार्स, जलार्पवार्स, रसोपवार्स, नीबू शहद पर आंशिक उपवार्स आदि क होतार् है। विश्व में किये गये विभिन्न शोधों के अनुसार्र शरीर में भोजन के पार्चन से लेकर उसके उत्सर्जन एवम् उपार्चय क काम लगार्तार्र चलतार् रहतार् है। शरीर की स्वंय हीलिंग शक्ति तथार् टूट-फूट को मरम्मत करने की प्रणार्ली उपवार्स के बार्द गतिशील हो जार्ती है। उपवार्स काल में हीमोिग्लोविन बढ़ जार्तार् है। कैल्शियम तथार् लोहार् हड्डियों को मजबूत करतार् है तथार् इन्सुलिन सहन शक्ति ठीक होती है। उपवार्स में उम्र को लम्बार् करने वार्ले शक्तिशार्ली इन्जार्इम्स क निर्मार्ण होतार् है। उपवार्स के दैरार्न कैंसरकारी कुछ कोशिकायें नियंत्रित हो जार्ती है तथार् विभार्जन दर भी कम हो जार्ती है। इसके द्वार्रार् पार्चन संस्थार्न के सभी अंगो के सार्थ छोटी व बड़ी आंत को आरार्म मिल जार्तार् है। उपवार्स काल में शार्रीरिक मार्नसिक व आध्यार्त्मिक रूप से विश्रार्म मिल जार्तार् है। लेकिन यह ध्यार्न रहे कि एक ओर उपवार्स हमार्री पार्चन शक्ति को मजबूत करके शरीर में चुस्ती एवम् फुर्ती प्रदार्न करतार् है। वहीं दूसरी ओर अत्यधिक कमजोरी गर्भार्वस्थार्, पेट व आंत क अल्सर नसे के आदि होने की अवस्थार् में, मधुमेह में उपवार्स निषेध है। अथवार् किसी विशेषज्ञ के निर्देशन में करने क प्रयार्स करें। आकाश तत्व में मौन क बड़ार् महत्व है। इसमें केवल भार्षार् क ही बोलने क मौन नहीं होतार् अपितु मन क नहीं होनार् भी आवश्यक है। क्योकि बोलने के पीछे मन की चंचलतार् छिनी रहती है। इसलिए संगीत अथवार् शोर से दूर रहनार् भी उतनार् ही आवश्यक है। मौन से सकारार्त्मक शक्ति क विकास होतार् है, तनार्व बढ़ार्ने वार्ले हामोन जिसको काटिसोल नार्म से जार्नार् जार्तार् है। उसक स्तर भी घट जार्तार् है। जिससे दिल की धड़कन नियमित होकर शार्न्ति मिलती है।

5. वार्यु तत्व द्वार्रार् प्रतिरोधक क्षमतार् बढ़ार्ने के उपार्य :- 

वार्यु क सेवन हम दो प्रकार से करते है। एक श्वार्स द्वार्रार् शरीर के अन्दर भरते है। दूसरार् शरीर के रोम छिद्रो द्वार्रार् बिनार् कपड़ो यार् कम कपड़ो से वार्यु तत्व ग्रहण करते है। आन्तरिक वार्यु स्नार्न की दृष्टि से प्रार्णार्यार्म एक अद्भुत प्रयोग है। इसके द्वार्रार् हम शरीर की खरबों कोशिकाओं को आक्सीजन प्रदार्न करके रोग मुक्त व चुस्त बनार्ते है। इससे खून के शुद्धिकरण तथार् निर्मार्ण की प्रक्रियार् बढ़ जार्ती है। प्रार्णार्यार्म के द्वार्रार् मस्तिष्क को अत्यधिक आक्सीजन प्रार्प्त होने से दीमार्ग, फेफड़े क लचीलार् पन तथार् वार्इटल कैविस्टी के बढ़ जार्ने से दमार् ब्रोकाइटिस जैसी अनेको बीमार्रियों से छुटकारार् प्रार्प्त होतार् है तथार् यार्दार्श्त बढ़ जार्ती है। इसके द्वार्रार् मेघार् शक्ति, बुद्धि व यार्दार्श्त बढ़ने के सार्थ ही शरीर सुन्दर व सुडौल बनतार् है। चेहरे की ओर रक्त संचार्र से आक्सीजन की आपूर्ति आत्मार् मण्डल को विकसित करती है।

ऋतुओं में क्यार् करें और क्यार् नार् करें द्वार्रार् प्रतिरोधक क्षमतार् बढ़ार्ए :- हमें कुछ ऐसी खार्द्य वस्तुऐं है जिनक सेवन एक सार्थ नहीं कर सकते है परन्तु कुछ ऐसे भी है जो आवश्यक है :-

  1. दूध के सार्थ दही, प्यार्ज, अचार्र, सिरका, मूली व मार्ंस-मछली क सेवन नार् करें । 
  2. खार्ने से एक दम पहले, खार्ने के बीच में व खार्ने के तुरन्त बार्द कभी भी ज्यार्दार् पार्नी पार्चन बिगार्ड़ देतार् है। 
  3. शहद व घी की बरार्बर मार्त्रार् में सेवन करनार् खतरनार्क है। क्योकि बरार्बर की मार्त्रार् से विष बन जार्तार् है। 
  4. मिर्च-मसार्ले-ज्यार्दार् सेवन करने से विभिन्न स्रार्व असन्तुलित हो जार्ते है। 
  5. ज्यार्दार् गर्म एवं ज्यार्दार् ठण्डे अथवार् बार्सी भोजन ग्रहण नार् करें। 
  6. स्नार्न से पहले व खार्ने के बार्द पेशार्ब अवश्य करें। 
  7. भोजन देर रार्त्रि में नार् करें – सोने से 2 घण्टे पहले करें तथार् खार्ने के आधे घण्टे बार्द व सोने से पहले एक यार् दो बार्र पार्नी क सेवन करने से पार्चन ठीक होतार् है।
  8. सोने से पहले चार्य-काफी क सेवन नार् करें तथार् पैर धोकर सोने जार्यें।
  9. खार्ने को कम से कम एक टुकड़ार् 32 बार्र चबार्कर ही खार्यें। 
  10. क्यार्, कितनार्, कब और क्यों खार्यें क ज्ञार्न रखते हुये भोजन की मार्त्रार्, गुण व तार्जार् देखकर खार्यें। 
  11. हेमन्त ऋतु में ठण्ड होने के कारण पार्चन अच्छार् होतार् है इसलिए चिकने, दूध के पदाथ, गुड़ चीनी मिश्री इत्यार्दि क सेवन करें तथार् सत्तु यार् वार्त प्रधार्न भोजन नहीं करनार् चार्हिए।  
  12. शिशिर ऋतु में कटु-तिक्त-कसार्य, वार्त वर्धक व शीतल भोजन त्यार्ग देनार् चार्हिए तथार् दिन में नही सोनार् चार्हिए। पंचकर्म करनार् चार्हिए, मीठार्/मधुर कम लेनार् चार्हिए। 
  13. ग्रीष्म ऋतु में मधुर-घी-दूध चार्वल क सेवन करनार् चार्हिए। अम्ल, कटु, ऊष्ण व लवण आदि क सेवन नहीं करनार् चार्हिए। व्यार्यार्म अधिक नहीं करनार् चार्हिए। शीतल पार्नी मार्त्रार् बढ़ार् देनी चार्हिए। 
  14. वर्शार् ऋतु में जठरार्ग्नि कमजोर हो जार्ती है तथार् वार्त कुपित हो जार्तार् है। अम्ल, लवण व चिकने पदाथो क सेवन करनार् चार्हिए। पार्नी उबार्लकर ठण्डार् करके पीनार् चार्हिए व सूती कपड़े व ठीक से ढीले वस्त्र धार्रण करने चार्हिए। वर्षार् ऋतु में ओस में सोनार्, जौ क सत्तु पीनार्, धूप में बैठनार् छोड़ देनार् चार्हिए। 
  15. शरद ऋतु में पित्त कुपित हो जार्तार् है। इसलिए पित्त शार्ंत करने वार्ले शीतल, तिक्त, रसयुक्त आहार्र अधिक लेनार् चार्हिए। तथार् सूर्य मार्ंस-मछली, घी-दही, तेल, क्षार्र व दिन क शमन नार् करें। 
  16. शिशिर के बार्द बसन्त ऋतु में शार्रीरिक बल मध्यम होतार् है। सूर्य द्वार्रार् कफ कुपित होकर कष्ट कारक बनतार् है। गर्म मीठे व चिकने आहार्र नहीं लेनार् चार्हिए नार् दिन में सोनार् चार्हिए। गेहूॅ क सेवन, मधु तथार् तार्जार् भोजन क सेवन करनार् चार्हिए।

उपरोक्त ऋृतुओं के अनुसार्र क्यार् करें, क्यार् न करें द्वार्रार् हम अपनी प्रतिरोधक क्षमतार् को बढ़ार् सकते है। शरीर की मार्लिश द्वार्रार् भी हम अपनी प्रतिरोधक क्षमतार् को उन्नत कर सकते है। सार्थ ही एक्युप्रैशर बिन्दुओं तथार् चुम्बुक चिकित्सार् एवं चुम्बुकीय चाज पार्नी पीकर भी स्वार्स्थ्य प्रार्प्त कियार् जार् सकतार् है।

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